Skip to main content

सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 49

मनुष्य-सृष्टि का वर्णन

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

श्लोक 1 (markandeya.49.1)

क्रौष्टुकिरुवाच अर्वाक्स्त्रोतस्तु कथितो भवता यस्तु मानुषः । ब्रह्मन् ! विस्तरतो ब्रूहि ब्रह्मा समसृजद्यथा ॥ 49.1 ॥

krauṣṭukiruvāca arvākstrotastu kathito bhavatā yastu mānuṣaḥ brahman ! vistarato brūhi brahmā samasṛjadyathā

क्रौष्टुकि ने कहा — आपने 'अर्वाक्स्रोत' अर्थात् मानव सृष्टि का वर्णन किया; हे ब्रह्मन्! अब यह विस्तार से कहिए कि ब्रह्मा ने उसकी रचना किस प्रकार की।

श्लोक 2 (markandeya.49.2)

यथा च वर्णानसृजद्यद् गुणाश्च महामते । यच्च येषां स्मृतं कर्म विप्रादीनां वदस्व तत् ॥ 49.2 ॥

yathā ca varṇānasṛjadyad guṇāśca mahāmate yacca yeṣāṁ smṛtaṁ karma viprādīnāṁ vadasva tat

हे महामते! उन्होंने वर्णों की रचना किस प्रकार की और उनमें कौन-कौन से गुण हैं, तथा ब्राह्मण आदि का जो-जो कर्म स्मृत है, वह भी मुझे बताइए।

श्लोक 3 (markandeya.49.3)

मार्कण्डेय उवाच ब्रह्मणः सृजतः पूर्वं सत्याभिध्यायिनस्तथा । मिथुनानां सहस्रन्तु मुखात् सोऽथासृजन्मुने ॥ 49.3 ॥

mārkaṇḍeya uvāca brahmaṇaḥ sṛjataḥ pūrvaṁ satyābhidhyāyinastathā mithunānāṁ sahasrantu mukhāt so'thāsṛjanmune

मार्कण्डेय ने कहा — सत्य-संकल्प ब्रह्मा ने सृष्टि करते हुए सर्वप्रथम, हे मुने! अपने मुख से एक सहस्र मिथुनों (युगलों) को उत्पन्न किया।

श्लोक 4 (markandeya.49.4)

जातास्ते ह्यु पपद्यन्ते सत्त्वोद्रिक्ताः स्वतेजसः । सहस्रमन्यद्वक्षस्तो मिथुनानां ससर्ज ह ॥ 49.4 ॥

jātāste hyu papadyante sattvodriktāḥ svatejasaḥ sahasramanyadvakṣasto mithunānāṁ sasarja ha

उत्पन्न होते ही वे सत्त्वगुण की अधिकता से युक्त, अपने ही तेज से प्रकाशित हो उठे; तत्पश्चात् उन्होंने अपने वक्षःस्थल से एक और सहस्र मिथुन उत्पन्न किए।

श्लोक 5 (markandeya.49.5)

ते सर्वे रजसोद्रिक्ताः शुष्मिणश्चाप्यमर्षिणः । ससर्जान्यते सहस्रन्तु द्वन्द्वानामूरुतः पुनः ॥ 49.5 ॥

te sarve rajasodriktāḥ śuṣmiṇaścāpyamarṣiṇaḥ sasarjānyate sahasrantu dvandvānāmūrutaḥ punaḥ

वे सब रजोगुण की अधिकता वाले, बलशाली और असहिष्णु स्वभाव के थे; तत्पश्चात् उन्होंने पुनः अपनी जाँघों से एक और सहस्र युगल उत्पन्न किए।

श्लोक 6 (markandeya.49.6)

रजस्तमोभ्यामुद्रिक्ता ईहाशीलास्तु ते स्मृताः । पद्भ्यां सहस्रमन्यच्च मिथुनानां ससर्ज ह ॥ 49.6 ॥

rajastamobhyāmudriktā īhāśīlāstu te smṛtāḥ padbhyāṁ sahasramanyacca mithunānāṁ sasarja ha

वे रज और तम दोनों गुणों की अधिकता वाले, चंचल स्वभाव के स्मृत हैं; तत्पश्चात् उन्होंने अपने पैरों से एक और सहस्र मिथुन उत्पन्न किए।

श्लोक 7 (markandeya.49.7)

उद्रिक्तास्तमसा सर्वे निः श्रीका ह्यल्पचेतसः । ततः संहर्षमाणास्ते द्वन्द्वोत्पन्नास्तु प्राणिनः ॥ 49.7 ॥

udriktāstamasā sarve niḥ śrīkā hyalpacetasaḥ tataḥ saṁharṣamāṇāste dvandvotpannāstu prāṇinaḥ

वे सब तमोगुण की अधिकता वाले, शोभाहीन और अल्पबुद्धि थे; तत्पश्चात् युगल रूप में उत्पन्न वे प्राणी परस्पर हर्षित होने लगे —

श्लोक 8 (markandeya.49.8)

अन्योन्यहृर्च्छ्याविष्टा मैथुनायोपचक्रमुः । ततः प्रभृति कल्पेऽस्मिन् मिथुनानां हि सम्भवः ॥ 49.8 ॥

anyonyahṛrcchyāviṣṭā maithunāyopacakramuḥ tataḥ prabhṛti kalpe'smin mithunānāṁ hi sambhavaḥ

— एक-दूसरे की चाह से व्याकुल होकर वे मैथुन में प्रवृत्त हुए। इस कल्प में तभी से युगलों द्वारा प्रजा-उत्पत्ति आरम्भ हुई।

श्लोक 9 (markandeya.49.9)

मासि मास्यार्तवं यत् तु न तदासीत्तु योषिताम् । तस्मात्तदा न सुषुवुः सेवितैरपि मैथुनैः ॥ 49.9 ॥

māsi māsyārtavaṁ yat tu na tadāsīttu yoṣitām tasmāttadā na suṣuvuḥ sevitairapi maithunaiḥ

किन्तु उस समय स्त्रियों को मासिक धर्म (आर्तव) नहीं होता था, इसीलिए मैथुन का सेवन करने पर भी वे तब गर्भधारण नहीं करती थीं।

श्लोक 10 (markandeya.49.10)

आयुषोऽन्ते प्रसूयन्ते मिथुनान्येव ताः सकृत् । ततः प्रभृति कल्पेऽस्मिन् मिथुनानां हि सम्भवः ॥ 49.10 ॥

āyuṣo'nte prasūyante mithunānyeva tāḥ sakṛt tataḥ prabhṛti kalpe'smin mithunānāṁ hi sambhavaḥ

वे आयु के अन्त में केवल एक बार युगल को जन्म देती थीं; इस कल्प में तभी से युगलों द्वारा ही प्रजा-उत्पत्ति होने लगी।

श्लोक 11 (markandeya.49.11)

ध्यानेन मनसा तासां प्रजानां जायते सकृत् । शब्दादिर्विषयः शुद्धः प्रत्येकं पञ्चलक्षणः ॥ 49.11 ॥

dhyānena manasā tāsāṁ prajānāṁ jāyate sakṛt śabdādirviṣayaḥ śuddhaḥ pratyekaṁ pañcalakṣaṇaḥ

उन प्रजाओं की संतान केवल मन के ध्यान मात्र से एक बार उत्पन्न हो जाती थी; शब्द आदि विषय शुद्ध थे और प्रत्येक अपने पाँच लक्षणों से युक्त था।

श्लोक 12 (markandeya.49.12)

इत्येषा मानुषी सृष्टिर्या पूर्वं वै प्रजापतेः । तस्यान्ववायसम्भूता यैरिदं पूरितं जगत् ॥ 49.12 ॥

ityeṣā mānuṣī sṛṣṭiryā pūrvaṁ vai prajāpateḥ tasyānvavāyasambhūtā yairidaṁ pūritaṁ jagat

यह प्रजापति की वह प्रथम मानव सृष्टि है, जिसके वंश से उत्पन्न प्राणियों से यह सम्पूर्ण जगत् भर गया है।

श्लोक 13 (markandeya.49.13)

सरित्सरः समुद्रांश्च सेवन्ते पर्वतानपि । तास्तदा ह्यल्पशीतोष्णा युगे तस्मिंश्चरन्ति वै ॥ 49.13 ॥

saritsaraḥ samudrāṁśca sevante parvatānapi tāstadā hyalpaśītoṣṇā yuge tasmiṁścaranti vai

वे नदी, सरोवर, समुद्र और पर्वतों का सेवन करते थे; उस युग में अत्यन्त सुखद शीत-उष्ण के बिना वे स्वतन्त्र विचरण करते थे।

श्लोक 14 (markandeya.49.14)

तृप्तिं स्वाभाविकीं प्राप्ता विषयेषु महामते । न तासां प्रतिघातोऽस्ति न द्वेषो नापि मत्सरः ॥ 49.14 ॥

tṛptiṁ svābhāvikīṁ prāptā viṣayeṣu mahāmate na tāsāṁ pratighāto'sti na dveṣo nāpi matsaraḥ

हे महामते! वे विषयों में स्वाभाविक तृप्ति को प्राप्त थे; उनमें न कोई द्वेष था, न वैर और न ही ईर्ष्या।

श्लोक 15 (markandeya.49.15)

पर्वतोदधिसेविन्यो ह्यनिकेतास्तु सर्वशः । ता वै निष्कामचारिण्यो नित्यं मुदितमानसाः ॥ 49.15 ॥

parvatodadhisevinyo hyaniketāstu sarvaśaḥ tā vai niṣkāmacāriṇyo nityaṁ muditamānasāḥ

पर्वत और समुद्र का सेवन करने वाले, सर्वथा गृहरहित, इच्छा से मुक्त होकर विचरण करने वाले वे सदा प्रसन्नचित्त रहते थे।

श्लोक 16 (markandeya.49.16)

पिशाचोरगरक्षांसि तथा मत्सरिणो जनाः । पशवः पक्षिणश्चैव नक्रा मत्स्याः सरीसृपाः ॥ 49.16 ॥

piśācoragarakṣāṁsi tathā matsariṇo janāḥ paśavaḥ pakṣiṇaścaiva nakrā matsyāḥ sarīsṛpāḥ

इसके विपरीत पिशाच, सर्प, राक्षस, तथा ईर्ष्यालु मनुष्य, पशु, पक्षी, मगर, मत्स्य और सरीसृप —

श्लोक 17 (markandeya.49.17)

अवारका ह्यण्डजा वा ते ह्यधर्मप्रसूतयः । न मूलफलपुष्पाणि नार्तवा वत्सराणि च ॥ 49.17 ॥

avārakā hyaṇḍajā vā te hyadharmaprasūtayaḥ na mūlaphalapuṣpāṇi nārtavā vatsarāṇi ca

— चाहे गर्भ से हों या अण्ड से उत्पन्न हुए हों, वे सब अधर्म से उत्पन्न हैं। उस समय न मूल-फल-पुष्प थे, न ऋतुएँ थीं और न ही वर्ष।

श्लोक 18 (markandeya.49.18)

सर्वकालसुखः कालो नात्यर्थं घर्मशीतता । कालेन गच्छता तेषां चित्रा सिद्धिरजायत ॥ 49.18 ॥

sarvakālasukhaḥ kālo nātyarthaṁ gharmaśītatā kālena gacchatā teṣāṁ citrā siddhirajāyata

काल सदा सुखद था, न अधिक गर्मी थी न सर्दी; समय बीतने के साथ उनके लिए एक विचित्र सिद्धि (शक्ति) उत्पन्न हुई।

श्लोक 19 (markandeya.49.19)

ततश्च तेषां पूर्वाह्ने मध्याह्ने च वितृप्तता । पुनस्तथेच्छतां तृप्तिरनायासेन साभवत् ॥ 49.19 ॥

tataśca teṣāṁ pūrvāhne madhyāhne ca vitṛptatā punastathecchatāṁ tṛptiranāyāsena sābhavat

उससे पूर्वाह्न और मध्याह्न में उन्हें तृप्ति मिलती थी, और जब भी वे पुनः चाहते, बिना किसी प्रयास के उन्हें तृप्ति प्राप्त हो जाती थी।

श्लोक 20 (markandeya.49.20)

इच्छताञ्च तथायासो मनसः समजायत । अपां सौक्ष्म्यं ततस्तासां सिद्धिर्नानारसोल्लसा ॥ 49.20 ॥

icchatāñca tathāyāso manasaḥ samajāyata apāṁ saukṣmyaṁ tatastāsāṁ siddhirnānārasollasā

जो चाहते थे, उनके मन में इच्छा-मात्र से ही वह प्राप्त हो जाता था; तत्पश्चात् जल की सूक्ष्मता से उनके लिए नाना रसों से युक्त एक और सिद्धि उत्पन्न हुई।

श्लोक 21 (markandeya.49.21)

समजायत चैवान्या सर्वकामप्रदायिनी । असंस्कार्यैः शरीरैश्च प्रजास्ताः स्थिरयौवनाः ॥ 49.21 ॥

samajāyata caivānyā sarvakāmapradāyinī asaṁskāryaiḥ śarīraiśca prajāstāḥ sthirayauvanāḥ

और भी एक सर्वकामप्रदायिनी सिद्धि उत्पन्न हुई; उन प्रजाओं के शरीर बिना किसी संस्कार के ही सदा युवावस्था में स्थिर रहते थे।

श्लोक 22 (markandeya.49.22)

तासां विना तु संकल्पं जायन्ते मिथुनाः प्रजाः । समं जन्म च रूपञ्च म्रियन्ते चैव ताः समम् ॥ 49.22 ॥

tāsāṁ vinā tu saṁkalpaṁ jāyante mithunāḥ prajāḥ samaṁ janma ca rūpañca mriyante caiva tāḥ samam

उनके संकल्प के बिना ही युगल संतान उत्पन्न होती थी; वे समान जन्म और समान रूप वाली होती थीं, और साथ-साथ ही मृत्यु को प्राप्त होती थीं।

श्लोक 23 (markandeya.49.23)

अनिच्छाद्वेषसंयुक्ता वर्तन्ते तु परस्परम् । तुल्यरूपायुषः सर्वा अधमोत्तमतां विना ॥ 49.23 ॥

anicchādveṣasaṁyuktā vartante tu parasparam tulyarūpāyuṣaḥ sarvā adhamottamatāṁ vinā

इच्छा और द्वेष से रहित होकर वे परस्पर साथ रहती थीं; सब समान रूप और समान आयु वाली थीं, उनमें कोई ऊँच-नीच नहीं था।

श्लोक 24 (markandeya.49.24)

तत्वारि तु सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु । आयुः प्रमाणं जीवन्ति न च क्लेशाद्विपत्तयः ॥ 49.24 ॥

tatvāri tu sahasrāṇi varṣāṇāṁ mānuṣāṇi tu āyuḥ pramāṇaṁ jīvanti na ca kleśādvipattayaḥ

मनुष्यों की आयु का प्रमाण चार हजार वर्ष था, और वे बिना किसी क्लेश या विपत्ति के जीवन व्यतीत करते थे।

श्लोक 25 (markandeya.49.25)

क्वचित् क्वचित् पुनः साभूत् क्षितिर्भाग्येन सर्वशः । कालेन गच्छता नाशमुपयान्ति यथा प्रजाः ॥ 49.25 ॥

kvacit kvacit punaḥ sābhūt kṣitirbhāgyena sarvaśaḥ kālena gacchatā nāśamupayānti yathā prajāḥ

जैसे प्रजाएँ कालक्रम से नाश को प्राप्त होती हैं, वैसे ही यत्र-तत्र पृथ्वी की वह सम्पन्नता भी समय के साथ सर्वत्र नाश को प्राप्त होने लगी।

श्लोक 26 (markandeya.49.26)

तथा ताः क्रमशो नाशं जग्मुः सर्वत्र सिद्धयः । तासु सर्वासु नष्टासु नभसः प्रच्युता नराः ॥ 49.26 ॥

tathā tāḥ kramaśo nāśaṁ jagmuḥ sarvatra siddhayaḥ tāsu sarvāsu naṣṭāsu nabhasaḥ pracyutā narāḥ

इस प्रकार वे सिद्धियाँ भी क्रमशः सर्वत्र नष्ट हो गईं; और जब वे सब नष्ट हो गईं, तब मनुष्य आकाश (उस निराकुल अवस्था) से च्युत हुए।

श्लोक 27 (markandeya.49.27)

प्रायशः कल्पवृक्षास्ते संभूता गृहसंज्ञिताः । सर्वे प्रत्युपभोगाश्च तासं तेभ्यः प्रजायते ॥ 49.27 ॥

prāyaśaḥ kalpavṛkṣāste saṁbhūtā gṛhasaṁjñitāḥ sarve pratyupabhogāśca tāsaṁ tebhyaḥ prajāyate

तब प्रायः 'गृह' नामक कल्पवृक्ष उत्पन्न हुए, जिनसे उन प्रजाओं के लिए हर प्रकार का भोग उत्पन्न होने लगा।

श्लोक 28 (markandeya.49.28)

वर्तयन्ति स्म तेभ्यस्तास्त्रेतायुगमुखे तदा । ततः कालेन वै रागस्तासामाकस्मिकोऽभवत् ॥ 49.28 ॥

vartayanti sma tebhyastāstretāyugamukhe tadā tataḥ kālena vai rāgastāsāmākasmiko'bhavat

त्रेतायुग के आरम्भ में वे उन्हीं से अपना जीवन-निर्वाह करते थे; तत्पश्चात् समय के साथ उनमें अकस्मात् राग उत्पन्न हो गया।

श्लोक 29 (markandeya.49.29)

मासि मास्यार्तवोत्पत्त्या गर्भोत्पत्तिः पुनः पुनः । रागोत्पत्त्या ततस्तासां वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः ॥ 49.29 ॥

māsi māsyārtavotpattyā garbhotpattiḥ punaḥ punaḥ rāgotpattyā tatastāsāṁ vṛkṣāste gṛhasaṁjñitāḥ

मासिक आर्तव (ऋतुस्राव) की उत्पत्ति से बार-बार गर्भ की उत्पत्ति होने लगी; और राग की उत्पत्ति के बाद भी वे 'गृह' नामक वृक्ष उनका आधार बने रहे।

श्लोक 30 (markandeya.49.30)

ब्रह्मन्नन्वपरेषान्तु पेतुः शाखा महीरुहाम् । वस्त्राणि च प्रसूयन्ते फलेष्वाभरणानि च ॥ 49.30 ॥

brahmannanvapareṣāntu petuḥ śākhā mahīruhām vastrāṇi ca prasūyante phaleṣvābharaṇāni ca

हे ब्रह्मन्! फिर उन विशाल वृक्षों की शाखाओं से वस्त्र गिरने लगे, और उनके फलों में आभूषण उत्पन्न होने लगे।

श्लोक 31 (markandeya.49.31)

तेष्वेव जायते तेषां गन्धवर्णरसान्वितम् । अमाक्षिकं माहवीर्यं पुटके पुटके मधु ॥ 49.31 ॥

teṣveva jāyate teṣāṁ gandhavarṇarasānvitam amākṣikaṁ māhavīryaṁ puṭake puṭake madhu

उन्हीं वृक्षों के प्रत्येक कोश में गन्ध, वर्ण और रस से युक्त, अत्यन्त शक्तिशाली और मक्खी-रहित मधु उत्पन्न होता था।

श्लोक 32 (markandeya.49.32)

तेन वा वर्तयन्ति स्म मुखे त्रेयायुगस्य वै । ततः कालान्तरेणैव पुनर्लोभान्वितास्तु ताः ॥ 49.32 ॥

tena vā vartayanti sma mukhe treyāyugasya vai tataḥ kālāntareṇaiva punarlobhānvitāstu tāḥ

त्रेतायुग के आरम्भ में वे उसी से अपना जीवन-निर्वाह करते थे; परन्तु कुछ काल बीतने पर वे पुनः लोभ से ग्रस्त हो गए।

श्लोक 33 (markandeya.49.33)

वृक्षांस्ताः पर्यगृह्णन्त ममत्वाविष्टचेतसः । नेशुस्तेनापचारेण तेऽपि तासां महीरुहाः ॥ 49.33 ॥

vṛkṣāṁstāḥ paryagṛhṇanta mamatvāviṣṭacetasaḥ neśustenāpacāreṇa te'pi tāsāṁ mahīruhāḥ

ममत्व से आविष्ट चित्त होकर उन्होंने उन वृक्षों को अपने-अपने अधिकार में ले लिया; उस अपराध के कारण वे विशाल वृक्ष भी उनके लिए नष्ट हो गए।

श्लोक 34 (markandeya.49.34)

ततो द्वन्द्वान्यजायन्ते शीतोष्णक्षुन्मुखानि वै । तास्तद्द्वन्द्वोपघातार्थं चक्रुः पूर्वं पुराणि तु ॥ 49.34 ॥

tato dvandvānyajāyante śītoṣṇakṣunmukhāni vai tāstaddvandvopaghātārthaṁ cakruḥ pūrvaṁ purāṇi tu

तब शीत-उष्ण और भूख आदि द्वन्द्व उत्पन्न होने लगे; उन द्वन्द्वों की पीड़ा से बचने के लिए उन्होंने पहले-पहल नगरों की रचना की।

श्लोक 35 (markandeya.49.35)

मरुधन्वषु दुर्गेषु पर्वतेषु दरीषु च । संश्रयन्ति च दुर्गाणि वार्क्षं पार्वतमौदकम् ॥ 49.35 ॥

marudhanvaṣu durgeṣu parvateṣu darīṣu ca saṁśrayanti ca durgāṇi vārkṣaṁ pārvatamaudakam

मरुस्थलों में, दुर्गों में, पर्वतों और गुफाओं में उन्होंने शरण ली, तथा वृक्ष, पर्वत और जल के दुर्गों का भी सहारा लिया।

श्लोक 36 (markandeya.49.36)

कृत्रिमञ्च तथा दुर्गं मित्वा मित्वात्मनोऽङ्गुलैः । मानार्थानि प्रमाणानि तास्तु पूर्वं प्रचक्रिरे ॥ 49.36 ॥

kṛtrimañca tathā durgaṁ mitvā mitvātmano'ṅgulaiḥ mānārthāni pramāṇāni tāstu pūrvaṁ pracakrire

तथा उन्होंने कृत्रिम दुर्ग भी बनाए; अपनी ही अँगुलियों से बार-बार माप कर उन्होंने सर्वप्रथम मान (माप) की इकाइयाँ निर्धारित कीं।

श्लोक 37 (markandeya.49.37)

परमाणुः परं सूक्ष्मं त्रषरेणुर्महीरजः । बालाग्रञ्चैव लिक्षां च यूकां चाथ यवोदरम् ॥ 49.37 ॥

paramāṇuḥ paraṁ sūkṣmaṁ traṣareṇurmahīrajaḥ bālāgrañcaiva likṣāṁ ca yūkāṁ cātha yavodaram

परमाणु सबसे सूक्ष्म है, फिर त्रसरेणु (धूलिकण), फिर पार्थिव रज, फिर बाल का अग्रभाग, लीख, जूँ, और यव (जौ) का मध्यभाग।

श्लोक 38 (markandeya.49.38)

क्रमादष्टगुणान्याहुर्यवानष्टौ तथाङ्गुलम् । षडङ्गुलं पदं तच्च वितस्तिर्द्विगुणं स्मृतम् ॥ 49.38 ॥

kramādaṣṭaguṇānyāhuryavānaṣṭau tathāṅgulam ṣaḍaṅgulaṁ padaṁ tacca vitastirdviguṇaṁ smṛtam

इनमें से प्रत्येक क्रमशः पूर्व से आठ गुना कहा गया है; आठ यवों की एक अँगुल होती है, छह अँगुलों का एक पद, और उसके दुगुने को एक वितस्ति कहा गया है।

श्लोक 39 (markandeya.49.39)

द्वे वितस्ती तथा हस्तो ब्राह्म्यतीर्थादिवेष्टनः । चतुर्हस्तं धनुर्दण्डो नाडिकार्युगमेव च ॥ 49.39 ॥

dve vitastī tathā hasto brāhmyatīrthādiveṣṭanaḥ caturhastaṁ dhanurdaṇḍo nāḍikāryugameva ca

दो वितस्तियों का एक हस्त होता है, जो ब्राह्म पद्धति से कलाई-कोहनी तक मापा जाता है; चार हस्तों का एक धनुर्दण्ड होता है, जिसे नाड़िका-युग भी कहा जाता है।

श्लोक 40 (markandeya.49.40)

धनुषां द्वे सहस्रे तु गव्यूतिस्तच्चतुर्गुणम् । प्रोक्तञ्च योजवनं प्राज्ञैः संख्यानार्थमिदं परम् ॥ 49.40 ॥

dhanuṣāṁ dve sahasre tu gavyūtistaccaturguṇam proktañca yojavanaṁ prājñaiḥ saṁkhyānārthamidaṁ param

दो हजार धनुओं की एक गव्यूति होती है, और उसकी चार गुनी एक योजन कही गई है — विद्वानों ने संख्या-गणना के लिए यह प्रमाण बताया है।

श्लोक 41 (markandeya.49.41)

चतुर्णामथ दुर्गाणां स्वसमुत्थानि त्रीणि तु । चतुर्थं कृत्रिमं दुर्गं ते चक्रुर्यत्नतस्तु वै ॥ 49.41 ॥

caturṇāmatha durgāṇāṁ svasamutthāni trīṇi tu caturthaṁ kṛtrimaṁ durgaṁ te cakruryatnatastu vai

चार प्रकार के दुर्गों में से तीन तो स्वतः उत्पन्न होते हैं, और चौथा कृत्रिम दुर्ग है, जिसे उन्होंने प्रयत्नपूर्वक स्वयं बनाया।

श्लोक 42 (markandeya.49.42)

पुरञ्च खेटकञ्चैव तद्वद् द्रोणीमुखं द्विज । शाखानगरकञ्चापि तथा कर्वटकं द्रमी ॥ 49.42 ॥

purañca kheṭakañcaiva tadvad droṇīmukhaṁ dvija śākhānagarakañcāpi tathā karvaṭakaṁ dramī

हे द्विज! पुर, खेटक, द्रोणीमुख, शाखानगरक, कर्वटक, द्रमी —

श्लोक 43 (markandeya.49.43)

ग्रामं सघोषविन्यासं तेषु चावसथान् पृथक् । सोत्सेधवप्रकारञ्च सर्वतः परिखावृतम् ॥ 49.43 ॥

grāmaṁ saghoṣavinyāsaṁ teṣu cāvasathān pṛthak sotsedhavaprakārañca sarvataḥ parikhāvṛtam

— तथा गोष्ठों की व्यवस्था वाला ग्राम — इन सबमें उन्होंने पृथक्-पृथक् निवास बनाए, जो ऊँची प्राचीर और चारों ओर खाई से घिरे होते थे।

श्लोक 44 (markandeya.49.44)

योजनार्धार्धविष्कम्भमष्टभागायतं पुरम् । प्रागुदक्प्रवणं शस्तं शुद्धवंशबहिर्गमम् ॥ 49.44 ॥

yojanārdhārdhaviṣkambhamaṣṭabhāgāyataṁ puram prāgudakpravaṇaṁ śastaṁ śuddhavaṁśabahirgamam

पुर की चौड़ाई आधे योजन की और लम्बाई उससे आठवें भाग अधिक होती है; वह पूर्व और उत्तर की ओर ढलान वाला तथा स्वच्छ बाँस-वेष्टन से युक्त होने पर श्रेष्ठ माना जाता है।

श्लोक 45 (markandeya.49.45)

तदर्धेन तथा खेटं तत्पादेन च कर्वटम् । न्यूनं द्रोणीमुखं तस्मादन्तभागेन चोच्यते ॥ 49.45 ॥

tadardhena tathā kheṭaṁ tatpādena ca karvaṭam nyūnaṁ droṇīmukhaṁ tasmādantabhāgena cocyate

खेट उसका आधा होता है, और कर्वट उसका चौथाई; द्रोणीमुख इससे भी छोटा, अपने ही अंशभाग के अनुसार कहा गया है।

श्लोक 46 (markandeya.49.46)

प्राकारपरिखाहीनां पुरं खर्वटमुच्यते । शाखानगरकञ्चान्यन्मन्त्रिसामन्तभुक्तिमत् ॥ 49.46 ॥

prākāraparikhāhīnāṁ puraṁ kharvaṭamucyate śākhānagarakañcānyanmantrisāmantabhuktimat

प्राचीर और खाई से रहित पुर को 'खर्वट' कहा जाता है; शाखानगरक एक और प्रकार है, जो मन्त्रियों और सामन्तों के भोग में रहता है।

श्लोक 47 (markandeya.49.47)

तथा शूद्रजनप्रायाः स्वसमृद्धिकृषीबलाः । क्षेत्रोपभोग्यभूमध्ये वसतिर्ग्रामसंज्ञिता ॥ 49.47 ॥

tathā śūdrajanaprāyāḥ svasamṛddhikṛṣībalāḥ kṣetropabhogyabhūmadhye vasatirgrāmasaṁjñitā

तथा प्रायः शूद्रजनों वाला, अपनी समृद्धि और कृषि-बल से युक्त, खेती योग्य भूमि के मध्य स्थित निवास 'ग्राम' कहलाता है।

श्लोक 48 (markandeya.49.48)

अन्यस्मान्नगरादेर्या कार्यमुद्दिश्य मानवैः । क्रियते वसतिः सा वै विज्ञेया वसतिर्नरैः ॥ 49.48 ॥

anyasmānnagarāderyā kāryamuddiśya mānavaiḥ kriyate vasatiḥ sā vai vijñeyā vasatirnaraiḥ

नगर आदि के अतिरिक्त, किसी विशेष प्रयोजन के लिए मनुष्यों द्वारा बसाया गया निवास 'वसति' के नाम से जाना जाना चाहिए।

श्लोक 49 (markandeya.49.49)

दुष्टप्रायो विना क्षेत्रैः परभूमिचरो बली । ग्राम एव द्रमीसंज्ञो राजवल्लभसंश्रयः ॥ 49.49 ॥

duṣṭaprāyo vinā kṣetraiḥ parabhūmicaro balī grāma eva dramīsaṁjño rājavallabhasaṁśrayaḥ

प्रायः दुष्ट, खेतों से रहित, पराई भूमि पर विचरने वाले बलवानों का ग्राम ही 'द्रमी' कहलाता है, जो राजा की कृपा पर आश्रित रहता है।

श्लोक 50 (markandeya.49.50)

शकटारूढभाण्डैश्च गोपालैर्विपणं विना । गोसमूहैस्तथा घोषो यत्रेच्छाभूमिकेतनः ॥ 49.50 ॥

śakaṭārūḍhabhāṇḍaiśca gopālairvipaṇaṁ vinā gosamūhaistathā ghoṣo yatrecchābhūmiketanaḥ

जहाँ गाड़ियों पर लदे सामान वाले गोपाल, बिना बाजार के, गायों के समूह सहित जहाँ चाहें वहीं बस जाते हैं, वह 'घोष' कहलाता है।

श्लोक 51 (markandeya.49.51)

त एवं नगरादींस्तु कृत्वा वासार्थमात्मनः । निकेतनानि द्वन्द्वानां चक्रुरावसथाय वै ॥ 49.51 ॥

ta evaṁ nagarādīṁstu kṛtvā vāsārthamātmanaḥ niketanāni dvandvānāṁ cakrurāvasathāya vai

इस प्रकार अपने निवास के लिए नगर आदि बनाकर उन्होंने युगलों के आश्रय हेतु घर भी बनाए।

श्लोक 52 (markandeya.49.52)

गृहाकारा यथा पूर्वं तेषामासन्नहीरुहाः । तथा संस्मृत्य तत्सर्वं चक्रुर्वेश्मानि ताः प्रजाः ॥ 49.52 ॥

gṛhākārā yathā pūrvaṁ teṣāmāsannahīruhāḥ tathā saṁsmṛtya tatsarvaṁ cakrurveśmāni tāḥ prajāḥ

पूर्वकाल में उनके निकट जो कल्पवृक्ष घर के समान आकार वाले थे, उसी सबका स्मरण करके उन प्रजाओं ने अपने घर बनाए।

श्लोक 53 (markandeya.49.53)

वृक्षस्यैवङ्गताः शाखास्तथैवञ्चापरी गताः । नताश्चैवोन्नताश्चैव तद्वच्छाखाः प्रचक्रिरे ॥ 49.53 ॥

vṛkṣasyaivaṅgatāḥ śākhāstathaivañcāparī gatāḥ natāścaivonnatāścaiva tadvacchākhāḥ pracakrire

जैसे वृक्ष की शाखाएँ इधर-उधर, कुछ झुकी हुई और कुछ ऊँची उठी हुई फैलती हैं, वैसे ही उन्होंने घरों की शाखाओं (छज्जों) की रचना की।

श्लोक 54 (markandeya.49.54)

याः शाखाः कल्पवृक्षाणां पूर्वमासन् द्विजोत्तम । ता एव शाखा गेहानां शालात्वं तेन तासु तत् ॥ 49.54 ॥

yāḥ śākhāḥ kalpavṛkṣāṇāṁ pūrvamāsan dvijottama tā eva śākhā gehānāṁ śālātvaṁ tena tāsu tat

हे द्विजोत्तम! जो शाखाएँ पहले कल्पवृक्षों की थीं, वे ही घरों की शाखाएँ बनीं, और इसी से उनमें 'शाला' नाम की सार्थकता हुई।

श्लोक 55 (markandeya.49.55)

कृत्वा द्वन्द्वोपघातन्ते वार्तोपायमचिन्तयन् । नष्टेषु मधुना सार्धं कल्पवृक्षेष्वशेषतः ॥ 49.55 ॥

kṛtvā dvandvopaghātante vārtopāyamacintayan naṣṭeṣu madhunā sārdhaṁ kalpavṛkṣeṣvaśeṣataḥ

इस प्रकार द्वन्द्वों से बचाव करने पर भी, जब कल्पवृक्ष मधु सहित सर्वथा नष्ट हो गए, तब उन्होंने जीविका का कोई उपाय न सोचा था।

श्लोक 56 (markandeya.49.56)

विषादव्याकुलास्ता वै प्रजास्तृष्णाक्षुधार्दिताः । ततः प्रादुर्बभौ तासां सिद्धिस्त्रेतामुखे तदा ॥ 49.56 ॥

viṣādavyākulāstā vai prajāstṛṣṇākṣudhārditāḥ tataḥ prādurbabhau tāsāṁ siddhistretāmukhe tadā

विषाद से व्याकुल और तृष्णा-भूख से पीड़ित वे प्रजाएँ थीं; तभी त्रेतायुग के आरम्भ में उनके लिए एक नई सिद्धि प्रकट हुई।

श्लोक 57 (markandeya.49.57)

वार्तास्वसाधिता ह्यन्या वृष्टिस्तासां निकामतः । तासां वृष्ट्युदकानीह यानि निम्नगतानि वै ॥ 49.57 ॥

vārtāsvasādhitā hyanyā vṛṣṭistāsāṁ nikāmataḥ tāsāṁ vṛṣṭyudakānīha yāni nimnagatāni vai

जीविका अभी सिद्ध न हुई थी, तब उनकी इच्छानुसार वर्षा नामक एक अन्य वरदान प्राप्त हुआ; उस वर्षा का जो जल यहाँ नीचे की ओर बहा —

श्लोक 58 (markandeya.49.58)

वृष्ट्यावरुद्धैरभवत् स्त्रोतः खातानि निम्नगाः । ये पुरस्तादपां स्तोका आपन्नाः पृथिवीतले ॥ 49.58 ॥

vṛṣṭyāvaruddhairabhavat strotaḥ khātāni nimnagāḥ ye purastādapāṁ stokā āpannāḥ pṛthivītale

— वर्षा से रुककर वही स्रोत, खात और नदियाँ बन गए; और इससे पहले जहाँ पृथ्वी पर जल की थोड़ी मात्रा टिकी हुई थी —

श्लोक 59 (markandeya.49.59)

ततो भूमेश्च संयोगादोषध्यस्तास्तदा भवन् । अफालकृष्टाश्चानुप्ता ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश ॥ 49.59 ॥

tato bhūmeśca saṁyogādoṣadhyastāstadā bhavan aphālakṛṣṭāścānuptā grāmyāraṇyāścaturdaśa

— वहाँ भूमि के संयोग से उस समय ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, बिना हल जोते और बिना बोए ही, चौदह प्रकार की ग्राम्य और वन्य।

श्लोक 60 (markandeya.49.60)

ऋतुपुष्पफलाश्चैव वृक्षा गुल्माश्च जज्ञिरे । प्रादुर्भावस्तु त्रेतायामाद्योऽयमौषधस्य तु ॥ 49.60 ॥

ṛtupuṣpaphalāścaiva vṛkṣā gulmāśca jajñire prādurbhāvastu tretāyāmādyo'yamauṣadhasya tu

ऋतु-अनुसार पुष्प-फल वाले वृक्ष और झाड़ियाँ उत्पन्न हुईं; त्रेतायुग में ओषधि का यह प्रथम आविर्भाव था।

श्लोक 61 (markandeya.49.61)

तेनौषधेन वर्तन्ते प्रजास्त्रेतायुगे मुने । रागलोभौ समासाद्य प्रजाश्चाकस्मिकौ तदा ॥ 49.61 ॥

tenauṣadhena vartante prajāstretāyuge mune rāgalobhau samāsādya prajāścākasmikau tadā

हे मुने! उसी ओषधि से प्रजाएँ त्रेतायुग में जीवन-निर्वाह करती थीं; परन्तु तभी अकस्मात् राग और लोभ ने उन प्रजाओं को घेर लिया।

श्लोक 62 (markandeya.49.62)

ततस्ताः पर्यग्वह्णन्त नदीक्षेत्राणि पर्वतान् । वृक्षगुल्मौषधीश्चैवमात्मन्यायाद्यथाबलम् ॥ 49.62 ॥

tatastāḥ paryagvahṇanta nadīkṣetrāṇi parvatān vṛkṣagulmauṣadhīścaivamātmanyāyādyathābalam

तत्पश्चात् वे अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार नदियों, खेतों, पर्वतों तथा वृक्ष-झाड़ी-ओषधियों को अन्यायपूर्वक अपने अधिकार में लेने लगे।

श्लोक 63 (markandeya.49.63)

तेन दोषेण ता नेशुरौषध्यो मिषतां द्विज । अग्रसद् भूर्युगपत्तास्तदौषध्यो महामते ॥ 49.63 ॥

tena doṣeṇa tā neśurauṣadhyo miṣatāṁ dvija agrasad bhūryugapattāstadauṣadhyo mahāmate

हे द्विज! उस दोष के कारण, सबके देखते-देखते ही वे ओषधियाँ नष्ट हो गईं; हे महामते! पृथ्वी ने उन सब ओषधियों को एक साथ निगल लिया।

श्लोक 64 (markandeya.49.64)

पुनस्तासु प्रणष्टासु विभ्रान्तास्ताः पुनः प्रजाः । ब्रह्माणं शरणं जग्मुः क्षुधार्ताः परमेष्ठिनम् ॥ 49.64 ॥

punastāsu praṇaṣṭāsu vibhrāntāstāḥ punaḥ prajāḥ brahmāṇaṁ śaraṇaṁ jagmuḥ kṣudhārtāḥ parameṣṭhinam

उनके पुनः नष्ट हो जाने पर वे भ्रमित प्रजाएँ भूख से पीड़ित होकर पुनः परमेष्ठी ब्रह्मा की शरण में गईं।

श्लोक 65 (markandeya.49.65)

स चापि तत्त्वतो ज्ञात्वा तदा ग्रस्तां वसुन्धराम् । वत्सं कृत्वा सुमेरुन्तु दुदोह भगवान् विभुः ॥ 49.65 ॥

sa cāpi tattvato jñātvā tadā grastāṁ vasundharām vatsaṁ kṛtvā sumeruntu dudoha bhagavān vibhuḥ

उन भगवान् प्रभु ने भी तत्त्व से यह जानकर कि पृथ्वी उन्हें निगल गई है, सुमेरु को बछड़ा बनाकर पृथ्वीरूपी गौ को दुहा।

श्लोक 66 (markandeya.49.66)

दुग्धेयं गौस्तदा तेन शस्यानि पृथिवीतले । जज्ञिरे तानि बीजानि ग्राम्यारण्यास्तु ताः पुनः ॥ 49.66 ॥

dugdheyaṁ gaustadā tena śasyāni pṛthivītale jajñire tāni bījāni grāmyāraṇyāstu tāḥ punaḥ

इस प्रकार दुही गई उस गौ से पृथ्वी पर अन्न के बीज उत्पन्न हुए, और वे ग्राम्य तथा वन्य ओषधियाँ पुनः उत्पन्न हुईं।

श्लोक 67 (markandeya.49.67)

ओषध्यः फलपाकान्ता गणाः सप्तदशा स्मृताः । व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमा अणवस्तिलाः ॥ 49.67 ॥

oṣadhyaḥ phalapākāntā gaṇāḥ saptadaśā smṛtāḥ vrīhayaśca yavāścaiva godhūmā aṇavastilāḥ

फल-पाक तक पहुँचने वाली वे ओषधियाँ सत्रह वर्गों में स्मृत हैं — धान, जौ, गेहूँ, कँगनी और तिल,

श्लोक 68 (markandeya.49.68)

प्रियङ्गवो ह्युदाराश्च कोरदूषाः सचीनकाः । माषा मुद्गा मसूराश्च निष्पावाः सकुलत्थकाः ॥ 49.68 ॥

priyaṅgavo hyudārāśca koradūṣāḥ sacīnakāḥ māṣā mudgā masūrāśca niṣpāvāḥ sakulatthakāḥ

प्रियंगु, उदार, कोदो, चीनक, उड़द, मूँग, मसूर, निष्पाव और कुलत्थ,

श्लोक 69 (markandeya.49.69)

आढकाश्चणकाश्चैव गणाः सप्तदश स्मृताः । इत्येता ओषधीनान्तु ग्राम्याणां जातयः पुरा ॥ 49.69 ॥

āḍhakāścaṇakāścaiva gaṇāḥ saptadaśa smṛtāḥ ityetā oṣadhīnāntu grāmyāṇāṁ jātayaḥ purā

अरहर और चना — ये सत्रह वर्ग स्मृत हैं; ये ही ग्राम्य ओषधियों की प्राचीन जातियाँ हैं।

श्लोक 70 (markandeya.49.70)

ओषध्यो जज्ञियाश्चैव ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश । व्रीहयश्च यवाश्चैव गोधूमा अणवस्तिलाः ॥ 49.70 ॥

oṣadhyo jajñiyāścaiva grāmyāraṇyāścaturdaśa vrīhayaśca yavāścaiva godhūmā aṇavastilāḥ

इसी प्रकार पहले उत्पन्न हुई चौदह ग्राम्य-वन्य ओषधियाँ थीं — धान, जौ, गेहूँ, कँगनी और तिल,

श्लोक 71 (markandeya.49.71)

प्रियङ्गुसप्तमा ह्येते अष्टमास्तु कुलत्थकाः । श्यामाकास्त्वथ नीवारा यत्तिला सगवेधुकाः ॥ 49.71 ॥

priyaṅgusaptamā hyete aṣṭamāstu kulatthakāḥ śyāmākāstvatha nīvārā yattilā sagavedhukāḥ

सातवाँ प्रियंगु और आठवाँ कुलत्थ; फिर श्यामाक, नीवार, जंगली तिल तथा गवेधुक,

श्लोक 72 (markandeya.49.72)

कुरुविन्दा मर्कटकास्तथा वेणुयवाश्च ये । ग्राम्यारण्याः स्मृता ह्येता ओषध्यश्च चतुर्दश ॥ 49.72 ॥

kuruvindā markaṭakāstathā veṇuyavāśca ye grāmyāraṇyāḥ smṛtā hyetā oṣadhyaśca caturdaśa

कुरुविन्द, मर्कटक तथा वेणुयव — इन्हीं चौदह को ग्राम्य-वन्य ओषधियाँ कहा गया है।

श्लोक 73 (markandeya.49.73)

यदा प्रसृष्टा ओषध्यो न प्ररोहन्ति ताः पुनः । ततः स तासां वृद्ध्यर्थं वार्तोपायञ्चकार ह ॥ 49.73 ॥

yadā prasṛṣṭā oṣadhyo na prarohanti tāḥ punaḥ tataḥ sa tāsāṁ vṛddhyarthaṁ vārtopāyañcakāra ha

जब बिखेरी गई वे ओषधियाँ पुनः स्वयं नहीं उगीं, तब उन्होंने उनकी वृद्धि के लिए जीविका का उपाय रचा।

श्लोक 74 (markandeya.49.74)

ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् हस्तसिद्धिञ्च कर्मजाम् । ततः प्रभृत्यथौषध्यः कृष्टपच्यास्तु जज्ञिरे ॥ 49.74 ॥

brahmā svayambhūrbhagavān hastasiddhiñca karmajām tataḥ prabhṛtyathauṣadhyaḥ kṛṣṭapacyāstu jajñire

स्वयंभू भगवान् ब्रह्मा ने हाथों के परिश्रम से सिद्ध होने वाली कर्मजन्य सिद्धि स्थापित की; तभी से ओषधियाँ केवल जोतने-बोने से ही पकने लगीं।

श्लोक 75 (markandeya.49.75)

संसिद्धायान्तु वार्तायां ततस्तासां स्वयं प्रभुः । मर्यादां स्थापयामास यथान्यायं यथागुणम् ॥ 49.75 ॥

saṁsiddhāyāntu vārtāyāṁ tatastāsāṁ svayaṁ prabhuḥ maryādāṁ sthāpayāmāsa yathānyāyaṁ yathāguṇam

जीविका के सिद्ध हो जाने पर उन प्रभु ने स्वयं ही न्याय और गुण के अनुसार उन प्रजाओं की मर्यादा स्थापित की।

श्लोक 76 (markandeya.49.76)

वर्णानामाश्रमाणाञ्च धर्मान् धर्मभृतांवर । लोकानां सर्ववर्णानां सम्यग्धर्मार्थपालिनाम् ॥ 49.76 ॥

varṇānāmāśramāṇāñca dharmān dharmabhṛtāṁvara lokānāṁ sarvavarṇānāṁ samyagdharmārthapālinām

हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! उन्होंने धर्म और अर्थ का सम्यक् पालन करने वाले सभी वर्णों के लोगों के लिए वर्णों और आश्रमों के धर्मों की स्थापना की।

श्लोक 77 (markandeya.49.77)

प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम् । स्थानमैन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वपलायिनाम् ॥ 49.77 ॥

prājāpatyaṁ brāhmaṇānāṁ smṛtaṁ sthānaṁ kriyāvatām sthānamaindraṁ kṣatriyāṇāṁ saṁgrāmeṣvapalāyinām

कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों का प्राजापत्य लोक स्मृत है, और युद्ध से न भागने वाले क्षत्रियों का ऐन्द्र लोक स्थान है।

श्लोक 78 (markandeya.49.78)

वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तताम् । गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचर्यानुवर्तताम् ॥ 49.78 ॥

vaiśyānāṁ mārutaṁ sthānaṁ svadharmamanuvartatām gāndharvaṁ śūdrajātīnāṁ paricaryānuvartatām

स्वधर्म का पालन करने वाले वैश्यों का मारुत लोक है, और सेवा-धर्म का पालन करने वाले शूद्रों का गान्धर्व लोक स्थान है।

श्लोक 79 (markandeya.49.79)

अष्टाशीतिसहस्राणामृषीणामूर्ध्वरेतसाम् । स्मृतं तेषान्तु यत् स्थानं तदेव गुरुवासिनाम् ॥ 49.79 ॥

aṣṭāśītisahasrāṇāmṛṣīṇāmūrdhvaretasām smṛtaṁ teṣāntu yat sthānaṁ tadeva guruvāsinām

अठासी हजार ऊर्ध्वरेता ऋषियों का जो स्थान स्मृत है, वही गुरुकुल में निवास करने वाले ब्रह्मचारियों का भी स्थान है।

श्लोक 80 (markandeya.49.80)

सप्तर्षोणान्तु यत् स्थानं स्मृतं तद्वै वनौकसाम् । प्राजापत्यं गृहस्थानां न्यासिनां ब्रह्मणः क्षयम् । योगिनाममृतं स्थानमिति वै स्थानकल्पना ॥ 49.80 ॥

saptarṣoṇāntu yat sthānaṁ smṛtaṁ tadvai vanaukasām prājāpatyaṁ gṛhasthānāṁ nyāsināṁ brahmaṇaḥ kṣayam yogināmamṛtaṁ sthānamiti vai sthānakalpanā

सप्तर्षियों का जो स्थान स्मृत है, वही वनवासियों का भी है; गृहस्थों का प्राजापत्य लोक है, संन्यासियों का ब्रह्मलोक है, और योगियों का अमृतपद है — ऐसी ही यह स्थान-व्यवस्था है।

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50