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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 120

अविक्षित-चरित (२)

अध्याय 119अध्याय-सूचीअध्याय 121

श्लोक 1 (markandeya.120.1)

मार्कण्डेय उवाच इति संग्रामसज्जास्ते भूपा भूपसुतस्तथा । निराकृताः सुबहुशस्तत्कालं चाप्यविक्षिता ॥ 120.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca iti saṁgrāmasajjāste bhūpā bhūpasutastathā nirākṛtāḥ subahuśastatkālaṁ cāpyavikṣitā

मार्कण्डेय ने कहा—इस प्रकार युद्ध हेतु सन्नद्ध वे राजा तथा राजपुत्र अविक्षित भी—वे राजा उस समय अविक्षित द्वारा पहले भी बार-बार परास्त किए जा चुके थे।

श्लोक 2 (markandeya.120.2)

ततो बभूव संग्रामस्तस्य तैः सह दारुणः । एकस्य बहुभिर्भूपैर्भूपपुत्रवरैर्मुने ॥ 120.2 ॥

tato babhūva saṁgrāmastasya taiḥ saha dāruṇaḥ ekasya bahubhirbhūpairbhūpaputravarairmune

तब उसके और उनके बीच घोर संग्राम छिड़ गया—एक की अनेक राजाओं और श्रेष्ठ राजकुमारों से, हे मुने।

श्लोक 3 (markandeya.120.3)

तेऽसिशक्तिगदाबाणपाणयस्तं सुदुर्मदाः । अभिघ्नन्तो युयुधिरे तैः समस्तैरसावपि ॥ 120.3 ॥

te ’siśaktigadābāṇapāṇayastaṁ sudurmadāḥ abhighnanto yuyudhire taiḥ samastairasāvapi

वे अत्यंत उद्दण्ड, हाथों में खड्ग, शक्ति, गदा और बाण लिए, प्रहार करते हुए युद्ध करने लगे; और वह भी उन सबके साथ युद्ध करने लगा।

श्लोक 4 (markandeya.120.4)

स ताञ्छरशतैरुग्रैर्बिभेद नृपनन्दनः । कृतास्त्रो बलवान्बाणैस्ते च तं बिभिदुः शितैः ॥ 120.4 ॥

sa tāñcharaśatairugrairbibheda nṛpanandanaḥ kṛtāstro balavānbāṇaiste ca taṁ bibhiduḥ śitaiḥ

वह राजपुत्र, अस्त्रविद्या में निपुण और बलवान्, सैकड़ों उग्र बाणों से उन्हें बींध डालता था; और वे भी अपने तीक्ष्ण बाणों से उसे बींधते थे।

श्लोक 5 (markandeya.120.5)

कस्यचिच्चिच्छिदे बाहुमन्यस्य च शिरोधराम् । हृदि विव्याध चैवान्यमन्यं वक्षस्यताडयत् ॥ 120.5 ॥

kasyaciccicchide bāhumanyasya ca śirodharām hṛdi vivyādha caivānyamanyaṁ vakṣasyatāḍayat

उसने किसी की भुजा काट डाली, किसी की गर्दन; किसी को हृदय में बींध दिया, और किसी अन्य को वक्षस्थल पर आघात किया।

श्लोक 6 (markandeya.120.6)

करं चिच्छेद करिणस्तुरगस्य तथा शिरः । रथस्येषां तथैवाश्वान्रथस्यान्यस्य सारथिम् ॥ 120.6 ॥

karaṁ ciccheda kariṇasturagasya tathā śiraḥ rathasyeṣāṁ tathaivāśvānrathasyānyasya sārathim

उसने किसी हाथी की सूँड़ काट डाली, किसी घोड़े का सिर, किसी रथ के घोड़ों को, और किसी अन्य रथ के सारथी को भी।

श्लोक 7 (markandeya.120.7)

बाणानापततश्चक्रे द्विधा बाणैस्तथा द्विषाम् । चिच्छेदान्यस्य खड्गं च धनुरन्यस्य लाघवात् ॥ 120.7 ॥

bāṇānāpatataścakre dvidhā bāṇaistathā dviṣām cicchedānyasya khaḍgaṁ ca dhanuranyasya lāghavāt

वह अपने बाणों से शत्रुओं के आते हुए बाणों को दो भागों में विभक्त कर देता था, तथा कुशलतापूर्वक किसी की तलवार और किसी अन्य के धनुष को काट देता था।

श्लोक 8 (markandeya.120.8)

तनुत्रेऽपहृते तेन ननाशान्यो नृपात्मजः । अविक्षिताहतश्चान्यः पदातिः प्रजहौ रणम् ॥ 120.8 ॥

tanutre ’pahṛte tena nanāśānyo nṛpātmajaḥ avikṣitāhataścānyaḥ padātiḥ prajahau raṇam

जिसका कवच उसके द्वारा हटा दिया गया, वह अन्य राजपुत्र नष्ट हो गया; तथा अविक्षित द्वारा आहत एक अन्य, यद्यपि केवल पदाति था, युद्ध छोड़कर भाग गया।

श्लोक 9 (markandeya.120.9)

इत्याकुलीकृते तस्मिन्समग्रे राजमण्डले । तस्थुः सप्तशतं वीरा मरणे कृतनिश्चयाः ॥ 120.9 ॥

ityākulīkṛte tasminsamagre rājamaṇḍale tasthuḥ saptaśataṁ vīrā maraṇe kṛtaniścayāḥ

जब समस्त राजमण्डल इस प्रकार व्याकुल हो गया, तब सात सौ वीर, मृत्यु का निश्चय करके, स्थिर रहे।

श्लोक 10 (markandeya.120.10)

आभिजात्यवयःशौर्यलज्जाभारसमन्विताः । निर्जिते सकले सैन्ये पलायनपरायणे ॥ 120.10 ॥

ābhijātyavayaḥśauryalajjābhārasamanvitāḥ nirjite sakale sainye palāyanaparāyaṇe

कुलीनता, युवावस्था, शौर्य और लज्जा के भार से युक्त वे वीर, जब समस्त सेना पराजित होकर पलायन में तत्पर हो गई—

श्लोक 11 (markandeya.120.11)

तैः समेत्य महीपालैः स तु पुत्रो महीभृतः । युयुधे धर्मयुद्धेन तेन तं नातिकोपितः ॥ 120.11 ॥

taiḥ sametya mahīpālaiḥ sa tu putro mahībhṛtaḥ yuyudhe dharmayuddhena tena taṁ nātikopitaḥ

—उन राजाओं के साथ, एकत्र होकर, उस पृथ्वीपति-पुत्र ने धर्मयुद्ध करते हुए युद्ध किया, अधिक क्रोधित नहीं हुआ।

श्लोक 12 (markandeya.120.12)

विच्छिन्नयन्त्रकवचान्स तानपि महाबलः । कर्त्तुं व्यवस्थितस्ते च ततः क्रुद्धा महामुने ॥ 120.12 ॥

vicchinnayantrakavacānsa tānapi mahābalaḥ karttuṁ vyavasthitaste ca tataḥ kruddhā mahāmune

उस महाबली ने उनके कवच और साज-सामान को तोड़कर उन्हें भी वैसा ही करने का निश्चय किया; परन्तु वे, हे महामुने, क्रुद्ध होकर—

श्लोक 13 (markandeya.120.13)

धर्ममुत्सृज्य युयुधुर्युध्यमानेन धर्मतः । नरेन्द्रपुत्राः प्रस्वेदजलक्लिन्नाननाः समम् ॥ 120.13 ॥

dharmamutsṛjya yuyudhuryudhyamānena dharmataḥ narendraputrāḥ prasvedajalaklinnānanāḥ samam

—धर्म का त्याग करके, धर्मपूर्वक युद्ध करने वाले उसके विरुद्ध युद्ध करने लगे; वे राजपुत्र, पसीने से भीगे मुख वाले, एक साथ—

श्लोक 14 (markandeya.120.14)

विव्याध कश्चिद्बाणौघैः कश्चिच्चिच्छेद कार्मुकम् । ध्वजमस्यापरो बाणैश्छित्त्वा भूमावपातयत् ॥ 120.14 ॥

vivyādha kaścidbāṇaughaiḥ kaścicciccheda kārmukam dhvajamasyāparo bāṇaiśchittvā bhūmāvapātayat

किसी ने बाण-समूह से उस पर प्रहार किया, किसी ने उसका धनुष काट डाला; किसी अन्य ने बाणों से उसकी ध्वजा काटकर भूमि पर गिरा दी।

श्लोक 15 (markandeya.120.15)

जघ्नुरन्ये तथैवाश्वान्बभञ्जुश्चापरे रथम् । गदापातेनाथ चान्ये बाणैः पृष्ठमताडयन् ॥ 120.15 ॥

jaghnuranye tathaivāśvānbabhañjuścāpare ratham gadāpātenātha cānye bāṇaiḥ pṛṣṭhamatāḍayan

अन्यों ने उसी प्रकार उसके घोड़ों को मार गिराया, और अन्यों ने उसका रथ तोड़ डाला; कुछ ने गदा के प्रहार से, कुछ ने बाणों से उसकी पीठ पर आघात किया।

श्लोक 16 (markandeya.120.16)

छिन्ने धनुषि सक्रोधः स तदा नृपतेः सुतः । जग्राहासिं तथा चर्म तदप्यन्योन्वपातयत् ॥ 120.16 ॥

chinne dhanuṣi sakrodhaḥ sa tadā nṛpateḥ sutaḥ jagrāhāsiṁ tathā carma tadapyanyonvapātayat

जब उसका धनुष कट गया, तब वह राजपुत्र क्रुद्ध होकर खड्ग और चर्म ढाल ले उठा; उसे भी किसी अन्य ने काट गिराया।

श्लोक 17 (markandeya.120.17)

च्छिन्नासिचर्मा जग्राह स गदां गदिनां वरः । तामप्यन्यः क्षुरप्रेण चिच्छेद कृतहस्तवत् ॥ 120.17 ॥

cchinnāsicarmā jagrāha sa gadāṁ gadināṁ varaḥ tāmapyanyaḥ kṣurapreṇa ciccheda kṛtahastavat

तलवार और ढाल कट जाने पर, गदाधारियों में श्रेष्ठ उसने गदा उठाई; उसे भी किसी अन्य ने क्षुरप्र बाण से, मानो अभ्यस्त हाथ से, काट डाला।

श्लोक 18 (markandeya.120.18)

अन्ये शरसहस्रेण शतेनान्ये नराधिपाः । विव्यधुः कोष्ठकीकृत्य धर्मयुद्धपराङ्मुखाः ॥ 120.18 ॥

anye śarasahasreṇa śatenānye narādhipāḥ vivyadhuḥ koṣṭhakīkṛtya dharmayuddhaparāṅmukhāḥ

धर्मयुद्ध से विमुख हुए कुछ राजाओं ने उसे घेरकर सहस्र बाणों से, कुछ ने सैकड़ों बाणों से बींध डाला।

श्लोक 19 (markandeya.120.19)

स विह्वलः पपातोर्व्यामेको बहुभिरर्दितः । राजपुत्रा महाभागा बबन्धुस्ते च तं ततः ॥ 120.19 ॥

sa vihvalaḥ papātorvyāmeko bahubhirarditaḥ rājaputrā mahābhāgā babandhuste ca taṁ tataḥ

अनेकों द्वारा पीड़ित और विह्वल होकर वह भूमि पर गिर पड़ा; तब उन अत्यंत भाग्यशाली राजपुत्रों ने उसे बाँध लिया।

श्लोक 20 (markandeya.120.20)

तमधर्मेण ते सर्वे गृहीत्वा नृपतेः सुतम् । विशालेन समं राज्ञा वैदिशं विविशुः परम् ॥ 120.20 ॥

tamadharmeṇa te sarve gṛhītvā nṛpateḥ sutam viśālena samaṁ rājñā vaidiśaṁ viviśuḥ param

वे सब अधर्मपूर्वक उस राजपुत्र को पकड़कर, राजा विशाल के साथ परम वैदिश नगरी में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 21 (markandeya.120.21)

हृष्टाः प्रमुदिता बद्धं समादाय नृपात्मजम् । स्वयंवरा च सा कन्या न्यस्ता तेन ततः पुरः ॥ 120.21 ॥

hṛṣṭāḥ pramuditā baddhaṁ samādāya nṛpātmajam svayaṁvarā ca sā kanyā nyastā tena tataḥ puraḥ

हर्षित और प्रमुदित होकर, बंदी राजपुत्र को साथ लेकर, वह स्वयंवरा कन्या तब उसके समक्ष रखी गई।

श्लोक 22 (markandeya.120.22)

पुनः पुनश्च पित्रोक्ता तथापि च पुरोधसा । आलम्ब्यतामिति वरो यस्ते राजसु रोचते ॥ 120.22 ॥

punaḥ punaśca pitroktā tathāpi ca purodhasā ālambyatāmiti varo yaste rājasu rocate

पिता द्वारा बार-बार तथा पुरोहित द्वारा भी यह कहे जाने पर कि 'इन राजाओं में से जो वर तुम्हें रुचे, उसे स्वीकार करो'—

श्लोक 23 (markandeya.120.23)

यदा सा मानिनी कञ्चिन्न जग्राह वरं मुने । तदा पप्रच्छ दैवज्ञं विवाहार्थं नरेश्वरः ॥ 120.23 ॥

yadā sā māninī kañcinna jagrāha varaṁ mune tadā papraccha daivajñaṁ vivāhārthaṁ nareśvaraḥ

हे मुने, जब उस मानिनी कन्या ने किसी भी वर को ग्रहण नहीं किया, तब उस नरेश्वर ने विवाह के विषय में ज्योतिषी से पूछा।

श्लोक 24 (markandeya.120.24)

विशिष्टतरमेतस्या विवाहाय दिनं वद । अद्यैतदीदृक्सञ्जातं युद्धं विघ्नोपपादकम् ॥ 120.24 ॥

viśiṣṭatarametasyā vivāhāya dinaṁ vada adyaitadīdṛksañjātaṁ yuddhaṁ vighnopapādakam

"इसके विवाह के लिए कोई अत्यंत उत्तम दिन बताओ; आज ऐसा यह युद्ध हो गया, जो विघ्नकारी बना।"

श्लोक 25 (markandeya.120.25)

मार्कण्डेय उवाच इति पृष्टो नरेन्द्रेण स दैवज्ञो विमृश्य तत् । दुर्मनाः प्राह विज्ञातपरमार्थो महीपतिम् ॥ 120.25 ॥

mārkaṇḍeya uvāca iti pṛṣṭo narendreṇa sa daivajño vimṛśya tat durmanāḥ prāha vijñātaparamārtho mahīpatim

मार्कण्डेय ने कहा—इस प्रकार नरेश्वर द्वारा पूछे जाने पर, उस ज्योतिषी ने इस पर विचार कर, परमार्थ को जानते हुए, खिन्न मन से राजा से कहा।

श्लोक 26 (markandeya.120.26)

भविष्यन्त्यपराणीह दिनानि पृथिवीपते । प्रशस्तलग्नयुक्तानि शोभनान्यचिरेण वै ॥ 120.26 ॥

bhaviṣyantyaparāṇīha dināni pṛthivīpate praśastalagnayuktāni śobhanānyacireṇa vai

"हे पृथ्वीपते, इससे अन्य दिन शीघ्र ही उपस्थित होंगे, जो प्रशस्त लग्नों से युक्त तथा शुभ होंगे—"

श्लोक 27 (markandeya.120.27)

करिष्यसि विवाहं त्वं तेषु प्राप्तेषु मानद । अलमेतेन यत्रायं महाविघ्न उपस्थितः ॥ 120.27 ॥

kariṣyasi vivāhaṁ tvaṁ teṣu prāpteṣu mānada alametena yatrāyaṁ mahāvighna upasthitaḥ

"—हे मानद, उनके प्राप्त होने पर तुम विवाह सम्पन्न करना; अभी बस करो, जिसमें यह महान् विघ्न उपस्थित हुआ है।"

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