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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 117

खनीनेत्र-चरित

अध्याय 116अध्याय-सूचीअध्याय 118

श्लोक 1 (markandeya.117.1)

मार्कण्डेय उवाच तस्य पुत्रः खनीनेत्रो महाबलपराक्रमः । यस्य यज्ञेष्वगायन्त गन्धर्वा विस्मयान्विताः ॥ 117.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tasya putraḥ khanīnetro mahābalaparākramaḥ yasya yajñeṣvagāyanta gandharvā vismayānvitāḥ

मार्कण्डेय ने कहा—उसका पुत्र खनीनेत्र महान् बल-पराक्रम वाला था, जिसके यज्ञों में गन्धर्व विस्मित होकर गान करते थे।

श्लोक 2 (markandeya.117.2)

खनीनेत्रसमो नान्यो भुवि यज्वा भविष्यति । तेन यज्ञायुते पूर्णे दत्ता पृथ्वी ससागरा ॥ 117.2 ॥

khanīnetrasamo nānyo bhuvi yajvā bhaviṣyati tena yajñāyute pūrṇe dattā pṛthvī sasāgarā

पृथ्वी पर खनीनेत्र के समान यज्ञकर्ता अन्य कोई न होगा; दस हजार यज्ञ पूर्ण होने पर उसने सागर सहित समस्त पृथ्वी दान में दे दी।

श्लोक 3 (markandeya.117.3)

दत्त्वा च सकलां पृथ्वीं ब्राह्मणानां महात्मनाम् । तपसा द्रव्यमासाद्य मोदयन्साधितेन यः ॥ 117.3 ॥

dattvā ca sakalāṁ pṛthvīṁ brāhmaṇānāṁ mahātmanām tapasā dravyamāsādya modayansādhitena yaḥ

सम्पूर्ण पृथ्वी महात्मा ब्राह्मणों को दान करके, उसने तप से धन प्राप्त कर, उस अर्जित धन से उन्हें प्रसन्न किया।

श्लोक 4 (markandeya.117.4)

यतश्च प्राप्य वित्तर्द्धिमतुलां दातृसत्तमात् । जगृहुर्ब्राह्मणा विप्र नान्यराज्ञः प्रतिग्रहम् ॥ 117.4 ॥

yataśca prāpya vittarddhimatulāṁ dātṛsattamāt jagṛhurbrāhmaṇā vipra nānyarājñaḥ pratigraham

हे विप्र, उस श्रेष्ठ दाता से अतुलनीय समृद्धि का धन पाकर ब्राह्मणों ने फिर किसी अन्य राजा से दान ग्रहण नहीं किया।

श्लोक 5 (markandeya.117.5)

सप्तषष्टिसहस्राणि सप्तषष्टिशतानि च । सप्तषष्टिं च यो यज्ञानयजद् भूरिदक्षिणान् ॥ 117.5 ॥

saptaṣaṣṭisahasrāṇi saptaṣaṣṭiśatāni ca saptaṣaṣṭiṁ ca yo yajñānayajad bhūridakṣiṇān

जिसने सड़सठ हजार, सड़सठ सौ, तथा सड़सठ यज्ञ किए, प्रत्येक में प्रचुर दक्षिणा दी।

श्लोक 6 (markandeya.117.6)

अपुत्रः स महीपालो मृगयामुपचक्रमे । पुत्रार्थं पितृयज्ञाय मांसकामो महामुने ॥ 117.6 ॥

aputraḥ sa mahīpālo mṛgayāmupacakrame putrārthaṁ pitṛyajñāya māṁsakāmo mahāmune

हे महामुने, वह राजा पुत्रहीन था; पुत्रप्राप्ति हेतु पितृयज्ञ के लिए मांस की इच्छा से वह मृगया करने निकला।

श्लोक 7 (markandeya.117.7)

अश्वारूढो विना सैन्यमेक एव महावने । बद्धगोधाङ्गुलित्राणो बाणखड्गधनुर्धरः ॥ 117.7 ॥

aśvārūḍho vinā sainyameka eva mahāvane baddhagodhāṅgulitrāṇo bāṇakhaḍgadhanurdharaḥ

घोड़े पर सवार होकर, सेना के बिना अकेला ही, विशाल वन में, गोधा-चर्म का अंगुलित्राण बाँधे, बाण-खड्ग-धनुष धारण किए हुए।

श्लोक 8 (markandeya.117.8)

तं वाहयन्तं तुरगमन्यतो गहनाद्वनात् । विनिष्क्रम्य मृगः प्राह मां हत्वाभिमतं कुरु ॥ 117.8 ॥

taṁ vāhayantaṁ turagamanyato gahanādvanāt viniṣkramya mṛgaḥ prāha māṁ hatvābhimataṁ kuru

जब वह अपने घोड़े को हाँक रहा था, तभी घने वन से अचानक निकलकर एक मृग बोला—मुझे मारकर अपना अभीष्ट कार्य पूर्ण करो।

श्लोक 9 (markandeya.117.9)

अन्ये मृगाः पलायन्ते महाभीत्या विलोक्य माम् । कथमात्मप्रदानं त्वं मृत्यवे कर्तुमिच्छसि ॥ 117.9 ॥

anye mṛgāḥ palāyante mahābhītyā vilokya mām kathamātmapradānaṁ tvaṁ mṛtyave kartumicchasi

राजा ने कहा—अन्य मृग तो मुझे देखकर अत्यंत भय से भाग जाते हैं; तुम अपने आपको मृत्यु के हवाले क्यों करना चाहते हो?

श्लोक 10 (markandeya.117.10)

मृग उवाच अपुत्रोऽहं महाराज वृथा जन्मप्रयोजनम् । विचारयन्न पश्यामि प्राणानामिह धारणम् ॥ 117.10 ॥

mṛga uvāca aputro ’haṁ mahārāja vṛthā janmaprayojanam vicārayanna paśyāmi prāṇānāmiha dhāraṇam

मृग ने कहा—हे महाराज, मैं पुत्रहीन हूँ, मेरा जन्म व्यर्थ हुआ। इस पर विचार करते हुए मुझे यहाँ प्राण धारण करने का कोई प्रयोजन नहीं दिखता।

श्लोक 11 (markandeya.117.11)

मार्कण्डेय उवाच अथाभ्येत्य मृगः प्राह तमन्यो वसुधाधिपम् । मृगस्य तस्य प्रत्यक्षमलमेतेन पार्थिव ॥ 117.11 ॥

mārkaṇḍeya uvāca athābhyetya mṛgaḥ prāha tamanyo vasudhādhipam mṛgasya tasya pratyakṣamalametena pārthiva

मार्कण्डेय ने कहा—तब उस मृग के सामने ही एक दूसरा मृग आकर उस भूपति से बोला—हे राजन्, इससे बस करो!

श्लोक 12 (markandeya.117.12)

घातयस्वेति मां मांसैर्मम कर्म समाचार । यथा कृतार्थता ते स्यान्मम चाप्युपकारि तत् ॥ 117.12 ॥

ghātayasveti māṁ māṁsairmama karma samācāra yathā kṛtārthatā te syānmama cāpyupakāri tat

मुझे मारो और मेरे मांस से अपना कर्म सम्पन्न करो, जिससे तुम्हारा कार्य सिद्ध हो और मेरा भी उपकार हो।

श्लोक 13 (markandeya.117.13)

पुत्रार्थं त्वं महाराज स्वपितॄन्यष्टुमिच्छसि । अपुत्रस्यास्य मांसेन लप्स्यसे वाञ्छितं कथम् ॥ 117.13 ॥

putrārthaṁ tvaṁ mahārāja svapitṝnyaṣṭumicchasi aputrasyāsya māṁsena lapsyase vāñchitaṁ katham

हे महाराज, तुम पुत्रप्राप्ति के लिए अपने पितरों का यजन करना चाहते हो; इस पुत्रहीन के मांस से तुम अपना अभीष्ट कैसे प्राप्त करोगे?

श्लोक 14 (markandeya.117.14)

यादृक्कर्म विनिष्पाद्यं तादृग्द्रव्यमुपाहरेत् । दुर्गन्धैर्न सुगन्धानां गन्धज्ञानविनिर्णयः ॥ 117.14 ॥

yādṛkkarma viniṣpādyaṁ tādṛgdravyamupāharet durgandhairna sugandhānāṁ gandhajñānavinirṇayaḥ

जिस प्रकार का कार्य सिद्ध करना हो, उसी के अनुरूप वस्तु लानी चाहिए; दुर्गन्धित वस्तुओं से सुगन्ध का निर्णय नहीं होता।

श्लोक 15 (markandeya.117.15)

राजोवाच वैराग्यकारणं प्रोक्तमनेनापुत्रता मम । कथ्यतां प्राणसंत्यागे यत्ते वैराग्यकारणम् ॥ 117.15 ॥

rājovāca vairāgyakāraṇaṁ proktamanenāputratā mama kathyatāṁ prāṇasaṁtyāge yatte vairāgyakāraṇam

राजा ने कहा—इसने अपनी पुत्रहीनता को वैराग्य का कारण बताया। अब तुम बताओ, प्राणत्याग के लिए तुम्हारे वैराग्य का क्या कारण है?

श्लोक 16 (markandeya.117.16)

मृग उवाच बहवो मे सुता भूप बह्व्यो दुहितरस्तथा । यच्चिन्तादुःखदावाग्निज्वालामध्ये वसाम्यहम् ॥ 117.16 ॥

mṛga uvāca bahavo me sutā bhūpa bahvyo duhitarastathā yaccintāduḥkhadāvāgnijvālāmadhye vasāmyaham

मृग ने कहा—हे भूप, मेरे अनेक पुत्र हैं और अनेक पुत्रियाँ भी; उन्हीं की चिन्ता रूपी दावाग्नि की ज्वालाओं के बीच मैं निवास करता हूँ।

श्लोक 17 (markandeya.117.17)

सर्वसाध्या नरेन्द्रेयं मृगजातिः सुकातरा । तेष्वपत्येषु मे चातिममत्वं तेन दुःखितः ॥ 117.17 ॥

sarvasādhyā narendreyaṁ mṛgajātiḥ sukātarā teṣvapatyeṣu me cātimamatvaṁ tena duḥkhitaḥ

हे नरेन्द्र, यह मृग-जाति सबके द्वारा सहज ही वश में की जा सकने वाली और अत्यंत भीरु है; तथा उन सन्तानों के प्रति मेरा अत्यधिक ममत्व है, जिसके कारण मैं दुःखी रहता हूँ।

श्लोक 18 (markandeya.117.18)

मनुष्यसिंहशार्दूलवृकादिभ्यो बिभेम्यहम् । विहीनात्सर्वसत्त्वेभ्यः श्वशृगालादपि प्रभो ॥ 117.18 ॥

manuṣyasiṁhaśārdūlavṛkādibhyo bibhemyaham vihīnātsarvasattvebhyaḥ śvaśṛgālādapi prabho

हे प्रभो, मैं मनुष्य, सिंह, व्याघ्र, भेड़िये आदि से भयभीत रहता हूँ, यहाँ तक कि सबसे तुच्छ प्राणी कुत्ते और सियार से भी।

श्लोक 19 (markandeya.117.19)

सोऽहं निमित्तं बन्धूनामिमां शून्यां वसुन्धराम् । नृसिंहादिभयात्सर्वामिच्छामि सुनृशंसकृत् ॥ 117.19 ॥

so ’haṁ nimittaṁ bandhūnāmimāṁ śūnyāṁ vasundharām nṛsiṁhādibhayātsarvāmicchāmi sunṛśaṁsakṛt

मैं अपने बन्धुओं के निमित्त, यद्यपि यह क्रूरतापूर्ण जान पड़ता है, चाहता हूँ कि यह सम्पूर्ण सूनी पृथ्वी मनुष्य-सिंह आदि के भय से रहित हो जाए।

श्लोक 20 (markandeya.117.20)

तृणान्यन्येऽपि खादन्ति गोऽजावितुरगादिकाः । तांस्तेषां पोषणायाहमिच्छामि निधनं गतान् ॥ 117.20 ॥

tṛṇānyanye ’pi khādanti go ’jāvituragādikāḥ tāṁsteṣāṁ poṣaṇāyāhamicchāmi nidhanaṁ gatān

गाय, बकरी, भेड़, घोड़े आदि अन्य भी घास खाते हैं; अपनी सन्तानों के पोषण हेतु मैं चाहता हूँ कि वे अन्य प्राणी नष्ट हो जाएँ।

श्लोक 21 (markandeya.117.21)

निष्क्रान्तेषु ततस्तेषु ममापत्येषु वै पृथक् । भवन्ति चिन्ताः शतशो ममत्वावृतचेतसः ॥ 117.21 ॥

niṣkrānteṣu tatasteṣu mamāpatyeṣu vai pṛthak bhavanti cintāḥ śataśo mamatvāvṛtacetasaḥ

और जब मेरी वे सन्तानें अलग-अलग वन में निकल जाती हैं, तब ममत्व से घिरे मेरे चित्त में सैकड़ों चिन्ताएँ उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 22 (markandeya.117.22)

किं कूटपाशं किं वज्रं वागुरां किं सुतो मम । प्राप्तश्चरन्वने किं वा नृसिंहादिवशं गतः ॥ 117.22 ॥

kiṁ kūṭapāśaṁ kiṁ vajraṁ vāgurāṁ kiṁ suto mama prāptaścaranvane kiṁ vā nṛsiṁhādivaśaṁ gataḥ

क्या मेरा पुत्र वन में विचरते हुए किसी छिपे हुए फंदे में फँस गया? या वज्र से टकरा गया? या जाल में आ गया? या मनुष्य-सिंह आदि के वश में चला गया?

श्लोक 23 (markandeya.117.23)

प्राप्तोऽयमेकः सम्प्राप्तास्तेऽवस्थां कीदृशीं मम । साम्प्रतं ते चिरायन्ते ये गताः सुमहावनम् ॥ 117.23 ॥

prāpto ’yamekaḥ samprāptāste ’vasthāṁ kīdṛśīṁ mama sāmprataṁ te cirāyante ye gatāḥ sumahāvanam

यह एक तो लौट आया, परन्तु शेष किस दशा में हैं? जो महावन में गए हैं, वे अभी तक विलम्ब कर रहे हैं।

श्लोक 24 (markandeya.117.24)

दृष्टवा प्राप्तान्ममाभ्याशमहं तानात्मजान्नृप । ईषदुछ्रवसितः क्षेममिच्छामि रजनीं पुनः ॥ 117.24 ॥

dṛṣṭavā prāptānmamābhyāśamahaṁ tānātmajānnṛpa īṣaduchravasitaḥ kṣemamicchāmi rajanīṁ punaḥ

हे राजन्, अपने उन बच्चों को अपने पास सकुशल लौटा हुआ देखकर मैं कुछ राहत की साँस लेता हूँ, और फिर रात्रि की भी कुशलता चाहने लगता हूँ।

श्लोक 25 (markandeya.117.25)

प्रभाते दिवसं क्षेममस्तगेऽर्के निशामपि । वाञ्छाम्यहं कदा क्षेमं सर्वकालं भविष्यति ॥ 117.25 ॥

prabhāte divasaṁ kṣemamastage ’rke niśāmapi vāñchāmyahaṁ kadā kṣemaṁ sarvakālaṁ bhaviṣyati

प्रातःकाल दिन की कुशलता चाहता हूँ, और सूर्यास्त होने पर रात्रि की भी; न जाने कब सदा के लिए कुशलता प्राप्त होगी।

श्लोक 26 (markandeya.117.26)

एतत्ते कथितं भूप महोद्वेगस्य कारणम् । अतः प्रसादं कुरु मे बाणोऽयं पात्यतां मयि ॥ 117.26 ॥

etatte kathitaṁ bhūpa mahodvegasya kāraṇam ataḥ prasādaṁ kuru me bāṇo ’yaṁ pātyatāṁ mayi

हे भूप, यही मेरे महान् उद्वेग का कारण मैंने तुम्हें बताया। अतः मुझ पर कृपा करो, यह बाण मुझ पर चलाओ।

श्लोक 27 (markandeya.117.27)

इति दुःखशताविष्टः प्राणान्नाहं त्यजामि यत् । तत्कारणं निबोध त्वं ब्रुवतो मम पार्थिव ॥ 117.27 ॥

iti duḥkhaśatāviṣṭaḥ prāṇānnāhaṁ tyajāmi yat tatkāraṇaṁ nibodha tvaṁ bruvato mama pārthiva

इस प्रकार सैकड़ों दुःखों से घिरा होकर भी मैं स्वयं प्राणत्याग नहीं करता—हे पार्थिव, मुझसे कहते हुए उसका कारण भी सुनो।

श्लोक 28 (markandeya.117.28)

असूर्या नाम ते लोका यान्गच्छन्त्यात्मघातकाः । यज्ञोपयुक्ताः पशवः सम्प्रयान्युच्छ्रितिं प्रभो ॥ 117.28 ॥

asūryā nāma te lokā yāngacchantyātmaghātakāḥ yajñopayuktāḥ paśavaḥ samprayānyucchritiṁ prabho

हे प्रभो, आत्मघात करने वाले जिन 'असूर्य' नामक निन्दित लोकों को प्राप्त होते हैं, वहाँ मैं नहीं जाना चाहता; परन्तु यज्ञ में उपयुक्त होने वाले पशु उत्कर्ष को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 29 (markandeya.117.29)

अग्निः पशुरभूत्पूर्वं पशुरासीज्जलाधिपः । भास्वानथोच्छ्रितीः प्राप्ता यज्ञे निष्ठामुपागताः ॥ 117.29 ॥

agniḥ paśurabhūtpūrvaṁ paśurāsījjalādhipaḥ bhāsvānathocchritīḥ prāptā yajñe niṣṭhāmupāgatāḥ

अग्नि पहले पशु रूप में था, जलाधिपति वरुण भी पशु रूप में थे; तेजस्वी सूर्य भी यज्ञ में पूर्णता को प्राप्त कर उत्कर्ष को प्राप्त हुए।

श्लोक 30 (markandeya.117.30)

तन्ममैतां कृपां कृत्वा नय मामुच्छ्रितिं नृप । आत्मनश्चेप्सितं कामं पुत्रलाभादवाप्स्यसि ॥ 117.30 ॥

tanmamaitāṁ kṛpāṁ kṛtvā naya māmucchritiṁ nṛpa ātmanaścepsitaṁ kāmaṁ putralābhādavāpsyasi

अतः मुझ पर यह कृपा करके मुझे उस उत्कर्ष तक पहुँचाओ, हे राजन्; और तुम स्वयं भी पुत्रप्राप्ति रूपी अपनी अभीष्ट कामना को प्राप्त करोगे।

श्लोक 31 (markandeya.117.31)

पूर्वमृग उवाच राजेन्द्र नैष हन्तव्यो धन्योऽयं सुकृती मृगः । बहवस्तनया ह्यस्य हन्तव्योऽहमसन्ततिः ॥ 117.31 ॥

pūrvamṛga uvāca rājendra naiṣa hantavyo dhanyo ’yaṁ sukṛtī mṛgaḥ bahavastanayā hyasya hantavyo ’hamasantatiḥ

पहले मृग ने कहा—हे राजेन्द्र, इसे मत मारो, यह पुण्यशाली मृग है, क्योंकि इसकी अनेक सन्तानें हैं। मुझे ही मारो, जो सन्तानहीन हूँ।

श्लोक 32 (markandeya.117.32)

उत्तरमृग उवाच एकदेहभयं यस्य दुःखं धन्यः स वै भवान् । बहूनि यस्य देहानि तस्य दुःखान्यनेकधा ॥ 117.32 ॥

uttaramṛga uvāca ekadehabhayaṁ yasya duḥkhaṁ dhanyaḥ sa vai bhavān bahūni yasya dehāni tasya duḥkhānyanekadhā

दूसरे मृग ने कहा—तुम ही धन्य हो, जिसका दुःख केवल एक शरीर के भय तक सीमित है; परन्तु जिसके अनेक शरीर हैं, उसके दुःख अनेक गुना हैं।

श्लोक 33 (markandeya.117.33)

एको यदाहमासं तु प्राक्तदा देहजं मम । दुःखमासीन्ममत्वे तु भार्यायास्तदभूद्द्विधा ॥ 117.33 ॥

eko yadāhamāsaṁ tu prāktadā dehajaṁ mama duḥkhamāsīnmamatve tu bhāryāyāstadabhūddvidhā

जब मैं अकेला था, तब मेरा दुःख केवल अपने शरीर से उत्पन्न था; परन्तु ममत्ववश जब पत्नी हुई, तब वह दुगुना हो गया।

श्लोक 34 (markandeya.117.34)

यदाजातान्यपत्यानि तदा यावन्ति तानि वै । तावच्छरीरभूमीनि मम दुःखान्यथाभवन् ॥ 117.34 ॥

yadājātānyapatyāni tadā yāvanti tāni vai tāvaccharīrabhūmīni mama duḥkhānyathābhavan

जब सन्तानें उत्पन्न हुईं, तब जितनी वे थीं, उतने ही मेरे शरीर के क्षेत्र बन गए, और मेरे दुःख भी उतने ही हो गए।

श्लोक 35 (markandeya.117.35)

न कृतार्थो भवाम्यस्य नातिदुःखाय सम्भवः । इह दुःखाय मत्सूतिःपरत्र च विरोधिनी ॥ 117.35 ॥

na kṛtārtho bhavāmyasya nātiduḥkhāya sambhavaḥ iha duḥkhāya matsūtiḥparatra ca virodhinī

इससे न तो मैं कृतार्थ हुआ, न ही मेरा जन्म अत्यधिक दुःख से रहित हुआ; मेरी सन्तानोत्पत्ति इस लोक में दुःखदायी है और परलोक में भी बाधक है।

श्लोक 36 (markandeya.117.36)

यतो रक्षणपोषार्थमपत्यानां करोमि तत् । चिन्तयामि च सम्भूतिस्तेन मे नरके ध्रुवम् ॥ 117.36 ॥

yato rakṣaṇapoṣārthamapatyānāṁ karomi tat cintayāmi ca sambhūtistena me narake dhruvam

सन्तानों की रक्षा और पोषण के लिए मैं वह [अन्यों की हानि चाहने जैसा] कर्म करता हूँ, और उनकी समृद्धि की सतत चिन्ता करता हूँ—इसी कारण मेरे लिए नरक निश्चित है।

श्लोक 37 (markandeya.117.37)

राजोवाच न वेद्मि किं सन्ततिमान्धन्योऽपुत्रोऽत्र किं मृग । पुत्रार्थश्चायमारम्भो मम दोलायते मनः ॥ 117.37 ॥

rājovāca na vedmi kiṁ santatimāndhanyo ’putro ’tra kiṁ mṛga putrārthaścāyamārambho mama dolāyate manaḥ

राजा ने कहा—हे मृग, मैं नहीं जानता कि इस संसार में सन्तानवान् धन्य है या पुत्रहीन; पुत्र-प्राप्ति का यह मेरा प्रयास ही अब मेरे मन को डाँवाडोल कर रहा है।

श्लोक 38 (markandeya.117.38)

दुःखाय सन्ततिः सत्यमैहिकामुष्मिकाय तत् । तथाप्यतनयान्यान्ति ऋणानीति श्रुतं मया ॥ 117.38 ॥

duḥkhāya santatiḥ satyamaihikāmuṣmikāya tat tathāpyatanayānyānti ṛṇānīti śrutaṁ mayā

सन्तान सचमुच इहलोक और परलोक दोनों के लिए दुःखदायी है; फिर भी मैंने सुना है कि पुत्रहीन के ऋण चुकते नहीं।

श्लोक 39 (markandeya.117.39)

सोऽहं यतिष्ये पुत्रार्थमृते प्राणिवधं मृग । तपसैव प्रचण्डेन यथापूर्वं महीपतिः ॥ 117.39 ॥

so ’haṁ yatiṣye putrārthamṛte prāṇivadhaṁ mṛga tapasaiva pracaṇḍena yathāpūrvaṁ mahīpatiḥ

अतः हे मृग, मैं बिना किसी प्राणी की हत्या किए, केवल प्रचण्ड तपस्या के द्वारा ही, पूर्वकाल के राजाओं की भाँति पुत्र-प्राप्ति का प्रयास करूँगा।

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