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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 18

गर्ग का उपदेश

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (markandeya.18.1)

पुत्र उवाच कस्यचित्त्वथ कालस्य कृतवीर्यात्मजोर्ऽजुनः । कृतवीर्ये दिवं याते मन्त्रिभिः सपुरोहितैः॥ 18.1 ॥

putra uvāca kasyacittvatha kālasya kṛtavīryātmajor’junaḥ kṛtavīrye divaṁ yāte mantribhiḥ sapurohitaiḥ

पुत्र ने कहा: कुछ समय बीत जाने पर, जब कृतवीर्य स्वर्गवासी हो गए, तब उनके पुत्र अर्जुन (कार्तवीर्य) को मन्त्रियों ने पुरोहितों सहित,

श्लोक 2 (markandeya.18.2)

पौरैश्चात्माभिषेकार्थं समाहूतोऽब्रवीदिदम् । नाहं राज्यं करिष्यामि मन्त्रिणो नरकोत्तरम्॥ 18.2 ॥

pauraiścātmābhiṣekārthaṁ samāhūto’bravīdidam nāhaṁ rājyaṁ kariṣyāmi mantriṇo narakottaram

तथा नगरवासियों ने अपने राज्याभिषेक के लिए बुलाया। उसने कहा — मैं नरक की ओर ले जाने वाले इस राज्य को नहीं करूँगा।

श्लोक 3 (markandeya.18.3)

यदर्थं गृह्यते शुल्कं तदनिष्पादयन् वृथा । पण्यानां द्वादशं भागं भूपालाय वणिग्जनः॥ 18.3 ॥

yadarthaṁ gṛhyate śulkaṁ tadaniṣpādayan vṛthā paṇyānāṁ dvādaśaṁ bhāgaṁ bhūpālāya vaṇigjanaḥ

जिस उद्देश्य के लिए शुल्क लिया जाता है, उसे पूरा न करना व्यर्थ है — व्यापारी लोग माल का बारहवाँ भाग राजा को देते हैं,

श्लोक 4 (markandeya.18.4)

दत्त्वार्थरक्षिभिर्मार्गे रक्षितो याति दस्युतः । गोपाश्च घृततक्रादेः षड्भागञ्च कृषीबलाः॥ 18.4 ॥

dattvārtharakṣibhirmārge rakṣito yāti dasyutaḥ gopāśca ghṛtatakrādeḥ ṣaḍbhāgañca kṛṣībalāḥ

और वह भाग देकर, उस धन से नियुक्त रक्षकों द्वारा मार्ग में चोरों से सुरक्षित होकर यात्रा करता है। गोपाल घी-मट्ठे आदि का छठा भाग और किसान भी अपना भाग देते हैं,

श्लोक 5 (markandeya.18.5)

दत्त्वान्यद्भूभुजे दद्युर्यदि भागं ततोऽधिकम् । पण्यादीनामशेषाणां वणिजो गृह्णतस्ततः॥ 18.5 ॥

dattvānyadbhūbhuje dadyuryadi bhāgaṁ tato’dhikam paṇyādīnāmaśeṣāṇāṁ vaṇijo gṛhṇatastataḥ

भूपति को देकर; और यदि व्यापारियों से लिए गए समस्त माल आदि के उस उचित भाग से अधिक कुछ भी लिया जाए,

श्लोक 6 (markandeya.18.6)

इष्टापूर्तविनाशाय तद्राज्ञश्चौरधर्मिणः । यद्यन्यैः पाल्यते लोकस्तद्वृत्तयन्तरसंश्रितैः॥ 18.6 ॥

iṣṭāpūrtavināśāya tadrājñaścauradharmiṇaḥ yadyanyaiḥ pālyate lokastadvṛttayantarasaṁśritaiḥ

तो वह चोर-सदृश आचरण करने वाले उस राजा के इष्ट-पूर्त कर्मों के नाश के लिए होता है — यदि प्रजा की रक्षा राजा के बदले अन्य आजीविका वालों द्वारा की जाए।

श्लोक 7 (markandeya.18.7)

गृह्णतो बलिषड्भागं नृपतेर्नरको ध्रुवम् । निरूपितमिदं राज्ञः पूर्वै रक्षणवेतनम्॥ 18.7 ॥

gṛhṇato baliṣaḍbhāgaṁ nṛpaternarako dhruvam nirūpitamidaṁ rājñaḥ pūrvai rakṣaṇavetanam

जो राजा षष्ठांश-रूपी कर लेकर भी रक्षा नहीं करता, उसके लिए नरक निश्चित है; यह भाग तो प्राचीनों ने रक्षा के पारिश्रमिक के रूप में ही निर्धारित किया था।

श्लोक 8 (markandeya.18.8)

अरक्षंश्चौरतश्चौर्यं तदेनो नृपतेर्भवेत् । तस्माद्यदि तपस्तप्त्वा प्राप्तो योगित्वमीप्सितम्॥ 18.8 ॥

arakṣaṁścaurataścauryaṁ tadeno nṛpaterbhavet tasmādyadi tapastaptvā prāpto yogitvamīpsitam

यदि वह चोरों से रक्षा नहीं करता, तो वह चोरी ही राजा का पाप बन जाती है। इसलिए यदि तप करके मुझे अभीष्ट योगत्व की सिद्धि प्राप्त हो चुकी है,

श्लोक 9 (markandeya.18.9)

भुवः पालनसामर्थ्य-युक्त एको महीपतिः । पृथिव्यां शस्त्रधृङ्मान्यस्त्वहमेवर्धिसंयुतः । ततो भविष्ये नात्मानं करिष्ये पापभागिनम्॥ 18.9 ॥

bhuvaḥ pālanasāmarthya-yukta eko mahīpatiḥ pṛthivyāṁ śastradhṛṅmānyastvahamevardhisaṁyutaḥ tato bhaviṣye nātmānaṁ kariṣye pāpabhāginam

तो पृथ्वी की रक्षा में समर्थ, शस्त्रधारी, सम्मानित तथा समृद्धि से युक्त एक अकेले भूपति के पद को धारण किए बिना ही मैं स्वयं को पापी नहीं बनाऊँगा।

श्लोक 10 (markandeya.18.10)

पुत्र उवाच तस्य तन्निश्चयं ज्ञात्वा मन्त्रिमध्यस्थितोऽब्रवीत् । गर्गो नाम महाबुद्धिर्मुनिश्रेष्ठो वयोऽतिगः॥ 18.10 ॥

putra uvāca tasya tanniścayaṁ jñātvā mantrimadhyasthito’bravīt gargo nāma mahābuddhirmuniśreṣṭho vayo’tigaḥ

पुत्र ने कहा: उसका यह निश्चय जानकर, मन्त्रियों के मध्य बैठे महाबुद्धिमान वृद्ध मुनिश्रेष्ठ गर्ग नामक ऋषि ने कहा —

श्लोक 11 (markandeya.18.11)

यद्येवं कर्तुकामस्त्वं राज्यं सम्यक् प्रशासितुम् । ततो शृणुष्व मे वाक्यं कुरुष्व च नृपात्मज॥ 18.11 ॥

yadyevaṁ kartukāmastvaṁ rājyaṁ samyak praśāsitum tato śṛṇuṣva me vākyaṁ kuruṣva ca nṛpātmaja

हे राजकुमार! यदि तुम राज्य का उचित रूप से पालन करना चाहते हो, तो मेरी बात सुनो और उसी के अनुसार करो।

श्लोक 12 (markandeya.18.12)

दत्तात्रेयं महाभागं सह्यद्रोणीकृताश्रयम् । तमाराधय भूपाल ! पाति यो भुवनत्रयम्॥ 18.12 ॥

dattātreyaṁ mahābhāgaṁ sahyadroṇīkṛtāśrayam tamārādhaya bhūpāla ! pāti yo bhuvanatrayam

सह्याद्रि की घाटी में निवास करने वाले महाभाग दत्तात्रेय की आराधना करो, हे भूपाल! जो तीनों लोकों की रक्षा करते हैं,

श्लोक 13 (markandeya.18.13)

योगयुक्तं महाभागं सर्वत्र समदर्शिनम् । विष्णोरंशं जगद्धातुरवतीर्णं महीतले॥ 18.13 ॥

yogayuktaṁ mahābhāgaṁ sarvatra samadarśinam viṣṇoraṁśaṁ jagaddhāturavatīrṇaṁ mahītale

वे योगयुक्त, सर्वत्र समदर्शी, महाभाग, विष्णु के अंशस्वरूप, जगत् के धाता, पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं।

श्लोक 14 (markandeya.18.14)

यमाराध्य सहस्राक्षः प्राप्तवान् पदमात्मनः । हृतं दुरात्मभिर्दैत्यैर्जघान च दितेः सुतान्॥ 18.14 ॥

yamārādhya sahasrākṣaḥ prāptavān padamātmanaḥ hṛtaṁ durātmabhirdaityairjaghāna ca diteḥ sutān

जिनकी आराधना करके सहस्राक्ष इन्द्र ने दुरात्मा दैत्यों द्वारा छीना हुआ अपना पद पुनः प्राप्त किया, और दिति के पुत्रों का वध किया।

श्लोक 15 (markandeya.18.15)

अर्जुन उवाच कथमाराधितो देवैर्दत्तात्रेयः प्रतापवान् । कथञ्चापहृतं दैत्यैरिन्द्रत्वं प्राप वासवः॥ 18.15 ॥

arjuna uvāca kathamārādhito devairdattātreyaḥ pratāpavān kathañcāpahṛtaṁ daityairindratvaṁ prāpa vāsavaḥ

अर्जुन ने कहा: प्रतापी दत्तात्रेय की देवताओं द्वारा किस प्रकार आराधना की गई, और किस प्रकार दैत्यों द्वारा छीना गया इन्द्रत्व वासव ने पुनः प्राप्त किया?

श्लोक 16 (markandeya.18.16)

गर्ग उवाच देवानां दानवानाञ्च युद्धमासीत् सुदारुणम् । दैत्यानामीश्वरो जम्भो देवानाञ्च शचीपतिः॥ 18.16 ॥

garga uvāca devānāṁ dānavānāñca yuddhamāsīt sudāruṇam daityānāmīśvaro jambho devānāñca śacīpatiḥ

गर्ग ने कहा: देवताओं और दानवों के बीच अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ; दैत्यों के स्वामी जम्भ और देवताओं के स्वामी शचीपति (इन्द्र) थे।

श्लोक 17 (markandeya.18.17)

तेषाञ्च युध्यमानानां दिव्यः संवत्सरो गतः । ततो देवाः पराभूता दैत्या विजयिनोऽभवन्॥ 18.17 ॥

teṣāñca yudhyamānānāṁ divyaḥ saṁvatsaro gataḥ tato devāḥ parābhūtā daityā vijayino’bhavan

उन दोनों के युद्ध करते हुए एक दिव्य वर्ष बीत गया; तब देवता पराजित हुए और दैत्य विजयी हो गए।

श्लोक 18 (markandeya.18.18)

विप्रचित्तिमुखैर्देवा दानवैस्ते पराजिताः । पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये॥ 18.18 ॥

vipracittimukhairdevā dānavaiste parājitāḥ palāyanakṛtotsāhā nirutsāhā dviṣajjaye

विप्रचित्ति आदि दानवों द्वारा देवता पराजित होकर, भाग खड़े होने में उत्साहित परन्तु शत्रु पर विजय पाने में निरुत्साहित हो गए।

श्लोक 19 (markandeya.18.19)

बृहस्पतिमुपागम्य दैत्यसैन्यवधेप्सवः । अमन्त्रयन्त सहिता बालखिल्यैस्तथर्षिभिः॥ 18.19 ॥

bṛhaspatimupāgamya daityasainyavadhepsavaḥ amantrayanta sahitā bālakhilyaistatharṣibhiḥ

दैत्य-सेना के वध की इच्छा से, बालखिल्य ऋषियों तथा अन्य ऋषियों सहित मिलकर वे बृहस्पति के पास गए और उनसे परामर्श किया।

श्लोक 20 (markandeya.18.20)

बृहस्पतिरुवाच दत्तात्रेयं महात्मानमत्रेः पुत्रं तपोधनम् । विकृताचरणं भक्त्या सन्तोषयितुमर्हथ॥ 18.20 ॥

bṛhaspatiruvāca dattātreyaṁ mahātmānamatreḥ putraṁ tapodhanam vikṛtācaraṇaṁ bhaktyā santoṣayitumarhatha

बृहस्पति ने कहा: तपोधन अत्रि-पुत्र महात्मा दत्तात्रेय को, जिनका आचरण विचित्र प्रतीत होता है, तुम्हें भक्तिपूर्वक संतुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 21 (markandeya.18.21)

स वो दैत्यविनाशाय वरदो दास्यते वरम् । ततो हनिष्यथ सुरा सहिता दैत्यदानवान्॥ 18.21 ॥

sa vo daityavināśāya varado dāsyate varam tato haniṣyatha surā sahitā daityadānavān

वे तुम्हें दैत्यों के विनाश के लिए वरदान देंगे; तब तुम देवगण मिलकर दैत्यों और दानवों का वध कर सकोगे।

श्लोक 22 (markandeya.18.22)

गर्ग उवाच इत्युक्तास्ते तदा जग्मुर्दत्तात्रेयाश्रमं सुराः । ददृशुश्च महात्मानं तं ते लक्ष्म्या समन्वितम्॥ 18.22 ॥

garga uvāca ityuktāste tadā jagmurdattātreyāśramaṁ surāḥ dadṛśuśca mahātmānaṁ taṁ te lakṣmyā samanvitam

गर्ग ने कहा: यह सुनकर देवगण तब दत्तात्रेय के आश्रम गए और उन महात्मा को लक्ष्मी-सहित देखा,

श्लोक 23 (markandeya.18.23)

उद्गीयमानं गन्धर्वैः सुरापानरतं मुनिम् । ते तस्य गत्वा प्रणतिमवदन् साध्यसाधनम्॥ 18.23 ॥

udgīyamānaṁ gandharvaiḥ surāpānarataṁ munim te tasya gatvā praṇatimavadan sādhyasādhanam

गन्धर्वों द्वारा गाए जाते हुए, मदिरापान में लीन उस मुनि को। उसके पास जाकर उन्होंने प्रणाम किया और अपने कार्य की सिद्धि का उपाय निवेदित किया।

श्लोक 24 (markandeya.18.24)

चक्रुः स्तवञ्चोपजह्रुर्भक्ष्यभोज्यस्त्रगादिकम् । तिष्ठन्तमनुतिष्ठन्ति यान्तं यान्ति दिवौकसः॥ 18.24 ॥

cakruḥ stavañcopajahrurbhakṣyabhojyastragādikam tiṣṭhantamanutiṣṭhanti yāntaṁ yānti divaukasaḥ

उन्होंने स्तुति की और भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, माला आदि भेंट कीं; जब वे बैठते तो देवता भी बैठे रहते, जब वे चलते तो देवता भी उनके साथ चलते।

श्लोक 25 (markandeya.18.25)

आराधयामासुरधः स्थितास्तिष्ठन्तमासने । स प्राह प्रणतान् देवान् दत्तात्रेयः किमिष्यते । मत्तो भवद्भिर्येनेयं शुश्रूषा क्रियते मम॥ 18.25 ॥

ārādhayāmāsuradhaḥ sthitāstiṣṭhantamāsane sa prāha praṇatān devān dattātreyaḥ kimiṣyate matto bhavadbhiryeneyaṁ śuśrūṣā kriyate mama

जब वे आसन पर विराजमान थे, तब नीचे खड़े रहकर उन्होंने उनकी आराधना की। दत्तात्रेय ने प्रणत देवताओं से कहा — तुम मुझसे क्या चाहते हो, जो इस प्रकार मेरी सेवा कर रहे हो?

श्लोक 26 (markandeya.18.26)

देवा ऊचुः दानवैर्मुनिशार्दूल ! जम्भाद्यैर्भूर्भुवादिकम् । हृतं तैलोक्यमाक्रम्य क्रतुभागाश्च कृत्स्नशः॥ 18.26 ॥

devā ūcuḥ dānavairmuniśārdūla ! jambhādyairbhūrbhuvādikam hṛtaṁ tailokyamākramya kratubhāgāśca kṛtsnaśaḥ

देवताओं ने कहा: हे मुनिश्रेष्ठ! जम्भ आदि दानवों द्वारा भूः, भुवः आदि लोकों पर आक्रमण करके सम्पूर्ण त्रिलोकी और हमारे यज्ञ-भाग छीन लिए गए हैं।

श्लोक 27 (markandeya.18.27)

तद्वधे कुरु बुद्धिं त्वं परित्राणाय नोऽनघ । त्वत्प्रसादादभीप्सामः पुनः प्राप्तं त्रिविष्टपम्॥ 18.27 ॥

tadvadhe kuru buddhiṁ tvaṁ paritrāṇāya no’nagha tvatprasādādabhīpsāmaḥ punaḥ prāptaṁ triviṣṭapam

हे निष्पाप! हमारी रक्षा के लिए उनके वध का निश्चय करो; तुम्हारी कृपा से हम पुनः स्वर्ग को प्राप्त करना चाहते हैं।

श्लोक 28 (markandeya.18.28)

दत्तात्रेय उवाच मद्यासक्तोऽहमुच्छिष्टो न चैवाहं जितेन्द्रियः । कथमिच्छथ मत्तोऽपि देवाः शत्रुपराभवम्॥ 18.28 ॥

dattātreya uvāca madyāsakto’hamucchiṣṭo na caivāhaṁ jitendriyaḥ kathamicchatha matto’pi devāḥ śatruparābhavam

दत्तात्रेय ने कहा: मैं मदिरा में आसक्त हूँ, अपवित्र हूँ, और जितेन्द्रिय भी नहीं हूँ — फिर तुम देवगण मुझसे शत्रु के पराभव की आशा कैसे रखते हो?

श्लोक 29 (markandeya.18.29)

देवा ऊचुः अनघस्त्वं जगन्नाथ न लेपस्तव विद्यते । विद्याक्षालनशुद्धान्तर्निविष्टज्ञानदीधिते !॥ 18.29 ॥

devā ūcuḥ anaghastvaṁ jagannātha na lepastava vidyate vidyākṣālanaśuddhāntarniviṣṭajñānadīdhite !

देवताओं ने कहा: हे जगन्नाथ! तुम निष्पाप हो, तुममें कोई कलंक नहीं है — हे ज्ञान की उज्ज्वल ज्योति से पूर्ण, विद्या से शुद्ध अन्तःकरण वाले!

श्लोक 30 (markandeya.18.30)

दत्तात्रेय उवाच सत्यमेतत् सुरा विद्या ममास्ति समदर्शिनः । अस्यास्तु योषितः सङ्गादहमुच्छिष्टतां गतः॥ 18.30 ॥

dattātreya uvāca satyametat surā vidyā mamāsti samadarśinaḥ asyāstu yoṣitaḥ saṅgādahamucchiṣṭatāṁ gataḥ

दत्तात्रेय ने कहा: हे देवताओ! यह सत्य है कि मुझमें समदर्शी ज्ञान विद्यमान है; परन्तु इस स्त्री के संग से मैं जूठेपन को प्राप्त हुआ हूँ।

श्लोक 31 (markandeya.18.31)

स्त्रीसम्भोगो हि दोषाय सातत्येनोपसेवितः । एवमुक्तास्ततो देवाः पुनर्वचनमब्रुवन्॥ 18.31 ॥

strīsambhogo hi doṣāya sātatyenopasevitaḥ evamuktāstato devāḥ punarvacanamabruvan

स्त्री-भोग निरन्तर सेवन किए जाने पर निश्चय ही दोष का कारण बनता है। इस प्रकार कहे जाने पर देवताओं ने फिर से कहा —

श्लोक 32 (markandeya.18.32)

देवा ऊचुः अनघेयं द्विजश्रेष्ठ जगन्माता न दुष्यते । यथांशुमाला सूर्यस्य द्विज-चाण्डालसङ्गिनी॥ 18.32 ॥

devā ūcuḥ anagheyaṁ dvijaśreṣṭha jaganmātā na duṣyate yathāṁśumālā sūryasya dvija-cāṇḍālasaṅginī

देवताओं ने कहा: हे द्विजश्रेष्ठ! यह जगन्माता निर्दोष है, कलंकित नहीं होती — जैसे सूर्य की किरणें ब्राह्मण और चाण्डाल दोनों का स्पर्श करती हुई भी निर्मल ही रहती हैं।

श्लोक 33 (markandeya.18.33)

गर्ग उवाच एवमुक्तस्ततो देवैर्दत्तात्रेयोऽब्रवीदिदम् । प्रहस्य त्रिदशान् सर्वान् यद्येतद्भवतां मतम्॥ 18.33 ॥

garga uvāca evamuktastato devairdattātreyo’bravīdidam prahasya tridaśān sarvān yadyetadbhavatāṁ matam

गर्ग ने कहा: देवताओं द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, दत्तात्रेय ने सब देवताओं पर हँसते हुए यह कहा — यदि यही तुम्हारा निश्चय है,

श्लोक 34 (markandeya.18.34)

तदाहूयासुरान् सर्वान् युद्धाय सुरसत्तमाः । इहानयत मद्दृष्टिगोचरं मा विलम्बतः॥ 18.34 ॥

tadāhūyāsurān sarvān yuddhāya surasattamāḥ ihānayata maddṛṣṭigocaraṁ mā vilambataḥ

तो हे श्रेष्ठ देवगण! समस्त दानवों को युद्ध के लिए बुलाकर बिना विलम्ब किए मेरी दृष्टि के समक्ष यहाँ ले आओ।

श्लोक 35 (markandeya.18.35)

मद्दृष्टिपातहुतभुक्-प्रक्षीणबलतेजसः । येन नाशमशेषास्ते प्रयान्ति मम दर्शनात्॥ 18.35 ॥

maddṛṣṭipātahutabhuk-prakṣīṇabalatejasaḥ yena nāśamaśeṣāste prayānti mama darśanāt

मेरी दृष्टि के पड़ते ही, हवि के समान अग्नि में भस्म होकर, उनका बल और तेज क्षीण हो जाएगा, जिससे वे सब बिना शेष रहे मेरे दर्शनमात्र से नाश को प्राप्त होंगे।

श्लोक 36 (markandeya.18.36)

गर्ग उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवैर्दैत्या महाबलाः । आहवाय समाहूता जग्मुर्देवगणान् रुषा॥ 18.36 ॥

garga uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā devairdaityā mahābalāḥ āhavāya samāhūtā jagmurdevagaṇān ruṣā

गर्ग ने कहा: उनकी वह बात सुनकर, देवताओं द्वारा युद्ध के लिए बुलाए गए महाबली दैत्य क्रोधपूर्वक देवसमूहों की ओर बढ़े।

श्लोक 37 (markandeya.18.37)

ते हन्यमाना दैतेयैर्देवा शीघ्रं भयातुराः । दत्तात्रेयाश्रमं जग्मुः समेताः शरणार्थिनः॥ 18.37 ॥

te hanyamānā daiteyairdevā śīghraṁ bhayāturāḥ dattātreyāśramaṁ jagmuḥ sametāḥ śaraṇārthinaḥ

दैत्यों द्वारा मारे जाते हुए देवता शीघ्र ही भय से व्याकुल होकर, शरण की इच्छा से एकत्र होकर दत्तात्रेय के आश्रम में गए।

श्लोक 38 (markandeya.18.38)

तमेव विविशुर्दैत्याः कालयन्तो दिवौकसः । ददृशुश्च महात्मानं दत्तात्रेयं महाबलम्॥ 18.38 ॥

tameva viviśurdaityāḥ kālayanto divaukasaḥ dadṛśuśca mahātmānaṁ dattātreyaṁ mahābalam

देवताओं का पीछा करते हुए दैत्य भी उसी आश्रम में घुस आए, और वहाँ उन्होंने महाबली महात्मा दत्तात्रेय को देखा —

श्लोक 39 (markandeya.18.39)

वामपार्श्वस्थितामिष्टामशेषजगतां शुभाम् । भार्याञ्चास्य सुचार्वङ्गीं लक्ष्मीमिन्दुनिभाननाम्॥ 18.39 ॥

vāmapārśvasthitāmiṣṭāmaśeṣajagatāṁ śubhām bhāryāñcāsya sucārvaṅgīṁ lakṣmīmindunibhānanām

उनके बाएँ पार्श्व में विराजमान, सम्पूर्ण जगत् की प्रिय एवं शुभ, सुन्दर अंगों वाली, चन्द्रमुखी उनकी पत्नी लक्ष्मी को,

श्लोक 40 (markandeya.18.40)

नीलोत्पलाभनयनां पीनश्रोणिपयोधराम् । गदन्तीं मधुरां भाषां सर्वैर्योषिद्गुणैर्युताम्॥ 18.40 ॥

nīlotpalābhanayanāṁ pīnaśroṇipayodharām gadantīṁ madhurāṁ bhāṣāṁ sarvairyoṣidguṇairyutām

नीलकमल के समान नेत्रों वाली, पुष्ट नितम्ब और स्तनों वाली, मधुर वाणी बोलती हुई, स्त्रियोचित समस्त गुणों से सम्पन्न।

श्लोक 41 (markandeya.18.41)

ते तां दृष्ट्वाग्रतो दैत्याः साभिलाषा मनोभवम् । न शेसुरुद्धतं धैर्यान्मनसा वोढुमातुराः॥ 18.41 ॥

te tāṁ dṛṣṭvāgrato daityāḥ sābhilāṣā manobhavam na śesuruddhataṁ dhairyānmanasā voḍhumāturāḥ

उसे सामने देखकर दैत्य अभिलाषा से युक्त हो गए, काम-भाव से उद्वेलित होकर वे धैर्य से अपने मन को संयत नहीं रख सके।

श्लोक 42 (markandeya.18.42)

त्यक्त्वा देवान् स्त्रियं तां तु हर्तुकामा हतौजसः । तेन पापेन मुह्यन्तः संशक्तास्ते ततोऽब्रुवन्॥ 18.42 ॥

tyaktvā devān striyaṁ tāṁ tu hartukāmā hataujasaḥ tena pāpena muhyantaḥ saṁśaktāste tato’bruvan

देवताओं को छोड़कर, बल-हीन हो चुके वे उस स्त्री को हर लेने की इच्छा से, उस पाप में मोहित होकर आपस में जुड़कर यह बोले —

श्लोक 43 (markandeya.18.43)

स्त्रोरत्नमेतत् त्रैलोक्ये सारं नो यदि वै भवेत् । कृतकृत्यास्ततः सर्व इति नो भावितं मनः॥ 18.43 ॥

stroratnametat trailokye sāraṁ no yadi vai bhavet kṛtakṛtyāstataḥ sarva iti no bhāvitaṁ manaḥ

यदि त्रिलोकी का यह सारभूत स्त्री-रत्न हमें प्राप्त हो जाए, तो हम सब कृतकृत्य हो जाएँगे — ऐसा उनके मन में विचार उठा।

श्लोक 44 (markandeya.18.44)

तस्मात् सर्वे समुत्क्षिप्य शिविकायां सुरार्दनाः । आरोप्य स्वमधिष्ठानं नयाम इति निश्चिताः॥ 18.44 ॥

tasmāt sarve samutkṣipya śivikāyāṁ surārdanāḥ āropya svamadhiṣṭhānaṁ nayāma iti niścitāḥ

इसलिए देवताओं के उन पीड़कों ने निश्चय किया — हम सब मिलकर उसे उठाकर पालकी पर बिठाएँ और अपने ही स्थान को ले चलें।

श्लोक 45 (markandeya.18.45)

गर्ग उवाच सानुरागास्ततस्ते तु प्रोक्ताश्चेत्त्थं परस्परम् । तस्य तां योषितं साध्वीं समुत्क्षिप्य स्मरार्दिताः॥ 18.45 ॥

garga uvāca sānurāgāstataste tu proktāścettthaṁ parasparam tasya tāṁ yoṣitaṁ sādhvīṁ samutkṣipya smarārditāḥ

गर्ग ने कहा: इस प्रकार अनुरागयुक्त होकर आपस में बातें करते हुए, काम से पीड़ित उन दैत्य-दानवों ने उस साध्वी स्त्री को उठा लिया,

श्लोक 46 (markandeya.18.46)

शिविकायां समारोप्य सहिता दैत्यदानवाः । शिरः सु शिविकां कृत्वा स्वस्थानाभिमुखं ययुः॥ 18.46 ॥

śivikāyāṁ samāropya sahitā daityadānavāḥ śiraḥ su śivikāṁ kṛtvā svasthānābhimukhaṁ yayuḥ

और मिलकर पालकी पर बिठाकर, पालकी को अपने सिरों पर उठाकर, अपने ही स्थान की ओर चल पड़े।

श्लोक 47 (markandeya.18.47)

दत्तात्रेयस्ततो देवान् विहस्येदमथाब्रवीत् । दिष्ट्या वर्धथ दैत्यानामेषा लक्ष्मीः शिरोगता । सप्त सथानान्यतिक्रान्ता नवमन्यमुपैष्यति॥ 18.47 ॥

dattātreyastato devān vihasyedamathābravīt diṣṭyā vardhatha daityānāmeṣā lakṣmīḥ śirogatā sapta sathānānyatikrāntā navamanyamupaiṣyati

तब दत्तात्रेय ने देवताओं से हँसते हुए यह कहा — सौभाग्य से यह लक्ष्मी दैत्यों के सिर पर जा बैठी है! सात स्थानों को पार करके वह अब एक नए स्थान की ओर जा रही है।

श्लोक 48 (markandeya.18.48)

देवा ऊचुः कथयस्व जगन्नाथ ! केषु स्थानेष्वस्थिता । पुरुषस्य फलं किं वा प्रयच्छत्यथ नश्यति॥ 18.48 ॥

devā ūcuḥ kathayasva jagannātha ! keṣu sthāneṣvasthitā puruṣasya phalaṁ kiṁ vā prayacchatyatha naśyati

देवताओं ने कहा: हे जगन्नाथ! बताइए, वह किन-किन स्थानों में रहती है, और पुरुष को क्या फल देती है अथवा किस दशा में नष्ट हो जाती है?

श्लोक 49 (markandeya.18.49)

दत्तात्रेय उवाच नृणां पदे स्थिता लक्ष्मीर्निलयं सम्प्रयच्छति । सक्थ्न्योश्च संस्थिता वस्त्रं तथा नानाविधं वसु॥ 18.49 ॥

dattātreya uvāca nṛṇāṁ pade sthitā lakṣmīrnilayaṁ samprayacchati sakthnyośca saṁsthitā vastraṁ tathā nānāvidhaṁ vasu

दत्तात्रेय ने कहा: पुरुष के चरणों में स्थित लक्ष्मी उसे निवास-स्थान प्रदान करती है; जाँघों में स्थित होकर वह वस्त्र और नाना प्रकार का धन देती है।

श्लोक 50 (markandeya.18.50)

कलात्रञ्च गुह्यसंस्था क्रोडस्थापत्यदायिनी । मनोरथान् पूरयति पुरुषाणां हृदि स्थिता॥ 18.50 ॥

kalātrañca guhyasaṁsthā kroḍasthāpatyadāyinī manorathān pūrayati puruṣāṇāṁ hṛdi sthitā

गुह्य स्थान में स्थित होकर वह पत्नी प्रदान करती है, गोद में स्थित होकर सन्तान देती है, और हृदय में स्थित होकर पुरुषों के मनोरथ पूर्ण करती है।

श्लोक 51 (markandeya.18.51)

लक्ष्मीर्लक्ष्मीवतां श्रेष्ठा कण्ठस्था कण्ठभूषणम् । अभीष्टबन्धुदारैश्च तथाश्लेषं प्रवासिभिः॥ 18.51 ॥

lakṣmīrlakṣmīvatāṁ śreṣṭhā kaṇṭhasthā kaṇṭhabhūṣaṇam abhīṣṭabandhudāraiśca tathāśleṣaṁ pravāsibhiḥ

श्रीसम्पन्न पुरुषों में श्रेष्ठ बनाने वाली लक्ष्मी कण्ठ में स्थित होकर कण्ठ-भूषण देती है, तथा प्रवासी को अभीष्ट बन्धुजनों और पत्नी के आलिंगन की प्राप्ति कराती है।

श्लोक 52 (markandeya.18.52)

सृष्टानुवाक्यलावण्यमाज्ञामवितथां तथा । मुखसंस्था कवित्वञ्च यच्छत्युदधिसम्भवा॥ 18.52 ॥

sṛṣṭānuvākyalāvaṇyamājñāmavitathāṁ tathā mukhasaṁsthā kavitvañca yacchatyudadhisambhavā

समुद्र से उत्पन्न वह लक्ष्मी, मुख में स्थित होकर, वाणी का सौन्दर्य, अमोघ आज्ञा और काव्य-प्रतिभा प्रदान करती है।

श्लोक 53 (markandeya.18.53)

शिरोगता सन्त्यजति ततोऽन्यं याति चाश्रयम् । सेयं शिरोगता चैतान् परित्यक्ष्यति साम्प्रतम्॥ 18.53 ॥

śirogatā santyajati tato’nyaṁ yāti cāśrayam seyaṁ śirogatā caitān parityakṣyati sāmpratam

किन्तु सिर पर स्थित होकर वह उसे त्याग देती है और अन्य आश्रय की ओर चली जाती है; और यही लक्ष्मी, अभी इनके सिर पर बैठी हुई, शीघ्र ही इन्हें भी त्याग देगी।

श्लोक 54 (markandeya.18.54)

प्रगृह्यास्त्राणि बध्यन्तां तस्मादेते सुरारयः । न भेतव्यं भृशञ्चैते मया निस्तेजसः कृताः । परदारावमर्षाच्च दग्धपुण्या हतौजसः॥ 18.54 ॥

pragṛhyāstrāṇi badhyantāṁ tasmādete surārayaḥ na bhetavyaṁ bhṛśañcaite mayā nistejasaḥ kṛtāḥ paradārāvamarṣācca dagdhapuṇyā hataujasaḥ

इसलिए अस्त्र उठाकर इन देव-शत्रुओं को बाँधो — डरने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि मैंने पहले ही इन्हें तेजहीन कर दिया है; दूसरे की स्त्री के प्रति अपमानजनक भाव के कारण इनका पुण्य भस्म हो चुका है और इनका बल नष्ट हो चुका है।

श्लोक 55 (markandeya.18.55)

ततस्ते विविधैरस्त्रैर्वध्यमानाः सुरारयः । मूध्नि लक्ष्म्या समाक्रान्ता विनेशुरिति नः श्रुतम्॥ 18.55 ॥

tataste vividhairastrairvadhyamānāḥ surārayaḥ mūdhni lakṣmyā samākrāntā vineśuriti naḥ śrutam

तब विविध अस्त्रों से मारे जाते हुए वे देव-शत्रु, लक्ष्मी द्वारा सिर पर अधिकृत होकर, नष्ट हो गए — ऐसा हमने सुना है।

श्लोक 56 (markandeya.18.56)

लक्ष्मीश्चीत्पत्य सम्प्राप्ता दत्तात्रेयं महामुनिम् । स्तूयमाना सुरैः सर्वैर्दैत्यनाशान्मुदान्वितैः॥ 18.56 ॥

lakṣmīścītpatya samprāptā dattātreyaṁ mahāmunim stūyamānā suraiḥ sarvairdaityanāśānmudānvitaiḥ

लक्ष्मी उड़कर पुनः महामुनि दत्तात्रेय के पास पहुँच गई, और दैत्यों के विनाश से प्रसन्न सभी देवताओं द्वारा उसकी स्तुति की गई।

श्लोक 57 (markandeya.18.57)

प्रणिपत्य ततो देवा दत्तात्रेयं मनीषिणम् । नाकपृष्ठमनुप्राप्ता यथापूर्वं गतज्वराः॥ 18.57 ॥

praṇipatya tato devā dattātreyaṁ manīṣiṇam nākapṛṣṭhamanuprāptā yathāpūrvaṁ gatajvarāḥ

तब देवगण महाज्ञानी दत्तात्रेय को प्रणाम करके, ज्वर-रहित होकर, पहले की भाँति स्वर्ग के शिखर को पुनः प्राप्त हुए।

श्लोक 58 (markandeya.18.58)

तथा त्वमपि रोजेन्द्र ! यदीच्छसि यथेप्सितम् । प्राप्तुमैश्वर्यमतुलं तूर्णमाराधयस्व ताम्॥ 18.58 ॥

tathā tvamapi rojendra ! yadīcchasi yathepsitam prāptumaiśvaryamatulaṁ tūrṇamārādhayasva tām

गर्ग ने कहा: हे राजेन्द्र! इसी प्रकार यदि तुम भी अभीष्ट, अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करना चाहते हो, तो शीघ्र ही उस लक्ष्मी की आराधना करो।

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