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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 31

पार्वण श्राद्ध कल्प

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (markandeya.31.1)

मदालसोवाच सपिण्डीकरणादूर्ध्वं पितुर्यः प्रपितामहः । स तु लेपभुजो याति प्रलुप्तः पितृपिण्डतः ॥ ३१.१ ॥

madālasovāca sapiṇḍīkaraṇādūrdhvaṃ pituryaḥ prapitāmahaḥ sa tu lepabhujo yāti praluptaḥ pitṛpiṇḍataḥ

सपिण्डीकरण संस्कार हो जाने के पश्चात् पिता का जो प्रपितामह (परदादा का पिता) होता है, वह पितृ-पिण्ड से वंचित होकर मात्र लेप (पिण्ड के लेप) का भोक्ता बन जाता है।

श्लोक 2 (markandeya.31.2)

तेषामन्यश्चतुर्थो यः पुत्रलेपभुजान्नभुक् । सोऽपि सम्बन्धतो हीनमुपभोगं प्रपद्यते ॥ ३१.२ ॥

teṣāmanyaścaturtho yaḥ putralepabhujānnabhuk so 'pi sambandhato hīnamupabhogaṃ prapadyate

उनमें जो चौथा है, जो पुत्र के लेप-भोजी अन्न को खाता है, वह भी सम्बन्ध की दृष्टि से घटा हुआ ही भोग प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (markandeya.31.3)

पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । पिण्डसम्बन्धिनो ह्येते विज्ञेयाः पुरुषास्त्रयः ॥ ३१.३ ॥

pitā pitāmahaścaiva tathaiva prapitāmahaḥ piṇḍasambandhino hyete vijñeyāḥ puruṣāstrayaḥ

पिता, पितामह और उसी प्रकार प्रपितामह — ये तीन पुरुष पिण्ड से सम्बन्धित जानने चाहिए।

श्लोक 4 (markandeya.31.4)

तेपसम्बन्धिनश्चान्ये पितामहपितामहात् । प्रभृत्युक्तास्त्रयस्तेषां यजमानश्च सप्तमः ॥ ३१.४ ॥

tepasambandhinaścānye pitāmahapitāmahāt prabhṛtyuktāstrayasteṣāṃ yajamānaśca saptamaḥ

पितामह के पितामह से आरम्भ होकर लेप से सम्बन्धित अन्य तीन पुरुष कहे गए हैं; और यजमान (यज्ञ करने वाला स्वयं) सातवाँ है।

श्लोक 5 (markandeya.31.5)

इत्येष मु नभिः प्रोक्तः सम्बन्धः साप्तपौरुषः । यजमानात् प्रभृत्यूर्ध्वमनुलेपभुजस्तथा ॥ ३१.५ ॥

ityeṣa mu nabhiḥ proktaḥ sambandhaḥ sāptapauruṣaḥ yajamānāt prabhṛtyūrdhvamanulepabhujastathā

इस प्रकार यह सात-पुरुषों का सम्बन्ध मुनियों द्वारा कहा गया है; और यजमान से ऊपर की ओर आगे भी वैसे ही लेप-भोजी अन्य होता है।

श्लोक 6 (markandeya.31.6)

ततोऽन्ये पूर्वजाः सर्वे ये चान्ये नरकौकसः । ये च तिर्यक्त्वमापन्ना ये च भूतादिसंस्थिताः ॥ ३१.६ ॥

tato 'nye pūrvajāḥ sarve ye cānye narakaukasaḥ ye ca tiryaktvamāpannā ye ca bhūtādisaṃsthitāḥ

इनके अतिरिक्त पूर्वजन्मे अन्य सभी — जो नरक में निवास करते हैं, जो पशु-योनि को प्राप्त हुए हैं, तथा जो भूत आदि योनियों में स्थित हैं —

श्लोक 7 (markandeya.31.7)

तान् सर्वान् यजमानो वै श्राद्धं कुर्वन् यथाविधि । समाप्याययते वत्स ! येन येन शृणुष्व तत् ॥ ३१.७ ॥

tān sarvān yajamāno vai śrāddhaṃ kurvan yathāvidhi samāpyāyayate vatsa ! yena yena śṛṇuṣva tat

उन सभी को यजमान विधिपूर्वक श्राद्ध करते हुए तृप्त करता है, हे वत्स! किस-किस साधन से, वह सुनो।

श्लोक 8 (markandeya.31.8)

अन्नप्रकिरणं यत् तु मनुष्यैः क्रियते भुवि । तेन तृत्पिमुपायान्ति ये पिशाचत्वमागताः ॥ ३१.८ ॥

annaprakiraṇaṃ yat tu manuṣyaiḥ kriyate bhuvi tena tṛtpimupāyānti ye piśācatvamāgatāḥ

पृथ्वी पर मनुष्यों द्वारा जो अन्न बिखेरा जाता है, उससे वे तृप्ति पाते हैं जो पिशाच-योनि को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 9 (markandeya.31.9)

यदम्बु स्त्रानवस्त्रोत्थं भूमौ पतति पुत्रक ! । तेन ये तरुतां प्राप्तास्तेषां तृप्तिः प्रजायते ॥ ३१.९ ॥

yadambu strānavastrotthaṃ bhūmau patati putraka ! tena ye tarutāṃ prāptāsteṣāṃ tṛptiḥ prajāyate

हे पुत्र! स्नान के वस्त्र से उत्पन्न होकर जो जल भूमि पर गिरता है, उससे जो वृक्ष-योनि को प्राप्त हुए हैं, उनकी तृप्ति होती है।

श्लोक 10 (markandeya.31.10)

यास्तु गात्राम्बुकणिकाः पतन्ति धरणीतले । ताभिराप्यायनं तेषां ये देवत्वं कुले गताः ॥ ३१.१० ॥

yāstu gātrāmbukaṇikāḥ patanti dharaṇītale tābhirāpyāyanaṃ teṣāṃ ye devatvaṃ kule gatāḥ

जो शरीर से जल की बूँदें धरती पर गिरती हैं, उनसे कुल में जो देवत्व को प्राप्त हुए हैं, उनकी तृप्ति होती है।

श्लोक 11 (markandeya.31.11)

उद्धृतेष्वथ पिण्डेषु याश्चान्नकणिका भुवि । ताभिराप्यायनं प्राप्ता ये तिर्यकत्वं कुले गताः ॥ ३१.११ ॥

uddhṛteṣvatha piṇḍeṣu yāścānnakaṇikā bhuvi tābhirāpyāyanaṃ prāptā ye tiryakatvaṃ kule gatāḥ

फिर पिण्डों को उठा लेने पर भूमि पर जो अन्न-कण रह जाते हैं, उनसे कुल में जो पशु-योनि को प्राप्त हुए हैं, वे तृप्त होते हैं।

श्लोक 12 (markandeya.31.12)

ये वादग्धाः कुले बालाः क्रियायोग्या ह्यसंस्कृताः । विपन्नास्तेऽन्नविकिर-संमार्जनजलाशिनः ॥ ३१.१२ ॥

ye vādagdhāḥ kule bālāḥ kriyāyogyā hyasaṃskṛtāḥ vipannāste 'nnavikira-saṃmārjanajalāśinaḥ

कुल में जो बालक बिना दाह-संस्कार के मरे, जो संस्कार के योग्य नहीं थे, अनुपनीत थे, वे मृत बालक बिखरे अन्न, झाड़न और जल के भक्षक होते हैं।

श्लोक 13 (markandeya.31.13)

भुक्त्वा चाचामतां यच्च जलं यच्चाङ्घ्रिसेचने । ब्राह्मणानां तथैवान्ये तेन तृप्तिं प्रयान्ति वै ॥ ३१.१३ ॥

bhuktvā cācāmatāṃ yacca jalaṃ yaccāṅghrisecane brāhmaṇānāṃ tathaivānye tena tṛptiṃ prayānti vai

भोजन कर लेने पर ब्राह्मणों के आचमन का जो जल तथा पैर धोने में प्रयुक्त जल होता है, उससे अन्य लोग भी उसी प्रकार तृप्ति पाते हैं।

श्लोक 14 (markandeya.31.14)

एवं यो यजमानस्य यश्च तेषां द्विजन्मनाम् । कश्चिज्जलान्नविक्षेपः शुचिरुच्छिष्ट एव वा ॥ ३१.१४ ॥

evaṃ yo yajamānasya yaśca teṣāṃ dvijanmanām kaścijjalānnavikṣepaḥ śucirucchiṣṭa eva vā

इस प्रकार यजमान का अथवा उन द्विजों का जो भी जल या अन्न का बिखराव होता है — चाहे शुद्ध हो या जूठा —

श्लोक 15 (markandeya.31.15)

तेनान्ये तत्कुले तत्र तत्तद्योन्यन्तरं गताः । प्रयान्त्याप्यायनं वत्स ! सम्यक् श्राद्धक्रियावताम् ॥ ३१.१५ ॥

tenānye tatkule tatra tattadyonyantaraṃ gatāḥ prayāntyāpyāyanaṃ vatsa ! samyak śrāddhakriyāvatām

उससे कुल में उस-उस भिन्न योनि को प्राप्त हुए अन्य जन तृप्त होते हैं, हे वत्स! जो सम्यक् रूप से श्राद्ध-कर्म करने वालों के द्वारा प्राप्त होती है।

श्लोक 16 (markandeya.31.16)

अन्यायोपार्जितैरर्थैर्यच्छ्राद्धं क्रियते नरैः । तृप्यन्ते तेन चाण्डालपुक्कसाद्यासु योनिषु ॥ ३१.१६ ॥

anyāyopārjitairarthairyacchrāddhaṃ kriyate naraiḥ tṛpyante tena cāṇḍālapukkasādyāsu yoniṣu

जो श्राद्ध मनुष्यों द्वारा अन्याय से अर्जित धन से किया जाता है, उससे वे ही तृप्त होते हैं जो चाण्डाल-पुक्कस आदि नीच योनियों में पड़े हों।

श्लोक 17 (markandeya.31.17)

एवमाप्यायनं वत्स ! बहूनामिह बान्धवैः । श्राद्धं कुर्वदिभरन्नाम्बुबिन्दुक्षेपेण जायते ॥ ३१.१७ ॥

evamāpyāyanaṃ vatsa ! bahūnāmiha bāndhavaiḥ śrāddhaṃ kurvadibharannāmbubindukṣepeṇa jāyate

इस प्रकार, हे वत्स! जो अपने परिवार का पालन करते हुए श्राद्ध करता है, उसके द्वारा जल की एक बूँद गिराने मात्र से भी यहाँ बहुत-से बान्धवों की तृप्ति हो जाती है।

श्लोक 18 (markandeya.31.18)

तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि । कुर्वोत कुर्वतः श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति ॥ ३१.१८ ॥

tasmācchrāddhaṃ naro bhaktyā śākairapi yathāvidhi kurvota kurvataḥ śrāddhaṃ kule kaścinna sīdati

इसलिए मनुष्य को भक्तिपूर्वक विधिवत् श्राद्ध करना चाहिए, चाहे वह मात्र शाक से ही क्यों न हो; जो श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई भी दुःखी नहीं रहता।

श्लोक 19 (markandeya.31.19)

तस्य कालानहं वक्ष्ये नित्यनैमित्तिकात्मकान् । विधिना येन च नरैः क्रियते तन्निबोध मे ॥ ३१.१९ ॥

tasya kālānahaṃ vakṣye nityanaimittikātmakān vidhinā yena ca naraiḥ kriyate tannibodha me

अब मैं उसके नित्य और नैमित्तिक — दोनों प्रकार के — काल बताऊँगा; और जिस विधि से मनुष्यों द्वारा यह किया जाता है, वह भी मुझसे जानो।

श्लोक 20 (markandeya.31.20)

कार्यं श्राद्धममावास्यां मासि मास्युडुपक्षये । तथाष्टकास्वप्यवश्यमिच्छाकालं निबोध मे ॥ ३१.२० ॥

kāryaṃ śrāddhamamāvāsyāṃ māsi māsyuḍupakṣaye tathāṣṭakāsvapyavaśyamicchākālaṃ nibodha me

अमावस्या को, प्रत्येक मास में चन्द्रमा के क्षय-काल में, तथा अष्टका-तिथियों में भी अवश्य ही श्राद्ध करना चाहिए; और अब मुझसे इच्छा-काल (स्वेच्छा से किए जाने वाले अवसर) भी जानो।

श्लोक 21 (markandeya.31.21)

विशिष्टब्राह्मणप्राप्तौ सूर्येन्दुग्रहणेऽयने । विषुवे रविसंक्रान्तौ व्यतिपाते च पुत्रक ॥ ३१.२१ ॥

viśiṣṭabrāhmaṇaprāptau sūryendugrahaṇe 'yane viṣuve ravisaṃkrāntau vyatipāte ca putraka

किसी विशिष्ट ब्राह्मण के प्राप्त होने पर, सूर्य या चन्द्र ग्रहण में, अयन (संक्रान्ति के आरम्भ) में, विषुव में, रवि-संक्रान्ति में और व्यतिपात योग में, हे पुत्र —

श्लोक 22 (markandeya.31.22)

श्राद्धार्हद्रव्यसम्प्राप्तौ तथा दुःस्वप्नदर्शने । जन्मर्क्षग्रहपीडासु श्राद्धं कुर्वोत चेच्छया ॥ ३१.२२ ॥

śrāddhārhadravyasamprāptau tathā duḥsvapnadarśane janmarkṣagrahapīḍāsu śrāddhaṃ kurvota cecchayā

श्राद्ध के योग्य सामग्री प्राप्त होने पर, बुरा स्वप्न देखने पर, तथा जन्म-नक्षत्र पर ग्रह-पीड़ा होने पर — इच्छानुसार श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 23 (markandeya.31.23)

विशिष्टः श्रोत्रियो योगी वेदविज्ज्येष्ठसामगः । त्रिणाचिकेतस्त्रिमधुस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित् ॥ ३१.२३ ॥

viśiṣṭaḥ śrotriyo yogī vedavijjyeṣṭhasāmagaḥ triṇāciketastrimadhustrisuparṇaḥ ṣaḍaṅgavit

विशिष्ट श्रोत्रिय, योगी, वेद का ज्ञाता, श्रेष्ठ सामगायक, तीन नाचिकेत का ज्ञाता, त्रिमधु का ज्ञाता, त्रिसुपर्ण का ज्ञाता, तथा षडंगों का ज्ञाता —

श्लोक 24 (markandeya.31.24)

दौहित्रऋत्विग्जामातृस्वस्त्रीयाः श्वशुरस्तथा । पञ्चाग्निकर्मनिष्ठश्च तपोनिष्ठोऽथ मातुलः ॥ ३१.२४ ॥

dauhitraṛtvigjāmātṛsvastrīyāḥ śvaśurastathā pañcāgnikarmaniṣṭhaśca taponiṣṭho 'tha mātulaḥ

दौहित्र (बेटी का पुत्र), ऋत्विक्, जामाता, बहन का पुत्र, तथा उसी प्रकार श्वसुर, पंचाग्नि-कर्म में निष्ठ, तपस्या में निष्ठ तथा मामा —

श्लोक 25 (markandeya.31.25)

मातापितृपराश्चैव शिष्यसम्बन्धिबान्धवाः । एते द्विजोत्तमाः श्राद्धे समस्ताः केतनक्षमाः ॥ ३१.२५ ॥

mātāpitṛparāścaiva śiṣyasambandhibāndhavāḥ ete dvijottamāḥ śrāddhe samastāḥ ketanakṣamāḥ

माता-पिता की सेवा में तत्पर, शिष्य, सम्बन्धी और बान्धव — ये सभी श्रेष्ठ द्विज श्राद्ध में आमन्त्रित किए जाने योग्य हैं।

श्लोक 26 (markandeya.31.26)

अवकीर्णो तथा रोगी न्यूने चाङ्गे तथाधिके । पौनर्भवस्तथा काणः कुण्डो गोलोऽथ पुत्रक ॥ ३१.२६ ॥

avakīrṇo tathā rogī nyūne cāṅge tathādhike paunarbhavastathā kāṇaḥ kuṇḍo golo 'tha putraka

हे पुत्र! व्रतभंग करने वाला, रोगी, अंग में न्यून या अधिक अंगों वाला, पुनर्विवाहिता का पुत्र, काना, कुण्ड (सौतेला) तथा गोल (विधवा-पुत्र) —

श्लोक 27 (markandeya.31.27)

मित्रध्रुक् कुनखी क्लीबः श्यावदन्तो निराकृतिः । अबिशस्तस्तु तातेन पिशुनः सोमविक्रयी ॥ ३१.२७ ॥

mitradhruk kunakhī klībaḥ śyāvadanto nirākṛtiḥ abiśastastu tātena piśunaḥ somavikrayī

मित्रद्रोही, बुरे नाखूनों वाला, नपुंसक, काले दाँतों वाला, कुरूप, पिता द्वारा धिक्कारा गया, चुगलखोर, तथा सोम बेचने वाला —

श्लोक 28 (markandeya.31.28)

कन्यादूषयिता वैद्यो गुरुपित्रोस्तथोज्झकः । भृतकाध्यापकोऽमित्रः परपूर्वापतिस्तथा ॥ ३१.२८ ॥

kanyādūṣayitā vaidyo gurupitrostathojjhakaḥ bhṛtakādhyāpako 'mitraḥ parapūrvāpatistathā

कन्या को दूषित करने वाला, वैद्य, गुरु या माता-पिता को त्यागने वाला, वेतन लेकर पढ़ाने वाला, शत्रु, तथा पहले किसी और की पत्नी रह चुकी स्त्री का पति —

श्लोक 29 (markandeya.31.29)

वेदोज्झोऽथाग्निसन्त्यागी वृषलीपतिदूषितः । तथान्ये च विकर्मस्था वर्ज्याः पित्र्येषु वै द्विजाः ॥ ३१.२९ ॥

vedojjho 'thāgnisantyāgī vṛṣalīpatidūṣitaḥ tathānye ca vikarmasthā varjyāḥ pitryeṣu vai dvijāḥ

वेद को त्यागने वाला, अग्नियों को छोड़ने वाला, शूद्रा-पत्नी के कारण दूषित, तथा अन्य भी जो निषिद्ध कर्मों में लगे रहते हैं — ऐसे द्विज पितृ-कर्मों में वर्जित हैं।

श्लोक 30 (markandeya.31.30)

निमन्त्रयेत पूर्वेद्युः पूर्वोक्तान् द्विजसत्तमान् । दैवे नियोगे पित्र्ये च तांस्तथैवोपकल्पयेत् ॥ ३१.३० ॥

nimantrayeta pūrvedyuḥ pūrvoktān dvijasattamān daive niyoge pitrye ca tāṃstathaivopakalpayet

पूर्वोक्त उन श्रेष्ठ द्विजों को एक दिन पहले ही आमन्त्रित कर लेना चाहिए — देव-भाग के लिए भी और पितृ-भाग के लिए भी — और उन्हें उसी प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए।

श्लोक 31 (markandeya.31.31)

तैश्च संयतिभिर्भाव्यं यश्च श्राद्धं करिष्यति । श्राद्धं दत्त्वा च भुक्त्वा च मैथुनं योऽनुगच्छति ॥ ३१.३१ ॥

taiśca saṃyatibhirbhāvyaṃ yaśca śrāddhaṃ kariṣyati śrāddhaṃ dattvā ca bhuktvā ca maithunaṃ yo 'nugacchati

उन आमन्त्रित ब्राह्मणों को तथा श्राद्ध करने वाले को संयमी रहना चाहिए; और जो श्राद्ध देकर तथा भोजन करके मैथुन में प्रवृत्त होता है —

श्लोक 32 (markandeya.31.32)

पितरस्तु तयोर्मासं तस्मिन रेतसि शेरते । गत्वा च योषितं श्राद्धे यो भुङ्क्ते यश्च गच्छति ॥ ३१.३२ ॥

pitarastu tayormāsaṃ tasmina retasi śerate gatvā ca yoṣitaṃ śrāddhe yo bhuṅkte yaśca gacchati

उन दोनों के पितर एक मास तक उसी वीर्य में वास करते हैं; तथा जो स्त्री-सङ्ग करके श्राद्ध में भोजन करता है, अथवा भोजन के पश्चात् स्त्री के पास जाता है —

श्लोक 33 (markandeya.31.33)

रेतोमूत्रकृताहारास्तन्मासं पितरस्तयोः । तस्मात्तु प्रथमं कार्यं प्राज्ञेनोपनिमन्त्रणम् ॥ ३१.३३ ॥

retomūtrakṛtāhārāstanmāsaṃ pitarastayoḥ tasmāttu prathamaṃ kāryaṃ prājñenopanimantraṇam

उन दोनों के पितरों को एक मास तक वीर्य और मूत्र ही आहार बन जाता है; इसलिए बुद्धिमान पुरुष का पहला कर्तव्य समय पर ही निमन्त्रण भेजना है।

श्लोक 34 (markandeya.31.34)

अप्राप्तौ तद्दिने चापि वर्ज्या योषित्प्रसङ्गिनः । भिक्षार्थमागतान् वापि काले संयमिनो यतीन् ॥ ३१.३४ ॥

aprāptau taddine cāpi varjyā yoṣitprasaṅginaḥ bhikṣārthamāgatān vāpi kāle saṃyamino yatīn

यदि उस दिन ब्राह्मण उपलब्ध न हों, तो स्त्री-आसक्त पुरुषों को वर्जित करना चाहिए; परन्तु ठीक समय पर भिक्षा के लिए आए संयमी यतियों को —

श्लोक 35 (markandeya.31.35)

भोजयेत् प्रणिपाताद्यैः प्रासाद्य यतमानसः । यथैव शुक्लपक्षाद्वै पितॄणामसितः प्रियः ॥ ३१.३५ ॥

bhojayet praṇipātādyaiḥ prāsādya yatamānasaḥ yathaiva śuklapakṣādvai pitṝṇāmasitaḥ priyaḥ

प्रणिपात आदि से प्रसन्न करके, शान्त मन से भोजन कराना चाहिए — क्योंकि जैसे पितरों को शुक्ल पक्ष से कृष्ण पक्ष अधिक प्रिय है,

श्लोक 36 (markandeya.31.36)

तथापराह्नः पूर्वाह्नात् पितॄणामतिरित्यते । संपूज्य स्वागतेनैतानभ्युपेतान् गृहे द्विजान् ॥ ३१.३६ ॥

tathāparāhnaḥ pūrvāhnāt pitṝṇāmatirityate saṃpūjya svāgatenaitānabhyupetān gṛhe dvijān

वैसे ही पितरों को पूर्वाह्न से अपराह्न अधिक प्रिय है। घर आए इन द्विजों को स्वागत के साथ सम्मानपूर्वक पूजकर —

श्लोक 37 (markandeya.31.37)

पवित्रपाणिराचान्तानासनेषूपवेशयेत् । पितॄणामयुजः कामं युग्मान् दैवे द्विजोत्तमान् ॥ ३१.३७ ॥

pavitrapāṇirācāntānāsaneṣūpaveśayet pitṝṇāmayujaḥ kāmaṃ yugmān daive dvijottamān

पवित्रक हाथ में लेकर, आचमन कर चुके इन ब्राह्मणों को आसनों पर बैठाना चाहिए — यदि चाहे तो पितरों के लिए विषम संख्या में, और देव-भाग के लिए श्रेष्ठ द्विजों को सम संख्या में।

श्लोक 38 (markandeya.31.38)

एकैकं वा पितॄणाञ्च देवानाञ्च स्वशक्तितः । तथा मातामहानाञ्च तुल्यं वा वैश्वदेविकम् ॥ ३१.३८ ॥

ekaikaṃ vā pitṝṇāñca devānāñca svaśaktitaḥ tathā mātāmahānāñca tulyaṃ vā vaiśvadevikam

अथवा अपनी शक्ति के अनुसार पितरों तथा देवताओं के लिए एक-एक ही, और उसी प्रकार नाना (मातामह) के लिए भी, अथवा वैश्वदेव-भाग के लिए भी बराबर संख्या में।

श्लोक 39 (markandeya.31.39)

पृथक् तयोस्तथा चान्ये केचिदिच्छन्ति मानवाः । प्राङ्मुखान्दैवसङ्कल्पान् पैत्र्यान् कुर्यादुदङ्मुखान् ॥ ३१.३९ ॥

pṛthak tayostathā cānye kecidicchanti mānavāḥ prāṅmukhāndaivasaṅkalpān paitryān kuryādudaṅmukhān

कुछ मनुष्य इन दोनों (पितृ और मातामह) के लिए पृथक्-पृथक् चाहते हैं। देव-सङ्कल्प के लिए पूर्वाभिमुख होना चाहिए, और पितृ-सङ्कल्प के लिए उत्तराभिमुख।

श्लोक 40 (markandeya.31.40)

तथैव मातामहानां विधिरुक्तो मनीषिभिः । विष्टरार्थे कुशान् दत्त्वा पूज्य चार्घ्यादिना बुधः ॥ ३१.४० ॥

tathaiva mātāmahānāṃ vidhirukto manīṣibhiḥ viṣṭarārthe kuśān dattvā pūjya cārghyādinā budhaḥ

इसी प्रकार मातामहों के लिए भी विद्वानों द्वारा विधि कही गई है। आसन के लिए कुश देकर, अर्घ्य आदि से पूजकर, बुद्धिमान पुरुष —

श्लोक 41 (markandeya.31.41)

पवित्रकादि वै दत्त्वा तेभ्योऽनुज्ञामवाप्य च । कुर्यादावाहनं प्राज्ञो देवानां मन्त्रतो द्विजः ॥ ३१.४१ ॥

pavitrakādi vai dattvā tebhyo 'nujñāmavāpya ca kuryādāvāhanaṃ prājño devānāṃ mantrato dvijaḥ

पवित्रक आदि देकर तथा उनकी अनुमति प्राप्त कर, बुद्धिमान द्विज मन्त्रपूर्वक देवताओं का आवाहन करे।

श्लोक 42 (markandeya.31.42)

यवाम्भोभिस्तथा चार्घ्यं दत्त्वा वै वैश्वदेविकम् । गन्धमाल्याम्बुधूपञ्च दत्त्वा सम्यक् सदिपकम् ॥ ३१.४२ ॥

yavāmbhobhistathā cārghyaṃ dattvā vai vaiśvadevikam gandhamālyāmbudhūpañca dattvā samyak sadipakam

वैश्वदेव-भाग के लिए भी जौ और जल मिलाकर अर्घ्य देकर, तथा गन्ध, माला, जल, धूप और दीप भी भलीभाँति देकर —

श्लोक 43 (markandeya.31.43)

अपसव्यं पितॄणाञ्च सर्वमेवोपकल्पयेत् । दर्भांश्च द्विगुणान् दत्त्वा तेभ्योऽनुज्ञामवाप्य च ॥ ३१.४३ ॥

apasavyaṃ pitṝṇāñca sarvamevopakalpayet darbhāṃśca dviguṇān dattvā tebhyo 'nujñāmavāpya ca

पितरों के लिए सब कुछ अपसव्य विधि से (यज्ञोपवीत को दाहिने कन्धे पर करके) व्यवस्थित करे, तथा दुगुनी कुश देकर, उनकी अनुमति प्राप्त करके —

श्लोक 44 (markandeya.31.44)

मन्त्रपूर्वं पितॄणाञ्च कुर्यादावाहनं बुधः । अपसव्यं तथा चार्घ्यं यवार्थञ्च तथा तिलैः ॥ ३१.४४ ॥

mantrapūrvaṃ pitṝṇāñca kuryādāvāhanaṃ budhaḥ apasavyaṃ tathā cārghyaṃ yavārthañca tathā tilaiḥ

बुद्धिमान पुरुष मन्त्रपूर्वक पितरों का आवाहन अपसव्य विधि से करे, तथा उसी प्रकार जौ और तिल मिलाकर अर्घ्य दे।

श्लोक 45 (markandeya.31.45)

निष्पादयेन्महाभाग ! पितॄणं प्रीणने रतः । अग्नौ कार्यमनुज्ञातः कुरुष्वेति ततो द्विजैः ॥ ३१.४५ ॥

niṣpādayenmahābhāga ! pitṝṇaṃ prīṇane rataḥ agnau kāryamanujñātaḥ kuruṣveti tato dvijaiḥ

हे महाभाग! पितरों को प्रसन्न करने में तत्पर होकर यह कर्म सम्पन्न करे। तब द्विजों द्वारा अनुमति दिए जाने पर वे कहें — 'अग्नि में यह कर्म करो।'

श्लोक 46 (markandeya.31.46)

जुहुयाद्व्यञ्जनक्षारवर्ज्यमन्नं यथाविधि । अग्नये कव्यवाहाय स्वहेति प्रथमाहुतिः ॥ ३१.४६ ॥

juhuyādvyañjanakṣāravarjyamannaṃ yathāvidhi agnaye kavyavāhāya svaheti prathamāhutiḥ

व्यंजन और क्षार से रहित अन्न विधिपूर्वक होम करे — 'कव्यवाहन अग्नि को स्वाहा' यह पहली आहुति है।

श्लोक 47 (markandeya.31.47)

सोमाय वै पितृमते स्वाहेत्यन्या तथा भवेत् । यमाय प्रेतपतये स्वाहेति त्रितयाहुतिः ॥ ३१.४७ ॥

somāya vai pitṛmate svāhetyanyā tathā bhavet yamāya pretapataye svāheti tritayāhutiḥ

'पितरों वाले सोम को स्वाहा' — यह दूसरी आहुति होती है; 'प्रेतपति यम को स्वाहा' — यह तीसरी आहुति है।

श्लोक 48 (markandeya.31.48)

हुतावशिष्टं दद्याच्च भाजनेषु द्विजन्मनाम् । भाजनालम्भनं कृत्वा दद्याच्चान्नं यथाविधि ॥ ३१.४८ ॥

hutāvaśiṣṭaṃ dadyācca bhājaneṣu dvijanmanām bhājanālambhanaṃ kṛtvā dadyāccānnaṃ yathāvidhi

होम के पश्चात् जो शेष रहे, वह द्विजों के पात्रों में देना चाहिए; पात्रों का स्पर्श कराकर विधिपूर्वक अन्न परोसना चाहिए।

श्लोक 49 (markandeya.31.49)

यथा सुखं जुषध्वं भो इति वाच्यमनिष्ठुरम् । भुञ्जीरंश्च ततस्तेऽपि तच्चित्ता मौनिनः सुखम् ॥ ३१.४९ ॥

yathā sukhaṃ juṣadhvaṃ bho iti vācyamaniṣṭhuram bhuñjīraṃśca tataste 'pi taccittā mauninaḥ sukham

'जैसे सुखपूर्वक हो, वैसे ग्रहण कीजिए, महोदय' — यह कोमलता से कहना चाहिए; तब वे भी उसी में चित्त लगाकर मौन रहकर सुखपूर्वक भोजन करें।

श्लोक 50 (markandeya.31.50)

यद्यदिष्टचतमं तेषां तत्तदन्नमसत्वरम् । अक्रुध्यंश्च नरो दद्यात् सम्भवेन प्रलोभयन् ॥ ३१.५० ॥

yadyadiṣṭacatamaṃ teṣāṃ tattadannamasatvaram akrudhyaṃśca naro dadyāt sambhavena pralobhayan

उन्हें जो-जो अन्न अत्यन्त प्रिय हो, वह शीघ्रता के बिना देना चाहिए; मनुष्य को बिना क्रोध किए, प्रचुरता से प्रलोभित करते हुए देना चाहिए।

श्लोक 51 (markandeya.31.51)

रक्षोघ्रांश्च जपेन्मन्त्रांस्तिलैश्च विकिरेन्महीम् । सिद्धार्थकैश्च रक्षार्थं श्राद्धं हि प्रचुरच्छलम् ॥ ३१.५१ ॥

rakṣoghrāṃśca japenmantrāṃstilaiśca vikirenmahīm siddhārthakaiśca rakṣārthaṃ śrāddhaṃ hi pracuracchalam

राक्षसों को नष्ट करने वाले मन्त्रों का जप करना चाहिए, तथा तिलों से पृथ्वी को बिखेरना चाहिए, और रक्षा के लिए श्वेत सरसों से भी — क्योंकि श्राद्ध में छल की बहुत सम्भावना रहती है।

श्लोक 52 (markandeya.31.52)

पृष्टैस्तृप्तैश्च तृप्ताः स्थ तृप्ताः स्म इति वादिभिः । अनुज्ञातो नरस्त्वन्नं प्रकिरेत् भुवि सर्वतः ॥ ३१.५२ ॥

pṛṣṭaistṛptaiśca tṛptāḥ stha tṛptāḥ sma iti vādibhiḥ anujñāto narastvannaṃ prakiret bhuvi sarvataḥ

पूछे जाने पर वे तृप्त होकर 'हम तृप्त हैं, हम तृप्त हैं' ऐसा कहते हैं; उनकी अनुमति पाकर मनुष्य को अन्न को सब ओर भूमि पर बिखेर देना चाहिए।

श्लोक 53 (markandeya.31.53)

तद्वदाचमनार्थाय दद्यादापः सकृत् सकृत् । अनुज्ञाञ्च ततः प्राप्य यतवाक्कायमानसः ॥ ३१.५३ ॥

tadvadācamanārthāya dadyādāpaḥ sakṛt sakṛt anujñāñca tataḥ prāpya yatavākkāyamānasaḥ

इसी प्रकार आचमन के लिए उन्हें एक-एक बार जल देना चाहिए; फिर उनकी अनुमति प्राप्त कर, वाणी, शरीर और मन को संयत रखकर —

श्लोक 54 (markandeya.31.54)

सतिलेन ततोऽन्नेन पिण्डान् सव्येन पुत्रक ! । पितनुद्दिश्य दर्भेषु दद्यादुच्छिष्टसन्निधौ ॥ ३१.५४ ॥

satilena tato 'nnena piṇḍān savyena putraka ! pitanuddiśya darbheṣu dadyāducchiṣṭasannidhau

हे पुत्र! फिर तिल मिले अन्न से दाहिने हाथ से पिण्ड बनाकर, पितरों का उद्देश्य करते हुए, जूठन के पास ही कुश पर रखकर देना चाहिए।

श्लोक 55 (markandeya.31.55)

पितृतीर्थेन तोयञ्च दद्यात्तेभ्यः समाहितः । पितॄनिद्दिश्य यद्भक्त्या यजमानो नृपात्मज ॥ ३१.५५ ॥

pitṛtīrthena toyañca dadyāttebhyaḥ samāhitaḥ pitṝniddiśya yadbhaktyā yajamāno nṛpātmaja

हे राजपुत्र! यजमान एकाग्रचित्त होकर, भक्तिपूर्वक पितरों का उद्देश्य करते हुए, पितृ-तीर्थ (अंगूठे और तर्जनी के बीच) से उन्हें जल अर्पित करे।

श्लोक 56 (markandeya.31.56)

तद्वन्मातामहानाञ्च दत्त्वा पिण्डान् यथाविधि । गन्धमाल्यादिसंयुक्तं दद्यादाचमनं ततः ॥ ३१.५६ ॥

tadvanmātāmahānāñca dattvā piṇḍān yathāvidhi gandhamālyādisaṃyuktaṃ dadyādācamanaṃ tataḥ

उसी प्रकार मातामहों के लिए भी विधिपूर्वक पिण्ड अर्पित कर, गन्ध-माला आदि से युक्त आचमन का जल देना चाहिए।

श्लोक 57 (markandeya.31.57)

दत्त्वा च तक्षिणां शक्त्या सुस्वधास्त्विति तान् वदेत् । तैश्च तुष्टैस्तथेत्युक्त्वा वाचयेद्वैश्वदेविकान् ॥ ३१.५७ ॥

dattvā ca takṣiṇāṃ śaktyā susvadhāstviti tān vadet taiśca tuṣṭaistathetyuktvā vācayedvaiśvadevikān

फिर शक्ति के अनुसार दक्षिणा देकर उनसे कहना चाहिए — 'आप सुष्वधा (भलीभाँति तृप्त) हों'; और जब वे प्रसन्न होकर 'ऐसा ही हो' कहें, तब वैश्वदेव-भाग वालों से भी वैसा ही कहलवाना चाहिए।

श्लोक 58 (markandeya.31.58)

प्रीयन्तामिति भद्रं वो विश्वेदेवा इतीरयेन् । तथेति चोक्ते तैर्विप्रैः प्रार्थनीयास्तदाशिषः ॥ ३१.५८ ॥

prīyantāmiti bhadraṃ vo viśvedevā itīrayen tatheti cokte tairvipraiḥ prārthanīyāstadāśiṣaḥ

'विश्वेदेव प्रसन्न हों, आपका कल्याण हो' — ऐसा कहना चाहिए; और जब वे ब्राह्मण 'ऐसा ही हो' कहें, तब उनसे आशीर्वाद माँगना चाहिए।

श्लोक 59 (markandeya.31.59)

विसर्जयेत् प्रियाण्युक्त्वा प्रणिपत्य च भक्तितः । आद्वारमनुगच्छेच्चागच्छेच्चानुप्रमोदितः ॥ ३१.५९ ॥

visarjayet priyāṇyuktvā praṇipatya ca bhaktitaḥ ādvāramanugaccheccāgaccheccānupramoditaḥ

प्रिय वचन कहकर तथा भक्तिपूर्वक प्रणाम करके उन्हें विदा करना चाहिए; और द्वार तक उनके पीछे-पीछे जाना चाहिए, फिर प्रसन्न मन से लौट आना चाहिए।

श्लोक 60 (markandeya.31.60)

ततो नित्यक्रियां कुर्याद् भोजयेच्च तथातिथीन् । नित्यक्रियां पितॄणाञ्च केचिदिच्छन्ति सत्तमाः ॥ ३१.६० ॥

tato nityakriyāṃ kuryād bhojayecca tathātithīn nityakriyāṃ pitṝṇāñca kecidicchanti sattamāḥ

इसके बाद अपना नित्य-कर्म करे और अतिथियों को भोजन कराए। कुछ श्रेष्ठ जन नित्य-कर्म को भी पितरों के लिए ही मानना चाहते हैं।

श्लोक 61 (markandeya.31.61)

न पितॄणान्तथैवान्ये शेषं पूर्ववदाचरेत् । पृथक् पाकेन नेत्यन्ये केचित् पूर्वञ्च पूर्ववत् ॥ ३१.६१ ॥

na pitṝṇāntathaivānye śeṣaṃ pūrvavadācaret pṛthak pākena netyanye kecit pūrvañca pūrvavat

अन्य लोग कहते हैं कि यह पितरों के लिए नहीं है; शेष कर्म पूर्ववत् ही करना चाहिए। कुछ पृथक् पाक से करना चाहते हैं, कुछ नहीं; कुछ पूर्व-भाग को पूर्ववत् ही रखना चाहते हैं।

श्लोक 62 (markandeya.31.62)

ततस्तदन्नं भुञ्जीत सह भृत्यादिभिर्नरः । एवं कुर्वोत धर्मज्ञः श्राद्धं पित्र्यं समाहितः ॥ ३१.६२ ॥

tatastadannaṃ bhuñjīta saha bhṛtyādibhirnaraḥ evaṃ kurvota dharmajñaḥ śrāddhaṃ pitryaṃ samāhitaḥ

फिर वह मनुष्य अपने सेवकों आदि के साथ वह अन्न ग्रहण करे। धर्मज्ञ पुरुष को इस प्रकार एकाग्रचित्त होकर पितृ-श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 63 (markandeya.31.63)

यथा वा द्विजमुख्यानां परितोषोऽभिजायते । त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रं कुतपस्तिलाः ॥ ३१.६३ ॥

yathā vā dvijamukhyānāṃ paritoṣo 'bhijāyate trīṇi śrāddhe pavitrāṇi dauhitraṃ kutapastilāḥ

अथवा जिस प्रकार से श्रेष्ठ द्विजों को सन्तोष प्राप्त हो, वैसे ही करना चाहिए। श्राद्ध में तीन वस्तुएँ पवित्र मानी गई हैं — दौहित्र (बेटी का पुत्र), कुतप (एक शुभ मुहूर्त) और तिल।

श्लोक 64 (markandeya.31.64)

वर्ज्यानि चाहुर्विप्रेन्द्र ! कोपोऽध्वगमनं त्वरा । राजतञ्च तथा पात्रं शस्तं श्राद्धेषु पुत्रक ! ॥ ३१.६४ ॥

varjyāni cāhurviprendra ! kopo 'dhvagamanaṃ tvarā rājatañca tathā pātraṃ śastaṃ śrāddheṣu putraka !

हे विप्रेन्द्र! क्रोध, यात्रा पर जाना, और शीघ्रता — ये वर्जित कहे गए हैं; और हे पुत्र! श्राद्धों में चाँदी का पात्र प्रशस्त माना गया है।

श्लोक 65 (markandeya.31.65)

रजतस्य तथा कार्यं दर्शनं दानमेव वा । राजते हि स्वधा दुग्धा पितृभिः श्रूयते मही । तस्मात् पितॄणां रजतमभीष्टं प्रीतिवर्धनम् ॥ ३१.६५ ॥

rajatasya tathā kāryaṃ darśanaṃ dānameva vā rājate hi svadhā dugdhā pitṛbhiḥ śrūyate mahī tasmāt pitṝṇāṃ rajatamabhīṣṭaṃ prītivardhanam

चाँदी का दर्शन अथवा दान भी करना चाहिए; क्योंकि सुना जाता है कि पितरों द्वारा दुही गई स्वधा से ही यह पृथ्वी चाँदी-सी चमकती (राजते) है। इसलिए पितरों को चाँदी अत्यन्त प्रिय है और उनकी प्रसन्नता बढ़ाने वाली है।

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