सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 59
भद्राश्व, केतुमाल और उत्तरकुरु वर्ष का वर्णन
श्लोक 1 (markandeya.59.1)
मार्कण्डेय उवाच एवन्तु भारतं वर्षं यथावत् कथितं मुने । कृतं त्रेता द्वापरञ्च तथाथिष्यं चतुष्टयम् ॥ 59.1 ॥
mārkaṇḍeya uvāca evantu bhārataṁ varṣaṁ yathāvat kathitaṁ mune kṛtaṁ tretā dvāparañca tathāthiṣyaṁ catuṣṭayam
मार्कण्डेय ने कहा — हे मुने! इस प्रकार भारतवर्ष का यथार्थ वर्णन तुम्हें सुनाया। कृत, त्रेता, द्वापर, तथा चतुर्थ युग —
श्लोक 2 (markandeya.59.2)
अत्रैवैतद्युगानान्तु चातुर्वर्ण्योऽत्र वै द्विज । चत्वारि त्रीणि द्वे चैव तथैकञ्च शरच्छतम् ॥ 59.2 ॥
atraivaitadyugānāntu cāturvarṇyo'tra vai dvija catvāri trīṇi dve caiva tathaikañca śaracchatam
यहीं इन चारों युगों की व्यवस्था तथा चारों वर्णों की स्थिति है, हे द्विज। इनमें मनुष्यों की आयु क्रमशः चार सौ, तीन सौ, दो सौ, और एक सौ वर्ष होती है।
श्लोक 3 (markandeya.59.3)
जीवन्त्यत्र नरा ब्रह्मन् ! कृतत्रेतादिके क्रमात् । देवकूटस्य पूर्वस्य शैलेन्द्रस्य महात्मनः ॥ 59.3 ॥
jīvantyatra narā brahman ! kṛtatretādike kramāt devakūṭasya pūrvasya śailendrasya mahātmanaḥ
हे ब्रह्मन्! यहाँ मनुष्य क्रमशः कृत, त्रेता आदि युगों में जीवन व्यतीत करते हैं। अब महान् पर्वतराज देवकूट के पूर्व में —
श्लोक 4 (markandeya.59.4)
पूर्वेण यत् स्थितं वर्षं भद्राश्वं तन्निबोध मे । श्वेतपर्णश्च नीलश्च शैवालश्चाचलोत्तमः ॥ 59.4 ॥
pūrveṇa yat sthitaṁ varṣaṁ bhadrāśvaṁ tannibodha me śvetaparṇaśca nīlaśca śaivālaścācalottamaḥ
उसके पूर्व में स्थित जो भद्राश्व वर्ष है, उसे मुझसे जानो। श्वेतपर्ण, नील, तथा शैवाल — यह श्रेष्ठ पर्वत,
श्लोक 5 (markandeya.59.5)
कौरञ्जः पर्णशालाग्रः पञ्चैते तु कुलाचलाः । तेषां प्रसूतिरन्ये ये बहवः क्षुद्रपर्वताः ॥ 59.5 ॥
kaurañjaḥ parṇaśālāgraḥ pañcaite tu kulācalāḥ teṣāṁ prasūtiranye ye bahavaḥ kṣudraparvatāḥ
कौरंज, तथा पर्णशालाग्र — ये पाँच कुलपर्वत हैं; इन्हीं से उत्पन्न अन्य बहुत से छोटे-छोटे पर्वत भी हैं।
श्लोक 6 (markandeya.59.6)
तैर्विशिष्टा जनपदा नानारूपाः सहस्रशः । ततः कुमुदसंकाशाः शुद्धसानुसुमङ्गलाः ॥ 59.6 ॥
tairviśiṣṭā janapadā nānārūpāḥ sahasraśaḥ tataḥ kumudasaṁkāśāḥ śuddhasānusumaṅgalāḥ
इन्हीं पर्वतों से पृथक् हुए सहस्रों प्रकार के विविध जनपद हैं — कुमुद पुष्प के समान उज्ज्वल, शुद्ध और परम मंगलमय शिखरों वाले।
श्लोक 7 (markandeya.59.7)
इत्येवमादयोऽन्येऽपि शतशोऽथ सहस्रशः । सीता शङ्खावती भद्रा चक्रावर्तादिकास्तथा ॥ 59.7 ॥
ityevamādayo'nye'pi śataśo'tha sahasraśaḥ sītā śaṅkhāvatī bhadrā cakrāvartādikāstathā
इस प्रकार ये तथा अन्य सैकड़ों-हजारों पर्वत हैं। सीता, शंखावती, भद्रा, तथा चक्रावर्ता आदि —
श्लोक 8 (markandeya.59.8)
नद्योऽथ बह्व्यो विस्तीर्णाः शीततोयौघवाहिकाः । अत्र वर्षे नराः शङ्खशुद्धहेमसमप्रभाः ॥ 59.8 ॥
nadyo'tha bahvyo vistīrṇāḥ śītatoyaughavāhikāḥ atra varṣe narāḥ śaṅkhaśuddhahemasamaprabhāḥ
— ये विस्तृत नदियाँ शीतल जल की धाराएँ लिए बहती हैं। इस वर्ष में मनुष्य शंख अथवा शुद्ध स्वर्ण के समान कांतिमान होते हैं,
श्लोक 9 (markandeya.59.9)
दिव्यसङ्गमिनः पुण्या दशवर्षशतायुषः । मन्दोत्तमौ न तेषु स्तः सर्वे ते समदर्शनाः ॥ 59.9 ॥
divyasaṅgaminaḥ puṇyā daśavarṣaśatāyuṣaḥ mandottamau na teṣu staḥ sarve te samadarśanāḥ
वे दिव्य कांति से युक्त, पुण्यात्मा, तथा सहस्र वर्ष की आयु वाले होते हैं; उनमें न कोई निम्न होता है और न श्रेष्ठ — वे सभी समान रूप-दर्शन वाले होते हैं।
श्लोक 10 (markandeya.59.10)
तितिक्षादिभिरष्टाभैः प्रकृत्या ते गुणैर्युताः । तत्राप्यश्वशिरा देवश्चतुर्बाहुर्जनार्दनः ॥ 59.10 ॥
titikṣādibhiraṣṭābhaiḥ prakṛtyā te guṇairyutāḥ tatrāpyaśvaśirā devaścaturbāhurjanārdanaḥ
वे स्वभाव से सहिष्णुता आदि आठ गुणों से युक्त होते हैं। वहाँ भी भगवान जनार्दन अश्व-मुख (हयग्रीव) तथा चतुर्भुज रूप में विराजमान हैं।
श्लोक 11 (markandeya.59.11)
शिरोहृदयोमेढ्राङ्घ्रिहस्तैश्चाक्षित्रयान्वितः । तस्याप्यथैवं विषया विज्ञेया जगतः प्रभोः ॥ 59.11 ॥
śirohṛdayomeḍhrāṅghrihastaiścākṣitrayānvitaḥ tasyāpyathaivaṁ viṣayā vijñeyā jagataḥ prabhoḥ
वे शिर, हृदय, उपस्थ, चरण और हाथों सहित, तथा तीन नेत्रों से युक्त हैं। उस जगत्प्रभु के भी इसी प्रकार शरीर के अंगों से संबंधित प्रदेशों को समझना चाहिए।
श्लोक 12 (markandeya.59.12)
केतुमालमतो वर्षं निबोध मम पश्चिमम् । विशालः कम्बलः कृष्णो जयन्तो हरिपर्वतः ॥ 59.12 ॥
ketumālamato varṣaṁ nibodha mama paścimam viśālaḥ kambalaḥ kṛṣṇo jayanto hariparvataḥ
अब मुझसे पश्चिम में स्थित केतुमाल वर्ष को जानो। विशाल, कंबल, कृष्ण, जयंत, तथा हरि पर्वत —
श्लोक 13 (markandeya.59.13)
विशोको वर्धमानश्च सप्तैते कुलपर्वताः । अन्ये सहस्रशः शैला येषु लोकगणः स्थितः ॥ 59.13 ॥
viśoko vardhamānaśca saptaite kulaparvatāḥ anye sahasraśaḥ śailā yeṣu lokagaṇaḥ sthitaḥ
विशोक, तथा वर्धमान — ये सात कुलपर्वत हैं; इनके अतिरिक्त सहस्रों अन्य पर्वत भी हैं, जिन पर जन-समुदाय निवास करता है।
श्लोक 14 (markandeya.59.14)
मौलयस्ते महाकायाः शाकपोतकम्भकाः । अङ्गुलप्रमुखाश्चापि वसन्ति शतशो जनाः ॥ 59.14 ॥
maulayaste mahākāyāḥ śākapotakambhakāḥ aṅgulapramukhāścāpi vasanti śataśo janāḥ
वे मूल-निवासी विशाल शरीर वाले होते हैं — शाकपोत, कंभक, तथा अंगुलप्रमुख — ऐसे सैकड़ों जन वहाँ निवास करते हैं।
श्लोक 15 (markandeya.59.15)
ये पिबन्ति महानद्यो वङ्क्षुं श्यामां सकम्बलाम् । अमोघां कामिनीं श्यामां तथैवान्याः सहस्रशः ॥ 59.15 ॥
ye pibanti mahānadyo vaṅkṣuṁ śyāmāṁ sakambalām amoghāṁ kāminīṁ śyāmāṁ tathaivānyāḥ sahasraśaḥ
वे वंक्षु, कंबला सहित श्यामा, अमोघा, कामिनी, श्यामा, तथा इसी प्रकार सहस्रों अन्य महानदियों का जल पीते हैं।
श्लोक 16 (markandeya.59.16)
अत्राप्यायुः समं पूर्वैरत्रापि भगवान् हरिः । वराहरूपी पादास्यहृत्पृष्ठपार्श्वतस्तथा ॥ 59.16 ॥
atrāpyāyuḥ samaṁ pūrvairatrāpi bhagavān hariḥ varāharūpī pādāsyahṛtpṛṣṭhapārśvatastathā
यहाँ भी आयु पूर्ववत् ही होती है; यहाँ भी भगवान हरि वराह-रूप में, अपने चरण, मुख, हृदय, पृष्ठ और पार्श्व सहित विद्यमान हैं।
श्लोक 17 (markandeya.59.17)
त्रिनक्षत्रयुते देशे नक्षत्राणि शुभानि च । इत्येतत् केतुमालन्ते कथितं मुनिसत्तम ॥ 59.17 ॥
trinakṣatrayute deśe nakṣatrāṇi śubhāni ca ityetat ketumālante kathitaṁ munisattama
प्रत्येक प्रदेश तीन-तीन नक्षत्रों से युक्त है, और वे नक्षत्र शुभ हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार यह केतुमाल वर्ष तुम्हें बताया गया।
श्लोक 18 (markandeya.59.18)
अतः परं कुरून् वक्ष्ये निबोधेह ममोत्तरान् । तत्र वृक्षा मधुफला नित्यपुष्पफलोपगाः ॥ 59.18 ॥
ataḥ paraṁ kurūn vakṣye nibodheha mamottarān tatra vṛkṣā madhuphalā nityapuṣpaphalopagāḥ
अब इसके आगे मैं उत्तर कुरु वर्ष का वर्णन करूँगा, उसे मुझसे सुनो। वहाँ के वृक्ष मधुर फलों वाले हैं और सदैव फूलों-फलों से लदे रहते हैं।
श्लोक 19 (markandeya.59.19)
वस्त्राणि च प्रसूयन्ते फलेष्वाभरणानि च । सर्वकामप्रदास्ते हि सर्वकामफलप्रदाः ॥ 59.19 ॥
vastrāṇi ca prasūyante phaleṣvābharaṇāni ca sarvakāmapradāste hi sarvakāmaphalapradāḥ
वे वृक्ष वस्त्र भी उत्पन्न करते हैं और उनके फलों में आभूषण भी प्राप्त होते हैं; वे समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं, क्योंकि उनके फल सभी इच्छाओं को सिद्ध करते हैं।
श्लोक 20 (markandeya.59.20)
भूमिर्मणिमयी वायुः सुगन्धः सर्वदा सुखः । जायन्ते मानवास्तत्र देवलोकपरिच्युताः ॥ 59.20 ॥
bhūmirmaṇimayī vāyuḥ sugandhaḥ sarvadā sukhaḥ jāyante mānavāstatra devalokaparicyutāḥ
वहाँ की भूमि रत्नमयी है, और वायु सुगंधित एवं सदा सुखद है। वहाँ वे मनुष्य जन्म लेते हैं जो देवलोक से च्युत हुए हैं।
श्लोक 21 (markandeya.59.21)
मिथुनानि प्रसूयन्ते समकालस्थितानि वै । अन्योन्यमनुरक्तानि चक्रवाकोपमानि च ॥ 59.21 ॥
mithunāni prasūyante samakālasthitāni vai anyonyamanuraktāni cakravākopamāni ca
वे युगल रूप में, एक ही समय में उत्पन्न होते हैं, परस्पर अनुरक्त, और चक्रवाक पक्षी-युगल के समान होते हैं।
श्लोक 22 (markandeya.59.22)
चतुर्दशसहस्राणि तेषां सार्धानि वै स्थितिः । चन्द्रकान्तश्च शैलेन्द्रः सूर्यकान्तस्तथापरः ॥ 59.22 ॥
caturdaśasahasrāṇi teṣāṁ sārdhāni vai sthitiḥ candrakāntaśca śailendraḥ sūryakāntastathāparaḥ
उनकी आयु साढ़े चौदह सहस्र वर्ष होती है। वहाँ चंद्रकांत पर्वत, तथा एक अन्य सूर्यकांत पर्वत है,
श्लोक 23 (markandeya.59.23)
तस्मिन् कुलाचलौ वर्षे तन्मध्ये च महानदी । भद्रसोमा प्रयात्युर्व्यां पुण्यामलजलौघिनी ॥ 59.23 ॥
tasmin kulācalau varṣe tanmadhye ca mahānadī bhadrasomā prayātyurvyāṁ puṇyāmalajalaughinī
— ये दोनों उस वर्ष के कुलपर्वत हैं, और उसके मध्य में महानदी भद्रसोमा बहती है, जिसका जल पवित्र और निर्मल है।
श्लोक 24 (markandeya.59.24)
सहस्रशस्तथैवान्या नद्यो वर्षेऽपि चोत्तरे । तथान्याः क्षीरवाहिन्यो घृतवाहिन्य एव च ॥ 59.24 ॥
sahasraśastathaivānyā nadyo varṣe'pi cottare tathānyāḥ kṣīravāhinyo ghṛtavāhinya eva ca
इसी प्रकार इस उत्तरी वर्ष में सहस्रों अन्य नदियाँ भी हैं, तथा कुछ अन्य दूध की धारा बहाने वाली, और कुछ घृत की धारा बहाने वाली भी हैं।
श्लोक 25 (markandeya.59.25)
दध्नो ह्रदास्तथा तत्र तथान्ये चानुपर्वताः । अमृतास्वादकल्पानि फलानि विविधानि च ॥ 59.25 ॥
dadhno hradāstathā tatra tathānye cānuparvatāḥ amṛtāsvādakalpāni phalāni vividhāni ca
वहाँ दही के सरोवर भी हैं, तथा अन्य उपपर्वत भी हैं, और अमृत के समान स्वाद वाले विविध प्रकार के फल भी।
श्लोक 26 (markandeya.59.26)
वनेषु तेषु वर्षेषु शतशोऽथ सहस्रशः । तत्रापि भगवान् विष्णुः प्राक्शिरा मत्स्यरूपवान् ॥ 59.26 ॥
vaneṣu teṣu varṣeṣu śataśo'tha sahasraśaḥ tatrāpi bhagavān viṣṇuḥ prākśirā matsyarūpavān
— उन वनों में, उस वर्ष में, ये सैकड़ों-हजारों की संख्या में हैं। वहाँ भी भगवान विष्णु मत्स्य-रूप में, पूर्वाभिमुख सिर किए हुए, विद्यमान हैं।
श्लोक 27 (markandeya.59.27)
विभक्तो नवधा विप्र ! नक्षत्राणां त्रयं त्रयम् । दिशस्तथापि नवधा विभक्ता मुनिसत्तम ॥ 59.27 ॥
vibhakto navadhā vipra ! nakṣatrāṇāṁ trayaṁ trayam diśastathāpi navadhā vibhaktā munisattama
हे विप्र! वे नौ भागों में विभक्त हैं, और प्रत्येक भाग में तीन-तीन नक्षत्र हैं; तथा हे मुनिश्रेष्ठ! दिशाएँ भी इसी प्रकार नौ भागों में विभक्त हैं।
श्लोक 28 (markandeya.59.28)
चन्द्रद्वीपः समुद्रे च भद्रद्वीपस्तथापरः । तत्रापि पुण्यो विख्यातः समुद्रान्तर्महामुने ॥ 59.28 ॥
candradvīpaḥ samudre ca bhadradvīpastathāparaḥ tatrāpi puṇyo vikhyātaḥ samudrāntarmahāmune
समुद्र में चंद्रद्वीप है, तथा एक अन्य भद्रद्वीप भी है; हे महामुने! वहाँ भी समुद्र के भीतर एक पवित्र और विख्यात स्थान है।
श्लोक 29 (markandeya.59.29)
इत्येतत् कथितं ब्रह्मन् ! कुरुवर्षं मयोत्तरम् । शृणु किंपुरुषादीनि वर्षाणि गदतो मम ॥ 59.29 ॥
ityetat kathitaṁ brahman ! kuruvarṣaṁ mayottaram śṛṇu kiṁpuruṣādīni varṣāṇi gadato mama
हे ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह उत्तर कुरु वर्ष का वर्णन सुनाया। अब मुझसे किंपुरुष आदि वर्षों का वर्णन सुनो, जैसा मैं कहता हूँ।