सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 64
स्वरोचि का विभावरी और कलावती से विवाह
श्लोक 1 (markandeya.64.1)
मार्कण्डेय उवाच एवं विमुक्तरोगा तु कन्यका तं मुदान्विता । स्वरोचिषमुवाचेदं शृणुष्व वचनं प्रभो ॥ 64.1 ॥
evaṁ vimuktarogā tu kanyakā taṁ mudānvitā / svarociṣamuvācedaṁ śṛṇuṣva vacanaṁ prabho
मार्कण्डेय ने कहा — इस प्रकार रोगमुक्त हुई वह कन्या हर्षित होकर स्वरोचि से बोली — 'हे प्रभो, मेरी बात सुनिए।'
श्लोक 2 (markandeya.64.2)
मन्दारविद्याधरजा नाम्ना ख्याता विभावरी । उपकारिन् ! स्वमात्मानं प्रयच्छामि प्रतीच्छ माम् ॥ 64.2 ॥
mandāravidyādharajā nāmnā khyātā vibhāvarī / upakārin ! svamātmānaṁ prayacchāmi pratīccha mām
'मैं मन्दार विद्याधर की पुत्री, विभावरी नाम से विख्यात हूँ। हे उपकारी, मैं अपने आपको तुम्हें देती हूँ — मुझे स्वीकार करो।'
श्लोक 3 (markandeya.64.3)
विद्याञ्च तुभ्यं दास्यामि सर्वबूतरुतानि ते । ययाभिव्यक्तिमेष्यन्ति प्रसादपुरगो भव ॥ 64.3 ॥
vidyāñca tubhyaṁ dāsyāmi sarvabūtarutāni te / yayābhivyaktimeṣyanti prasādapurago bhava
'और मैं तुम्हें वह विद्या दूँगी जिससे तुम्हें सभी प्राणियों की बोली समझ में आ जाएगी। कृपापूर्वक स्वीकार करो।'
श्लोक 4 (markandeya.64.4)
मार्कण्डेय उवाच एवमस्त्विति तेनोक्ते धर्मज्ञेन स्वरोचिषा । द्वितीया तु तदा कन्या इदं वचनमब्रवीत् ॥ 64.4 ॥
evamastviti tenokte dharmajñena svarociṣā / dvitīyā tu tadā kanyā idaṁ vacanamabravīt
मार्कण्डेय ने कहा — धर्मज्ञ स्वरोचि द्वारा 'ऐसा ही हो' कहे जाने पर दूसरी कन्या ने तब यह वचन कहा —
श्लोक 5 (markandeya.64.5)
कुमारब्रह्मचार्यासीत् पारो नाम पिता मम । ब्रह्मर्षिः सुमहाभागो वेदवेदाङ्गपारगः ॥ 64.5 ॥
kumārabrahmacāryāsīt pāro nāma pitā mama / brahmarṣiḥ sumahābhāgo vedavedāṅgapāragaḥ
'मेरे पिता का नाम पार था, जो बाल्यकाल से ब्रह्मचारी, वेद-वेदांगों के पारगामी, महाभाग ब्रह्मर्षि थे।'
श्लोक 6 (markandeya.64.6)
तस्य पुंस्कोकिलालापरमणीये मधौ पुरा । आजगामाप्सराभ्यासं प्रख्याता पुञ्जिकास्तना ॥ 64.6 ॥
tasya puṁskokilālāparamaṇīye madhau purā / ājagāmāpsarābhyāsaṁ prakhyātā puñjikāstanā
'एक बार पुंस्कोकिल की ध्वनि से मनोहर वसन्त ऋतु में, प्रख्यात अप्सरा पुञ्जिकास्थना उनके पास आई।'
श्लोक 7 (markandeya.64.7)
कामवक्तव्यतां नीतः स तदा मुनिपुङ्गवः । तत्संयोगेऽहमुत्पन्ना तस्यामत्र महाचले ॥ 64.7 ॥
kāmavaktavyatāṁ nītaḥ sa tadā munipuṅgavaḥ / tatsaṁyoge 'hamutpannā tasyāmatra mahācale
'वह श्रेष्ठ मुनि तब काम-वशीभूत हो गए; उन्हीं के संयोग से मैं इस महापर्वत पर उनसे उत्पन्न हुई।'
श्लोक 8 (markandeya.64.8)
विहाय मां गता सा च मातास्मिन्निर्जने वने । बालामेकां महीपृष्ठे व्यालश्वापदसंकुले ॥ 64.8 ॥
vihāya māṁ gatā sā ca mātāsminnirjane vane / bālāmekāṁ mahīpṛṣṭhe vyālaśvāpadasaṁkule
'मेरी माता मुझे इस निर्जन, सर्प-हिंस्र पशुओं से भरे वन में अकेली बालिका के रूप में छोड़कर चली गई।'
श्लोक 9 (markandeya.64.9)
ततः कलाभिः सोमस्य वर्धन्तीभिरहः क्षये । आप्याय्यमानाहरहो वृद्धिं यातास्मि सत्तम ॥ 64.9 ॥
tataḥ kalābhiḥ somasya vardhantībhirahaḥ kṣaye / āpyāyyamānāharaho vṛddhiṁ yātāsmi sattama
'तब चन्द्रमा की दिन-प्रतिदिन बढ़ती कलाओं से पोषित होकर, हे सत्तम, मैं बढ़ती गई।'
श्लोक 10 (markandeya.64.10)
ततः कलावतीत्येतन्मम नाम महात्मना । गृहीतायः कृतं पित्रा गन्धर्वेण शुभानना ॥ 64.10 ॥
tataḥ kalāvatītyetanmama nāma mahātmanā / gṛhītāyaḥ kṛtaṁ pitrā gandharveṇa śubhānanā
'तब एक महात्मा गन्धर्व ने मुझे अपनी पुत्री बनाकर 'कलावती' यह नाम रखा।'
श्लोक 11 (markandeya.64.11)
न दत्ताहं तदा तेन याचितेन महात्मना । देवारिणालिना सुप्तस्ततो मे घातितः पिता ॥ 64.11 ॥
na dattāhaṁ tadā tena yācitena mahātmanā / devāriṇālinā suptastato me ghātitaḥ pitā
'याचना करने पर भी उस महात्मा ने मुझे उसे नहीं दिया; तब सोते हुए मेरे पिता को देवताओं के शत्रु सर्प ने मार डाला।'
श्लोक 12 (markandeya.64.12)
ततोऽहमतिनिर्वेदादात्मव्यापादनोद्यता । निवारिता शम्भुपत्न्या सत्या सत्यप्रतिश्रवा ॥ 64.12 ॥
tato 'hamatinirvedādātmavyāpādanodyatā / nivāritā śambhupatnyā satyā satyapratiśravā
'तब अत्यन्त वैराग्य से मैं आत्मघात करने को उद्यत हुई, किन्तु शम्भु की सत्यप्रतिज्ञ, सती पत्नी ने मुझे रोक दिया।'
श्लोक 13 (markandeya.64.13)
मा शुचः सुभ्रु ! भर्ता ते महाभागो भविष्यति । स्वरोचिर्नाम पुत्रश्च मनुस्तस्य भविष्यति ॥ 64.13 ॥
mā śucaḥ subhru ! bhartā te mahābhāgo bhaviṣyati / svarocirnāma putraśca manustasya bhaviṣyati
'उन्होंने कहा — शोक मत करो, हे सुभ्रु! तुम्हारा पति महाभाग होगा, और उसका पुत्र मनु होगा।'
श्लोक 14 (markandeya.64.14)
आज्ञाञ्च निधयः सर्वे करिष्यन्ति तवादृताः । यथाभिलषितं वित्तं प्रदास्यन्ति च ते शुभे ॥ 64.14 ॥
ājñāñca nidhayaḥ sarve kariṣyanti tavādṛtāḥ / yathābhilaṣitaṁ vittaṁ pradāsyanti ca te śubhe
'समस्त निधियाँ तुम्हारा आदर करते हुए तुम्हारी आज्ञा मानेंगी, और हे शुभे, तुम्हें इच्छानुसार धन प्रदान करेंगी।'
श्लोक 15 (markandeya.64.15)
यस्या वत्से प्रभावेण विद्यायास्तां गृहाण मे । पद्मिनी नाम विद्येयं महापद्माभिपूजिता ॥ 64.15 ॥
yasyā vatse prabhāveṇa vidyāyāstāṁ gṛhāṇa me / padminī nāma vidyeyaṁ mahāpadmābhipūjitā
'हे वत्से, जिस विद्या के प्रभाव से यह सब होगा, वह मुझसे ग्रहण करो — यह पद्मिनी नामक विद्या है, महापद्म से पूजित।'
श्लोक 16 (markandeya.64.16)
इत्याह मां दक्षसुता सती सत्यपरायणा । स्वरोचिस्त्वं ध्रुवं देवी नान्यथा सा वदिष्यति ॥ 64.16 ॥
ityāha māṁ dakṣasutā satī satyaparāyaṇā / svarocistvaṁ dhruvaṁ devī nānyathā sā vadiṣyati
'दक्ष-पुत्री सत्यपरायणा सती ने मुझसे यह कहा — हे स्वरोचि, तुम निश्चय ही वही हो; वह देवी अन्यथा नहीं कहतीं।'
श्लोक 17 (markandeya.64.17)
साहं प्राणप्रदायाद्य तां विद्यां स्वं तथा वपुः । प्रयच्छामि प्रतीच्छ त्वं प्रसादसुमुखो मम ॥ 64.17 ॥
sāhaṁ prāṇapradāyādya tāṁ vidyāṁ svaṁ tathā vapuḥ / prayacchāmi pratīccha tvaṁ prasādasumukho mama
'इसलिए मैं, अपने प्राणों की दात्री, आज वह विद्या तथा अपना स्वरूप भी तुम्हें देती हूँ — स्वीकार करो, मुझ पर कृपादृष्टि करो।'
श्लोक 18 (markandeya.64.18)
मार्कण्डेय उवाच एवमस्त्विति तामाह स तु कन्यां कलावतीम् । विभावर्याः कलावत्याः स्निग्धदृष्ट्यानुमोदितः ॥ 64.18 ॥
evamastviti tāmāha sa tu kanyāṁ kalāvatīm / vibhāvaryāḥ kalāvatyāḥ snigdhadṛṣṭyānumoditaḥ
मार्कण्डेय ने कहा — विभावरी की स्नेहभरी अनुमोदक दृष्टि से समर्थित होकर उसने उस कलावती नामक कन्या से भी 'ऐसा ही हो' कहा।
श्लोक 19 (markandeya.64.19)
जग्राह च ततः पाणी स तयोरमरद्युतिः । नदत्सु देवतूर्येषु नृत्यन्तीष्वप्सरः सु च ॥ 64.19 ॥
jagrāha ca tataḥ pāṇī sa tayoramaradyutiḥ / nadatsu devatūryeṣu nṛtyantīṣvapsaraḥ su ca
तब देवताओं के वाद्य बजते हुए, अप्सराओं के नृत्य करते हुए, वह अमरतुल्य तेजस्वी उन दोनों का पाणिग्रहण कर लिया।