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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 67

स्वारोचिष मन्वन्तर-वर्णन

अध्याय 66अध्याय-सूचीअध्याय 68

श्लोक 1 (markandeya.67.1)

मार्कण्डेय उवाच ततः स्वारोचिषं नाम्ना द्युतिमन्तं प्रजापतिम् । मनुं चकार भगवांस्तस्य मन्वन्तरं शृणु ॥ 67.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tataḥ svārociṣaṁ nāmnā dyutimantaṁ prajāpatim manuṁ cakāra bhagavāṁstasya manvantaraṁ śṛṇu

मार्कण्डेय ने कहा — तत्पश्चात् भगवान ने प्रजापति द्युतिमान को स्वारोचिष नाम से मनु बनाया; अब उनके मन्वन्तर के विषय में सुनो।

श्लोक 2 (markandeya.67.2)

तत्रान्तरे तु ये देवा मुनयस्तत्सुताश्च ये । भूपालाः क्रौष्टुके ये तान्गदतस्त्वं निशामय ॥ 67.2 ॥

tatrāntare tu ye devā munayastatsutāśca ye bhūpālāḥ krauṣṭuke ye tāngadatastvaṁ niśāmaya

हे क्रौष्टुकि! उस मन्वन्तर में जो देवगण, मुनिगण, उनके पुत्र तथा राजा हुए, उन सबका वर्णन करते हुए मुझसे सुनो।

श्लोक 3 (markandeya.67.3)

देवाः पारावतास्तत्र तथैव तुषिता द्विज । स्वारोचिषेऽन्तरे चेन्द्रो विपश्चिदिति विश्रुतः ॥ 67.3 ॥

devāḥ pārāvatāstatra tathaiva tuṣitā dvija svārociṣe’ntare cendro vipaściditi viśrutaḥ

हे द्विज! उस काल में पारावत तथा तुषित नामक देवगण थे; और स्वारोचिष मन्वन्तर में इन्द्र विपश्चित् नाम से विख्यात थे।

श्लोक 4 (markandeya.67.4)

ऊर्जस्तम्बस्तथा प्राणो दत्तोऽलिर्ऋषभस्तथा । निश्चरश्चार्ववीरश्च तत्र सप्तर्षयोऽभवन् ॥ 67.4 ॥

ūrjastambastathā prāṇo datto’lirṛṣabhastathā niścaraścārvavīraśca tatra saptarṣayo’bhavan

ऊर्जस्तम्भ, प्राण, दत्त, अलि, ऋषभ, निश्चर और चारुवीर — ये सात ऋषि उस मन्वन्तर में हुए।

श्लोक 5 (markandeya.67.5)

चैत्रकिंपुरुषाद्याश्च सुतास्तस्य महात्मनः । सप्तासन्सुमहावीर्याः पृथिवीपरिपालकाः ॥ 67.5 ॥

caitrakiṁpuruṣādyāśca sutāstasya mahātmanaḥ saptāsansumahāvīryāḥ pṛthivīparipālakāḥ

चैत्र, किंपुरुष आदि उस महात्मा मनु के पुत्र थे — ये सात अत्यन्त पराक्रमी राजा पृथ्वी का पालन करते थे।

श्लोक 6 (markandeya.67.6)

तस्य मन्वन्तरं यावत्तावत्तद्वंशविस्तरे । भुक्तेयमवनिः सर्वा द्वितीयं वै तदन्तरम् ॥ 67.6 ॥

tasya manvantaraṁ yāvattāvattadvaṁśavistare bhukteyamavaniḥ sarvā dvitīyaṁ vai tadantaram

जब तक उसका मन्वन्तर रहा, तब तक उसके वंश-विस्तार के द्वारा यह सम्पूर्ण पृथ्वी भोगी गई — यही द्वितीय मन्वन्तर था।

श्लोक 7 (markandeya.67.7)

स्वरोचिषस्तु चरितं जन्म स्वारोचिषस्य च । निशम्य मुच्यते पापैः श्रद्धधानो हि मानवः ॥ 67.7 ॥

svarociṣastu caritaṁ janma svārociṣasya ca niśamya mucyate pāpaiḥ śraddhadhāno hi mānavaḥ

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक स्वरोचि के चरित्र तथा स्वारोचिष के जन्म को सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

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