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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 122

अविक्षित-चरित (४): किमिच्छक-व्रत

अध्याय 121अध्याय-सूचीअध्याय 123

श्लोक 1 (markandeya.122.1)

मार्कण्डेय उवाच अथ साऽविक्षितो माता वीरा वीर प्रजावती । पुण्येऽहनि समाहूय प्राह पुत्रमविक्षितम् ॥ 122.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca atha sā ’vikṣito mātā vīrā vīra prajāvatī puṇye ’hani samāhūya prāha putramavikṣitam

मार्कण्डेय ने कहा—तब अविक्षित की माता, वीर-प्रजा वाली वीरा, एक पुण्य दिवस पर अपने पुत्र अविक्षित को बुलाकर बोली।

श्लोक 2 (markandeya.122.2)

पुत्राहमभ्यनुज्ञाता तव पित्रा महात्मना । उपवासं करिष्यामि दुष्करोऽयं किमिच्छकः ॥ 122.2 ॥

putrāhamabhyanujñātā tava pitrā mahātmanā upavāsaṁ kariṣyāmi duṣkaro ’yaṁ kimicchakaḥ

हे पुत्र, तुम्हारे महात्मा पिता की अनुमति प्राप्त कर, मैं उपवास करूँगी — यह किमिच्छक व्रत अत्यंत दुष्कर है।

श्लोक 3 (markandeya.122.3)

स चायत्तस्तव पितुस्त्वया साध्यो मयापि च । प्रतिज्ञाते त्वया पुत्र ततस्तत्र यताम्यहम् ॥ 122.3 ॥

sa cāyattastava pitustvayā sādhyo mayāpi ca pratijñāte tvayā putra tatastatra yatāmyaham

वह तुम्हारे पिता के अधीन है, और तुम्हारे तथा मेरे द्वारा भी सम्पन्न होने वाला है; हे पुत्र, यदि तुम प्रतिज्ञा करो, तो मैं उसमें प्रवृत्त होऊँगी।

श्लोक 4 (markandeya.122.4)

द्रव्यस्यार्द्धं महाकोशात्तव दास्याम्यहं पितुः । धनं ते पितुरायत्तमनुज्ञाताऽस्मि तेन च ॥ 122.4 ॥

dravyasyārddhaṁ mahākośāttava dāsyāmyahaṁ pituḥ dhanaṁ te piturāyattamanujñātā ’smi tena ca

तुम्हारे पिता के महाकोष से आधा धन मैं तुम्हें दूँगी; वह धन तुम्हारे पिता के अधीन है, और उसके लिए मुझे उनकी अनुमति प्राप्त है।

श्लोक 5 (markandeya.122.5)

क्लेशसाध्यो मदायत्तः स हि श्रेयो भविष्यति । साध्यो भवेद्वा यदि ते कश्चिद्बलपराक्रमैः ॥ 122.5 ॥

kleśasādhyo madāyattaḥ sa hi śreyo bhaviṣyati sādhyo bhavedvā yadi te kaścidbalaparākramaiḥ

जो कठिनाई से सिद्ध होने वाला और मेरे अधीन है, वह तुम्हारे कल्याण के लिए ही होगा; अथवा यदि तुम्हारे बल-पराक्रम से कुछ सिद्ध हो सकता हो—

श्लोक 6 (markandeya.122.6)

स तेऽसाध्यो ह्यन्यथा वा दुःखसाध्यो भविष्यति । तत्त्वं प्रतिज्ञां कुरुषे यदि पुत्रात्र चैव ते । तदैतदहमावाप्स्ये कथ्यतां यन्मतं तव ॥ 122.6 ॥

sa te ’sādhyo hyanyathā vā duḥkhasādhyo bhaviṣyati tattvaṁ pratijñāṁ kuruṣe yadi putrātra caiva te tadaitadahamāvāpsye kathyatāṁ yanmataṁ tava

—वह या तो तुम्हारे लिए असाध्य होगा, या दुःखपूर्वक साध्य होगा; अतः हे पुत्र, यदि तुम अभी यह प्रतिज्ञा करो, तो मैं इसे प्राप्त कर लूँगी — बताओ, तुम्हारा क्या मत है?

श्लोक 7 (markandeya.122.7)

अविक्षिदुवाच वित्तं मे पितुरायत्तं मत्स्वामित्वं न तत्र वै । यन्मच्छरीरनिष्पाद्यं तत्करिष्ये त्वयोदितम् ॥ 122.7 ॥

avikṣiduvāca vittaṁ me piturāyattaṁ matsvāmitvaṁ na tatra vai yanmaccharīraniṣpādyaṁ tatkariṣye tvayoditam

अविक्षित ने कहा—धन मेरे पिता के अधीन है — उस पर मेरा स्वामित्व नहीं है; परन्तु जो मेरे शरीर से सम्पन्न होने वाला है, वह मैं करूँगा, जैसा आपने कहा है।

श्लोक 8 (markandeya.122.8)

किमिच्छकं व्रतं मातर्निश्चिन्ता भव निर्व्यथा । राज्ञा पित्राऽभ्यनुज्ञातं यदि वित्तेश्वरेण मे ॥ 122.8 ॥

kimicchakaṁ vrataṁ mātarniścintā bhava nirvyathā rājñā pitrā ’bhyanujñātaṁ yadi vitteśvareṇa me

व्रत की पूर्ति के विषय में, हे माता, आप निश्चिन्त और निर्व्यथ रहें — बशर्ते राजा, मेरे पिता, तथा धनेश्वर की भी अनुमति हो।

श्लोक 9 (markandeya.122.9)

मार्कण्डेय उवाच ततः सा राजमहिषी तद्व्रतं समुपोषिता । यथोक्तं साऽकरोत्पूजां राजराजस्य संयता ॥ 122.9 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataḥ sā rājamahiṣī tadvrataṁ samupoṣitā yathoktaṁ sā ’karotpūjāṁ rājarājasya saṁyatā

मार्कण्डेय ने कहा—तब वह राजमहिषी उस व्रत का उपवास करके, संयमित होकर, यथोक्त विधि से राजराज (कुबेर) की पूजा करने लगी।

श्लोक 10 (markandeya.122.10)

निधीनामप्यशेषाणां निधिपालगणस्य च । लक्ष्म्याश्च परया भक्त्या यतवाक्कायमानसा ॥ 122.10 ॥

nidhīnāmapyaśeṣāṇāṁ nidhipālagaṇasya ca lakṣmyāśca parayā bhaktyā yatavākkāyamānasā

वह परम भक्ति से, वाणी-काया-मन को संयत रखते हुए, समस्त निधियों, निधिपालों के समूह, तथा लक्ष्मी की भी पूजा करने लगी।

श्लोक 11 (markandeya.122.11)

विविक्ते तु गृहस्थोऽयमथ राजा करन्धमः । आसीन उक्तः सचिवैर्नीतिशास्त्रविशारदैः ॥ 122.11 ॥

vivikte tu gṛhastho ’yamatha rājā karandhamaḥ āsīna uktaḥ sacivairnītiśāstraviśāradaiḥ

इस बीच राजा करन्धम, एकान्त में गृहस्थ रूप में बैठे हुए, नीतिशास्त्र में निपुण मंत्रियों द्वारा संबोधित किए गए।

श्लोक 12 (markandeya.122.12)

सचिवा ऊचुः राजन्वयः परिणतं तवैतच्छासतो महीम् । एकस्ते तनयोऽविक्षित्त्यक्तदारपरिग्रहः ॥ 122.12 ॥

sacivā ūcuḥ rājanvayaḥ pariṇataṁ tavaitacchāsato mahīm ekaste tanayo ’vikṣittyaktadāraparigrahaḥ

मंत्रियों ने कहा—हे राजन्, पृथ्वी का शासन करते हुए आपकी अवस्था अब ढल चुकी है; आपका एकमात्र पुत्र अविक्षित पत्नी ग्रहण करने का त्याग किए हुए है।

श्लोक 13 (markandeya.122.13)

अपुत्रः स च ते निष्ठां यदा भूप गमिष्यति । तदारिपक्षं पृथिवी निश्चितं तव यास्यति ॥ 122.13 ॥

aputraḥ sa ca te niṣṭhāṁ yadā bhūpa gamiṣyati tadāripakṣaṁ pṛthivī niścitaṁ tava yāsyati

और वह पुत्रहीन है; हे भूप, जब वह अपने अन्त को प्राप्त होगा, तब यह पृथ्वी निश्चय ही आपके शत्रुओं के पक्ष में चली जाएगी।

श्लोक 14 (markandeya.122.14)

वंशक्षयस्ते भविता पितृपिण्डोदकक्षयः । एतन्महत्तेऽरिभयं क्रियाहान्या भविष्यति ॥ 122.14 ॥

vaṁśakṣayaste bhavitā pitṛpiṇḍodakakṣayaḥ etanmahatte ’ribhayaṁ kriyāhānyā bhaviṣyati

आपके वंश का क्षय हो जाएगा, पितरों को पिण्ड-जल देना बंद हो जाएगा; यह आपके लिए शत्रुओं का बड़ा भय है, और इससे कर्मों की हानि होगी।

श्लोक 15 (markandeya.122.15)

तस्मात्कुरु तथा भूप यथा ते तनयः पुनः । करोति सततं बुद्धिं पितॄणामुपकारिणीम् ॥ 122.15 ॥

tasmātkuru tathā bhūpa yathā te tanayaḥ punaḥ karoti satataṁ buddhiṁ pitṝṇāmupakāriṇīm

अतः हे भूप, ऐसा करो जिससे तुम्हारा पुत्र पुनः पितरों के हितकारी संकल्प को धारण करे।

श्लोक 16 (markandeya.122.16)

मार्कण्डेय उवाच एतस्मिन्नन्तरे शब्दं शुश्राव जगतीपतिः । पुरोहितस्य वीराया गदतो ह्यर्थिनं प्रति ॥ 122.16 ॥

mārkaṇḍeya uvāca etasminnantare śabdaṁ śuśrāva jagatīpatiḥ purohitasya vīrāyā gadato hyarthinaṁ prati

मार्कण्डेय ने कहा—इसी बीच उस पृथ्वीपति ने पुरोहित को किसी याचक से वीरा के विषय में कहते हुए सुना।

श्लोक 17 (markandeya.122.17)

कः किमिच्छति दुःसाध्यं कस्य किं साध्यतामिति । करन्धमस्य महिषी किमिच्छिकमुपोषिता ॥ 122.17 ॥

kaḥ kimicchati duḥsādhyaṁ kasya kiṁ sādhyatāmiti karandhamasya mahiṣī kimicchikamupoṣitā

'कौन क्या दुष्कर वस्तु चाहता है? किसकी कौन-सी इच्छा पूर्ण की जाए?' — करन्धम की महिषी ने किमिच्छक व्रत का उपवास किया है।

श्लोक 18 (markandeya.122.18)

राजपुत्रोऽप्यविक्षित्तु श्रुत्वा पौरोहितं वचः । प्रत्युवाचार्थिनः सर्वान्राजद्वारमुपागतान् ॥ 122.18 ॥

rājaputro ’pyavikṣittu śrutvā paurohitaṁ vacaḥ pratyuvācārthinaḥ sarvānrājadvāramupāgatān

राजपुत्र अविक्षित ने भी पुरोहित के वचन सुनकर, राजद्वार पर एकत्र समस्त याचकों को उत्तर दिया।

श्लोक 19 (markandeya.122.19)

मया साध्यं शरीरेण यस्य किञ्जिद्ब्रवीतु सः । मम माता महाभागा किमिच्छिकमुपोषिता ॥ 122.19 ॥

mayā sādhyaṁ śarīreṇa yasya kiñjidbravītu saḥ mama mātā mahābhāgā kimicchikamupoṣitā

जो मेरे अपने शरीर से सम्पन्न किया जा सकता हो, जिसकी कोई ऐसी इच्छा हो वह कहे; मेरी परम भाग्यशालिनी माता ने किमिच्छक व्रत का उपवास किया है।

श्लोक 20 (markandeya.122.20)

शृण्वन्तु मेऽर्थिनः सर्वे प्रतिज्ञातं मया तदा । किमिच्छथ ददाम्येष क्रियमाणो किमिच्छिके ॥ 122.20 ॥

śṛṇvantu me ’rthinaḥ sarve pratijñātaṁ mayā tadā kimicchatha dadāmyeṣa kriyamāṇo kimicchike

समस्त याचक सुनें, जो मैं अब प्रतिज्ञा करता हूँ: तुम जो चाहोगे, मैं दूँगा — यह किमिच्छक-रूप में किया जा रहा है।

श्लोक 21 (markandeya.122.21)

मार्कण्डेय उवाच ततो राजा निशम्यैतद्वाक्यं पुत्रमुखाच्छ्रुतम् । समुत्पत्याब्रवीत्पुत्रमहमर्थी प्रयच्छ मे ॥ 122.21 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tato rājā niśamyaitadvākyaṁ putramukhācchrutam samutpatyābravītputramahamarthī prayaccha me

मार्कण्डेय ने कहा—तब राजा, अपने पुत्र के ही मुख से यह वचन सुनकर, तुरन्त उठकर बोला—हे पुत्र, मैं भी याचक हूँ — मुझे दो।

श्लोक 22 (markandeya.122.22)

अविक्षिदुवाच दातव्यं यन्मया तात भवते तद्ब्रवीहि माम् । कर्तव्यं दुष्करं वा ते साध्यं दुःसाध्यमेव वा ॥ 122.22 ॥

avikṣiduvāca dātavyaṁ yanmayā tāta bhavate tadbravīhi mām kartavyaṁ duṣkaraṁ vā te sādhyaṁ duḥsādhyameva vā

अविक्षित ने कहा—हे तात, जो मेरे द्वारा दिया जाना है, वह मुझसे कहिए; जो भी करना हो, चाहे वह दुष्कर हो, साध्य हो या असाध्य ही क्यों न हो।

श्लोक 23 (markandeya.122.23)

राजोवाच यदि सत्यप्रतिज्ञस्त्वं ददासि च किमिच्छकम् । पौत्रस्य दर्शय मुखं ममोत्सङ्गगतस्य तत् ॥ 122.23 ॥

rājovāca yadi satyapratijñastvaṁ dadāsi ca kimicchakam pautrasya darśaya mukhaṁ mamotsaṅgagatasya tat

राजा ने कहा—यदि तुम अपनी प्रतिज्ञा में सत्य हो और जो चाहा जाए वह देते हो — तो मुझे अपनी गोद में बैठे पौत्र का मुख दिखाओ।

श्लोक 24 (markandeya.122.24)

अविक्षिदुवाच अहं तवैकस्तनयो ब्रह्मचर्यं च मे नृप । न मे पुत्रोऽस्ति पौत्रस्य दर्शयामि कथं मुखम् ॥ 122.24 ॥

avikṣiduvāca ahaṁ tavaikastanayo brahmacaryaṁ ca me nṛpa na me putro ’sti pautrasya darśayāmi kathaṁ mukham

अविक्षित ने कहा—हे राजन्, मैं आपका एकमात्र पुत्र हूँ, और मैं ब्रह्मचर्य का पालन करता हूँ; मेरा कोई पुत्र नहीं है — तो मैं आपको पौत्र का मुख कैसे दिखाऊँ?

श्लोक 25 (markandeya.122.25)

राजोवाच पापाय ब्रह्मचर्यं ते यदिदं धार्यते त्वया । तस्मात्त्वं मोचयात्मानं मम पौत्रं च दर्शय ॥ 122.25 ॥

rājovāca pāpāya brahmacaryaṁ te yadidaṁ dhāryate tvayā tasmāttvaṁ mocayātmānaṁ mama pautraṁ ca darśaya

राजा ने कहा—तुम्हारा यह जो ब्रह्मचर्य धारण किया हुआ है, वह पाप की ओर ले जाता है; अतः इससे अपने आपको मुक्त करो, और मुझे मेरा पौत्र दिखाओ।

श्लोक 26 (markandeya.122.26)

अविक्षिदुवाच विषमं स्यान्महाराज यदन्यत्तत्समादिश । वैराग्येण मया त्यक्तः स्त्रीसंभोगस्तथास्तु सः ॥ 122.26 ॥

avikṣiduvāca viṣamaṁ syānmahārāja yadanyattatsamādiśa vairāgyeṇa mayā tyaktaḥ strīsaṁbhogastathāstu saḥ

अविक्षित ने कहा—यह कठिन होगा, हे महाराज; इसके स्थान पर मुझे कोई अन्य कार्य आज्ञा दीजिए। वैराग्यवश मैंने स्त्री-सम्भोग का त्याग कर दिया है — वह वैसे ही रहे।

श्लोक 27 (markandeya.122.27)

राजोवाच बहुभिर्युध्यमानानां दृष्टो वै वैरिणां जयः । तत्रापि यदि वैराग्यमुपैषि तदपण्डितः ॥ 122.27 ॥

rājovāca bahubhiryudhyamānānāṁ dṛṣṭo vai vairiṇāṁ jayaḥ tatrāpi yadi vairāgyamupaiṣi tadapaṇḍitaḥ

राजा ने कहा—अनेक शत्रुओं से युद्ध करते हुए भी शत्रुओं पर विजय देखी जाती है; यदि वहाँ भी तुम वैराग्य अपनाते हो, तो तुम अबुद्धिमान हो।

श्लोक 28 (markandeya.122.28)

किं वा नो बहुनोक्तेन ब्रह्मचर्यं परित्यज । मातुस्त्वमिच्छया वक्त्र पौत्रस्य मम दर्शय ॥ 122.28 ॥

kiṁ vā no bahunoktena brahmacaryaṁ parityaja mātustvamicchayā vaktra pautrasya mama darśaya

अधिक कहने से हमें क्या लाभ? अपना ब्रह्मचर्य त्याग दो। अपनी माता की इच्छा से भी, मुझे पौत्र का मुख दिखाओ।

श्लोक 29 (markandeya.122.29)

मार्कण्डेय उवाच यदा स बहुशस्तेन प्रोक्तः पुत्रेण पार्थिवः । नान्यत्प्रार्थयते किंचित्तदा पुत्रोऽब्रवीत्पुनः ॥ 122.29 ॥

mārkaṇḍeya uvāca yadā sa bahuśastena proktaḥ putreṇa pārthivaḥ nānyatprārthayate kiṁcittadā putro ’bravītpunaḥ

मार्कण्डेय ने कहा—जब वह राजा, अपने पुत्र द्वारा इस प्रकार बार-बार कहे जाने पर, अन्य कुछ भी नहीं माँगता था, तब पुत्र ने पुनः कहा।

श्लोक 30 (markandeya.122.30)

दत्त्वा किमिच्छकं तुभ्यं प्राप्तोऽहं तात सङ्कटम् । तत्करिष्यामि निर्लज्जो भूयो दारपरिग्रहम् ॥ 122.30 ॥

dattvā kimicchakaṁ tubhyaṁ prāpto ’haṁ tāta saṅkaṭam tatkariṣyāmi nirlajjo bhūyo dāraparigraham

हे तात, तुम्हें यह किमिच्छक वरदान देकर मैं संकट में पड़ गया हूँ; निर्लज्ज होकर मैं पुनः पत्नी ग्रहण करूँगा।

श्लोक 31 (markandeya.122.31)

स्त्रियाः समक्षं विजितः पतितो धरणीतले । स्त्रीपतिर्भविता भूयस्तातैतदतिदुष्करम् ॥ 122.31 ॥

striyāḥ samakṣaṁ vijitaḥ patito dharaṇītale strīpatirbhavitā bhūyastātaitadatiduṣkaram

एक स्त्री के समक्ष पराजित होकर, भूमि पर गिरकर, पुनः उसी स्त्री का पति बनना — हे तात, यह अत्यंत दुष्कर है।

श्लोक 32 (markandeya.122.32)

तथापि किं करोम्येष सत्यपाशवशङ्गतः । करिष्यामि यथाऽऽत्थ त्वं भुज्यतां निजशासनम् ॥ 122.32 ॥

tathāpi kiṁ karomyeṣa satyapāśavaśaṅgataḥ kariṣyāmi yathā ’ ’ttha tvaṁ bhujyatāṁ nijaśāsanam

फिर भी, सत्य के पाश में बँधा हुआ मैं क्या करूँ? मैं वही करूँगा जो आप कहते हैं — आपकी अपनी आज्ञा का पालन हो।

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