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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 21

मदालसा-परिणय

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (markandeya.21.1)

पितोवाच गालवेन समं गत्वा नृपपुत्रेण तेन यत् । कृतं तत् कथ्यतां पुत्रौ विचित्रा युवयोः कथा॥ 21.1 ॥

pitovāca gālavena samaṁ gatvā nṛpaputreṇa tena yat kṛtaṁ tat kathyatāṁ putrau vicitrā yuvayoḥ kathā

हे पुत्रो, राजपुत्र ने गालव के साथ जाकर जो कुछ किया, वह मुझे बताओ; तुम दोनों की कथा अद्भुत है।

श्लोक 2 (markandeya.21.2)

पुत्रावूचतुः स गालवाश्रमे रम्ये तिष्ठन् भूपालनन्दनः । सर्वविघ्रोपशमनं चकार ब्रह्मवादिनाम्॥ 21.2 ॥

putrāvūcatuḥ sa gālavāśrame ramye tiṣṭhan bhūpālanandanaḥ sarvavighropaśamanaṁ cakāra brahmavādinām

वह राजकुमार गालव के रमणीय आश्रम में रहते हुए, वेदवादी ऋषियों के सभी विघ्नों का निवारण करता था।

श्लोक 3 (markandeya.21.3)

वीरं कुवलयाश्वं तं वसन्तं गालवाश्रमे । मदावलेपोपहतो नाजानाद्दानवाधमः॥ 21.3 ॥

vīraṁ kuvalayāśvaṁ taṁ vasantaṁ gālavāśrame madāvalepopahato nājānāddānavādhamaḥ

मद से अंधे उस नीच दानव को यह ज्ञात नहीं हुआ कि वीर कुवलयाश्व उस समय गालव के आश्रम में ही निवास कर रहा है।

श्लोक 4 (markandeya.21.4)

ततस्तं गालवं विप्रं सन्ध्योपासनतत्परम् । शौकरं रूपमास्थाय प्रधर्षयितुमागतम्॥ 21.4 ॥

tatastaṁ gālavaṁ vipraṁ sandhyopāsanatatparam śaukaraṁ rūpamāsthāya pradharṣayitumāgatam

तदनन्तर सन्ध्या-उपासना में लीन उस ब्राह्मण गालव पर आक्रमण करने के लिए वह शूकर का रूप धारण करके वहाँ आया।

श्लोक 5 (markandeya.21.5)

मुनिशिष्यैरथोत्क्रुष्टे शीघ्रमारुह्य तं हयम् । अन्वधावद्वराहं तं नृपपुत्रः शरासनी॥ 21.5 ॥

muniśiṣyairathotkruṣṭe śīghramāruhya taṁ hayam anvadhāvadvarāhaṁ taṁ nṛpaputraḥ śarāsanī

मुनि के शिष्यों के चिल्लाने पर राजकुमार शीघ्र ही उस घोड़े पर सवार होकर धनुर्धारी बना और उस वराह का पीछा किया।

श्लोक 6 (markandeya.21.6)

आजघान च बाणेन चन्द्रार्धाकारवर्चसा । आकृष्य बलवच्चापं चारुचित्रोपशोभितम्॥ 21.6 ॥

ājaghāna ca bāṇena candrārdhākāravarcasā ākṛṣya balavaccāpaṁ cārucitropaśobhitam

उसने अपने बलशाली और सुंदर चित्रों से सुशोभित धनुष को खींचकर, अर्धचंद्राकार तेजयुक्त बाण से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 7 (markandeya.21.7)

नाराचाभिहतः शीघ्रमात्मत्राणपरो मृगः । गिरिपादपसम्बाधां सोऽन्वक्रामन्महाटवीम्॥ 21.7 ॥

nārācābhihataḥ śīghramātmatrāṇaparo mṛgaḥ giripādapasambādhāṁ so ’nvakrāmanmahāṭavīm

उस लौह-बाण से आहत होकर वह पशु आत्मरक्षा के लिए शीघ्र ही पर्वतों और वृक्षों से भरे उस विशाल वन में भाग गया।

श्लोक 8 (markandeya.21.8)

तमन्वधावद्वेगेन तुरगोऽसौ मनोजवः । चोदितो राजपुत्रेण पितुरादेशकारिणा॥ 21.8 ॥

tamanvadhāvadvegena turago ’sau manojavaḥ codito rājaputreṇa piturādeśakāriṇā

पिता की आज्ञा का पालन करने वाले उस राजकुमार द्वारा प्रेरित होकर वह मनोवेगी घोड़ा तीव्र गति से उसके पीछे दौड़ा।

श्लोक 9 (markandeya.21.9)

अतिक्रम्याथ वेगेन योजनानि सहस्रशः । धरण्यां विवृते गर्ते निपपात लघुक्रमः॥ 21.9 ॥

atikramyātha vegena yojanāni sahasraśaḥ dharaṇyāṁ vivṛte garte nipapāta laghukramaḥ

हजारों योजन वेग से पार करके वह हल्की चाल वाला पशु पृथ्वी में खुले हुए एक गड्ढे में जा गिरा।

श्लोक 10 (markandeya.21.10)

तस्यानन्तरमेवाशु सोऽप्यश्वी नृपतेः सुतः । निपपात महागर्ते तिमिरौघसमावृते॥ 21.10 ॥

tasyānantaramevāśu so ’pyaśvī nṛpateḥ sutaḥ nipapāta mahāgarte timiraughasamāvṛte

उसके तुरन्त बाद ही घुड़सवार वह राजपुत्र भी अन्धकार के प्रवाह से आच्छादित उस विशाल गड्ढे में जा गिरा।

श्लोक 11 (markandeya.21.11)

ततो नादृश्यत मृगः स तस्मिन् राजसूनुना । प्रकाशञ्च स पातालमपश्यत् तत्र नापि नम्॥ 21.11 ॥

tato nādṛśyata mṛgaḥ sa tasmin rājasūnunā prakāśañca sa pātālamapaśyat tatra nāpi nam

तब राजकुमार को वह पशु वहाँ दिखाई नहीं दिया, और उसने प्रकाशमय पाताल को देखा, जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था।

श्लोक 12 (markandeya.21.12)

ततोऽपश्यत् स सौवर्ण-प्रासादशतसंकुलम् । पुरन्दरपुरप्रख्यं पुरं प्राकारशोभितम्॥ 21.12 ॥

tato ’paśyat sa sauvarṇa-prāsādaśatasaṁkulam purandarapuraprakhyaṁ puraṁ prākāraśobhitam

तब उसने सैकड़ों स्वर्ण-प्रासादों से भरा हुआ, इन्द्रपुरी के समान विख्यात तथा प्राकार से सुशोभित एक नगर देखा।

श्लोक 13 (markandeya.21.13)

तत् प्रविश्य स नापश्यत् तत्र कञ्चिन्नरं पुरे । भ्रमता च ततो दृष्टा तत्र योषित् त्वरान्विता॥ 21.13 ॥

tat praviśya sa nāpaśyat tatra kañcinnaraṁ pure bhramatā ca tato dṛṣṭā tatra yoṣit tvarānvitā

उस नगर में प्रवेश करके उसे वहाँ कोई पुरुष दिखाई नहीं दिया; परन्तु घूमते हुए उसने वहाँ शीघ्रता से जाती हुई एक स्त्री को देखा।

श्लोक 14 (markandeya.21.14)

सा पृष्टा तेन तन्वङ्गी प्रस्थिता केन कस्य वा । नोवाच किञ्चित् प्रासादमारुरोह च भामिनी॥ 21.14 ॥

sā pṛṣṭā tena tanvaṅgī prasthitā kena kasya vā novāca kiñcit prāsādamāruroha ca bhāminī

उस कृशांगी सुंदरी से जब उसने पूछा कि वह किसके यहाँ और किसलिए जा रही है, तो वह कुछ न बोली और एक प्रासाद में चढ़ गई।

श्लोक 15 (markandeya.21.15)

सोऽप्यश्वमेकतो बद्ध्वा तामेवानुससार वै । विस्मयोत्फुल्लनयनो निः शङ्को नृपतेः सुतः॥ 21.15 ॥

so ’pyaśvamekato baddhvā tāmevānusasāra vai vismayotphullanayano niḥ śaṅko nṛpateḥ sutaḥ

उसने भी अपने घोड़े को एक ओर बाँधकर, विस्मय से चकित नेत्रों वाला वह निडर राजकुमार उसी के पीछे-पीछे गया।

श्लोक 16 (markandeya.21.16)

ततोऽपश्यत् सुविस्तीर्णे पर्यङ्के सर्वकाञ्चने । निषण्णां कन्यकामेकां कामयुक्तां रतीमिव॥ 21.16 ॥

tato ’paśyat suvistīrṇe paryaṅke sarvakāñcane niṣaṇṇāṁ kanyakāmekāṁ kāmayuktāṁ ratīmiva

तब उसने पूर्ण स्वर्णमय एक विशाल पलंग पर बैठी हुई एक कन्या को देखा, जो कामातुर रति के समान प्रतीत होती थी।

श्लोक 17 (markandeya.21.17)

विस्पष्टेन्दुमुखीं सुभ्रूं पीनश्रोणिपयोधराम् । बिम्बाधरोष्ठीं नन्वङ्गीं नीलोत्पलविलोचनाम्॥ 21.17 ॥

vispaṣṭendumukhīṁ subhrūṁ pīnaśroṇipayodharām bimbādharoṣṭhīṁ nanvaṅgīṁ nīlotpalavilocanām

उसका मुख चन्द्रमा के समान उज्ज्वल था, भौंहें सुंदर थीं, नितम्ब और स्तन भरे हुए थे, ओष्ठ बिम्बफल के समान लाल थे, अंग निर्दोष थे और नेत्र नीले कमल के समान थे।

श्लोक 18 (markandeya.21.18)

रक्ततुङ्गनखीं श्यामां मृद्वीं ताम्रकराङ्घ्रिकाम् । करभोरुं सुदशनां नीलसूक्ष्मस्थिरालकाम्॥ 21.18 ॥

raktatuṅganakhīṁ śyāmāṁ mṛdvīṁ tāmrakarāṅghrikām karabhoruṁ sudaśanāṁ nīlasūkṣmasthirālakām

उसके नख लाल और उभरे हुए थे, वर्ण श्याम, अंग कोमल, हाथ-पैर ताम्रवर्ण, जंघाएँ हाथी की सूँड़ जैसी, दाँत सुंदर तथा केश काले, सूक्ष्म और घुँघराले थे।

श्लोक 19 (markandeya.21.19)

तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीमनङ्गाङ्गलतामिव । सोऽमन्यत् पार्थिवसुतस्तां रसातलदेवताम्॥ 21.19 ॥

tāṁ dṛṣṭvā cārusarvāṅgīmanaṅgāṅgalatāmiva so ’manyat pārthivasutastāṁ rasātaladevatām

उसके सभी अंग सुंदर होने के कारण मानो वह कामदेव के शरीर की लता हो, ऐसा देखकर राजकुमार ने उसे रसातल की देवी मान लिया।

श्लोक 20 (markandeya.21.20)

सा च दृष्ट्वैव तं बाला नीलकुञ्चितमूर्धजम् । पीनोरुस्कन्धबाहुं तममंस्त मदनं शुभा॥ 21.20 ॥

sā ca dṛṣṭvaiva taṁ bālā nīlakuñcitamūrdhajam pīnoruskandhabāhuṁ tamamaṁsta madanaṁ śubhā

और वह सुंदरी बाला भी नीले घुँघराले केशों तथा भरे हुए जंघाओं, कंधों और भुजाओं वाले उसे देखकर उसे साक्षात् कामदेव मान बैठी।

श्लोक 21 (markandeya.21.21)

उत्तस्थौ च महाभागा चित्तक्षोभमवाप्य सा । लज्जाविस्मयदैन्यानां सद्यस्तन्वी वशं गता॥ 21.21 ॥

uttasthau ca mahābhāgā cittakṣobhamavāpya sā lajjāvismayadainyānāṁ sadyastanvī vaśaṁ gatā

वह भाग्यशालिनी चित्त में क्षुब्ध होकर उठ खड़ी हुई; वह कृशांगी तत्काल ही लज्जा, विस्मय और असहायता के वशीभूत हो गई।

श्लोक 22 (markandeya.21.22)

कोऽयं देवो नु यक्षो वा गन्धर्वो वोरगोऽपि वा । विद्याधरो वा सम्प्राप्तः कृतपुण्यरतिर्नरः॥ 21.22 ॥

ko ’yaṁ devo nu yakṣo vā gandharvo vorago ’pi vā vidyādharo vā samprāptaḥ kṛtapuṇyaratirnaraḥ

यह कौन है — देव, यक्ष, गन्धर्व अथवा नाग? या विद्याधर, अथवा पुण्यवश प्रेम पाने आया कोई मनुष्य?

श्लोक 23 (markandeya.21.23)

एवं विचिन्त्य वहुधा निश्वस्य च महीतले । उपविश्य ततो भेजे सा मूर्च्छां मदिरक्षणा॥ 21.23 ॥

evaṁ vicintya vahudhā niśvasya ca mahītale upaviśya tato bheje sā mūrcchāṁ madirakṣaṇā

इस प्रकार बहुत सोच-विचार कर और लम्बी साँस लेकर वह मृगनयनी पृथ्वी पर बैठ गई और मूर्च्छित हो गई।

श्लोक 24 (markandeya.21.24)

सोऽपि कामशराघातमवाप्य नृपतेः सुतः । तां समाश्वासयामास न भेतव्यमिति ब्रुवन्॥ 21.24 ॥

so ’pi kāmaśarāghātamavāpya nṛpateḥ sutaḥ tāṁ samāśvāsayāmāsa na bhetavyamiti bruvan

कामदेव के बाणों से आहत वह राजकुमार भी 'डरने की कोई बात नहीं' यह कहकर उसे सांत्वना देने लगा।

श्लोक 25 (markandeya.21.25)

सा च स्त्री या तदा दृष्टा पूर्वं तेन महात्मना । तालवृन्तमुपादाय पर्यवीजयदाकुला॥ 21.25 ॥

sā ca strī yā tadā dṛṣṭā pūrvaṁ tena mahātmanā tālavṛntamupādāya paryavījayadākulā

और पहले जिस स्त्री को उस महात्मा ने देखा था, वह भी व्याकुल होकर पंखा लेकर उसे झलने लगी।

श्लोक 26 (markandeya.21.26)

समाश्वास्य तदा पृष्टा तेन संमोहकारणम् । किञ्चिल्लज्जान्विता बाला तस्याः सख्युर्न्यवेदयत्॥ 21.26 ॥

samāśvāsya tadā pṛṣṭā tena saṁmohakāraṇam kiñcillajjānvitā bālā tasyāḥ sakhyurnyavedayat

सचेत होने पर जब उससे मूर्च्छा का कारण पूछा गया, तो कुछ लज्जायुक्त वह बाला अपनी सखी को बताने लगी।

श्लोक 27 (markandeya.21.27)

सा चास्मै कथयामास नृपपुत्राय विस्तरात् । मोहस्य कारणं सर्वं तद्दर्शनसमुद्भवम् । यथा तया समाख्यातं तद्वृत्तान्तञ्च भामिनी॥ 21.27 ॥

sā cāsmai kathayāmāsa nṛpaputrāya vistarāt mohasya kāraṇaṁ sarvaṁ taddarśanasamudbhavam yathā tayā samākhyātaṁ tadvṛttāntañca bhāminī

और उस स्त्री ने राजकुमार से विस्तारपूर्वक उसके दर्शन से उत्पन्न मूर्च्छा का सारा कारण तथा उस सुंदरी द्वारा बताया गया सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

श्लोक 28 (markandeya.21.28)

स्त्र्युवाच विश्वावसुरिति ख्यातो दिवि गन्धर्वराट् प्रभो । तस्येयमात्मजा सुभ्रूर्नाम्ना ख्याता मदालसा॥ 21.28 ॥

stryuvāca viśvāvasuriti khyāto divi gandharvarāṭ prabho tasyeyamātmajā subhrūrnāmnā khyātā madālasā

हे प्रभु, स्वर्ग में विश्वावसु नामक गन्धर्वराज विख्यात हैं; यह सुंदर भौंहों वाली मदालसा नाम से प्रसिद्ध उन्हीं की पुत्री है।

श्लोक 29 (markandeya.21.29)

वज्रकेतोः सुतश्चोग्रो दानवोऽरिविदारणः । पातालकेतुर्विख्यातः पातालान्तरसंश्रयः॥ 21.29 ॥

vajraketoḥ sutaścogro dānavo ’rividāraṇaḥ pātālaketurvikhyātaḥ pātālāntarasaṁśrayaḥ

वज्रकेतु का पुत्र, शत्रुओं को विदीर्ण करने वाला उग्र दानव, पातालकेतु के नाम से विख्यात है, जो पाताल के भीतर निवास करता है।

श्लोक 30 (markandeya.21.30)

तेनेयमुद्यानगता कृत्वा मायां तमोमयीम् । अपहृत्य मयां हीना बाला नीता दुरात्मना॥ 21.30 ॥

teneyamudyānagatā kṛtvā māyāṁ tamomayīm apahṛtya mayāṁ hīnā bālā nītā durātmanā

उसी दुरात्मा ने अंधकारमयी माया रचकर, उद्यान में गई हुई इस निराश्रित बाला का अपहरण कर यहाँ ले आया।

श्लोक 31 (markandeya.21.31)

आगामिन्यां त्रयोदश्यामुद्वक्ष्यति किलासुरः । स तु नार्हति चार्वङ्गीं शूद्रो वेदश्रुतीमिव॥ 21.31 ॥

āgāminyāṁ trayodaśyāmudvakṣyati kilāsuraḥ sa tu nārhati cārvaṅgīṁ śūdro vedaśrutīmiva

आगामी त्रयोदशी को वह असुर इससे विवाह करेगा, परन्तु जैसे शूद्र वेदवाणी का अधिकारी नहीं, वैसे ही वह इस सुंदरांगी की पात्रता नहीं रखता।

श्लोक 32 (markandeya.21.32)

अतीते च दिने बालामात्मव्यापदनोद्यताम् । सुरभिः प्राह नायं त्वं प्राप्स्यते दानवाधमः॥ 21.32 ॥

atīte ca dine bālāmātmavyāpadanodyatām surabhiḥ prāha nāyaṁ tvaṁ prāpsyate dānavādhamaḥ

एक दिन पहले जब यह बाला आत्मघात के लिए उद्यत हुई, तब सुरभि ने कहा — 'यह नीच दानव तुझे प्राप्त नहीं करेगा।'

श्लोक 33 (markandeya.21.33)

मर्त्यलोकमनुप्राप्तं य एनं छेत्स्यते शरैः । सते भर्ता महाभागे अचिरेण भविष्यति॥ 21.33 ॥

martyalokamanuprāptaṁ ya enaṁ chetsyate śaraiḥ sate bhartā mahābhāge acireṇa bhaviṣyati

'जो मनुष्यलोक से आकर बाणों द्वारा इसका वध करेगा, हे महाभागे, वही शीघ्र ही तेरा पति होगा।'

श्लोक 34 (markandeya.21.34)

अहं चास्याः सखी नाम्नरा कुण्डलेति मनस्विनी । सुता विन्ध्यवतः पत्नी वीरपुष्करमालिनः॥ 21.34 ॥

ahaṁ cāsyāḥ sakhī nāmnarā kuṇḍaleti manasvinī sutā vindhyavataḥ patnī vīrapuṣkaramālinaḥ

'और मैं इसकी सखी हूँ, विचारशीला कुण्डला नाम से जानी जाती हूँ; मैं विन्ध्यवत् की पुत्री तथा वीर पुष्करमालिन् की पत्नी हूँ।'

श्लोक 35 (markandeya.21.35)

हते भर्तरि शुम्भेन तीर्थात् तीर्थमनुव्रता । चरामि दिव्यया गत्या परलोकार्थमुद्यता॥ 21.35 ॥

hate bhartari śumbhena tīrthāt tīrthamanuvratā carāmi divyayā gatyā paralokārthamudyatā

'मेरे पति के शुम्भ द्वारा मारे जाने पर, मैं तीर्थ-तीर्थ भ्रमण करती हुई, दिव्य गति से परलोक के लिए यत्नशील होकर विचरण करती हूँ।'

श्लोक 36 (markandeya.21.36)

पातालकेतुर्दुष्टात्मा वाराहं वपुरास्थितः । केनापि विद्धो बाणेन मुनीनां त्राणकारणात्॥ 21.36 ॥

pātālaketurduṣṭātmā vārāhaṁ vapurāsthitaḥ kenāpi viddho bāṇena munīnāṁ trāṇakāraṇāt

'वह दुष्टात्मा पातालकेतु शूकर का रूप धारण करके, मुनियों की रक्षा के लिए किसी के बाण से बिंधा गया था।'

श्लोक 37 (markandeya.21.37)

तञ्चाहं तत्त्वतोऽन्विष्य त्वरिता समुपागता । सत्यमेव स केनापि ताडितो दानवाधमः॥ 21.37 ॥

tañcāhaṁ tattvato ’nviṣya tvaritā samupāgatā satyameva sa kenāpi tāḍito dānavādhamaḥ

'उसी की सच्चाई खोजते हुए मैं शीघ्रता से यहाँ आई; सचमुच ही वह नीच दानव किसी के द्वारा आहत किया गया है।'

श्लोक 38 (markandeya.21.38)

इयञ्च मूर्च्छामगमत् कारणं यत् शृणुष्व तत् । त्वयि प्रीतिमती बाला दर्शनादेव मानद॥ 21.38 ॥

iyañca mūrcchāmagamat kāraṇaṁ yat śṛṇuṣva tat tvayi prītimatī bālā darśanādeva mānada

'हे मानद! सुनो, यह जो मूर्च्छित हुई उसका कारण यह है कि यह बाला तुम्हें देखते ही तुममें अनुरक्त हो गई।'

श्लोक 39 (markandeya.21.39)

देवपुत्रोपमे चारु-वाक्यादिगुणशालिनि । भर्या चान्यस्य विहिता येन विद्धः स दानवः॥ 21.39 ॥

devaputropame cāru-vākyādiguṇaśālini bharyā cānyasya vihitā yena viddhaḥ sa dānavaḥ

'हे देवकुमार-सदृश, सुंदर वाणी आदि गुणों से सम्पन्न! विधाता ने पहले ही यह निश्चित कर दिया था कि जिसने उस दानव को बींधा, वही इसका पति होगा — किसी और का नहीं।'

श्लोक 40 (markandeya.21.40)

एतस्मात् कारणान्मोहं महान्तमियमागता । यावज्जीवं च तन्वङ्गी दुः खमेवोपभोक्ष्यते॥ 21.40 ॥

etasmāt kāraṇānmohaṁ mahāntamiyamāgatā yāvajjīvaṁ ca tanvaṅgī duḥ khamevopabhokṣyate

'इसी कारण से यह इतने बड़े मोह को प्राप्त हुई है; और यह कृशांगी जीवनभर केवल दुःख ही भोगेगी।'

श्लोक 41 (markandeya.21.41)

त्वय्यस्या हृदयं रागि भर्ता चान्यो भविष्यति । यावज्जीवमतो दुः खं सुरभ्या नान्यथा वचः॥ 21.41 ॥

tvayyasyā hṛdayaṁ rāgi bhartā cānyo bhaviṣyati yāvajjīvamato duḥ khaṁ surabhyā nānyathā vacaḥ

'क्योंकि इसका हृदय तुझमें अनुरक्त है, परन्तु पति कोई और होगा, इसलिए जीवनभर दुःख होगा; सुरभि का वचन अन्यथा नहीं हो सकता।'

श्लोक 42 (markandeya.21.42)

अहं त्वस्याः प्रभी प्रीत्या दुः खितात्र समागता । यतो विशेषो नैवास्ति स्वसखी-निजदेहयोः॥ 21.42 ॥

ahaṁ tvasyāḥ prabhī prītyā duḥ khitātra samāgatā yato viśeṣo naivāsti svasakhī-nijadehayoḥ

'मैं भी उसके स्नेह के कारण यहाँ दुःखी होकर आई हूँ, क्योंकि अपनी सखी और अपने शरीर में कोई अन्तर नहीं होता।'

श्लोक 43 (markandeya.21.43)

यद्येषाभिमतं वीरं पतिमाप्नोति शोभना । ततस्तपस्त्वहं कुर्यां निर्व्यलीकेन चेतसा॥ 21.43 ॥

yadyeṣābhimataṁ vīraṁ patimāpnoti śobhanā tatastapastvahaṁ kuryāṁ nirvyalīkena cetasā

'यदि यह सुंदरी अपने अभीष्ट वीर को पति रूप में प्राप्त करे, तो मैं निष्कपट हृदय से तप करूँगी।'

श्लोक 44 (markandeya.21.44)

त्वन्तु को वा किमर्थं वा सम्प्राप्तोऽत्र महामते । देवो दैत्यो नु गन्धर्वः पन्नगः किन्नरोऽपि वा॥ 21.44 ॥

tvantu ko vā kimarthaṁ vā samprāpto ’tra mahāmate devo daityo nu gandharvaḥ pannagaḥ kinnaro ’pi vā

हे महामते! तुम कौन हो और किस प्रयोजन से यहाँ आए हो — देव, दैत्य, गन्धर्व, नाग या किन्नर?

श्लोक 45 (markandeya.21.45)

न ह्यत्र मानुषगतिर्न चेदृङ्मानुषं वपुः । तत्त्वमाख्याहि कथितं यथैवावितथं मया॥ 21.45 ॥

na hyatra mānuṣagatirna cedṛṅmānuṣaṁ vapuḥ tattvamākhyāhi kathitaṁ yathaivāvitathaṁ mayā

यहाँ तो मनुष्य की पहुँच नहीं है और न ऐसा शरीर मनुष्य का होता है; अतः जैसे मैंने सत्य कहा है, वैसे ही तुम भी सत्य बताओ।

श्लोक 46 (markandeya.21.46)

कुवलयाश्व उवाच यन्मां पृच्छसि धर्मज्ञे कस्त्वं किं वा समागतः । तच्छृणुष्वामलप्रज्ञे कथयाम्यादितस्तव॥ 21.46 ॥

kuvalayāśva uvāca yanmāṁ pṛcchasi dharmajñe kastvaṁ kiṁ vā samāgataḥ tacchṛṇuṣvāmalaprajñe kathayāmyāditastava

हे धर्मज्ञे! तुम मुझसे जो पूछ रही हो कि मैं कौन हूँ और किसलिए आया हूँ, हे निर्मल बुद्धि वाली, वह सुनो, मैं तुम्हें आदि से बताता हूँ।

श्लोक 47 (markandeya.21.47)

राज्ञः शत्रुजितः पुत्रः पित्रा सम्प्रेषितः शुभे । मुनिरक्षणमुद्दिश्य गालवाश्रममागतः॥ 21.47 ॥

rājñaḥ śatrujitaḥ putraḥ pitrā sampreṣitaḥ śubhe munirakṣaṇamuddiśya gālavāśramamāgataḥ

हे शुभे! मैं राजा शत्रुजित् का पुत्र हूँ, जिसे पिता ने मुनियों की रक्षा के उद्देश्य से गालव के आश्रम में भेजा था।

श्लोक 48 (markandeya.21.48)

कुर्वतो मम रक्षाञ्च मुनीनां धर्मचारिणाम् । विघ्नार्थमागतः कोषऽपि शौकरं रूपमास्थितः॥ 21.48 ॥

kurvato mama rakṣāñca munīnāṁ dharmacāriṇām vighnārthamāgataḥ koṣa ’pi śaukaraṁ rūpamāsthitaḥ

मैं धर्मपरायण मुनियों की रक्षा कर ही रहा था कि कोई विघ्न डालने के लिए शूकर का रूप धारण कर आया।

श्लोक 49 (markandeya.21.49)

मया स विद्धो बाणेन चन्द्रार्धाकारवर्च्चसा । अपक्रान्तोऽतिवेगेन तमस्म्यनुगतो हयी॥ 21.49 ॥

mayā sa viddho bāṇena candrārdhākāravarccasā apakrānto ’tivegena tamasmyanugato hayī

मैंने उसे अर्धचन्द्राकार तेजयुक्त बाण से बींध दिया; वह अत्यंत वेग से भाग गया और मैं घोड़े पर सवार होकर उसके पीछे गया।

श्लोक 50 (markandeya.21.50)

पपात सहसा गर्ते सक्रीडोऽश्वश्च मामकः । सोऽहमश्वं समारूढस्तमस्येकः परिभ्रमन्॥ 21.50 ॥

papāta sahasā garte sakrīḍo ’śvaśca māmakaḥ so ’hamaśvaṁ samārūḍhastamasyekaḥ paribhraman

मेरा घोड़ा सहसा उस गड्ढे में जा गिरा; उसी पर सवार मैं भी अकेला उस अन्धकार में भटकता रहा।

श्लोक 51 (markandeya.21.51)

प्रकाशमासादितवान् दृष्टा च भवती मया । पृष्टया च न मे किञ्चिद्भवत्या दत्तमुत्तरम्॥ 21.51 ॥

prakāśamāsāditavān dṛṣṭā ca bhavatī mayā pṛṣṭayā ca na me kiñcidbhavatyā dattamuttaram

फिर मुझे प्रकाश प्राप्त हुआ और मैंने तुम्हें देखा; पूछने पर भी तुमने मुझे कोई उत्तर नहीं दिया।

श्लोक 52 (markandeya.21.52)

त्वाञ्चैवानुप्रविष्टोऽहमिमं प्रासादमुत्तमम् । इत्येतत् कथितं सत्यं न देवोऽहं न दानवः॥ 21.52 ॥

tvāñcaivānupraviṣṭo ’hamimaṁ prāsādamuttamam ityetat kathitaṁ satyaṁ na devo ’haṁ na dānavaḥ

मैं तुम्हारे ही पीछे इस उत्तम प्रासाद में प्रविष्ट हुआ। यह जो मैंने कहा, वह सत्य है — मैं न देव हूँ, न दानव।

श्लोक 53 (markandeya.21.53)

न पन्नगो न गन्धर्वः किन्नरो वा शुचिस्मिते । समस्ता पूज्यपक्षो वै देवाद्या मम कुण्डले । मनुष्योऽस्मि विशङ्का ते न कर्तव्यात्र कर्हिचित्॥ 21.53 ॥

na pannago na gandharvaḥ kinnaro vā śucismite samastā pūjyapakṣo vai devādyā mama kuṇḍale manuṣyo ’smi viśaṅkā te na kartavyātra karhicit

हे शुचिस्मिते! मैं न नाग हूँ, न गन्धर्व, न किन्नर। हे कुण्डले! मेरे लिए तो देवादि सभी पूज्यपक्ष के हैं। मैं तो मनुष्य हूँ; तुम्हें इस विषय में कभी कोई शंका नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 54 (markandeya.21.54)

पुत्रावूचतुः ततः प्रहृष्टा सा कन्या सखीवदनमुत्तमम् । लज्जाजडं वीक्षमाणा किञ्चिन्नोवाच भामिनी॥ 21.54 ॥

putrāvūcatuḥ tataḥ prahṛṣṭā sā kanyā sakhīvadanamuttamam lajjājaḍaṁ vīkṣamāṇā kiñcinnovāca bhāminī

तब वह प्रसन्न हुई कन्या, लज्जा से जड़ हुई अपनी सखी के सुंदर मुख को देखती हुई, कुछ भी न बोली।

श्लोक 55 (markandeya.21.55)

सा सखी पुनरप्येनां प्रहृष्टा प्रत्युवाच ह । यथावत् कथितं तेन सुरभ्या वचनानुगे॥ 21.55 ॥

sā sakhī punarapyenāṁ prahṛṣṭā pratyuvāca ha yathāvat kathitaṁ tena surabhyā vacanānuge

वह सखी भी हर्षित होकर उससे पुनः बोली, क्योंकि सुरभि के वचन के अनुरूप ही उसने यह सब कह दिया था।

श्लोक 56 (markandeya.21.56)

कुण्डलोवाच वीर सत्यमसन्दिग्धं भवताभिहितं वचः । नान्यत्र हृदयन्त्वस्या दृष्ट्वा स्थैर्यं प्रयास्यति॥ 21.56 ॥

kuṇḍalovāca vīra satyamasandigdhaṁ bhavatābhihitaṁ vacaḥ nānyatra hṛdayantvasyā dṛṣṭvā sthairyaṁ prayāsyati

हे वीर! तुमने जो कहा वह निश्चय ही सत्य है। तुम्हें देखकर इसका हृदय अब कहीं और स्थिर नहीं होगा।

श्लोक 57 (markandeya.21.57)

चन्द्रमेवाधिका कान्तिः समुपैति रविं प्रभा । भूतिर्धन्यं धृतिर्धोरं क्षान्तिरभ्येति चोत्तमम्॥ 21.57 ॥

candramevādhikā kāntiḥ samupaiti raviṁ prabhā bhūtirdhanyaṁ dhṛtirdhoraṁ kṣāntirabhyeti cottamam

जैसे कान्ति चन्द्रमा की ओर और प्रभा सूर्य की ओर बढ़ती है, वैसे ही सम्पत्ति धन्य पुरुष की ओर, धैर्य वीर की ओर और क्षमा श्रेष्ठ पुरुष की ओर ही जाती है।

श्लोक 58 (markandeya.21.58)

त्वयैव विद्धोऽसन्दिग्धं स पापो दानवाधमः । सुरभिः सा गवां माता कथं मिथ्या वदिष्यति॥ 21.58 ॥

tvayaiva viddho ’sandigdhaṁ sa pāpo dānavādhamaḥ surabhiḥ sā gavāṁ mātā kathaṁ mithyā vadiṣyati

निःसन्देह उस पापी नीच दानव को तुमने ही बींधा है; क्योंकि गौओं की माता सुरभि भला झूठ कैसे बोल सकती है?

श्लोक 59 (markandeya.21.59)

तद्धन्येयं सभाग्या च त्वत्सम्बन्धं समेत्य वै । कुरुष्व वीर यत् कार्यं विधिनैव समाहितम्॥ 21.59 ॥

taddhanyeyaṁ sabhāgyā ca tvatsambandhaṁ sametya vai kuruṣva vīra yat kāryaṁ vidhinaiva samāhitam

अतः तुमसे सम्बन्ध पाकर यह सुंदरी धन्य और भाग्यशालिनी हो गई है। हे वीर! जो कार्य विधाता द्वारा पहले ही निश्चित है, उसे अब पूरा करो।

श्लोक 60 (markandeya.21.60)

पुत्रावूचतुः परवानहमित्याह राजपुत्रः सतां पितुः । सा च तं चिन्तयामास तुम्बुरुं तत्कुले गुरुम्॥ 21.60 ॥

putrāvūcatuḥ paravānahamityāha rājaputraḥ satāṁ pituḥ sā ca taṁ cintayāmāsa tumburuṁ tatkule gurum

राजकुमार ने कहा — 'मैं अपने पिता के अधीन हूँ।' तब वह कन्या अपने कुल के गुरु तुम्बुरु का स्मरण करने लगी।

श्लोक 61 (markandeya.21.61)

स चापि तत्क्षणात् प्राप्तः प्रगृहीतसमित्कुशः । मदालसायाः सम्प्रीत्या कुण्डलागौरवेण च॥ 21.61 ॥

sa cāpi tatkṣaṇāt prāptaḥ pragṛhītasamitkuśaḥ madālasāyāḥ samprītyā kuṇḍalāgauraveṇa ca

वे भी उसी क्षण समिधा और कुश हाथ में लिए हुए, मदालसा के प्रेम तथा कुण्डला के आदर से प्रेरित होकर वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 62 (markandeya.21.62)

प्रज्वाल्य पावकं हुत्वा मन्त्रवित् कृतमङ्गलाम् । वैवाहिकविधिं कन्यां प्रतिपाद्य यथागतम्॥ 21.62 ॥

prajvālya pāvakaṁ hutvā mantravit kṛtamaṅgalām vaivāhikavidhiṁ kanyāṁ pratipādya yathāgatam

अग्नि प्रज्वलित कर, मन्त्रों को जानने वाले उस गुरु ने हवन कर, मंगल-सम्पन्न कन्या का विवाह-विधि द्वारा कन्यादान किया, फिर जैसे आए थे वैसे ही चले गए।

श्लोक 63 (markandeya.21.63)

जगाम तपसे धीमान् स्वाश्रमपदं तदा । सा चाह तां सखीं बालां कृतार्थास्मि वरानने॥ 21.63 ॥

jagāma tapase dhīmān svāśramapadaṁ tadā sā cāha tāṁ sakhīṁ bālāṁ kṛtārthāsmi varānane

वह बुद्धिमान गुरु तप के लिए अपने आश्रम को चले गए। तब मदालसा ने अपनी उस सखी बाला से कहा — 'हे सुंदर मुख वाली, अब मैं कृतार्थ हुई।'

श्लोक 64 (markandeya.21.64)

संयुक्ताममुना दृष्ट्वा त्वामहं रूपशालिनीम् । तमस्तप्स्येऽहमतुलं निर्व्यलीकेन चेतसा॥ 21.64 ॥

saṁyuktāmamunā dṛṣṭvā tvāmahaṁ rūpaśālinīm tamastapsye ’hamatulaṁ nirvyalīkena cetasā

'हे रूपवती! तुम्हें इसके साथ संयुक्त देखकर अब मैं निष्कपट हृदय से अनुपम तप करूँगी।'

श्लोक 65 (markandeya.21.65)

तीर्थाम्बुधूतपापा च भवित्री नेदृशी यथा । तञ्चाह राजपुत्रं सा प्रश्रयावनता तदा । गन्तुकामा निजसखी-स्नेहविक्लवभाषिणी॥ 21.65 ॥

tīrthāmbudhūtapāpā ca bhavitrī nedṛśī yathā tañcāha rājaputraṁ sā praśrayāvanatā tadā gantukāmā nijasakhī-snehaviklavabhāṣiṇī

'तीर्थों के जल से अपने पापों को धोकर मैं ऐसी नहीं रह जाऊँगी जैसी अभी हूँ।' फिर जाने की इच्छा से विनम्र हुई वह अपनी सखी के स्नेह से गद्गद वाणी में उस राजकुमार से बोली।

श्लोक 66 (markandeya.21.66)

कुण्डलोवाच पुंभिरप्यमितप्रज्ञ नोपदेशो भवद्विधे । दातव्यः किमुत स्त्रीभिरतो नोपदिशामि ते॥ 21.66 ॥

kuṇḍalovāca puṁbhirapyamitaprajña nopadeśo bhavadvidhe dātavyaḥ kimuta strībhirato nopadiśāmi te

हे अपरिमित बुद्धि वाले! तुम्हारे जैसे व्यक्ति को पुरुषों द्वारा भी उपदेश नहीं दिया जाना चाहिए, स्त्रियों की तो बात ही क्या — इसलिए मैं तुम्हें उपदेश नहीं देती।

श्लोक 67 (markandeya.21.67)

किन्त्वस्यास्तनुमध्यायाः स्नेहाकृष्टेन चेतसा । त्वया विश्रम्भिता चास्मि स्मारयाम्यरिसूदन॥ 21.67 ॥

kintvasyāstanumadhyāyāḥ snehākṛṣṭena cetasā tvayā viśrambhitā cāsmi smārayāmyarisūdana

परन्तु इस कृशांगी के स्नेह से खिंचे हृदय से, हे शत्रुदमन! तुमने मुझ पर विश्वास किया है, इसलिए मैं तुम्हें केवल स्मरण कराती हूँ।

श्लोक 68 (markandeya.21.68)

भर्तव्या रक्षितव्या च भार्या हि पतिना सदा । धर्मार्थकामसंसिद्ध्यै भार्या भर्तृसहायिनी॥ 21.68 ॥

bhartavyā rakṣitavyā ca bhāryā hi patinā sadā dharmārthakāmasaṁsiddhyai bhāryā bhartṛsahāyinī

पति को सदा अपनी पत्नी का भरण-पोषण और रक्षा करनी चाहिए; पत्नी धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि में पति की सहायिका होती है।

श्लोक 69 (markandeya.21.69)

यदा भार्या च भर्ता च परस्परवशानुगौ । तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि सङ्गतम्॥ 21.69 ॥

yadā bhāryā ca bhartā ca parasparavaśānugau tadā dharmārthakāmānāṁ trayāṇāmapi saṅgatam

जब पत्नी और पति दोनों परस्पर एक-दूसरे के अनुकूल रहते हैं, तभी धर्म, अर्थ और काम — तीनों की सिद्धि सम्भव होती है।

श्लोक 70 (markandeya.21.70)

कथं भार्यामृते धर्ममर्थं वा पुरुषः प्रभो । प्राप्नोति काममथवा तस्यां त्रितयमाहितम्॥ 21.70 ॥

kathaṁ bhāryāmṛte dharmamarthaṁ vā puruṣaḥ prabho prāpnoti kāmamathavā tasyāṁ tritayamāhitam

हे प्रभो! पत्नी के बिना पुरुष धर्म, अर्थ अथवा काम को कैसे प्राप्त कर सकता है? यह त्रिवर्ग उसी में स्थापित है।

श्लोक 71 (markandeya.21.71)

तथैव भर्तारमृते भार्या धर्मादिसाधने । न समर्था त्रिवर्गोऽयं दाम्पत्यं समुपाश्रितः॥ 21.71 ॥

tathaiva bhartāramṛte bhāryā dharmādisādhane na samarthā trivargo ’yaṁ dāmpatyaṁ samupāśritaḥ

इसी प्रकार पति के बिना पत्नी भी धर्म आदि की साधना में समर्थ नहीं होती; यह त्रिवर्ग दाम्पत्य पर ही आश्रित है।

श्लोक 72 (markandeya.21.72)

देवाता-पितृ-भृत्यानामतिथीनाञ्च पूजनम् । न पुंभिः शक्यते कर्तुमृते भार्यां नृपात्मज॥ 21.72 ॥

devātā-pitṛ-bhṛtyānāmatithīnāñca pūjanam na puṁbhiḥ śakyate kartumṛte bhāryāṁ nṛpātmaja

हे राजकुमार! देवता, पितर, सेवक और अतिथियों का पूजन पत्नी के बिना पुरुषों द्वारा सम्पन्न नहीं किया जा सकता।

श्लोक 73 (markandeya.21.73)

प्राप्तोऽपि चार्थो मनुजैरानीतोऽपी निजं गृहम् । क्षयमेति विना भार्यां कुभार्यासंश्रयेऽपि वा॥ 21.73 ॥

prāpto ’pi cārtho manujairānīto ’pī nijaṁ gṛham kṣayameti vinā bhāryāṁ kubhāryāsaṁśraye ’pi vā

मनुष्यों द्वारा प्राप्त और अपने घर लाया गया धन भी पत्नी के बिना अथवा दुष्ट पत्नी के होने पर नष्ट हो जाता है।

श्लोक 74 (markandeya.21.74)

कामस्तु तस्य नैवास्ति प्रत्यक्षेणोपलक्ष्यते । दम्पत्योः सहधर्मेण त्रयीधर्ममवाप्नुयात्॥ 21.74 ॥

kāmastu tasya naivāsti pratyakṣeṇopalakṣyate dampatyoḥ sahadharmeṇa trayīdharmamavāpnuyāt

उसके काम की तो सिद्धि होती ही नहीं, यह प्रत्यक्ष दिखाई देता है। पति-पत्नी सहधर्म से ही त्रयी-धर्म को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 75 (markandeya.21.75)

पितॄन् पुत्रैस्तथैवान्न-साधनैरतिथीन् नरः । पूजाभिरमरांस्तद्वत् साध्वीं भार्यां नरोऽवति॥ 21.75 ॥

pitṝn putraistathaivānna-sādhanairatithīn naraḥ pūjābhiramarāṁstadvat sādhvīṁ bhāryāṁ naro ’vati

पुरुष पुत्रों द्वारा पितरों को, अन्न आदि साधनों द्वारा अतिथियों को, और पूजा द्वारा देवताओं को तृप्त करता है — यह सब एक सती पत्नी ही सम्भव बनाती है।

श्लोक 76 (markandeya.21.76)

स्त्रियाश्चापि विना भर्त्रा धर्मकामार्थसन्ततिः । नैव तस्मात् त्रिवर्गोऽयं दाम्पत्यमधिगच्छति॥ 21.76 ॥

striyāścāpi vinā bhartrā dharmakāmārthasantatiḥ naiva tasmāt trivargo ’yaṁ dāmpatyamadhigacchati

उसी प्रकार स्त्री के लिए भी पति के बिना धर्म, काम, अर्थ और सन्तान की प्राप्ति नहीं होती; अतः यह त्रिवर्ग केवल दाम्पत्य से ही सिद्ध होता है।

श्लोक 77 (markandeya.21.77)

एतन्मयोक्तं युवयोर्गच्छामि च यथेप्सितम् । वर्ध त्वमनया सार्धं धन-पुत्र-सुखायुषा॥ 21.77 ॥

etanmayoktaṁ yuvayorgacchāmi ca yathepsitam vardha tvamanayā sārdhaṁ dhana-putra-sukhāyuṣā

यह मैंने तुम दोनों से कह दिया; अब मैं अपनी इच्छानुसार जाती हूँ। तुम इसके साथ धन, पुत्र, सुख और दीर्घायु से समृद्ध होओ।

श्लोक 78 (markandeya.21.78)

पुत्रावूचतुः इत्युक्त्वा सा परिष्वज्य स्वसखीं तं नमस्य च । जगाम दिव्यया गत्या यथाभिप्रेतमात्मनः॥ 21.78 ॥

putrāvūcatuḥ ityuktvā sā pariṣvajya svasakhīṁ taṁ namasya ca jagāma divyayā gatyā yathābhipretamātmanaḥ

यह कहकर उसने अपनी सखी का आलिंगन किया और राजकुमार को प्रणाम कर, अपनी दिव्य गति से अपनी इच्छा के अनुसार चली गई।

श्लोक 79 (markandeya.21.79)

सोऽपि शत्रुजितः पुत्रस्तामारोप्य तुरङ्गमम् । निर्गन्तुकामः पातालाद्विज्ञातो दनुसम्भवैः॥ 21.79 ॥

so ’pi śatrujitaḥ putrastāmāropya turaṅgamam nirgantukāmaḥ pātālādvijñāto danusambhavaiḥ

शत्रुजित् का वह पुत्र भी उसे घोड़े पर बिठाकर पाताल से बाहर निकलना चाहता ही था कि दनु-वंशियों ने उसे पहचान लिया।

श्लोक 80 (markandeya.21.80)

ततस्तैः सहसोत्क्रुष्टं ह्रियते ह्रियतेऽति वै । कन्यारत्नं यदानीतं दिवः पातालकेतुना॥ 21.80 ॥

tatastaiḥ sahasotkruṣṭaṁ hriyate hriyate ’ti vai kanyāratnaṁ yadānītaṁ divaḥ pātālaketunā

तब वे सहसा चिल्ला उठे — 'हरण की जा रही है, हरण की जा रही है यह रत्न-कन्या, जिसे पातालकेतु स्वर्ग से लाया था!'

श्लोक 81 (markandeya.21.81)

ततः परिघ-निस्त्रिंश-गदा-शूल-शरायुधम् । दानवानां बलं प्राप्तं सह पातालकेतुना॥ 21.81 ॥

tataḥ parigha-nistriṁśa-gadā-śūla-śarāyudham dānavānāṁ balaṁ prāptaṁ saha pātālaketunā

तब परिघ, तलवार, गदा, शूल और बाण आदि आयुधों से सुसज्जित दानवों की सेना पातालकेतु के साथ वहाँ आ पहुँची।

श्लोक 82 (markandeya.21.82)

तिष्ठ तिष्ठेति जल्पन्तस्ते तदा दानवोत्तमाः । शरवर्षैस्तथा शूलैर्ववर्षुर्नृपनन्दनम्॥ 21.82 ॥

tiṣṭha tiṣṭheti jalpantaste tadā dānavottamāḥ śaravarṣaistathā śūlairvavarṣurnṛpanandanam

'ठहरो, ठहरो' कहते हुए उन श्रेष्ठ दानवों ने राजकुमार पर बाणों और शूलों की वर्षा कर दी।

श्लोक 83 (markandeya.21.83)

स च शत्रुजितः पुत्रस्तदस्त्राण्यतिवीर्यवान् । चिच्छेद शरजालेन प्रहसन्निव लीलया॥ 21.83 ॥

sa ca śatrujitaḥ putrastadastrāṇyativīryavān ciccheda śarajālena prahasanniva līlayā

शत्रुजित् के उस अत्यंत पराक्रमी पुत्र ने मानो हँसते हुए, खेल-खेल में ही, अपने बाणजाल से उनके सभी अस्त्रों को काट डाला।

श्लोक 84 (markandeya.21.84)

क्षणेन पातालतलमसिखक्त्यृष्टिशायकैः । छिन्नैः सञ्छन्नमभवदृतध्वजशरोत्करैः॥ 21.84 ॥

kṣaṇena pātālatalamasikhaktyṛṣṭiśāyakaiḥ chinnaiḥ sañchannamabhavadṛtadhvajaśarotkaraiḥ

एक ही क्षण में पातालतल कटी हुई तलवारों, भालों, बरछों और बाणों तथा ऋतध्वज के बाणसमूहों से आच्छादित हो गया।

श्लोक 85 (markandeya.21.85)

ततोऽस्त्रं त्वाष्ट्रमादाय चिक्षेप प्रति दानवान् । तेन ते दानवाः सर्वे सह पातालकेतुना॥ 21.85 ॥

tato ’straṁ tvāṣṭramādāya cikṣepa prati dānavān tena te dānavāḥ sarve saha pātālaketunā

तब उसने त्वष्टा के अस्त्र को धारण कर दानवों पर छोड़ा; उससे पातालकेतु सहित वे सभी दानव —

श्लोक 86 (markandeya.21.86)

ज्वालामालातितीव्रेण स्फुटदस्थिचयाः कृताः । निर्दग्धाः कापिलं तेजः समासाद्येव सागराः॥ 21.86 ॥

jvālāmālātitīvreṇa sphuṭadasthicayāḥ kṛtāḥ nirdagdhāḥ kāpilaṁ tejaḥ samāsādyeva sāgarāḥ

— उसकी अत्यंत तीव्र ज्वालामाला से उनकी हड्डियाँ चटकने लगीं, और जैसे समुद्र कपिल के तेज को पाकर भस्म हो जाते हैं, वैसे ही वे सब भस्म हो गए।

श्लोक 87 (markandeya.21.87)

ततः स राजपुत्रोऽश्वी निहत्यासुरसत्तमान् । स्त्रीरत्नेन समं तेन समागच्छत् पितुः पुरम्॥ 21.87 ॥

tataḥ sa rājaputro ’śvī nihatyāsurasattamān strīratnena samaṁ tena samāgacchat pituḥ puram

तब वह राजकुमार उन श्रेष्ठ असुरों को मारकर, अपने घोड़े सहित उस स्त्री-रत्न के साथ अपने पिता के नगर में आ पहुँचा।

श्लोक 88 (markandeya.21.88)

प्रणिपत्य च तत् सर्वं स तु पित्रे न्यवेदयत् । पातालगमनञ्चैव कुण्डलायाश्च दर्शनम्॥ 21.88 ॥

praṇipatya ca tat sarvaṁ sa tu pitre nyavedayat pātālagamanañcaiva kuṇḍalāyāśca darśanam

प्रणाम कर उसने अपने पिता को वह सारा वृत्तान्त सुनाया — पाताल-गमन तथा कुण्डला के दर्शन का भी।

श्लोक 89 (markandeya.21.89)

तद्वन्मदालसाप्राप्तिं दानवैश्चापि सङ्गरम् । वधञ्च तेषामस्त्रेण पुनरागमनं तथा॥ 21.89 ॥

tadvanmadālasāprāptiṁ dānavaiścāpi saṅgaram vadhañca teṣāmastreṇa punarāgamanaṁ tathā

— इसी प्रकार मदालसा की प्राप्ति, दानवों के साथ युद्ध, अस्त्र द्वारा उनका वध, और फिर अपना वापस लौटना — सब कुछ।

श्लोक 90 (markandeya.21.90)

इति श्रुत्वा पिता तस्य चरितं चारुचेतसः । प्रीतिमानभवच्चेदं परिष्वज्याह चात्मजम्॥ 21.90 ॥

iti śrutvā pitā tasya caritaṁ cārucetasaḥ prītimānabhavaccedaṁ pariṣvajyāha cātmajam

अपने उस सुंदर हृदय वाले पुत्र का यह चरित्र सुनकर पिता अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे आलिंगन कर उससे यह कहा —

श्लोक 91 (markandeya.21.91)

सत्पात्रेण त्वया पुत्र तारितोऽहं महात्मना । भयेभ्यो मुनयस्त्राता येन सद्धर्मचारिणः॥ 21.91 ॥

satpātreṇa tvayā putra tārito ’haṁ mahātmanā bhayebhyo munayastrātā yena saddharmacāriṇaḥ

'हे पुत्र! तुम जैसे सत्पात्र महात्मा द्वारा मैं तर गया हूँ, जिसने सद्धर्मपरायण मुनियों को भयों से बचाया।'

श्लोक 92 (markandeya.21.92)

मत्पूर्वैः ख्यातिमानीतं मया विस्तारितं पुनः । पराक्रमवता वीर त्वया तद्वहुलीकृतम्॥ 21.92 ॥

matpūrvaiḥ khyātimānītaṁ mayā vistāritaṁ punaḥ parākramavatā vīra tvayā tadvahulīkṛtam

'मेरे पूर्वजों द्वारा प्राप्त की गई कीर्ति को मैंने और भी बढ़ाया; और हे वीर! पराक्रमी तुमने उसे और भी अधिक बढ़ा दिया है।'

श्लोक 93 (markandeya.21.93)

यदुपात्तं यशः पित्रा धनं वीर्यमथापि वा । तन्न हापयते यस्तु स नरो मध्यमः स्मृतः॥ 21.93 ॥

yadupāttaṁ yaśaḥ pitrā dhanaṁ vīryamathāpi vā tanna hāpayate yastu sa naro madhyamaḥ smṛtaḥ

'जो पुत्र अपने पिता द्वारा प्राप्त यश, धन अथवा पराक्रम को कम नहीं होने देता, वह मध्यम पुरुष कहलाता है।'

श्लोक 94 (markandeya.21.94)

तद्वीर्यादधिकं यस्तु पुनरन्यत् स्वशक्तितः । निष्पादयति तं प्राज्ञाः प्रवदन्ति नरोत्तमम्॥ 21.94 ॥

tadvīryādadhikaṁ yastu punaranyat svaśaktitaḥ niṣpādayati taṁ prājñāḥ pravadanti narottamam

'परन्तु जो अपने पराक्रम से पिता के पराक्रम से भी अधिक कुछ और प्राप्त करता है, उसे बुद्धिमान लोग श्रेष्ठ पुरुष कहते हैं।'

श्लोक 95 (markandeya.21.95)

यः पिता समुपात्तानि धनवीर्ययशांसि वै । न्यूनतां नयति प्राज्ञास्तमाहुः पुरुषाधमम्॥ 21.95 ॥

yaḥ pitā samupāttāni dhanavīryayaśāṁsi vai nyūnatāṁ nayati prājñāstamāhuḥ puruṣādhamam

'और जो पिता द्वारा प्राप्त धन, पराक्रम और यश को कम कर देता है, उसे बुद्धिमान लोग नीच पुरुष कहते हैं।'

श्लोक 96 (markandeya.21.96)

तन्मया ब्राह्मणत्राणं कृतमासीद्यथा त्वया । पातालगमनं यच्च यच्चासुरविनाशनम्॥ 21.96 ॥

tanmayā brāhmaṇatrāṇaṁ kṛtamāsīdyathā tvayā pātālagamanaṁ yacca yaccāsuravināśanam

'मैंने भी ब्राह्मणों की रक्षा की थी, परन्तु जो पाताल-गमन और असुरों का विनाश तुमने किया —'

श्लोक 97 (markandeya.21.97)

एतदप्यधिकं वत्स तेन त्वं पुरुषोत्तमः । तद्धन्योऽस्म्य बाल त्वमहमेव गुणाधिकम्॥ 21.97 ॥

etadapyadhikaṁ vatsa tena tvaṁ puruṣottamaḥ taddhanyo ’smya bāla tvamahameva guṇādhikam

'— यह उससे भी बढ़कर है, हे वत्स! इसलिए तुम पुरुषोत्तम हो। मैं धन्य हूँ कि तुम ही गुणों में मुझसे भी अधिक हो।'

श्लोक 98 (markandeya.21.98)

त्वां पुत्रमीदृशं प्राप्य श्लाघ्यः पुण्यवतामपि । न स पुत्रकृतां प्रीतिं मन्ये प्राप्नोति मानवः॥ 21.98 ॥

tvāṁ putramīdṛśaṁ prāpya ślāghyaḥ puṇyavatāmapi na sa putrakṛtāṁ prītiṁ manye prāpnoti mānavaḥ

'ऐसा पुत्र पाकर मैं पुण्यवानों में भी प्रशंसनीय हूँ; मुझे नहीं लगता कि कोई मनुष्य पुत्र द्वारा दी गई ऐसी प्रसन्नता पा सकता है।'

श्लोक 99 (markandeya.21.99)

पुत्रेण नातिशयितो यः प्रज्ञादानविक्रमैः । धिग्जन्म तस्य यः पित्रा लोके विज्ञायते नरः॥ 21.99 ॥

putreṇa nātiśayito yaḥ prajñādānavikramaiḥ dhigjanma tasya yaḥ pitrā loke vijñāyate naraḥ

'जो पुरुष अपने पुत्र द्वारा बुद्धि, दान और पराक्रम में न बढ़ाया जाए, और जिसे लोक में केवल पिता के ही कारण जाना जाता है, उसके जन्म को धिक्कार है।'

श्लोक 100 (markandeya.21.100)

यः पुत्रात् ख्यातिमभ्येति तस्य जन्म सुजन्मनः । आत्मना ज्ञायते धन्यो मध्यः पितृपितामहैः॥ 21.100 ॥

yaḥ putrāt khyātimabhyeti tasya janma sujanmanaḥ ātmanā jñāyate dhanyo madhyaḥ pitṛpitāmahaiḥ

'जो अपने पुत्र द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त करता है, उसका जन्म सफल है; जो स्वयं अपनी शक्ति से जाना जाता है, वह धन्य है; और जो पिता-पितामह के कारण जाना जाता है, वह मध्यम है।'

श्लोक 101 (markandeya.21.101)

मातृपक्षेण मात्रा च ख्यातिमेति नराधमः । तत् पुत्र धनवीर्यैस्त्वं विवर्धस्व सुखेन च॥ 21.101 ॥

mātṛpakṣeṇa mātrā ca khyātimeti narādhamaḥ tat putra dhanavīryaistvaṁ vivardhasva sukhena ca

'जो केवल माता या मातृ-पक्ष के कारण जाना जाता है, वह नराधम है। अतः, हे पुत्र, तुम धन, पराक्रम और सुख से समृद्ध होते रहो।'

श्लोक 102 (markandeya.21.102)

घन्धर्वतनया चेयं मा त्वया वै वियुज्यताम् । इति पित्रा बहुविधं प्रियमुक्तः पुनः पुनः॥ 21.102 ॥

ghandharvatanayā ceyaṁ mā tvayā vai viyujyatām iti pitrā bahuvidhaṁ priyamuktaḥ punaḥ punaḥ

'और यह गन्धर्व-कन्या तुमसे कभी वियुक्त न हो।' — इस प्रकार पिता ने बारंबार अनेक प्रकार से प्रिय वचन कहे।

श्लोक 103 (markandeya.21.103)

परिष्वज्य स्वमावासं सभार्यः स विसर्जितः । स तया भार्याया सार्धं रेमे तत्र पितुः पुरे॥ 21.103 ॥

pariṣvajya svamāvāsaṁ sabhāryaḥ sa visarjitaḥ sa tayā bhāryāyā sārdhaṁ reme tatra pituḥ pure

उसे आलिंगन कर, पत्नी सहित उसे अपने निवास में विदा किया गया। वह अपनी उस पत्नी के साथ पिता के नगर में रमण करने लगा।

श्लोक 104 (markandeya.21.104)

अन्येषु च तथोद्यान-वन-पर्वतसानुषु । श्वश्रू-श्वसुरयोः पादौ प्रणिपत्य च सा शुभा । प्रातः प्रातस्ततस्तेन सह रेमे सुमध्यमा॥ 21.104 ॥

anyeṣu ca tathodyāna-vana-parvatasānuṣu śvaśrū-śvasurayoḥ pādau praṇipatya ca sā śubhā prātaḥ prātastatastena saha reme sumadhyamā

और उद्यानों, वनों तथा पर्वत-शिखरों में भी वे विहार करते रहे। वह शुभा प्रतिदिन प्रातःकाल सास-श्वसुर के चरणों में प्रणाम कर, फिर उसके साथ आनन्दपूर्वक रहती थी।

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