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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 46

ब्रह्मा की आयु का प्रमाण

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

श्लोक 1 (markandeya.46.1)

क्रौष्टुकिरुवाच भगवंस्त्वण्डसम्भूतिर्यथावत् कथिता मम । ब्रह्माण्डे ब्रह्मणो जन्म तथा चोक्तं महात्मनः ॥ 46.1 ॥

krauṣṭukiruvāca bhagavaṁstvaṇḍasambhūtiryathāvat kathitā mama brahmāṇḍe brahmaṇo janma tathā coktaṁ mahātmanaḥ

क्रौष्टुकि ने कहा — हे भगवन्! आपने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का यथावत् वर्णन मुझसे किया, और उसी ब्रह्माण्ड में महात्मा ब्रह्मा के जन्म का भी वर्णन किया।

श्लोक 2 (markandeya.46.2)

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तो भृगुकुलोद्भव । यदान सृष्टिर्भूतानामस्ति किन्नु न चास्ति वा । काले वै प्रलयस्यान्ते सर्वस्मिन्नुपसंहृते ॥ 46.2 ॥

etadicchāmyahaṁ śrotuṁ tvatto bhṛgukulodbhava yadāna sṛṣṭirbhūtānāmasti kinnu na cāsti vā kāle vai pralayasyānte sarvasminnupasaṁhṛte

हे भृगुकुल में उत्पन्न हुए मुनि! मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि प्रलय के अन्त में, जब सब कुछ समेट लिया जाता है, उस समय क्या प्राणियों की सृष्टि होती है या नहीं होती।

श्लोक 3 (markandeya.46.3)

मार्कण्डेय उवाच यदा तु प्रकृतौ याति लयं विश्वमिदं जगत् । तदोच्यते प्राकृतोऽयं विद्वद्भिः प्रतिसञ्चरः ॥ 46.3 ॥

mārkaṇḍeya uvāca yadā tu prakṛtau yāti layaṁ viśvamidaṁ jagat tadocyate prākṛto'yaṁ vidvadbhiḥ pratisañcaraḥ

मार्कण्डेय ने कहा — जब यह सम्पूर्ण जगत् प्रकृति में लय को प्राप्त होता है, तब विद्वानों द्वारा उसे 'प्राकृत प्रतिसंचर' (प्राकृतिक प्रलय) कहा जाता है।

श्लोक 4 (markandeya.46.4)

स्वात्मन्यवस्थितेव्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते । प्रकृतिः पुरुषश्चैव साधर्म्येणावतिष्ठतः ॥ 46.4 ॥

svātmanyavasthitevyakte vikāre pratisaṁhṛte prakṛtiḥ puruṣaścaiva sādharmyeṇāvatiṣṭhataḥ

जब यह व्यक्त विकार समेट लिया जाता है और अपने ही स्वरूप में स्थित रहता है, तब प्रकृति और पुरुष दोनों समान धर्म से (समरूप होकर) स्थित रहते हैं।

श्लोक 5 (markandeya.46.5)

तदा तमश्च सत्त्वञ्च समत्वेन व्यवस्थितौ । अनुद्रिक्तावनूनौ च तत्प्रोतौ च परस्परम् ॥ 46.5 ॥

tadā tamaśca sattvañca samatvena vyavasthitau anudriktāvanūnau ca tatprotau ca parasparam

उस समय तम और सत्त्व समत्व से स्थित रहते हैं, न कोई अधिक होता है न कम, और वे परस्पर एक-दूसरे में गुँथे रहते हैं।

श्लोक 6 (markandeya.46.6)

तिलेषु वा यथा तैलं घृतं पयसि वा स्थितम् । तथा तमसि सत्त्वे च रजोऽप्यनुसृतं स्थितम् ॥ 46.6 ॥

tileṣu vā yathā tailaṁ ghṛtaṁ payasi vā sthitam tathā tamasi sattve ca rajo'pyanusṛtaṁ sthitam

जिस प्रकार तिलों में तेल और दूध में घी अव्यक्त रूप से रहता है, उसी प्रकार तम और सत्त्व में भी रज व्याप्त होकर स्थित रहता है।

श्लोक 7 (markandeya.46.7)

उत्पत्तिर्ब्रह्मणो यावदायुषो द्विपरार्धिकम् । तावद्दिनं परेशस्य तत्समा संयमे निशा ॥ 46.7 ॥

utpattirbrahmaṇo yāvadāyuṣo dviparārdhikam tāvaddinaṁ pareśasya tatsamā saṁyame niśā

ब्रह्मा की उत्पत्ति से लेकर उनकी आयु के दो परार्ध पूर्ण होने तक जो काल है, वही परमेश्वर का 'दिन' कहलाता है; उतना ही काल संयम (लय) में बीतने पर उनकी 'रात्रि' कहलाती है।

श्लोक 8 (markandeya.46.8)

अहर्मुखे प्रबुद्धस्तु जगदादिरनादिमान् । सर्वहेतुरचिन्त्यात्मा परः कोऽप्यपरक्रियः ॥ 46.8 ॥

aharmukhe prabuddhastu jagadādiranādimān sarvaheturacintyātmā paraḥ ko'pyaparakriyaḥ

दिन के आरम्भ में जागृत होने वाला वह जगत् का आदि कारण, अनादि, सबका हेतु, अचिन्त्य स्वरूप, परम तथा किसी अन्य क्रिया से रहित स्वतन्त्र सत्ता है।

श्लोक 9 (markandeya.46.9)

प्रकृतिं पुरुषञ्चैव प्राविश्याशु जगत्पतिः । क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः ॥ 46.9 ॥

prakṛtiṁ puruṣañcaiva prāviśyāśu jagatpatiḥ kṣobhayāmāsa yogena pareṇa parameśvaraḥ

जगत्पति परमेश्वर ने शीघ्र ही प्रकृति और पुरुष दोनों में प्रवेश करके अपनी परम योगशक्ति से उन्हें क्षुब्ध कर दिया।

श्लोक 10 (markandeya.46.10)

यथा मदो नवस्त्रीणां यथा वा माधवानिलः । अनुप्रविष्टः क्षोभाय तथासौ योगमूर्तिमान् ॥ 46.10 ॥

yathā mado navastrīṇāṁ yathā vā mādhavānilaḥ anupraviṣṭaḥ kṣobhāya tathāsau yogamūrtimān

जिस प्रकार नवयौवना स्त्री में मद और वसन्त की वायु वृक्षों में प्रवेश करके उन्हें क्षुब्ध कर देती है, उसी प्रकार वह योगमूर्ति परमेश्वर उनमें प्रविष्ट होकर उन्हें क्षुब्ध करने लगा।

श्लोक 11 (markandeya.46.11)

प्रधाने क्षोभ्यमाने तु स देवो ब्रह्मसंज्ञितः । समुत्पन्नोऽण्डकोषस्थो यथा ते कथितं मया ॥ 46.11 ॥

pradhāne kṣobhyamāne tu sa devo brahmasaṁjñitaḥ samutpanno'ṇḍakoṣastho yathā te kathitaṁ mayā

जब प्रधान (मूल प्रकृति) इस प्रकार क्षुब्ध हुआ, तब ब्रह्मा नामक वह देव, जैसा मैंने तुम्हें पहले बताया था, अण्ड के कोश के भीतर उत्पन्न हुआ।

श्लोक 12 (markandeya.46.12)

स एव क्षोभकः पूर्वं स क्षोभ्यः प्रकृतेः पतिः । स सङ्कोचविकाशाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थितः ॥ 46.12 ॥

sa eva kṣobhakaḥ pūrvaṁ sa kṣobhyaḥ prakṛteḥ patiḥ sa saṅkocavikāśābhyāṁ pradhānatve'pi ca sthitaḥ

वही पहले क्षोभ करने वाला था और वही क्षुब्ध होने वाला भी, वही प्रकृति का स्वामी है; वह संकोच और विकास दोनों के द्वारा प्रधानरूप में भी स्थित रहता है।

श्लोक 13 (markandeya.46.13)

अत्पन्नः स जगद्योनिरगुणोऽपि रजोगुणम् । भुञ्जन् प्रवर्तते सर्गे ब्रह्मत्वं समुपाश्रितः ॥ 46.13 ॥

atpannaḥ sa jagadyoniraguṇo'pi rajoguṇam bhuñjan pravartate sarge brahmatvaṁ samupāśritaḥ

इस प्रकार उत्पन्न हुआ वह जगत् की योनि, गुणों से रहित होते हुए भी रजोगुण का आश्रय लेकर, ब्रह्मत्व को प्राप्त कर सृष्टि-कार्य में प्रवृत्त होता है।

श्लोक 14 (markandeya.46.14)

ब्रह्मत्वे स प्रजाः सृष्ट्वा ततः सत्त्वातिरेकवान् । विष्णुत्वमेत्य धर्मेण कुरुते परिपालनम् ॥ 46.14 ॥

brahmatve sa prajāḥ sṛṣṭvā tataḥ sattvātirekavān viṣṇutvametya dharmeṇa kurute paripālanam

ब्रह्मा के रूप में प्रजाओं की सृष्टि करके, तत्पश्चात् सत्त्वगुण की अधिकता से युक्त होकर वह विष्णुत्व को प्राप्त करता है और धर्मपूर्वक सबका पालन करता है।

श्लोक 15 (markandeya.46.15)

ततस्तमोगुणोद्रिक्तो रुद्रत्वे चाखिलं जगत् । उपसंहृत्य वै शेते त्रैलोक्यं त्रिगुणोऽगुणः ॥ 46.15 ॥

tatastamoguṇodrikto rudratve cākhilaṁ jagat upasaṁhṛtya vai śete trailokyaṁ triguṇo'guṇaḥ

फिर तमोगुण से अभिभूत होकर रुद्ररूप में वह सम्पूर्ण जगत् को समेटकर लेट जाता है — यद्यपि वह त्रिगुणों से युक्त प्रतीत होकर भी वस्तुतः गुणरहित ही है।

श्लोक 16 (markandeya.46.16)

यथा प्राग्व्यापकः क्षेत्री पालको लावकस्तथा । यथा स संज्ञामायाति ब्रह्मविष्ण्वीशकारिणीम् ॥ 46.16 ॥

yathā prāgvyāpakaḥ kṣetrī pālako lāvakastathā yathā sa saṁjñāmāyāti brahmaviṣṇvīśakāriṇīm

जैसे पहले वह क्षेत्र का व्यापक स्वामी (बोने वाला) था, वैसे ही वह पालक और अन्ततः काटने वाला (संहारक) भी बनता है; इसी प्रकार वह ब्रह्मा, विष्णु और ईश (रुद्र) — इन नामों को अपने-अपने कार्य के अनुसार धारण करता है।

श्लोक 17 (markandeya.46.17)

ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् रुद्रत्वे संहरत्यपि । विष्णुत्वे चाप्युदासीनस्तिस्त्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः ॥ 46.17 ॥

brahmatve sṛjate lokān rudratve saṁharatyapi viṣṇutve cāpyudāsīnastistro'vasthāḥ svayambhuvaḥ

ब्रह्मारूप में वह लोकों की सृष्टि करता है, रुद्ररूप में उनका संहार भी करता है, और विष्णुरूप में उदासीन (समभाव में स्थित) रहता है — ये ही स्वयंभू की तीन अवस्थाएँ हैं।

श्लोक 18 (markandeya.46.18)

रजो ब्रह्मा तमो रुद्रो विष्णुः सत्त्वं जगत्पतिः । एत एव त्रयो देवा एत एव त्रयो गुणाः ॥ 46.18 ॥

rajo brahmā tamo rudro viṣṇuḥ sattvaṁ jagatpatiḥ eta eva trayo devā eta eva trayo guṇāḥ

रज ही ब्रह्मा है, तम ही रुद्र है, और सत्त्व ही जगत्पति विष्णु है; ये तीनों ही देवता हैं और ये ही तीनों गुण भी हैं।

श्लोक 19 (markandeya.46.19)

अन्योन्यमिथुना ह्येते अन्योन्याश्रयिणस्तथा । क्षणं वियोगो नह्येषां न त्यजन्ति परस्परम् ॥ 46.19 ॥

anyonyamithunā hyete anyonyāśrayiṇastathā kṣaṇaṁ viyogo nahyeṣāṁ na tyajanti parasparam

ये तीनों परस्पर युगल के समान हैं और एक-दूसरे के आश्रित भी हैं; इनका क्षणभर के लिए भी वियोग नहीं होता, ये कभी एक-दूसरे को नहीं त्यागते।

श्लोक 20 (markandeya.46.20)

एवं ब्रह्मा जगत्पूर्वो देवदेवश्चतुर्मुखः । रजोगुणं समाश्रित्य स्त्रष्ट्टत्वे स व्यवस्थितः ॥ 46.20 ॥

evaṁ brahmā jagatpūrvo devadevaścaturmukhaḥ rajoguṇaṁ samāśritya straṣṭṭatve sa vyavasthitaḥ

इस प्रकार जगत् के आदिस्वरूप, देवताओं के देव, चतुर्मुख ब्रह्मा रजोगुण का आश्रय लेकर स्रष्टा के पद पर प्रतिष्ठित रहते हैं।

श्लोक 21 (markandeya.46.21)

हिरण्यगर्भो देवादिरनादिरुपचारतः । भूपद्मकर्णिकासंस्थो ब्रह्माग्रे समजायत ॥ 46.21 ॥

hiraṇyagarbho devādiranādirupacārataḥ bhūpadmakarṇikāsaṁstho brahmāgre samajāyata

वे देवताओं में आदि, यद्यपि वस्तुतः अनादि हैं तथापि उपचार से 'हिरण्यगर्भ' कहलाते हैं; पृथ्वीरूपी कमल की कर्णिका पर स्थित होकर ब्रह्मा सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न हुए।

श्लोक 22 (markandeya.46.22)

तस्य वर्षशतं त्वेकं परमायुर्महात्मनः । ब्रह्म्येणैव हि मानेन तस्य संख्यां निबोध मे ॥ 46.22 ॥

tasya varṣaśataṁ tvekaṁ paramāyurmahātmanaḥ brahmyeṇaiva hi mānena tasya saṁkhyāṁ nibodha me

उस महात्मा की परम आयु ब्रह्मा के अपने ही मान से केवल एक सौ वर्ष है; अब मुझसे उसकी गणना सुनो।

श्लोक 23 (markandeya.46.23)

निमेषैर्दशभिः काष्ठा तथा पञ्चभिरुच्यते । कलास्त्रिंशच्च वै काष्ठा मुहूर्तं त्रिंशत्ताः कलाः ॥ 46.23 ॥

nimeṣairdaśabhiḥ kāṣṭhā tathā pañcabhirucyate kalāstriṁśacca vai kāṣṭhā muhūrtaṁ triṁśattāḥ kalāḥ

दस और पाँच अर्थात् पन्द्रह निमेषों की एक 'काष्ठा' कही जाती है; तीस काष्ठाओं की एक 'कला' होती है, और तीस कलाओं का एक 'मुहूर्त' होता है।

श्लोक 24 (markandeya.46.24)

अहोरात्रं मुहूर्तानां नृणां त्रिंशत्तु वै स्मृतम् । अहोरात्रैश्च त्रिंशद्भिः पक्षौ द्वौ मास उच्यते ॥ 46.24 ॥

ahorātraṁ muhūrtānāṁ nṛṇāṁ triṁśattu vai smṛtam ahorātraiśca triṁśadbhiḥ pakṣau dvau māsa ucyate

मनुष्यों के तीस मुहूर्तों का एक अहोरात्र (दिन-रात) स्मरण किया गया है; और तीस अहोरात्रों के दो पक्षों को एक मास कहा जाता है।

श्लोक 25 (markandeya.46.25)

तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे । तद्देवानामहोरात्रं दिनं तत्रोत्तरायणम् ॥ 46.25 ॥

taiḥ ṣaḍbhirayanaṁ varṣaṁ dve'yane dakṣiṇottare taddevānāmahorātraṁ dinaṁ tatrottarāyaṇam

उन छह मासों का एक अयन होता है, और दक्षिण-उत्तर दो अयनों का एक वर्ष होता है; वह वर्ष देवताओं का एक अहोरात्र है, जिसमें उत्तरायण उनका दिन है।

श्लोक 26 (markandeya.46.26)

दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम् । चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं शृणुष्व मे ॥ 46.26 ॥

divyairvarṣasahasraistu kṛtatretādisaṁjñitam caturyugaṁ dvādaśabhistadvibhāgaṁ śṛṇuṣva me

अब मुझसे कृत, त्रेता आदि नामों से प्रसिद्ध चार युगों के दिव्य वर्षों में विभाजन को सुनो, जो कुल बारह हजार वर्षों का है।

श्लोक 27 (markandeya.46.27)

चत्वारि तु सहस्राणि वर्षाणां कृतमुच्यते । शतानि सन्ध्या चत्वारि सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥ 46.27 ॥

catvāri tu sahasrāṇi varṣāṇāṁ kṛtamucyate śatāni sandhyā catvāri sandhyāṁśaśca tathāvidhaḥ

कृतयुग चार हजार वर्षों का कहा गया है; उसकी संध्या चार सौ वर्षों की और संध्यांश भी उतना ही है।

श्लोक 28 (markandeya.46.28)

त्रेता त्रीणि सहस्राणि दिव्याब्दानां शतत्रयम् । तत्सन्ध्या तत्समा चैव सन्ध्यांशश्च तथाविधः ॥ 46.28 ॥

tretā trīṇi sahasrāṇi divyābdānāṁ śatatrayam tatsandhyā tatsamā caiva sandhyāṁśaśca tathāvidhaḥ

त्रेतायुग तीन हजार दिव्य वर्षों का है, उसकी संध्या तीन सौ वर्षों की तथा संध्यांश भी उतना ही है।

श्लोक 29 (markandeya.46.29)

द्वापरं द्वे सहस्रे तु वर्षाणां द्वे शते तथा । तस्य सन्ध्या समाख्याता द्वे शताब्दे तदंशकः ॥ 46.29 ॥

dvāparaṁ dve sahasre tu varṣāṇāṁ dve śate tathā tasya sandhyā samākhyātā dve śatābde tadaṁśakaḥ

द्वापर दो हजार वर्षों का है, और उसकी संध्या दो सौ वर्षों की कही गई है, तथा संध्यांश भी उतना ही है।

श्लोक 30 (markandeya.46.30)

कलिः सहस्रं दिव्यानामब्दानां द्विजसत्तम । सन्ध्या सन्ध्यांशकश्चैव शतकौ समुदाहृतौ ॥ 46.30 ॥

kaliḥ sahasraṁ divyānāmabdānāṁ dvijasattama sandhyā sandhyāṁśakaścaiva śatakau samudāhṛtau

हे द्विजश्रेष्ठ! कलियुग एक हजार दिव्य वर्षों का है, और उसकी संध्या तथा संध्यांश दोनों सौ-सौ वर्षों के कहे गए हैं।

श्लोक 31 (markandeya.46.31)

एषा द्वाधशसाहस्त्री युगाख्या कविभिः कृता । एतत् सहस्रगुणितमो ब्राह्म्यमुदाहृतम् ॥ 46.31 ॥

eṣā dvādhaśasāhastrī yugākhyā kavibhiḥ kṛtā etat sahasraguṇitamo brāhmyamudāhṛtam

यह बारह हजार वर्षों की अवधि ही मुनियों द्वारा 'युग' (महायुग) कही गई है; इसे ही एक हजार गुणा करने पर 'ब्राह्म' (ब्रह्मा का दिन) कहा गया है।

श्लोक 32 (markandeya.46.32)

ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन् मनवः स्युश्चतुर्दश । भवन्ति भागशस्तेषां सहस्रं तद्विभज्यते ॥ 46.32 ॥

brahmaṇo divase brahman manavaḥ syuścaturdaśa bhavanti bhāgaśasteṣāṁ sahasraṁ tadvibhajyate

हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं; उस सहस्र-युग की अवधि उनमें भागानुसार विभाजित होती है।

श्लोक 33 (markandeya.46.33)

देवाः सप्तर्षयः सेन्द्रा मनुस्तत्सूनवो नृपाः । मनुना सह सृज्यन्ते संह्रियन्ते च पूर्ववत् ॥ 46.33 ॥

devāḥ saptarṣayaḥ sendrā manustatsūnavo nṛpāḥ manunā saha sṛjyante saṁhriyante ca pūrvavat

देवता, इन्द्र सहित सप्तर्षि, मनु और उनके पुत्र राजा — ये सब प्रत्येक मनु के साथ उत्पन्न होते हैं और पूर्ववत् समेट भी लिए जाते हैं।

श्लोक 34 (markandeya.46.34)

चतुर्युगानां संख्याता साधिका ह्ये कसप्ततिः । मन्वन्तरं तस्य संख्यां मानुषाब्दैर्निबोध मे ॥ 46.34 ॥

caturyugānāṁ saṁkhyātā sādhikā hye kasaptatiḥ manvantaraṁ tasya saṁkhyāṁ mānuṣābdairnibodha me

एक मन्वन्तर की गणना इकहत्तर चतुर्युगों से कुछ अधिक कही गई है; अब मुझसे मानव वर्षों में उसकी संख्या सुनो।

श्लोक 35 (markandeya.46.35)

त्रिंशत्कोट्यस्तु संपूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज । सत्पषष्टिस्तथान्यानि नियुतानि च संख्यया ॥ 46.35 ॥

triṁśatkoṭyastu saṁpūrṇāḥ saṁkhyātāḥ saṁkhyayā dvija satpaṣaṣṭistathānyāni niyutāni ca saṁkhyayā

हे द्विज! पूर्ण तीस करोड़ वर्ष गिने गए हैं, और उनके साथ सड़सठ लाख वर्ष और मिलाए जाते हैं।

श्लोक 36 (markandeya.46.36)

विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयं साधिकं विना । एतन्मन्वन्तरं प्रोक्तं दिव्यैर्वर्षैर्निबोध मे ॥ 46.36 ॥

viṁśatiśca sahasrāṇi kālo'yaṁ sādhikaṁ vinā etanmanvantaraṁ proktaṁ divyairvarṣairnibodha me

तथा बीस हजार वर्ष और (जोड़े जाते हैं) — यह वही काल है, जिसमें कुछ अधिक अंश छोड़ दिया गया है; यही मन्वन्तर तुम्हें दिव्य वर्षों में पहले ही बताया जा चुका है, ऐसा जानो।

श्लोक 37 (markandeya.46.37)

अष्टौ वर्षसहस्राणि दिव्यया संख्यया युतम् । द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु ॥ 46.37 ॥

aṣṭau varṣasahasrāṇi divyayā saṁkhyayā yutam dvipañcāśattathānyāni sahasrāṇyadhikāni tu

आठ हजार दिव्य वर्षों के साथ बावन हजार वर्ष और मिलाए जाते हैं (यह मन्वन्तरों की संधियों का काल है)।

श्लोक 38 (markandeya.46.38)

चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्रह्म्यमहः स्मृतम् । तस्यान्ते प्रलयः प्रोक्तो ब्रह्मन् नैमित्तिको बुधैः ॥ 46.38 ॥

caturdaśaguṇo hyeṣa kālo brahmyamahaḥ smṛtam tasyānte pralayaḥ prokto brahman naimittiko budhaiḥ

यही काल चौदह गुणा होकर ब्रह्मा का 'महः' (दिन) कहा गया है; हे ब्रह्मन्! उसके अन्त में विद्वानों ने नैमित्तिक प्रलय बताया है।

श्लोक 39 (markandeya.46.39)

भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकश्च विनाशिनः । तथा विनाशमायान्ति महर्लोकश्च तिष्ठति ॥ 46.39 ॥

bhūrloko'tha bhuvarlokaḥ svarlokaśca vināśinaḥ tathā vināśamāyānti maharlokaśca tiṣṭhati

उस समय भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक — ये तीनों नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार वे विनाश को प्राप्त होते हैं, जबकि महर्लोक बना रहता है।

श्लोक 40 (markandeya.46.40)

तद्वासिनोऽपि तापेन जनलोकं प्रयान्ति वै । एकार्णवे च त्रैलोक्ये ब्रह्मा स्वपिति वै निशि ॥ 46.40 ॥

tadvāsino'pi tāpena janalokaṁ prayānti vai ekārṇave ca trailokye brahmā svapiti vai niśi

उसके निवासी भी उस ताप से पीड़ित होकर जनलोक को चले जाते हैं; और जब त्रैलोक्य एक ही समुद्र बन जाता है, तब ब्रह्मा उस रात्रि में सो जाते हैं।

श्लोक 41 (markandeya.46.41)

तत्प्रमाणैव सा रात्रिस्तदन्ते सृज्यते पुनः । एवन्तु ब्रह्मणो वर्षमेकं वर्षशतन्तु तत् ॥ 46.41 ॥

tatpramāṇaiva sā rātristadante sṛjyate punaḥ evantu brahmaṇo varṣamekaṁ varṣaśatantu tat

वह रात्रि भी उसी दिन के बराबर परिमाण की होती है, और उसके अन्त में सृष्टि पुनः रची जाती है; इस प्रकार (तीन सौ साठ ऐसे दिन-रात) ब्रह्मा का एक वर्ष होता है, और सौ ऐसे वर्षों की उनकी आयु है।

श्लोक 42 (markandeya.46.42)

शतं हि तस्य वर्षाणां परमित्यभिधीयते । पञ्चाशद्भिस्तथा वर्षैः परार्धमिति कीर्त्यते ॥ 46.42 ॥

śataṁ hi tasya varṣāṇāṁ paramityabhidhīyate pañcāśadbhistathā varṣaiḥ parārdhamiti kīrtyate

उनके सौ वर्ष ही उनका 'पर' (पूर्ण आयु-प्रमाण) कहलाते हैं, और उनमें से पचास वर्षों को 'परार्ध' कहा जाता है।

श्लोक 43 (markandeya.46.43)

एवमस्य परार्धन्तु व्यतीतं द्विजसत्तम । यस्यान्तेऽभून्महाकल्पः पाद्म इत्यभिविश्रुतः ॥ 46.43 ॥

evamasya parārdhantu vyatītaṁ dvijasattama yasyānte'bhūnmahākalpaḥ pādma ityabhiviśrutaḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार उनका एक परार्ध बीत चुका है, जिसके अन्त में वह महाकल्प हुआ था जो 'पाद्म' नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 44 (markandeya.46.44)

द्वितीयस्य परार्धस्य वर्तमानस्य वै द्विज । वाराह इति कल्पोऽयं प्रथमः परिकल्पितः ॥ 46.44 ॥

dvitīyasya parārdhasya vartamānasya vai dvija vārāha iti kalpo'yaṁ prathamaḥ parikalpitaḥ

हे द्विज! अब वर्तमान द्वितीय परार्ध में यह जो कल्प चल रहा है, वह इसका प्रथम कल्प है, जिसे 'वाराह' कल्प कहा गया है।

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