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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 50

यक्ष को उपदेश

अध्याय 49अध्याय-सूचीअध्याय 51

श्लोक 1 (markandeya.50.1)

मार्कण्डेय उवाच ततोऽभिद्यायतस्तस्य जज्ञिरे मानसीः प्रजाः । तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः कारणैः सह ॥ 50.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tato'bhidyāyatastasya jajñire mānasīḥ prajāḥ taccharīrasamutpannaiḥ kāryaistaiḥ kāraṇaiḥ saha

मार्कण्डेय ने कहा — तत्पश्चात् उनके ध्यान करते ही मानस प्रजाएँ उत्पन्न हुईं, उनके शरीर से उत्पन्न कार्यों तथा कारणों के साथ।

श्लोक 2 (markandeya.50.2)

क्षेत्रज्ञाः समवर्तन्त गात्रेब्यस्तस्य धीमतः । ते सर्वे समवर्तन्त ये मया प्रगुदाहृताः ॥ 50.2 ॥

kṣetrajñāḥ samavartanta gātrebyastasya dhīmataḥ te sarve samavartanta ye mayā pragudāhṛtāḥ

उन बुद्धिमान ब्रह्मा के अंगों से क्षेत्रज्ञ (जीवात्माएँ) उत्पन्न हुईं; जिन सबका मैंने पहले वर्णन किया था, वे सब इसी प्रकार उत्पन्न हुए।

श्लोक 3 (markandeya.50.3)

देवाद्याः स्थावरान्ताश्च त्रैगुण्यविषयाः स्मृताः । एवंभूतानि सृष्टानि स्थावराणि चराणि च ॥ 50.3 ॥

devādyāḥ sthāvarāntāśca traiguṇyaviṣayāḥ smṛtāḥ evaṁbhūtāni sṛṣṭāni sthāvarāṇi carāṇi ca

देवता से लेकर स्थावर पर्यन्त सभी प्राणी त्रिगुणों के विषय स्मृत हैं; इस प्रकार स्थावर और जंगम प्राणियों की सृष्टि हुई।

श्लोक 4 (markandeya.50.4)

यदास्य ताः प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः । अथान्यान्मानसान् पुत्रानु सदृशानात्मनोऽसृजत् ॥ 50.4 ॥

yadāsya tāḥ prajāḥ sarvā na vyavardhanta dhīmataḥ athānyānmānasān putrānu sadṛśānātmano'sṛjat

जब उन बुद्धिमान ब्रह्मा की वे सब प्रजाएँ बढ़ नहीं रही थीं, तब उन्होंने अपने ही समान अन्य मानस पुत्रों को उत्पन्न किया।

श्लोक 5 (markandeya.50.5)

भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्गिरसन्तथा । मरीचिं दक्षमत्रिञ्च वसिष्टञ्चैव मानसम् ॥ 50.5 ॥

bhṛguṁ pulastyaṁ pulahaṁ kratumaṅgirasantathā marīciṁ dakṣamatriñca vasiṣṭañcaiva mānasam

भृगु, पुलस्त्य, पुलह, तथा क्रतु और अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ — ये उनके मानस पुत्र थे।

श्लोक 6 (markandeya.50.6)

नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयङ्गताः । ततोऽसृजत् पुनर्ब्रह्मा रुद्रं क्रोधात्मसम्भवम् ॥ 50.6 ॥

nava brahmāṇa ityete purāṇe niścayaṅgatāḥ tato'sṛjat punarbrahmā rudraṁ krodhātmasambhavam

ये नौ ही पुराणों में 'नव ब्रह्मा' के नाम से निश्चित हैं; तत्पश्चात् ब्रह्मा ने पुनः अपने क्रोध से उत्पन्न रुद्र को रचा।

श्लोक 7 (markandeya.50.7)

सङ्कल्पञ्चैव धर्मञ्च पूर्वेषामपि पूर्वजम् । सनन्दनादयो ये च पूर्वं सृष्टाः स्वयंभुवा ॥ 50.7 ॥

saṅkalpañcaiva dharmañca pūrveṣāmapi pūrvajam sanandanādayo ye ca pūrvaṁ sṛṣṭāḥ svayaṁbhuvā

तथा संकल्प और धर्म को भी, जो पहले उत्पन्न हुए उन (सनन्दन आदि) से भी पूर्वजात हैं; और जो सनन्दन आदि स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा पहले ही उत्पन्न किए गए थे —

श्लोक 8 (markandeya.50.8)

न ते लोकेषु सज्जन्तो निरपेक्षाः समाहिताः । सर्वे तेऽनागतज्ञाना वीतरागा विमत्सराः ॥ 50.8 ॥

na te lokeṣu sajjanto nirapekṣāḥ samāhitāḥ sarve te'nāgatajñānā vītarāgā vimatsarāḥ

— वे लोकों में आसक्त न होकर, निरपेक्ष तथा शान्तचित्त रहे; वे सब भविष्य के ज्ञाता, वीतराग तथा ईर्ष्यारहित थे।

श्लोक 9 (markandeya.50.9)

तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ महात्मनः । ब्रह्मणोऽभून्महाक्रोधस्तत्रोत्पन्नोऽर्कसन्निभः ॥ 50.9 ॥

teṣvevaṁ nirapekṣeṣu lokasṛṣṭau mahātmanaḥ brahmaṇo'bhūnmahākrodhastatrotpanno'rkasannibhaḥ

उन पुत्रों के लोक-सृष्टि के प्रति इस प्रकार निरपेक्ष रहने पर महात्मा ब्रह्मा को महान् क्रोध उत्पन्न हुआ, और उससे सूर्य के समान तेजस्वी एक प्राणी उत्पन्न हुआ।

श्लोक 10 (markandeya.50.10)

अर्धनारीनरवपुः पुरुषोऽतिशरीरवान् । विभजात्मानमित्युक्त्वा स तदान्तर्दधे ततः ॥ 50.10 ॥

ardhanārīnaravapuḥ puruṣo'tiśarīravān vibhajātmānamityuktvā sa tadāntardadhe tataḥ

वह अत्यन्त विशालकाय पुरुष आधा स्त्री और आधा पुरुष के शरीर वाला था; 'अपने आपको विभाजित करो' — यह कहकर वह तत्काल अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 11 (markandeya.50.11)

स चोक्तो वै पृथक् स्त्रीत्वं पुरुषत्वं तथाकरोत् । बिभेद पुरुषत्वञ्च दशधा चैकधा तु सः ॥ 50.11 ॥

sa cokto vai pṛthak strītvaṁ puruṣatvaṁ tathākarot bibheda puruṣatvañca daśadhā caikadhā tu saḥ

इस प्रकार आदेश पाकर उस (देव) ने स्त्रीत्व और पुरुषत्व को पृथक्-पृथक् कर दिया; और पुरुषत्व को उसने दस भागों में तथा एक में भी विभाजित किया।

श्लोक 12 (markandeya.50.12)

सौम्यासौम्यैस्तथा शान्तैः पुंस्त्वं स्त्रीत्वञ्च स प्रभुः । बिभेद बहुधा देवः पुरुषैरसितैः सितैः ॥ 50.12 ॥

saumyāsaumyaistathā śāntaiḥ puṁstvaṁ strītvañca sa prabhuḥ bibheda bahudhā devaḥ puruṣairasitaiḥ sitaiḥ

वे प्रभु देव सौम्य, असौम्य तथा शान्त रूपों के द्वारा पुंस्त्व और स्त्रीत्व को अनेक प्रकार से, काले और गोरे पुरुषों के रूप में विभाजित करते गए।

श्लोक 13 (markandeya.50.13)

ततो ब्रह्मात्मसम्भूतं पूर्वं स्वायम्भुवं प्रभुः । आत्मनः सदृशं कृत्वा प्रजापालो मनुं द्विज ॥ 50.13 ॥

tato brahmātmasambhūtaṁ pūrvaṁ svāyambhuvaṁ prabhuḥ ātmanaḥ sadṛśaṁ kṛtvā prajāpālo manuṁ dvija

तत्पश्चात् हे द्विज! प्रजाओं के पालक उन प्रभु ब्रह्मा ने पहले अपने से उत्पन्न स्वायम्भुव को अपने ही समान बनाकर मनु के रूप में स्थापित किया।

श्लोक 14 (markandeya.50.14)

शतरूपाञ्च तां नारीं तपोनिर्धूतकल्मषाम् । स्वायम्भुवो मनुर्देवः पत्नीत्वे जगृहे विभुः ॥ 50.14 ॥

śatarūpāñca tāṁ nārīṁ taponirdhūtakalmaṣām svāyambhuvo manurdevaḥ patnītve jagṛhe vibhuḥ

तप से जिसके सब दोष धुल गए थे, उस शतरूपा नामक नारी को स्वायम्भुव मनु देव ने पत्नी रूप में ग्रहण किया।

श्लोक 15 (markandeya.50.15)

तस्माच्च पुरुषात् पुत्रौ शतरूपा व्यजायत । प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रख्यातावात्मकर्मभिः ॥ 50.15 ॥

tasmācca puruṣāt putrau śatarūpā vyajāyata priyavratottānapādau prakhyātāvātmakarmabhiḥ

उस पुरुष से शतरूपा ने दो पुत्रों को जन्म दिया — प्रियव्रत और उत्तानपाद, जो अपने ही कर्मों से विख्यात हुए।

श्लोक 16 (markandeya.50.16)

कन्ये द्वे च तथा ऋद्धिं प्रसूतिञ्च ततः पिता । ददौ प्रसूतिं दक्षाय तथा ऋद्धिं रुचेः पुरा ॥ 50.16 ॥

kanye dve ca tathā ṛddhiṁ prasūtiñca tataḥ pitā dadau prasūtiṁ dakṣāya tathā ṛddhiṁ ruceḥ purā

तथा दो कन्याएँ भी — आकूति और प्रसूति; तत्पश्चात् पिता ने प्रसूति को दक्ष को और पहले ही आकूति को रुचि को प्रदान किया।

श्लोक 17 (markandeya.50.17)

प्रजापतिः स जग्राह तयोर्यज्ञः सदक्षिणः । पुत्रो जज्ञे महाभाग ! दम्पतीमिथुनं ततः ॥ 50.17 ॥

prajāpatiḥ sa jagrāha tayoryajñaḥ sadakṣiṇaḥ putro jajñe mahābhāga ! dampatīmithunaṁ tataḥ

उन प्रजापति रुचि ने उसे ग्रहण किया; उस दक्षिणायुक्त यज्ञ से हे महाभाग! एक पुत्र और पुत्री का युगल उत्पन्न हुआ।

श्लोक 18 (markandeya.50.18)

यज्ञस्य दक्षिणायान्तु पुत्रा द्वादश जज्ञिरे । यामा इति समाख्याता देवाः स्वायम्भुवोऽन्तरे ॥ 50.18 ॥

yajñasya dakṣiṇāyāntu putrā dvādaśa jajñire yāmā iti samākhyātā devāḥ svāyambhuvo'ntare

उस यज्ञ के दक्षिणा से बारह पुत्र उत्पन्न हुए, जो स्वायम्भुव मन्वन्तर में 'याम' नाम के देवता कहलाए।

श्लोक 19 (markandeya.50.19)

तस्य पुत्रास्तु यज्ञस्य दक्षिणायां सभास्वराः । प्रसूत्याञ्च तथा दक्षश्चतस्त्रो विंशतिस्तथा ॥ 50.19 ॥

tasya putrāstu yajñasya dakṣiṇāyāṁ sabhāsvarāḥ prasūtyāñca tathā dakṣaścatastro viṁśatistathā

यज्ञ के वे पुत्र दक्षिणा से 'सभास्वर' नाम से तेजस्वी हुए। और प्रसूति में दक्ष ने चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं।

श्लोक 20 (markandeya.50.20)

ससर्ज कन्यास्तासाञ्च सम्यङ्नामानि मे शृणु । श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा क्रिया तथा ॥ 50.20 ॥

sasarja kanyāstāsāñca samyaṅnāmāni me śṛṇu śraddhā lakṣmīrdhṛtistuṣṭiḥ puṣṭirmedhā kriyā tathā

उन्होंने उन कन्याओं को उत्पन्न किया; अब उनके नाम मुझसे यथावत् सुनो — श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, तथा क्रिया,

श्लोक 21 (markandeya.50.21)

बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी । पत्न्यर्थे प्रतिजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः ॥ 50.21 ॥

buddhirlajjā vapuḥ śāntiḥ siddhiḥ kīrtistrayodaśī patnyarthe pratijagrāha dharmo dākṣāyaṇīḥ prabhuḥ

बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और तेरहवीं कीर्ति — इन दाक्षायणी कन्याओं को प्रभु धर्म ने पत्नी रूप में ग्रहण किया।

श्लोक 22 (markandeya.50.22)

ताभ्यः शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः । ख्यातिः सत्यथ सम्भूतिः स्मृतिः प्रीतिस्तथा क्षमा ॥ 50.22 ॥

tābhyaḥ śiṣṭā yavīyasya ekādaśa sulocanāḥ khyātiḥ satyatha sambhūtiḥ smṛtiḥ prītistathā kṣamā

उनसे शेष रह गईं छोटी, सुन्दर नेत्रों वाली ग्यारह कन्याएँ — ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति तथा क्षमा,

श्लोक 23 (markandeya.50.23)

सन्ततिश्चानसूया च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा । भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः ॥ 50.23 ॥

santatiścānasūyā ca ūrjā svāhā svadhā tathā bhṛgurbhavo marīciśca tathā caivāṅgirā muniḥ

सन्तति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा और स्वधा। इसी क्रम से भृगु, भव, मरीचि तथा मुनि अंगिरा,

श्लोक 24 (markandeya.50.24)

पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुश्च ऋषयस्तथा । वसिष्ठोऽत्रिस्तथा वह्निः पितरश्च यथाक्रमम् ॥ 50.24 ॥

pulastyaḥ pulahaścaiva kratuśca ṛṣayastathā vasiṣṭho'tristathā vahniḥ pitaraśca yathākramam

पुलस्त्य, पुलह तथा क्रतु ऋषि, और वसिष्ठ, अत्रि, वह्नि (अग्नि) तथा पितरगण — यथाक्रम,

श्लोक 25 (markandeya.50.25)

ख्यात्याद्या जगृहुः कन्या मुनयो मुनिसत्तमाः । श्रद्धा कामं श्रीश्च दर्पं नियमं धृतिरात्मजम् ॥ 50.25 ॥

khyātyādyā jagṛhuḥ kanyā munayo munisattamāḥ śraddhā kāmaṁ śrīśca darpaṁ niyamaṁ dhṛtirātmajam

इन मुनिश्रेष्ठ ऋषियों ने ख्याति आदि उन कन्याओं को पत्नी रूप में ग्रहण किया। श्रद्धा से काम उत्पन्न हुआ, श्री से दर्प, धृति से आत्मज नामक पुत्र (नियम),

श्लोक 26 (markandeya.50.26)

सन्तोषञ्च तथा तुष्टिर्लोभं पुष्टिरजायत । मेधा श्रुतं क्रिया दण्डं नयं विनयमेव च ॥ 50.26 ॥

santoṣañca tathā tuṣṭirlobhaṁ puṣṭirajāyata medhā śrutaṁ kriyā daṇḍaṁ nayaṁ vinayameva ca

तुष्टि से सन्तोष उत्पन्न हुआ, और पुष्टि से लोभ; मेधा से श्रुत, तथा क्रिया से दण्ड, नय और विनय उत्पन्न हुए।

श्लोक 27 (markandeya.50.27)

बोधं बुद्धिस्तथा लज्जा विनयं वपुरात्मजम् । व्यवसायं प्रजज्ञे वै क्षेमं शान्तिरसूयत ॥ 50.27 ॥

bodhaṁ buddhistathā lajjā vinayaṁ vapurātmajam vyavasāyaṁ prajajñe vai kṣemaṁ śāntirasūyata

बुद्धि से बोध, लज्जा से विनय, वपु से व्यवसाय नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, और शान्ति ने क्षेम को जन्म दिया।

श्लोक 28 (markandeya.50.28)

सुखं सिद्धिर्यशः कीर्तिरित्येते धर्मयोनयः । कामादतिमुदं हर्षं धर्मपौत्रमसूयत ॥ 50.28 ॥

sukhaṁ siddhiryaśaḥ kīrtirityete dharmayonayaḥ kāmādatimudaṁ harṣaṁ dharmapautramasūyata

सिद्धि से सुख और कीर्ति से यश उत्पन्न हुआ — ये सब धर्म से उत्पन्न सन्तानें हैं। और काम से हर्ष नामक धर्म का प्रपौत्र उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त आनन्दमय था।

श्लोक 29 (markandeya.50.29)

हिंसा भार्या त्वधर्मस्य तस्यां जज्ञे तथानृतम् । कन्या च निरृतिस्तस्यां सुतौ द्वौ नरकं भयम् ॥ 50.29 ॥

hiṁsā bhāryā tvadharmasya tasyāṁ jajñe tathānṛtam kanyā ca nirṛtistasyāṁ sutau dvau narakaṁ bhayam

हिंसा अधर्म की पत्नी थी; उससे अनृत (असत्य) तथा निर्ऋति नामक कन्या उत्पन्न हुई; निर्ऋति से दो पुत्र उत्पन्न हुए — नरक और भय।

श्लोक 30 (markandeya.50.30)

माया च वेदना चैव मिथुनं द्वयमेतयोः । तयोर्जज्ञेऽथ वै माया मृत्युं भूतापहारिणम् ॥ 50.30 ॥

māyā ca vedanā caiva mithunaṁ dvayametayoḥ tayorjajñe'tha vai māyā mṛtyuṁ bhūtāpahāriṇam

माया और वेदना — ये दोनों उनकी युगल पत्नियाँ हुईं; उनमें से माया ने प्राणियों को हर लेने वाले मृत्यु को जन्म दिया।

श्लोक 31 (markandeya.50.31)

वेदनात्मसुतञ्चापि दुःखं जज्ञेऽथ रौरवात् । मृत्योर्व्याधि-जरा-शोक-तृष्णा-क्रोधाश्च जज्ञिरे ॥ 50.31 ॥

vedanātmasutañcāpi duḥkhaṁ jajñe'tha rauravāt mṛtyorvyādhi-jarā-śoka-tṛṣṇā-krodhāśca jajñire

वेदना ने भी अपने पुत्र दुःख को जन्म दिया, जो रौरव नाम से जाना गया; और मृत्यु से व्याधि, जरा, शोक, तृष्णा और क्रोध उत्पन्न हुए।

श्लोक 32 (markandeya.50.32)

दुः खोद्भवाः स्मृता ह्येते सर्वे वाधर्मलक्षणाः । नैषां भार्यास्ति पुत्रो वा सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥ 50.32 ॥

duḥ khodbhavāḥ smṛtā hyete sarve vādharmalakṣaṇāḥ naiṣāṁ bhāryāsti putro vā sarve te hyūrdhvaretasaḥ

ये सब दुःख से उत्पन्न, अधर्म के लक्षण-स्वरूप स्मृत हैं; इनमें से किसी की न पत्नी है, न पुत्र, क्योंकि ये सब ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) हैं।

श्लोक 33 (markandeya.50.33)

निरृतिश्च तथा चान्या मृत्योर्भार्याभवन्मुने । अलक्ष्मीर्नाम तस्याञ्च मृत्योः पुत्राश्चतुर्दश ॥ 50.33 ॥

nirṛtiśca tathā cānyā mṛtyorbhāryābhavanmune alakṣmīrnāma tasyāñca mṛtyoḥ putrāścaturdaśa

हे मुने! तथा एक अन्य देवी, जिसका नाम अलक्ष्मी है, मृत्यु की पत्नी बनी; उससे मृत्यु के चौदह पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 34 (markandeya.50.34)

अलक्ष्मीपुत्रका ह्येते मृत्योरादेशकारिणः । विनाशकालेषु नरान् भजन्त्येते शृणुष्व तान् ॥ 50.34 ॥

alakṣmīputrakā hyete mṛtyorādeśakāriṇaḥ vināśakāleṣu narān bhajantyete śṛṇuṣva tān

अलक्ष्मी के ये पुत्र मृत्यु की आज्ञा का पालन करने वाले हैं, जो विनाश के समय मनुष्यों को आ घेरते हैं — अब उनके विषय में सुनो।

श्लोक 35 (markandeya.50.35)

इन्द्रियेषु दशस्वेते तथा मनसि च स्थिताः । स्वे स्वे नरं स्त्रियं वापि विषये योजयन्ति हि ॥ 50.35 ॥

indriyeṣu daśasvete tathā manasi ca sthitāḥ sve sve naraṁ striyaṁ vāpi viṣaye yojayanti hi

ये दसों इन्द्रियों में तथा मन में भी स्थित रहते हैं, और अपने-अपने विषय में पुरुष अथवा स्त्री को नियोजित करते हैं।

श्लोक 36 (markandeya.50.36)

अथेन्द्रियाणि चाक्रम्य रागक्रोधादिभिर्नरान् । योजयन्ति यथा हानिं यान्त्यधर्मादिभिर्द्विज ॥ 50.36 ॥

athendriyāṇi cākramya rāgakrodhādibhirnarān yojayanti yathā hāniṁ yāntyadharmādibhirdvija

फिर इन्द्रियों पर आक्रमण कर वे मनुष्यों को राग, क्रोध आदि से जोड़ देते हैं, हे द्विज! जिससे वे अधर्म आदि के कारण हानि को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 37 (markandeya.50.37)

अहङ्कारगतश्चान्यस्तथान्यो बुद्धिसंस्थितः । विनाशाय नराः स्त्रीणां यतन्ते महोसंश्रिताः ॥ 50.37 ॥

ahaṅkāragataścānyastathānyo buddhisaṁsthitaḥ vināśāya narāḥ strīṇāṁ yatante mahosaṁśritāḥ

एक अहंकार में स्थित है, तो दूसरा बुद्धि में स्थित; महामोह का आश्रय लेकर वे पुरुषों और स्त्रियों के विनाश के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

श्लोक 38 (markandeya.50.38)

तथैवान्यो गृहे पुंसां दुः सहो नाम विश्रुतः । क्षुत्क्षामोऽधोमुखो नग्रश्चीरी काकसमस्वनः ॥ 50.38 ॥

tathaivānyo gṛhe puṁsāṁ duḥ saho nāma viśrutaḥ kṣutkṣāmo'dhomukho nagraścīrī kākasamasvanaḥ

इसी प्रकार मनुष्यों के घरों में 'दुःसह' नामक एक अन्य विख्यात प्राणी है, भूख से क्षीण, नीचे मुख किए, नग्न, चीथड़े पहने, कौवे जैसी आवाज़ वाला।

श्लोक 39 (markandeya.50.39)

स सर्वान् खादितुं सृष्टो ब्रह्मणा तमसो निधिः । दंष्ट्राकरालमत्यर्थं विवृतास्यं सुभैरवम् ॥ 50.39 ॥

sa sarvān khādituṁ sṛṣṭo brahmaṇā tamaso nidhiḥ daṁṣṭrākarālamatyarthaṁ vivṛtāsyaṁ subhairavam

वह तमोगुण का भण्डार, सबको खा जाने के लिए ब्रह्मा द्वारा रचा गया, अत्यन्त भयंकर दाढ़ों वाला, फैले हुए मुख वाला और अत्यन्त भयावह था।

श्लोक 40 (markandeya.50.40)

तमत्तुकाममाहेदं ब्रह्मा लोकपितामहः । सर्वब्रह्ममयः शुद्धः कारणं जगतोऽव्ययः ॥ 50.40 ॥

tamattukāmamāhedaṁ brahmā lokapitāmahaḥ sarvabrahmamayaḥ śuddhaḥ kāraṇaṁ jagato'vyayaḥ

उस खाने की इच्छा रखने वाले को लोकपितामह ब्रह्मा ने, जो सर्वात्मक, शुद्ध तथा जगत् के अविनाशी कारण हैं, इस प्रकार कहा —

श्लोक 41 (markandeya.50.41)

ब्रह्मोवाच नात्तव्यन्ते जगदिदं जहि कोपं शमं व्रज । त्यजैनान्तामसी वृत्तिमपास्य रजसः कलाम् ॥ 50.41 ॥

brahmovāca nāttavyante jagadidaṁ jahi kopaṁ śamaṁ vraja tyajaināntāmasī vṛttimapāsya rajasaḥ kalām

ब्रह्मा ने कहा — इस समस्त जगत् को खा मत जाओ! अपना क्रोध त्यागो, शान्ति को प्राप्त हो; तमोगुणी वृत्ति को छोड़कर रजोगुण के एक अंश को स्वीकार करो।

श्लोक 42 (markandeya.50.42)

दुः सह उवाच क्षुत्क्षामोऽस्मि जगन्नाथ ! पिपासुश्चापि दुर्बलः । कथं तृप्तिमियान्नाथ ! भवेयं बलवान् कथम् । कश्चाश्रयो ममाक्याहि वर्तेयं यत्र निर्वृतः ॥ 50.42 ॥

duḥ saha uvāca kṣutkṣāmo'smi jagannātha ! pipāsuścāpi durbalaḥ kathaṁ tṛptimiyānnātha ! bhaveyaṁ balavān katham kaścāśrayo mamākyāhi varteyaṁ yatra nirvṛtaḥ

दुःसह ने कहा — हे जगन्नाथ! मैं भूख से क्षीण, प्यासा और निर्बल हूँ; हे नाथ! मुझे तृप्ति कैसे मिलेगी, मैं बलवान कैसे बनूँगा? मुझे बताइए, मेरा आश्रय क्या है, कहाँ रहकर मैं तृप्त हो सकूँगा।

श्लोक 43 (markandeya.50.43)

ब्रह्मोवाच तवाश्रयो गृहं पुंसां जनश्चाधार्मिको बलम् । पुष्टिं नित्यक्रियाहान्या भवान् वत्स ! गमिष्यति ॥ 50.43 ॥

brahmovāca tavāśrayo gṛhaṁ puṁsāṁ janaścādhārmiko balam puṣṭiṁ nityakriyāhānyā bhavān vatsa ! gamiṣyati

ब्रह्मा ने कहा — मनुष्यों का घर ही तुम्हारा आश्रय है, और अधर्मी जन ही तुम्हारा बल है; हे वत्स! नित्यकर्मों की उपेक्षा से ही तुम्हें पुष्टि प्राप्त होगी।

श्लोक 44 (markandeya.50.44)

वृथास्फोटाश्च ते वस्त्रमाहारञ्च ददामि ते । क्षतं कीटावपन्नञ्च तथा श्वबिरवेक्षितम् ॥ 50.44 ॥

vṛthāsphoṭāśca te vastramāhārañca dadāmi te kṣataṁ kīṭāvapannañca tathā śvabiravekṣitam

व्यर्थ फेंके-फटे वस्त्र, तथा कीड़ों से भरा हुआ खाना, और कुत्ते द्वारा देखा गया भोजन — यह सब मैं तुम्हें वस्त्र और आहार के रूप में देता हूँ।

श्लोक 45 (markandeya.50.45)

भग्नभाणागतन्तद्वन्मुखवातोपशामितम् । उच्छिष्टापक्वमास्विन्नमवलीढमसंस्कृतम् ॥ 50.45 ॥

bhagnabhāṇāgatantadvanmukhavātopaśāmitam ucchiṣṭāpakvamāsvinnamavalīḍhamasaṁskṛtam

टूटे पात्र में लाया गया, मुख की फूँक से ठण्डा किया गया, जूठा, अधपका, पसीना लगा हुआ, चखा हुआ तथा असंस्कृत भोजन —

श्लोक 46 (markandeya.50.46)

भग्नासनस्थितैर्भुक्तमासन्नागतमेव च । विदिङ्मुखं सन्ध्ययोश्च नृत्यवाद्यस्वनाकुलम् ॥ 50.46 ॥

bhagnāsanasthitairbhuktamāsannāgatameva ca vidiṅmukhaṁ sandhyayośca nṛtyavādyasvanākulam

टूटे हुए आसन पर बैठकर खाया गया, अतिथि के आने के ठीक समय खाया गया, विपरीत दिशा में मुख करके खाया गया, तथा सन्ध्याओं में नृत्य-वाद्य के शोर में खाया गया भोजन —

श्लोक 47 (markandeya.50.47)

उदक्योपहतं भुक्तमुदक्या दृष्टमेव च । यच्चोपघातवत् किञ्चिद् भक्ष्यं पेयमथापि वा ॥ 50.47 ॥

udakyopahataṁ bhuktamudakyā dṛṣṭameva ca yaccopaghātavat kiñcid bhakṣyaṁ peyamathāpi vā

रजस्वला स्त्री द्वारा छुआ या देखा गया भोजन, तथा जो भी भक्ष्य या पेय किसी प्रकार से दूषित हो गया हो —

श्लोक 48 (markandeya.50.48)

एतानि तव पुष्ट्यर्थमन्यच्चापि ददामि ते । अश्रद्धया हुतं दत्तमस्नातैर्यदवज्ञया ॥ 50.48 ॥

etāni tava puṣṭyarthamanyaccāpi dadāmi te aśraddhayā hutaṁ dattamasnātairyadavajñayā

ये सब तुम्हारी पुष्टि के लिए मैं देता हूँ, और भी अधिक देता हूँ — बिना श्रद्धा के किया गया हवन, बिना स्नान किए तथा अनादरपूर्वक दिया गया दान,

श्लोक 49 (markandeya.50.49)

यन्नाम्बुपूर्वकं क्षिप्तमनर्थोकृतमेव च । त्यक्तुमाविष्कृतं यत् तु दत्तं चैवातिविस्मयात् ॥ 50.49 ॥

yannāmbupūrvakaṁ kṣiptamanarthokṛtameva ca tyaktumāviṣkṛtaṁ yat tu dattaṁ caivātivismayāt

जो जल-अर्पण के बिना ही फेंक दिया जाए, जो व्यर्थ अथवा अनुचित रूप से किया गया हो, जो त्याग देने के लिए दिखावटी रूप से दिया गया हो, अथवा जो अत्यधिक विस्मय से दिया गया हो,

श्लोक 50 (markandeya.50.50)

दुष्टं क्रुद्धार्तदत्तञ्च यक्ष तद्भागि तत् फलम् । यच्च पौनर्भवः किञ्चित् करोत्यामुष्मिकं क्रमम् ॥ 50.50 ॥

duṣṭaṁ kruddhārtadattañca yakṣa tadbhāgi tat phalam yacca paunarbhavaḥ kiñcit karotyāmuṣmikaṁ kramam

जो दूषित हो, अथवा क्रोध या पीड़ा में दिया गया हो — हे यक्ष! इन सबका फल तुम्हारा है; तथा पुनर्विवाहित स्त्री का पति जो कुछ परलोक-सम्बन्धी क्रम करता है,

श्लोक 51 (markandeya.50.51)

यच्च पौनर्भवा योषित् तद्यक्ष ! तव तृप्तये । कन्याशुल्कोपधानाय समुपास्ते धनक्रियाः ॥ 50.51 ॥

yacca paunarbhavā yoṣit tadyakṣa ! tava tṛptaye kanyāśulkopadhānāya samupāste dhanakriyāḥ

और पुनर्विवाहित स्त्री जो कुछ करती है — हे यक्ष! वह भी तुम्हारी तृप्ति के लिए है; तथा कन्या-शुल्क के लिए किए गए धन के लेन-देन —

श्लोक 52 (markandeya.50.52)

तथैव यक्ष ! पुष्ट्यर्थमसच्छास्त्रक्रियाश्च याः । यच्चार्थनिर्वृतं किञ्चिदधीतं यन्न सत्यतः ॥ 50.52 ॥

tathaiva yakṣa ! puṣṭyarthamasacchāstrakriyāśca yāḥ yaccārthanirvṛtaṁ kiñcidadhītaṁ yanna satyataḥ

हे यक्ष! इसी प्रकार पुष्टि के लिए असत् शास्त्रों के अनुसार की गई क्रियाएँ, तथा जो कुछ केवल धन के लिए पढ़ा जाए, सत्य के लिए नहीं —

श्लोक 53 (markandeya.50.53)

तत सर्वं तव कालांश्च ददामि तव सिद्धये । गुर्विण्यभिगमे सन्ध्यानित्यकार्यव्यतिक्रमे ॥ 50.53 ॥

tata sarvaṁ tava kālāṁśca dadāmi tava siddhaye gurviṇyabhigame sandhyānityakāryavyatikrame

यह सब तुम्हारी सफलता के लिए मैं तुम्हें कुछ विशेष समयों सहित देता हूँ — गर्भवती स्त्री के समीप जाने के समय, सन्ध्या तथा नित्यकर्मों के उल्लंघन के समय,

श्लोक 54 (markandeya.50.54)

असच्छास्त्रक्रियालापदूषितेषु च दुः सह । तवाभिभवसामर्थ्यं भविष्यति सदा नृषु ॥ 50.54 ॥

asacchāstrakriyālāpadūṣiteṣu ca duḥ saha tavābhibhavasāmarthyaṁ bhaviṣyati sadā nṛṣu

और हे दुःसह! जहाँ लोग असत् शास्त्रों की क्रियाओं और व्यर्थ की बातों से दूषित हों, वहाँ मनुष्यों पर तुम्हारा प्रभाव सदा बना रहेगा।

श्लोक 55 (markandeya.50.55)

पङ्क्तिभेदे वृथापाके पाकभेदे तथा क्रिया । नित्यञ्च गेहकलहे भविता वसतिस्तव ॥ 50.55 ॥

paṅktibhede vṛthāpāke pākabhede tathā kriyā nityañca gehakalahe bhavitā vasatistava

पंक्तिभेद में, व्यर्थ पाक में, पाक के अनुचित विभाजन में, तथा सदा घरेलू कलह में — यही तुम्हारा निवास-स्थान होगा।

श्लोक 56 (markandeya.50.56)

अपोष्यमाणे च तथा भृत्ये गोवाहनादिके । असन्ध्याभ्युक्षितागारे काले त्वत्तो भयं नृणाम् ॥ 50.56 ॥

apoṣyamāṇe ca tathā bhṛtye govāhanādike asandhyābhyukṣitāgāre kāle tvatto bhayaṁ nṛṇām

जहाँ सेवक, गौ और वाहन आदि को भोजन नहीं दिया जाता, तथा जहाँ सन्ध्या के समय घर में जल का छिड़काव नहीं होता — ऐसे समय मनुष्यों को तुमसे भय रहेगा।

श्लोक 57 (markandeya.50.57)

नक्षत्रग्रहपीडासु त्रिविधोत्पातदर्शने । अशान्तिकपरान् यक्ष ! नरानभिभविष्यसि ॥ 50.57 ॥

nakṣatragrahapīḍāsu trividhotpātadarśane aśāntikaparān yakṣa ! narānabhibhaviṣyasi

नक्षत्र-ग्रहों की पीड़ा में तथा त्रिविध उत्पातों के दर्शन में, हे यक्ष! जो मनुष्य शान्ति-कर्म की उपेक्षा करते हैं, उन्हें तुम अभिभूत करोगे।

श्लोक 58 (markandeya.50.58)

वृथोपवासिनो मर्त्या द्यूतस्त्रीषु सदा रताः । त्वद्भाषणोपकर्तारो वैडालव्रतिकाश्च ये ॥ 50.58 ॥

vṛthopavāsino martyā dyūtastrīṣu sadā ratāḥ tvadbhāṣaṇopakartāro vaiḍālavratikāśca ye

व्यर्थ उपवास करने वाले, सदा जुए और स्त्रियों में रत रहने वाले मनुष्य, तुम्हारा नाम लेकर सहायता माँगने वाले, तथा बिडाल-व्रती (कपटी दिखावटी धार्मिक) —

श्लोक 59 (markandeya.50.59)

अब्रह्मचारिणाधीतमिज्या चाविदुषा कृता । तपोवने ग्राम्यभुजां तथैवानिर्वजितात्मनाम् ॥ 50.59 ॥

abrahmacāriṇādhītamijyā cāviduṣā kṛtā tapovane grāmyabhujāṁ tathaivānirvajitātmanām

— ब्रह्मचर्य-रहित होकर पढ़ा गया शास्त्र, अनजान व्यक्ति द्वारा किया गया यज्ञ, तथा तपोवन में रहते हुए भी ग्राम्य-सुखों का भोग करने वाले तथा अशुद्ध चित्त वाले —

श्लोक 60 (markandeya.50.60)

ब्राह्मण-क्षत्रिय-विशां शूद्राणाञ्च स्वकर्मतः । परिच्युतानां या चेष्टा परलोकार्थमीप्सताम् ॥ 50.60 ॥

brāhmaṇa-kṣatriya-viśāṁ śūdrāṇāñca svakarmataḥ paricyutānāṁ yā ceṣṭā paralokārthamīpsatām

— तथा अपने-अपने कर्म से च्युत हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों का जो प्रयत्न परलोक की कामना से किया जाता है —

श्लोक 61 (markandeya.50.61)

तस्याश्च यत् फलं सर्वं तत् ते यक्ष ! भविष्यति । अन्यच्च ते प्रयच्छामि पुष्ट्यर्थं सन्निबोध तत् ॥ 50.61 ॥

tasyāśca yat phalaṁ sarvaṁ tat te yakṣa ! bhaviṣyati anyacca te prayacchāmi puṣṭyarthaṁ sannibodha tat

— हे यक्ष! उसका सम्पूर्ण फल तुम्हारा ही होगा। और भी एक वस्तु मैं तुम्हें पुष्टि के लिए देता हूँ, उसे भी समझो।

श्लोक 62 (markandeya.50.62)

भवतो वैश्वदेवान्ते नामोच्चारणपूर्वकम् । एतत् तवेति दास्यन्ति भवतो बलिमूर्जितम् ॥ 50.62 ॥

bhavato vaiśvadevānte nāmoccāraṇapūrvakam etat taveti dāsyanti bhavato balimūrjitam

वैश्वदेव के अन्त में लोग तुम्हारा नाम लेकर 'यह तुम्हारे लिए है' कहकर तुम्हें एक सशक्त बलि अर्पित करेंगे।

श्लोक 63 (markandeya.50.63)

यः संस्कृताशी विधिवच्छुचिरन्तस्तथा बहिः । अलोलुपो जितस्त्रीकस्तद्गेहमपवर्जय ॥ 50.63 ॥

yaḥ saṁskṛtāśī vidhivacchucirantastathā bahiḥ alolupo jitastrīkastadgehamapavarjaya

किन्तु जो संस्कारयुक्त भोजन करता है, विधिपूर्वक बाहर-भीतर शुद्ध रहता है, लोभरहित तथा स्त्रियों के प्रति जितेन्द्रिय है, उसका घर तुम छोड़ देना।

श्लोक 64 (markandeya.50.64)

पूज्यन्ते हव्यकव्याभ्यां देवताः पितरस्तथा । यामयोऽतिथयश्चापि तद्गेहं यक्ष ! वर्जय ॥ 50.64 ॥

pūjyante havyakavyābhyāṁ devatāḥ pitarastathā yāmayo'tithayaścāpi tadgehaṁ yakṣa ! varjaya

हे यक्ष! जहाँ हव्य से देवता और कव्य से पितर पूजे जाते हैं, तथा संयमी और अतिथि भी सम्मानित होते हैं, वह घर छोड़ देना।

श्लोक 65 (markandeya.50.65)

यत्र मैत्री गृहे बालवृद्धयोषिन्नरेषु च । तथा स्वजनवर्गेषु गृहं तच्चापि वर्जय ॥ 50.65 ॥

yatra maitrī gṛhe bālavṛddhayoṣinnareṣu ca tathā svajanavargeṣu gṛhaṁ taccāpi varjaya

जहाँ घर में बालक, वृद्ध, स्त्री-पुरुष तथा अपने ही परिजनों में परस्पर मित्रता हो, वह घर भी छोड़ देना।

श्लोक 66 (markandeya.50.66)

योषितोऽबिरता यत्र न वहिर्गमनोत्सुकाः । लज्जान्विताः सदा गेहं यक्ष ! तत् परिवर्जय ॥ 50.66 ॥

yoṣito'biratā yatra na vahirgamanotsukāḥ lajjānvitāḥ sadā gehaṁ yakṣa ! tat parivarjaya

हे यक्ष! जहाँ स्त्रियाँ अपने घर में सन्तुष्ट रहती हैं, बाहर जाने को उत्सुक नहीं होतीं, सदा लज्जायुक्त रहती हैं, वह घर पूर्णतः छोड़ देना।

श्लोक 67 (markandeya.50.67)

वयः सम्बन्धयोग्यानि शयनान्यशनानि च । यत्र गेहे त्वया यक्ष ! तद्वर्ज्यं वचनान्मम ॥ 50.67 ॥

vayaḥ sambandhayogyāni śayanānyaśanāni ca yatra gehe tvayā yakṣa ! tadvarjyaṁ vacanānmama

हे यक्ष! जिस घर में शयन और भोजन आयु और सम्बन्ध के अनुरूप व्यवस्थित होते हैं, उसे भी मेरे इस वचन से छोड़ देना।

श्लोक 68 (markandeya.50.68)

यत्र कारुणिका नित्यं साधुकर्मण्यवस्थिताः । सामान्योपस्करैर्युक्तास्त्यजेथा यक्ष ! तद्गृहम् ॥ 50.68 ॥

yatra kāruṇikā nityaṁ sādhukarmaṇyavasthitāḥ sāmānyopaskarairyuktāstyajethā yakṣa ! tadgṛham

हे यक्ष! जहाँ लोग सदा दयालु, सत्कर्म में स्थित और साधारण गृहसामग्री से ही सन्तुष्ट रहते हैं, वह घर छोड़ देना।

श्लोक 69 (markandeya.50.69)

यत्रासनस्थास्तिष्ठत्सु गुरु-वृद्ध-द्विजातिषु । न तिष्ठन्ति गृहं तच्च वर्ज्यं यक्ष ! त्वया सदा ॥ 50.69 ॥

yatrāsanasthāstiṣṭhatsu guru-vṛddha-dvijātiṣu na tiṣṭhanti gṛhaṁ tacca varjyaṁ yakṣa ! tvayā sadā

हे यक्ष! जहाँ गुरु, वृद्ध और द्विजों के खड़े होने पर लोग बैठे नहीं रहते, वह घर तुम सदा छोड़ देना।

श्लोक 70 (markandeya.50.70)

तरुगुल्मादिभिर्धारं न विद्धं यस्य वेश्मनः । मर्मभेदोऽथवा पुंसस्तच्छ्रेयो भवनं न ते ॥ 50.70 ॥

tarugulmādibhirdhāraṁ na viddhaṁ yasya veśmanaḥ marmabhedo'thavā puṁsastacchreyo bhavanaṁ na te

जिस घर की नींव वृक्ष-झाड़ी आदि से क्षतिग्रस्त न हो, अथवा जिसमें पारिवारिक सम्बन्धों में कोई दरार न हो, वह कल्याणकारी भवन तुम्हारे लिए नहीं है।

श्लोक 71 (markandeya.50.71)

देवतापितृभृत्त्यानामतिथीनाञ्च वर्तनम् । य्सायवशिष्टेनान्नेन पुंसस्तस्य गृहं त्यज ॥ 50.71 ॥

devatāpitṛbhṛttyānāmatithīnāñca vartanam ysāyavaśiṣṭenānnena puṁsastasya gṛhaṁ tyaja

देवता, पितर, सेवक और अतिथियों का पालन करने वाले, तथा उनके बाद बचे हुए अन्न से जीवन-निर्वाह करने वाले पुरुष का घर छोड़ देना।

श्लोक 72 (markandeya.50.72)

सत्यवाक्यान् क्षमाशीलानहिंस्त्रान्नानुतापिनः । पुरुषानीदृशान् यक्ष ! त्यजेथाश्चानसूयकान् ॥ 50.72 ॥

satyavākyān kṣamāśīlānahiṁstrānnānutāpinaḥ puruṣānīdṛśān yakṣa ! tyajethāścānasūyakān

हे यक्ष! सत्यवादी, क्षमाशील, अहिंसक, अनुताप-रहित तथा ईर्ष्यारहित — ऐसे पुरुषों को तुम छोड़ देना।

श्लोक 73 (markandeya.50.73)

भर्तृशुश्रूषणे युक्तामसत्स्त्रीसङ्गवर्जिताम् । कुटुम्बभर्तृशेषान्नपुष्टाञ्च त्यज योषितम् ॥ 50.73 ॥

bhartṛśuśrūṣaṇe yuktāmasatstrīsaṅgavarjitām kuṭumbabhartṛśeṣānnapuṣṭāñca tyaja yoṣitam

पति की सेवा में तत्पर, दुष्ट स्त्रियों के संग से रहित, तथा परिवार और पति के बचे हुए अन्न से पुष्ट होने वाली स्त्री को छोड़ देना।

श्लोक 74 (markandeya.50.74)

यजनाध्ययनाभ्यासदानासक्तमतिं सदा । याजनाध्यापनादानकृतवृत्तिं द्विजं त्यज ॥ 50.74 ॥

yajanādhyayanābhyāsadānāsaktamatiṁ sadā yājanādhyāpanādānakṛtavṛttiṁ dvijaṁ tyaja

यजन, अध्ययन, अभ्यास और दान में सदा आसक्तचित्त, तथा याजन-अध्यापन-प्रतिग्रह से जीविका चलाने वाले द्विज को छोड़ देना।

श्लोक 75 (markandeya.50.75)

दानाध्ययनयज्ञेषु सदोद्युक्तञ्च दुः सह । क्षत्रियं त्यज सच्छुल्कशस्त्राजीवात्तवेतनम् ॥ 50.75 ॥

dānādhyayanayajñeṣu sadodyuktañca duḥ saha kṣatriyaṁ tyaja sacchulkaśastrājīvāttavetanam

हे दुःसह! दान, अध्ययन और यज्ञों में सदा उद्यत, तथा उचित कर और शस्त्र से जीविका कमाने वाले क्षत्रिय को छोड़ देना।

श्लोक 76 (markandeya.50.76)

त्रिभिः पूर्वगुणैर्युक्तं पाशुपाल्य-वणिज्ययोः । कृषेश्चावाप्तवृत्तिञ्च त्यज वैश्यमकल्मषम् ॥ 50.76 ॥

tribhiḥ pūrvaguṇairyuktaṁ pāśupālya-vaṇijyayoḥ kṛṣeścāvāptavṛttiñca tyaja vaiśyamakalmaṣam

पूर्वोक्त तीनों गुणों (दान, अध्ययन, यज्ञ) से युक्त, तथा पशुपालन, वाणिज्य और कृषि से निर्दोष जीविका पाने वाले वैश्य को छोड़ देना।

श्लोक 77 (markandeya.50.77)

दानेझ्या-द्विजशुश्रूषा-तत्परं यक्ष ! सन्त्यज । शूद्रञ्च ब्राह्मणादीनांशुश्रूषावृत्तिपोषकम् ॥ 50.77 ॥

dānejhyā-dvijaśuśrūṣā-tatparaṁ yakṣa ! santyaja śūdrañca brāhmaṇādīnāṁśuśrūṣāvṛttipoṣakam

हे यक्ष! दान, पूजा और द्विज-सेवा में तत्पर, तथा ब्राह्मण आदि की सेवा से अपनी जीविका पोषित करने वाले शूद्र को पूर्णतः छोड़ देना।

श्लोक 78 (markandeya.50.78)

श्रुतिस्मृत्यविरोधेन कृतवृत्तिर्गृहे गृही । यत्र तत्र च तत्पत्नि तस्यैवानुगतात्मिका ॥ 50.78 ॥

śrutismṛtyavirodhena kṛtavṛttirgṛhe gṛhī yatra tatra ca tatpatni tasyaivānugatātmikā

जो गृहस्थ श्रुति और स्मृति के अविरोध में अपनी जीविका चलाता है, जहाँ कहीं भी हो, और जिसकी पत्नी सदा उसी का अनुसरण करने वाली हो —

श्लोक 79 (markandeya.50.79)

यत्र पुत्रो गुरोः पूजां देवानाञ्च तथा पितुः । पत्नी च भर्तुः कुरुते तत्रालक्ष्मीभयं कुतः ॥ 50.79 ॥

yatra putro guroḥ pūjāṁ devānāñca tathā pituḥ patnī ca bhartuḥ kurute tatrālakṣmībhayaṁ kutaḥ

जहाँ पुत्र गुरु, देवताओं और पिता का सम्मान करता है, तथा पत्नी अपने पति का सम्मान करती है, वहाँ अलक्ष्मी का भय ही कहाँ?

श्लोक 80 (markandeya.50.80)

सदानुलिप्तं सन्ध्यासु गृहमम्बुसमुक्षितम् । कृतपुष्पबलिं यक्ष ! न त्वं शक्नोषि वीक्षितुम् ॥ 50.80 ॥

sadānuliptaṁ sandhyāsu gṛhamambusamukṣitam kṛtapuṣpabaliṁ yakṣa ! na tvaṁ śaknoṣi vīkṣitum

हे यक्ष! जो घर सदा सन्ध्या के समय लीपा जाता है, जल से सिंचित होता है और जहाँ पुष्प-बलि अर्पित की जाती है, उसे तुम देख भी नहीं सकते।

श्लोक 81 (markandeya.50.81)

भास्करादृष्टशय्यानि नित्याग्निसलिलानि च । सूर्यावलोकदीपानि लक्ष्म्या गेहानि भाजनम् ॥ 50.81 ॥

bhāskarādṛṣṭaśayyāni nityāgnisalilāni ca sūryāvalokadīpāni lakṣmyā gehāni bhājanam

जिनकी शय्याएँ सूर्य को न दिखें, जहाँ नित्य अग्नि और जल की व्यवस्था हो, तथा जो दीपकों से सदा प्रकाशित रहते हैं, ऐसे घर लक्ष्मी के आधार होते हैं।

श्लोक 82 (markandeya.50.82)

यत्रोक्षा चन्दनं वीणा आदर्शो मधुसर्पिषी । विषाज्यताम्रपात्राणि तद्गृहं न तवाश्रयः ॥ 50.82 ॥

yatrokṣā candanaṁ vīṇā ādarśo madhusarpiṣī viṣājyatāmrapātrāṇi tadgṛhaṁ na tavāśrayaḥ

जहाँ बैल, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु और घृत हों, तथा जहाँ उत्तम धातुओं और ताम्र के पात्र हों, वह घर तुम्हारा आश्रय नहीं है।

श्लोक 83 (markandeya.50.83)

यत्र कष्टकिनो वृक्षा यत्र निष्पाववल्लरी । भार्या पुनर्भूर्वल्मीकस्तद्यक्ष ! तव मन्दिरम् ॥ 50.83 ॥

yatra kaṣṭakino vṛkṣā yatra niṣpāvavallarī bhāryā punarbhūrvalmīkastadyakṣa ! tava mandiram

जहाँ काँटेदार वृक्ष हों, जहाँ जंगली लताएँ उगी हों, जहाँ पत्नी पुनर्विवाहित हो, और जहाँ बाँबी (चींटी का टीला) हो — हे यक्ष! वही तुम्हारा मन्दिर है।

श्लोक 84 (markandeya.50.84)

यस्मिन् गृहे नराः पञ्च स्त्रीत्रयं तावतीश्च गाः । अन्धकारेन्धनाग्निश्च तद्गृहं वसतिस्तव ॥ 50.84 ॥

yasmin gṛhe narāḥ pañca strītrayaṁ tāvatīśca gāḥ andhakārendhanāgniśca tadgṛhaṁ vasatistava

जिस घर में केवल पाँच पुरुष, तीन स्त्रियाँ और उतनी ही गौएँ हों, तथा जहाँ अन्धकार और अपर्याप्त ईंधन-अग्नि हो, वह घर तुम्हारा निवास है।

श्लोक 85 (markandeya.50.85)

एकच्छागं द्विवालेयं त्रिगवं पञ्चमाहिषम् । षडश्वं सप्तमातङ्गं गृहं यक्षाशु शोषय ॥ 50.85 ॥

ekacchāgaṁ dvivāleyaṁ trigavaṁ pañcamāhiṣam ṣaḍaśvaṁ saptamātaṅgaṁ gṛhaṁ yakṣāśu śoṣaya

एक बकरी, दो ऊँट, तीन गौएँ, पाँच भैंसें, छह घोड़े या सात हाथी वाले घर को, हे यक्ष! तुम शीघ्र ही सुखा दो (क्षीण कर दो)।

श्लोक 86 (markandeya.50.86)

कुद्दालदात्रपिटकं तद्वत् स्थाल्यादिभाजनम् । यत्र तत्रैव क्षिप्तानि तव दद्युः प्रतिश्रयम् ॥ 50.86 ॥

kuddāladātrapiṭakaṁ tadvat sthālyādibhājanam yatra tatraiva kṣiptāni tava dadyuḥ pratiśrayam

जहाँ कुदाल, हँसिया, टोकरी तथा हाँडी आदि बर्तन इधर-उधर लापरवाही से फेंके पड़े हों, वहाँ वे तुम्हें आश्रय दे देते हैं।

श्लोक 87 (markandeya.50.87)

मुसलोलूखले स्त्रीणामास्या तद्वदुदुम्बरे । अवस्करे मन्त्रणञ्च यक्षैतदुपकृत् तव ॥ 50.87 ॥

musalolūkhale strīṇāmāsyā tadvadudumbare avaskare mantraṇañca yakṣaitadupakṛt tava

मूसल-ओखली के पास तथा गूलर के वृक्ष के पास स्त्रियों की बातचीत, और कूड़े के ढेर पर की गई गुप्त सलाह — हे यक्ष! यह भी तुम्हारी सहायता करती है।

श्लोक 88 (markandeya.50.88)

लङ्घ्यन्ते यत्र धान्यानि पक्वापक्वानि वेश्मनि । तद्वच्छास्त्राणि तत्र त्वं यथेष्टं चर दुः सह ॥ 50.88 ॥

laṅghyante yatra dhānyāni pakvāpakvāni veśmani tadvacchāstrāṇi tatra tvaṁ yatheṣṭaṁ cara duḥ saha

जहाँ घर में कच्चे-पक्के अन्न को लाँघा जाता है, और वैसे ही शास्त्रों का भी अनादर होता है, हे दुःसह! वहाँ तुम इच्छानुसार विचरण करो।

श्लोक 89 (markandeya.50.89)

स्थालीपिधाने यत्राग्निर्दत्तो दर्वोफलेन वा । गृहे तत्र दुरिष्टानामशेषाणां समाश्रयः ॥ 50.89 ॥

sthālīpidhāne yatrāgnirdatto darvophalena vā gṛhe tatra duriṣṭānāmaśeṣāṇāṁ samāśrayaḥ

जहाँ हाँडी के ढक्कन पर या कलछी के पीछे अग्नि रखी जाती है, उस घर में समस्त अशुभ वस्तुओं का पूर्ण आश्रय है।

श्लोक 90 (markandeya.50.90)

मानुषास्थि गृहे यत्र दिवारात्रं मृतस्थितिः । तत्र यक्ष ! तवावासस्तथान्येषाञ्च रक्षसाम् ॥ 50.90 ॥

mānuṣāsthi gṛhe yatra divārātraṁ mṛtasthitiḥ tatra yakṣa ! tavāvāsastathānyeṣāñca rakṣasām

जिस घर में मनुष्य की हड्डी पड़ी हो, और जहाँ दिन-रात मृत शरीर पड़ा रहे — हे यक्ष! वहीं तुम्हारा और अन्य राक्षसों का निवास है।

श्लोक 91 (markandeya.50.91)

अदत्त्वा भुञ्जते ये वै बन्धोः पिण्डं तथोदकम् । सपिण्डान् सोदकांश्चैव तत्काले तान् नरान् भज ॥ 50.91 ॥

adattvā bhuñjate ye vai bandhoḥ piṇḍaṁ tathodakam sapiṇḍān sodakāṁścaiva tatkāle tān narān bhaja

जो लोग अपने बन्धु को पिण्ड और जल दिए बिना ही भोजन कर लेते हैं, उन पिण्ड-जलदाता सम्बन्धियों को उसी समय तुम अपना ग्रास बनाओ।

श्लोक 92 (markandeya.50.92)

यत्र पद्मपहापद्मौ सुरभिर्मोकाशिनी । वृषभैरावतौ यत्र कल्प्यन्ते तद्गृहं त्यज ॥ 50.92 ॥

yatra padmapahāpadmau surabhirmokāśinī vṛṣabhairāvatau yatra kalpyante tadgṛhaṁ tyaja

जहाँ पद्म और महापद्म (निधियाँ), सुरभि और मोकाशिनी (कामधेनु), तथा वृषभ और ऐरावत की स्थापना की जाती है, वह घर तुम त्याग देना।

श्लोक 93 (markandeya.50.93)

अशस्त्रा देवता यत्र सशस्त्राश्चाहवं विना । कल्प्यन्ते मनुजैरर्च्यास्तत् परित्यज मन्दिरम् ॥ 50.93 ॥

aśastrā devatā yatra saśastrāścāhavaṁ vinā kalpyante manujairarcyāstat parityaja mandiram

जहाँ स्वभाव से अशस्त्र देवताओं को मनुष्य युद्ध के बिना ही सशस्त्र रूप में गढ़कर पूजते हैं, उस मन्दिर को पूर्णतः त्याग देना।

श्लोक 94 (markandeya.50.94)

पौरजानपदैर्यत्र प्राक्प्रसिद्धमहोत्सवाः । क्रियन्ते पूर्ववद् गेहे न त्वं तत्र गृहे चर ॥ 50.94 ॥

paurajānapadairyatra prākprasiddhamahotsavāḥ kriyante pūrvavad gehe na tvaṁ tatra gṛhe cara

जहाँ नगर और देश के लोग पूर्वकाल से प्रसिद्ध महोत्सवों को पूर्ववत् घर में मनाते हैं, वहाँ तुम विचरण मत करना।

श्लोक 95 (markandeya.50.95)

शूर्पवातघटाम्भोभिः स्त्रानं वस्त्राम्बुविप्रुषैः । नखाग्रसलिलैश्चैव तान् याहि हतलक्षणान् ॥ 50.95 ॥

śūrpavātaghaṭāmbhobhiḥ strānaṁ vastrāmbuvipruṣaiḥ nakhāgrasalilaiścaiva tān yāhi hatalakṣaṇān

शूर्प से छाने जल, घट के जल से किए गए स्नान, वस्त्र निचोड़ने से बिखरी बूँदों तथा नखाग्र के जल से किए गए स्नान से रहित, अशुभ लक्षण वाले लोगों की ओर ही तुम जाना।

श्लोक 96 (markandeya.50.96)

देशाचारान् समयान् ज्ञातिधर्मं जपं होपं मङ्गलं देवतेष्टिम् । सम्यक्शौचं विधिवल्लोकवादान् पुंसस्त्वया कुर्वतो मास्तु सङ्गः ॥ 50.96 ॥

deśācārān samayān jñātidharmaṁ japaṁ hopaṁ maṅgalaṁ devateṣṭim samyakśaucaṁ vidhivallokavādān puṁsastvayā kurvato māstu saṅgaḥ

जो मनुष्य देशाचार, समझौतों तथा बन्धु-धर्म का पालन करता है, जो जप, हवन, मंगल-कार्य और देव-पूजा करता है, जो विधिपूर्वक शुद्धता तथा लोकाचार का पालन करता है — ऐसे पुरुष से तुम्हारा कोई सम्बन्ध न हो।

श्लोक 97 (markandeya.50.97)

मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त्वा दुः सहं ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत । चकार शासनं सोऽपि तथा पङ्कजजन्मनः ॥ 50.97 ॥

mārkaṇḍeya uvāca ityuktvā duḥ sahaṁ brahmā tatraivāntaradhīyata cakāra śāsanaṁ so'pi tathā paṅkajajanmanaḥ

मार्कण्डेय ने कहा — दुःसह से इस प्रकार कहकर ब्रह्मा वहीं अन्तर्धान हो गए; और उस दुःसह ने भी उन कमलजन्मा (ब्रह्मा) की आज्ञा का पालन किया।

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