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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 52

रुद्र-सर्ग

अध्याय 51अध्याय-सूचीअध्याय 53

श्लोक 1 (markandeya.52.1)

मार्कण्डेय उवाच इत्येष तामसः सर्गो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । रुद्रसर्गं प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥ 52.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca ityeṣa tāmasaḥ sargo brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ rudrasargaṁ pravakṣyāmi tanme nigadataḥ śṛṇu

मार्कण्डेय ने कहा — यह ब्रह्मा की, जो स्वयं अव्यक्त से उत्पन्न हैं, तामसी सृष्टि है। अब मैं रुद्र-सर्ग का वर्णन करूँगा; उसे मुझसे कहते हुए सुनो।

श्लोक 2 (markandeya.52.2)

तनयाश्च तथैवाष्टौ पत्न्यः पुत्राश्च ते तथा । कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतः प्रभोः ॥ 52.2 ॥

tanayāśca tathaivāṣṭau patnyaḥ putrāśca te tathā kalpādāvātmanastulyaṁ sutaṁ pradhyāyataḥ prabhoḥ

[ब्रह्मा के] उसी प्रकार आठ पुत्र, उनकी पत्नियाँ और पुत्र भी हुए। कल्प के आरम्भ में प्रभु अपने समान ही एक पुत्र का ध्यान कर रहे थे,

श्लोक 3 (markandeya.52.3)

प्रादुरासीदथाङ्केऽस्य कुमारो नीललोहितः । रुरोद सुस्वरं सोऽथ द्रवंश्च द्विजसत्तम ॥ 52.3 ॥

prādurāsīdathāṅke'sya kumāro nīlalohitaḥ ruroda susvaraṁ so'tha dravaṁśca dvijasattama

तभी उनकी गोद में नीललोहित नामक एक बालक प्रकट हुआ; वह ऊँचे स्वर में रोने लगा और इधर-उधर दौड़ने लगा, हे द्विजसत्तम।

श्लोक 4 (markandeya.52.4)

किं रोदिषीति तं ब्रह्मा रुदन्तं प्रत्युवाच ह । नाम देहीति तं सोऽथ प्रत्युवाच जगत्पतिम् ॥ 52.4 ॥

kiṁ rodiṣīti taṁ brahmā rudantaṁ pratyuvāca ha nāma dehīti taṁ so'tha pratyuvāca jagatpatim

'तुम क्यों रो रहे हो?' — ब्रह्मा ने रोते हुए उससे कहा। उसने जगत्पति से उत्तर दिया — 'मुझे नाम दीजिए।'

श्लोक 5 (markandeya.52.5)

रुद्रस्त्वं देव ! नाम्नासि मा रोदीर्धैर्यमावह । एवमुक्तस्ततः सोऽथ सप्तकृत्वो रुरोद ह ॥ 52.5 ॥

rudrastvaṁ deva ! nāmnāsi mā rodīrdhairyamāvaha evamuktastataḥ so'tha saptakṛtvo ruroda ha

'हे देव, तुम्हारा नाम रुद्र है; मत रोओ, धैर्य धारण करो।' ऐसा कहे जाने पर भी वह पुनः सात बार रोया।

श्लोक 6 (markandeya.52.6)

ततोऽन्यानि ददौ तस्मै सप्त नामानि वै प्रभुः । स्थानानि चैषामष्टानां पत्नीः पुत्रांश्च वै द्विज ॥ 52.6 ॥

tato'nyāni dadau tasmai sapta nāmāni vai prabhuḥ sthānāni caiṣāmaṣṭānāṁ patnīḥ putrāṁśca vai dvija

तब प्रभु ने उसे सात अन्य नाम दिए, तथा इन आठों के लिए उनके स्थान, पत्नियाँ और पुत्र भी दिए, हे द्विज।

श्लोक 7 (markandeya.52.7)

भवं शर्वं तथेशानं तथा पशुपतिं प्रभुः । भीममुग्रं महादेवमुवाच स पितामहः ॥ 52.7 ॥

bhavaṁ śarvaṁ tatheśānaṁ tathā paśupatiṁ prabhuḥ bhīmamugraṁ mahādevamuvāca sa pitāmahaḥ

उन पितामह [ब्रह्मा] ने उसे भव, शर्व, तथा ईशान, पशुपति, भीम, उग्र और महादेव — ये नाम प्रभु ने कहे।

श्लोक 8 (markandeya.52.8)

चक्रे नामान्यथैतानि स्थानान्येषाञ्चकार ह । सूर्यो जलं मही वह्निर्वायुराकाशमेव च ॥ 52.8 ॥

cakre nāmānyathaitāni sthānānyeṣāñcakāra ha sūryo jalaṁ mahī vahnirvāyurākāśameva ca

इस प्रकार उन्होंने ये नाम बनाए, और इनके स्थान भी बनाए — सूर्य, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश,

श्लोक 9 (markandeya.52.9)

दीक्षितो ब्राह्मणः सोम इत्येतास्तनवः क्रमात् । सुवर्चला तथैवोमा विकेशी चापरा स्वधा ॥ 52.9 ॥

dīkṣito brāhmaṇaḥ soma ityetāstanavaḥ kramāt suvarcalā tathaivomā vikeśī cāparā svadhā

दीक्षित ब्राह्मण, और सोम — ये क्रमशः उनके शरीर [रूप] हैं। [उनकी पत्नियाँ:] सुवर्चला, तथा उमा, विकेशी, और स्वधा,

श्लोक 10 (markandeya.52.10)

स्वाहा दिशस्तथा दीक्षा रोहिणी च यथाक्रमम् । सूर्यादीनां द्विजश्रेष्ठ ! रुद्राद्यैर्नामभिः सह ॥ 52.10 ॥

svāhā diśastathā dīkṣā rohiṇī ca yathākramam sūryādīnāṁ dvijaśreṣṭha ! rudrādyairnāmabhiḥ saha

स्वाहा, दिशाएँ, दीक्षा, तथा रोहिणी — क्रमशः सूर्य आदि की, हे द्विजश्रेष्ठ, रुद्र आदि नामों के साथ।

श्लोक 11 (markandeya.52.11)

शनैश्चरस्तथा शुक्रो लोहिताङ्गो मनोजवः । स्कन्दः सर्गोऽथ सन्तानो बुधश्चानुक्रमात् सुतः ॥ 52.11 ॥

śanaiścarastathā śukro lohitāṅgo manojavaḥ skandaḥ sargo'tha santāno budhaścānukramāt sutaḥ

[उनके पुत्र हैं:] शनैश्चर, तथा शुक्र, लोहिताङ्ग, मनोजव, स्कन्द, सर्ग, सन्तान, और बुध — क्रमशः पुत्र।

श्लोक 12 (markandeya.52.12)

एवम्प्रकारो रुद्रोऽसौ सतीं भार्यामविन्दत । दक्षकोपाच्च तत्याज सा सती स्वं कलेवरम् ॥ 52.12 ॥

evamprakāro rudro'sau satīṁ bhāryāmavindata dakṣakopācca tatyāja sā satī svaṁ kalevaram

इस प्रकार के रुद्र ने सती को अपनी पत्नी के रूप में प्राप्त किया; किन्तु दक्ष के क्रोध के कारण सती ने अपने ही शरीर का त्याग कर दिया।

श्लोक 13 (markandeya.52.13)

हिमवद्दुहिता साभून्मेनायां द्विजसत्तम । तस्या भ्राता तु मैनाकः सखाम्भोधेरनुत्तमः ॥ 52.13 ॥

himavadduhitā sābhūnmenāyāṁ dvijasattama tasyā bhrātā tu mainākaḥ sakhāmbhodheranuttamaḥ

वह हिमवान की पुत्री होकर मेना के गर्भ से उत्पन्न हुई, हे द्विजसत्तम; उसका भाई मैनाक था, जो समुद्र का अद्वितीय मित्र है।

श्लोक 14 (markandeya.52.14)

उपयेमे पुनश्चैनामनन्यां भगवान् भवः । देवौ धाताविधातारौ भृगोः ख्यातिरसूयत ॥ 52.14 ॥

upayeme punaścaināmananyāṁ bhagavān bhavaḥ devau dhātāvidhātārau bhṛgoḥ khyātirasūyata

भगवान भव [रुद्र] ने पुनः उसी को, जो अभिन्न थी, अपनी पत्नी के रूप में वरण किया। [अब सुनो:] भृगु की पत्नी ख्याति ने धाता और विधाता — इन दो देवताओं को जन्म दिया,

श्लोक 15 (markandeya.52.15)

श्रियञ्च देवदेवस्य पत्नी नारायणास्य या । आयातिर्नियतिश्चैव मेरोः कन्ये महात्मनः ॥ 52.15 ॥

śriyañca devadevasya patnī nārāyaṇāsya yā āyātirniyatiścaiva meroḥ kanye mahātmanaḥ

तथा देवताओं के देव [नारायण] की पत्नी श्री को भी। आयति और नियति — ये महात्मा मेरु की दो कन्याएँ थीं।

श्लोक 16 (markandeya.52.16)

धाताविधात्रोस्ते भार्ये तयोर्जातौ सुतावुभौ । प्राणश्चैव मृकण्डुश्च पिता मम महायशाः ॥ 52.16 ॥

dhātāvidhātroste bhārye tayorjātau sutāvubhau prāṇaścaiva mṛkaṇḍuśca pitā mama mahāyaśāḥ

वे दोनों धाता और विधाता की पत्नियाँ बनीं; उन दोनों से प्राण और मृकण्डु — दो पुत्र उत्पन्न हुए। मृकण्डु ही महायशस्वी मेरे पिता हैं।

श्लोक 17 (markandeya.52.17)

मनस्विन्यामहं तस्मात् पुत्रो वेदशिरा मम । धूम्रवत्यां समभवत् प्राणस्यापि निबोध मे ॥ 52.17 ॥

manasvinyāmahaṁ tasmāt putro vedaśirā mama dhūmravatyāṁ samabhavat prāṇasyāpi nibodha me

मनस्विनी से मैं [अपने पिता का] पुत्र [अर्थात मार्कण्डेय, जो वेदशिरा भी कहलाता हूँ] उत्पन्न हुआ। अब प्राण के विषय में भी मुझसे सुनो — वे धूम्रवती में उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 18 (markandeya.52.18)

प्राणस्य द्युतिमान् पुत्र उत्पन्नस्तस्य चात्मजः । अजराश्च तयोः पुत्राः पौत्राश्च बहवोऽभवन् ॥ 52.18 ॥

prāṇasya dyutimān putra utpannastasya cātmajaḥ ajarāśca tayoḥ putrāḥ pautrāśca bahavo'bhavan

प्राण को द्युतिमान नामक पुत्र प्राप्त हुआ, और उससे भी एक पुत्र उत्पन्न हुआ; उन दोनों के अनेक पुत्र और पौत्र 'अजर' कहलाए।

श्लोक 19 (markandeya.52.19)

पत्नी मरीचेः सम्भूतिः पौर्णमासमसूयत । विरजाः पर्वतश्चैव तस्य पुत्रौ महात्मनः ॥ 52.19 ॥

patnī marīceḥ sambhūtiḥ paurṇamāsamasūyata virajāḥ parvataścaiva tasya putrau mahātmanaḥ

मरीचि की पत्नी सम्भूति ने पौर्णमास को जन्म दिया; विरजा और पर्वत — ये उस महात्मा के दो पुत्र थे।

श्लोक 20 (markandeya.52.20)

तयोः पुत्रांस्तु वक्ष्येऽहं वंशसंकीर्तने द्विज । स्मृतिश्चाङ्गिरसः पत्नी प्रसूता कन्यकास्तथा ॥ 52.20 ॥

tayoḥ putrāṁstu vakṣye'haṁ vaṁśasaṁkīrtane dvija smṛtiścāṅgirasaḥ patnī prasūtā kanyakāstathā

उनके पुत्रों के विषय में मैं वंश-कीर्तन में आगे बताऊँगा, हे द्विज। अंगिरा की पत्नी स्मृति ने कन्याओं को भी जन्म दिया —

श्लोक 21 (markandeya.52.21)

सिनीवाली कुहूश्चैव राका भानुमती तथा । अनसूया तथैवात्रेर्जज्ञे पुत्रानकल्पषान् ॥ 52.21 ॥

sinīvālī kuhūścaiva rākā bhānumatī tathā anasūyā tathaivātrerjajñe putrānakalpaṣān

सिनीवाली, कुहू, तथा राका और भानुमती। और अत्रि की पत्नी अनसूया ने निष्पाप पुत्रों को जन्म दिया —

श्लोक 22 (markandeya.52.22)

सोमं दुर्वाससञ्चैव दत्तात्रेयञ्च योगिनम् । प्रीत्यां पुलस्त्यभार्यायां दत्तोऽन्यस्तत्सुतोऽभवत् ॥ 52.22 ॥

somaṁ durvāsasañcaiva dattātreyañca yoginam prītyāṁ pulastyabhāryāyāṁ datto'nyastatsuto'bhavat

सोम, तथा दुर्वासा, और योगी दत्तात्रेय। पुलस्त्य की पत्नी प्रीति में एक और पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम दत्त था।

श्लोक 23 (markandeya.52.23)

पूर्वजन्मनि सोऽगस्त्यः स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे । कर्दमश्चार्ववीरश्च सहिष्णुश्च सुतत्रयम् ॥ 52.23 ॥

pūrvajanmani so'gastyaḥ smṛtaḥ svāyambhuve'ntare kardamaścārvavīraśca sahiṣṇuśca sutatrayam

पूर्वजन्म में वही स्वायम्भुव मन्वन्तर में अगस्त्य के नाम से स्मरण किया गया। [पुलह के पुत्र:] कर्दम, अर्ववीर और सहिष्णु — ये तीन पुत्र,

श्लोक 24 (markandeya.52.24)

क्षमा तु सुषुवे भार्या पुलहस्य प्रजापतेः । क्रतोस्तु सन्नतिर्भार्या बालखिल्यानसूयत ॥ 52.24 ॥

kṣamā tu suṣuve bhāryā pulahasya prajāpateḥ kratostu sannatirbhāryā bālakhilyānasūyata

प्रजापति पुलह की पत्नी क्षमा ने जन्म दिए। क्रतु की पत्नी सन्नति ने बालखिल्यों को जन्म दिया —

श्लोक 25 (markandeya.52.25)

षष्टिर्यानि सहस्राणि ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम् । ऊर्जायान्तु वसिष्ठस्य सप्ताजायन्त वै सुताः ॥ 52.25 ॥

ṣaṣṭiryāni sahasrāṇi ṛṣīṇāmūrdhvaretasām ūrjāyāntu vasiṣṭhasya saptājāyanta vai sutāḥ

ऊर्ध्वरेता ऋषियों के साठ हजार, जो [अंगुष्ठ-मात्र] थे। वसिष्ठ की पत्नी ऊर्जा से सात पुत्र उत्पन्न हुए —

श्लोक 26 (markandeya.52.26)

रजोगात्रोर्ध्वबाहुश्च सबलश्चानघस्तथा । सुतपाः शुक्ल इत्येते सर्वे सप्तर्षयः स्मृताः ॥ 52.26 ॥

rajogātrordhvabāhuśca sabalaścānaghastathā sutapāḥ śukla ityete sarve saptarṣayaḥ smṛtāḥ

रजोगात्र, ऊर्ध्वबाहु, सबल, अनघ, सुतपा और शुक्ल — ये सभी सप्तर्षि कहलाए।

श्लोक 27 (markandeya.52.27)

योऽसावग्निरभीमानी ब्रह्मणस्तनयोऽग्रजः । तस्मात् स्वाहा सुतान् लेभे त्रीनुदारौजसो द्विज ॥ 52.27 ॥

yo'sāvagnirabhīmānī brahmaṇastanayo'grajaḥ tasmāt svāhā sutān lebhe trīnudāraujaso dvija

जो यह अग्निदेव, स्वयं को महान मानने वाले, ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र हैं — उनसे स्वाहा ने महातेजस्वी तीन पुत्रों को जन्म दिया, हे द्विज —

श्लोक 28 (markandeya.52.28)

पावकं पवमानञ्च शुचिञ्चापि जलाशिनम् । तेषान्तु सन्तातावन्ये चत्वारिंशच्च पञ्च च ॥ 52.28 ॥

pāvakaṁ pavamānañca śuciñcāpi jalāśinam teṣāntu santātāvanye catvāriṁśacca pañca ca

पावक, पवमान, और जल में रहने वाला शुचि। उनकी आगे की सन्तति संख्या में पैंतालीस और है,

श्लोक 29 (markandeya.52.29)

कथ्यन्ते बहुशश्चैते पिता पुत्रत्रयञ्च यत् । एवमेकोनपञ्चाशद् दुर्जयाः परिकीर्तिताः ॥ 52.29 ॥

kathyante bahuśaścaite pitā putratrayañca yat evamekonapañcāśad durjayāḥ parikīrtitāḥ

ये सब अनेक प्रकार से कहे जाते हैं; और पिता तथा उन तीन पुत्रों को मिलाकर इस प्रकार उनतालीस [अग्नि] अजेय कहे गए हैं।

श्लोक 30 (markandeya.52.30)

पितरो ब्रह्मणा सृष्टा ये व्याख्याता मया तव । अग्निष्वात्ता बर्हिषदोऽनग्नयः साग्नयश्च ये ॥ 52.30 ॥

pitaro brahmaṇā sṛṣṭā ye vyākhyātā mayā tava agniṣvāttā barhiṣado'nagnayaḥ sāgnayaśca ye

ब्रह्मा द्वारा सृजित जिन पितरों का मैंने तुम्हें वर्णन किया — अग्निष्वात्त, बर्हिषद, तथा जो अग्निरहित और अग्निसहित हैं,

श्लोक 31 (markandeya.52.31)

तेभ्यः स्वधा सुते जज्ञे मेनां वै धारिणीं तथा । ते उभे ब्रह्मवादिन्यौ योगिन्यौ चाप्युभे द्विज ॥ 52.31 ॥

tebhyaḥ svadhā sute jajñe menāṁ vai dhāriṇīṁ tathā te ubhe brahmavādinyau yoginyau cāpyubhe dvija

उनसे स्वधा ने मेना नामक कन्या को, तथा धारिणी को भी जन्म दिया। वे दोनों ब्रह्मवादिनी थीं, और दोनों ही योगिनी भी थीं, हे द्विज,

श्लोक 32 (markandeya.52.32)

उत्तमज्ञानसंपन्ने सर्वैः समुदिते गुणैः । इत्येषा दक्षकन्यानां कथितापत्यसंततिः । श्रद्धावान् संस्मरन्नित्यं प्रजावानभिजायते ॥ 52.32 ॥

uttamajñānasaṁpanne sarvaiḥ samudite guṇaiḥ ityeṣā dakṣakanyānāṁ kathitāpatyasaṁtatiḥ śraddhāvān saṁsmarannityaṁ prajāvānabhijāyate

उत्तम ज्ञान से सम्पन्न, तथा सभी सद्गुणों से युक्त। इस प्रकार दक्ष-कन्याओं की सन्तति का यह वर्णन किया गया; जो श्रद्धावान इसे सदा स्मरण करता है, वह सन्तानवान होकर जन्म लेता है।

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