सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 26
पुत्रानुशासन
श्लोक 1 (markandeya.26.1)
वर्धमानं सुतं सा तु राजपत्नी दिने दिने । तमुल्लापादिना बोधमनयन्निर्ममात्मकम्॥ २६.१ ॥
vardhamānaṃ sutaṃ sā tu rājapatnī dine dine tamullāpādinā bodhamanayannirmamātmakam
वह राजपत्नी (मदालसा) प्रतिदिन बढ़ते हुए अपने पुत्र को लोरियों आदि के द्वारा ऐसा बोध कराती थी कि आत्मा ममत्व-रहित है।
श्लोक 2 (markandeya.26.2)
यथायथं बलं लेभे यथा लेभे मतिं पितुः । तथा तथात्मबोधञ्च सोऽवापन्मातृभाषितैः॥ २६.२ ॥
yathāyathaṃ balaṃ lebhe yathā lebhe matiṃ pituḥ tathā tathātmabodhañca so 'vāpanmātṛbhāṣitaiḥ
जैसे-जैसे वह बालक बल में बढ़ता गया और पिता जैसी बुद्धि प्राप्त करता गया, वैसे-वैसे वह अपनी माता के वचनों से आत्मबोध भी प्राप्त करता गया।
श्लोक 3 (markandeya.26.3)
इत्थं तया स तनयो जन्मप्रभृति बोधितः । चकार न मतिं प्राज्ञो गार्हस्थ्यं प्रति निर्ममः॥ २६.३ ॥
itthaṃ tayā sa tanayo janmaprabhṛti bodhitaḥ cakāra na matiṃ prājño gārhasthyaṃ prati nirmamaḥ
इस प्रकार जन्म से ही उसके द्वारा बोधित वह बुद्धिमान पुत्र ममता-रहित होकर गृहस्थ जीवन की ओर मन नहीं लगाता था।
श्लोक 4 (markandeya.26.4)
द्वितीयोऽस्याः सुतो जज्ञे तस्य नामाकरोत्पिता । सुबाहुरयमित्युक्ते सा जाहस मदालसा॥ २६.४ ॥
dvitīyo 'syāḥ suto jajñe tasya nāmākarotpitā subāhurayamityukte sā jāhasa madālasā
उसका दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम पिता ने रखा। जब उसे 'सुबाहु' कहा गया, तब मदालसा हँस पड़ी।
श्लोक 5 (markandeya.26.5)
तमप्येवं यथापूर्वं बालमुल्लापनादिना । प्राह बाल्यात् स च प्राप तथा बोधं माहमतिः॥ २६.५ ॥
tamapyevaṃ yathāpūrvaṃ bālamullāpanādinā prāha bālyāt sa ca prāpa tathā bodhaṃ māhamatiḥ
उसे भी पहले पुत्र की भाँति उसने लोरियों आदि द्वारा बालपन से ही उपदेश दिया, और वह भी उसी प्रकार बाल्यावस्था से महान बोध को प्राप्त हुआ।
श्लोक 6 (markandeya.26.6)
तृतीयं तनयं जातं स राजा शत्रुमर्दनम् । यदाह तेन सा सुभ्रुर्जहासातिचिरं पुनः॥ २६.६ ॥
tṛtīyaṃ tanayaṃ jātaṃ sa rājā śatrumardanam yadāha tena sā subhrurjahāsāticiraṃ punaḥ
जब राजा ने तीसरे उत्पन्न पुत्र का नाम 'शत्रुमर्दन' रखा, तब वह सुन्दर भौंहों वाली मदालसा पुनः बहुत देर तक हँसती रही।
श्लोक 7 (markandeya.26.7)
तथैव सोऽपि तन्वङ्ग्या बालत्वादवबोधितः । क्रियाश्चकार निष्कामो न किञ्चिदुपकारकम्॥ २६.७ ॥
tathaiva so 'pi tanvaṅgyā bālatvādavabodhitaḥ kriyāścakāra niṣkāmo na kiñcidupakārakam
उसी प्रकार उस सुकुमारांगी (मदालसा) द्वारा बचपन से ही उपदेशित वह पुत्र भी निष्काम होकर कोई भी स्वार्थ-सिद्धि करने वाला कर्म नहीं करता था।
श्लोक 8 (markandeya.26.8)
चतुर्थस्य सुतस्याथ चिकीर्षुर्नाम भूमिपः । ददर्श तां शुभाचारामीषद्धासां मदालसाम् । तामाह राजा हसतीं किञ्चित् कौतूहलान्वितः॥ २६.८ ॥
caturthasya sutasyātha cikīrṣurnāma bhūmipaḥ dadarśa tāṃ śubhācārāmīṣaddhāsāṃ madālasām tāmāha rājā hasatīṃ kiñcit kautūhalānvitaḥ
फिर चौथे पुत्र का नामकरण करने की इच्छा से राजा ने सदाचारिणी मदालसा को कुछ हल्की मुस्कान के साथ देखा। कुछ कौतूहल से भरे राजा ने हँसती हुई उससे कहा।
श्लोक 9 (markandeya.26.9)
राजोवाच । क्रियमाणेऽसकृन्नाम्नि कथ्यतां हास्यकारणम् । विक्रान्तश्च सुबाहुश्च तथान्यः शत्रुमर्दनः॥ २६.९ ॥
rājovāca kriyamāṇe 'sakṛnnāmni kathyatāṃ hāsyakāraṇam vikrāntaśca subāhuśca tathānyaḥ śatrumardanaḥ
राजा ने कहा — बार-बार नामकरण के समय तुम्हारी हँसी का कारण बताओ। विक्रान्त, सुबाहु और तीसरा शत्रुमर्दन — इन नामों पर तुम क्यों हँसती हो?
श्लोक 10 (markandeya.26.10)
शोभनानीति नामानि मया मन्ये कृतानि वै । योग्यानि क्षत्रबन्धूनां शौर्याटोपयुतानि च॥ २६.१० ॥
śobhanānīti nāmāni mayā manye kṛtāni vai yogyāni kṣatrabandhūnāṃ śauryāṭopayutāni ca
मुझे लगता है कि मैंने ये शुभ नाम रखे हैं, जो क्षत्रिय-बन्धुओं के योग्य तथा शौर्य के गर्व से युक्त हैं।
श्लोक 11 (markandeya.26.11)
असन्त्येतानि चेद्भद्रे ! यदि ते मनसि स्थितम् । तदस्य क्रियतां नाम चतुर्थस्य सुतस्य मे॥ २६.११ ॥
asantyetāni cedbhadre ! yadi te manasi sthitam tadasya kriyatāṃ nāma caturthasya sutasya me
हे भद्रे! यदि ये नाम उचित नहीं हैं और यदि तुम्हारे मन में कुछ और है, तो मेरे इस चौथे पुत्र का नाम तुम ही रखो।
श्लोक 12 (markandeya.26.12)
मदालसोवाच । मयाज्ञा भवतः कार्या महाराज ! यथात्थ माम् । तथा नाम करिष्यामि चतुर्थस्य सुतस्य ते॥ २६.१२ ॥
madālasovāca mayājñā bhavataḥ kāryā mahārāja ! yathāttha mām tathā nāma kariṣyāmi caturthasya sutasya te
मदालसा ने कहा — हे महाराज! आपकी आज्ञा का मुझे पालन करना है। जैसा आप कहते हैं, वैसे ही मैं आपके चौथे पुत्र का नाम रखूँगी।
श्लोक 13 (markandeya.26.13)
अलर्क इति धर्मज्ञः ख्यातिं लोके प्रयास्यति । कनीयानेष ते पुत्रो मतिमांश्च भविष्यति॥ २६.१३ ॥
alarka iti dharmajñaḥ khyātiṃ loke prayāsyati kanīyāneṣa te putro matimāṃśca bhaviṣyati
'अलर्क' — यह तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र धर्मज्ञ होकर संसार में यश प्राप्त करेगा और बुद्धिमान भी होगा।
श्लोक 14 (markandeya.26.14)
तच्छ्रुत्वा नाम पुत्रस्य कृतं मात्रा महीपतिः । अलर्क इत्यसम्बद्धं प्रहस्येदमथाब्रवीत्॥ २६.१४ ॥
tacchrutvā nāma putrasya kṛtaṃ mātrā mahīpatiḥ alarka ityasambaddhaṃ prahasyedamathābravīt
पुत्र का यह नाम माता द्वारा रखा गया सुनकर, राजा 'अलर्क' को असंगत मानकर हँस पड़ा और यह बोला।
श्लोक 15 (markandeya.26.15)
राजोवाच । भवत्या यदिदं नाम मत्पुत्रस्य कृतं शुभे । किमीदृशमसम्बद्धमर्थः कोऽस्य मदालसे॥ २६.१५ ॥
rājovāca bhavatyā yadidaṃ nāma matputrasya kṛtaṃ śubhe kimīdṛśamasambaddhamarthaḥ ko 'sya madālase
राजा ने कहा — हे शुभे! तुमने मेरे पुत्र का यह जो नाम रखा है, यह ऐसा असंगत क्यों है? हे मदालसे, इसका क्या अर्थ है?
श्लोक 16 (markandeya.26.16)
मदालसोवाच । कल्पनेयं महाराज ! कृता सा व्यावहारिको । त्वत्कृतानां तथा नाम्नां शृणु भूप ! निरर्थताम्॥ २६.१६ ॥
madālasovāca kalpaneyaṃ mahārāja ! kṛtā sā vyāvahāriko tvatkṛtānāṃ tathā nāmnāṃ śṛṇu bhūpa ! nirarthatām
मदालसा ने कहा — हे महाराज! यह तो केवल एक व्यावहारिक कल्पना है। अब हे राजन्! सुनिए, आपके द्वारा दिए गए नामों की भी निरर्थकता।
श्लोक 17 (markandeya.26.17)
वदन्ति पुरुषाः प्राज्ञा व्यापिनं पुरुषं यतः । क्रान्तिश्च गतिरुद्दिष्टा देशाद्देशान्तरन्तु या॥ २६.१७ ॥
vadanti puruṣāḥ prājñā vyāpinaṃ puruṣaṃ yataḥ krāntiśca gatiruddiṣṭā deśāddeśāntarantu yā
विद्वान पुरुष कहते हैं कि पुरुष (आत्मा) सर्वव्यापी है; परन्तु 'क्रान्ति' अथवा गति तो एक देश से दूसरे देश में जाने को कहते हैं।
श्लोक 18 (markandeya.26.18)
सर्वगो न प्रयातीति व्यापी देहेश्वरो यतः । ततो विक्रान्तसंज्ञेयं मता मम निरर्थिका॥ २६.१८ ॥
sarvago na prayātīti vyāpī deheśvaro yataḥ tato vikrāntasaṃjñeyaṃ matā mama nirarthikā
चूँकि सर्वव्यापी देहस्वामी (आत्मा) सब जगह होने के कारण कहीं 'जाता' नहीं, इसलिए 'विक्रान्त' यह नाम मुझे निरर्थक प्रतीत होता है।
श्लोक 19 (markandeya.26.19)
सुबाहुरिति या संज्ञा कृतान्यस्य सुतस्य ते । निरर्था साप्यमूर्तत्वात् पुरुषस्य महीपते॥ २६.१९ ॥
subāhuriti yā saṃjñā kṛtānyasya sutasya te nirarthā sāpyamūrtatvāt puruṣasya mahīpate
हे राजन्! आपके दूसरे पुत्र का जो नाम 'सुबाहु' रखा गया है, वह भी निरर्थक है, क्योंकि पुरुष (आत्मा) अमूर्त (आकाररहित) है।
श्लोक 20 (markandeya.26.20)
पुत्रस्य यद् कृतं नाम तृतीयस्यारिमर्दनः । मन्ये तदप्यसम्बद्धं शृणु चाप्यत्र कारणम्॥ २६.२० ॥
putrasya yad kṛtaṃ nāma tṛtīyasyārimardanaḥ manye tadapyasambaddhaṃ śṛṇu cāpyatra kāraṇam
तीसरे पुत्र का जो नाम 'अरिमर्दन' रखा गया है, उसे भी मैं असंगत मानती हूँ; इसका कारण भी सुनिए।
श्लोक 21 (markandeya.26.21)
एक एव शरीरेषु सर्वेषु पुरुषो यदा । तदास्य राजन् ! क शत्रुः को वा मित्रमिहेष्यते॥ २६.२१ ॥
eka eva śarīreṣu sarveṣu puruṣo yadā tadāsya rājan ! ka śatruḥ ko vā mitramiheṣyate
हे राजन्! जब एक ही पुरुष सभी शरीरों में विद्यमान है, तब उसका शत्रु ही कौन है और मित्र ही कौन?
श्लोक 22 (markandeya.26.22)
भूतैर्भूतानि मृद्यन्ते अमूर्तो मृद्यते कथम् । क्रोधादीनां पृथग्भावात् कल्पनेयं निरर्थिका॥ २६.२२ ॥
bhūtairbhūtāni mṛdyante amūrto mṛdyate katham krodhādīnāṃ pṛthagbhāvāt kalpaneyaṃ nirarthikā
शरीरधारी भूत ही अन्य भूतों को कुचलते हैं, परन्तु अमूर्त (आत्मा) कैसे कुचला जा सकता है? क्रोध आदि विकार आत्मा से पृथक् होने के कारण यह कल्पना निरर्थक है।
श्लोक 23 (markandeya.26.23)
यदि संव्यवहारार्थमसन्नाम प्रकल्प्यते । नाम्नि कस्मादलर्काख्ये नैरर्थ्यं भवतो मतम्॥ २६.२३ ॥
yadi saṃvyavahārārthamasannāma prakalpyate nāmni kasmādalarkākhye nairarthyaṃ bhavato matam
यदि व्यवहार के लिए ऐसा नाम रखा जा सकता है जो वास्तव में असत् है, तो 'अलर्क' नाम में निरर्थकता का दोष आपको क्यों प्रतीत होता है?
श्लोक 24 (markandeya.26.24)
जड उवाच । एवमुक्तस्तया साधु महीष्या स महीपतिः । तथेत्याह महाबुद्धिर्दयितां तथ्यवादिनीम्॥ २६.२४ ॥
jaḍa uvāca evamuktastayā sādhu mahīṣyā sa mahīpatiḥ tathetyāha mahābuddhirdayitāṃ tathyavādinīm
जड ने कहा — इस प्रकार रानी द्वारा भलीभाँति सम्बोधित किया गया वह महाबुद्धिमान राजा अपनी सत्यवादिनी प्रिय पत्नी से 'ऐसा ही हो' कहकर सहमत हो गया।
श्लोक 25 (markandeya.26.25)
तञ्चापि सा सुतं सुभ्रूर्यथा पूर्वसुतांस्तथा । प्रोवाच बोधजननं तामुवाच स पार्थिवः॥ २६.२५ ॥
tañcāpi sā sutaṃ subhrūryathā pūrvasutāṃstathā provāca bodhajananaṃ tāmuvāca sa pārthivaḥ
उस सुन्दर भौंहों वाली रानी ने इस पुत्र को भी, पूर्व के पुत्रों के समान ही, बोध कराने वाली शिक्षा दी। तब राजा ने उससे यह कहा।
श्लोक 26 (markandeya.26.26)
करोषि किमिदं मूढे ! ममाभावाय सन्ततेः । दुष्टावबोधदानेन यथापूर्वं सुतेषु मे॥ २६.२६ ॥
karoṣi kimidaṃ mūḍhe ! mamābhāvāya santateḥ duṣṭāvabodhadānena yathāpūrvaṃ suteṣu me
हे मूढे! तुम यह क्या कर रही हो? पहले की भाँति मेरे पुत्रों को यह दूषित उपदेश देकर तुम मेरी सन्तान-परम्परा का नाश ही कर रही हो!
श्लोक 27 (markandeya.26.27)
यदि ते मत्प्रियं कार्यं यदि ग्राह्यं वचो मम । तदेनं तनयं मार्गे प्रवृत्तेः सन्नियोजय॥ २६.२७ ॥
yadi te matpriyaṃ kāryaṃ yadi grāhyaṃ vaco mama tadenaṃ tanayaṃ mārge pravṛtteḥ sanniyojaya
यदि तुम्हें मेरा प्रिय करना है, यदि मेरा वचन तुम्हें मान्य है, तो इस पुत्र को प्रवृत्ति-मार्ग (सांसारिक कर्मों) में लगाओ।
श्लोक 28 (markandeya.26.28)
कर्ममार्गः समुच्छेदं नैवं देवि ! गमिष्यति । पितृपिण्डनिवृत्तिश्च नैवं साध्वि ! भविष्यति॥ २६.२८ ॥
karmamārgaḥ samucchedaṃ naivaṃ devi ! gamiṣyati pitṛpiṇḍanivṛttiśca naivaṃ sādhvi ! bhaviṣyati
हे देवी! इस प्रकार कर्ममार्ग का उच्छेद नहीं होना चाहिए, और हे साध्वि! इस प्रकार पितरों के पिण्डदान की परम्परा भी समाप्त नहीं होनी चाहिए।
श्लोक 29 (markandeya.26.29)
पितरो देवलोकस्थास्तथा तिर्यक्त्वमागताः । तद्वन्मनुष्यतां याता भूतवर्गे च संस्थिताः॥ २६.२९ ॥
pitaro devalokasthāstathā tiryaktvamāgatāḥ tadvanmanuṣyatāṃ yātā bhūtavarge ca saṃsthitāḥ
पितर कभी देवलोक में स्थित होते हैं, कभी पशु-योनि को प्राप्त होते हैं, तो कभी मनुष्य-योनि को प्राप्त होकर भूत-गण में भी स्थित रहते हैं।
श्लोक 30 (markandeya.26.30)
सपुण्यानसपुण्यांश्च क्षुत्क्षामान् तृट्परिप्लुतान् । पिण्डोदकप्रदानेन नरः कर्मण्यवस्थितः॥ २६.३० ॥
sapuṇyānasapuṇyāṃśca kṣutkṣāmān tṛṭpariplutān piṇḍodakapradānena naraḥ karmaṇyavasthitaḥ
कर्म में स्थित मनुष्य, पिण्ड और जल के दान द्वारा, पुण्यवान और पुण्यहीन, भूख से क्षीण और प्यास से व्याकुल — सभी पितरों को तृप्त करता है।
श्लोक 31 (markandeya.26.31)
सदाप्यायते सुभ्रु ! तद्वद्देवातिथोनपि । देवैर्मनुष्यैः पितृभिः प्रेतैर्भूतैः सगुह्यकैः॥ २६.३१ ॥
sadāpyāyate subhru ! tadvaddevātithonapi devairmanuṣyaiḥ pitṛbhiḥ pretairbhūtaiḥ saguhyakaiḥ
हे सुभ्रु! यह कर्म-परम्परा सदा पुष्ट होती रहती है — देवों, मनुष्यों, पितरों, प्रेतों, भूतों तथा गुह्यकों के अतिथि-सत्कार से भी।
श्लोक 32 (markandeya.26.32)
वयोभिः कृमिकीटैश्च नर एवोपजीव्यते । तस्मात् तन्वड्गि ! पुत्रं यत्कार्यं क्षत्रयोनिभिः॥ २६.३२ ॥
vayobhiḥ kṛmikīṭaiśca nara evopajīvyate tasmāt tanvaḍgi ! putraṃ yatkāryaṃ kṣatrayonibhiḥ
मनुष्य पर पक्षी, कीट और कृमि भी आश्रित रहते हैं। इसलिए हे तन्वंगी! क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न इस पुत्र का जो कर्तव्य है —
श्लोक 33 (markandeya.26.33)
ऐहिकामुष्मिकफलं तत् सम्यक् प्रतिपादय॥ २६.३३ ॥
aihikāmuṣmikaphalaṃ tat samyak pratipādaya
— उसे भलीभाँति उसमें स्थापित करो, जिसका फल इस लोक और परलोक दोनों में प्राप्त हो।
श्लोक 34 (markandeya.26.34)
जड उवाच । तेनैवमुक्ता सा भर्त्रा वरनारी मदालसा । अलर्कं नाम तनयमुवाचोल्लापवादिनी॥ २६.३४ ॥
jaḍa uvāca tenaivamuktā sā bhartrā varanārī madālasā alarkaṃ nāma tanayamuvācollāpavādinī
जड ने कहा — पति द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह श्रेष्ठ नारी मदालसा मधुर वाणी में अपने पुत्र अलर्क से यह बोली।
श्लोक 35 (markandeya.26.35)
पुत्र वर्धस्व मद्भर्तुर्मनो नन्दय कर्मभिः । मित्राणामुपकाराय दुर्हृदां नाशनाय च॥ २६.३५ ॥
putra vardhasva madbharturmano nandaya karmabhiḥ mitrāṇāmupakārāya durhṛdāṃ nāśanāya ca
हे पुत्र! तुम बढ़ो और अपने कर्मों से मेरे पति के मन को आनन्दित करो — मित्रों के उपकार के लिए और दुष्टों के नाश के लिए।
श्लोक 36 (markandeya.26.36)
धन्योऽसि रे यो वसुधामशत्रुर् एकश्चिरं पालयितासि पुत्र । तत्पालनादस्तु सुखोपभोगो धर्मात् फलं प्राप्स्यसि चामरत्वम्॥ २६.३६ ॥
dhanyo 'si re yo vasudhāmaśatrur ekaściraṃ pālayitāsi putra tatpālanādastu sukhopabhogo dharmāt phalaṃ prāpsyasi cāmaratvam
हे पुत्र! धन्य हो तुम, जो अकेले ही शत्रु-रहित होकर दीर्घ काल तक इस पृथ्वी का पालन करोगे। उस पालन से सुख-भोग प्राप्त हो, और धर्म से तुम्हें फल तथा अमरत्व भी प्राप्त हो।
श्लोक 37 (markandeya.26.37)
धरामरान् पर्वसु तर्पयेथाः समीहितं बन्धुषु पूरयेथाः । हितं परस्मै हृदि चिन्तयेथाः मनः परस्त्रीषु निवर्तयेथाः॥ २६.३७ ॥
dharāmarān parvasu tarpayethāḥ samīhitaṃ bandhuṣu pūrayethāḥ hitaṃ parasmai hṛdi cintayethāḥ manaḥ parastrīṣu nivartayethāḥ
पर्वों पर पृथ्वी के ब्राह्मणों को तृप्त करना, बन्धुजनों की इच्छाएँ पूर्ण करना, हृदय में दूसरों के हित का चिन्तन करना, और अपने मन को परस्त्रियों से दूर रखना।
श्लोक 38 (markandeya.26.38)
यज्ञौरनेकैर्विबुधानजस्त्रम् अर्थैर्द्विजान् प्रीणय संश्रितांश्च । स्त्रियश्च कामैरतुलैश्चिराय युद्धैश्चारींस्तोषयितासि वीर॥ २६.३८ ॥
yajñauranekairvibudhānajastram arthairdvijān prīṇaya saṃśritāṃśca striyaśca kāmairatulaiścirāya yuddhaiścārīṃstoṣayitāsi vīra
अनेक यज्ञों से देवताओं को निरन्तर प्रसन्न करो, धन से ब्राह्मणों और आश्रितों को तृप्त करो, अनुपम भोगों से पत्नियों को चिरकाल तक प्रसन्न रखो, और हे वीर! युद्धों द्वारा शत्रुओं को संतुष्ट करोगे।
श्लोक 39 (markandeya.26.39)
बालो मनो नन्दय बान्धवानां गुरोस्तथाज्ञानकरणैः कुमारः । स्त्रीणां युवा सत्कुलभूषणानां वृद्धो वने वत्स ! वनेचराणाम्॥ २६.३९ ॥
bālo mano nandaya bāndhavānāṃ gurostathājñānakaraṇaiḥ kumāraḥ strīṇāṃ yuvā satkulabhūṣaṇānāṃ vṛddho vane vatsa ! vanecarāṇām
बाल्यावस्था में बान्धवों के मन को प्रसन्न करना, कुमार-अवस्था में गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें प्रसन्न करना, युवावस्था में कुलीन घरानों की शोभा बढ़ाने वाली स्त्रियों को प्रसन्न करना, और हे वत्स! वृद्धावस्था में वन में वनवासियों को प्रसन्न करना।
श्लोक 40 (markandeya.26.40)
राज्यं कुर्वन् सुहृदो नन्दयेथाः साधून् रक्षंस्तात ! यज्ञैर्यजेथाः । दुष्टान्निघ्रन् वैरिणश्चाजिमध्ये गोविप्रार्थे वत्स ! मृत्युं व्रजेथाः॥ २६.४० ॥
rājyaṃ kurvan suhṛdo nandayethāḥ sādhūn rakṣaṃstāta ! yajñairyajethāḥ duṣṭānnighran vairiṇaścājimadhye goviprārthe vatsa ! mṛtyuṃ vrajethāḥ
राज्य करते हुए मित्रों को प्रसन्न रखना, हे तात! सज्जनों की रक्षा करते हुए यज्ञों से देवताओं का यजन करना, दुष्टों और शत्रुओं का युद्ध में संहार करना, और हे वत्स! यदि आवश्यक हो तो गौ और ब्राह्मणों के लिए मृत्यु को भी प्राप्त होना।