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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 48

सृष्टि का प्रकार

अध्याय 47अध्याय-सूचीअध्याय 49

श्लोक 1 (markandeya.48.1)

क्रौष्टुकिरुवाच समासात् कथिता सृष्टिः सम्यग् भगवता मम । देवादीनां भवं ब्रह्मन् विस्तरात्तु ब्रवीहि मे ॥ 48.1 ॥

krauṣṭukiruvāca samāsāt kathitā sṛṣṭiḥ samyag bhagavatā mama devādīnāṁ bhavaṁ brahman vistarāttu bravīhi me

क्रौष्टुकि ने कहा — हे भगवन्! आपने मुझे संक्षेप में सृष्टि का उत्तम वर्णन सुनाया; अब हे ब्रह्मन्! देवताओं आदि की उत्पत्ति मुझे विस्तार से कहिए।

श्लोक 2 (markandeya.48.2)

मार्कण्डेय उवाच कुशलाकुशलैर्ब्रह्मन् ! भाविता पूर्वकमर्मभिः । ख्याता तथा ह्यनिर्मुक्ताः प्रलये ह्यु पसंहृताः ॥ 48.2 ॥

mārkaṇḍeya uvāca kuśalākuśalairbrahman ! bhāvitā pūrvakamarmabhiḥ khyātā tathā hyanirmuktāḥ pralaye hyu pasaṁhṛtāḥ

मार्कण्डेय ने कहा — हे ब्रह्मन्! अपने पूर्वजन्म के शुभ-अशुभ कर्मों से संस्कारित, प्रसिद्ध किन्तु (जन्म-मरण से) अमुक्त वे प्राणी प्रलय में समेट लिए गए थे।

श्लोक 3 (markandeya.48.3)

देवाद्याः स्थावरान्ताश्च प्रजा ब्रह्मंश्चतुर्विधाः । ब्रह्मणः कुर्वतः सृष्टिं जज्ञिरे मानसास्तदा ॥ 48.3 ॥

devādyāḥ sthāvarāntāśca prajā brahmaṁścaturvidhāḥ brahmaṇaḥ kurvataḥ sṛṣṭiṁ jajñire mānasāstadā

हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा जब सृष्टि करने लगे, तब देवता से लेकर स्थावर पर्यन्त चार प्रकार की प्रजाएँ उनके मानस-पुत्रों के रूप में उत्पन्न हुईं।

श्लोक 4 (markandeya.48.4)

ततो देवासुरान् पितॄन् मानुषांश्च चतुष्टयम् । सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत् ॥ 48.4 ॥

tato devāsurān pitṝn mānuṣāṁśca catuṣṭayam sisṛkṣurambhāṁsyetāni svamātmānamayūyujat

तत्पश्चात् देव, असुर, पितर और मनुष्य — इन चारों की सृष्टि की इच्छा से उन्होंने अपने आपको इस कार्य में नियुक्त किया।

श्लोक 5 (markandeya.48.5)

युक्तात्मनस्तमोमात्रा उद्रिक्ताभूत् प्रजापतेः । सिसृक्षोर्जघनात् पूर्वमसुरा जज्ञिरे ततः ॥ 48.5 ॥

yuktātmanastamomātrā udriktābhūt prajāpateḥ sisṛkṣorjaghanāt pūrvamasurā jajñire tataḥ

इस प्रकार तत्पर प्रजापति में तमोगुण की मात्रा अधिक हो गई, और सृष्टि की इच्छा से पहले उनके जघन-भाग से असुर उत्पन्न हुए।

श्लोक 6 (markandeya.48.6)

उत्ससर्ज ततस्तान्तु तमोमात्रात्मिकां तनुम् । सापविद्धा तनुस्तेन सद्यो रात्रिरजायत ॥ 48.6 ॥

utsasarja tatastāntu tamomātrātmikāṁ tanum sāpaviddhā tanustena sadyo rātrirajāyata

तत्पश्चात् उन्होंने तमोमात्रामय उस शरीर को त्याग दिया; वह त्यागा हुआ शरीर तत्काल ही रात्रि बन गया।

श्लोक 7 (markandeya.48.7)

अन्यां तनुमुपादाय सिसृक्षुः प्रीतिमाप सः । सत्त्वोद्रेकास्ततो देवा मुखतस्तस्य जज्ञिरे ॥ 48.7 ॥

anyāṁ tanumupādāya sisṛkṣuḥ prītimāpa saḥ sattvodrekāstato devā mukhatastasya jajñire

फिर दूसरा शरीर धारण करके, सृष्टि की इच्छा से प्रसन्न होकर, उनके मुख से सत्त्वगुण की अधिकता वाले देवता उत्पन्न हुए।

श्लोक 8 (markandeya.48.8)

उत्ससर्ज च भूतेशस्तनुं तामप्यसौ विभुः । सा चापविद्धा दिवसं सत्त्वप्रायमजायत् ॥ 48.8 ॥

utsasarja ca bhūteśastanuṁ tāmapyasau vibhuḥ sā cāpaviddhā divasaṁ sattvaprāyamajāyat

उन प्राणिपति ने वह शरीर भी त्याग दिया; और वह त्यागा हुआ शरीर प्रायः सात्त्विक 'दिन' बन गया।

श्लोक 9 (markandeya.48.9)

सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां जगृहे तनुम् । पितृवन्मन्यमानस्य पितरस्तस्य जज्ञिरे ॥ 48.9 ॥

sattvamātrātmikāmeva tato'nyāṁ jagṛhe tanum pitṛvanmanyamānasya pitarastasya jajñire

तत्पश्चात् उन्होंने विशुद्ध सत्त्वमात्रामय एक और शरीर धारण किया, और स्वयं को पितृतुल्य मानते हुए उनसे पितर उत्पन्न हुए।

श्लोक 10 (markandeya.48.10)

सृष्ट्वा पितॄनुत्ससर्ज तनुं तामपि स प्रभुः । सा चोत्सृष्टाभवत् सन्ध्या दिवननक्तान्तरस्थिता ॥ 48.10 ॥

sṛṣṭvā pitṝnutsasarja tanuṁ tāmapi sa prabhuḥ sā cotsṛṣṭābhavat sandhyā divananaktāntarasthitā

पितरों को उत्पन्न करके उन प्रभु ने वह शरीर भी त्याग दिया; और वह त्यागा हुआ शरीर दिन-रात्रि के मध्य स्थित 'सन्ध्या' बन गया।

श्लोक 11 (markandeya.48.11)

रजोमात्रात्मिकामन्यां तनुं भेजेऽथ स प्रभुः । ततो मनुष्याः सम्भूता रजोमात्रासमुद्भवाः ॥ 48.11 ॥

rajomātrātmikāmanyāṁ tanuṁ bheje'tha sa prabhuḥ tato manuṣyāḥ sambhūtā rajomātrāsamudbhavāḥ

उन प्रभु ने फिर रजोमात्रामय एक और शरीर धारण किया, जिससे रजोगुण की मात्रा से उत्पन्न हुए मनुष्य प्रकट हुए।

श्लोक 12 (markandeya.48.12)

सृष्ट्वा मनुष्यान् स विभुरुत्ससर्ज तनुं ततः । ज्योत्स्ना समभवत् सा च नक्तान्तेऽहर्मुखे च या ॥ 48.12 ॥

sṛṣṭvā manuṣyān sa vibhurutsasarja tanuṁ tataḥ jyotsnā samabhavat sā ca naktānte'harmukhe ca yā

मनुष्यों को उत्पन्न करके उन प्रभु ने वह शरीर भी त्याग दिया; वह रात्रि के अन्त और दिन के आरम्भ में स्थित 'ज्योत्स्ना' (चाँदनी) बन गया।

श्लोक 13 (markandeya.48.13)

इत्येतास्तनवस्तस्य देवदेवस्य धीमतः । ख्याता रात्र्यहनी चैव सन्ध्या ज्योत्स्ना च वै द्विज ॥ 48.13 ॥

ityetāstanavastasya devadevasya dhīmataḥ khyātā rātryahanī caiva sandhyā jyotsnā ca vai dvija

हे द्विज! उस बुद्धिमान देवाधिदेव के ये शरीर ही रात्रि, दिन, सन्ध्या और ज्योत्स्ना के नाम से विख्यात हुए।

श्लोक 14 (markandeya.48.14)

ज्योत्स्तना सन्ध्या तथैवाह---सत्त्वमात्रात्मकं त्रयम् । तमोमात्रात्मिका रात्रिः सा वै तस्मात् त्रियामिका ॥ 48.14 ॥

jyotstanā sandhyā tathaivāha---sattvamātrātmakaṁ trayam tamomātrātmikā rātriḥ sā vai tasmāt triyāmikā

ज्योत्स्ना और सन्ध्या तथा दिन — ये तीनों सत्त्वमात्रामय कहे गए हैं; रात्रि ही अकेली तमोमात्रामय है, इसीलिए वह 'त्रियामा' (तीन प्रहरों वाली) कहलाती है।

श्लोक 15 (markandeya.48.15)

तस्माद् देवा दिवा रात्रावसुरास्तु बलान्विताः । ज्योत्स्नागमे च मनुजाः सन्ध्यायां पितरस्तथा ॥ 48.15 ॥

tasmād devā divā rātrāvasurāstu balānvitāḥ jyotsnāgame ca manujāḥ sandhyāyāṁ pitarastathā

इसीलिए देवता दिन में बलवान होते हैं और असुर रात्रि में बलवान होते हैं; मनुष्य ज्योत्स्ना के आगमन पर और पितर सन्ध्या में बलवान होते हैं।

श्लोक 16 (markandeya.48.16)

भवन्ति बलिनोऽधृष्या विपक्षाणां न संशयः । तद्विपर्ययमासाद्य प्रयान्ति च विपर्ययम् ॥ 48.16 ॥

bhavanti balino'dhṛṣyā vipakṣāṇāṁ na saṁśayaḥ tadviparyayamāsādya prayānti ca viparyayam

उस-उस समय वे निश्चय ही बलवान और अपने विपक्षियों के लिए अजेय हो जाते हैं; किन्तु उसका उल्टा समय आने पर वे भी विपरीत (निर्बल) दशा को प्राप्त हो जाते हैं।

श्लोक 17 (markandeya.48.17)

ज्योत्स्नो रात्र्यहनी सन्ध्या चत्वार्येतानि वै प्रभोः । ब्रह्मणस्तु शरीराणि त्रिगुणोपश्रितानि तु ॥ 48.17 ॥

jyotsno rātryahanī sandhyā catvāryetāni vai prabhoḥ brahmaṇastu śarīrāṇi triguṇopaśritāni tu

ज्योत्स्ना, रात्रि, दिन और सन्ध्या — ये चारों ही उन प्रभु ब्रह्मा के शरीर हैं, जो तीनों गुणों के आश्रित हैं।

श्लोक 18 (markandeya.48.18)

चत्वार्येतान्यथोत्पाद्य तनुमन्यां प्रजापतिः । रजस्तमोमयीं रात्रौ जगृहे क्षुत्तृडन्वितः ॥ 48.18 ॥

catvāryetānyathotpādya tanumanyāṁ prajāpatiḥ rajastamomayīṁ rātrau jagṛhe kṣuttṛḍanvitaḥ

इन चारों को उत्पन्न करके प्रजापति ने रात्रि में भूख-प्यास से पीड़ित होकर रज-तमोमय एक और शरीर धारण किया।

श्लोक 19 (markandeya.48.19)

तदन्धकारे क्षुत्क्षामानसृजद् भगवानजः । विरूपान् श्मश्रुलानत्तुमारब्धास्ते च तां तनुम् ॥ 48.19 ॥

tadandhakāre kṣutkṣāmānasṛjad bhagavānajaḥ virūpān śmaśrulānattumārabdhāste ca tāṁ tanum

उस अन्धकार में भूख से क्षीण अजन्मा भगवान् ने विरूप, दाढ़ी-मूँछ वाले प्राणी उत्पन्न किए, जो तुरन्त ही उस शरीर को खाने में लग गए।

श्लोक 20 (markandeya.48.20)

रक्षाम इति तेभ्योऽन्ये य ऊचुस्ते तु राक्षसाः । खादाम इति ये चोचुस्ते यक्षा यक्षणात् द्विज ॥ 48.20 ॥

rakṣāma iti tebhyo'nye ya ūcuste tu rākṣasāḥ khādāma iti ye cocuste yakṣā yakṣaṇāt dvija

उनमें से जिन्होंने कहा 'हम रक्षा करेंगे' वे राक्षस कहलाए; और हे द्विज! जिन्होंने कहा 'हम खाएँगे' वे 'यक्षण' (खाने) के कारण यक्ष कहलाए।

श्लोक 21 (markandeya.48.21)

तान् दृष्ट्वा ह्यप्रियेणास्य केशाः शीर्यन्त वेधसः । समारोहणहीनाश्च शिरसो ब्रह्मणस्तु ते ॥ 48.21 ॥

tān dṛṣṭvā hyapriyeṇāsya keśāḥ śīryanta vedhasaḥ samārohaṇahīnāśca śiraso brahmaṇastu te

उन्हें देखकर अप्रसन्न हुए विधाता ब्रह्मा के केश झड़ गए; उनके सिर से जो केश जड़रहित होकर गिरे —

श्लोक 22 (markandeya.48.22)

सर्पणात्तेऽभवन् सर्पा हीनत्वादहयः स्मृताः । सर्पान् दृष्ट्वा ततः क्रोधात् क्रोधात्मानो विनिर्ममे ॥ 48.22 ॥

sarpaṇātte'bhavan sarpā hīnatvādahayaḥ smṛtāḥ sarpān dṛṣṭvā tataḥ krodhāt krodhātmāno vinirmame

— वे रेंगने के कारण सर्प कहलाए, और गिरे हुए (हीन) होने के कारण 'अहि' भी कहे गए; उन सर्पों को देखकर उन्होंने क्रोधवश क्रोधस्वरूप प्राणी रचे।

श्लोक 23 (markandeya.48.23)

वर्णेन कपिलेनोग्रास्ते भूताः पिशिताशनाः । ध्यायतो गां ततस्तस्य गन्धर्वा जज्ञिरे सुताः ॥ 48.23 ॥

varṇena kapilenogrāste bhūtāḥ piśitāśanāḥ dhyāyato gāṁ tatastasya gandharvā jajñire sutāḥ

कपिल वर्ण वाले और उग्र वे प्राणी मांसभक्षी भूत बने; तत्पश्चात् गौ (वाणी) का ध्यान करते हुए उनके पुत्ररूप गन्धर्व उत्पन्न हुए।

श्लोक 24 (markandeya.48.24)

जज्ञिरे पिबतो वाचं गन्धर्वास्तेन ते स्मृताः । अष्टास्वेतासु सृष्टासु देवयोनिषु स प्रभुः ॥ 48.24 ॥

jajñire pibato vācaṁ gandharvāstena te smṛtāḥ aṣṭāsvetāsu sṛṣṭāsu devayoniṣu sa prabhuḥ

वाणी का पान करते हुए वे उत्पन्न हुए, इसीलिए वे 'गन्धर्व' कहलाए; इन आठ देवयोनियों की सृष्टि हो जाने पर वे प्रभु —

श्लोक 25 (markandeya.48.25)

ततः स्वदेहतोऽन्यानि वयांसि पशवोऽसृजत् । मुखतोऽजाः ससर्जाथ वक्षसश्चावयोऽसृजत् ॥ 48.25 ॥

tataḥ svadehato'nyāni vayāṁsi paśavo'sṛjat mukhato'jāḥ sasarjātha vakṣasaścāvayo'sṛjat

— तत्पश्चात् अपने ही शरीर से अन्य पक्षी और पशु उत्पन्न करने लगे; अपने मुख से उन्होंने बकरे और वक्षःस्थल से भेड़ें उत्पन्न कीं।

श्लोक 26 (markandeya.48.26)

गावश्चैवोदराद् ब्रह्मा पार्श्वाभ्याञ्च विनिर्ममे । पद्भ्याञ्चाश्वान् स मातङ्गान् रासबान् शशकान् मृगान् ॥ 48.26 ॥

gāvaścaivodarād brahmā pārśvābhyāñca vinirmame padbhyāñcāśvān sa mātaṅgān rāsabān śaśakān mṛgān

ब्रह्मा ने अपने उदर और दोनों पार्श्वों से गौओं की रचना की, तथा अपने पैरों से घोड़े, हाथी, गधे, खरगोश और मृगों को उत्पन्न किया।

श्लोक 27 (markandeya.48.27)

उष्ट्रानश्वतरांश्चैव नानारूपाश्च जातयः । ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे ॥ 48.27 ॥

uṣṭrānaśvatarāṁścaiva nānārūpāśca jātayaḥ oṣadhyaḥ phalamūlinyo romabhyastasya jajñire

ऊँट, खच्चर तथा अन्य नाना रूपों की जातियाँ भी उत्पन्न कीं; और उनके रोमों से फल-मूल वाली ओषधियाँ उत्पन्न हुईं।

श्लोक 28 (markandeya.48.28)

एवं पश्वोषधीः सृष्ट्वा ह्ययजच्चाध्वरे विभुः । तस्मादादौ तु कल्पस्य त्रेतायुगमुखे तदा ॥ 48.28 ॥

evaṁ paśvoṣadhīḥ sṛṣṭvā hyayajaccādhvare vibhuḥ tasmādādau tu kalpasya tretāyugamukhe tadā

इस प्रकार पशुओं और ओषधियों को उत्पन्न करके उन प्रभु ने यज्ञ किया; तभी से, कल्प के आरम्भ में, त्रेतायुग के मुख में —

श्लोक 29 (markandeya.48.29)

गौरजः पुरुषो मेषो अश्वाश्वतरगर्दभाः । एतान् ग्राम्यान् पशूनाहुरारण्यांश्च निबोध मे ॥ 48.29 ॥

gaurajaḥ puruṣo meṣo aśvāśvataragardabhāḥ etān grāmyān paśūnāhurāraṇyāṁśca nibodha me

— गौ, बकरा, पुरुष, भेड़, घोड़ा, खच्चर और गधा — इन्हें ग्राम्य पशु कहा गया है; अब मुझसे वन्य पशुओं को भी जानो।

श्लोक 30 (markandeya.48.30)

श्वापदं द्विखुरं हस्ती वानराः पक्षिपञ्चमाः । औदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमास्तु सरीसृपाः ॥ 48.30 ॥

śvāpadaṁ dvikhuraṁ hastī vānarāḥ pakṣipañcamāḥ audakāḥ paśavaḥ ṣaṣṭhāḥ saptamāstu sarīsṛpāḥ

हिंसक जन्तु, द्विखुर पशु, हाथी, वानर, पाँचवें पक्षी, छठे जलचर पशु, और सातवें सरीसृप — ये सब वन्य पशु हैं।

श्लोक 31 (markandeya.48.31)

गायत्रीञ्च ऋचञ्चैव त्रिवृत् सोमं रथन्तरम् । अग्निष्टोमञ्च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात् ॥ 48.31 ॥

gāyatrīñca ṛcañcaiva trivṛt somaṁ rathantaram agniṣṭomañca yajñānāṁ nirmame prathamānmukhāt

उन्होंने अपने पूर्व (पूर्व दिशा के) मुख से यज्ञों के लिए गायत्री छन्द, ऋग्वेद, त्रिवृत्सोम, रथन्तर साम तथा अग्निष्टोम की रचना की।

श्लोक 32 (markandeya.48.32)

यजूंषि त्रैष्टुभं धन्दः स्तोमं पञ्चदशन्तथा । बृहत् साम तथोकथञ्च दक्षिणादसृजन्मुखात् ॥ 48.32 ॥

yajūṁṣi traiṣṭubhaṁ dhandaḥ stomaṁ pañcadaśantathā bṛhat sāma tathokathañca dakṣiṇādasṛjanmukhāt

दक्षिण मुख से उन्होंने यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पन्द्रह स्तोम, बृहत्साम और उक्थ्य यज्ञ की रचना की।

श्लोक 33 (markandeya.48.33)

सामानि जगतीच्छन्दः स्तोमं पञ्चदशन्तथा । वैरूपमतिरात्रञ्च निर्ममे पश्चिमान्मुखात् ॥ 48.33 ॥

sāmāni jagatīcchandaḥ stomaṁ pañcadaśantathā vairūpamatirātrañca nirmame paścimānmukhāt

पश्चिम मुख से उन्होंने सामवेद, जगती छन्द, पन्द्रह स्तोम, वैरूप साम और अतिरात्र यज्ञ की रचना की।

श्लोक 34 (markandeya.48.34)

एकविशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च । अनुष्टुभं सवैराजमुत्तरादसृजन्मुखात् ॥ 48.34 ॥

ekaviśamatharvāṇamāptoryāmāṇameva ca anuṣṭubhaṁ savairājamuttarādasṛjanmukhāt

उत्तर मुख से उन्होंने इक्कीसवें स्तोम, अथर्ववेद, आप्तोर्याम यज्ञ, अनुष्टुप् छन्द तथा वैराज साम को उत्पन्न किया।

श्लोक 35 (markandeya.48.35)

विद्युतोऽशनिमेघाश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च । वयांसि च ससर्जादौ कल्पस्य भगवान् विभुः ॥ 48.35 ॥

vidyuto'śanimeghāśca rohitendradhanūṁṣi ca vayāṁsi ca sasarjādau kalpasya bhagavān vibhuḥ

कल्प के आरम्भ में भगवान् प्रभु ने बिजली, वज्र, मेघ, इन्द्रधनुष और पक्षियों की भी रचना की।

श्लोक 36 (markandeya.48.36)

उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तलस्य जज्ञिरे । सृष्ट्वा चतुष्टयं पूर्वं देवासुरपितॄन् प्रजाः ॥ 48.36 ॥

uccāvacāni bhūtāni gātrebhyastalasya jajñire sṛṣṭvā catuṣṭayaṁ pūrvaṁ devāsurapitṝn prajāḥ

उन बुद्धिमान प्रभु के अंगों से ऊँच-नीच अनेक प्रकार के प्राणी उत्पन्न हुए; पहले देव, असुर, पितर और मनुष्य — यह चतुष्टय रचकर —

श्लोक 37 (markandeya.48.37)

ततोऽसृजत् स भूतानि स्थावराणि चराणि च । यक्षान् पिशाचान् गन्धर्वांस्तथैवाप्सरसाङ्गणान् ॥ 48.37 ॥

tato'sṛjat sa bhūtāni sthāvarāṇi carāṇi ca yakṣān piśācān gandharvāṁstathaivāpsarasāṅgaṇān

— उन्होंने फिर स्थावर और जंगम प्राणियों की रचना की — यक्ष, पिशाच, गन्धर्व तथा उनके परिवार सहित अप्सराएँ।

श्लोक 38 (markandeya.48.38)

नरकिन्नररक्षांसि वयः पशुमृगोरगान् । अव्ययञ्च व्ययञ्चैव यदिदं स्थाणुजङ्गमम् ॥ 48.38 ॥

narakinnararakṣāṁsi vayaḥ paśumṛgoragān avyayañca vyayañcaiva yadidaṁ sthāṇujaṅgamam

मनुष्य, किन्नर, राक्षस, पक्षी, पशु, मृग, सर्प — यह सब कुछ, अविनाशी और विनाशी, जो भी स्थावर-जंगम है।

श्लोक 39 (markandeya.48.39)

तेषां ये यानि कर्माणि प्राक् सृष्टेः प्रतिपेदिरे । तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ 48.39 ॥

teṣāṁ ye yāni karmāṇi prāk sṛṣṭeḥ pratipedire tānyeva pratipadyante sṛjyamānāḥ punaḥ punaḥ

पूर्व सृष्टि में इन प्राणियों ने जो-जो कर्म किए थे, उन्हीं कर्मों को ये बार-बार उत्पन्न होते हुए फिर से ग्रहण करते हैं।

श्लोक 40 (markandeya.48.40)

हिंस्त्राहिंस्त्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते । तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥ 48.40 ॥

hiṁstrāhiṁstre mṛdukrūre dharmādharmāvṛtānṛte tadbhāvitāḥ prapadyante tasmāttattasya rocate

हिंसक-अहिंसक, कोमल-क्रूर, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य — उन्हीं पूर्व-संस्कारों से भावित होकर वे उसी को अपनाते हैं, इसीलिए वही उन्हें प्रिय लगता है।

श्लोक 41 (markandeya.48.41)

इन्द्रियार्थेषु भूतेषु शरीरेषु च स प्रभुः । नानात्वं विनियोगञ्च धातैव व्यदधात् स्वयम् ॥ 48.41 ॥

indriyārtheṣu bhūteṣu śarīreṣu ca sa prabhuḥ nānātvaṁ viniyogañca dhātaiva vyadadhāt svayam

इन्द्रिय-विषयों में, प्राणियों में और शरीरों में विविधता तथा उनका उचित प्रयोग स्वयं उन विधाता ने ही निर्धारित किया।

श्लोक 42 (markandeya.48.42)

नाम रूपञ्च भूतानां कृत्यानाञ्च प्रपञ्चनम् । वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनाञ्चकार सः ॥ 48.42 ॥

nāma rūpañca bhūtānāṁ kṛtyānāñca prapañcanam vedaśabdebhya evādau devādīnāñcakāra saḥ

प्राणियों के नाम-रूप और कर्तव्यों का विस्तार उन्होंने सृष्टि के आरम्भ में देवादि के लिए वेद के शब्दों से ही रचा।

श्लोक 43 (markandeya.48.43)

ऋषीणां नामधेयानि याश्च देवेषु सृष्टयः । शर्वर्यन्ते प्रसूतानामन्येषाञ्च ददाति सः ॥ 48.43 ॥

ṛṣīṇāṁ nāmadheyāni yāśca deveṣu sṛṣṭayaḥ śarvaryante prasūtānāmanyeṣāñca dadāti saḥ

ऋषियों के नाम तथा देवताओं में जो-जो सृष्टियाँ होती हैं, उस रात्रि के अन्त में उत्पन्न हुए अन्य प्राणियों के भी नाम वे ही निर्धारित करते हैं।

श्लोक 44 (markandeya.48.44)

यथर्तावृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्यये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ 48.44 ॥

yathartāvṛtuliṅgāni nānārūpāṇi paryaye dṛśyante tāni tānyeva tathā bhāvā yugādiṣu

जैसे बदलती ऋतुओं में उन्हीं-उन्हीं ऋतुओं के चिह्न नाना रूपों में बार-बार दिखाई देते हैं, वैसे ही युगों के आरम्भ में वही-वही भाव पुनः प्रकट होते हैं।

श्लोक 45 (markandeya.48.45)

एवंविधाः सृष्टयस्तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । शर्वर्यन्ते प्रबुद्धस्य कल्पे कल्पे भवन्ति वै ॥ 48.45 ॥

evaṁvidhāḥ sṛṣṭayastu brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ śarvaryante prabuddhasya kalpe kalpe bhavanti vai

इस प्रकार अव्यक्त से जन्म लेने वाले ब्रह्मा की ऐसी सृष्टियाँ प्रत्येक कल्प में, रात्रि के अन्त में जागृत होने पर, बार-बार होती रहती हैं।

अध्याय 47अध्याय-सूचीअध्याय 49