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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 30

नैमित्तिक श्राद्ध-कल्प

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

श्लोक 1 (markandeya.30.1)

मदालसोवाच । नित्यं नैमित्तकञ्चैव नित्यनैमित्तिकं तथा । गृहस्थस्य तु यत् कर्म तन्निशामय पुत्रक !॥ ३०.१ ॥

madālasovāca nityaṃ naimittakañcaiva nityanaimittikaṃ tathā gṛhasthasya tu yat karma tanniśāmaya putraka !

मदालसा ने कहा — हे पुत्रक! गृहस्थ के जो नित्य, नैमित्तिक तथा नित्यनैमित्तिक कर्म हैं, उन्हें सुनो।

श्लोक 2 (markandeya.30.2)

पञ्चयज्ञाश्रितं नित्यं यदेतत् कथितं तव । नैमित्तिकं तथैवान्यत् पुत्रजन्मक्रियादिकम्॥ ३०.२ ॥

pañcayajñāśritaṃ nityaṃ yadetat kathitaṃ tava naimittikaṃ tathaivānyat putrajanmakriyādikam

जो मैंने पहले तुम्हें पंचमहायज्ञ पर आधारित कर्म बताया, वह नित्य कर्म है; इससे भिन्न पुत्र-जन्म आदि पर की जाने वाली क्रियाएँ नैमित्तिक कर्म हैं।

श्लोक 3 (markandeya.30.3)

नित्यनैमित्तिकं ज्ञेयं पर्वश्राद्धादि पण्डितैः । तत्र नैमित्तिकं वक्ष्ये श्राद्धमभ्युदयं तव॥ ३०.३ ॥

nityanaimittikaṃ jñeyaṃ parvaśrāddhādi paṇḍitaiḥ tatra naimittikaṃ vakṣye śrāddhamabhyudayaṃ tava

नित्यनैमित्तिक कर्म पण्डितों द्वारा पर्व-श्राद्ध आदि माना गया है। उनमें से मैं तुम्हें नैमित्तिक अभ्युदय-श्राद्ध बताती हूँ।

श्लोक 4 (markandeya.30.4)

पुत्रजन्मनि यत्कार्यं जातकर्मसमं नरैः । विवाहादौ च कर्तव्यं सर्वं सम्यक् क्रिमोदितम्॥ ३०.४ ॥

putrajanmani yatkāryaṃ jātakarmasamaṃ naraiḥ vivāhādau ca kartavyaṃ sarvaṃ samyak krimoditam

पुत्र के जन्म पर जातकर्म आदि जो कर्म करने योग्य है, तथा विवाह आदि में जो सब करना चाहिए, वह भलीभाँति बता दिया गया है।

श्लोक 5 (markandeya.30.5)

पितरश्चात्र सम्पूज्याः ख्याता नान्दीमुखास्तु ये । पिण्डांश्च दधिसंमिश्रान् दद्याद् यवसमन्वितान्॥ ३०.५ ॥

pitaraścātra sampūjyāḥ khyātā nāndīmukhāstu ye piṇḍāṃśca dadhisaṃmiśrān dadyād yavasamanvitān

इन अवसरों पर 'नान्दीमुख' नाम से प्रसिद्ध पितरों की पूजा करनी चाहिए, तथा उन्हें दही मिश्रित यव-युक्त पिण्ड अर्पित करने चाहिए।

श्लोक 6 (markandeya.30.6)

उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा यजमानः समाहितः । वैश्वदेवविहीनं तत् केचिदिच्छन्ति मानवाः॥ ३०.६ ॥

udaṅmukhaḥ prāṅmukho vā yajamānaḥ samāhitaḥ vaiśvadevavihīnaṃ tat kecidicchanti mānavāḥ

यजमान उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख होकर एकाग्रचित्त से यह कर्म करे; कुछ लोग इसे वैश्वदेव-रहित करना उचित मानते हैं।

श्लोक 7 (markandeya.30.7)

युग्माश्चात्र द्विजाः कार्यास्ते च पूज्याः प्रदक्षिणम् । एतन्नैमित्तिकं वृद्धौ तथान्यच्चौर्ध्वदेहिकम्॥ ३०.७ ॥

yugmāścātra dvijāḥ kāryāste ca pūjyāḥ pradakṣiṇam etannaimittikaṃ vṛddhau tathānyaccaurdhvadehikam

यहाँ द्विजों को सम-संख्या में आमंत्रित करना चाहिए, और उन्हें प्रदक्षिणा-विधि से पूजित करना चाहिए। यह अभ्युदय-सम्बन्धी नैमित्तिक कर्म है; इसके अतिरिक्त एक अन्य कर्म भी है, जो मृतक के लिए किया जाता है।

श्लोक 8 (markandeya.30.8)

मृताहनि च कर्तव्यमेकोद्दिष्टं शृणुष्व तत् । दैवहीनं तथा कार्यं तथैवैकपवित्रकम्॥ ३०.८ ॥

mṛtāhani ca kartavyamekoddiṣṭaṃ śṛṇuṣva tat daivahīnaṃ tathā kāryaṃ tathaivaikapavitrakam

मृत्यु के दिन 'एकोद्दिष्ट' नामक श्राद्ध करना चाहिए — उसे सुनो। इसमें देव-कर्म का अभाव होता है, तथा इसमें केवल एक ही पवित्रक होता है।

श्लोक 9 (markandeya.30.9)

आवाहनं न कर्तव्यमग्नौकरणवर्जितम् । प्रेतस्य पिण्डमेकञ्च दद्यादुच्छिष्टसन्निधौ॥ ३०.९ ॥

āvāhanaṃ na kartavyamagnaukaraṇavarjitam pretasya piṇḍamekañca dadyāducchiṣṭasannidhau

इसमें आवाहन नहीं करना चाहिए, तथा अग्नि में हवन भी नहीं करना चाहिए। उच्छिष्ट के समीप ही प्रेत के लिए एक पिण्ड अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 10 (markandeya.30.10)

तिलोदकं चापसव्यं तन्नामस्मरणान्वितम् । अक्षय्यममुकस्येति स्थाने विप्रविसर्जने॥ ३०.१० ॥

tilodakaṃ cāpasavyaṃ tannāmasmaraṇānvitam akṣayyamamukasyeti sthāne vipravisarjane

अपसव्य होकर तिल-मिश्रित जल अर्पित करना चाहिए, साथ ही मृतक का नाम लेते हुए 'अमुक के लिए यह अक्षय हो' — यह विप्र-विसर्जन के समय कहना चाहिए।

श्लोक 11 (markandeya.30.11)

अभिरण्यतामिति ब्रूयाद् ब्रूयुस्तेऽभिरताः स्म ह । प्रतिमासं भवेदेतत् कार्यमा वत्सरं नरैः॥ ३०.११ ॥

abhiraṇyatāmiti brūyād brūyuste 'bhiratāḥ sma ha pratimāsaṃ bhavedetat kāryamā vatsaraṃ naraiḥ

उसे कहना चाहिए, 'आप प्रसन्न हों' और वे उत्तर दें, 'हम प्रसन्न हुए हैं'। यह कर्म मनुष्यों को एक वर्ष तक प्रतिमास करना चाहिए।

श्लोक 12 (markandeya.30.12)

अथ संवत्सरे पूर्णे यदा वा क्रियते नरैः । सपिण्डीकरणं कार्यं तस्यापि विधिरुच्यते॥ ३०.१२ ॥

atha saṃvatsare pūrṇe yadā vā kriyate naraiḥ sapiṇḍīkaraṇaṃ kāryaṃ tasyāpi vidhirucyate

फिर वर्ष पूर्ण होने पर, अथवा जब भी मनुष्यों द्वारा किया जाए, सपिण्डीकरण कर्म करना चाहिए; इसकी विधि भी बताई जाती है।

श्लोक 13 (markandeya.30.13)

तच्चापि दैवरहितमेकार्घ्यैकपवित्रकम् । नैवाग्नौकरणं तत्र तच्चावाहनवर्जितम्॥ ३०.१३ ॥

taccāpi daivarahitamekārghyaikapavitrakam naivāgnaukaraṇaṃ tatra taccāvāhanavarjitam

यह भी देव-रहित होता है, इसमें एक ही अर्घ्य तथा एक ही पवित्रक होता है; इसमें अग्नि में हवन भी नहीं होता, तथा यह भी आवाहन-रहित होता है।

श्लोक 14 (markandeya.30.14)

अपसव्यञ्च तत्रापि भोजयेदयुजो द्विजान् । विशेषस्तत्र चान्योऽस्ति प्रतिमासं क्रियाधिकः॥ ३०.१४ ॥

apasavyañca tatrāpi bhojayedayujo dvijān viśeṣastatra cānyo 'sti pratimāsaṃ kriyādhikaḥ

वहाँ भी अपसव्य होकर विषम संख्या में द्विजों को भोजन कराना चाहिए। वहाँ एक अन्य विशेषता भी है, जो मासिक कर्म से अधिक है।

श्लोक 15 (markandeya.30.15)

तं कथ्यमानमेकाग्रो वदन्त्या मे निशामय । तिलगन्धोदकैर्युक्तं तत्र पात्रचतुष्टयम्॥ ३०.१५ ॥

taṃ kathyamānamekāgro vadantyā me niśāmaya tilagandhodakairyuktaṃ tatra pātracatuṣṭayam

उसे बताती हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो — वहाँ तिल और सुगन्धित जल से युक्त चार पात्र होने चाहिए।

श्लोक 16 (markandeya.30.16)

कुर्यात् पितॄणां त्रितयमेकं प्रेतस्य पुत्रक । पात्रत्रये प्रेतपात्रमर्घ्यञ्चैव प्रसेचयेत्॥ ३०.१६ ॥

kuryāt pitṝṇāṃ tritayamekaṃ pretasya putraka pātratraye pretapātramarghyañcaiva prasecayet

हे पुत्रक! इनमें से तीन पात्र पितरों के लिए और एक प्रेत के लिए बनाना चाहिए। प्रेत के पात्र को अर्घ्य सहित उन तीनों पात्रों में मिला देना चाहिए।

श्लोक 17 (markandeya.30.17)

ये समाना इति जपन् पूर्ववच्छेषमाचरेत् । स्त्रीणामप्येवमेवैतदेकीद्दिष्टमुदाहृतम्॥ ३०.१७ ॥

ye samānā iti japan pūrvavaccheṣamācaret strīṇāmapyevamevaitadekīddiṣṭamudāhṛtam

'ये समाना' इस मन्त्र का जप करते हुए शेष विधि पूर्ववत् करनी चाहिए। स्त्रियों के लिए भी यही एकोद्दिष्ट-श्राद्ध बताया गया है।

श्लोक 18 (markandeya.30.18)

सपिण्डीकरणं तासां पुत्राभावे न विद्यते । प्रतिसंवत्सरं कार्यमेकोद्दिष्टं नरैः स्त्रियाः॥ ३०.१८ ॥

sapiṇḍīkaraṇaṃ tāsāṃ putrābhāve na vidyate pratisaṃvatsaraṃ kāryamekoddiṣṭaṃ naraiḥ striyāḥ

पुत्र के अभाव में स्त्रियों का सपिण्डीकरण नहीं होता; इसके स्थान पर पुरुषों को प्रतिवर्ष स्त्री के लिए एकोद्दिष्ट-श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 19 (markandeya.30.19)

मृताहनि यथान्यायं नृणां यद्वदिहोदितम् । पुत्राभावे सपिण्डास्तु तदभावे सहोदकाः॥ ३०.१९ ॥

mṛtāhani yathānyāyaṃ nṛṇāṃ yadvadihoditam putrābhāve sapiṇḍāstu tadabhāve sahodakāḥ

मृत्यु के दिन जिस प्रकार पुरुषों के लिए यहाँ न्यायपूर्वक बताया गया है, वैसे ही पुत्र के अभाव में सपिण्ड-जन तथा उनके भी अभाव में सहोदक-जन यह कर्म करें।

श्लोक 20 (markandeya.30.20)

मातुः सपिण्डा ये च स्युर्ये च मातुः सहोदकाः । कुर्युरेनं विधिं सम्यगपुत्रस्य सुतासुतः॥ ३०.२० ॥

mātuḥ sapiṇḍā ye ca syurye ca mātuḥ sahodakāḥ kuryurenaṃ vidhiṃ samyagaputrasya sutāsutaḥ

जो माता के सपिण्ड अथवा सहोदक हों, और यदि पुत्र न हो, तो पुत्री का पुत्र इस विधि को भलीभाँति सम्पन्न करे।

श्लोक 21 (markandeya.30.21)

कुर्युर्मातामहायैवं पुत्रिकास्तनयास्तथा । द्व्यामुष्यायणसंज्ञास्तु मातामहपितामहान्॥ ३०.२१ ॥

kuryurmātāmahāyaivaṃ putrikāstanayāstathā dvyāmuṣyāyaṇasaṃjñāstu mātāmahapitāmahān

इसी प्रकार पुत्रिका के पुत्र नाना के लिए यह कर्म करें; तथा द्व्यामुष्यायण नामक (दोनों कुलों से सम्बन्धित) पुत्र —

श्लोक 22 (markandeya.30.22)

पूजयेयुर्यथान्यायं श्राद्धैर्नैमित्तिकैरपि । सर्वाभावे स्त्रियः कुर्युः स्वभर्तॄणाममन्त्रकम्॥ ३०.२२ ॥

pūjayeyuryathānyāyaṃ śrāddhairnaimittikairapi sarvābhāve striyaḥ kuryuḥ svabhartṝṇāmamantrakam

— नाना और दादा दोनों को विधिपूर्वक नैमित्तिक श्राद्धों सहित पूजें। इन सबके अभाव में स्त्रियाँ अपने पतियों के लिए मन्त्ररहित यह कर्म करें।

श्लोक 23 (markandeya.30.23)

तदभावे च नृपतिः कारयेत् स्वकुटुम्बिना । तज्जातीयैर्नरैः सम्याग् दाहाद्याः सकलाः क्रियाः॥ ३०.२३ ॥

tadabhāve ca nṛpatiḥ kārayet svakuṭumbinā tajjātīyairnaraiḥ samyāg dāhādyāḥ sakalāḥ kriyāḥ

और उनके भी अभाव में राजा को चाहिए कि वह उसके ही कुटुम्बीजनों अथवा उसी जाति के लोगों द्वारा दाह-संस्कार आदि सभी क्रियाएँ भलीभाँति सम्पन्न कराए।

श्लोक 24 (markandeya.30.24)

सर्वेषामेव वर्णानां बान्धवो नृपतिर्यतः । एतास्ते कथिता वत्स ! नित्यनैमित्तकास्तथा॥ ३०.२४ ॥

sarveṣāmeva varṇānāṃ bāndhavo nṛpatiryataḥ etāste kathitā vatsa ! nityanaimittakāstathā

क्योंकि राजा ही समस्त वर्णों का बन्धु होता है। हे वत्स! इस प्रकार मैंने तुम्हें नित्यनैमित्तिक कर्म बता दिए।

श्लोक 25 (markandeya.30.25)

क्रियां श्राद्धाश्रयामन्यां नित्यनैमित्तिकीं शृणु । दर्शस्तत्र निमित्तं वै कालश्चन्द्रक्षयात्मकः । नित्यातां नियतः कालस्तस्याः संसूचयत्यथ॥ ३०.२५ ॥

kriyāṃ śrāddhāśrayāmanyāṃ nityanaimittikīṃ śṛṇu darśastatra nimittaṃ vai kālaścandrakṣayātmakaḥ nityātāṃ niyataḥ kālastasyāḥ saṃsūcayatyatha

अब श्राद्ध पर आश्रित एक अन्य नित्यनैमित्तिक कर्म को सुनो। उसमें अमावस्या निमित्त है, तथा उसका काल चन्द्रमा के क्षय पर आधारित है; उसका नियत काल ही उसकी नित्यता को सूचित करता है।

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