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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 47

प्राकृत एवं वैकृत सृष्टि

अध्याय 46अध्याय-सूचीअध्याय 48

श्लोक 1 (markandeya.47.1)

क्रौष्टुकिरुवाच यथा ससर्ज वै ब्रह्मा भगवानादिकृत् प्रजाः । प्रजापतिः पतिर्देवस्तन्मे विस्तरतो वद ॥ 47.1 ॥

krauṣṭukiruvāca yathā sasarja vai brahmā bhagavānādikṛt prajāḥ prajāpatiḥ patirdevastanme vistarato vada

क्रौष्टुकि ने कहा — आदिकर्ता भगवान् ब्रह्मा, जो प्रजापतियों के स्वामी और देवताओं के अधिपति हैं, उन्होंने प्रजाओं की सृष्टि जिस प्रकार की, वह मुझसे विस्तारपूर्वक कहिए।

श्लोक 2 (markandeya.47.2)

मार्कण्डेय उवाच कथयाम्येष ते ब्रह्मन् ससर्ज भगवान् यथा । लोककृच्छाश्वतः कृत्स्नं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ 47.2 ॥

mārkaṇḍeya uvāca kathayāmyeṣa te brahman sasarja bhagavān yathā lokakṛcchāśvataḥ kṛtsnaṁ jagat sthāvarajaṅgamam

मार्कण्डेय ने कहा — हे ब्रह्मन्! मैं तुम्हें बताता हूँ कि सनातन लोककर्ता भगवान् ने चराचरमय इस सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि किस प्रकार की।

श्लोक 3 (markandeya.47.3)

पद्मावसाने प्रलये निशासुत्पोत्थितः प्रभुः । सत्त्वोद्रिक्तस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत ॥ 47.3 ॥

padmāvasāne pralaye niśāsutpotthitaḥ prabhuḥ sattvodriktastadā brahmā śūnyaṁ lokamavaikṣata

पाद्मकल्प की प्रलय-रात्रि के अन्त में जागृत हुए वे प्रभु — उस समय सत्त्वगुण से परिपूर्ण ब्रह्मा ने संसार को शून्य देखा।

श्लोक 4 (markandeya.47.4)

इमञ्चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति । ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवाप्ययम् ॥ 47.4 ॥

imañcodāharantyatra ślokaṁ nārāyaṇaṁ prati brahmasvarūpiṇaṁ devaṁ jagataḥ prabhavāpyayam

इस विषय में लोग नारायण के प्रति यह श्लोक उद्धृत करते हैं — वे देव, जिनका स्वरूप ही ब्रह्म है, जिनसे जगत् की उत्पत्ति और लय होते हैं।

श्लोक 5 (markandeya.47.5)

आपो नारा वै तनव इत्यपां नाम शुश्रुम । तासु शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः ॥ 47.5 ॥

āpo nārā vai tanava ityapāṁ nāma śuśruma tāsu śete sa yasmācca tena nārāyaṇaḥ smṛtaḥ

'जल को नार कहा जाता है, क्योंकि वे ही उनके शरीर हैं' — जल का यह नाम हमने ऐसा सुना है; और चूँकि वे उन जलों में शयन करते हैं, इसीलिए वे 'नारायण' कहलाते हैं।

श्लोक 6 (markandeya.47.6)

विबुद्धः सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतां महीम् । अनुमानात् समुद्धारं कर्तुकामस्तदा क्षिते ॥ 47.6 ॥

vibuddhaḥ salile tasmin vijñāyāntargatāṁ mahīm anumānāt samuddhāraṁ kartukāmastadā kṣite

उन जलों में जागृत होकर, अनुमान से यह जानकर कि पृथ्वी उनके भीतर डूबी हुई है, वे उस समय पृथ्वी का उद्धार करने की इच्छा करने लगे।

श्लोक 7 (markandeya.47.7)

अकरोत् स तनूरन्याः कल्पादिषु यथा पुरा । मत्स्यकूर्मादिकास्तद्वद्वाराहं वपुरास्थितः ॥ 47.7 ॥

akarot sa tanūranyāḥ kalpādiṣu yathā purā matsyakūrmādikāstadvadvārāhaṁ vapurāsthitaḥ

जैसे उन्होंने पूर्व कल्पों के आरम्भ में मत्स्य, कूर्म आदि रूप धारण किए थे, वैसे ही उन्होंने इस बार वाराह का शरीर धारण किया।

श्लोक 8 (markandeya.47.8)

वेदयज्ञमयं दिव्यं वेदयज्ञमयो विभुः । रूपं कृत्वा विवेशाप्सु सर्वगः सर्वसम्भवः ॥ 47.8 ॥

vedayajñamayaṁ divyaṁ vedayajñamayo vibhuḥ rūpaṁ kṛtvā viveśāpsu sarvagaḥ sarvasambhavaḥ

वेद और यज्ञमय दिव्य रूप धारण करके, सर्वव्यापी तथा सबके उद्भव-स्थान वे वेद-यज्ञमय प्रभु जल में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 9 (markandeya.47.9)

समुद्धृकत्य च पातालान्मुमोच सलिले भुवम् । जनलोकस्थितैः सिद्धैश्चिन्त्यमानो जगत्पतिः ॥ 47.9 ॥

samuddhṛkatya ca pātālānmumoca salile bhuvam janalokasthitaiḥ siddhaiścintyamāno jagatpatiḥ

पाताल से पृथ्वी को उठाकर उन्होंने उसे जल पर स्थापित किया — वे जगत्पति, जिनका जनलोक में स्थित सिद्धगण ध्यान करते थे।

श्लोक 10 (markandeya.47.10)

तस्योपरि जलौघस्य महती नैरिव स्थिता । विततत्वात्तु देहस्य न मही याति संप्लवम् ॥ 47.10 ॥

tasyopari jalaughasya mahatī nairiva sthitā vitatatvāttu dehasya na mahī yāti saṁplavam

उस विशाल जलराशि के ऊपर वह पृथ्वी नौका के समान स्थित रही; उनके (वाराह-रूप के) शरीर के अत्यन्त विस्तृत होने के कारण पृथ्वी जल में डूबती नहीं।

श्लोक 11 (markandeya.47.11)

ततः क्षितिं समीकृत्य पृथिव्यां सोऽसृजद् गिरीन् । प्राक् सर्गे दह्यमाने तु तदा संवर्तकाग्निना ॥ 47.11 ॥

tataḥ kṣitiṁ samīkṛtya pṛthivyāṁ so'sṛjad girīn prāk sarge dahyamāne tu tadā saṁvartakāgninā

तब पृथ्वी को समतल करके उन्होंने उस पर पर्वतों की रचना की, क्योंकि सृष्टि के आरम्भ में वे संवर्तक अग्नि द्वारा दग्ध हो चुके थे।

श्लोक 12 (markandeya.47.12)

तेनाग्निना विशीर्णास्ते पर्वता भुवि सर्वशः । शैला एकार्णवे मग्ना वायुनापस्तु संहताः ॥ 47.12 ॥

tenāgninā viśīrṇāste parvatā bhuvi sarvaśaḥ śailā ekārṇave magnā vāyunāpastu saṁhatāḥ

उस अग्नि से वे पर्वत सर्वत्र पृथ्वी पर बिखर गए थे; एक ही समुद्र में डूबी हुई वे शिलाएँ वायु और जल के द्वारा एकत्र हो गईं।

श्लोक 13 (markandeya.47.13)

निषक्ता यत्र यत्रासंस्तत्र तत्राचलाभवन् । भूविभागन्ततः कृत्वा सप्तद्वीपोपशोभितम् ॥ 47.13 ॥

niṣaktā yatra yatrāsaṁstatra tatrācalābhavan bhūvibhāgantataḥ kṛtvā saptadvīpopaśobhitam

जहाँ-जहाँ वे टिक गईं, वहीं-वहीं वे पुनः पर्वत बन गईं; इस प्रकार पृथ्वी का विभाजन करके उन्होंने उसे सप्त द्वीपों से सुशोभित किया।

श्लोक 14 (markandeya.47.14)

भूराद्यांश्चतुरो लोकान् पूर्वंवत् समकल्पयत् । सृष्टिञ्चिन्तयतस्तस्य कल्पादिषु यथा पुरा ॥ 47.14 ॥

bhūrādyāṁścaturo lokān pūrvaṁvat samakalpayat sṛṣṭiñcintayatastasya kalpādiṣu yathā purā

उन्होंने पूर्ववत् भूः आदि चार लोकों की रचना की; तत्पश्चात् सृष्टि का चिन्तन करते हुए, जैसा पूर्व कल्पों में हुआ था —

श्लोक 15 (markandeya.47.15)

अबुद्धिपूर्वकस्तस्मात् प्रादुर्भूतस्तमोमयः । तमो मोहो महामोहस्तामिस्त्रो ह्यन्धसंज्ञितः ॥ 47.15 ॥

abuddhipūrvakastasmāt prādurbhūtastamomayaḥ tamo moho mahāmohastāmistro hyandhasaṁjñitaḥ

— उनसे बिना किसी पूर्व-विचार के तमोमयी सृष्टि प्रकट हुई — तम, मोह, महामोह, तामिस्र और जिसे अन्ध (तामिस्र) कहा जाता है।

श्लोक 16 (markandeya.47.16)

अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः । पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतोऽप्रतिबोधवान् ॥ 47.16 ॥

avidyā pañcaparvaiṣā prādurbhūtā mahātmanaḥ pañcadhāvasthitaḥ sargo dhyāyato'pratibodhavān

उस महात्मा से यह पंचपर्वा अविद्या प्रकट हुई; ध्यान करते हुए उनकी यह सृष्टि पाँच रूपों में स्थित हुई, जो स्वयं किसी बोध से रहित थी।

श्लोक 17 (markandeya.47.17)

बहिरन्तश्चाप्रकाशः संवृतात्मा नगात्मकः । मुख्या नगा यतश्चोक्ता मुख्यसर्गस्ततस्त्वयम् ॥ 47.17 ॥

bahirantaścāprakāśaḥ saṁvṛtātmā nagātmakaḥ mukhyā nagā yataścoktā mukhyasargastatastvayam

बाहर और भीतर दोनों ओर से प्रकाशरहित, संवृत-स्वभाव तथा वृक्ष के समान (स्थावर) — चूँकि इन्हें 'मुख्य' कहा गया, इसलिए इसे 'मुख्यसर्ग' कहा जाता है।

श्लोक 18 (markandeya.47.18)

तं दृष्ट्वासाधकं सर्गममन्यदपरं पुनः । तस्याभिध्यायतः सर्गं तिर्यक्स्त्रोतो ह्यवर्तत ॥ 47.18 ॥

taṁ dṛṣṭvāsādhakaṁ sargamamanyadaparaṁ punaḥ tasyābhidhyāyataḥ sargaṁ tiryakstroto hyavartata

उस सृष्टि को असफल देखकर उन्होंने पुनः दूसरी सृष्टि का विचार किया; उनके ध्यान करते ही 'तिर्यक्स्रोत' नामक सृष्टि उत्पन्न हुई।

श्लोक 19 (markandeya.47.19)

यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तिः सा तिर्यक्स्त्रोतस्ततः स्मृतः । पश्वादयस्ते विख्यातास्तमः प्रायो ह्यवेदिनः ॥ 47.19 ॥

yasmāttiryakpravṛttiḥ sā tiryakstrotastataḥ smṛtaḥ paśvādayaste vikhyātāstamaḥ prāyo hyavedinaḥ

चूँकि इनकी प्रवृत्ति तिरछी होती है, इसीलिए यह 'तिर्यक्स्रोत' कहलाई; पशु आदि नाम से प्रसिद्ध ये प्राणी प्रायः तमोगुणी और अज्ञानी होते हैं।

श्लोक 20 (markandeya.47.20)

अत्पथग्राहिनश्चैव तेऽज्ञाने ज्ञानमानिनः । अहङ्कृता अहंमाना अष्टाविशशद्विधात्मकाः ॥ 47.20 ॥

atpathagrāhinaścaiva te'jñāne jñānamāninaḥ ahaṅkṛtā ahaṁmānā aṣṭāviśaśadvidhātmakāḥ

ये कुमार्गगामी होते हैं, अज्ञान को ही ज्ञान मानते हैं, अहंकार और अभिमान से युक्त होते हैं, और अट्ठाईस प्रकार के होते हैं।

श्लोक 21 (markandeya.47.21)

अन्तः प्रकाशास्ते सर्वे आवृतास्तु परस्परम् । तमप्यसाधकं मत्वा ध्यायतोऽन्यस्ततोऽभवत् ॥ 47.21 ॥

antaḥ prakāśāste sarve āvṛtāstu parasparam tamapyasādhakaṁ matvā dhyāyato'nyastato'bhavat

ये सभी भीतर से प्रकाशयुक्त हैं, किन्तु परस्पर एक-दूसरे से आवृत रहते हैं; इसे भी असफल मानकर, ध्यान करते-करते उनसे तब एक और सृष्टि उत्पन्न हुई।

श्लोक 22 (markandeya.47.22)

ऊर्ध्वस्त्रोतस्तृतीयस्तु सात्त्विकः समवर्तत । ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तस्त्वनावृताः ॥ 47.22 ॥

ūrdhvastrotastṛtīyastu sāttvikaḥ samavartata te sukhaprītibahulā bahirantastvanāvṛtāḥ

तीसरी सृष्टि 'ऊर्ध्वस्रोत' नामक सात्त्विक सृष्टि उत्पन्न हुई; वे सुख और प्रीति से परिपूर्ण, बाहर-भीतर दोनों ओर से अनावृत होते हैं।

श्लोक 23 (markandeya.47.23)

प्रकाशा बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्त्रोतः समुद्भवाः । तुष्टात्मकस्तृतीयस्तु देवसर्गो हि स स्मृतः ॥ 47.23 ॥

prakāśā bahirantaśca ūrdhvastrotaḥ samudbhavāḥ tuṣṭātmakastṛtīyastu devasargo hi sa smṛtaḥ

बाहर-भीतर प्रकाशमय, ऊर्ध्वस्रोत से उत्पन्न, संतोषस्वरूप यह तीसरी सृष्टि देवताओं की सृष्टि कही जाती है।

श्लोक 24 (markandeya.47.24)

तस्मिन् सर्गेऽभवत् प्रीतिर्निष्पन्ने ब्रह्मणस्तदा । ततोऽन्यं स तदा दध्यौ साधकं सर्गमुत्तमम् ॥ 47.24 ॥

tasmin sarge'bhavat prītirniṣpanne brahmaṇastadā tato'nyaṁ sa tadā dadhyau sādhakaṁ sargamuttamam

यह सृष्टि सिद्ध होने पर ब्रह्मा को उससे प्रसन्नता हुई; तत्पश्चात् उन्होंने एक अन्य, अधिक श्रेष्ठ तथा सफल सृष्टि का ध्यान किया।

श्लोक 25 (markandeya.47.25)

तथाभिध्यायतस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्ततः । प्रादुर्बभौ तदाव्यक्तादर्वाक्स्त्रोतस्तु साधकः ॥ 47.25 ॥

tathābhidhyāyatastasya satyābhidhyāyinastataḥ prādurbabhau tadāvyaktādarvākstrotastu sādhakaḥ

इस प्रकार सत्य-संकल्प उन ध्यानशील प्रभु के चिन्तन करने पर, अव्यक्त से 'अर्वाक्स्रोत' नामक सफल सृष्टि प्रकट हुई।

श्लोक 26 (markandeya.47.26)

यस्मादर्वाग् व्यवर्तन्त ततोर्ऽवाक्स्त्रोतसस्तु ते । ते च प्रकाशबहुलास्तमोद्रिक्ता रजोऽधिकाः ॥ 47.26 ॥

yasmādarvāg vyavartanta tator'vākstrotasastu te te ca prakāśabahulāstamodriktā rajo'dhikāḥ

चूँकि वे नीचे की ओर प्रवृत्त हुए, इसीलिए वे 'अर्वाक्स्रोत' कहलाए; वे प्रकाश की अधिकता से युक्त होकर भी तमोगुण से आधिक्य और रजोगुण से अधिक होते हैं।

श्लोक 27 (markandeya.47.27)

तस्मात् ते दुः खबहुला भूयोभूयश्च कारिणः । प्रकाशा बहिरन्तश्च मनुष्याः साधकाश्च ते ॥ 47.27 ॥

tasmāt te duḥ khabahulā bhūyobhūyaśca kāriṇaḥ prakāśā bahirantaśca manuṣyāḥ sādhakāśca te

इसीलिए वे बहुत दुःख भोगने वाले और बार-बार कर्म करने वाले होते हैं; बाहर-भीतर प्रकाशयुक्त, यही मनुष्य हैं, जो सफलता प्राप्त करने में समर्थ हैं।

श्लोक 28 (markandeya.47.28)

पञ्चमोऽनुग्रहः सर्गः स चतुर्धा व्यवस्थितः । विपर्ययेण सिद्ध्या च शान्त्या तुष्ट्या तथैव च ॥ 47.28 ॥

pañcamo'nugrahaḥ sargaḥ sa caturdhā vyavasthitaḥ viparyayeṇa siddhyā ca śāntyā tuṣṭyā tathaiva ca

पाँचवीं 'अनुग्रह' नामक सृष्टि है, जो चार प्रकार से स्थित है — विपर्यय के द्वारा, सिद्धि के द्वारा, शान्ति के द्वारा और इसी प्रकार तुष्टि के द्वारा।

श्लोक 29 (markandeya.47.29)

निर्वृत्तं वर्तमानञ्च तेर्ऽथं जानन्ति वै पुनः । भूतादिकानां भूतानां षष्ठः सर्ग स उच्यते ॥ 47.29 ॥

nirvṛttaṁ vartamānañca ter'thaṁ jānanti vai punaḥ bhūtādikānāṁ bhūtānāṁ ṣaṣṭhaḥ sarga sa ucyate

वे भूत और भविष्य दोनों को उसी प्रयोजन से जानते हैं; और भूतादि से उत्पन्न भूतों की छठी सृष्टि कही जाती है।

श्लोक 30 (markandeya.47.30)

ते परिग्राहिणः सर्वे संविभागरतास्तथा । चोदनाश्चाप्यशीलाश्च ज्ञेया भूतादिकाश्च ते ॥ 47.30 ॥

te parigrāhiṇaḥ sarve saṁvibhāgaratāstathā codanāścāpyaśīlāśca jñeyā bhūtādikāśca te

वे सब संग्रह करने वाले, बँटवारे में रत, प्रेरणास्वरूप तथा अनियत स्वभाव के जानने योग्य हैं — इन्हें ही 'भूतादिक' कहा जाता है।

श्लोक 31 (markandeya.47.31)

प्रथमो महतः सर्गो विज्ञेयो ब्रह्मणस्तु सः । तन्मात्राणां द्वितीयस्तु भूतसर्गः स उच्यते ॥ 47.31 ॥

prathamo mahataḥ sargo vijñeyo brahmaṇastu saḥ tanmātrāṇāṁ dvitīyastu bhūtasargaḥ sa ucyate

पहली सृष्टि 'महत्' की जानने योग्य है, जो ब्रह्म से सम्बन्धित है; दूसरी सृष्टि तन्मात्राओं की है, जिसे 'भूतसर्ग' कहा जाता है।

श्लोक 32 (markandeya.47.32)

वैकारिकस्तृतीयस्तु सर्गश्चैन्द्रियकः स्मृतः । इत्येष प्राकृतः सर्गः संभूतो बुद्धैपूर्वकः ॥ 47.32 ॥

vaikārikastṛtīyastu sargaścaindriyakaḥ smṛtaḥ ityeṣa prākṛtaḥ sargaḥ saṁbhūto buddhaipūrvakaḥ

तीसरी सृष्टि 'वैकारिक' कही गई है, जो इन्द्रियों की है; इस प्रकार यह प्राकृत सृष्टि है, जो बुद्धिपूर्वक उत्पन्न हुई।

श्लोक 33 (markandeya.47.33)

मुख्यः सर्गश्चतुर्थस्तु मुख्या वै स्थावराः स्मृताः । तिर्यक्स्त्रोतस्तु यः प्रोक्तस्तिर्यग्योन्यः स पञ्चमः ॥ 47.33 ॥

mukhyaḥ sargaścaturthastu mukhyā vai sthāvarāḥ smṛtāḥ tiryakstrotastu yaḥ proktastiryagyonyaḥ sa pañcamaḥ

चौथी सृष्टि 'मुख्य' है, स्थावर प्राणी ही 'मुख्य' कहे गए हैं; और जो 'तिर्यक्स्रोत' कहा गया, वह पशु-योनि की पाँचवीं सृष्टि है।

श्लोक 34 (markandeya.47.34)

तथोर्ध्वस्त्रोतसां षष्ठो देवसर्गस्तु स स्मृतः । ततोर्ऽवाक्स्त्रोतसां सर्गः सप्तमः स तु मानुषः ॥ 47.34 ॥

tathordhvastrotasāṁ ṣaṣṭho devasargastu sa smṛtaḥ tator'vākstrotasāṁ sargaḥ saptamaḥ sa tu mānuṣaḥ

इसी प्रकार ऊर्ध्वस्रोत की छठी सृष्टि देवताओं की कही गई है; और अर्वाक्स्रोत की सातवीं सृष्टि मनुष्यों की है।

श्लोक 35 (markandeya.47.35)

अष्टमोऽनुग्रहः सर्गः सात्त्विकस्तामसश्च सः । पञ्चैते वैकृताः सर्गाः प्राकृतास्तु त्रयः स्मृताः ॥ 47.35 ॥

aṣṭamo'nugrahaḥ sargaḥ sāttvikastāmasaśca saḥ pañcaite vaikṛtāḥ sargāḥ prākṛtāstu trayaḥ smṛtāḥ

आठवीं 'अनुग्रह' नामक सृष्टि है, जो सात्त्विक भी है और तामसिक भी; ये पाँचों 'वैकृत' सृष्टियाँ कही गई हैं, और तीन को 'प्राकृत' कहा गया है।

श्लोक 36 (markandeya.47.36)

प्राकृतो वैकृतश्चैव कौमारो नवमः स्मृतः । इत्येते वै समाख्याता नव सर्गाः प्रजापतेः ॥ 47.36 ॥

prākṛto vaikṛtaścaiva kaumāro navamaḥ smṛtaḥ ityete vai samākhyātā nava sargāḥ prajāpateḥ

प्राकृत, वैकृत, और नवीं 'कौमार' सृष्टि कही गई है — इस प्रकार प्रजापति की ये नौ सृष्टियाँ पूर्णरूप से वर्णित की गई हैं।

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