सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 53
स्वायम्भुव मन्वन्तर
श्लोक 1 (markandeya.53.1)
क्रौष्टुकिरुवाच स्वायम्भुवं त्वयाख्यातमेतन्मन्वन्तरञ्च यत् । तदहं भगवन् ! सम्यक् श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् ॥ 53.1 ॥
krauṣṭukiruvāca svāyambhuvaṁ tvayākhyātametanmanvantarañca yat tadahaṁ bhagavan ! samyak śrotumicchāmi kathyatām
क्रौष्टुकि ने कहा — हे भगवन्, आपने जो यह स्वायम्भुव मन्वन्तर बताया, उसे मैं भलीभाँति सुनना चाहता हूँ; कृपया कहिए।
श्लोक 2 (markandeya.53.2)
मन्वन्तरप्रमाणञ्च देवा देवर्षयस्तथा । ये च क्षितीशा भगवन् ! देवेन्द्रश्चैव यस्तथा ॥ 53.2 ॥
manvantarapramāṇañca devā devarṣayastathā ye ca kṣitīśā bhagavan ! devendraścaiva yastathā
मन्वन्तर का प्रमाण, तथा देवगण, देवर्षिगण, जो पृथ्वी के स्वामी [राजा] हुए, और जो उस काल के देवेन्द्र हुए —
श्लोक 3 (markandeya.53.3)
मार्कण्डेय उवाच मन्वन्तराणां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः । मानुषेण प्रमाणेन शृणु मन्वन्तरञ्च मे ॥ 53.3 ॥
mārkaṇḍeya uvāca manvantarāṇāṁ saṁkhyātā sādhikā hyekasaptatiḥ mānuṣeṇa pramāṇena śṛṇu manvantarañca me
मार्कण्डेय ने कहा — मन्वन्तर इकहत्तर और कुछ अधिक गिने गए हैं; मुझसे मानव प्रमाण द्वारा मन्वन्तर का काल सुनो।
श्लोक 4 (markandeya.53.4)
त्रिंशत्कोट्यस्तु संख्याताः सहस्राणि च विंशतिः । सप्तषष्टिस्तथान्यानि नियुतानि च संख्यया ॥ 53.4 ॥
triṁśatkoṭyastu saṁkhyātāḥ sahasrāṇi ca viṁśatiḥ saptaṣaṣṭistathānyāni niyutāni ca saṁkhyayā
तीस करोड़ गिने गए हैं, तथा बीस हजार, सड़सठ, और इसी प्रकार अन्य नियुत भी संख्या में —
श्लोक 5 (markandeya.53.5)
मन्वन्तरप्रमाणञ्च इत्येतत् साधिकं विना । अष्टौ शतसहस्राणि दिव्यया संख्यया स्मृतम् ॥ 53.5 ॥
manvantarapramāṇañca ityetat sādhikaṁ vinā aṣṭau śatasahasrāṇi divyayā saṁkhyayā smṛtam
यही मन्वन्तर का प्रमाण है — यह 'कुछ अधिक' के बिना ही; दिव्य गणना से आठ लाख स्मरण किया गया है,
श्लोक 6 (markandeya.53.6)
द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि च । स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं मनुः स्वारोचिषस्तथा ॥ 53.6 ॥
dvipañcāśattathānyāni sahasrāṇyadhikāni ca svāyambhuvo manuḥ pūrvaṁ manuḥ svārociṣastathā
और उससे भी बावन हजार अधिक। [मनुओं में] पहले स्वायम्भुव मनु हुए, फिर स्वारोचिष मनु,
श्लोक 7 (markandeya.53.7)
औत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा । षडेते मनवोऽतीतास्तथा वैवस्वतोऽधुना ॥ 53.7 ॥
auttamastāmasaścaiva raivataścākṣuṣastathā ṣaḍete manavo'tītāstathā vaivasvato'dhunā
औत्तम, तथा तामस, रैवत, और चाक्षुष — ये छह मनु बीत चुके हैं, और अब वैवस्वत [वर्तमान में हैं],
श्लोक 8 (markandeya.53.8)
सावर्णिः पञ्च रौच्याश्च भौत्याश्चागामिनस्त्वमी । एतेषां विस्तरं भूयो मन्वन्तरपरिग्रहे ॥ 53.8 ॥
sāvarṇiḥ pañca raucyāśca bhautyāścāgāminastvamī eteṣāṁ vistaraṁ bhūyo manvantaraparigrahe
सावर्णि, पाँच रौच्य, तथा भौत्य — ये अभी आने वाले हैं। इनका विस्तृत वर्णन आगे मन्वन्तर-प्रकरण में करूँगा,
श्लोक 9 (markandeya.53.9)
वक्ष्ये देवानृषींश्चैव यक्षेन्द्राः पितरश्च ये । उत्पत्तिं संग्रहं ब्रह्मन् ! श्रूयतामस्य सन्ततिः ॥ 53.9 ॥
vakṣye devānṛṣīṁścaiva yakṣendrāḥ pitaraśca ye utpattiṁ saṁgrahaṁ brahman ! śrūyatāmasya santatiḥ
और देवों, ऋषियों, यक्षों के स्वामियों तथा पितरों का भी वर्णन करूँगा। हे ब्रह्मन्, उनकी उत्पत्ति और सन्तति का संक्षिप्त वर्णन सुनो,
श्लोक 10 (markandeya.53.10)
यच्च तेषामभूत् क्षेत्रं तत्पुत्राणां महात्मनाम् । मनोः स्वायम्भुवस्यासन् दश पुत्रास्तु तत्समाः ॥ 53.10 ॥
yacca teṣāmabhūt kṣetraṁ tatputrāṇāṁ mahātmanām manoḥ svāyambhuvasyāsan daśa putrāstu tatsamāḥ
तथा उन महात्मा पुत्रों का जो क्षेत्र [राज्य] था। स्वायम्भुव मनु के दस पुत्र थे, जो उन्हीं के समान तेजस्वी थे,
श्लोक 11 (markandeya.53.11)
यैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता । ससमुद्राकरवती प्रतिवर्षं निवेशिता ॥ 53.11 ॥
yairiyaṁ pṛthivī sarvā saptadvīpā saparvatā sasamudrākaravatī prativarṣaṁ niveśitā
जिनके द्वारा यह सप्तद्वीप और पर्वतों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी, समुद्रों और खानों सहित, प्रत्येक वर्ष [प्रदेश] में स्थापित की गई,
श्लोक 12 (markandeya.53.12)
ससमुद्राकरवती प्रतिवर्षं त्रेतायुगे तथा । प्रियव्रतस्य पुत्रैस्तैः पौत्रैः स्वायम्भुवस्य च ॥ 53.12 ॥
sasamudrākaravatī prativarṣaṁ tretāyuge tathā priyavratasya putraistaiḥ pautraiḥ svāyambhuvasya ca
समुद्रों और खानों सहित, प्रत्येक वर्ष में, त्रेतायुग में — प्रियव्रत के उन पुत्रों और स्वायम्भुव के पौत्रों द्वारा।
श्लोक 13 (markandeya.53.13)
प्रियव्रतात् प्रजावत्यां वीरात् कन्या व्यजायत । कन्या सा तु महाभागा कर्दमस्य प्रजापते ॥ 53.13 ॥
priyavratāt prajāvatyāṁ vīrāt kanyā vyajāyata kanyā sā tu mahābhāgā kardamasya prajāpate
प्रियव्रत से, प्रजावती के गर्भ से, एक वीर कन्या उत्पन्न हुई; वह महाभागा कन्या कर्दम प्रजापति की [पत्नी बनी]।
श्लोक 14 (markandeya.53.14)
कन्ये द्वे दश पुत्रांश्च सम्राट्कुक्षी च ते उभे । तयोर्वै भ्रातरः शूराः प्रजापतिसमा दश ॥ 53.14 ॥
kanye dve daśa putrāṁśca samrāṭkukṣī ca te ubhe tayorvai bhrātaraḥ śūrāḥ prajāpatisamā daśa
उससे दो कन्याएँ और दस पुत्र उत्पन्न हुए; सम्राट् और कुक्षी — ये वे दोनों कन्याएँ थीं; उनके भाई, दस शूरवीर, प्रजापतियों के समान थे।
श्लोक 15 (markandeya.53.15)
आग्नीध्रो मेधातिथिश्च वपुष्मांश्च तथापरः । ज्योतिष्मान्द्युतिमान् भव्यः सवनः सप्त एव ते ॥ 53.15 ॥
āgnīdhro medhātithiśca vapuṣmāṁśca tathāparaḥ jyotiṣmāndyutimān bhavyaḥ savanaḥ sapta eva te
आग्नीध्र, मेधातिथि, वपुष्मान, तथा एक और, ज्योतिष्मान, द्युतिमान, भव्य, और सवन — ये सात हुए।
श्लोक 16 (markandeya.53.16)
प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चत्तान् सप्त सप्तसु पार्थिवान् । द्वीपेषु तेन धर्मेण द्वीपांश्चैव निबोध मे ॥ 53.16 ॥
priyavrato'bhyaṣiñcattān sapta saptasu pārthivān dvīpeṣu tena dharmeṇa dvīpāṁścaiva nibodha me
प्रियव्रत ने उन सात को सात द्वीपों में राजा के पद पर अभिषिक्त किया; उस धर्मपूर्वक कार्य के अनुसार, अब मुझसे द्वीपों को भी जानो।
श्लोक 17 (markandeya.53.17)
जम्बुद्वीपे तथाग्नीध्रं राजानं कृतवान् पिता । प्लक्षद्वीपेश्वरश्चापि तेन मेधातिथिः कृतः ॥ 53.17 ॥
jambudvīpe tathāgnīdhraṁ rājānaṁ kṛtavān pitā plakṣadvīpeśvaraścāpi tena medhātithiḥ kṛtaḥ
जम्बूद्वीप में पिता ने आग्नीध्र को राजा बनाया; प्लक्षद्वीप का स्वामी भी उन्होंने मेधातिथि को बनाया।
श्लोक 18 (markandeya.53.18)
शाल्मलेस्तु वपुष्मन्तं ज्योतिष्मन्तं कुशाह्वये । क्रौञ्चद्वीपे द्युतिमन्तं भव्यं शाकाह्वयेश्वरम् ॥ 53.18 ॥
śālmalestu vapuṣmantaṁ jyotiṣmantaṁ kuśāhvaye krauñcadvīpe dyutimantaṁ bhavyaṁ śākāhvayeśvaram
शाल्मलि द्वीप का वपुष्मान को, कुश नामक द्वीप का ज्योतिष्मान को, क्रौंचद्वीप का द्युतिमान को, शाक नामक द्वीप का स्वामी भव्य को बनाया,
श्लोक 19 (markandeya.53.19)
पुष्कराधिपतिञ्चापि सवनं कृतवान् सुतम् । महावीतो धातकिश्च पुष्कराधिपतेः सुतौ ॥ 53.19 ॥
puṣkarādhipatiñcāpi savanaṁ kṛtavān sutam mahāvīto dhātakiśca puṣkarādhipateḥ sutau
तथा पुष्कर द्वीप का स्वामी भी अपने पुत्र सवन को बनाया। महावीत और धातकि — ये पुष्कर के स्वामी के दो पुत्र थे।
श्लोक 20 (markandeya.53.20)
द्विधा कृत्वा तयोर्वर्षं पुष्करे संन्यवेशयत् । भव्यस्य पुत्राः सप्तासन्नामतस्तान्निबोध मे ॥ 53.20 ॥
dvidhā kṛtvā tayorvarṣaṁ puṣkare saṁnyaveśayat bhavyasya putrāḥ saptāsannāmatastānnibodha me
उनके [उस द्वीप के] प्रदेश को दो भागों में बाँटकर उसने पुष्कर में उन्हें स्थापित किया। भव्य के सात पुत्र थे; उनके नाम मुझसे जानो —
श्लोक 21 (markandeya.53.21)
जलदश्च कुमारश्च सुकुमारो मनीवकः । कुशोत्तरोऽथ मेधावी सप्तमस्तु महाद्रुमः ॥ 53.21 ॥
jaladaśca kumāraśca sukumāro manīvakaḥ kuśottaro'tha medhāvī saptamastu mahādrumaḥ
जलद, और कुमार, सुकुमार, मनीवक, कुशोत्तर, तथा मेधावी — सातवाँ महाद्रुम है।
श्लोक 22 (markandeya.53.22)
तन्नामकानि वर्षाणि शाकद्वीपे चकार सः । तथा द्युतिमतः सप्त पुत्रास्तांश्च निबोध मे ॥ 53.22 ॥
tannāmakāni varṣāṇi śākadvīpe cakāra saḥ tathā dyutimataḥ sapta putrāstāṁśca nibodha me
उनके नामों पर उसने शाकद्वीप में प्रदेश बनाए। इसी प्रकार द्युतिमान के भी सात पुत्र थे; उन्हें भी मुझसे जानो —
श्लोक 23 (markandeya.53.23)
कुशलो मनुगश्चोष्णः प्राकरश्चार्थकारकः । मुनिश्च दुन्दुभिश्चैव सप्तमः परिकीर्तितः ॥ 53.23 ॥
kuśalo manugaścoṣṇaḥ prākaraścārthakārakaḥ muniśca dundubhiścaiva saptamaḥ parikīrtitaḥ
कुशल, मनुग, उष्ण, प्राकर, अर्थकारक, मुनि, और सातवाँ दुन्दुभि कहा गया है।
श्लोक 24 (markandeya.53.24)
तेषां स्वनामधेयानि क्रौञ्चद्वीपे तथाभवन् । ज्योतिष्मतः कुशद्वीपे पुत्रनामाङ्कितानि वै ॥ 53.24 ॥
teṣāṁ svanāmadheyāni krauñcadvīpe tathābhavan jyotiṣmataḥ kuśadvīpe putranāmāṅkitāni vai
उनके अपने-अपने नाम क्रौंचद्वीप में [प्रदेशों के नाम] बने। ज्योतिष्मान के [पुत्रों के नाम] कुशद्वीप में उनके पुत्रों के नामों से अंकित हुए,
श्लोक 25 (markandeya.53.25)
तत्रापि सप्त वर्षापि तेषां नामानि मे शृणु । उद्भिदं वैष्णवञ्चैव सुरथं लम्बनं तथा ॥ 53.25 ॥
tatrāpi sapta varṣāpi teṣāṁ nāmāni me śṛṇu udbhidaṁ vaiṣṇavañcaiva surathaṁ lambanaṁ tathā
वहाँ भी सात प्रदेश हैं; उनके नाम मुझसे सुनो — उद्भिद, तथा वैष्णव, सुरथ, लम्बन,
श्लोक 26 (markandeya.53.26)
धृतिमत् प्राकरञ्चैव कापिलं चापि सप्तमम् । वपुष्मतः सुताः सप्त शाल्मलेशस्य चाभवन् ॥ 53.26 ॥
dhṛtimat prākarañcaiva kāpilaṁ cāpi saptamam vapuṣmataḥ sutāḥ sapta śālmaleśasya cābhavan
धृतिमत्, तथा प्राकर, और सातवाँ कपिल भी। शाल्मलि के स्वामी वपुष्मान के भी सात पुत्र हुए —
श्लोक 27 (markandeya.53.27)
श्वेतश्च हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा । वैद्युतो मानसश्चैव केतुमान् सप्तमस्तथा ॥ 53.27 ॥
śvetaśca haritaścaiva jīmūto rohitastathā vaidyuto mānasaścaiva ketumān saptamastathā
श्वेत, और हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस, और सातवाँ केतुमान।
श्लोक 28 (markandeya.53.28)
तथैव शाल्मलेस्तेषां समनामानि सप्त वै । सप्त मेधातिथेः पुत्राः प्लक्षद्वीपेश्वरस्य वै ॥ 53.28 ॥
tathaiva śālmalesteṣāṁ samanāmāni sapta vai sapta medhātitheḥ putrāḥ plakṣadvīpeśvarasya vai
इसी प्रकार शाल्मलि द्वीप में उनके सात प्रदेश भी उन्हीं के नामों पर हुए। मेधातिथि, प्लक्षद्वीप के स्वामी, के भी सात पुत्र हुए,
श्लोक 29 (markandeya.53.29)
येषां नामाङ्गितैर्वर्षैः प्लक्षद्वीपस्तु सप्तधा । पूर्वं शाकभवं वर्षं शिशिरन्तु सुखोदयम् ॥ 53.29 ॥
yeṣāṁ nāmāṅgitairvarṣaiḥ plakṣadvīpastu saptadhā pūrvaṁ śākabhavaṁ varṣaṁ śiśirantu sukhodayam
जिनके नामों से अंकित सात प्रदेशों में प्लक्षद्वीप विभक्त है। पहला प्रदेश, शाकद्वीप की भाँति बना, शिशिर है, जिसका उदय सुखकारी है।
श्लोक 30 (markandeya.53.30)
आनन्दञ्च शिवञ्चैव क्षेमकञ्च ध्रुवन्तथा । प्लक्षद्वीपादिभूतेषु शाकद्वीपान्तिमेषु वै ॥ 53.30 ॥
ānandañca śivañcaiva kṣemakañca dhruvantathā plakṣadvīpādibhūteṣu śākadvīpāntimeṣu vai
[अन्य हैं:] आनन्द, तथा शिव, क्षेमक, और ध्रुव। इन प्लक्षद्वीप से लेकर शाकद्वीप के अन्तिम प्रदेशों तक,
श्लोक 31 (markandeya.53.31)
ज्ञेयः पञ्चसु धर्मश्च वर्णाश्रमविभागजः । नित्यः स्वाभाविकश्चैव अहिंसाविधिवर्धितः ॥ 53.31 ॥
jñeyaḥ pañcasu dharmaśca varṇāśramavibhāgajaḥ nityaḥ svābhāvikaścaiva ahiṁsāvidhivardhitaḥ
वर्ण और आश्रम के विभाग से उत्पन्न धर्म ही जानना चाहिए, जो नित्य और स्वाभाविक है, तथा अहिंसा के विधान से वर्धित होता है।
श्लोक 32 (markandeya.53.32)
पञ्चस्वेतेषु वर्षेषु सर्वसाधारणः स्मृतः । अग्नीध्राय पिता पूर्वं जम्बुद्वीपं ददौ द्विज ॥ 53.32 ॥
pañcasveteṣu varṣeṣu sarvasādhāraṇaḥ smṛtaḥ agnīdhrāya pitā pūrvaṁ jambudvīpaṁ dadau dvija
इन पाँच प्रदेशों में यह [धर्म] सबके लिए समान रूप से स्मरण किया गया है। पिता ने पहले जम्बूद्वीप आग्नीध्र को दिया, हे द्विज।
श्लोक 33 (markandeya.53.33)
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमा नव । ज्येष्ठो नाबिरिति ख्यातस्तस्य किंपुरुषोऽनुजः ॥ 53.33 ॥
tasya putrā babhūvurhi prajāpatisamā nava jyeṣṭho nābiriti khyātastasya kiṁpuruṣo'nujaḥ
उसके नौ पुत्र हुए, जो प्रजापतियों के समान थे; ज्येष्ठ नाभि नाम से प्रसिद्ध हुआ, उसके बाद किंपुरुष अनुज हुआ,
श्लोक 34 (markandeya.53.34)
हरिवर्षस्तृतीयस्तु चतुर्थोऽभूदिलावृतः । वश्यश्च पञ्चमः पुत्रो हिरण्यः षष्ठ उच्यते ॥ 53.34 ॥
harivarṣastṛtīyastu caturtho'bhūdilāvṛtaḥ vaśyaśca pañcamaḥ putro hiraṇyaḥ ṣaṣṭha ucyate
हरिवर्ष तीसरा, और चौथा इलावृत हुआ; वश्य पाँचवाँ पुत्र, और हिरण्य छठा कहा जाता है।
श्लोक 35 (markandeya.53.35)
कुरुस्तु सप्तमस्तेषां भद्राश्वश्चाष्टमः स्मृतः । नवमः केतुमालश्च तन्नाम्ना वर्षसंस्थितिः ॥ 53.35 ॥
kurustu saptamasteṣāṁ bhadrāśvaścāṣṭamaḥ smṛtaḥ navamaḥ ketumālaśca tannāmnā varṣasaṁsthitiḥ
कुरु उनका सातवाँ था, और भद्राश्व आठवाँ स्मरण किया गया; नौवाँ केतुमाल है — उनके नामों से ही प्रदेशों की स्थापना हुई।
श्लोक 36 (markandeya.53.36)
यानि किपुरुषाद्यानि वर्जयित्वा हिमाह्वयम् । तेषां स्वबावतः सिद्धिः सुखप्राया ह्यत्नतः ॥ 53.36 ॥
yāni kipuruṣādyāni varjayitvā himāhvayam teṣāṁ svabāvataḥ siddhiḥ sukhaprāyā hyatnataḥ
किंपुरुष आदि प्रदेशों में, हिम नामक [भारतवर्ष] को छोड़कर, इन [शेष] सबमें स्वभाव से ही सिद्धि प्रायः सुखपूर्वक, बिना परिश्रम के प्राप्त होती है।
श्लोक 37 (markandeya.53.37)
विपर्ययो न तेष्वस्ति जरामृत्युभयं न च । धर्माधर्मौ न तेष्वास्तां नोत्तमाधममध्यमाः ॥ 53.37 ॥
viparyayo na teṣvasti jarāmṛtyubhayaṁ na ca dharmādharmau na teṣvāstāṁ nottamādhamamadhyamāḥ
उनमें कोई विपरीत परिणाम नहीं होता, न बुढ़ापे और मृत्यु का भय है; उनमें न धर्म-अधर्म हैं, और न ही उत्तम, अधम, मध्यम [वर्ग] हैं,
श्लोक 38 (markandeya.53.38)
न वै चतुर्युगावस्था नार्तवा ऋतवो न च । आग्नीध्रसूनोर्नाभेस्तु ऋषभोऽभूत् सुतो द्विज ॥ 53.38 ॥
na vai caturyugāvasthā nārtavā ṛtavo na ca āgnīdhrasūnornābhestu ṛṣabho'bhūt suto dvija
और न ही चार युगों की अवस्था है, न ऋतुओं का परिवर्तन। आग्नीध्र के पुत्र नाभि को ऋषभ नाम का पुत्र हुआ, हे द्विज।
श्लोक 39 (markandeya.53.39)
ऋषभाद्भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताद्वरः । सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं महाप्रव्राज्यमास्थितः ॥ 53.39 ॥
ṛṣabhādbharato jajñe vīraḥ putraśatādvaraḥ so'bhiṣicyarṣabhaḥ putraṁ mahāpravrājyamāsthitaḥ
ऋषभ से भरत उत्पन्न हुए, जो वीर और सौ पुत्रों में श्रेष्ठ थे; ऋषभ ने अपने पुत्र [भरत] का अभिषेक करके महाप्रव्रज्या का आश्रय लिया।
श्लोक 40 (markandeya.53.40)
तपस्तेपे महाभागः पुलहाश्रमसंश्रयः । हिमाह्विं दक्षिणं वर्षं भरताय पिता ददौ ॥ 53.40 ॥
tapastepe mahābhāgaḥ pulahāśramasaṁśrayaḥ himāhviṁ dakṣiṇaṁ varṣaṁ bharatāya pitā dadau
वह महाभाग्यशाली पुलह के आश्रम का आश्रय लेकर तपस्या करने लगा। पिता ने भरत को हिम नामक दक्षिण प्रदेश दिया।
श्लोक 41 (markandeya.53.41)
तस्मात् तु भारतं वर्षं तस्य नान्मा महात्मनः । भतस्याप्यभूत् पुत्रः सुमतिर्नाम धार्मिकः ॥ 53.41 ॥
tasmāt tu bhārataṁ varṣaṁ tasya nānmā mahātmanaḥ bhatasyāpyabhūt putraḥ sumatirnāma dhārmikaḥ
उसी से भारतवर्ष का नाम उस महात्मा के नाम पर पड़ा। भरत के भी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम सुमति था, जो धर्मात्मा था।
श्लोक 42 (markandeya.53.42)
तस्मिन् राज्यं समावेश्य भरतोऽपि वनं ययौ । एतेषां पुत्रपौत्रैस्तु सप्तद्वीपा वसुन्धरा ॥ 53.42 ॥
tasmin rājyaṁ samāveśya bharato'pi vanaṁ yayau eteṣāṁ putrapautraistu saptadvīpā vasundharā
उसे राज्य में स्थापित करके भरत भी वन को चले गए। इन सबके पुत्रों और पौत्रों द्वारा, सप्तद्वीप वसुधा,
श्लोक 43 (markandeya.53.43)
प्रियव्रतस्य पुत्रैस्तु भुक्त्वा स्वायम्भुवेऽन्तरे । एष स्वायम्भुवः सर्गः कथितस्ते द्विजोत्तम ॥ 53.43 ॥
priyavratasya putraistu bhuktvā svāyambhuve'ntare eṣa svāyambhuvaḥ sargaḥ kathitaste dvijottama
प्रियव्रत के पुत्रों द्वारा भोगी गई, स्वायम्भुव मन्वन्तर में। यह स्वायम्भुव सर्ग तुम्हें बताया गया, हे द्विजोत्तम।
श्लोक 44 (markandeya.53.44)
पूर्वमन्वन्तरे सम्यक् किमन्यत् कथयामि ते ॥ 53.44 ॥
pūrvamanvantare samyak kimanyat kathayāmi te
पूर्व मन्वन्तर के विषय में यह भलीभाँति कहा गया; अब और क्या तुम्हें बताऊँ?