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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 17

दत्तात्रेय की उत्पत्ति

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (markandeya.17.1)

पुत्र उवाच ततः काले बहुतिथे द्वितीयो ब्रह्मणः सुतः । स्वभार्यां भगवानत्रिरनसूयामपश्यत॥ 17.1 ॥

putra uvāca tataḥ kāle bahutithe dvitīyo brahmaṇaḥ sutaḥ svabhāryāṁ bhagavānatriranasūyāmapaśyata

पुत्र ने कहा: तदनन्तर बहुत समय बीत जाने पर, भगवान अत्रि ने अपनी पत्नी अनसूया को देखा, जो ब्रह्मा के दूसरे पुत्र थे।

श्लोक 2 (markandeya.17.2)

ऋतुस्नातां सुचार्वङ्गीं लोभनीयोत्तमाकृतिम् । सकामो मनसा भेजे स मुनिस्तामनिन्दिताम्॥ 17.2 ॥

ṛtusnātāṁ sucārvaṅgīṁ lobhanīyottamākṛtim sakāmo manasā bheje sa munistāmaninditām

ऋतुस्नाता, सुन्दर अंगों वाली, लोभनीय उत्तम आकृति वाली, उस निर्दोष पत्नी को उस मुनि ने काम-भाव से मन में धारण किया।

श्लोक 3 (markandeya.17.3)

तस्याभिध्यायतस्तान्तु विकारो योऽन्वजायत । तमेवोवाह पवनस्तिरश्चोर्ध्वञ्च वेगवान्॥ 17.3 ॥

tasyābhidhyāyatastāntu vikāro yo’nvajāyata tamevovāha pavanastiraścordhvañca vegavān

उस प्रकार ध्यान करते हुए उसमें जो विकार उत्पन्न हुआ, उसे वेगवान वायु ने तिरछे और ऊपर की ओर ले गया।

श्लोक 4 (markandeya.17.4)

ब्रह्मरूपञ्च शुक्लाभं पतमानं समन्ततः । सोमरूपं रजोपेतं दिशस्तं जगृहुर्दश॥ 17.4 ॥

brahmarūpañca śuklābhaṁ patamānaṁ samantataḥ somarūpaṁ rajopetaṁ diśastaṁ jagṛhurdaśa

वह ब्रह्मस्वरूप, श्वेत कान्ति वाला, चारों ओर गिरता हुआ रज से युक्त सोमरूप — उसे दसों दिशाओं ने ग्रहण कर लिया।

श्लोक 5 (markandeya.17.5)

स सोमो मानसो जज्ञे तस्यामत्रेः प्रजापतेः । पुत्रः समस्तसत्त्वानामायुराधार एव च॥ 17.5 ॥

sa somo mānaso jajñe tasyāmatreḥ prajāpateḥ putraḥ samastasattvānāmāyurādhāra eva ca

अत्रि प्रजापति की उस पत्नी से वह मानस सोम उत्पन्न हुआ — समस्त प्राणियों का पुत्र और उनके आयु का आधार।

श्लोक 6 (markandeya.17.6)

तुष्टेन विष्णुना जज्ञे दत्तात्रेयो महात्मना । स्वशरीरात् समुत्पाद्य सत्त्वोद्रिक्तो द्विजात्तमः॥ 17.6 ॥

tuṣṭena viṣṇunā jajñe dattātreyo mahātmanā svaśarīrāt samutpādya sattvodrikto dvijāttamaḥ

संतुष्ट हुए महात्मा विष्णु से, अपने ही शरीर से उत्पन्न होकर, दत्तात्रेय उत्पन्न हुए — सत्त्वगुण से परिपूर्ण वह श्रेष्ठ द्विज।

श्लोक 7 (markandeya.17.7)

दत्तात्रेय इति ख्यातः सोऽनसूयास्तनं पपौ । विष्णुरेवावतीर्णोऽसौ द्वितीयोऽत्रेः सुतोऽभवत्॥ 17.7 ॥

dattātreya iti khyātaḥ so’nasūyāstanaṁ papau viṣṇurevāvatīrṇo’sau dvitīyo’treḥ suto’bhavat

दत्तात्रेय के नाम से विख्यात वह अनसूया का स्तनपान करने वाले, विष्णु का ही अवतार, अत्रि के दूसरे पुत्र हुए।

श्लोक 8 (markandeya.17.8)

सप्ताहात् प्रच्युतो मातुरुदरात् कुपितो यतः । हैहयेन्द्रमुपावृत्तमपराध्यन्तमुद्धतम्॥ 17.8 ॥

saptāhāt pracyuto māturudarāt kupito yataḥ haihayendramupāvṛttamaparādhyantamuddhatam

वह गर्भ में ही क्रुद्ध हो उठा, जिसके कारण वह अपनी माता के उदर से सात दिन में ही बाहर निकल आया — उस अपराधी, उद्धत हैहयराज को अत्रि की ओर उन्मुख हुआ देखकर,

श्लोक 9 (markandeya.17.9)

दृष्ट्वात्रौ कुपितः सद्यो दग्धुकामः स हैहयम् । गर्भवासमहायास-दुः खामर्षसमन्वितः॥ 17.9 ॥

dṛṣṭvātrau kupitaḥ sadyo dagdhukāmaḥ sa haihayam garbhavāsamahāyāsa-duḥ khāmarṣasamanvitaḥ

— अत्रि पर आक्रमण करते देखकर वह तुरन्त क्रुद्ध हो उठा और उस हैहयराज को भस्म कर देने की इच्छा से युक्त हुआ, गर्भवास के महान क्लेश और दुःख के रोष से भी परिपूर्ण।

श्लोक 10 (markandeya.17.10)

दुर्वासास्तमसोद्रिक्तो रुद्रांशः समजायत । इति पुत्रत्रयं तस्या जज्ञे ब्रह्मेशवैष्णवम्॥ 17.10 ॥

durvāsāstamasodrikto rudrāṁśaḥ samajāyata iti putratrayaṁ tasyā jajñe brahmeśavaiṣṇavam

— उस तमोगुण से परिपूर्ण दुर्वासा उत्पन्न हुए, जो रुद्र के अंश थे। इस प्रकार अनसूया के तीन पुत्र उत्पन्न हुए — ब्रह्मा, विष्णु और शिव के अंशस्वरूप।

श्लोक 11 (markandeya.17.11)

सोमो ब्रह्मभवद्विष्णुर्दत्तात्रेयो व्यजायत । दुर्वासाः शङ्करो जज्ञे वरदानाद्दिवौकसाम्॥ 17.11 ॥

somo brahmabhavadviṣṇurdattātreyo vyajāyata durvāsāḥ śaṅkaro jajñe varadānāddivaukasām

सोम ब्रह्मा के अंश हुए, विष्णु के अंश दत्तात्रेय उत्पन्न हुए, और देवताओं के वरदान से शंकर के अंश दुर्वासा उत्पन्न हुए।

श्लोक 12 (markandeya.17.12)

सोमः स्वरश्मिभैः शीतैर्वोरुधौषधिमानवान् । आप्याययन् सदा स्वर्गे वर्तते स प्रजापतिः॥ 17.12 ॥

somaḥ svaraśmibhaiḥ śītairvorudhauṣadhimānavān āpyāyayan sadā svarge vartate sa prajāpatiḥ

सोम अपनी शीतल किरणों से लताओं, औषधियों और मनुष्यों को सदा तृप्त करते हुए स्वर्ग में प्रजापति के रूप में विराजमान रहते हैं।

श्लोक 13 (markandeya.17.13)

दत्तात्रेयः प्रजां पाति दुष्टदैत्यनिबर्हणात् । शिष्टानुग्रहकृच्चेति ज्ञेयश्चांशः स वैष्णवः॥ 17.13 ॥

dattātreyaḥ prajāṁ pāti duṣṭadaityanibarhaṇāt śiṣṭānugrahakṛcceti jñeyaścāṁśaḥ sa vaiṣṇavaḥ

दत्तात्रेय दुष्ट दैत्यों के विनाश द्वारा प्रजा की रक्षा करते हैं और सज्जनों पर अनुग्रह करते हैं — इसीलिए वे विष्णु के अंश माने जाने चाहिए।

श्लोक 14 (markandeya.17.14)

निर्दहत्यवमन्तारं दुर्वासा भगवानजः । रौद्रं समाश्रित्य वपुर्दृङ्मनोवाग्भिरुद्धतः॥ 17.14 ॥

nirdahatyavamantāraṁ durvāsā bhagavānajaḥ raudraṁ samāśritya vapurdṛṅmanovāgbhiruddhataḥ

अजन्मा भगवान दुर्वासा, दृष्टि, मन और वाणी में उद्धत होकर तथा रौद्र स्वरूप का आश्रय लेकर, अपने अपमान करने वाले को तत्क्षण भस्म कर देते हैं।

श्लोक 15 (markandeya.17.15)

सोमत्वं भगवानत्रैः पुनश्चक्रे प्रजापतिः । दत्तात्रेयोऽपि विषयान् योगास्थो बुभुजे हरिः॥ 17.15 ॥

somatvaṁ bhagavānatraiḥ punaścakre prajāpatiḥ dattātreyo’pi viṣayān yogāstho bubhuje hariḥ

भगवान प्रजापति ने पुनः अत्रि द्वारा सोम-रूप धारण किया, और दत्तात्रेय भी, योग में स्थित रहते हुए, हरि के रूप में विषयों का भोग करने लगे।

श्लोक 16 (markandeya.17.16)

दुर्वासाः पितरं हित्वा मातरञ्चोत्तम व्रतम् । उन्मत्ताख्यं समाश्रित्य परिबभ्राम मेदिनीम्॥ 17.16 ॥

durvāsāḥ pitaraṁ hitvā mātarañcottama vratam unmattākhyaṁ samāśritya paribabhrāma medinīm

दुर्वासा, पिता और माता को छोड़कर, उत्तम उन्मत्त-नामक व्रत का आश्रय लेकर, पृथ्वी पर विचरण करने लगे।

श्लोक 17 (markandeya.17.17)

मुनिपुत्रवृतो योगी दत्तात्रेयोऽप्यसङ्गिताम् । अभीप्स्यमानः सरसि निममज्ज चिरं प्रभुः॥ 17.17 ॥

muniputravṛto yogī dattātreyo’pyasaṅgitām abhīpsyamānaḥ sarasi nimamajja ciraṁ prabhuḥ

मुनियों के पुत्रों से घिरे हुए योगी प्रभु दत्तात्रेय भी असंगता की प्राप्ति की इच्छा से एक सरोवर में दीर्घकाल तक डूबे रहे।

श्लोक 18 (markandeya.17.18)

तथापि तं महात्मानमतीव प्रियदर्शनम् । तत्यजुर्न कुमारास्ते सरसस्तीरमाश्रिताः॥ 17.18 ॥

tathāpi taṁ mahātmānamatīva priyadarśanam tatyajurna kumārāste sarasastīramāśritāḥ

फिर भी अत्यन्त प्रिय-दर्शन उस महात्मा को उन कुमारों ने नहीं त्यागा, और सरोवर के तट का आश्रय लिए वहीं बने रहे।

श्लोक 19 (markandeya.17.19)

दिव्ये वर्षशते पूर्णे यदा ते न त्यजन्ति तम् । तत्प्रीत्या सरसस्तीरं सर्वे मुनिकुमारकाः॥ 17.19 ॥

divye varṣaśate pūrṇe yadā te na tyajanti tam tatprītyā sarasastīraṁ sarve munikumārakāḥ

जब सौ दिव्य वर्ष पूरे हो जाने पर भी वे मुनिकुमार उसे नहीं त्यागते, तब उन सबने प्रेमपूर्वक सरोवर के तट का ही आश्रय ले लिया।

श्लोक 20 (markandeya.17.20)

ततो दिव्याम्बरधरां चारुपीननितम्बिनीम् । नारीमादाय कल्याणीमुत्तितार जलान्मुनिः॥ 17.20 ॥

tato divyāmbaradharāṁ cārupīnanitambinīm nārīmādāya kalyāṇīmuttitāra jalānmuniḥ

तब उस मुनि ने जल में से दिव्य वस्त्र धारण किए हुए, सुन्दर एवं पुष्ट नितम्ब वाली एक कल्याणी स्त्री को साथ लेकर बाहर निकाला।

श्लोक 21 (markandeya.17.21)

स्त्रीसन्निकर्षाद्यद्येते परित्यक्ष्यन्ति मामिति । मुनिपुत्रास्ततोऽसङ्गी स्थास्यामीति विचिन्तयन्॥ 17.21 ॥

strīsannikarṣādyadyete parityakṣyanti māmiti muniputrāstato’saṅgī sthāsyāmīti vicintayan

यह सोचते हुए कि यदि इस स्त्री के सान्निध्य से ये मुझे त्याग देंगे, तो मैं फिर से असंग होकर रह जाऊँगा — मुनिपुत्र यह विचार करते रहे।

श्लोक 22 (markandeya.17.22)

तथापि तं मुनिसुता न त्यजन्ति यदा मुनिम् । ततः सह तया नार्या मद्यपानमथापिबत्॥ 17.22 ॥

tathāpi taṁ munisutā na tyajanti yadā munim tataḥ saha tayā nāryā madyapānamathāpibat

फिर भी जब उन मुनि-पुत्रों ने उस मुनि को नहीं त्यागा, तब उन्होंने उस स्त्री के साथ मदिरापान भी करना आरम्भ कर दिया।

श्लोक 23 (markandeya.17.23)

सुरापानरतं ते न सभार्यं तत्यजुस्ततः । गीतवाद्यादिवनिता-भोगसंसर्गदूषितम्॥ 17.23 ॥

surāpānarataṁ te na sabhāryaṁ tatyajustataḥ gītavādyādivanitā-bhogasaṁsargadūṣitam

मदिरापान में लीन, संगीत-वाद्य आदि तथा स्त्री-भोग के संसर्ग से दूषित प्रतीत होने वाले उस पत्नी-सहित महात्मा को भी वे मुनि-पुत्र नहीं त्याग सके,

श्लोक 24 (markandeya.17.24)

मन्यमाना महात्मानं पीतासव-सविक्रियम् । नावाप दोषं योगीशो वारुणीं स पिबन्नपि॥ 17.24 ॥

manyamānā mahātmānaṁ pītāsava-savikriyam nāvāpa doṣaṁ yogīśo vāruṇīṁ sa pibannapi

— ऐसा मानते हुए भी। मदिरा के नशे में विकार-सा दिखता हुआ वह योगीश्वर, मदिरा पीते हुए भी, किसी दोष को प्राप्त नहीं हुआ।

श्लोक 25 (markandeya.17.25)

अन्तावसायिवेश्मान्तर्मातरिश्वा वसन्निव । सुरां पिबन् सपत्नीकस्तपस्तेपे स योगवित् । योगीश्वारश्चिन्त्यमानो योगिभिर्मुक्तिकाङ्क्षिभिः॥ 17.25 ॥

antāvasāyiveśmāntarmātariśvā vasanniva surāṁ piban sapatnīkastapastepe sa yogavit yogīśvāraścintyamāno yogibhirmuktikāṅkṣibhiḥ

अन्त्यज के घर में वायु के समान निवास करते हुए, अपनी पत्नी सहित मदिरा पीते हुए, वह योगवेत्ता तप करते रहे — मुक्ति की इच्छा रखने वाले योगियों द्वारा वे योगीश्वर सदा चिन्तन के विषय बने रहे।

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