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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 54

द्वीप और जम्बूद्वीप-वर्णन

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

श्लोक 1 (markandeya.54.1)

क्रौष्टुकिरुवाच कतिद्वीपाः समुद्रा वा पर्वता वा कति द्विज । कियन्ति चैव वर्षाणि तेषां नद्यश्च का मुने ॥ 54.1 ॥

krauṣṭukiruvāca katidvīpāḥ samudrā vā parvatā vā kati dvija kiyanti caiva varṣāṇi teṣāṁ nadyaśca kā mune

क्रौष्टुकि ने कहा — हे द्विज, कितने द्वीप हैं, कितने समुद्र और कितने पर्वत हैं? और कितने वर्ष [प्रदेश] हैं, तथा हे मुनि, उनकी नदियाँ कौन-कौन सी हैं?

श्लोक 2 (markandeya.54.2)

महाभूतप्रमाणञ्च लोकालोकन्तथैव च । पर्यासं परिमाणञ्च गतिञ्चन्द्रार्कयोरपि ॥ 54.2 ॥

mahābhūtapramāṇañca lokālokantathaiva ca paryāsaṁ parimāṇañca gatiñcandrārkayorapi

महाभूतों का प्रमाण, तथा लोकालोक पर्वत, विस्तार और परिमाण, और चन्द्र-सूर्य की गति भी —

श्लोक 3 (markandeya.54.3)

एतत् प्रब्रूहि मे सर्वं विस्तरेण महामुने ॥ 54.3 ॥

etat prabrūhi me sarvaṁ vistareṇa mahāmune

यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बताइए, हे महामुने।

श्लोक 4 (markandeya.54.4)

मार्कण्डेय उवाच शतार्धकोटिविस्तारा पृथिवी कृत्स्त्रशो द्विज । तस्या हि स्थानमखिलं कथयामि शृणुष्व तत् ॥ 54.4 ॥

mārkaṇḍeya uvāca śatārdhakoṭivistārā pṛthivī kṛtstraśo dvija tasyā hi sthānamakhilaṁ kathayāmi śṛṇuṣva tat

मार्कण्डेय ने कहा — पृथ्वी सम्पूर्ण रूप से पचास करोड़ [योजन] विस्तार वाली है, हे द्विज; उसकी सारी स्थिति मैं बताता हूँ, उसे सुनो।

श्लोक 5 (markandeya.54.5)

ये ते द्वीपा मया प्रोक्ता जम्बुद्वीपादयो द्विज । पुष्करान्ता महाभाग ! शृण्वेषां विस्तरं पुनः ॥ 54.5 ॥

ye te dvīpā mayā proktā jambudvīpādayo dvija puṣkarāntā mahābhāga ! śṛṇveṣāṁ vistaraṁ punaḥ

जिन द्वीपों का मैंने वर्णन किया — जम्बूद्वीप आदि, पुष्कर तक — हे महाभाग, अब उनका विस्तार पुनः सुनो।

श्लोक 6 (markandeya.54.6)

द्वीपात् तु द्विगुणो द्वीपो जम्बुः प्लक्षोऽथ शाल्मलः । कुशः क्रौञ्चस्तथा शाकः पुष्करद्वीप एव च ॥ 54.6 ॥

dvīpāt tu dviguṇo dvīpo jambuḥ plakṣo'tha śālmalaḥ kuśaḥ krauñcastathā śākaḥ puṣkaradvīpa eva ca

प्रत्येक द्वीप अपने से पूर्व द्वीप से दुगुना है — जम्बू, फिर प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौंच, शाक, तथा पुष्कर द्वीप —

श्लोक 7 (markandeya.54.7)

लवणेक्षु-सुरा-सर्पिर्दधि-दुग्धःजलाब्धिभिः । द्विगुणैर्द्विगुणैर्वृद्ध्या सर्वतः परिवेष्टिताः ॥ 54.7 ॥

lavaṇekṣu-surā-sarpirdadhi-dugdhaḥjalābdhibhiḥ dviguṇairdviguṇairvṛddhyā sarvataḥ pariveṣṭitāḥ

वे क्रमशः खारे जल, इक्षुरस, मदिरा, घी, दही, दूध, और मीठे जल के समुद्रों से चारों ओर घिरे हैं, जो भी क्रमशः दुगुने-दुगुने हैं।

श्लोक 8 (markandeya.54.8)

जम्बुद्वीपस्य संस्थानं प्रवक्ष्येऽहं निबोध मे । लक्षमेकं योजनानां वृत्तौ विस्तारदैर्घ्यतः ॥ 54.8 ॥

jambudvīpasya saṁsthānaṁ pravakṣye'haṁ nibodha me lakṣamekaṁ yojanānāṁ vṛttau vistāradairghyataḥ

अब मैं जम्बूद्वीप की संरचना बताऊँगा, उसे मुझसे जानो। यह गोल आकार में एक लाख योजन चौड़ाई-लम्बाई में विस्तृत है।

श्लोक 9 (markandeya.54.9)

हिमवान् हेमकूटश्च ऋषभो मेरुरेव च । नीलः श्वेतस्तथा शृङ्गी सप्तास्मिन् वर्षपर्वताः ॥ 54.9 ॥

himavān hemakūṭaśca ṛṣabho merureva ca nīlaḥ śvetastathā śṛṅgī saptāsmin varṣaparvatāḥ

हिमवान, हेमकूट, ऋषभ, तथा मेरु, नील, श्वेत, और शृंगी — ये इसमें सात वर्ष-पर्वत हैं।

श्लोक 10 (markandeya.54.10)

द्वौ लक्षयोजनायामौ मध्ये तत्र महाचलौ । तयोर्दक्षिणतो यौ तु यौ तथोत्तरतो गिरी ॥ 54.10 ॥

dvau lakṣayojanāyāmau madhye tatra mahācalau tayordakṣiṇato yau tu yau tathottarato girī

दो लाख योजन लम्बे दो महापर्वत उसके मध्य में हैं; उनके दक्षिण में और उत्तर में भी क्रमशः [अन्य] पर्वत हैं,

श्लोक 11 (markandeya.54.11)

दशभिर्दशभिर्न्यूनैः सहस्रैस्तैः परस्परम् । द्विसाहस्त्रोच्छ्रयाः सर्वे तावद्विस्तारिणश्च ते ॥ 54.11 ॥

daśabhirdaśabhirnyūnaiḥ sahasraistaiḥ parasparam dvisāhastrocchrayāḥ sarve tāvadvistāriṇaśca te

जो परस्पर एक-दूसरे से दस-दस हजार [योजन] कम होते जाते हैं; वे सभी दो हजार [योजन] ऊँचे हैं, और उतने ही चौड़े भी हैं।

श्लोक 12 (markandeya.54.12)

समुद्रान्तः प्रविष्टाश्च षडस्मिन् वर्षपर्वताः । दक्षिणोत्तरतो निम्ना मध्ये तुङ्गायता क्षितिः ॥ 54.12 ॥

samudrāntaḥ praviṣṭāśca ṣaḍasmin varṣaparvatāḥ dakṣiṇottarato nimnā madhye tuṅgāyatā kṣitiḥ

इनमें से छह वर्ष-पर्वत समुद्र के भीतर तक प्रविष्ट हैं; भूमि दक्षिण और उत्तर में नीची, तथा मध्य में ऊँची और लम्बी है।

श्लोक 13 (markandeya.54.13)

वेद्यर्धे दक्षिमे त्रीणि त्रीणि वर्षाणि चोत्तरे । इलावृतं तयोर्मध्ये चन्द्रार्धाकारवत् स्थितम् ॥ 54.13 ॥

vedyardhe dakṣime trīṇi trīṇi varṣāṇi cottare ilāvṛtaṁ tayormadhye candrārdhākāravat sthitam

दक्षिण के आधे भाग में तीन, और उत्तर में भी तीन वर्ष [प्रदेश] हैं; उन दोनों के मध्य में इलावृत है, जो अर्धचन्द्र के आकार का है।

श्लोक 14 (markandeya.54.14)

ततः पूर्वेण भद्राश्वं केतुमालञ्च पश्चिमे । इलावृतस्य मध्ये तु मेरुः कनकपर्वतः ॥ 54.14 ॥

tataḥ pūrveṇa bhadrāśvaṁ ketumālañca paścime ilāvṛtasya madhye tu meruḥ kanakaparvataḥ

फिर उसके पूर्व में भद्राश्व है, और पश्चिम में केतुमाल; इलावृत के मध्य में सुवर्ण-पर्वत मेरु स्थित है।

श्लोक 15 (markandeya.54.15)

चतुरशीतिसाहस्त्रस्तस्योच्छ्रायो महागिरेः । प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्विस्तीर्णः षोडशैव तु ॥ 54.15 ॥

caturaśītisāhastrastasyocchrāyo mahāgireḥ praviṣṭaḥ ṣoḍaśādhastādvistīrṇaḥ ṣoḍaśaiva tu

उस महापर्वत की ऊँचाई चौरासी हजार [योजन] है; यह नीचे सोलह हजार तक प्रविष्ट है, और सोलह हजार ही इसका विस्तार है।

श्लोक 16 (markandeya.54.16)

शरावसंस्थितत्वाच्च द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः । शुक्लः पीतोऽसितो रक्तः प्राच्यादिषु यथाक्रमम् ॥ 54.16 ॥

śarāvasaṁsthitatvācca dvātriṁśanmūrdhni vistṛtaḥ śuklaḥ pīto'sito raktaḥ prācyādiṣu yathākramam

उलटे कटोरे के समान आकार होने के कारण यह शिखर पर बत्तीस हजार तक फैला हुआ है; यह क्रमशः पूर्व आदि दिशाओं में श्वेत, पीत, श्याम और रक्त वर्ण का है,

श्लोक 17 (markandeya.54.17)

विप्रो वैश्यस्तथा शूद्रः क्षत्रियश्च स्ववर्णतः । तस्योपरि तथैवाष्टौ पुर्यो दिक्षु यथाक्रमम् ॥ 54.17 ॥

vipro vaiśyastathā śūdraḥ kṣatriyaśca svavarṇataḥ tasyopari tathaivāṣṭau puryo dikṣu yathākramam

जो अपने-अपने वर्ण से ब्राह्मण, वैश्य, तथा शूद्र और क्षत्रिय [के रंगों] का प्रतीक है। उसके ऊपर उसी प्रकार दिशाओं में क्रमशः इन्द्र आदि लोकपालों की आठ पुरियाँ हैं,

श्लोक 18 (markandeya.54.18)

इन्द्रादिलोकपालानां तन्मध्ये ब्रह्मणः सभा । योजनानां सहस्राणि चतुर्दश समुच्छ्रिता ॥ 54.18 ॥

indrādilokapālānāṁ tanmadhye brahmaṇaḥ sabhā yojanānāṁ sahasrāṇi caturdaśa samucchritā

और उनके मध्य में ब्रह्मा की सभा है, जो चौदह हजार योजन ऊँची उठी हुई है।

श्लोक 19 (markandeya.54.19)

अयुतोच्छ्रायास्तस्याधस्तथा विषकम्भवर्वताः । प्राच्यादिषु क्रमेणैव मन्दरो गन्धमादनः ॥ 54.19 ॥

ayutocchrāyāstasyādhastathā viṣakambhavarvatāḥ prācyādiṣu krameṇaiva mandaro gandhamādanaḥ

उसके नीचे दस हजार [योजन] ऊँचे विष्कम्भ-पर्वत हैं; पूर्व आदि दिशाओं में क्रमशः मन्दर, गन्धमादन,

श्लोक 20 (markandeya.54.20)

विपुलश्च सुपार्श्वश्च केतुपादपशोभिताः । कदम्बो मन्दरे केतुर्जम्बुव गन्धमादने ॥ 54.20 ॥

vipulaśca supārśvaśca ketupādapaśobhitāḥ kadambo mandare keturjambuva gandhamādane

विपुल, और सुपार्श्व, जो अपने ध्वज-वृक्षों से सुशोभित हैं। मन्दर पर कदम्ब का ध्वज है, गन्धमादन पर जम्बू का,

श्लोक 21 (markandeya.54.21)

विपुले च तथाश्वत्थः सुपार्श्वे च वटो महान् । एकादशशतायामा योजनानामिमे नगाः ॥ 54.21 ॥

vipule ca tathāśvatthaḥ supārśve ca vaṭo mahān ekādaśaśatāyāmā yojanānāmime nagāḥ

विपुल पर उसी प्रकार अश्वत्थ [पीपल], और सुपार्श्व पर विशाल वट। ये पर्वत ग्यारह सौ योजन विस्तृत हैं।

श्लोक 22 (markandeya.54.22)

जठरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ । आनीलनिषधौ प्राप्तौ परस्परनिरन्तरौ ॥ 54.22 ॥

jaṭharo devakūṭaśca pūrvasyāṁ diśi parvatau ānīlaniṣadhau prāptau parasparanirantarau

जठर और देवकूट — ये दो पर्वत पूर्व दिशा में हैं, जो नील से लेकर निषध तक परस्पर अविच्छिन्न फैले हैं।

श्लोक 23 (markandeya.54.23)

निषधः पारियात्रश्च मेरोः पार्श्वे तु पश्चिमे । यथा पूर्वौ तथा चैतावानीलनिषधायतौ ॥ 54.23 ॥

niṣadhaḥ pāriyātraśca meroḥ pārśve tu paścime yathā pūrvau tathā caitāvānīlaniṣadhāyatau

निषध और पारियात्र मेरु के पश्चिम भाग में हैं; जैसे वे दो पूर्व वाले हैं, वैसे ही ये भी नील से निषध तक विस्तृत हैं।

श्लोक 24 (markandeya.54.24)

कैलासो हिमवांश्चैव दक्षिणेन महाचलौ । पूर्वपश्चायतावेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ 54.24 ॥

kailāso himavāṁścaiva dakṣiṇena mahācalau pūrvapaścāyatāvetāvarṇavāntarvyavasthitau

कैलास और हिमवान — दक्षिण में ये दो महापर्वत हैं, जो पूर्व-पश्चिम फैले हुए समुद्र के भीतर तक स्थित हैं।

श्लोक 25 (markandeya.54.25)

शृङ्गवान् जारुधिश्चैव तथैवोत्तरपर्वतौ । यतैव दक्षिणे तद्वदर्णप्वान्तर्व्यवस्थितौ ॥ 54.25 ॥

śṛṅgavān jārudhiścaiva tathaivottaraparvatau yataiva dakṣiṇe tadvadarṇapvāntarvyavasthitau

शृंगवान और जारुधि — ये उसी प्रकार उत्तर के दो पर्वत हैं; जैसे दक्षिण में हैं, वैसे ही ये भी समुद्र के भीतर तक स्थित हैं।

श्लोक 26 (markandeya.54.26)

मर्यादापर्वता ह्येते कथ्यन्तेऽष्टौ द्विजोत्तम । हिमवद्धेमकूटादिपर्वतानां परस्परम् ॥ 54.26 ॥

maryādāparvatā hyete kathyante'ṣṭau dvijottama himavaddhemakūṭādiparvatānāṁ parasparam

हे द्विजोत्तम, ये आठ मर्यादा-पर्वत [सीमा-पर्वत] कहलाते हैं। हिमवान, हेमकूट आदि पर्वतों के परस्पर अन्तर में,

श्लोक 27 (markandeya.54.27)

नवयोजनसाहस्त्रं प्रागुदग्दक्षिणोत्तरम् । मेरोरिलावृते तद्वदन्तरे वै चतुर्दिशम् ॥ 54.27 ॥

navayojanasāhastraṁ prāgudagdakṣiṇottaram merorilāvṛte tadvadantare vai caturdiśam

पूर्व-उत्तर-दक्षिण दिशा में नौ हजार योजन का अन्तर है; उसी प्रकार मेरु और इलावृत के बीच भी चारों दिशाओं में यही अन्तर है।

श्लोक 28 (markandeya.54.28)

फलानि यानि वै जम्ब्वाः गन्धमादनपर्वते । गजदेहप्रमाणानि पतन्ति गिरिमूर्धनि ॥ 54.28 ॥

phalāni yāni vai jambvāḥ gandhamādanaparvate gajadehapramāṇāni patanti girimūrdhani

गन्धमादन पर्वत पर जम्बू वृक्ष के जो फल गजतुल्य आकार के हैं, वे पर्वत के शिखर पर गिरते हैं।

श्लोक 29 (markandeya.54.29)

तेषां स्त्रावात् प्रभवति ख्याता जम्बूनदीति वै । यत्र जाम्बूनदं नाम कनकं सम्प्रजायते ॥ 54.29 ॥

teṣāṁ strāvāt prabhavati khyātā jambūnadīti vai yatra jāmbūnadaṁ nāma kanakaṁ samprajāyate

उनके रस से जम्बू नाम से विख्यात नदी उत्पन्न होती है, जहाँ जाम्बूनद नामक सुवर्ण उत्पन्न होता है।

श्लोक 30 (markandeya.54.30)

सा परिक्रम्य वै मेरुं जम्बूमूलं पुनर्नदी । विशति द्विजशार्दूल ! पीयमाना जनैश्च तैः ॥ 54.30 ॥

sā parikramya vai meruṁ jambūmūlaṁ punarnadī viśati dvijaśārdūla ! pīyamānā janaiśca taiḥ

वह नदी मेरु की परिक्रमा करके पुनः जम्बू वृक्ष की जड़ में प्रवेश करती है, हे द्विजश्रेष्ठ, और वहाँ के निवासियों द्वारा पी जाती है।

श्लोक 31 (markandeya.54.31)

भद्राश्वेऽश्वशिरा विष्णुर्भारते कूर्मसंस्थितिः । वराहः केतुमाले च मत्स्यरूपस्तथोत्तरे ॥ 54.31 ॥

bhadrāśve'śvaśirā viṣṇurbhārate kūrmasaṁsthitiḥ varāhaḥ ketumāle ca matsyarūpastathottare

भद्राश्व में विष्णु हयग्रीव [अश्वमुख] रूप में हैं, भारत में कूर्म-रूप में स्थित हैं, केतुमाल में वराह-रूप में, और उत्तर [कुरु] में मत्स्य-रूप में हैं।

श्लोक 32 (markandeya.54.32)

तेषु नक्षत्रविन्यासाद्विषयाः समवस्थिताः । चतुर्ष्वपि द्विजश्रेष्ठ ! ग्रहाभिभवपाठकाः ॥ 54.32 ॥

teṣu nakṣatravinyāsādviṣayāḥ samavasthitāḥ caturṣvapi dvijaśreṣṭha ! grahābhibhavapāṭhakāḥ

हे द्विजश्रेष्ठ, इन [चारों] में नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार प्रदेश व्यवस्थित हैं, और चारों में ही ग्रहों के प्रभाव को जानने वाले [ज्योतिषी] भी विद्यमान हैं।

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