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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 130

दम का स्वयंवर और सुमना हेतु संग्राम

अध्याय 129अध्याय-सूचीअध्याय 131

श्लोक 1 (markandeya.130.1)

मार्कण्डेय उवाच नरिष्यन्तस्य तनयो दुष्टारिदमनो दमः । शक्रस्येव बलं तस्य दयाशीलं मुनेरिव ॥ 130.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca nariṣyantasya tanayo duṣṭāridamano damaḥ śakrasyeva balaṁ tasya dayāśīlaṁ muneriva

मार्कण्डेय ने कहा — नरिष्यन्त का पुत्र दम दुष्ट शत्रुओं का दमन करने वाला था; उसका बल इन्द्र के समान था और स्वभाव मुनि के समान दयालु था।

श्लोक 2 (markandeya.130.2)

बाभ्रव्यामिन्द्रसेनायां जज्ञे तस्य भूभृतः । नववर्षाणि जठरे स्थित्वा मार्तुर्महायशाः ॥ 130.2 ॥

bābhravyāmindrasenāyāṁ jajñe tasya bhūbhṛtaḥ navavarṣāṇi jaṭhare sthitvā mārturmahāyaśāḥ

वह अत्यन्त यशस्वी बालक बाभ्रवी इन्द्रसेना के गर्भ में नौ वर्षों तक रहकर उस राजा से उत्पन्न हुआ।

श्लोक 3 (markandeya.130.3)

यद्ग्राहयामास दम मातरं जठरे स्थितः । दमशीलश्च भविता यतश्चायं नृपात्मजः ॥ 130.3 ॥

yadgrāhayāmāsa dama mātaraṁ jaṭhare sthitaḥ damaśīlaśca bhavitā yataścāyaṁ nṛpātmajaḥ

अपनी माता के गर्भ में स्थित रहते हुए ही उसने अपनी माता को संयमित करा दिया था; और इसीलिए यह राजपुत्र संयमशील स्वभाव वाला होने वाला था।

श्लोक 4 (markandeya.130.4)

ततस्त्रिकालविज्ञानः स हि तस्य पुरोहितः । दम इत्यकरोन्नाम नरिष्यन्तसुतस्य तु ॥ 130.4 ॥

tatastrikālavijñānaḥ sa hi tasya purohitaḥ dama ityakaronnāma nariṣyantasutasya tu

तब त्रिकालज्ञ पुरोहित ने नरिष्यन्त के उस पुत्र का नाम 'दम' रखा।

श्लोक 5 (markandeya.130.5)

स दत्तो राजपुत्रस्तु धनुर्वेदमशेषतः । जगृहे सुरराजस्य सकाशाद्वृषपर्वणः ॥ 130.5 ॥

sa datto rājaputrastu dhanurvedamaśeṣataḥ jagṛhe surarājasya sakāśādvṛṣaparvaṇaḥ

वह राजपुत्र देवराज वृषपर्वा से समर्पित होकर उनसे सम्पूर्ण धनुर्वेद प्राप्त हुआ।

श्लोक 6 (markandeya.130.6)

दुन्दुभेर्दैत्यवर्यस्य तपोवननिवासिनः । सकाशाज्जगृहे कृत्स्नमस्त्रग्रामं च तत्त्वतः ॥ 130.6 ॥

dundubherdaityavaryasya tapovananivāsinaḥ sakāśājjagṛhe kṛtsnamastragrāmaṁ ca tattvataḥ

तपोवन में निवास करने वाले दैत्यश्रेष्ठ दुन्दुभि से उसने समस्त अस्त्रसमूह को यथार्थतः प्राप्त किया।

श्लोक 7 (markandeya.130.7)

शक्तेः सकाशाद्वेदाश्च वेदाङ्गान्यखिलानि च । तथार्ष्टिषेणाद्राजर्षेर्जगृहे योगमात्मवान् ॥ 130.7 ॥

śakteḥ sakāśādvedāśca vedāṅgānyakhilāni ca tathārṣṭiṣeṇādrājarṣerjagṛhe yogamātmavān

शक्ति ऋषि से उसने वेद और समस्त वेदाङ्ग प्राप्त किए, तथा राजर्षि आर्ष्टिषेण से उस आत्मवान् ने योग सीखा।

श्लोक 8 (markandeya.130.8)

तं सुरूपं महात्मानं गृहीतास्त्रं महाबलम् । स्वयंवरे कृता पित्रा जगृहे सुमना पतिम् ॥ 130.8 ॥

taṁ surūpaṁ mahātmānaṁ gṛhītāstraṁ mahābalam svayaṁvare kṛtā pitrā jagṛhe sumanā patim

अपने पिता द्वारा आयोजित स्वयंवर में सुमना ने उस सुरूप, महाबली और महात्मा को, जिसने शस्त्रास्त्र ग्रहण कर लिए थे, अपने पति के रूप में वरण किया।

श्लोक 9 (markandeya.130.9)

सुता दशार्णाधिपतेर्बलिनश्चारुवर्मणः । पश्यतां सर्वभूतानां ये तदर्थमुपागताः ॥ 130.9 ॥

sutā daśārṇādhipaterbalinaścāruvarmaṇaḥ paśyatāṁ sarvabhūtānāṁ ye tadarthamupāgatāḥ

वह दशार्ण के बलशाली राजा चारुवर्मा की पुत्री थी, और वहाँ उस स्वयंवर के लिए आए हुए समस्त प्राणी यह देख रहे थे।

श्लोक 10 (markandeya.130.10)

तस्यां च सानुरागोऽभून्मद्रराजस्य वै सुतः । सुमनायां महानन्दो महाबलपराक्रमः ॥ 130.10 ॥

tasyāṁ ca sānurāgo’bhūnmadrarājasya vai sutaḥ sumanāyāṁ mahānando mahābalaparākramaḥ

उस सुमना के प्रति मद्रराज के पुत्र महानन्द को, जो महाबली और पराक्रमी था, अनुराग उत्पन्न हो गया था।

श्लोक 11 (markandeya.130.11)

तथा विदर्भाधिपतेः पुत्रः संक्रन्दनस्य च । वपुष्मान्राजपुत्रश्च महाधनुरुदारधीः ॥ 130.11 ॥

tathā vidarbhādhipateḥ putraḥ saṁkrandanasya ca vapuṣmānrājaputraśca mahādhanurudāradhīḥ

तथा विदर्भाधिपति संक्रन्दन के पुत्र वपुष्मान् राजकुमार को भी, जो बड़े धनुर्धर और उदार बुद्धि वाला था, [उससे अनुराग था]।

श्लोक 12 (markandeya.130.12)

ते तदा तं वृतं दृष्ट्वा दुष्टारिदमनं दमम् । मन्त्रयामासुरन्योऽन्यं तत्रानङ्गविमोहिताः ॥ 130.12 ॥

te tadā taṁ vṛtaṁ dṛṣṭvā duṣṭāridamanaṁ damam mantrayāmāsuranyo’nyaṁ tatrānaṅgavimohitāḥ

तब उन्होंने दुष्ट शत्रुओं के दमनकर्ता दम को वरण किया हुआ देखकर, काम से मोहित होकर, आपस में मन्त्रणा की।

श्लोक 13 (markandeya.130.13)

एतामस्य बलात्कन्यां गृहीत्वा रूपशालिनीम् । गृहं प्रयामस्तस्येयमस्माकं यं ग्रहीष्यति ॥ 130.13 ॥

etāmasya balātkanyāṁ gṛhītvā rūpaśālinīm gṛhaṁ prayāmastasyeyamasmākaṁ yaṁ grahīṣyati

'इस रूपवती कन्या को बलपूर्वक हरण करके हम अपने-अपने घर चलें — यह जिसे भी ग्रहण करेगी, वही इसका होगा।'

श्लोक 14 (markandeya.130.14)

भर्तृबुद्ध्या वरारोहा स्वयंवरविधानतः । तस्येच्छया नो भवित्री भार्या धर्मोपपादिता ॥ 130.14 ॥

bhartṛbuddhyā varārohā svayaṁvaravidhānataḥ tasyecchayā no bhavitrī bhāryā dharmopapāditā

'श्रेष्ठ कटिवाली इस कन्या ने स्वयंवर की विधि से पति मानकर जिसे वरण किया है, वही धर्मसंगत विवाह से हमारी इच्छानुसार [वस्तुतः उसकी नहीं, हमारी परिस्थिति के अनुसार] भार्या होगी।'

श्लोक 15 (markandeya.130.15)

अथ नेच्छति सा कञ्चिदस्माकं मदिरेक्षणा । ततस्तस्य भवित्री सा यो दमं घातयिष्यति ॥ 130.15 ॥

atha necchati sā kañcidasmākaṁ madirekṣaṇā tatastasya bhavitrī sā yo damaṁ ghātayiṣyati

'और यदि यह मदमत्त नयनों वाली हम में से किसी को भी नहीं चाहेगी, तो वह उसी की होगी जो दम को मार डालेगा।'

श्लोक 16 (markandeya.130.16)

मार्कण्डेय उवाच इति ते निश्चयं कृत्वा त्रयः पार्थिवनन्दनाः । जगृहुस्तां सुचार्वङ्गीं दमपार्श्वानुवर्त्तिनीम् ॥ 130.16 ॥

mārkaṇḍeya uvāca iti te niścayaṁ kṛtvā trayaḥ pārthivanandanāḥ jagṛhustāṁ sucārvaṅgīṁ damapārśvānuvarttinīm

मार्कण्डेय ने कहा — ऐसा निश्चय करके उन तीनों राजकुमारों ने दम के साथ चल रही उस सुन्दरांगी कन्या को पकड़ लिया।

श्लोक 17 (markandeya.130.17)

ततः केचिन्नृपास्तेषां ये तत्पक्षा विचुक्रुशुः । चुक्रुशुश्चापरे भूपाः केचिन्मध्यस्थतां गताः ॥ 130.17 ॥

tataḥ kecinnṛpāsteṣāṁ ye tatpakṣā vicukruśuḥ cukruśuścāpare bhūpāḥ kecinmadhyasthatāṁ gatāḥ

तब उन [तीनों] के पक्ष के कुछ राजा चिल्लाकर विरोध करने लगे, अन्य राजा भी चिल्लाए, और कुछ मध्यस्थ बने रहे।

श्लोक 18 (markandeya.130.18)

ततो दमस्तान्भूपालानवलोक्य समन्ततः । अनाकुलमना वाक्यमिदमाह महामुने ॥ 130.18 ॥

tato damastānbhūpālānavalokya samantataḥ anākulamanā vākyamidamāha mahāmune

तब दम ने चारों ओर उन राजाओं को देखकर, हे महामुने, अविचलित मन से यह वचन कहा।

श्लोक 19 (markandeya.130.19)

दम उवाच भो भूपा धर्मकृत्येषु यद्वदन्ति स्वयंवरम् । दशार्णपतिना भूपाः कृते धर्म्ये स्वयंवरे । अधर्मो वाऽथ वा धर्मो यदेभिर्गृह्यते बलात् ॥ 130.19 ॥

dama uvāca bho bhūpā dharmakṛtyeṣu yadvadanti svayaṁvaram daśārṇapatinā bhūpāḥ kṛte dharmye svayaṁvare adharmo vā’tha vā dharmo yadebhirgṛhyate balāt

दम ने कहा — 'हे राजाओ, जिसे धर्मकृत्यों में स्वयंवर कहा जाता है, दशार्णपति द्वारा किए गए इस धर्मसंगत स्वयंवर में यह जो बलपूर्वक हरण किया जा रहा है, वह अधर्म है अथवा धर्म?'

श्लोक 20 (markandeya.130.20)

यद्यधर्मो न मे कार्यमन्यभार्या भविष्यति । धर्मो वा तदलं प्राणैर्ये रक्ष्यन्तेऽरिलङ्घने ॥ 130.20 ॥

yadyadharmo na me kāryamanyabhāryā bhaviṣyati dharmo vā tadalaṁ prāṇairye rakṣyante’rilaṅghane

'यदि यह अधर्म है तो मुझे इससे कोई प्रयोजन नहीं — मेरी दूसरी पत्नी हो जाएगी। और यदि यह धर्म है, तो जो शत्रु के इस अतिक्रमण से रक्षित होने योग्य हैं, उनके लिए प्राणों की भी क्या चिन्ता!'

श्लोक 21 (markandeya.130.21)

ततो दशार्णाधिपतिश्चारुवर्मा नराधिपः । निःशब्दं कारयित्वा तत्सदः प्राह महामुने ॥ 130.21 ॥

tato daśārṇādhipatiścāruvarmā narādhipaḥ niḥśabdaṁ kārayitvā tatsadaḥ prāha mahāmune

तब दशार्ण के राजा चारुवर्मा ने उस सभा को चुप कराकर, हे महामुने, यह कहा —

श्लोक 22 (markandeya.130.22)

दमेन यदिदं प्रोक्तं धर्माधर्माश्रितं नृपाः । तद्वदध्वं यथा धर्मो ममास्य च न लुप्यते ॥ 130.22 ॥

damena yadidaṁ proktaṁ dharmādharmāśritaṁ nṛpāḥ tadvadadhvaṁ yathā dharmo mamāsya ca na lupyate

'हे राजाओ, दम ने जो यह धर्म और अधर्म से सम्बन्धित बात कही है, उसका उत्तर आप इस प्रकार दीजिए कि मेरा धर्म भी नष्ट न हो और इसका भी नहीं।'

श्लोक 23 (markandeya.130.23)

मार्कण्डेय उवाच ततः केचिन्महीपालास्तमूचुर्वसुधाधिपम् । परस्परानुरागेण गान्धर्वो विहितो विधिः ॥ 130.23 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataḥ kecinmahīpālāstamūcurvasudhādhipam parasparānurāgeṇa gāndharvo vihito vidhiḥ

मार्कण्डेय ने कहा — तब कुछ राजाओं ने उस पृथ्वीपति से कहा — 'परस्पर अनुराग से यहाँ गान्धर्व विधि सम्पन्न हो चुकी है।'

श्लोक 24 (markandeya.130.24)

क्षत्रियाणां परमयं न विट्शूद्रद्विजन्मनाम् । दममाश्रित्य निष्पन्नः स चास्या दुहितुस्तव ॥ 130.24 ॥

kṣatriyāṇāṁ paramayaṁ na viṭśūdradvijanmanām damamāśritya niṣpannaḥ sa cāsyā duhitustava

'यह क्षत्रियों के लिए सर्वोत्तम विवाह है, वैश्य-शूद्र-ब्राह्मणों के लिए नहीं। दम के आश्रय से यह [विवाह] सिद्ध हो चुका है, और यह आपकी पुत्री का भी है।'

श्लोक 25 (markandeya.130.25)

इति धर्माद्दमस्यैषा दुहिता तव पार्थिव । योऽन्यथा वर्त्तते मोहात्कामात्मा सम्प्रवर्त्तते ॥ 130.25 ॥

iti dharmāddamasyaiṣā duhitā tava pārthiva yo’nyathā varttate mohātkāmātmā sampravarttate

'अतः धर्मानुसार, हे राजन्, यह आपकी पुत्री दम की पत्नी है। जो इसके विपरीत आचरण करता है, वह मोहवश काम के वश में होकर ही ऐसा करता है।'

श्लोक 26 (markandeya.130.26)

तथाऽपरे तदा प्रोचुर्महात्मानो हि भूभृताम् । पक्षे ये भूभृतो विप्र दशार्णाधिपतिं वचः ॥ 130.26 ॥

tathā’pare tadā procurmahātmāno hi bhūbhṛtām pakṣe ye bhūbhṛto vipra daśārṇādhipatiṁ vacaḥ

तब उसी समय, हे विप्र, राजाओं के दूसरे पक्ष में खड़े कुछ महात्मा राजाओं ने भी दशार्णाधिपति से यह वचन कहा —

श्लोक 27 (markandeya.130.27)

मोहात्किमाहुर्धर्मोऽयं गान्धर्वं क्षत्रजन्मनः । न त्वेष शास्ता नान्यो हि राक्षसः शस्त्रजीविनाम् ॥ 130.27 ॥

mohātkimāhurdharmo’yaṁ gāndharvaṁ kṣatrajanmanaḥ na tveṣa śāstā nānyo hi rākṣasaḥ śastrajīvinām

'क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न पुरुष के लिए गान्धर्व विवाह को धर्म कहना केवल मोहवश कहा गया है। इसका कोई और शासक/प्रमाण नहीं — शस्त्रजीवियों के लिए राक्षस विवाह ही [एकमात्र प्रमाण] है।'

श्लोक 28 (markandeya.130.28)

बलादिमां यो हरति हत्वा तु परिपन्थिनः । तस्यैषा स्याद्राक्षसेन विवाहेनावनीश्वराः ॥ 130.28 ॥

balādimāṁ yo harati hatvā tu paripanthinaḥ tasyaiṣā syādrākṣasena vivāhenāvanīśvarāḥ

'जो शत्रुओं का वध करके बलपूर्वक इसका हरण करेगा, हे राजाओ, वह राक्षस विवाह द्वारा ही इसका [वास्तविक पति] होगा।'

श्लोक 29 (markandeya.130.29)

प्रधानतर एषोऽत्र विवाहद्वितये मतः । क्षत्रियाणामतो धर्मा महानन्दादिभिः कृतः ॥ 130.29 ॥

pradhānatara eṣo’tra vivāhadvitaye mataḥ kṣatriyāṇāmato dharmā mahānandādibhiḥ kṛtaḥ

'दोनों प्रकार के विवाहों में यही अधिक प्रधान माना गया है — इसीलिए महानन्द आदि ने क्षत्रियों का यह धर्म अपनाया है।'

श्लोक 30 (markandeya.130.30)

मार्कण्डेय उवाच अथ प्रोचुः पुनर्भूपा यैः पूर्वमुदितो नृपः । परस्परानुरागेण जातिधर्माश्रितं वचः ॥ 130.30 ॥

mārkaṇḍeya uvāca atha procuḥ punarbhūpā yaiḥ pūrvamudito nṛpaḥ parasparānurāgeṇa jātidharmāśritaṁ vacaḥ

मार्कण्डेय ने कहा — तब जिन राजाओं ने पहले [गान्धर्व-पक्ष का] समर्थन किया था, उन्होंने पुनः जाति-धर्म पर आधारित होकर परस्पर-अनुराग की बात कही।

श्लोक 31 (markandeya.130.31)

सत्यं शस्तो राक्षसोऽपि क्षत्रियाणां परो विधिः । किन्त्वसौ जनकस्वाम्ये कुमार्यानुमतो वरः ॥ 130.31 ॥

satyaṁ śasto rākṣaso’pi kṣatriyāṇāṁ paro vidhiḥ kintvasau janakasvāmye kumāryānumato varaḥ

'यह सत्य है कि राक्षस विवाह भी क्षत्रियों के लिए एक श्रेष्ठ विधि कही गई है, किन्तु वह [तभी वैध होता है जब] कन्या के पिता के स्वामित्व में उसका वर कन्या द्वारा स्वीकृत हो।'

श्लोक 32 (markandeya.130.32)

हत्वा तु पितृसम्बन्धं बलेन ह्रियते हि या । स राक्षसो विधिः प्रोक्तो नात्र भर्तृकरे स्थिता ॥ 130.32 ॥

hatvā tu pitṛsambandhaṁ balena hriyate hi yā sa rākṣaso vidhiḥ prokto nātra bhartṛkare sthitā

'जो पितृ-सम्बन्ध को नष्ट करके [अर्थात् पिता के अधिकार को न मानकर] बलपूर्वक हरण की जाती है, वही राक्षस विधि कहलाती है — यह उस स्थिति में लागू नहीं होती जहाँ कन्या पहले ही किसी के हाथ में [अर्थात् वरण कर चुकी] है।'

श्लोक 33 (markandeya.130.33)

पश्यतां सर्वभूपानामनया यद्वृतो दमः । गान्धर्वस्येह निष्पत्तौ विवाहो राक्षसोऽत्र कः ॥ 130.33 ॥

paśyatāṁ sarvabhūpānāmanayā yadvṛto damaḥ gāndharvasyeha niṣpattau vivāho rākṣaso’tra kaḥ

'सम्पूर्ण राजाओं के देखते हुए इसने दम को वरण किया — यह गान्धर्व विवाह पहले ही सम्पन्न हो चुका, तो यहाँ राक्षस विवाह कहाँ रहा?'

श्लोक 34 (markandeya.130.34)

विवाहितायाः कन्यायाः कन्यात्वं नैव विद्यते । कन्यायाश्च विवाहेन सम्बन्धः पृथिवीश्वराः ॥ 130.34 ॥

vivāhitāyāḥ kanyāyāḥ kanyātvaṁ naiva vidyate kanyāyāśca vivāhena sambandhaḥ pṛthivīśvarāḥ

'विवाहित कन्या का कन्यात्व शेष नहीं रहता, और विवाह से ही कन्या का [अपने पति से] सम्बन्ध स्थापित होता है, हे पृथ्वीपतियो।'

श्लोक 35 (markandeya.130.35)

त इमे ये बलादेनां दमादादातुमुद्यताः । बलिनस्ते यदि ततः कुर्वन्तु न तु साधु तत् ॥ 130.35 ॥

ta ime ye balādenāṁ damādādātumudyatāḥ balinaste yadi tataḥ kurvantu na tu sādhu tat

'ये जो लोग अब बलपूर्वक इसे दम से छीनने को उद्यत हैं, यदि वे बलवान् भी हैं, तो भी वे यह करें — किन्तु यह उचित नहीं है।'

श्लोक 36 (markandeya.130.36)

मार्कण्डेय उवाच तच्छ्रुत्वाऽसौ दमः कोपकषायीकृतलोचनः । आरोपयामास धनुर्वचनं चेदमब्रवीत् ॥ 130.36 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tacchrutvā’sau damaḥ kopakaṣāyīkṛtalocanaḥ āropayāmāsa dhanurvacanaṁ cedamabravīt

मार्कण्डेय ने कहा — यह सुनकर, क्रोध से लाल हुए नेत्रों वाले उस दम ने धनुष चढ़ाया और यह वचन कहा —

श्लोक 37 (markandeya.130.37)

ममापि भार्या बलिभिः पश्यतो ह्रियते यदि । तत्कुलेन भुजाभ्यां वा को गुणः क्लीबजन्मनः ॥ 130.37 ॥

mamāpi bhāryā balibhiḥ paśyato hriyate yadi tatkulena bhujābhyāṁ vā ko guṇaḥ klībajanmanaḥ

'यदि मेरे देखते हुए बलवानों द्वारा मेरी पत्नी भी हर ली जाए, तो फिर कुल का अथवा भुजबल का क्या गुण रह जाता है — मैं तो नपुंसक-जन्मा ही कहलाऊँगा।'

श्लोक 38 (markandeya.130.38)

धिङ्ममास्त्राणि धिक्छौर्यं धिक्छरान्धिक्छरासनम् । धिग्व्यर्थं मे कुले जन्म मरुत्तस्य महात्मनः ॥ 130.38 ॥

dhiṅmamāstrāṇi dhikchauryaṁ dhikcharāndhikcharāsanam dhigvyarthaṁ me kule janma maruttasya mahātmanaḥ

'धिक्कार है मेरे अस्त्रों को, धिक्कार है मेरे शौर्य को, धिक्कार है मेरे बाणों और धनुष को! धिक्कार है महात्मा मरुत्त के कुल में मेरा यह व्यर्थ जन्म!'

श्लोक 39 (markandeya.130.39)

यदि भार्यामिमे मूढाः समादाय बलान्विताः । प्रयान्ति जीवतो धिक्तां मम व्यर्थमनुष्यताम् ॥ 130.39 ॥

yadi bhāryāmime mūḍhāḥ samādāya balānvitāḥ prayānti jīvato dhiktāṁ mama vyarthamanuṣyatām

'यदि ये मूर्ख बलशाली लोग मेरी पत्नी को लेकर जीवित चले जाएँ, तो मेरे इस व्यर्थ मनुष्य-जीवन को धिक्कार है!'

श्लोक 40 (markandeya.130.40)

इत्युक्त्वा तान्महीपालान्महानन्दमुखान्बली । अथाब्रवीत्तदा सर्वान्महारिदमनो दमः ॥ 130.40 ॥

ityuktvā tānmahīpālānmahānandamukhānbalī athābravīttadā sarvānmahāridamano damaḥ

यह कहकर उस बलशाली, महाशत्रु-दमनकारी दम ने महानन्द आदि उन सभी राजाओं से पुनः यह कहा —

श्लोक 41 (markandeya.130.41)

एषातिशोभना बाला चार्वङ्गी मदिरेक्षणा । किं तस्य जन्मना भार्या न यस्येयं कुलोद्भवा ॥ 130.41 ॥

eṣātiśobhanā bālā cārvaṅgī madirekṣaṇā kiṁ tasya janmanā bhāryā na yasyeyaṁ kulodbhavā

'यह अत्यन्त सुन्दर, चारु-अंगी, मदिर-नयनों वाली बाला है — जो कुलीन नहीं है, उसके जन्म से इस पत्नी को क्या लाभ?'

श्लोक 42 (markandeya.130.42)

इति सञ्चिन्त्य भूपालास्तथा यतत संयुगे । यथा निर्जित्य मामेतां पत्नीं कुरुत मानिनः ॥ 130.42 ॥

iti sañcintya bhūpālāstathā yatata saṁyuge yathā nirjitya māmetāṁ patnīṁ kuruta māninaḥ

'ऐसा सोचकर, हे मानी राजाओ, युद्ध में यत्न करो, जिससे मुझे परास्त करके तुम इसे अपनी पत्नी बना सको।'

श्लोक 43 (markandeya.130.43)

इत्याभाष्य ततस्तत्र शरवर्षममुञ्चत । छादयन्पृथिवीपालांस्तमसेव महीरुहान् ॥ 130.43 ॥

ityābhāṣya tatastatra śaravarṣamamuñcata chādayanpṛthivīpālāṁstamaseva mahīruhān

यह कहकर उसने वहीं बाणों की वर्षा छोड़ दी, जिससे राजाओं को इस प्रकार ढक दिया जैसे अन्धकार वृक्षों को ढक लेता है।

श्लोक 44 (markandeya.130.44)

तेऽपि वीरा महीपालाः शरशक्त्यृष्टिमुद्गरान् । मुमुचुस्तत्प्रयुक्तांश्च दमश्चिच्छेद लीलया ॥ 130.44 ॥

te’pi vīrā mahīpālāḥ śaraśaktyṛṣṭimudgarān mumucustatprayuktāṁśca damaściccheda līlayā

वे वीर राजा भी बाण, शक्ति, ऋष्टि और मुद्गर छोड़ने लगे; परन्तु दम ने उन प्रयुक्त अस्त्रों को लीलामात्र से काट डाला।

श्लोक 45 (markandeya.130.45)

तेऽपि तत्प्रहितान्बाणांस्तेषां चासौ शरोत्करान् । चिच्छेद पृथिवीशानां नरिष्यन्तात्मजो मुने ॥ 130.45 ॥

te’pi tatprahitānbāṇāṁsteṣāṁ cāsau śarotkarān ciccheda pṛthivīśānāṁ nariṣyantātmajo mune

उन राजाओं द्वारा छोड़े गए बाणों के तथा बाण-समूहों के भी, हे मुने, नरिष्यन्त-पुत्र दम ने टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

श्लोक 46 (markandeya.130.46)

वर्त्तमाने तदा युद्धे दमस्य क्षितिपात्मजैः । प्रविवेश महानन्दः खड्गपाणिर्यतो दमः ॥ 130.46 ॥

varttamāne tadā yuddhe damasya kṣitipātmajaiḥ praviveśa mahānandaḥ khaḍgapāṇiryato damaḥ

जब दम का उन राजपुत्रों के साथ युद्ध चल ही रहा था, तभी खड्ग हाथ में लिए महानन्द वहाँ [दम के सम्मुख] आ पहुँचा।

श्लोक 47 (markandeya.130.47)

तमायान्तं दमो दृष्ट्वा खड्गपाणिं महामृधे । मुमोच शरवर्षाणि वर्षाणीव पुरन्दरः ॥ 130.47 ॥

tamāyāntaṁ damo dṛṣṭvā khaḍgapāṇiṁ mahāmṛdhe mumoca śaravarṣāṇi varṣāṇīva purandaraḥ

खड्ग लिए हुए उसे महासमर में आते देखकर, दम ने पुरन्दर (इन्द्र) की वर्षा के समान बाणों की वर्षा छोड़ी।

श्लोक 48 (markandeya.130.48)

तदस्त्राणि ततस्तानि शरजालानि तत्क्षणात् । महानन्दः प्रचिच्छेद खड्गेनान्यानवञ्चयत् ॥ 130.48 ॥

tadastrāṇi tatastāni śarajālāni tatkṣaṇāt mahānandaḥ praciccheda khaḍgenānyānavañcayat

महानन्द ने उन अस्त्रों के, उन बाण-जालों के तत्काल ही खड्ग से टुकड़े कर दिए, और शेष को चकमा देकर बचा लिया।

श्लोक 49 (markandeya.130.49)

ततो रोषात्समारुह्य तं दमस्य तदा रथम् । महानन्दो महावीर्यो दमेन युयुधे सह ॥ 130.49 ॥

tato roṣātsamāruhya taṁ damasya tadā ratham mahānando mahāvīryo damena yuyudhe saha

तब क्रोध से महाबली महानन्द दम के रथ पर चढ़कर दम के साथ युद्ध करने लगा।

श्लोक 50 (markandeya.130.50)

बहुधा युध्यमानस्य महानन्दस्य लाघवात् । दमो मुमोच हदये शरं कालानलप्रभम् ॥ 130.50 ॥

bahudhā yudhyamānasya mahānandasya lāghavāt damo mumoca hadaye śaraṁ kālānalaprabham

बार-बार युद्ध करते हुए महानन्द की फुर्ती से बचते हुए, दम ने कालाग्नि के समान तेजस्वी एक बाण उसके हृदय में छोड़ा।

श्लोक 51 (markandeya.130.51)

तं लग्नमात्मनोत्कृष्य विभिन्नेन ततो हृदा । दमं प्रति विचिक्षेप महानन्दोऽसिमुज्ज्वलम् ॥ 130.51 ॥

taṁ lagnamātmanotkṛṣya vibhinnena tato hṛdā damaṁ prati vicikṣepa mahānando’simujjvalam

उस चुभे हुए बाण को स्वयं खींचकर, विदीर्ण हृदय से महानन्द ने चमकती हुई तलवार दम पर फेंकी।

श्लोक 52 (markandeya.130.52)

पतन्तं चैनमुल्काभं शक्त्या चिक्षेप तं दमः । शिरो वेतसपत्रेण महानन्दस्य चाच्छिनत् ॥ 130.52 ॥

patantaṁ cainamulkābhaṁ śaktyā cikṣepa taṁ damaḥ śiro vetasapatreṇa mahānandasya cācchinat

उल्का के समान गिरती हुई उस तलवार को दम ने शक्ति से काट दिया, और महानन्द का सिर वेतस-पत्र [के आकार के बाण] से काट डाला।

श्लोक 53 (markandeya.130.53)

तस्मिन्हते महानन्दे प्राचुर्येण पराङ्मुखाः । बभूवुः पार्थिवास्तस्थौ वपुष्मान्कुण्डिनाधिपः ॥ 130.53 ॥

tasminhate mahānande prācuryeṇa parāṅmukhāḥ babhūvuḥ pārthivāstasthau vapuṣmānkuṇḍinādhipaḥ

महानन्द के मारे जाने पर अधिकांश राजा मुँह मोड़कर भाग खड़े हुए; केवल कुण्डिनाधिपति वपुष्मान् वहीं डटा रहा।

श्लोक 54 (markandeya.130.54)

दमेन युयुधे चासौ बलगर्वमदान्वितः । दाक्षिणात्यमहीपालतनयो रणगोचरः ॥ 130.54 ॥

damena yuyudhe cāsau balagarvamadānvitaḥ dākṣiṇātyamahīpālatanayo raṇagocaraḥ

बल के घमण्ड से उन्मत्त होकर वह दाक्षिणात्य राजपुत्र (वपुष्मान्) रणभूमि में दम के साथ युद्ध करने लगा।

श्लोक 55 (markandeya.130.55)

युध्यमानस्य तस्योग्रं करवालं स वै लघु । चिच्छेद सारथेश्चैव शिरः संख्ये तथा ध्वजम् ॥ 130.55 ॥

yudhyamānasya tasyograṁ karavālaṁ sa vai laghu ciccheda sāratheścaiva śiraḥ saṁkhye tathā dhvajam

युद्ध करते हुए उसकी उग्र तलवार को दम ने तत्काल काट डाला, और युद्ध में उसके सारथि का सिर तथा ध्वज भी काट दिए।

श्लोक 56 (markandeya.130.56)

छिन्नखड्गो गदां सोऽथ जग्राह बहुकण्टकाम् । तामप्यस्य स चिच्छेद करस्थामेव सत्वरः ॥ 130.56 ॥

chinnakhaḍgo gadāṁ so’tha jagrāha bahukaṇṭakām tāmapyasya sa ciccheda karasthāmeva satvaraḥ

खड्ग कट जाने पर उसने बहुत काँटों वाली गदा उठाई; उसे भी दम ने त्वरा से उसके हाथ में ही काट डाला।

श्लोक 57 (markandeya.130.57)

यावदन्यत्समादत्त्ते स वपुष्मान्वरायुधम् । तावच्छरेण तं विद्ध्वा दमो भूमावपातयत् ॥ 130.57 ॥

yāvadanyatsamādattte sa vapuṣmānvarāyudham tāvacchareṇa taṁ viddhvā damo bhūmāvapātayat

जब तक वह वपुष्मान् दूसरा श्रेष्ठ शस्त्र उठाता, तब तक दम ने उसे बाण से बींधकर भूमि पर गिरा दिया।

श्लोक 58 (markandeya.130.58)

स पातितस्ततो भूमौ विह्वलाङ्गः सवेपथुः । विनिवृत्तमतिर्युद्धाद्बभूव क्षितिपात्मजः ॥ 130.58 ॥

sa pātitastato bhūmau vihvalāṅgaḥ savepathuḥ vinivṛttamatiryuddhādbabhūva kṣitipātmajaḥ

भूमि पर गिराया गया वह राजकुमार, अंग विह्वल और काँपता हुआ, युद्ध से विरत-चित्त हो गया।

श्लोक 59 (markandeya.130.59)

तमालोक्य तथा भूतमयुद्धमतिमात्मवान् । उत्सृज्यादाय सुमनां सुमनाः प्रययौ दमः ॥ 130.59 ॥

tamālokya tathā bhūtamayuddhamatimātmavān utsṛjyādāya sumanāṁ sumanāḥ prayayau damaḥ

उस अवस्था को प्राप्त, युद्ध से विमुख हो चुके उसे देखकर, संयमी दम ने युद्ध छोड़ दिया और सुमना को साथ लेकर प्रसन्नचित्त होकर वहाँ से प्रस्थान किया।

श्लोक 60 (markandeya.130.60)

ततो दशार्णाधिपतिः प्रीतिमानकरोत्तयोः । दमस्य सुमनायाश्च विवाहं विधिपूर्वकम् ॥ 130.60 ॥

tato daśārṇādhipatiḥ prītimānakarottayoḥ damasya sumanāyāśca vivāhaṁ vidhipūrvakam

तब दशार्णाधिपति ने प्रसन्न होकर दम और सुमना का विवाह विधिपूर्वक सम्पन्न कराया।

श्लोक 61 (markandeya.130.61)

कृतदारो दमस्तत्र दशार्णाधिपतेः पुरे । स्थित्वाऽल्पकालं प्रययौ सभार्यो निजमन्दिरम् ॥ 130.61 ॥

kṛtadāro damastatra daśārṇādhipateḥ pure sthitvā’lpakālaṁ prayayau sabhāryo nijamandiram

दशार्णाधिपति के नगर में विवाह करके दम कुछ काल तक वहीं रहा, फिर अपनी पत्नी के साथ अपने घर को प्रस्थान किया।

श्लोक 62 (markandeya.130.62)

दशार्णाधिपतिश्चासौ दत्त्वा नागांस्तुरङ्गमान् । रथगोऽश्वखरोष्ट्रांश्च दासीदासांस्तथा बहून् ॥ 130.62 ॥

daśārṇādhipatiścāsau dattvā nāgāṁsturaṅgamān rathago’śvakharoṣṭrāṁśca dāsīdāsāṁstathā bahūn

दशार्णाधिपति ने उसे हाथी, घोड़े, रथ के बैल-अश्व-गधे-ऊँट, तथा अनेक दास-दासियाँ भी भेंट में दीं।

श्लोक 63 (markandeya.130.63)

वस्त्रालङ्कारचापादि वरोपस्करमासनम् । अन्यैस्तैश्च तथा भाण्डैः परिपूर्णं व्यसर्जयत् ॥ 130.63 ॥

vastrālaṅkāracāpādi varopaskaramāsanam anyaistaiśca tathā bhāṇḍaiḥ paripūrṇaṁ vyasarjayat

वस्त्र, आभूषण, धनुष आदि उत्तम सामग्री तथा आसन एवं अन्य बहुमूल्य पात्रों से परिपूर्ण [सामग्री] उसने उसे विदा में दी।

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