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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 61

ब्राह्मण और अप्सरा वरूथिनी

अध्याय 60अध्याय-सूचीअध्याय 62

श्लोक 1 (markandeya.61.1)

क्रौष्टुकिरुवाच कथितं भवता सम्यग् यत् पृष्टोऽसि महामुने । भूसमुद्रादिसंस्थानं प्रमाणानि तथा ग्रहाः ॥ 61.1 ॥

kathitaṁ bhavatā samyag yat pṛṣṭo 'si mahāmune / bhūsamudrādisaṁsthānaṁ pramāṇāni tathā grahāḥ

क्रौष्टुकि ने कहा — हे महामुने, आपने जो पूछा गया था वह सब भली-भाँति बता दिया — पृथ्वी, समुद्र आदि की संरचना, उनके प्रमाण तथा ग्रहों का वर्णन।

श्लोक 2 (markandeya.61.2)

तेषाञ्चैव प्रमाणञ्च नक्षत्राणाञ्च संस्थितिः । भूरादयस्तथा लोकाः पातालान्यखिलान्यपि ॥ 61.2 ॥

teṣāñcaiva pramāṇañca nakṣatrāṇāñca saṁsthitiḥ / bhūrādayastathā lokāḥ pātālānyakhilānyapi

उनके प्रमाण, नक्षत्रों की स्थिति, भूर्लोक आदि लोकों तथा समस्त पातालों का भी वर्णन आपने किया।

श्लोक 3 (markandeya.61.3)

स्वायम्भुवं तथा ख्यातं मुने ! मन्वन्तरं मम । तदन्तराण्यहं श्रोतुमिच्छे मन्वन्तराणि वै । मन्वन्तराधिपान् देवानृषींस्तत्तनयान्नृपान् ॥ 61.3 ॥

svāyambhuvaṁ tathā khyātaṁ mune ! manvantaraṁ mama / tadantarāṇyahaṁ śrotumicche manvantarāṇi vai / manvantarādhipān devānṛṣīṁstattanayānnṛpān

हे मुने, आपने स्वायम्भुव मन्वन्तर का भी वर्णन किया। अब मैं अन्य मन्वन्तरों को सुनना चाहता हूँ — प्रत्येक मन्वन्तर के अधिपति, देवगण, ऋषिगण, उनके पुत्र तथा राजाओं को।

श्लोक 4 (markandeya.61.4)

मार्कण्डेय उवाच मन्वन्तरं मयाख्यातं तव स्वायम्भुवं च यत् । स्वारोचिषाख्यमन्यत् तु शृणु तस्मादनन्तरम् ॥ 61.4 ॥

manvantaraṁ mayākhyātaṁ tava svāyambhuvaṁ ca yat / svārociṣākhyamanyat tu śṛṇu tasmādanantaram

मार्कण्डेय ने कहा — मैंने तुम्हें स्वायम्भुव मन्वन्तर बता दिया है। अब उसके पश्चात आने वाले स्वारोचिष नामक मन्वन्तर को सुनो।

श्लोक 5 (markandeya.61.5)

कश्चिद् द्विजातिप्रवरः पुरेऽभूदरुणास्पदे । वरुणायास्तटे विप्रो रूपेणात्यश्विनावपि ॥ 61.5 ॥

kaścid dvijātipravaraḥ pure 'bhūdaruṇāspade / varuṇāyāstaṭe vipro rūpeṇātyaśvināvapi

अरुणास्पद नामक नगर में, वरुणा नदी के तट पर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था, जो रूप में अश्विनीकुमारों को भी मात करता था।

श्लोक 6 (markandeya.61.6)

मृदुस्वभावः सद्वृत्तो वेदवेदाङ्गपारगः । सदातिथिप्रियो रात्रावागतानां समाश्रयः ॥ 61.6 ॥

mṛdusvabhāvaḥ sadvṛtto vedavedāṅgapāragaḥ / sadātithipriyo rātrāvāgatānāṁ samāśrayaḥ

वह स्वभाव से कोमल, सदाचारी, वेद-वेदांगों का पारगामी था, अतिथियों का सदैव प्रिय था तथा रात्रि में आये हुओं का आश्रय था।

श्लोक 7 (markandeya.61.7)

तस्य बुद्धिरियं त्वासीदहं पश्ये वसुन्धराम् । अतिरम्यवनोद्यानां नानानगरशोभिताम् ॥ 61.7 ॥

tasya buddhiriyaṁ tvāsīdahaṁ paśye vasundharām / atiramyavanodyānāṁ nānānagaraśobhitām

उसके मन में यह विचार आया — 'मैं वन-उद्यानों से अति रमणीय तथा अनेक नगरों से सुशोभित इस पृथ्वी को देखूँ।'

श्लोक 8 (markandeya.61.8)

अथागतो।ञतिथिः कश्चित् कदाचित्तस्य वेश्मनि । नानौषधिप्रभावज्ञो मन्त्रविद्याविशारदः ॥ 61.8 ॥

athāgato / ñatithiḥ kaścit kadācittasya veśmani / nānauṣadhiprabhāvajño mantravidyāviśāradaḥ

एक दिन कोई अतिथि उसके घर आया, जो अनेक औषधियों के प्रभाव को जानने वाला तथा मन्त्र-विद्या में निपुण था।

श्लोक 9 (markandeya.61.9)

अभ्यर्थितस्तु तेनासौ श्रद्धापूतेन चेतसा । तस्याचख्यौ स देशांश्च रम्याणि नगराणि च ॥ 61.9 ॥

abhyarthitastu tenāsau śraddhāpūtena cetasā / tasyācakhyau sa deśāṁśca ramyāṇi nagarāṇi ca

श्रद्धापूत मन से प्रार्थना किये जाने पर उस अतिथि ने उसे अनेक रमणीय देश तथा नगर बताये,

श्लोक 10 (markandeya.61.10)

वनानि नद्यः शैलांश्च पुण्यान्यायतनानि च । स ततो विस्मयाविष्टः प्राह तं द्विजसत्तमम् ॥ 61.10 ॥

vanāni nadyaḥ śailāṁśca puṇyānyāyatanāni ca / sa tato vismayāviṣṭaḥ prāha taṁ dvijasattamam

वन, नदियाँ, पर्वत तथा पवित्र तीर्थस्थान भी बताये। इससे विस्मित होकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उससे कहा —

श्लोक 11 (markandeya.61.11)

अनेकदेशदर्शित्वेनातिश्रमसमन्वितः । त्वं नातिवृद्धो वयसा नातिवृत्तश्च यौवनात् । कथमल्पेन कालेन पृथिवीमटसि द्विज ॥ 61.11 ॥

anekadeśadarśitvenātiśramasamanvitaḥ / tvaṁ nātivṛddho vayasā nātivṛttaśca yauvanāt / kathamalpena kālena pṛthivīmaṭasi dvija

'आप अनेक देशों को देखने से अत्यन्त श्रमित होंगे! न आप वय में अति वृद्ध हैं, न यौवन से परे हैं — फिर हे द्विज, इतने अल्प समय में आप सारी पृथ्वी कैसे घूम लेते हैं?'

श्लोक 12 (markandeya.61.12)

ब्राह्मण उवाच मन्त्रौषधिप्रभावेण विप्राप्रतिहता गतिः । योजनानां सहस्रं हि दिनार्धेन व्रजाम्यम् ॥ 61.12 ॥

mantrauṣadhiprabhāveṇa viprāpratihatā gatiḥ / yojanānāṁ sahasraṁ hi dinārdhena vrajāmyam

ब्राह्मण ने कहा — मन्त्र और औषधि के प्रभाव से मेरी गति अबाध है। मैं आधे दिन में सहस्र योजन चल लेता हूँ।

श्लोक 13 (markandeya.61.13)

मार्कण्डेय उवाच ततः स विप्रस्तं भूयः प्रत्युवाचेदमादरात् । श्रद्धधानो वचस्तस्य ब्राह्मणस्य विपश्चितः ॥ 61.13 ॥

tataḥ sa viprastaṁ bhūyaḥ pratyuvācedamādarāt / śraddhadhāno vacastasya brāhmaṇasya vipaścitaḥ

मार्कण्डेय ने कहा — तब उस विद्वान ब्राह्मण के वचन पर श्रद्धा रखते हुए उस ब्राह्मण ने पुनः आदरपूर्वक उससे कहा —

श्लोक 14 (markandeya.61.14)

मम प्रसादं भगवन् ! कुरु मन्त्रप्रभावजम् । द्रष्टुमेतां मम महीमतीवेच्छा प्रवर्तते ॥ 61.14 ॥

mama prasādaṁ bhagavan ! kuru mantraprabhāvajam / draṣṭumetāṁ mama mahīmatīvecchā pravartate

'हे भगवन्, मुझ पर मन्त्र-प्रभाव से उत्पन्न कृपा कीजिए। इस पृथ्वी को देखने की मेरी अत्यन्त इच्छा है।'

श्लोक 15 (markandeya.61.15)

प्रादात् स ब्राह्मणश्चास्मै पादलेपमुदारधीः । अभिमन्त्रयामास दिशं तेनाख्याताञ्च यत्नतः ॥ 61.15 ॥

prādāt sa brāhmaṇaścāsmai pādalepamudāradhīḥ / abhimantrayāmāsa diśaṁ tenākhyātāñca yatnataḥ

उस उदार बुद्धि वाले ब्राह्मण ने उसे पैरों में लगाने का लेप दिया, उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया तथा प्रयत्नपूर्वक उसे उससे पहुँचने योग्य दिशा भी बता दी।

श्लोक 16 (markandeya.61.16)

तेनानुलिप्तपादोऽथ स द्विजो द्विजसत्तम । हिमवन्तमगाद् द्रष्टुं नानाप्रस्त्रवणान्वितम् ॥ 61.16 ॥

tenānuliptapādo 'tha sa dvijo dvijasattama / himavantamagād draṣṭuṁ nānāprastravaṇānvitam

उस लेप से पैर लिपटाकर वह ब्राह्मण अनेक झरनों से युक्त हिमालय को देखने गया।

श्लोक 17 (markandeya.61.17)

सहस्रं योजनानां हि दिनार्धेन व्रजामि यत् । आयास्यामीति सञ्चिन्त्य तदर्धेनापरेण हि ॥ 61.17 ॥

sahasraṁ yojanānāṁ hi dinārdhena vrajāmi yat / āyāsyāmīti sañcintya tadardhenāpareṇa hi

यह सोचकर कि 'जब मैं आधे दिन में सहस्र योजन चलता हूँ, तो शेष आधे दिन में लौट आऊँगा',

श्लोक 18 (markandeya.61.18)

सम्प्राप्तो हिमवत्पृष्ठं नातिश्रान्ततनुर्द्विज । विचचार ततस्तत्र तुहिनाचलभूतले ॥ 61.18 ॥

samprāpto himavatpṛṣṭhaṁ nātiśrāntatanurdvija / vicacāra tatastatra tuhinācalabhūtale

वह हिमालय के शिखर पर बिना अधिक थके पहुँच गया और वहाँ हिम-पर्वत की भूमि पर विचरण करने लगा।

श्लोक 19 (markandeya.61.19)

पादाक्रान्तेन तस्याथ तुहिनेन विलीयता । प्रक्षालितः पादलेपः परमौषधिसम्भः ॥ 61.19 ॥

pādākrāntena tasyātha tuhinena vilīyatā / prakṣālitaḥ pādalepaḥ paramauṣadhisambhaḥ

किन्तु उसके पैरों से कुचली गई बर्फ के पिघलने से वह उत्तम औषधियों से बना पाद-लेप धुल गया।

श्लोक 20 (markandeya.61.20)

ततो जडगतिः सोऽथ इतश्चेतश्च पर्यटन् । ददर्शातिमनोज्ञानि सानूनि हिमभूभृतः ॥ 61.20 ॥

tato jaḍagatiḥ so 'tha itaścetaśca paryaṭan / dadarśātimanojñāni sānūni himabhūbhṛtaḥ

तब उसकी गति मन्द पड़ गई और वह इधर-उधर भटकते हुए हिम-पर्वत की अत्यन्त मनोहर चोटियों को देखने लगा,

श्लोक 21 (markandeya.61.21)

सिद्धगन्धर्वजुष्टानि किन्नराभिरतानि च । क्रीडाविहाररम्याणि देवादीनामितस्ततः ॥ 61.21 ॥

siddhagandharvajuṣṭāni kinnarābhiratāni ca / krīḍāvihāraramyāṇi devādīnāmitastataḥ

जो सिद्ध-गन्धर्वों से सेवित, किन्नरों से रमणीय तथा देवादि की क्रीड़ा-भूमियों से सर्वत्र सुन्दर थीं,

श्लोक 22 (markandeya.61.22)

दिव्याप्सरोगणशतैराकीर्णान्यवलोकयन् । नातृप्यत द्विजश्रेष्ठः प्रोद्भूतपुलको मुने ॥ 61.22 ॥

divyāpsarogaṇaśatairākīrṇānyavalokayan / nātṛpyata dvijaśreṣṭhaḥ prodbhūtapulako mune

तथा सैकड़ों दिव्य अप्सराओं से भरी थीं — यह सब देखते हुए वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, रोमांचित होकर भी, तृप्त नहीं हुआ, हे मुने।

श्लोक 23 (markandeya.61.23)

क्वचित् प्रस्त्रवणाद् भ्रष्टजलपातमनोरमम् । प्रनृत्यच्छिखिकेकाभिरन्यतश्च निनादितम् ॥ 61.23 ॥

kvacit prastravaṇād bhraṣṭajalapātamanoramam / pranṛtyacchikhikekābhiranyataśca nināditam

कहीं झरने से गिरते जल से मनोहर स्थान था, तो कहीं नृत्य करते मोरों की केकाओं से गूँज रहा था;

श्लोक 24 (markandeya.61.24)

दात्यूहकोयष्टिकाद्यैः क्वचिच्चातिमनोहरैः । पुंस्कोकिलकलालापैः श्रुतिहारिभिरन्वितम् ॥ 61.24 ॥

dātyūhakoyaṣṭikādyaiḥ kvaciccātimanoharaiḥ / puṁskokilakalālāpaiḥ śrutihāribhiranvitam

कहीं जल-पक्षियों की तथा कोकिल के मधुर स्वरों से, जो कानों को अत्यन्त प्रिय लगते थे, वह स्थान युक्त था।

श्लोक 25 (markandeya.61.25)

प्रफुल्लतरुगन्धेन वासितानिलवीजितम् । मुदा युक्तः स ददृशे हिमवन्तं महागिरिम् ॥ 61.25 ॥

praphullatarugandhena vāsitānilavījitam / mudā yuktaḥ sa dadṛśe himavantaṁ mahāgirim

खिले हुए वृक्षों की सुगन्ध से सुवासित वायु से हिलता हुआ वह हर्षपूर्वक उस महान हिमालय पर्वत को देखने लगा।

श्लोक 26 (markandeya.61.26)

दृष्ट्वा चैतं द्विजसुतो हिमवन्तं महाचलम् । श्वो द्रक्ष्यामीति संचिन्त्य मतिञ्चक्रे गृहं प्रति ॥ 61.26 ॥

dṛṣṭvā caitaṁ dvijasuto himavantaṁ mahācalam / śvo drakṣyāmīti saṁcintya matiñcakre gṛhaṁ prati

इस महान हिमालय को देखकर उस ब्राह्मण-पुत्र ने सोचा — 'कल फिर देखूँगा' — और घर लौटने का विचार किया।

श्लोक 27 (markandeya.61.27)

विभ्रष्टपादलेपोऽथ चिरेण जडितक्रमः । चिन्तयामास किमिदं मयाज्ञानादनुष्ठितम् ॥ 61.27 ॥

vibhraṣṭapādalepo 'tha cireṇa jaḍitakramaḥ / cintayāmāsa kimidaṁ mayājñānādanuṣṭhitam

किन्तु तब, पाद-लेप के नष्ट होने से गति मन्द हो चुकने पर, उसने सोचा — 'यह मैंने अज्ञानवश क्या कर डाला!'

श्लोक 28 (markandeya.61.28)

यदि प्रलेपो नष्टो मे विलीनो हिमवारिणा । शैलोऽतिदुर्गमश्चायं दूरञ्चाहमिहागतः ॥ 61.28 ॥

yadi pralepo naṣṭo me vilīno himavāriṇā / śailo 'tidurgamaścāyaṁ dūrañcāhamihāgataḥ

'यदि मेरा लेप हिम के जल में घुलकर नष्ट हो गया है, और यह पर्वत इतना दुर्गम है, और मैं इतनी दूर आ चुका हूँ —'

श्लोक 29 (markandeya.61.29)

प्रयास्यामि क्रियाहानिमग्निशुश्रूषणादिकम् । कथमत्र करिष्यामि सङ्कटं महदागतम् ॥ 61.29 ॥

prayāsyāmi kriyāhānimagniśuśrūṣaṇādikam / kathamatra kariṣyāmi saṅkaṭaṁ mahadāgatam

'तो अग्नि-सेवा आदि नित्य कर्मों की हानि होगी। अब मैं यहाँ क्या करूँ? यह तो बड़ा संकट आ पड़ा है।'

श्लोक 30 (markandeya.61.30)

इदं रम्यमिदं रम्यमित्यस्मिन् वरपर्वते । शक्तदृष्टिरहं तृप्तिं न यास्येऽब्दशतैरपि ॥ 61.30 ॥

idaṁ ramyamidaṁ ramyamityasmin varaparvate / śaktadṛṣṭirahaṁ tṛptiṁ na yāsye 'bdaśatairapi

'यह रमणीय है, यह रमणीय है' — इस उत्तम पर्वत पर मेरी मुग्ध दृष्टि सौ वर्षों में भी तृप्त न होती।

श्लोक 31 (markandeya.61.31)

किन्नराणां कलालापाः समन्ताच्छ्रोत्रहारिणः । प्रफुल्लतरुगन्धांश्च घ्राणमत्यन्तमृच्छति ॥ 61.31 ॥

kinnarāṇāṁ kalālāpāḥ samantācchrotrahāriṇaḥ / praphullatarugandhāṁśca ghrāṇamatyantamṛcchati

'किन्नरों के मधुर स्वर सब ओर से कानों को हर लेते हैं, और खिले वृक्षों की गन्ध घ्राण को अत्यन्त वश में कर लेती है।'

श्लोक 32 (markandeya.61.32)

सुखस्पर्शस्तथा वायुः फलानि रसवन्ति च । हरन्ति प्रसभं चेतो मनोज्ञानि सरांसि च ॥ 61.32 ॥

sukhasparśastathā vāyuḥ phalāni rasavanti ca / haranti prasabhaṁ ceto manojñāni sarāṁsi ca

'सुखद स्पर्श वाली वायु, रसीले फल तथा मनोहर सरोवर — ये सब बलपूर्वक मन को हर लेते हैं।'

श्लोक 33 (markandeya.61.33)

एवं गते तु पश्येयं यदि कञ्चित् तपोनिधिम् । स ममोपदिशेन्मार्गं गमनाय गृहं प्रति ॥ 61.33 ॥

evaṁ gate tu paśyeyaṁ yadi kañcit taponidhim / sa mamopadiśenmārgaṁ gamanāya gṛhaṁ prati

'ऐसी दशा में यदि कोई तपोनिधि दिख जाए, तो वह मुझे घर लौटने का मार्ग बता सकेगा।'

श्लोक 34 (markandeya.61.34)

मार्कण्डेय उवाच स एवं चिन्तयन् विप्रो बभ्राम च हिमाचले । भ्रष्टपादौषधिबलो वैक्लवं परमं गतः ॥ 61.34 ॥

sa evaṁ cintayan vipro babhrāma ca himācale / bhraṣṭapādauṣadhibalo vaiklavaṁ paramaṁ gataḥ

मार्कण्डेय ने कहा — इस प्रकार सोचता हुआ वह ब्राह्मण हिमाचल पर भटकता रहा, और पाद-औषधि का बल जाते ही अत्यन्त व्याकुल हो उठा।

श्लोक 35 (markandeya.61.35)

तं ददर्श भ्रमन्तञ्च मुनिश्रेष्ठं वरूथिनी । वराप्सरा महाभागा मौलेया रूपशालिनी ॥ 61.35 ॥

taṁ dadarśa bhramantañca muniśreṣṭhaṁ varūthinī / varāpsarā mahābhāgā mauleyā rūpaśālinī

भटकते हुए उस श्रेष्ठ मुनि को मौलेय कुल की रूपशालिनी, महाभागा अप्सरा वरूथिनी ने देखा।

श्लोक 36 (markandeya.61.36)

तस्मिन् दृष्टे ततः साभूद् द्विजवर्ये वरूथिनी । मदनाकृष्टहृदया सानुरागा हि तत्क्षणात् ॥ 61.36 ॥

tasmin dṛṣṭe tataḥ sābhūd dvijavarye varūthinī / madanākṛṣṭahṛdayā sānurāgā hi tatkṣaṇāt

उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को देखते ही वरूथिनी का हृदय काम से आकृष्ट हो गया और वह तत्क्षण अनुरागिणी बन गई।

श्लोक 37 (markandeya.61.37)

चिन्तयामास को न्वेष रमणीयतमाकृतिः । सफलं मे भवेज्जन्म यदि मां नावमन्यते ॥ 61.37 ॥

cintayāmāsa ko nveṣa ramaṇīyatamākṛtiḥ / saphalaṁ me bhavejjanma yadi māṁ nāvamanyate

उसने सोचा — 'यह अत्यन्त रमणीय आकृति वाला कौन है? यदि यह मेरा तिरस्कार न करे तो मेरा जन्म सफल हो जाए।'

श्लोक 38 (markandeya.61.38)

अहोऽस्य रूपमाधुर्यमहोऽस्य ललिता गतिः । अहो गम्भीरता दृष्टेः कुतोऽस्य सदृशो भुवि ॥ 61.38 ॥

aho 'sya rūpamādhuryamaho 'sya lalitā gatiḥ / aho gambhīratā dṛṣṭeḥ kuto 'sya sadṛśo bhuvi

'अहो, इसके रूप की माधुरी! अहो, इसकी चाल की लालित्य! अहो, इसकी दृष्टि की गम्भीरता! पृथ्वी पर इसके समान कौन होगा?'

श्लोक 39 (markandeya.61.39)

दृष्टा देवास्तथा दैत्याः सिद्धगन्धर्वपन्नगाः । कथमेकोऽपि नास्त्यस्य तुल्यरूपो महात्मनः ॥ 61.39 ॥

dṛṣṭā devāstathā daityāḥ siddhagandharvapannagāḥ / kathameko 'pi nāstyasya tulyarūpo mahātmanaḥ

'मैंने देवता, दैत्य, सिद्ध, गन्धर्व, नाग सब देखे हैं — फिर इस महात्मा के समान रूप वाला एक भी क्यों नहीं है?'

श्लोक 40 (markandeya.61.40)

यथाहमस्मिन्मय्येष सानुरागस्तथा यदि । भवेदत्र मया कार्यस्तत्कृतः पुण्यसञ्चयः ॥ 61.40 ॥

yathāhamasminmayyeṣa sānurāgastathā yadi / bhavedatra mayā kāryastatkṛtaḥ puṇyasañcayaḥ

'यदि यह भी मेरे प्रति वैसा ही अनुराग रखे जैसा मैं इसके प्रति रखती हूँ, तो जो पुण्य-संचय इसके लिए करना हो, वह मुझसे हो जाए।'

श्लोक 41 (markandeya.61.41)

यद्येष मयि सुस्त्रिग्धां दृष्टिमद्य निपातयेत् । कृतपुण्या न मत्तोऽन्या त्रैलोक्ये वनिता ततः ॥ 61.41 ॥

yadyeṣa mayi sustrigdhāṁ dṛṣṭimadya nipātayet / kṛtapuṇyā na matto 'nyā trailokye vanitā tataḥ

'यदि यह आज मुझ पर स्नेहभरी दृष्टि डाले, तो त्रैलोक्य में मुझसे बढ़कर पुण्यवती कोई स्त्री न होगी।'

श्लोक 42 (markandeya.61.42)

मार्कण्डेय उवाच एवं सञ्चिन्तयन्ती सा दिव्ययोषित् स्मरातुरा । आत्मानं दर्शयामास कमनीयतराकृतिम् ॥ 61.42 ॥

evaṁ sañcintayantī sā divyayoṣit smarāturā / ātmānaṁ darśayāmāsa kamanīyatarākṛtim

मार्कण्डेय ने कहा — इस प्रकार सोचती हुई वह दिव्य स्त्री, काम-पीड़ित होकर, स्वयं को अत्यन्त मनोहर रूप में प्रकट करने लगी।

श्लोक 43 (markandeya.61.43)

तान्तु दृष्ट्वा द्विजसुतश्चारुरूपां वरूथिनीम् । सोपचारं समागम्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ 61.43 ॥

tāntu dṛṣṭvā dvijasutaścārurūpāṁ varūthinīm / sopacāraṁ samāgamya vākyametaduvāca ha

उस सुन्दर वरूथिनी को देखकर ब्राह्मण-पुत्र सादर उसके पास गया और यह वचन बोला —

श्लोक 44 (markandeya.61.44)

का त्वं कमलगर्भाभे कस्य किं वानुतिष्ठसि । ब्राह्मणोऽहमिहायातो नगरादरुणास्पदात् ॥ 61.44 ॥

kā tvaṁ kamalagarbhābhe kasya kiṁ vānutiṣṭhasi / brāhmaṇo 'hamihāyāto nagarādaruṇāspadāt

'कमल के गर्भ-सी कान्तिवाली, तुम कौन हो? किसकी हो, किस कार्य में लगी हो? मैं अरुणास्पद नगर से आया हुआ ब्राह्मण हूँ।'

श्लोक 45 (markandeya.61.45)

पादलेपोऽत्र मे ध्वस्तो विलीनो हिमवारिणा । यस्यानुभावादत्राहमागतो मदिरेक्षणे ॥ 61.45 ॥

pādalepo 'tra me dhvasto vilīno himavāriṇā / yasyānubhāvādatrāhamāgato madirekṣaṇe

'हे मदिरेक्षणे, यहाँ मेरा पाद-लेप, जिसके प्रभाव से मैं यहाँ आया था, हिम के जल में घुलकर नष्ट हो गया है।'

श्लोक 46 (markandeya.61.46)

वरूथिन्युवाच मौलेयाहं महाभागा नाम्ना ख्याता वरूथिनी । विचरामि सदैवात्र रमणीये महाचले ॥ 61.46 ॥

mauleyāhaṁ mahābhāgā nāmnā khyātā varūthinī / vicarāmi sadaivātra ramaṇīye mahācale

वरूथिनी ने कहा — मैं मौलेय कुल की महाभागा वरूथिनी नाम से विख्यात हूँ। मैं सदा इसी रमणीय महाचल पर विचरण करती हूँ।

श्लोक 47 (markandeya.61.47)

साहं त्वद्दर्शनाद्विप्र ! कामवक्तव्यताङ्गता । प्रशाधि यन्मया कार्यं त्वदधीनास्मि साम्प्रतम् ॥ 61.47 ॥

sāhaṁ tvaddarśanādvipra ! kāmavaktavyatāṅgatā / praśādhi yanmayā kāryaṁ tvadadhīnāsmi sāmpratam

'हे विप्र, तुम्हें देखते ही मैं काम-वशीभूत होकर बोल उठी हूँ। जो कार्य मुझसे कराना हो, आज्ञा दो — अब मैं तुम्हारे अधीन हूँ।'

श्लोक 48 (markandeya.61.48)

ब्राह्मण उवाच येनोपायेन गच्छेयं निजगेहं शुचिस्मिते । तन्ममाचक्ष्व कल्याणि हानिर्नोऽखिलकर्मणाम् ॥ 61.48 ॥

yenopāyena gaccheyaṁ nijagehaṁ śucismite / tanmamācakṣva kalyāṇi hānirno 'khilakarmaṇām

ब्राह्मण ने कहा — हे शुचिस्मिते, मुझे वह उपाय बताओ जिससे मैं अपने घर जा सकूँ, हे कल्याणी — मेरे सारे कर्मों की हानि हो रही है।

श्लोक 49 (markandeya.61.49)

नित्यनैमित्तिकानान्तु महाहानिर्द्विजन्मनः । भवत्यतस्त्वं हे भद्रे ! मामुद्धर हिमालयात् ॥ 61.49 ॥

nityanaimittikānāntu mahāhānirdvijanmanaḥ / bhavatyatastvaṁ he bhadre ! māmuddhara himālayāt

'नित्य-नैमित्तिक कर्मों की उपेक्षा से ब्राह्मण को बड़ी हानि होती है। अतः हे भद्रे, मुझे इस हिमालय से उबारो।'

श्लोक 50 (markandeya.61.50)

प्रशस्यते न प्रवासो ब्राह्मणानां कदाचम । अपराद्धं न मे भीरु देशदर्शनकौतुकम् ॥ 61.50 ॥

praśasyate na pravāso brāhmaṇānāṁ kadācama / aparāddhaṁ na me bhīru deśadarśanakautukam

'ब्राह्मणों के लिए परदेश-गमन कभी सराहनीय नहीं माना जाता। फिर भी, हे भीरु, देश देखने की मेरी उत्सुकता कोई अपराध नहीं थी।'

श्लोक 51 (markandeya.61.51)

सतो गृहे द्विजाग्र्यस्य निष्पत्तिः सर्वकर्मणाम् । नित्यनैमित्तिकानाञ्च हानिरेवं प्रवासिनः ॥ 61.51 ॥

sato gṛhe dvijāgryasya niṣpattiḥ sarvakarmaṇām / nityanaimittikānāñca hānirevaṁ pravāsinaḥ

'श्रेष्ठ ब्राह्मण के अपने ही घर में रहने से सभी कर्मों की सिद्धि होती है; परदेश जाने वाले के नित्य-नैमित्तिक कर्मों की इसी प्रकार हानि होती है।'

श्लोक 52 (markandeya.61.52)

सा त्वं किं बहुनोक्तेन तथा कुरु यशस्विनि । यथा नास्तं गेत सूर्ये पश्यामि निजमालयम् ॥ 61.52 ॥

sā tvaṁ kiṁ bahunoktena tathā kuru yaśasvini / yathā nāstaṁ geta sūrye paśyāmi nijamālayam

'हे यशस्विनि, बहुत कहने से क्या लाभ? ऐसा करो कि सूर्यास्त से पहले ही मैं अपना घर देख सकूँ।'

श्लोक 53 (markandeya.61.53)

वरूथिन्युवाच मैवं ब्रूहि महाभाग ! मा भूत्स दिवसो मम । मां परित्यज्य यत्र त्वं निजगेहमुपैष्यसि ॥ 61.53 ॥

maivaṁ brūhi mahābhāga ! mā bhūtsa divaso mama / māṁ parityajya yatra tvaṁ nijagehamupaiṣyasi

वरूथिनी ने कहा — हे महाभाग, ऐसा मत कहो! वह दिन मेरे लिए कभी न आए जब तुम मुझे त्यागकर अपने घर चले जाओ।

श्लोक 54 (markandeya.61.54)

अहो रम्यतरः स्वर्गो न यतो द्विजनन्दन । अतो वयं परित्यज्य तिष्ठामोऽत्र सुरालयम् ॥ 61.54 ॥

aho ramyataraḥ svargo na yato dvijanandana / ato vayaṁ parityajya tiṣṭhāmo 'tra surālayam

'हे द्विजनन्दन, स्वर्ग भी इससे अधिक रमणीय नहीं है, इसीलिए हम उसे त्यागकर इस देवालय में रहते हैं।'

श्लोक 55 (markandeya.61.55)

स त्वं सह मया कान्त ! कान्तेऽत्र तुहिनाचले । रममाणो न मर्त्यानां बान्धवानां स्मरिष्यसि ॥ 61.55 ॥

sa tvaṁ saha mayā kānta ! kānte 'tra tuhinācale / ramamāṇo na martyānāṁ bāndhavānāṁ smariṣyasi

'हे कान्त, तुम इस सुन्दर हिम-पर्वत पर मेरे साथ क्रीड़ा करते हुए अपने मर्त्य बन्धुओं को स्मरण भी नहीं करोगे।'

श्लोक 56 (markandeya.61.56)

स्त्रजो वस्त्राण्यलङ्कारान् भोगभोज्यानुलेपनम् । दास्याम्यत्र तथाहन्ते स्मरेण वशगा हृता ॥ 61.56 ॥

strajo vastrāṇyalaṅkārān bhogabhojyānulepanam / dāsyāmyatra tathāhante smareṇa vaśagā hṛtā

'मैं तुम्हें यहाँ माला, वस्त्र, आभूषण, भोग्य पदार्थ तथा अनुलेपन दूँगी — क्योंकि काम ने मुझे तुम्हारे वश में कर दिया है।'

श्लोक 57 (markandeya.61.57)

वीणावेणुस्वनं गीतं किन्नराणां मनोरमम् । अङ्गाह्लादकरो वायुरुष्णान्नमुदकं शुचि ॥ 61.57 ॥

vīṇāveṇusvanaṁ gītaṁ kinnarāṇāṁ manoramam / aṅgāhlādakaro vāyuruṣṇānnamudakaṁ śuci

'वीणा-वेणु की ध्वनि से युक्त किन्नरों का मनोरम गीत, अंगों को सुखद वायु, गर्म अन्न तथा शुद्ध जल —'

श्लोक 58 (markandeya.61.58)

मनोभिलषिता शय्या सुगन्धमनुलेपनम् । इहासतो महाभाग गृहे किन्ते निजेऽधिकम् ॥ 61.58 ॥

manobhilaṣitā śayyā sugandhamanulepanam / ihāsato mahābhāga gṛhe kinte nije 'dhikam

'मनचाही शय्या, सुगन्धित अनुलेपन — हे महाभाग, यहाँ रहते हुए तुम्हें अपने ही घर में और क्या अधिक मिलेगा?'

श्लोक 59 (markandeya.61.59)

इहासतो नैव जरा कदाचित्ते भविष्यति । त्रिदशानामियं भूमिर्यौवनोपचयप्रदा ॥ 61.59 ॥

ihāsato naiva jarā kadācitte bhaviṣyati / tridaśānāmiyaṁ bhūmiryauvanopacayapradā

'यहाँ रहने से तुम्हें कभी बुढ़ापा नहीं आएगा; क्योंकि यह देवताओं की भूमि है, जो केवल यौवन की वृद्धि ही देती है।'

श्लोक 60 (markandeya.61.60)

इत्युक्त्वा सानुरागा सा सहसा कमलेक्षणा । आलिलिङ्ग प्रसीदेति वदन्ती कलमुन्मनाः ॥ 61.60 ॥

ityuktvā sānurāgā sā sahasā kamalekṣaṇā / āliliṅga prasīdeti vadantī kalamunmanāḥ

यह कहकर वह कमलनयनी, प्रेम से आतुर होकर, सहसा उसका आलिंगन कर बोली — 'मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।'

श्लोक 61 (markandeya.61.61)

ब्राह्मण उवाच मा मां स्प्राक्षीर्व्रजान्यत्र दुष्टे यः सदृशस्तव । मयान्यथा याचिता त्वमन्यथैवाप्युपैषि माम् ॥ 61.61 ॥

mā māṁ sprākṣīrvrajānyatra duṣṭe yaḥ sadṛśastava / mayānyathā yācitā tvamanyathaivāpyupaiṣi mām

ब्राह्मण ने कहा — मुझे मत छुओ, दुष्टे! जाओ वहाँ जहाँ तुम्हारे योग्य कोई हो। मैंने तुमसे कुछ और माँगा था, और तुम कुछ और लेकर मेरे पास आती हो।

श्लोक 62 (markandeya.61.62)

सायं प्रातर्हुतं हव्यं लोकान् यच्छति शाश्वतान् । त्रैलोक्यमेतदखिलं मूढे इव्ये प्रतिष्ठितम् ॥ 61.62 ॥

sāyaṁ prātarhutaṁ havyaṁ lokān yacchati śāśvatān / trailokyametadakhilaṁ mūḍhe ivye pratiṣṭhitam

'प्रातः-सायं दी गई हवि शाश्वत लोक प्रदान करती है; यह सम्पूर्ण त्रैलोक्य, हे मूढ़े, उसी यज्ञ पर प्रतिष्ठित है।'

श्लोक 63 (markandeya.61.63)

वरूथिन्युवाच किं ते नाहं प्रिया विप्र ! रमणीयो न किं गिरिः । गन्धर्वान् किन्नरादींश्च त्यक्त्वाभीष्टो हि कस्तव ॥ 61.63 ॥

kiṁ te nāhaṁ priyā vipra ! ramaṇīyo na kiṁ giriḥ / gandharvān kinnarādīṁśca tyaktvābhīṣṭo hi kastava

वरूथिनी ने कहा — हे विप्र, क्या मैं तुम्हें प्रिय नहीं? क्या यह पर्वत रमणीय नहीं? गन्धर्व-किन्नरों को त्यागकर तुम्हें वास्तव में कौन अभीष्ट है?

श्लोक 64 (markandeya.61.64)

निजमालयमप्यस्माद्भवान् यास्यत्यसंशयम् । स्वल्पकालं मया सार्धं भुङ्क्षव भोगान् सुदुर्लभान् ॥ 61.64 ॥

nijamālayamapyasmādbhavān yāsyatyasaṁśayam / svalpakālaṁ mayā sārdhaṁ bhuṅkṣava bhogān sudurlabhān

'तुम निश्चय ही यहाँ से अपने घर चले जाओगे। थोड़े समय के लिए मेरे साथ ये दुर्लभ भोग भोगो।'

श्लोक 66 (markandeya.61.66)

ब्राह्मण उवाच अष्टावात्मगुणा ये हि तेषामादौ दया द्विज । तां करोषि कथं न त्वं मयि सद्धर्मपालक ॥ 61.66 ॥

aṣṭāvātmaguṇā ye hi teṣāmādau dayā dvija / tāṁ karoṣi kathaṁ na tvaṁ mayi saddharmapālaka

'आत्मा के आठ गुणों में दया सबसे पहले है, हे द्विज; फिर तुम मुझ पर वह दया क्यों नहीं करते, हे सद्धर्म के रक्षक?'

श्लोक 67 (markandeya.61.67)

त्वद्विमुक्ता न जीवामि तथा प्रीतिमती त्वयि । नैतद्वदाम्यहं मिथ्या प्रसीद कुलनन्दन ॥ 61.67 ॥

tvadvimuktā na jīvāmi tathā prītimatī tvayi / naitadvadāmyahaṁ mithyā prasīda kulanandana

'तुमसे विमुक्त होकर मैं जीवित नहीं रह सकती, इतना अधिक प्रेम मुझे तुमसे है। मैं यह झूठ नहीं कहती — प्रसन्न हो जाओ, हे कुलनन्दन।'

श्लोक 68 (markandeya.61.68)

ब्राह्मण उवाच यदि प्रीतिमती सत्यं नोपचाराद्ब्रवीषि माम् । तदुपायं समाचक्ष्व येन यामि स्वमालयम् ॥ 61.68 ॥

yadi prītimatī satyaṁ nopacārādbravīṣi mām / tadupāyaṁ samācakṣva yena yāmi svamālayam

ब्राह्मण ने कहा — यदि सचमुच प्रेम है, केवल उपचार से नहीं कह रही हो, तो वह उपाय बताओ जिससे मैं अपने घर जा सकूँ।

श्लोक 69 (markandeya.61.69)

वरूथिन्युवाच निजमालयमप्यस्माद्भवान् यास्यत्यसंशयम् । स्वल्पकालं मया सार्धं भुङ्क्ष्व भोगान् सुदुर्लभान् ॥ 61.69 ॥

nijamālayamapyasmādbhavān yāsyatyasaṁśayam / svalpakālaṁ mayā sārdhaṁ bhuṅkṣva bhogān sudurlabhān

वरूथिनी ने कहा — तुम निश्चय ही यहाँ से अपने घर चले जाओगे। थोड़े समय के लिए मेरे साथ ये दुर्लभ भोग भोगो।

श्लोक 70 (markandeya.61.70)

ब्राह्मण उवाच न भोगार्थाय विप्राणां शस्यते हि वरूथिनी । इह क्लेशाय विप्राणां चेष्टा प्रेत्याफलप्रदा ॥ 61.70 ॥

na bhogārthāya viprāṇāṁ śasyate hi varūthinī / iha kleśāya viprāṇāṁ ceṣṭā pretyāphalapradā

ब्राह्मण ने कहा — ब्राह्मणों के लिए भोग हेतु वरूथिनी की संगति कभी प्रशस्त नहीं मानी जाती; यह यहाँ क्लेश तथा परलोक में दुष्फल देने वाली चेष्टा है।

श्लोक 71 (markandeya.61.71)

वरूथिन्युवाच सन्त्राणं म्रियमाणाया मम कृत्वा परत्र ते । पुण्यस्यैव फलं भावि भोगाश्चान्यत्र जन्मनि ॥ 61.71 ॥

santrāṇaṁ mriyamāṇāyā mama kṛtvā paratra te / puṇyasyaiva phalaṁ bhāvi bhogāścānyatra janmani

वरूथिनी ने कहा — मरणासन्न मुझ पर रक्षा करने से तुम्हें परलोक में पुण्य का ही फल मिलेगा, और अन्य जन्म में भोग भी।

श्लोक 72 (markandeya.61.72)

एवं च द्वयमप्यत्र तवोपचयकारणम् । प्रत्याख्यानादहं मृत्युं त्वञ्च पापमवाप्स्यसि ॥ 61.72 ॥

evaṁ ca dvayamapyatra tavopacayakāraṇam / pratyākhyānādahaṁ mṛtyuṁ tvañca pāpamavāpsyasi

'इस प्रकार यहाँ दोनों ही बातें तुम्हारी वृद्धि का कारण हैं; और यदि तुम अस्वीकार करोगे तो मुझे मृत्यु तथा तुम्हें पाप प्राप्त होगा।'

श्लोक 73 (markandeya.61.73)

ब्राह्मण उवाच परस्त्रियं नाभिलषेदित्युचुर्गुरवो मम । तेन त्वां नाभिवाञ्छामि कामं विलप शुष्य वा ॥ 61.73 ॥

parastriyaṁ nābhilaṣedityucurguravo mama / tena tvāṁ nābhivāñchāmi kāmaṁ vilapa śuṣya vā

ब्राह्मण ने कहा — मेरे गुरुओं ने कहा है कि पराई स्त्री की कामना नहीं करनी चाहिए। इसलिए मैं तुम्हारी कामना नहीं करता — चाहे विलाप करो या सूख जाओ।

श्लोक 74 (markandeya.61.74)

मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त्वा स महाभागः स्पृष्ट्वापः प्रयतः शुचिः । प्राहेदं प्रणिपत्याग्निं गार्हपत्यमुपांशुना ॥ 61.74 ॥

ityuktvā sa mahābhāgaḥ spṛṣṭvāpaḥ prayataḥ śuciḥ / prāhedaṁ praṇipatyāgniṁ gārhapatyamupāṁśunā

मार्कण्डेय ने कहा — यह कहकर उस महाभाग ने जल स्पर्श किया, पवित्र और संयत होकर गार्हपत्य अग्नि को प्रणाम कर धीमे स्वर में यह कहा —

श्लोक 75 (markandeya.61.75)

भगवन् ! गार्हपत्याग्ने योनिस्त्वं सर्वकर्मणाम् । त्वत्त आहवनीयोऽग्निर्दक्षिणाग्निश्च नान्यतः ॥ 61.75 ॥

bhagavan ! gārhapatyāgne yonistvaṁ sarvakarmaṇām / tvatta āhavanīyo 'gnirdakṣiṇāgniśca nānyataḥ

'हे भगवन् गार्हपत्याग्नि! तुम समस्त कर्मों के मूल हो; तुमसे ही आहवनीय और दक्षिणाग्नि उत्पन्न होते हैं, अन्य किसी से नहीं।'

श्लोक 76 (markandeya.61.76)

युष्मदाप्यायनाद् देवा वृष्टिशस्यादिहेतवः । भवन्ति शस्यादखिलं जगद्भवति नान्यतः ॥ 61.76 ॥

yuṣmadāpyāyanād devā vṛṣṭiśasyādihetavaḥ / bhavanti śasyādakhilaṁ jagadbhavati nānyataḥ

'तुम्हारे ही पोषण से देवगण वर्षा तथा अन्न आदि के कारण बनते हैं; अन्न से ही समस्त जगत का जीवन है, अन्य किसी से नहीं।'

श्लोक 77 (markandeya.61.77)

एवं त्वत्तो भवत्येतद्येन सत्येन वै जगत् । तथाहमद्य स्वं गेहं पश्येयं सति भास्करे ॥ 61.77 ॥

evaṁ tvatto bhavatyetadyena satyena vai jagat / tathāhamadya svaṁ gehaṁ paśyeyaṁ sati bhāskare

'जिस सत्य से यह सब तुमसे उत्पन्न होता है, जिससे यह जगत विद्यमान है, उसी सत्य से आज सूर्य के रहते हुए मैं अपना घर देख सकूँ।'

श्लोक 78 (markandeya.61.78)

यथा वै वैदिकं कर्म स्वकाले नोज्झितं मया । तेन सत्येन पश्येयं गृहस्थोऽद्य दिवाकरम् ॥ 61.78 ॥

yathā vai vaidikaṁ karma svakāle nojjhitaṁ mayā / tena satyena paśyeyaṁ gṛhastho 'dya divākaram

'जैसे मैंने कभी उचित समय पर वैदिक कर्म का त्याग नहीं किया, उसी सत्य से मैं गृहस्थ होकर आज घर पर सूर्य को देख सकूँ।'

श्लोक 79 (markandeya.61.79)

यथा च न परद्रव्ये परदारे च मे मतिः । कदाचित् साभिलाषाभूत्तथैतत् सिद्धिमेतु मे ॥ 61.79 ॥

yathā ca na paradravye paradāre ca me matiḥ / kadācit sābhilāṣābhūttathaitat siddhimetu me

'और जैसे मेरा मन कभी पराए धन और पराई स्त्री के प्रति अभिलाषी नहीं हुआ, वैसे ही मेरी यह इच्छा सिद्ध हो।'

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