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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 32

श्राद्ध कल्प

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

श्लोक 1 (markandeya.32.1)

मदालसोवाच अतः परं शृणुष्वेमं पुत्र ! भक्त्या यदाहृतम् । पितॄणां प्रीतये यद्वा वर्ज्यं वा प्रीतिकारकम् ॥ ३२.१ ॥

madālasovāca ataḥ paraṃ śṛṇuṣvemaṃ putra ! bhaktyā yadāhṛtam pitṝṇāṃ prītaye yadvā varjyaṃ vā prītikārakam

मदालसा ने कहा — हे पुत्र! अब इसके आगे भक्तिपूर्वक कहे गए इस विषय को सुनो — पितरों की प्रसन्नता के लिए क्या वर्जित है और क्या प्रीतिकारक है।

श्लोक 2 (markandeya.32.2)

मासं पितॄणां तृप्तिश्च हविष्यान्नेन जायते । मासद्वयं मत्स्यमांसैस्तृप्तिं यान्ति पितामहाः ॥ ३२.२ ॥

māsaṃ pitṝṇāṃ tṛptiśca haviṣyānnena jāyate māsadvayaṃ matsyamāṃsaistṛptiṃ yānti pitāmahāḥ

हविष्य अन्न से पितरों की तृप्ति एक मास तक होती है; मछली के मांस से पितामह लोग दो मास तक तृप्ति पाते हैं।

श्लोक 3 (markandeya.32.3)

त्रीन् मासान् हारिणां मांसं विज्ञेयं पितृतृप्तये । चतुर्मासांस्तु पुष्णाति शशस्य पिशितं पितॄन् ॥ ३२.३ ॥

trīn māsān hāriṇāṃ māṃsaṃ vijñeyaṃ pitṛtṛptaye caturmāsāṃstu puṣṇāti śaśasya piśitaṃ pitṝn

हिरण के मांस को पितृ-तृप्ति के लिए तीन मास तक जानना चाहिए; खरगोश का मांस पितरों को चार मास तक तृप्त रखता है।

श्लोक 4 (markandeya.32.4)

शाकुनं पञ्च वै मासान् षण्मासान् शूकरामिषम् । छागलं सप्त वै मासानैणेयञ्चाष्टमासिकीम् ॥ ३२.४ ॥

śākunaṃ pañca vai māsān ṣaṇmāsān śūkarāmiṣam chāgalaṃ sapta vai māsānaiṇeyañcāṣṭamāsikīm

पक्षी का मांस पाँच मास तक, शूकर का मांस छह मास तक, बकरे का मांस सात मास तक, तथा हिरणी (ऐणेय) का मांस आठ मास तक तृप्ति देता है।

श्लोक 5 (markandeya.32.5)

करोति तृप्तिं नव वै रुरोर्मांसं न संशयः । गवयस्यामिषं तृप्तिं करोति दशमासिकीम् ॥ ३२.५ ॥

karoti tṛptiṃ nava vai rurormāṃsaṃ na saṃśayaḥ gavayasyāmiṣaṃ tṛptiṃ karoti daśamāsikīm

निःसन्देह रुरु मृग का मांस नौ मास तक तृप्ति करता है; गवय (जंगली बैल) का मांस दस मास तक तृप्ति करता है।

श्लोक 6 (markandeya.32.6)

तथैकादशमासंस्तु औरभ्रं पितृतृप्तिदम् । संवत्सरं तथा गव्यं पयः पायसमेव वा ॥ ३२.६ ॥

tathaikādaśamāsaṃstu aurabhraṃ pitṛtṛptidam saṃvatsaraṃ tathā gavyaṃ payaḥ pāyasameva vā

उसी प्रकार भेड़ का मांस ग्यारह मास तक पितरों को तृप्त करने वाला है; तथा गाय का दूध या खीर एक वर्ष तक तृप्ति देती है।

श्लोक 7 (markandeya.32.7)

वाध्रीणसामिषं लौहं कालशाकन्तथा मधु । दौहित्रामिषमन्यच्च यच्चान्यत् स्वकुलोद्भवैः ॥ ३२.७ ॥

vādhrīṇasāmiṣaṃ lauhaṃ kālaśākantathā madhu dauhitrāmiṣamanyacca yaccānyat svakulodbhavaiḥ

वाध्रीणस (एक बड़े बकरे) का रक्तवर्ण मांस, कालशाक और मधु, दौहित्र द्वारा अर्पित मांस, तथा अपने ही कुल में उत्पन्न अन्य वस्तुएँ —

श्लोक 8 (markandeya.32.8)

अनन्तां वै प्रयच्छन्ति तृप्तिं गौरीसुतस्तथा । पितॄणां नात्र सन्देहो गायाश्राद्धञ्च पुत्रक ॥ ३२.८ ॥

anantāṃ vai prayacchanti tṛptiṃ gaurīsutastathā pitṝṇāṃ nātra sandeho gāyāśrāddhañca putraka

हे पुत्र! ये तथा गौरी की सन्तान भी पितरों को अनन्त तृप्ति देती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है; और गया में किया गया श्राद्ध भी।

श्लोक 9 (markandeya.32.9)

श्यामाकराजश्यामाकौ तद्वच्चैव प्रसातिकाः । नीवाराः पौष्कलाश्चैव धान्यानां पितृतृप्तये ॥ ३२.९ ॥

śyāmākarājaśyāmākau tadvaccaiva prasātikāḥ nīvārāḥ pauṣkalāścaiva dhānyānāṃ pitṛtṛptaye

श्यामाक और राजश्यामाक, तथा उसी प्रकार प्रसातिक, नीवार और पौष्कल अन्न — ये सब धान्यों में पितृ-तृप्ति के लिए उत्तम हैं।

श्लोक 10 (markandeya.32.10)

यवव्रीहिसगोधूमतिला मुद्गाः ससर्षपाः । प्रियङ्गवः कोविदारा निष्पावाश्चातिशोभनाः ॥ ३२.१० ॥

yavavrīhisagodhūmatilā mudgāḥ sasarṣapāḥ priyaṅgavaḥ kovidārā niṣpāvāścātiśobhanāḥ

जौ, चावल, गेहूँ और तिल के साथ, मूँग सरसों के साथ, प्रियंगु, कोविदार तथा निष्पाव — ये अत्यन्त शोभनीय हैं।

श्लोक 11 (markandeya.32.11)

वर्ज्या मर्कटकाः श्राद्धे राजमाषास्तथाणवः । विप्राषिका मसूराश्च श्राद्धकर्मणि गर्हिताः ॥ ३२.११ ॥

varjyā markaṭakāḥ śrāddhe rājamāṣāstathāṇavaḥ viprāṣikā masūrāśca śrāddhakarmaṇi garhitāḥ

श्राद्ध में मर्कटक, राजमाष तथा अणु अन्न वर्जित हैं; विप्राषिका और मसूर भी श्राद्ध-कर्म में निन्दित माने गए हैं।

श्लोक 12 (markandeya.32.12)

लशुनं गृञ्जनञ्चैव पलाण्डं,पिण्डमूलकम् । करम्भं यानि चान्यानि हीनानि रसवर्णतः ॥ ३२.१२ ॥

laśunaṃ gṛñjanañcaiva palāṇḍaṃ,piṇḍamūlakam karambhaṃ yāni cānyāni hīnāni rasavarṇataḥ

लहसुन, गृंजन (एक प्रकार का प्याज), प्याज, मूली की गाँठ, करम्भ (एक मिश्रित दही-व्यंजन), तथा अन्य जो भी रस और वर्ण में हीन हों —

श्लोक 13 (markandeya.32.13)

गान्धारिकामलाबूनि लवणान्यूषराणि च । आरक्ता ये च निर्यासाः प्रत्यक्षलवणानि च ॥ ३२.१३ ॥

gāndhārikāmalābūni lavaṇānyūṣarāṇi ca āraktā ye ca niryāsāḥ pratyakṣalavaṇāni ca

गान्धारिक तथा कद्दू-लौकी, नमक और ऊसर भूमि से उत्पन्न वस्तुएँ, रक्त-वर्ण के गोंद, तथा सीधे प्राप्त नमक —

श्लोक 14 (markandeya.32.14)

वर्ज्यान्येतानि वै श्राद्धे यच्च वाचा न शस्यते । यच्चोत्कोचादिना प्राप्तं पतिताद्यदुपार्जितम् ॥ ३२.१४ ॥

varjyānyetāni vai śrāddhe yacca vācā na śasyate yaccotkocādinā prāptaṃ patitādyadupārjitam

ये सब श्राद्ध में वर्जित हैं, तथा जो कुछ शास्त्र-वचन से प्रशंसित नहीं है, वह भी; और जो घूस आदि से प्राप्त हो, या किसी पतित पुरुष से अर्जित हो —

श्लोक 15 (markandeya.32.15)

अन्यायकन्याशुल्कोत्थं द्रव्यञ्चात्र विगर्हितम् । दुर्गन्धि फेनिलञ्चाम्बु तथैवाल्पतरोदकम् ॥ ३२.१५ ॥

anyāyakanyāśulkotthaṃ dravyañcātra vigarhitam durgandhi phenilañcāmbu tathaivālpatarodakam

कन्या के अन्यायपूर्ण शुल्क से उत्पन्न धन भी यहाँ निन्दित है; दुर्गन्धित तथा फेनयुक्त जल, और उसी प्रकार अत्यन्त अल्प जल भी —

श्लोक 16 (markandeya.32.16)

न लभेद्यत्र गौस्तृप्तिं नक्तं यच्चाप्युपाहृतम् । यन्न सर्वापचोत्सृष्टं यच्चाभोज्यं निपानजम् ॥ ३२.१६ ॥

na labhedyatra gaustṛptiṃ naktaṃ yaccāpyupāhṛtam yanna sarvāpacotsṛṣṭaṃ yaccābhojyaṃ nipānajam

जहाँ गाय भी तृप्ति न पा सके, जो रात में लाया गया हो, जो सबके लिए सुलभ न हो, तथा जो पनघट का अपेय जल हो —

श्लोक 17 (markandeya.32.17)

तद्वर्ज्यं सलिलं तात ! सदैव पितृकर्मणि । मार्गमाविकमौष्ट्रञ्च सर्वमैकशफञ्च यत् ॥ ३२.१७ ॥

tadvarjyaṃ salilaṃ tāta ! sadaiva pitṛkarmaṇi mārgamāvikamauṣṭrañca sarvamaikaśaphañca yat

हे तात! ऐसा जल पितृ-कर्म में सदैव वर्जित है। मार्ग की भेड़, ऊँटनी, तथा एक खुर वाले पशुओं का सारा दूध भी वर्जित है —

श्लोक 18 (markandeya.32.18)

माहिषञ्चामरञ्चैव धेन्वा गोश्चाप्यनिर्दशम् । पित्रर्थं मे प्रयच्छस्वेत्युक्त्वा यच्चाप्युपाहृतम् ॥ ३२.१८ ॥

māhiṣañcāmarañcaiva dhenvā goścāpyanirdaśam pitrarthaṃ me prayacchasvetyuktvā yaccāpyupāhṛtam

भैंस, चमरी गाय, तथा दस दिन के भीतर की गाय का दूध भी वर्जित है; और 'यह मेरे पितर के लिए दो' — ऐसा कहकर माँगा गया दूध भी वर्जित है।

श्लोक 19 (markandeya.32.19)

वर्जनीयं सदा सदिभस्तत्पयः श्राद्धकर्मणि । वर्ज्या जन्तुमती रूक्षा क्षितिः प्लुष्टा तथाग्निना ॥ ३२.१९ ॥

varjanīyaṃ sadā sadibhastatpayaḥ śrāddhakarmaṇi varjyā jantumatī rūkṣā kṣitiḥ pluṣṭā tathāgninā

ऐसा दूध श्राद्ध-कर्म में विद्वानों द्वारा सदा वर्जित माना गया है; कीड़ों से भरी, रूखी, तथा अग्नि से जली हुई भूमि भी वर्जित है।

श्लोक 20 (markandeya.32.20)

अनिष्टदुष्टशब्दोग्रदुर्गन्धा चात्र कर्मणि । कुलापमानकाः श्राद्धे व्यायुज्य कुलहिंसकाः ॥ ३२.२० ॥

aniṣṭaduṣṭaśabdogradurgandhā cātra karmaṇi kulāpamānakāḥ śrāddhe vyāyujya kulahiṃsakāḥ

इस कर्म में अनिष्ट, कर्कश ध्वनि तथा उग्र दुर्गन्ध वाला स्थान भी वर्जित है; कुल का अपमान करने वाले तथा कुल का हिंसक श्राद्ध से दूर रखे जाएँ।

श्लोक 21 (markandeya.32.21)

नग्नाः पातकिनश्चैव हन्युर्दृष्ट्या पितृक्रियाम् । अपुमानपविद्धश्च कुक्कुटो ग्रामशूकरः ॥ ३२.२१ ॥

nagnāḥ pātakinaścaiva hanyurdṛṣṭyā pitṛkriyām apumānapaviddhaśca kukkuṭo grāmaśūkaraḥ

नग्न पुरुष तथा पापी लोग केवल दृष्टि मात्र से ही पितृ-कर्म को नष्ट कर देते हैं; तथा नपुंसक, बहिष्कृत पुरुष, मुर्गा और गाँव का सूअर भी।

श्लोक 22 (markandeya.32.22)

श्वा चैव हन्ति श्राद्धानि यातुधानाश्च दर्शनात् । तस्मात् सुसंवृतो दद्यात्तिलैश्चावकिरन्महीम् ॥ ३२.२२ ॥

śvā caiva hanti śrāddhāni yātudhānāśca darśanāt tasmāt susaṃvṛto dadyāttilaiścāvakiranmahīm

कुत्ता तथा राक्षस भी केवल दिखाई देने मात्र से श्राद्ध को नष्ट कर देते हैं; इसलिए भलीभाँति घिरे स्थान में तथा तिल बिखेरते हुए श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 23 (markandeya.32.23)

एवं रक्षा भवेच्छ्राद्धे कृता तातोभयोरपि । शावसूतकसंस्पृष्टं दीर्घरोगिभिरेव च ॥ ३२.२३ ॥

evaṃ rakṣā bhavecchrāddhe kṛtā tātobhayorapi śāvasūtakasaṃspṛṣṭaṃ dīrgharogibhireva ca

हे तात! इस प्रकार दोनों ही कारणों से श्राद्ध में रक्षा करनी चाहिए। मृतक-सूतक से स्पर्शित, तथा दीर्घ रोगियों द्वारा —

श्लोक 24 (markandeya.32.24)

पतितैर्मलिनैश्चैव न पुष्णाति पितामहान् । वर्जनीयं तथा श्राद्धे तथोदक्याश्च दर्शनम् ॥ ३२.२४ ॥

patitairmalinaiścaiva na puṣṇāti pitāmahān varjanīyaṃ tathā śrāddhe tathodakyāśca darśanam

या पतितों और मलिनों द्वारा स्पर्श किया गया अन्न पितामहों को तृप्त नहीं करता; उसी प्रकार श्राद्ध में रजस्वला स्त्री का दर्शन भी वर्जित है।

श्लोक 25 (markandeya.32.25)

मुण्डशौण्डसमाभ्यासो यजमानेन यादरात् । केशकीटावपन्नञ्च तथाश्वभिरवेक्षितम् ॥ ३२.२५ ॥

muṇḍaśauṇḍasamābhyāso yajamānena yādarāt keśakīṭāvapannañca tathāśvabhiravekṣitam

यजमान का मुण्डित सिर वाले या मद्यप के साथ असावधानीपूर्वक मेल-जोल, बाल या कीड़े गिरा हुआ अन्न, तथा कुत्तों द्वारा देखा गया अन्न —

श्लोक 26 (markandeya.32.26)

पूति पर्युषितञ्चैव वार्ताक्यभिषवांस्तथा । वर्जनीयानि वै श्राद्धे यच्च वस्त्रानिलाहतम् ॥ ३२.२६ ॥

pūti paryuṣitañcaiva vārtākyabhiṣavāṃstathā varjanīyāni vai śrāddhe yacca vastrānilāhatam

सड़ा हुआ, बासी, बैंगन तथा किण्वित रस — ये सब श्राद्ध में वर्जित हैं, और वह भी जो वस्त्र से होकर हवा के स्पर्श में आया हो।

श्लोक 27 (markandeya.32.27)

श्रद्धया परया दत्तं पितॄणां नामगोत्रतः । यदाहारास्तु ते जातास्तदाहारत्वमेति तत् ॥ ३२.२७ ॥

śraddhayā parayā dattaṃ pitṝṇāṃ nāmagotrataḥ yadāhārāstu te jātāstadāhāratvameti tat

जो कुछ परम श्रद्धा से पितरों के नाम और गोत्र का उच्चारण करके दिया जाता है, वह उन्हें उसी रूप में आहार बन जाता है, जिस योनि में वे उत्पन्न हुए हैं।

श्लोक 28 (markandeya.32.28)

तस्मात् श्रद्धावता पात्रे यच्छस्तं पितृकर्मणि । यथावच्चैव दातव्यं पितॄणां तृप्तिमिच्छता ॥ ३२.२८ ॥

tasmāt śraddhāvatā pātre yacchastaṃ pitṛkarmaṇi yathāvaccaiva dātavyaṃ pitṝṇāṃ tṛptimicchatā

इसलिए पितरों की तृप्ति चाहने वाले को श्रद्धावान होकर, पितृ-कर्म में जो प्रशस्त कहा गया है, वह यथाविधि सुपात्र को ही देना चाहिए।

श्लोक 29 (markandeya.32.29)

योगिनश्च सदा श्राद्धे भोजनीया विपश्चिता । योगाधारा हि पिररस्तस्मात् तान् पूजयेत् सदा ॥ ३२.२९ ॥

yoginaśca sadā śrāddhe bhojanīyā vipaścitā yogādhārā hi pirarastasmāt tān pūjayet sadā

योगीजन विद्वान होने के कारण श्राद्ध में सदैव भोजन कराने योग्य हैं; क्योंकि पितर योग के ही आधार पर टिके रहते हैं, इसलिए उन्हें सदा पूजना चाहिए।

श्लोक 30 (markandeya.32.30)

ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यो योगी त्वग्राशनी यदि । यजमानञ्च भोक्तॄंश्च नौरिवाम्भसि तारयेत् ॥ ३२.३० ॥

brāhmaṇānāṃ sahasrebhyo yogī tvagrāśanī yadi yajamānañca bhoktṝṃśca naurivāmbhasi tārayet

यदि केवल अग्रभोजी एक ही योगी उपस्थित हो, तो वह हज़ार ब्राह्मणों से बढ़कर है; वह यजमान और भोजन करने वालों को नाव के समान जल में पार लगा देता है।

श्लोक 31 (markandeya.32.31)

पितृगाथास्तथवात्र गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः । या गीताः पितृभिः पूर्वमैलस्यासीन्महीपतेः ॥ ३२.३१ ॥

pitṛgāthāstathavātra gīyante brahmavādibhiḥ yā gītāḥ pitṛbhiḥ pūrvamailasyāsīnmahīpateḥ

यहाँ ब्रह्मवादियों द्वारा पितृ-गाथाएँ भी गाई जाती हैं, जो पूर्वकाल में ऐल राजा के पितरों द्वारा गाई गई थीं।

श्लोक 32 (markandeya.32.32)

कदा नः सन्ततावग्र्यः कस्यचिद् भविता सुतः । यो योगिभुक्तशोषान्नो भुवि पिण्डं प्रदास्यति ॥ ३२.३२ ॥

kadā naḥ santatāvagryaḥ kasyacid bhavitā sutaḥ yo yogibhuktaśoṣānno bhuvi piṇḍaṃ pradāsyati

'हमारी सन्तान में कभी किसी का श्रेष्ठ पुत्र होगा, जो योगियों के भोजन से बचे शेष अन्न से भी पृथ्वी पर हमें पिण्ड देगा?'

श्लोक 33 (markandeya.32.33)

गयायामथवा पिण्डं खड्गमांसं महाहविः । कालशाकं तिलाढ्यं वा कृसरं मासतृप्तये ॥ ३२.३३ ॥

gayāyāmathavā piṇḍaṃ khaḍgamāṃsaṃ mahāhaviḥ kālaśākaṃ tilāḍhyaṃ vā kṛsaraṃ māsatṛptaye

अथवा गया में पिण्डदान, खड्ग (गैंडे) का मांस — जो महान हवि है — कालशाक, तिल से भरपूर भोजन, अथवा एक मास की तृप्ति के लिए कृसर (तिल-चावल का व्यंजन) —

श्लोक 34 (markandeya.32.34)

वैश्वदेवञ्च सौम्यञ्च खड्गमांसं परं हविः । विषाणवर्ज्यखड्गाप्त्या आसूर्यञ्चाश्नुवामहे ॥ ३२.३४ ॥

vaiśvadevañca saumyañca khaḍgamāṃsaṃ paraṃ haviḥ viṣāṇavarjyakhaḍgāptyā āsūryañcāśnuvāmahe

खड्ग का मांस वैश्वदेव और सौम्य दोनों भागों के लिए सर्वोत्तम हवि है; सींग रहित खड्ग को प्राप्त कर हम सूर्य-मण्डल तक व्याप्त तृप्ति का उपभोग करते हैं।

श्लोक 35 (markandeya.32.35)

दद्यात् श्राद्धं त्रयोदश्यां मघासु च यथाविधि । मधुसर्पिः समायुक्तं पायसं दक्षिणायने ॥ ३२.३५ ॥

dadyāt śrāddhaṃ trayodaśyāṃ maghāsu ca yathāvidhi madhusarpiḥ samāyuktaṃ pāyasaṃ dakṣiṇāyane

त्रयोदशी तिथि को तथा मघा नक्षत्र में विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए, दक्षिणायन में मधु और घी से युक्त खीर अर्पित करते हुए।

श्लोक 36 (markandeya.32.36)

तस्मात् सम्पूजयेत् भक्त्या स्वपितॄन् पुत्र मानवः । कामानभीप्सन् सकलान् पापाच्चात्मविमोचनम् ॥ ३२.३६ ॥

tasmāt sampūjayet bhaktyā svapitṝn putra mānavaḥ kāmānabhīpsan sakalān pāpāccātmavimocanam

इसलिए, हे पुत्र! सारी कामनाओं की सिद्धि तथा पाप से आत्मा की मुक्ति चाहने वाले मनुष्य को भक्तिपूर्वक अपने पितरों की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 37 (markandeya.32.37)

वसून् रुद्रांस्तथादित्यान्नक्षत्रग्रहतारकाः । प्रीणयन्ति मनुष्याणां पितरः श्राद्धतर्पिताः ॥ ३२.३७ ॥

vasūn rudrāṃstathādityānnakṣatragrahatārakāḥ prīṇayanti manuṣyāṇāṃ pitaraḥ śrāddhatarpitāḥ

श्राद्ध से तृप्त हुए पितर वसुओं, रुद्रों, आदित्यों तथा नक्षत्रों, ग्रहों और तारों को मनुष्यों की ओर से प्रसन्न करते हैं।

श्लोक 38 (markandeya.32.38)

आयुः प्रज्ञां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च । प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिताः ॥ ३२.३८ ॥

āyuḥ prajñāṃ dhanaṃ vidyāṃ svargaṃ mokṣaṃ sukhāni ca prayacchanti tathā rājyaṃ pitaraḥ śrāddhatarpitāḥ

श्राद्ध से तृप्त हुए पितर आयु, बुद्धि, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख तथा राज्य भी प्रदान करते हैं।

श्लोक 39 (markandeya.32.39)

एतत् ते पुत्र ! कथितं श्राद्धकर्म यथोदितम् । काम्यानां श्रूयतां वत्स ! श्राद्धानां तिथिकीर्तनम् ॥ ३२.३९ ॥

etat te putra ! kathitaṃ śrāddhakarma yathoditam kāmyānāṃ śrūyatāṃ vatsa ! śrāddhānāṃ tithikīrtanam

हे पुत्र! यह श्राद्ध-कर्म तुम्हें यथावत् बता दिया गया। अब, हे वत्स! काम्य श्राद्धों की तिथियों का वर्णन सुनो।

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33