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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 6

बलदेव का ब्रह्महत्या-पातक

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (markandeya.6.1)

पक्षिण ऊचुः । रामः पार्थे परां प्रीतिं ज्ञात्वा कृष्णस्य लाङ्गली । चिन्तयामास बहुधा किं कृतं सुकृतं भवेत् ॥ 6.1 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / rāmaḥ pārthe parāṃ prītiṃ jñātvā kṛṣṇasya lāṅgalī / cintayāmāsa bahudhā kiṃ kṛtaṃ sukṛtaṃ bhavet // 6.1 //

पक्षियों ने कहा — बलराम (हलधर) कृष्ण का पार्थ (अर्जुन) के प्रति परम स्नेह जानकर बारंबार यह विचार करने लगे कि मुझे भी कौन-सा सुकृत करना चाहिए।

श्लोक 2 (markandeya.6.2)

कृष्णेन हि विना नाहं यास्ये दुर्योधनान्तिकम् । पाण्डवान् वा समाश्रित्य कथं दुर्योधनं नृपम् ॥ 6.2 ॥

kṛṣṇena hi vinā nāhaṃ yāsye duryodhanāntikam / pāṇḍavān vā samāśritya kathaṃ duryodhanaṃ nṛpam // 6.2 //

मैं कृष्ण के बिना दुर्योधन के पास नहीं जाऊँगा, और पाण्डवों का आश्रय लेकर राजा दुर्योधन के विरुद्ध भी कैसे जाऊँ।

श्लोक 3 (markandeya.6.3)

जामातरं तथा शिष्यं घातयिष्ये नरेश्वरम् । तस्मान्न पार्थं यास्यामि नापि दुर्योधनं नृपम् ॥ 6.3 ॥

jāmātaraṃ tathā śiṣyaṃ ghātayiṣye nareśvaram / tasmānna pārthaṃ yāsyāmi nāpi duryodhanaṃ nṛpam // 6.3 //

मैं अपने जामाता तथा शिष्य, उस नरेश्वर को मरवा डालूँगा; इसलिए मैं न तो पार्थ के पास जाऊँगा और न राजा दुर्योधन के पास।

श्लोक 4 (markandeya.6.4)

तीर्थेष्वाप्लावयिष्यामि तावदात्मानमात्मना । कुरूणां पाण्डवानां च यावदन्ताय कल्पते ॥ 6.4 ॥

tīrtheṣvāplāvayiṣyāmi tāvadātmānamātmanā / kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca yāvadantāya kalpate // 6.4 //

जब तक कुरुओं और पाण्डवों का यह विनाश-पर्व समाप्त न हो, तब तक मैं तीर्थों में स्नान करता हुआ अपने आपको पवित्र करता रहूँगा।

श्लोक 5 (markandeya.6.5)

इत्यामन्त्र्य हृषीकेशं पार्थ-दुर्योधनावपि । जगाम द्वारकां शौरिः स्वसैन्युपरिवारितः ॥ 6.5 ॥

ityāmantrya hṛṣīkeśaṃ pārtha-duryodhanāvapi / jagāma dvārakāṃ śauriḥ svasainyuparivāritaḥ // 6.5 //

ऐसा कहकर हृषीकेश कृष्ण से, तथा पार्थ और दुर्योधन दोनों से विदा लेकर, शौरि (बलराम) अपनी सेना से घिरे हुए द्वारका को चले गये।

श्लोक 6 (markandeya.6.6)

गत्वा द्वारवतीं रामो हृष्टपुष्टजनाकुलाम् । श्वो गन्तव्येषु तीर्थेषु पपौ पानं हलायुधः ॥ 6.6 ॥

gatvā dvāravatīṃ rāmo hṛṣṭapuṣṭajanākulām / śvo gantavyeṣu tīrtheṣu papau pānaṃ halāyudhaḥ // 6.6 //

हृष्ट-पुष्ट जनों से भरी हुई द्वारवती नगरी में जाकर, अगले दिन तीर्थयात्रा पर जाना था, इसी बीच हलायुध (बलराम) ने मदिरापान किया।

श्लोक 7 (markandeya.6.7)

पीतपानो जगामाथ रैवतोद्यानमृद्धिमत् । हस्ते गृहीत्वा समदां रेवतीमप्सरोपमाम् ॥ 6.7 ॥

pītapāno jagāmātha raivatodyānamṛddhimat / haste gṛhītvā samadāṃ revatīmapsaropamām // 6.7 //

मदिरा पीकर वे समृद्धिशाली रैवतक-उद्यान में गये, और अप्सरा के समान सुन्दर, स्वयं भी मदमत्त रेवती का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

श्लोक 8 (markandeya.6.8)

स्त्रीकदम्बकमध्यस्थो ययौ मत्तः पदा स्खलन् । ददर्शच वनं वीरो रमणीयमनुत्तमम् ॥ 6.8 ॥

strīkadambakamadhyastho yayau mattaḥ padā skhalan / dadarśaca vanaṃ vīro ramaṇīyamanuttamam // 6.8 //

स्त्रियों के झुंड के बीच खड़े वह वीर मतवाले होकर लड़खड़ाते हुए पैरों से चले, और उन्होंने एक अत्यन्त रमणीय, अनुपम वन देखा।

श्लोक 9 (markandeya.6.9)

सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं शाखामृगगणाकुलम् । पुण्यं पद्मवनोपेतं सपल्वलमहावनम् ॥ 6.9 ॥

sarvartuphalapuṣpāḍhyaṃ śākhāmṛgagaṇākulam / puṇyaṃ padmavanopetaṃ sapalvalamahāvanam // 6.9 //

वह पवित्र महावन सब ऋतुओं के फल-फूलों से समृद्ध था, वानरों के झुंडों से भरा हुआ था, तथा कमल-वनों और जलाशयों से सुशोभित था।

श्लोक 10 (markandeya.6.10)

स शृण्वन् प्रीतिजननान् बहून् मदकलान् शुभान् । श्रोत्ररम्यान् सुमधुरान् शब्दान् खगमुखेरितान् ॥ 6.10 ॥

sa śṛṇvan prītijananān bahūn madakalān śubhān / śrotraramyān sumadhurān śabdān khagamukheritān // 6.10 //

वे आनन्दजनक, मधुर, कर्णप्रिय तथा पक्षियों के मुख से निकले हुए मादक स्वरों को बड़ी संख्या में सुनते रहे।

श्लोक 11 (markandeya.6.11)

सर्वर्तुफलभाराढ्यान् सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वलान् । अपश्यत् पादपांस्तत्र विहगैरनुनादितान् ॥ 6.11 ॥

sarvartuphalabhārāḍhyān sarvartukusumojjvalān / apaśyat pādapāṃstatra vihagairanunāditān // 6.11 //

वहाँ उन्होंने सब ऋतुओं के फलों के भार से लदे तथा सब ऋतुओं के फूलों से देदीप्यमान वृक्षों को देखा, जो पक्षियों की कूक से गूँज रहे थे।

श्लोक 12 (markandeya.6.12)

आम्रानाम्रातकान् भव्यान् नारिकेलान् सतिन्दुकान् । आविल्वकांस्तथा जीरान् दाडिमान् बीजपूरकान् ॥ 6.12 ॥

āmrānāmrātakān bhavyān nārikelān satindukān / āvilvakāṃstathā jīrān dāḍimān bījapūrakān // 6.12 //

उन्होंने आम, आमड़ा, नारियल तथा तेंदू के सुन्दर वृक्ष, तथा बेल, बेर, अनार और बिजौरा-नींबू के वृक्ष देखे।

श्लोक 13 (markandeya.6.13)

पनसान् लकुचान् मोचान् नीपांश्चातिमनोहरान् । पारावतांश्च कङ्कोलान् नलिनानम्लवेतसान् ॥ 6.13 ॥

panasān lakucān mocān nīpāṃścātimanoharān / pārāvatāṃśca kaṅkolān nalinānamlavetasān // 6.13 //

उन्होंने कटहल, लकुच, केले, अत्यन्त मनोहर कदम्ब, कपित्थ तथा लौंग के वृक्ष, तथा कमल और अम्लवेतस (खट्टी बेंत) भी देखे।

श्लोक 14 (markandeya.6.14)

भल्लातकानामलकांस्तिन्दुकांश्च महाफलान् । इङ्गुदान् करमर्दांश्च हरीतक-विभीतकान् ॥ 6.14 ॥

bhallātakānāmalakāṃstindukāṃśca mahāphalān / iṅgudān karamardāṃśca harītaka-vibhītakān // 6.14 //

भिलावा, आँवला, बड़े फलों वाले तेंदू, इंगुदी, करौंदे, तथा हरड़ और बहेड़े के वृक्ष भी वहाँ थे।

श्लोक 15 (markandeya.6.15)

एतानन्यांश्च स तरून् ददर्श यदुनन्दनः । तथैवाशोक-पुन्नाग-केतकी-बकुलानथ ॥ 6.15 ॥

etānanyāṃśca sa tarūn dadarśa yadunandanaḥ / tathaivāśoka-punnāga-ketakī-bakulānatha // 6.15 //

यदुकुल के आनन्दवर्धक बलराम ने इन तथा अन्य वृक्षों को देखा, और उसी प्रकार अशोक, पुन्नाग, केतकी तथा बकुल के वृक्ष भी देखे।

श्लोक 16 (markandeya.6.16)

चम्पकान् सप्तपर्णांश्च कर्णिकारान् समालतीन् । पारिजातान् कोविदारान् मन्दारान् बदरांस्तथा ॥ 6.16 ॥

campakān saptaparṇāṃśca karṇikārān samālatīn / pārijātān kovidārān mandārān badarāṃstathā // 6.16 //

उन्होंने चम्पा, सप्तपर्ण, लताओं से लिपटे कर्णिकार, तथा पारिजात, कोविदार, मन्दार और बेर के वृक्ष भी देखे।

श्लोक 17 (markandeya.6.17)

पाटलान् पुष्पितान् रम्यान् देवदारुद्रुमांस्तथा । सालांस्तालांस्तमालांश्च किंशौकान् वञ्जुलान् वरान् ॥ 6.17 ॥

pāṭalān puṣpitān ramyān devadārudrumāṃstathā / sālāṃstālāṃstamālāṃśca kiṃśaukān vañjulān varān // 6.17 //

उन्होंने खिले हुए सुन्दर पाटल-वृक्ष, तथा देवदार, साल, ताल, तमाल, पलाश और उत्तम बेंत के वृक्ष भी देखे।

श्लोक 18 (markandeya.6.18)

चकोरैः शातपत्रैश्च भृङ्गराजैस्तथा शुकैः । कोकिलैः कलविङ्कैश्च हारीतैर्जोवजीवकैः ॥ 6.18 ॥

cakoraiḥ śātapatraiśca bhṛṅgarājaistathā śukaiḥ / kokilaiḥ kalaviṅkaiśca hārītairjovajīvakaiḥ // 6.18 //

वह वन चकोर, शातपत्र, भृंगराज, तोते, कोयल, गौरैया, हरियल तथा जीवंजीवक पक्षियों से गूँज रहा था,

श्लोक 19 (markandeya.6.19)

प्रियपुत्रैश्चातकैश्च तथान्यैर्विविधैः खगैः । श्रोत्ररम्यं सुमधुरं कूजद्भिश्चाप्यधिष्ठितम् ॥ 6.19 ॥

priyaputraiścātakaiśca tathānyairvividhaiḥ khagaiḥ / śrotraramyaṃ sumadhuraṃ kūjadbhiścāpyadhiṣṭhitam // 6.19 //

तथा प्रियपुत्र, चातक और अन्य नाना प्रकार के पक्षियों से भी, जो कर्णप्रिय और अत्यन्त मधुर बोली में कूज रहे थे।

श्लोक 20 (markandeya.6.20)

सरांसि च मनोज्ञानि प्रसन्नसलिलानि च । कुमुदैः पुण्डरीकैश्च तथा नीलोत्पलैः शुभैः ॥ 6.20 ॥

sarāṃsi ca manojñāni prasannasalilāni ca / kumudaiḥ puṇḍarīkaiśca tathā nīlotpalaiḥ śubhaiḥ // 6.20 //

वहाँ मनोहर, निर्मल जल वाले सरोवर भी थे, जो कुमुद, श्वेत कमल तथा सुन्दर नीले कमलों से आच्छादित थे,

श्लोक 21 (markandeya.6.21)

कह्लारैः कमलैश्चापि आचितानि समन्ततः । कादम्बैश्चक्रवाकैश्च तथैव जलकुक्कुटैः ॥ 6.21 ॥

kahlāraiḥ kamalaiścāpi ācitāni samantataḥ / kādambaiścakravākaiśca tathaiva jalakukkuṭaiḥ // 6.21 //

तथा चारों ओर लाल कुमुदिनी और कमलों से भरे हुए थे, और कादम्ब हंस, चक्रवाक तथा जलमुर्गियों से युक्त थे।

श्लोक 22 (markandeya.6.22)

कारण्डवैः प्लवैर्हंसैः कूर्मैर्मद्गुभिरेव च । एभिश्चान्यैश्च कीर्णानि समन्ताज्जलचारिभिः ॥ 6.22 ॥

kāraṇḍavaiḥ plavairhaṃsaiḥ kūrmairmadgubhireva ca / ebhiścānyaiśca kīrṇāni samantājjalacāribhiḥ // 6.22 //

वे कारण्डव, गोताखोर पक्षी, हंस, कछुए तथा जलकाग आदि जलचरों से तथा इनके अतिरिक्त अन्य प्राणियों से भी चारों ओर भरे हुए थे।

श्लोक 23 (markandeya.6.23)

क्रमेणेत्थं वनं शौरिर्वोक्षमाणो मनोरमम् । जगामानुगतः स्त्रीभिर्लतागृहमनुत्तमम् ॥ 6.23 ॥

krameṇetthaṃ vanaṃ śaurirvokṣamāṇo manoramam / jagāmānugataḥ strībhirlatāgṛhamanuttamam // 6.23 //

इस प्रकार उस मनोरम वन को क्रमशः देखते हुए शौरि (बलराम) स्त्रियों के साथ एक अनुपम लता-मण्डप में जा पहुँचे।

श्लोक 24 (markandeya.6.24)

स ददर्श द्विजांस्तत्र वेदवेदाङ्गपारगान् । कौशिकान् भार्गवांश्चैव भारद्वाजान् सगौतमान् ॥ 6.24 ॥

sa dadarśa dvijāṃstatra vedavedāṅgapāragān / kauśikān bhārgavāṃścaiva bhāradvājān sagautamān // 6.24 //

वहाँ उन्होंने वेद-वेदांगों में पारंगत ब्राह्मणों को देखा — कौशिक, भार्गव, भारद्वाज तथा गौतम गोत्र के ब्राह्मणों को,

श्लोक 25 (markandeya.6.25)

विविधेषु च सम्भूतान् वंशेषु द्विजसत्तमान् । कथाश्रवणबद्धोत्कानुपविष्टान् महत्सु च ॥ 6.25 ॥

vividheṣu ca sambhūtān vaṃśeṣu dvijasattamān / kathāśravaṇabaddhotkānupaviṣṭān mahatsu ca // 6.25 //

नाना कुलों में उत्पन्न उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को, जो कथा सुनने की उत्सुकता में उत्तम आसनों पर बैठे थे,

श्लोक 26 (markandeya.6.26)

कृष्णाजिनोत्तरीयेषु कुशेषु च वृषीषु च । सूतञ्च तेषां मध्यस्थं कथयानं कथाः शुभाः ॥ 6.26 ॥

kṛṣṇājinottarīyeṣu kuśeṣu ca vṛṣīṣu ca / sūtañca teṣāṃ madhyasthaṃ kathayānaṃ kathāḥ śubhāḥ // 6.26 //

जो काले मृगचर्म ओढ़े हुए, कुश और चटाई पर बैठे थे, तथा उनके बीच में बैठा एक सूत उन्हें पुराणों की शुभ कथाएँ सुना रहा था,

श्लोक 27 (markandeya.6.27)

पौराणिकीः सुरर्षोणामाद्यानां चरिताश्रयाः । दृष्ट्वा रामं द्विजाः सर्वे मधुपानारुणेक्षणम् ॥ 6.27 ॥

paurāṇikīḥ surarṣoṇāmādyānāṃ caritāśrayāḥ / dṛṣṭvā rāmaṃ dvijāḥ sarve madhupānāruṇekṣaṇam // 6.27 //

जो पूर्वकालीन आदि देव-ऋषियों के चरित्रों पर आधारित थीं। मदिरापान से लाल हुई आँखों वाले बलराम को देखकर उन सभी ब्राह्मणों ने,

श्लोक 28 (markandeya.6.28)

मत्तोऽयमिति मन्वानाः समुत्तस्थुस्त्वरान्विताः । पूजयन्तो हलधरमृते तं सूतवंशजम् ॥ 6.28 ॥

matto 'yamiti manvānāḥ samuttasthustvarānvitāḥ / pūjayanto haladharamṛte taṃ sūtavaṃśajam // 6.28 //

'यह कोई मतवाला व्यक्ति है' — ऐसा मानकर, हलधर का सम्मान करते हुए शीघ्रता से उठ खड़े हुए, केवल सूत-वंश में उत्पन्न वह सूत छोड़कर।

श्लोक 29 (markandeya.6.29)

ततः क्रोधसमाविष्टो हली सूतं महाबलः । निजघान विवृत्ताक्षः क्षोभिताशेषदानवः ॥ 6.29 ॥

tataḥ krodhasamāviṣṭo halī sūtaṃ mahābalaḥ / nijaghāna vivṛttākṣaḥ kṣobhitāśeṣadānavaḥ // 6.29 //

तब क्रोध से भरे, महाबली हलधर ने आँखें घुमाते हुए, समस्त दानवों को भी कँपा देने योग्य क्रोध में उस सूत का वध कर दिया।

श्लोक 30 (markandeya.6.30)

अध्यास्याति पदं ब्राह्मं तस्मिन् सूते निपातिते । निष्क्रान्तास्ते द्विजाः सर्वे वनात् कृष्णाजिनाम्बराः ॥ 6.30 ॥

adhyāsyāti padaṃ brāhmaṃ tasmin sūte nipātite / niṣkrāntāste dvijāḥ sarve vanāt kṛṣṇājināmbarāḥ // 6.30 //

वह सूत तो ब्राह्मण-पद को प्राप्त होने ही वाला था, ऐसे में उसके मारे जाने पर वे सभी ब्राह्मण मृगचर्म पहने हुए उस वन से निकल गये।

श्लोक 31 (markandeya.6.31)

अवधूतं तथात्मानं मन्यमानो हलायुधः । चिन्तयामास सुमहन्मया पापमिदं कृतम् ॥ 6.31 ॥

avadhūtaṃ tathātmānaṃ manyamāno halāyudhaḥ / cintayāmāsa sumahanmayā pāpamidaṃ kṛtam // 6.31 //

अपने आपको उनके द्वारा तिरस्कृत माना हुआ हलायुध विचार करने लगे — 'मुझसे यह बहुत बड़ा पाप हुआ है।'

श्लोक 32 (markandeya.6.32)

ब्राह्मं स्थानं गतो ह्येष यद् सूतो विनिपातितः । तथा हीमे द्विजाः सर्वे मामवेक्ष्य विनिर्गताः ॥ 6.32 ॥

brāhmaṃ sthānaṃ gato hyeṣa yad sūto vinipātitaḥ / tathā hīme dvijāḥ sarve māmavekṣya vinirgatāḥ // 6.32 //

'यह सूत ब्राह्मण-पद को प्राप्त हो चुका था, इसीलिए इसके मारे जाने पर ये सभी ब्राह्मण मुझे देखकर यहाँ से चले गये हैं।'

श्लोक 33 (markandeya.6.33)

शरीरस्य च मे गन्धो लोहस्येवासुखावहः । आत्मानञ्चावगच्छामि ब्रह्मघ्नमिव कुत्सितम् ॥ 6.33 ॥

śarīrasya ca me gandho lohasyevāsukhāvahaḥ / ātmānañcāvagacchāmi brahmaghnamiva kutsitam // 6.33 //

'मेरे शरीर की गन्ध भी अब लोहे के समान अशुभ हो गयी है; मैं अपने आपको एक निन्दित ब्रह्महत्यारे के समान जानता हूँ।'

श्लोक 34 (markandeya.6.34)

धिगमर्षं तथा मद्यमतिमानमभीरुताम् । यैराविष्टेन सुमहन्मया पापमिदं कृतम् ॥ 6.34 ॥

dhigamarṣaṃ tathā madyamatimānamabhīrutām / yairāviṣṭena sumahanmayā pāpamidaṃ kṛtam // 6.34 //

'धिक्कार है मेरी असहनशीलता, मदिरा, अत्यधिक अभिमान तथा निर्भयता को — जिनसे ग्रस्त होकर मैंने यह बहुत बड़ा पाप किया है।'

श्लोक 35 (markandeya.6.35)

तत्क्षयार्थं चरिष्यामि व्रतं द्वादशवार्षिकम् । स्वकर्मख्यापनं कुर्वंन् प्रयश्चित्तमनुत्तमम् ॥ 6.35 ॥

tatkṣayārthaṃ cariṣyāmi vrataṃ dvādaśavārṣikam / svakarmakhyāpanaṃ kurvaṃn prayaścittamanuttamam // 6.35 //

'उस पाप के नाश के लिए मैं अपने इस कर्म को स्वयं प्रकट करते हुए बारह वर्षों का व्रत धारण करूँगा, यही सबसे उत्तम प्रायश्चित्त है।'

श्लोक 36 (markandeya.6.36)

अथ येयं समारब्धा तीर्थयात्रा मयाधुना । एतामेव प्रयास्यामि प्रतिलोमां सरस्वतीम् ॥ 6.36 ॥

atha yeyaṃ samārabdhā tīrthayātrā mayādhunā / etāmeva prayāsyāmi pratilomāṃ sarasvatīm // 6.36 //

'अब जो यह तीर्थयात्रा मैंने आरम्भ की है, उसे मैं इसी सरस्वती नदी के प्रतिकूल प्रवाह में, उसके उलटे मार्ग से, पूरा करूँगा।'

श्लोक 37 (markandeya.6.37)

अतो जगाम रामोऽसौ प्रतिलोमां सरस्वतीम् । ततः परं शृणुष्वेमं पाण्डवेयकथाश्रयम् ॥ 6.37 ॥

ato jagāma rāmo 'sau pratilomāṃ sarasvatīm / tataḥ paraṃ śṛṇuṣvemaṃ pāṇḍaveyakathāśrayam // 6.37 //

इस प्रकार बलराम सरस्वती नदी के प्रतिकूल मार्ग पर चल पड़े। अब इसके आगे पाण्डवों की कथा से सम्बन्धित यह वृत्तान्त सुनो।

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