सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 55
मेरु के वन-पर्वत तथा भारतवर्ष-वर्णन
श्लोक 1 (markandeya.55.1)
मार्कण्डेय उवाच शैलेषु मन्दाराद्येषु चतुर्ष्वपि द्विजोत्तम । वाननि यानि चत्वारि सरांसि च निबोध मे ॥ 55.1 ॥
mārkaṇḍeya uvāca śaileṣu mandārādyeṣu caturṣvapi dvijottama vānani yāni catvāri sarāṁsi ca nibodha me
मार्कण्डेय ने कहा — हे द्विजोत्तम, मन्दर आदि चारों पर्वतों पर जो चार वन और चार सरोवर हैं, उन्हें मुझसे जानो।
श्लोक 2 (markandeya.55.2)
पूर्वं चैत्ररथं नाम दक्षिणे नन्दनं वनम् । वैभ्राजं पश्चिमे शैले सावित्रं चोत्तराचले ॥ 55.2 ॥
pūrvaṁ caitrarathaṁ nāma dakṣiṇe nandanaṁ vanam vaibhrājaṁ paścime śaile sāvitraṁ cottarācale
पूर्व में चैत्ररथ नाम का वन है, दक्षिण में नन्दन वन; पश्चिम के पर्वत पर वैभ्राज, और उत्तर के पर्वत पर सावित्र वन है।
श्लोक 3 (markandeya.55.3)
अरुणोदं सरः पूर्वं मानसं दक्षिणे तथा । शीतोदं पश्चिमे मेरोर्महाभद्रं तथोत्तरे ॥ 55.3 ॥
aruṇodaṁ saraḥ pūrvaṁ mānasaṁ dakṣiṇe tathā śītodaṁ paścime merormahābhadraṁ tathottare
अरुणोद सरोवर पूर्व में है, उसी प्रकार मानस दक्षिण में; मेरु के पश्चिम में शीतोद, और उत्तर में महाभद्र सरोवर है।
श्लोक 4 (markandeya.55.4)
शीतार्तश्चक्रमुञ्जश्च कुलीरोऽथ सुकङ्कवान् । मणिशैलोऽथ वृषवान् महानीलो भवाचलः ॥ 55.4 ॥
śītārtaścakramuñjaśca kulīro'tha sukaṅkavān maṇiśailo'tha vṛṣavān mahānīlo bhavācalaḥ
शीतार्थ, चक्रमुंज, कुलीर, और सुकंकवान, मणिशैल, तथा वृषवान, महानील, भवाचल —
श्लोक 5 (markandeya.55.5)
सूबिन्दुर्मन्दरो वेणुस्तामसो निषधस्तथा । देवशैलश्च पूर्वेण मन्दरस्य महाचलः ॥ 55.5 ॥
sūbindurmandaro veṇustāmaso niṣadhastathā devaśailaśca pūrveṇa mandarasya mahācalaḥ
सूबिन्दु, मन्दर, वेणु, तामस, और उसी प्रकार निषध, तथा देवशैल — यह मन्दर के पूर्व में स्थित महापर्वत है।
श्लोक 6 (markandeya.55.6)
त्रिकटशिखराद्रिश्च कलिङ्गोऽथ पतङ्गकः । रुचकः सानुमांश्चाद्रिस्ताम्रकोऽथ विशाखवान् ॥ 55.6 ॥
trikaṭaśikharādriśca kaliṅgo'tha pataṅgakaḥ rucakaḥ sānumāṁścādristāmrako'tha viśākhavān
त्रिकटशिखराद्रि, और कलिंग, तथा पतंगक, रुचक, सानुमान, और ताम्रक पर्वत, तथा विशाखवान —
श्लोक 7 (markandeya.55.7)
श्वेतोदरः समूलश्च वसुधारश्च रत्नवान् । एकशृङ्गो महाशैलो राजशालः पिपाठकः ॥ 55.7 ॥
śvetodaraḥ samūlaśca vasudhāraśca ratnavān ekaśṛṅgo mahāśailo rājaśālaḥ pipāṭhakaḥ
श्वेतोदर, और समूल, तथा रत्नयुक्त वसुधार, महापर्वत एकशृंग, राजशाल, पिपाठक —
श्लोक 8 (markandeya.55.8)
पञ्चशैलोऽथ कैलासो हिमवांश्चाचलोत्तमः । इत्येते दक्षिणे पार्श्वे मेरोः प्रोक्ता महाचलाः ॥ 55.8 ॥
pañcaśailo'tha kailāso himavāṁścācalottamaḥ ityete dakṣiṇe pārśve meroḥ proktā mahācalāḥ
पंचशैल, तथा कैलास, और श्रेष्ठ पर्वत हिमवान — ये मेरु के दक्षिण पार्श्व में कहे गए महापर्वत हैं।
श्लोक 9 (markandeya.55.9)
सुरक्षः शिशिराक्षश्च वैदुर्यः कपिलस्तथा । पिञ्जरोऽथ महाभद्रः सुरसः पिङ्गलो मधुः ॥ 55.9 ॥
surakṣaḥ śiśirākṣaśca vaiduryaḥ kapilastathā piñjaro'tha mahābhadraḥ surasaḥ piṅgalo madhuḥ
सुरक्ष, और शिशिराक्ष, वैदूर्य, तथा उसी प्रकार कपिल, पिंजर, तथा महाभद्र, सुरस, पिंगल, मधु —
श्लोक 10 (markandeya.55.10)
अञ्जनः कुक्कुटः कृष्णः पाण्डरश्चालोत्तमः । सहस्रशिखरश्चाद्रिः पारियात्रः सशृङ्गवान् ॥ 55.10 ॥
añjanaḥ kukkuṭaḥ kṛṣṇaḥ pāṇḍaraścālottamaḥ sahasraśikharaścādriḥ pāriyātraḥ saśṛṅgavān
अंजन, कुक्कुट, कृष्ण, पाण्डर, और चालोत्तम, सहस्रशिखर पर्वत, तथा शृंगों सहित पारियात्र —
श्लोक 11 (markandeya.55.11)
पश्चिमेन तथा मेरोर्विस्कम्भात् पश्चिमाद्वहिः । एतेऽचलाः समाख्याताः शृणुष्वन्यांस्तथोत्तरान् ॥ 55.11 ॥
paścimena tathā merorviskambhāt paścimādvahiḥ ete'calāḥ samākhyātāḥ śṛṇuṣvanyāṁstathottarān
ये मेरु के विष्कम्भ [आधार-पर्वत] से पश्चिम में, उसके बाहर स्थित हैं। इस प्रकार ये पर्वत कहे गए; अब उत्तर के अन्य पर्वतों को सुनो।
श्लोक 12 (markandeya.55.12)
शङ्खकूटोऽथ वृषभो हंसनाभस्तथाचलः । कपिलेन्द्रस्तथा शैलः सानुमान् नील एव च ॥ 55.12 ॥
śaṅkhakūṭo'tha vṛṣabho haṁsanābhastathācalaḥ kapilendrastathā śailaḥ sānumān nīla eva ca
शंखकूट, तथा वृषभ, और हंसनाभ पर्वत, उसी प्रकार कपिलेन्द्र पर्वत, सानुमान, और नील भी —
श्लोक 13 (markandeya.55.13)
स्वर्णशृङ्गी शातशृङ्गी पुष्पको मेघपर्वतः । विरजाक्षो वराहाद्रिर्मयूरो जारुधिस्तथा ॥ 55.13 ॥
svarṇaśṛṅgī śātaśṛṅgī puṣpako meghaparvataḥ virajākṣo varāhādrirmayūro jārudhistathā
स्वर्णशृंगी, शातशृंगी, पुष्पक, मेघपर्वत, विरजाक्ष, वराहाद्रि, मयूर, तथा जारुधि —
श्लोक 14 (markandeya.55.14)
इत्येते कथिता ब्रह्मन् ! मेरोरुत्तरतो नगाः । एतेषां पर्वतानान्तु द्रौण्योऽतीव मनोहराः ॥ 55.14 ॥
ityete kathitā brahman ! meroruttarato nagāḥ eteṣāṁ parvatānāntu drauṇyo'tīva manoharāḥ
हे ब्रह्मन्, ये मेरु के उत्तर में स्थित पर्वत कहे गए हैं। इन पर्वतों की घाटियाँ अत्यन्त मनोहर हैं,
श्लोक 15 (markandeya.55.15)
वनैरमलपानीयैः सरोभिरुपशोभिताः । तासु पुण्यकृतां जन्म मनुष्याणां द्विजोत्तम ॥ 55.15 ॥
vanairamalapānīyaiḥ sarobhirupaśobhitāḥ tāsu puṇyakṛtāṁ janma manuṣyāṇāṁ dvijottama
जो निर्मल जल के वनों तथा सरोवरों से सुशोभित हैं; उनमें, हे द्विजोत्तम, पुण्यकर्मी मनुष्यों का जन्म होता है।
श्लोक 16 (markandeya.55.16)
एते भौमा द्विजश्रेष्ठ ! स्वर्गाः स्वर्गगुणाधिकाः । न तासु पुण्यपापानामपूर्वाणामुपार्जनम् ॥ 55.16 ॥
ete bhaumā dvijaśreṣṭha ! svargāḥ svargaguṇādhikāḥ na tāsu puṇyapāpānāmapūrvāṇāmupārjanam
हे द्विजश्रेष्ठ, ये पार्थिव स्वर्ग हैं, स्वर्ग के गुणों से भी अधिक; इनमें नए पुण्य या पाप का अर्जन नहीं होता,
श्लोक 17 (markandeya.55.17)
पुण्योपभोगा एवोक्ता देवानामपि तास्वपि । शीतान्ताद्येषु चैतषु शैलेषु द्विजसत्तम ॥ 55.17 ॥
puṇyopabhogā evoktā devānāmapi tāsvapi śītāntādyeṣu caitaṣu śaileṣu dvijasattama
केवल पूर्वार्जित पुण्य का भोग ही देवताओं के लिए भी वहाँ कहा गया है। इन शीत [-क्षेत्र] आदि पर्वतों में, हे द्विजसत्तम,
श्लोक 18 (markandeya.55.18)
विद्याधराणां यक्षाणां किन्नरोरगरक्षसाम् । देवानाञ्च महावासा गन्धर्वाणां च शोभनाः ॥ 55.18 ॥
vidyādharāṇāṁ yakṣāṇāṁ kinnaroragarakṣasām devānāñca mahāvāsā gandharvāṇāṁ ca śobhanāḥ
विद्याधरों, यक्षों, किन्नरों, नागों और राक्षसों के तथा देवताओं और गन्धर्वों के भी सुन्दर महान् निवास हैं,
श्लोक 19 (markandeya.55.19)
महापुण्या मनोज्ञैश्च सदैवोपवनैर्युताः । सरांसि च मनोज्ञानि सर्वर्तुसुखदोऽनिलः ॥ 55.19 ॥
mahāpuṇyā manojñaiśca sadaivopavanairyutāḥ sarāṁsi ca manojñāni sarvartusukhado'nilaḥ
अत्यन्त पुण्यमय और मनोहर उपवनों से युक्त सदैव; तथा मनोरम सरोवर, और सब ऋतुओं में सुख देने वाला पवन।
श्लोक 20 (markandeya.55.20)
न चैतेषु मनुष्याणां वैमनस्यानि कुत्रचित् । तदेवं पार्थिवं पद्मं चतुष्पत्रं मयोदितम् ॥ 55.20 ॥
na caiteṣu manuṣyāṇāṁ vaimanasyāni kutracit tadevaṁ pārthivaṁ padmaṁ catuṣpatraṁ mayoditam
इनमें मनुष्यों को कहीं भी कोई असन्तोष नहीं होता। इस प्रकार यह चार पंखुड़ियों वाला पार्थिव कमल मेरे द्वारा वर्णित किया गया —
श्लोक 21 (markandeya.55.21)
भद्राश्चभारताद्यानि पत्राण्यस्य चतुर्दिशम् । भारतं नाम यद्वर्षं दक्षिणेन मयोदितम् ॥ 55.21 ॥
bhadrāścabhāratādyāni patrāṇyasya caturdiśam bhārataṁ nāma yadvarṣaṁ dakṣiṇena mayoditam
भद्राश्व, भारत आदि इसकी चारों दिशाओं की पंखुड़ियाँ हैं। भारत नाम का जो वर्ष मैंने दक्षिण में बताया,
श्लोक 22 (markandeya.55.22)
तत् कर्मभूमिर्नान्यत्र संप्राप्तिः पुण्यपापयोः । एतत् प्रधानं विज्ञेयं यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ 55.22 ॥
tat karmabhūmirnānyatra saṁprāptiḥ puṇyapāpayoḥ etat pradhānaṁ vijñeyaṁ yatra sarvaṁ pratiṣṭhitam
वही कर्मभूमि है; अन्यत्र कहीं भी पुण्य और पाप की [ऐसी] प्राप्ति नहीं होती। इसे ही प्रधान जानना चाहिए, जहाँ सब कुछ प्रतिष्ठित है।
श्लोक 23 (markandeya.55.23)
तस्मात् स्वर्गापवर्गौ च मानुष्यनारकावपि । तिर्यक्त्वमथवाप्यन्यत् नरः प्राप्नोति वै द्विज ॥ 55.23 ॥
tasmāt svargāpavargau ca mānuṣyanārakāvapi tiryaktvamathavāpyanyat naraḥ prāpnoti vai dvija
इसलिए, हे द्विज, वहीं से मनुष्य स्वर्ग और मोक्ष को, तथा मनुष्य-योनि और नरक को, अथवा पशु-योनि अथवा अन्य किसी भी गति को प्राप्त करता है।