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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 119

अविक्षित-चरित (१)

अध्याय 118अध्याय-सूचीअध्याय 120

श्लोक 1 (markandeya.119.1)

वीर्यचन्द्रसुता सुभूर्वीरा नाम शुभव्रता । स्वयंवरे सा जगृहे महाराजं करन्धमम् ॥ 119.1 ॥

vīryacandrasutā subhūrvīrā nāma śubhavratā svayaṁvare sā jagṛhe mahārājaṁ karandhamam

वीर्यचन्द्र की सुन्दरी पुत्री, शुभव्रता वीरा नामक कन्या ने, अपने स्वयंवर में महाराज करन्धम को वरण किया।

श्लोक 2 (markandeya.119.2)

तस्यां पुत्रं स राजेन्द्रो जनयामास वीर्यवान् । अविक्षितमिति ख्यातिमुपेतं जगतीतले ॥ 119.2 ॥

tasyāṁ putraṁ sa rājendro janayāmāsa vīryavān avikṣitamiti khyātimupetaṁ jagatītale

उस पराक्रमी राजेन्द्र ने उससे एक पुत्र उत्पन्न किया, जो पृथ्वी पर अविक्षित नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 3 (markandeya.119.3)

जाते तस्मिन्सुते राजा स दैवज्ञानपृच्छत । कच्चित्प्रशस्तनक्षत्रे शस्तलग्ने सुतो मम ॥ 119.3 ॥

jāte tasminsute rājā sa daivajñānapṛcchata kaccitpraśastanakṣatre śastalagne suto mama

उस पुत्र के जन्म पर राजा ने ज्योतिषियों से पूछा—क्या मेरा पुत्र प्रशस्त नक्षत्र में, शुभ लग्न में उत्पन्न हुआ है?

श्लोक 4 (markandeya.119.4)

कच्चिच्चालोकितं जन्म मम पुत्रस्य शोभनैः । ग्रहैः कच्चिन्न दुष्टानां ग्रहाणां दृक्पथं गतम् ॥ 119.4 ॥

kacciccālokitaṁ janma mama putrasya śobhanaiḥ grahaiḥ kaccinna duṣṭānāṁ grahāṇāṁ dṛkpathaṁ gatam

क्या मेरे पुत्र का जन्म शुभ ग्रहों द्वारा दृष्ट हुआ है? क्या वह दुष्ट ग्रहों की दृष्टि-पथ में तो नहीं आया?

श्लोक 5 (markandeya.119.5)

इत्युक्तास्तेन दैवज्ञास्तमूचुर्नृपतिं ततः । शस्ते मुहूर्ते नक्षत्रे लग्ने चैव सुतस्तव ॥ 119.5 ॥

ityuktāstena daivajñāstamūcurnṛpatiṁ tataḥ śaste muhūrte nakṣatre lagne caiva sutastava

इस प्रकार पूछे जाने पर उन ज्योतिषियों ने राजा से कहा—शुभ मुहूर्त, नक्षत्र और लग्न में ही तुम्हारा पुत्र—

श्लोक 6 (markandeya.119.6)

समुत्पन्नो महावीर्यो महाभागो महाबलः । भविष्यति महाराज महाराजस्तवात्मजः ॥ 119.6 ॥

samutpanno mahāvīryo mahābhāgo mahābalaḥ bhaviṣyati mahārāja mahārājastavātmajaḥ

—महान् पराक्रम, महान् सौभाग्य और महान् बल वाला उत्पन्न हुआ है; हे महाराज, तुम्हारा यह पुत्र महाराज होगा।

श्लोक 7 (markandeya.119.7)

अवैक्षतेमं देवानां गुरुः शुक्रश्च सप्तमः । सोमश्चतुर्थस्तनयं तवैनं समवैक्षत ॥ 119.7 ॥

avaikṣatemaṁ devānāṁ guruḥ śukraśca saptamaḥ somaścaturthastanayaṁ tavainaṁ samavaikṣata

देवगुरु बृहस्पति ने इसे देखा, और सप्तम स्थान में शुक्र ने; चतुर्थ स्थान में चन्द्रमा ने भी तुम्हारे इस पुत्र को देखा।

श्लोक 8 (markandeya.119.8)

उपान्तसंस्थितश्चैव सोमपुत्रोप्यवैक्षत । नावैक्षतेमं सविता न भौमो न शनैश्चरः ॥ 119.8 ॥

upāntasaṁsthitaścaiva somaputropyavaikṣata nāvaikṣatemaṁ savitā na bhaumo na śanaiścaraḥ

समीप स्थित बुध ने भी इसे देखा। परन्तु सूर्य ने इसे नहीं देखा, न मंगल ने, न शनि ने।

श्लोक 9 (markandeya.119.9)

तव पुत्रं महाराज धन्योऽयं तनयस्तव । सर्वकल्याणसम्पत्ति समवेतो भविष्यति ॥ 119.9 ॥

tava putraṁ mahārāja dhanyo ’yaṁ tanayastava sarvakalyāṇasampatti samaveto bhaviṣyati

हे महाराज, तुम्हारा यह पुत्र धन्य है; यह समस्त कल्याणकारी सम्पदाओं से युक्त होगा।

श्लोक 10 (markandeya.119.10)

मार्कण्डेय उवाच इति दैवज्ञवचनं निशम्य वसुधाधिपः । हर्षपूर्णमनाः प्राह निजस्थानगतस्तदा ॥ 119.10 ॥

mārkaṇḍeya uvāca iti daivajñavacanaṁ niśamya vasudhādhipaḥ harṣapūrṇamanāḥ prāha nijasthānagatastadā

मार्कण्डेय ने कहा—ज्योतिषियों के इस वचन को सुनकर, हर्ष से पूर्ण मन वाले उस पृथ्वीपति ने तब अपने स्थान पर लौटकर कहा।

श्लोक 11 (markandeya.119.11)

अवैक्षतेमं देवानां गुरुः सोमः सितो बुधः । नावैक्षतैनमादित्यो नार्कसूनुर्न भूमिजः ॥ 119.11 ॥

avaikṣatemaṁ devānāṁ guruḥ somaḥ sito budhaḥ nāvaikṣatainamādityo nārkasūnurna bhūmijaḥ

देवगुरु, चन्द्रमा, शुक्र और बुध ने इसे देखा; सूर्य ने इसे नहीं देखा, न सूर्यपुत्र शनि ने, न भूमिपुत्र मंगल ने।

श्लोक 12 (markandeya.119.12)

अवैक्षतेति यत्प्रोक्तं भवद्भिर्बहुशो वचः । अविक्षितेति तेनास्य ख्यातं नाम भविष्यति ॥ 119.12 ॥

avaikṣateti yatproktaṁ bhavadbhirbahuśo vacaḥ avikṣiteti tenāsya khyātaṁ nāma bhaviṣyati

चूँकि आप सबने बार-बार 'अवैक्षत' शब्द का उच्चारण किया, अतः इसका नाम 'अविक्षित' के रूप में विख्यात होगा।

श्लोक 13 (markandeya.119.13)

मार्कण्डेय उवाच अविक्षितः सुतस्तस्य वेदवेदाङ्गपारगः । अस्त्रग्राममशेषं स कण्वपुत्रादथाग्रहीत् ॥ 119.13 ॥

mārkaṇḍeya uvāca avikṣitaḥ sutastasya vedavedāṅgapāragaḥ astragrāmamaśeṣaṁ sa kaṇvaputrādathāgrahīt

मार्कण्डेय ने कहा—उसका पुत्र अविक्षित वेद-वेदांगों में पारंगत हुआ; उसने कण्व-पुत्र से समस्त अस्त्र-विद्या ग्रहण की।

श्लोक 14 (markandeya.119.14)

स्वरूपेणातिभिषजौ देवानां पार्थिवात्मजः । बुद्ध्या वाचस्पतिं कान्त्या शशाङ्कं तेजसा रविम् ॥ 119.14 ॥

svarūpeṇātibhiṣajau devānāṁ pārthivātmajaḥ buddhyā vācaspatiṁ kāntyā śaśāṅkaṁ tejasā ravim

उस राजपुत्र ने रूप में देवताओं के दोनों वैद्यों को, बुद्धि में वाचस्पति को, कान्ति में चन्द्रमा को, और तेज में सूर्य को भी पीछे छोड़ दिया।

श्लोक 15 (markandeya.119.15)

धैर्येणाब्धिं तयोर्वीं च सहिष्णुत्वेन वीर्यवान् । शौर्येण न समस्तस्य कश्चिदासीन्महात्मनः ॥ 119.15 ॥

dhairyeṇābdhiṁ tayorvīṁ ca sahiṣṇutvena vīryavān śauryeṇa na samastasya kaścidāsīnmahātmanaḥ

धैर्य में उसने सागर को, सहनशीलता में पृथ्वी को पीछे छोड़ दिया; शौर्य में उस महात्मा वीर्यवान् का कोई समकक्ष न था।

श्लोक 16 (markandeya.119.16)

स्वयंवरे तं जगृहे हेमधर्मात्मजा वरा । सुदेवतनया गौरी सुभद्रा बलिनः सुता ॥ 119.16 ॥

svayaṁvare taṁ jagṛhe hemadharmātmajā varā sudevatanayā gaurī subhadrā balinaḥ sutā

स्वयंवर में हेमधर्म की श्रेष्ठ पुत्री ने उसे वरण किया; तथा सुदेव की पुत्री गौरी और बलि की पुत्री सुभद्रा ने भी।

श्लोक 17 (markandeya.119.17)

लीलावती वीरसुता वीरभद्रसुता निभा । भीमात्मजा मान्यवती दम्भपुत्री कुमुद्वती ॥ 119.17 ॥

līlāvatī vīrasutā vīrabhadrasutā nibhā bhīmātmajā mānyavatī dambhaputrī kumudvatī

वीर की पुत्री लीलावती, वीरभद्र की पुत्री निभा, भीम की पुत्री मान्यवती, तथा दम्भ की पुत्री कुमुद्वती।

श्लोक 18 (markandeya.119.18)

याश्चैनं नाभिनन्दन्ति स्वयंवरकृतक्षणाः । ताश्चापि स बलाद्वीरो जग्राह नृपतेः सुतः ॥ 119.18 ॥

yāścainaṁ nābhinandanti svayaṁvarakṛtakṣaṇāḥ tāścāpi sa balādvīro jagrāha nṛpateḥ sutaḥ

और जिन्होंने स्वयंवर का अवसर बनाकर भी उसका हर्षपूर्वक स्वागत नहीं किया, उन्हें भी उस वीर राजपुत्र ने बलपूर्वक ग्रहण कर लिया।

श्लोक 19 (markandeya.119.19)

निराकृत्य नृपान्सर्वांस्तासां पितृकुलानि च । स्वयं हि वीर्यमाश्रित्य बलवान्न बलोद्धतः ॥ 119.19 ॥

nirākṛtya nṛpānsarvāṁstāsāṁ pitṛkulāni ca svayaṁ hi vīryamāśritya balavānna baloddhataḥ

उन राजकुमारियों के समस्त राजाओं और पितृकुलों को परास्त करके, स्वयं अपने पराक्रम के बल पर, वह बलवान् होते हुए भी बल का अहंकार नहीं करता था।

श्लोक 20 (markandeya.119.20)

एकदा तु विशालस्य विशालाधिपतेः सुताम् । वैशालिनीं स सुदतीं स्वयंवरकृतक्षणाम् ॥ 119.20 ॥

ekadā tu viśālasya viśālādhipateḥ sutām vaiśālinīṁ sa sudatīṁ svayaṁvarakṛtakṣaṇām

परन्तु एक बार विशाल के अधिपति विशाल की सुदन्ती पुत्री वैशालिनी के, स्वयंवर हेतु बनाए गए अवसर पर—

श्लोक 21 (markandeya.119.21)

परिभूयाखिलान्भूपान्स्वेच्छया न वृतस्तया । बलाज्जग्राह विप्रर्षे यथान्या बलगर्वितः ॥ 119.21 ॥

paribhūyākhilānbhūpānsvecchayā na vṛtastayā balājjagrāha viprarṣe yathānyā balagarvitaḥ

हे विप्रर्षे, यद्यपि उस कन्या ने उसे अपनी इच्छा से वरण नहीं किया, फिर भी समस्त राजाओं को परास्त कर, अन्य कन्याओं की भाँति, अपने बल पर गर्वित होकर उसने उसे भी बलपूर्वक ग्रहण कर लिया।

श्लोक 22 (markandeya.119.22)

ततस्ते भूभृतः सर्वे बहुशस्तेन मानिना । निराकृताः सुनिर्विण्णाः प्रोचुरन्योन्यमाकुलाः ॥ 119.22 ॥

tataste bhūbhṛtaḥ sarve bahuśastena māninā nirākṛtāḥ sunirviṇṇāḥ procuranyonyamākulāḥ

तब वे समस्त राजा, उस अभिमानी के द्वारा बार-बार परास्त किए जाने से अत्यंत खिन्न होकर, व्याकुल होकर आपस में बोले।

श्लोक 23 (markandeya.119.23)

क्षमतां वञ्चनामेतामेकस्माद्बलशालिनाम् । बहूनामेकवर्णानां जन्म धिग्वो महीभृताम् ॥ 119.23 ॥

kṣamatāṁ vañcanāmetāmekasmādbalaśālinām bahūnāmekavarṇānāṁ janma dhigvo mahībhṛtām

क्या हम मात्र एक बलशाली के द्वारा की गई इस वंचना को सहन करें? धिक्कार है हम इतने सारे समान वर्ण वाले, बलशाली राजाओं के जन्म पर!

श्लोक 24 (markandeya.119.24)

क्षत्रियो यः क्षतात्त्राणं वध्यमानस्य दुर्मदैः । करोति तस्य तन्नाम वृथैवान्ये हि बिभ्रति ॥ 119.24 ॥

kṣatriyo yaḥ kṣatāttrāṇaṁ vadhyamānasya durmadaiḥ karoti tasya tannāma vṛthaivānye hi bibhrati

जो दुर्मद शत्रुओं द्वारा मारे जा रहे को क्षति से रक्षा प्रदान करे, वही सच्चा क्षत्रिय है; शेष तो व्यर्थ ही यह नाम धारण करते हैं।

श्लोक 25 (markandeya.119.25)

आत्मनोऽपि क्षतत्राणं दुष्टादस्मादकुर्वताम् । भवतां क्षत्रियकुले जातानां कीदृशी मतिः ॥ 119.25 ॥

ātmano ’pi kṣatatrāṇaṁ duṣṭādasmādakurvatām bhavatāṁ kṣatriyakule jātānāṁ kīdṛśī matiḥ

क्षत्रियकुल में जन्म लेकर भी जब तुम इस दुष्ट से अपनी रक्षा भी नहीं कर सकते, तो तुम्हारी यह कैसी बुद्धि है?

श्लोक 26 (markandeya.119.26)

उच्चार्यते स्तुतिर्या वः सूतमागधबन्दिभिः । सा सत्या मा वृथा वीरा भवत्वरिविनाशनात् ॥ 119.26 ॥

uccāryate stutiryā vaḥ sūtamāgadhabandibhiḥ sā satyā mā vṛthā vīrā bhavatvarivināśanāt

हे वीरो, सूत, मागध और बन्दीजन तुम्हारी जो स्तुति करते हैं, वह शत्रु-विनाश से सत्य हो, व्यर्थ न हो।

श्लोक 27 (markandeya.119.27)

चरतां सा तथैवैषा भूपाश्चारैर्दिगन्तरे । पौरुषाश्रयिणः सर्वे विशिष्टकुलसम्भवाः ॥ 119.27 ॥

caratāṁ sā tathaivaiṣā bhūpāścārairdigantare pauruṣāśrayiṇaḥ sarve viśiṣṭakulasambhavāḥ

जिस प्रकार अन्य दिशाओं में राजा अपने गुप्तचरों द्वारा विचरते हैं, उसी प्रकार यह भी सत्य हो; तुम सब पौरुष के आश्रय वाले, विशिष्ट कुलों में उत्पन्न हो।

श्लोक 28 (markandeya.119.28)

बिभेति को न मरणात्को युद्धेन विनाऽमरः । विचिन्त्यैतन्न हातव्यं पौरुषं शस्त्रवृत्तिभिः ॥ 119.28 ॥

bibheti ko na maraṇātko yuddhena vinā ’maraḥ vicintyaitanna hātavyaṁ pauruṣaṁ śastravṛttibhiḥ

मृत्यु से कौन नहीं डरता? युद्ध के बिना कौन अमर होता है? इस पर विचार कर, शस्त्रजीवियों को अपना पौरुष नहीं त्यागना चाहिए।

श्लोक 29 (markandeya.119.29)

एतन्निशम्य ते भूपा विस्पष्टामर्षपूरिताः । ऊचुः परस्परं सर्वे समुत्तस्थुश्च सायुधाः ॥ 119.29 ॥

etanniśamya te bhūpā vispaṣṭāmarṣapūritāḥ ūcuḥ parasparaṁ sarve samuttasthuśca sāyudhāḥ

यह सुनकर वे समस्त राजा, स्पष्ट क्रोध से भरकर, आपस में बोले और सब हथियार लेकर उठ खड़े हुए।

श्लोक 30 (markandeya.119.30)

केचिद्रथानारुरुहुः केचिन्नागांस्तथा हयान् । अन्येऽमर्षपराधीनास्तमुपेताः पदातयः ॥ 119.30 ॥

kecidrathānāruruhuḥ kecinnāgāṁstathā hayān anye ’marṣaparādhīnāstamupetāḥ padātayaḥ

कुछ रथों पर सवार हुए, कुछ हाथियों और घोड़ों पर; अन्य क्रोध के वशीभूत होकर पैदल ही उसकी ओर बढ़े।

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