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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 68

अष्ट निधियों का वर्णन

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69

श्लोक 1 (markandeya.68.1)

क्रौष्टुकिरुवाच भगवन्कथितं सर्वं विस्तरेण त्वया मम । स्वरोचिषस्तु चरितं जन्म स्वारोचिषस्य तु ॥ 68.1 ॥

krauṣṭukiruvāca bhagavankathitaṁ sarvaṁ vistareṇa tvayā mama svarociṣastu caritaṁ janma svārociṣasya tu

क्रौष्टुकि ने कहा — हे भगवन्! आपने मुझे स्वरोचि का चरित्र तथा स्वारोचिष का जन्म-वृत्तान्त विस्तार से कह सुनाया।

श्लोक 2 (markandeya.68.2)

या तु सा पद्मिनी नाम विद्या भोगोपपादिका । तत्संश्रया ये निधयस्तान्मे विस्तरतो वद ॥ 68.2 ॥

yā tu sā padminī nāma vidyā bhogopapādikā tatsaṁśrayā ye nidhayastānme vistarato vada

जो वह पद्मिनी नामक विद्या समस्त भोगों को प्रदान करने वाली है, उसके आश्रित जो निधियाँ हैं, उन्हें मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 3 (markandeya.68.3)

अष्टौ ये निधयस्तेषां स्वरूपं द्रव्यसंस्थितिः । भवताभिहितं सम्यक्छ्रोतुमिच्छाम्यहं गुरो ॥ 68.3 ॥

aṣṭau ye nidhayasteṣāṁ svarūpaṁ dravyasaṁsthitiḥ bhavatābhihitaṁ samyakchrotumicchāmyahaṁ guro

हे गुरो! आपने जिन आठ निधियों का उल्लेख किया, उनके स्वरूप तथा धन की स्थिति को मैं भलीभाँति सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 4 (markandeya.68.4)

मार्कण्डेय उवाच पद्मिनी नाम या विद्या लक्ष्मीस्तस्याश्च देवता । तदाधाराश्च निधयस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ 68.4 ॥

mārkaṇḍeya uvāca padminī nāma yā vidyā lakṣmīstasyāśca devatā tadādhārāśca nidhayastanme nigadataḥ śṛṇu

मार्कण्डेय ने कहा — पद्मिनी नामक जो विद्या है, लक्ष्मी उसकी अधिष्ठात्री देवी हैं; उन्हीं के आश्रित निधियों को मुझसे कहते हुए सुनो।

श्लोक 5 (markandeya.68.5)

यत्र पद्ममहापद्मौ तथा मकरकच्छपौ । मुकुन्दो नंदकश्चैव नीलः शङ्खोऽष्टमो निधिः ॥ 68.5 ॥

yatra padmamahāpadmau tathā makarakacchapau mukundo naṁdakaścaiva nīlaḥ śaṅkho’ṣṭamo nidhiḥ

पद्म और महापद्म, तथा मकर और कच्छप, मुकुन्द और नन्दक, नील और आठवीं शंख — ये आठ निधियाँ हैं।

श्लोक 6 (markandeya.68.6)

सत्यामृद्धौ भवन्त्येते सिद्धिस्तेषां हि जायते । एते ह्यष्टौ समाख्याता निधयस्तव क्रौष्टुके ॥ 68.6 ॥

satyāmṛddhau bhavantyete siddhisteṣāṁ hi jāyate ete hyaṣṭau samākhyātā nidhayastava krauṣṭuke

जब समृद्धि होती है, तब ये प्रकट होते हैं, और इनसे सिद्धि उत्पन्न होती है। हे क्रौष्टुकि! ये आठ निधियाँ तुम्हें बता दी गईं।

श्लोक 7 (markandeya.68.7)

देवतानां प्रसादेन साधुसंसेवनेन च । एभिरालोकितं वित्तं मानुषस्य सदा मुने ॥ 68.7 ॥

devatānāṁ prasādena sādhusaṁsevanena ca ebhirālokitaṁ vittaṁ mānuṣasya sadā mune

हे मुने! देवताओं की कृपा से तथा सज्जनों की सेवा से, इनके द्वारा देखा गया धन सदा मनुष्य के पास रहता है।

श्लोक 8 (markandeya.68.8)

यादृक्स्वरूपं भवति तन्मे निगदतः शृणु । पद्मो नाम निधिः पूर्वं स यस्य भवति द्विज ॥ 68.8 ॥

yādṛksvarūpaṁ bhavati tanme nigadataḥ śṛṇu padmo nāma nidhiḥ pūrvaṁ sa yasya bhavati dvija

उनका जैसा स्वरूप होता है, वह मुझसे कहते हुए सुनो। हे द्विज! सर्वप्रथम पद्म नामक निधि है, जिसके पास वह होती है।

श्लोक 9 (markandeya.68.9)

स तस्य तत्सुतानां च तत्पौत्राणां च नित्यशः । दाक्षिण्यसारः पुरुषस्तेन चाधिष्ठितो भवेत् ॥ 68.9 ॥

sa tasya tatsutānāṁ ca tatpautrāṇāṁ ca nityaśaḥ dākṣiṇyasāraḥ puruṣastena cādhiṣṭhito bhavet

वह, तथा सदा उसके पुत्रों और पौत्रों में भी, इस निधि से अधिष्ठित पुरुष उदारता-प्रधान होता है।

श्लोक 10 (markandeya.68.10)

सत्त्वाधारो महाभागो यतोऽसौ सात्त्विको निधिः । सुवर्णरूप्यताम्रादिधातूनां च परिग्रहम् ॥ 68.10 ॥

sattvādhāro mahābhāgo yato’sau sāttviko nidhiḥ suvarṇarūpyatāmrādidhātūnāṁ ca parigraham

वह अत्यन्त भाग्यशाली और सत्त्व-प्रधान होता है, क्योंकि यह निधि सात्त्विक है; वह सोना, चाँदी, ताँबा आदि धातुओं का संग्रह करता है।

श्लोक 11 (markandeya.68.11)

करोत्यतितरां सोऽथ तेषां च क्रयविक्रयम् । करोति च तथा यज्ञान्दक्षिणां च प्रयच्छति । संपादयति कामांश्च सर्वानेव यथाक्रमम् । सभां देवनिकेतांश्च स कारयति तन्मनाः ॥ 68.11 ॥

karotyatitarāṁ so’tha teṣāṁ ca krayavikrayam karoti ca tathā yajñāndakṣiṇāṁ ca prayacchati saṁpādayati kāmāṁśca sarvāneva yathākramam sabhāṁ devaniketāṁśca sa kārayati tanmanāḥ

वह इनका खूब क्रय-विक्रय करता है, यज्ञ करता है और दक्षिणा देता है; वह क्रमशः अपनी सभी कामनाओं को पूर्ण करता है, और एकाग्रचित्त होकर सभाभवन तथा देवमन्दिर बनवाता है।

श्लोक 12 (markandeya.68.12)

सत्त्वाधारो निधिश्चान्यो महापद्म इति श्रुतः ॥ 68.12 ॥

sattvādhāro nidhiścānyo mahāpadma iti śrutaḥ

सत्त्व पर आधारित एक अन्य निधि महापद्म नाम से प्रसिद्ध है।

श्लोक 13 (markandeya.68.13)

सत्त्वप्रधानो भवति तेन चाधिष्ठितो नरः । करोति पद्मरागादिरत्नानां च परिग्रहम् ॥ 68.13 ॥

sattvapradhāno bhavati tena cādhiṣṭhito naraḥ karoti padmarāgādiratnānāṁ ca parigraham

इससे अधिष्ठित मनुष्य सत्त्वप्रधान होता है, और वह पद्मराग आदि रत्नों का संग्रह करता है।

श्लोक 14 (markandeya.68.14)

मौक्तिकानां प्रवालानां तेषां च क्रयविक्रयान् । ददाति योगशीलेभ्यस्तेषामावसथांस्तथा ॥ 68.14 ॥

mauktikānāṁ pravālānāṁ teṣāṁ ca krayavikrayān dadāti yogaśīlebhyasteṣāmāvasathāṁstathā

वह मोतियों और मूँगों का क्रय-विक्रय करता है, और योगशील पुरुषों को उनके निवास-स्थान प्रदान करता है।

श्लोक 15 (markandeya.68.15)

स कारयति तच्छीलः स्वयमेव च जायते । तत्प्रसूतास्तथाशीलाः पुत्रपौत्रक्रमेण च ॥ 68.15 ॥

sa kārayati tacchīlaḥ svayameva ca jāyate tatprasūtāstathāśīlāḥ putrapautrakrameṇa ca

वह स्वयं भी वैसे ही स्वभाव वाला बन जाता है, और उससे उत्पन्न सन्ततियाँ भी पुत्र-पौत्रक्रम से वैसे ही स्वभाव वाली होती हैं।

श्लोक 16 (markandeya.68.16)

पूर्वर्द्धिमात्रः सप्तासौ पुरुषांश्च न मुञ्चति । तामसो मकरो नाम निधिस्तेनावलोकितः ॥ 68.16 ॥

pūrvarddhimātraḥ saptāsau puruṣāṁśca na muñcati tāmaso makaro nāma nidhistenāvalokitaḥ

यह पूर्वोक्त समृद्धि के समान ही सात पुरुषों तक बना रहता है, इसे नहीं छोड़ता। मकर नामक जो तामस निधि है, उसके द्वारा देखा गया मनुष्य...

श्लोक 17 (markandeya.68.17)

पुरुषोऽथ तमःप्रायः सुशीलोऽपि हि जायते । बाणखड्गर्ष्टि धनुषां चर्मणां च परिग्रहम् ॥ 68.17 ॥

puruṣo’tha tamaḥprāyaḥ suśīlo’pi hi jāyate bāṇakhaḍgarṣṭi dhanuṣāṁ carmaṇāṁ ca parigraham

...तमःप्रधान हो जाता है, चाहे वह पहले सुशील ही क्यों न रहा हो; वह बाण, खड्ग, भाला, धनुष तथा चर्मों का संग्रह करता है।

श्लोक 18 (markandeya.68.18)

दंशनानां च कुरुते योऽतिमैत्री च राजभिः । ददाति शौर्यवृत्तीनां भूभुजां ये च तत्प्रियाः ॥ 68.18 ॥

daṁśanānāṁ ca kurute yo’timaitrī ca rājabhiḥ dadāti śauryavṛttīnāṁ bhūbhujāṁ ye ca tatpriyāḥ

वह कवचों का भी संग्रह करता है, और राजाओं के साथ अत्यन्त मैत्री रखता है; वह शौर्यवृत्ति वाले तथा उन राजाओं को देता है, जो उसे प्रिय हैं।

श्लोक 19 (markandeya.68.19)

क्रयविक्रये च शस्त्राणां नान्यत्र प्रीतिमेति च । एकस्यैव भवत्येष नरस्य न सुतानुगः ॥ 68.19 ॥

krayavikraye ca śastrāṇāṁ nānyatra prītimeti ca ekasyaiva bhavatyeṣa narasya na sutānugaḥ

वह अस्त्र-शस्त्रों के क्रय-विक्रय में ही रुचि रखता है, अन्यत्र नहीं; यह निधि केवल एक ही मनुष्य के पास रहती है, उसके पुत्रों तक नहीं जाती।

श्लोक 20 (markandeya.68.20)

द्रव्यार्थं दस्युतो नाशं संग्रामे वापि स व्रजेत् । कच्छपश्च निधिर्योऽसौ नरस्तेनाभिवीक्षितः ॥ 68.20 ॥

dravyārthaṁ dasyuto nāśaṁ saṁgrāme vāpi sa vrajet kacchapaśca nidhiryo’sau narastenābhivīkṣitaḥ

धन के लिए वह डाकुओं से या संग्राम में भी विनाश को प्राप्त हो सकता है। कच्छप नामक जो निधि है, जिस मनुष्य पर उसकी दृष्टि पड़ती है...

श्लोक 21 (markandeya.68.21)

तमःप्रधानो भवति यतोऽसौ तामसो निधिः । व्यवहारानशेषांस्तु पुण्यजातैः करोति च ॥ 68.21 ॥

tamaḥpradhāno bhavati yato’sau tāmaso nidhiḥ vyavahārānaśeṣāṁstu puṇyajātaiḥ karoti ca

...तमःप्रधान हो जाता है, क्योंकि यह निधि तामसी है; वह पुण्यशाली लोगों के साथ ही अपने सारे व्यवहार करता है।

श्लोक 22 (markandeya.68.22)

कर्मस्थानखिलांश्चैव न विश्वसिति कस्यचित् । समस्तानि यथाङ्गानि संहरत्येव कच्छपः ॥ 68.22 ॥

karmasthānakhilāṁścaiva na viśvasiti kasyacit samastāni yathāṅgāni saṁharatyeva kacchapaḥ

वह अपने सभी कार्य-स्थानों में भी किसी पर विश्वास नहीं करता, जैसे कच्छप अपने सभी अंगों को समेट लेता है।

श्लोक 23 (markandeya.68.23)

तथाविष्टभ्य रत्नानि तिष्ठत्याकुलमानसः । न ददाति न वा भुङ्क्ते तद्विनाशभयाकुलः ॥ 68.23 ॥

tathāviṣṭabhya ratnāni tiṣṭhatyākulamānasaḥ na dadāti na vā bhuṅkte tadvināśabhayākulaḥ

इसी प्रकार वह अपने रत्नों को कसकर पकड़े हुए व्याकुल-चित्त होकर रहता है; उनके नाश के भय से व्याकुल होकर न तो वह दान देता है, न भोगता है।

श्लोक 24 (markandeya.68.24)

निधानमुर्व्यां कुरुते निधिः सोऽप्येकपूरुषः । रजोगुणमयश्चान्यो मुकुन्दो नाम यो निधिः ॥ 68.24 ॥

nidhānamurvyāṁ kurute nidhiḥ so’pyekapūruṣaḥ rajoguṇamayaścānyo mukundo nāma yo nidhiḥ

यह निधि भी पृथ्वी में अपना कोष छिपाकर रखता है, और यह भी एक ही पुरुष के पास रहता है। रजोगुणमय एक अन्य निधि मुकुन्द नाम से है।

श्लोक 25 (markandeya.68.25)

नरोऽवलोकितस्तेन तद्गुणो भवति द्विज । वीणावेणुमृदङ्गानामातोद्यस्य परिग्रहम् ॥ 68.25 ॥

naro’valokitastena tadguṇo bhavati dvija vīṇāveṇumṛdaṅgānāmātodyasya parigraham

हे द्विज! उसके द्वारा देखा गया मनुष्य उसी गुण वाला हो जाता है; वह वीणा, वेणु, मृदंग आदि वाद्ययन्त्रों का संग्रह करता है।

श्लोक 26 (markandeya.68.26)

करोति गायतां वित्तं नृत्यतां च प्रयच्छति । बन्दिमागधसूतानां विटानां लास्यपाठिनाम् ॥ 68.26 ॥

karoti gāyatāṁ vittaṁ nṛtyatāṁ ca prayacchati bandimāgadhasūtānāṁ viṭānāṁ lāsyapāṭhinām

वह गायकों को धन देता है और नर्तकों को भी; तथा भाटों, मागधों, सूतों, विटों और नृत्य-गायन सिखाने वालों को भी।

श्लोक 27 (markandeya.68.27)

ददात्यहर्निशं भोगान्भुङ्क्ते तैश्च समं द्विज । कुलटासु रतिश्चास्य भवत्यन्यैश्च तद्विधैः । प्रयाति सङ्गमेकं च यं निधिर्भजते नरम् ॥ 68.27 ॥

dadātyaharniśaṁ bhogānbhuṅkte taiśca samaṁ dvija kulaṭāsu ratiścāsya bhavatyanyaiśca tadvidhaiḥ prayāti saṅgamekaṁ ca yaṁ nidhirbhajate naram

हे द्विज! वह दिन-रात भोग देता है और उन्हीं के साथ भोगता भी है; उसकी रति अनैतिक स्त्रियों में तथा अन्य वैसे ही लोगों में होती है। यह निधि जिस एक पुरुष का सेवन करती है, केवल उसी के साथ संग को प्राप्त होती है।

श्लोक 28 (markandeya.68.28)

रजस्तमोमयश्चान्यो नन्दो नाम महानिधिः । उपैति स्तम्भमधिकं नरस्तेनावलोकितः ॥ 68.28 ॥

rajastamomayaścānyo nando nāma mahānidhiḥ upaiti stambhamadhikaṁ narastenāvalokitaḥ

रजस्-तमस् से युक्त एक अन्य महानिधि नन्द नाम से है; उसके द्वारा देखा गया मनुष्य अत्यधिक अहंकार को प्राप्त होता है।

श्लोक 29 (markandeya.68.29)

समस्तधातुरत्नानां पुण्यधान्यादिकस्य च । परिग्रहं करोत्येष तथैव क्रयविक्रयम् ॥ 68.29 ॥

samastadhāturatnānāṁ puṇyadhānyādikasya ca parigrahaṁ karotyeṣa tathaiva krayavikrayam

यह सभी धातुओं, रत्नों तथा पवित्र धान्य आदि का संग्रह करता है, और वैसे ही उनका क्रय-विक्रय भी करता है।

श्लोक 30 (markandeya.68.30)

आधारः स्वजनानां च आगताभ्यागतस्य च ॥ 68.30 ॥

ādhāraḥ svajanānāṁ ca āgatābhyāgatasya ca

वह अपने स्वजनों का तथा आए हुए अतिथियों का भी आधार बनता है।

श्लोक 31 (markandeya.68.31)

सहते नापमानोक्तिं स्वल्पमपि महामुने । स्तूयमानश्च महतीं प्रीतिं बध्नाति यच्छति ॥ 68.31 ॥

sahate nāpamānoktiṁ svalpamapi mahāmune stūyamānaśca mahatīṁ prītiṁ badhnāti yacchati

हे महामुने! वह थोड़ा-सा भी अपमानजनक वचन सहन नहीं करता; और स्तुति किए जाने पर वह अत्यन्त प्रसन्न होकर देता है।

श्लोक 32 (markandeya.68.32)

यं यमिच्छति वै कामं मृदुत्वमुपयाति च । बह्व्यो भार्या भवन्त्यस्य सूतिमत्योऽतिशोभनाः ॥ 68.32 ॥

yaṁ yamicchati vai kāmaṁ mṛdutvamupayāti ca bahvyo bhāryā bhavantyasya sūtimatyo’tiśobhanāḥ

जिस-जिस इच्छा को वह चाहता है, वह पूर्ण होती है, और वह कोमल स्वभाव का हो जाता है; उसकी अनेक अत्यन्त सुन्दर तथा सन्तानवती पत्नियाँ होती हैं।

श्लोक 33 (markandeya.68.33)

भजते सप्त च नरान्निधिर्नन्दोऽनुवर्तते । प्रवर्द्धमानोऽथ नरमष्टभागेन सत्तम ॥ 68.33 ॥

bhajate sapta ca narānnidhirnando’nuvartate pravarddhamāno’tha naramaṣṭabhāgena sattama

हे सत्तम! यह निधि नन्द सात पुरुषों तक अनुसरण करती है, और बढ़ते हुए आठवें भाग में मनुष्य को छोड़ देती है।

श्लोक 34 (markandeya.68.34)

दीर्घायुष्ट्वं च सर्वेषां पुरुषाणां प्रयच्छति । बन्धूनामेव भरणं ये च दूरादुपागताः ॥ 68.34 ॥

dīrghāyuṣṭvaṁ ca sarveṣāṁ puruṣāṇāṁ prayacchati bandhūnāmeva bharaṇaṁ ye ca dūrādupāgatāḥ

वह सभी पुरुषों को दीर्घायु प्रदान करता है, तथा दूर से आए हुए बन्धुजनों का भी भरण-पोषण करता है।

श्लोक 35 (markandeya.68.35)

तेषां करोति वै नन्दः परलोके न चादृतः । भवत्यस्य न च स्नेहः सहवासिषु जायते ॥ 68.35 ॥

teṣāṁ karoti vai nandaḥ paraloke na cādṛtaḥ bhavatyasya na ca snehaḥ sahavāsiṣu jāyate

नन्द उनका भरण-पोषण तो करता है, किन्तु परलोक में उसका आदर नहीं होता; और साथ रहने वालों में भी उसका स्नेह उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 36 (markandeya.68.36)

पूर्वमित्रेषु शैथिल्यं प्रीतिमन्यैः करोति च । तथैव सत्त्वरजसी यो बिभर्ति महानिधिः ॥ 68.36 ॥

pūrvamitreṣu śaithilyaṁ prītimanyaiḥ karoti ca tathaiva sattvarajasī yo bibharti mahānidhiḥ

पुराने मित्रों के प्रति उसमें शिथिलता आ जाती है, और वह अन्य लोगों से प्रीति करने लगता है; इसी प्रकार जो महानिधि सत्त्व और रज दोनों को धारण करता है...

श्लोक 37 (markandeya.68.37)

स नीलसंज्ञस्तत्सङ्गी नरस्तच्छीलवान्भवेत् । वस्त्रकार्पासधान्यादिफलपुष्पपरिग्रहम् ॥ 68.37 ॥

sa nīlasaṁjñastatsaṅgī narastacchīlavānbhavet vastrakārpāsadhānyādiphalapuṣpaparigraham

...वह नील नाम से जाना जाता है; उसका संगी मनुष्य उसी स्वभाव वाला हो जाता है, वह वस्त्र, कपास, धान्य, फल तथा पुष्पों का संग्रह करता है।

श्लोक 38 (markandeya.68.38)

मुक्ताविद्रुमशङ्खानां शुक्त्यादीनां तथा मुने । काष्ठादीनां करोत्येष यच्चान्यज्जलसम्भवम् ॥ 68.38 ॥

muktāvidrumaśaṅkhānāṁ śuktyādīnāṁ tathā mune kāṣṭhādīnāṁ karotyeṣa yaccānyajjalasambhavam

हे मुने! वह मोती, मूँगा, शंख, सीप आदि का, तथा काष्ठ आदि का, और जल से उत्पन्न होने वाली अन्य वस्तुओं का भी संग्रह करता है।

श्लोक 39 (markandeya.68.39)

क्रयविक्रयमन्येषां नान्यत्र रमते मनः । तडागान्पुष्करिण्योऽथ तथारामान्करोति च ॥ 68.39 ॥

krayavikrayamanyeṣāṁ nānyatra ramate manaḥ taḍāgānpuṣkariṇyo’tha tathārāmānkaroti ca

उनका ही क्रय-विक्रय करता है, उसका मन अन्यत्र नहीं रमता; वह तालाब, पुष्करिणी तथा उद्यान भी बनवाता है।

श्लोक 40 (markandeya.68.40)

बन्धं च सरितां वृक्षांस्तथारोपयते नरः । अनुलेपनपुष्पादिभोगभुग्वाभिजायते ॥ 68.40 ॥

bandhaṁ ca saritāṁ vṛkṣāṁstathāropayate naraḥ anulepanapuṣpādibhogabhugvābhijāyate

वह नदियों पर बाँध बनाता है, और वृक्ष रोपता है; वह चन्दन-लेप, पुष्प आदि के भोग को भोगने वाला बन जाता है।

श्लोक 41 (markandeya.68.41)

त्रिपौरुषश्चापि निधिर्नीलो नामैष जायते । रजस्तमोमयश्चान्यः शङ्खसंज्ञो हि यो निधिः ॥ 68.41 ॥

tripauruṣaścāpi nidhirnīlo nāmaiṣa jāyate rajastamomayaścānyaḥ śaṅkhasaṁjño hi yo nidhiḥ

यह नील नामक निधि तीन पुरुषों तक बना रहता है। रज और तम से युक्त एक अन्य निधि है, जो शंख नाम से जानी जाती है।

श्लोक 42 (markandeya.68.42)

तेनापि नीयते विप्र तद्गुणित्वं निधीश्वरः । एकस्यैव भवत्येष नरं नान्यमुपैति च ॥ 68.42 ॥

tenāpi nīyate vipra tadguṇitvaṁ nidhīśvaraḥ ekasyaiva bhavatyeṣa naraṁ nānyamupaiti ca

हे विप्र! उसके द्वारा भी निधि का स्वामी उसी गुण को प्राप्त हो जाता है; यह भी केवल एक ही मनुष्य का होता है, दूसरे के पास नहीं जाता।

श्लोक 43 (markandeya.68.43)

यस्य शङ्खो निधिस्तस्य स्वरूपं क्रौष्टुके शृणु । एक एवात्मना सृष्टमन्नं भुङ्क्ते तथाम्बरम् ॥ 68.43 ॥

yasya śaṅkho nidhistasya svarūpaṁ krauṣṭuke śṛṇu eka evātmanā sṛṣṭamannaṁ bhuṅkte tathāmbaram

हे क्रौष्टुकि! जिसके पास शंख निधि होती है, उसका स्वरूप सुनो — वह अकेला ही अपने लिए बनाया गया अन्न खाता है, और वैसे ही वस्त्र पहनता है।

श्लोक 44 (markandeya.68.44)

कदन्नभुक्परिजनो न च शोभनवस्त्रधृक् । न ददाति सुहृद्भार्याभ्रातृपुत्रस्नुषादिषु ॥ 68.44 ॥

kadannabhukparijano na ca śobhanavastradhṛk na dadāti suhṛdbhāryābhrātṛputrasnuṣādiṣu

उसके परिजन घटिया अन्न खाते हैं, और वह स्वयं भी सुन्दर वस्त्र नहीं पहनता; वह अपने मित्रों, पत्नी, भाइयों, पुत्रों तथा पुत्रवधुओं आदि को कुछ नहीं देता।

श्लोक 45 (markandeya.68.45)

स्वपोषणपरः शङ्खी नरो भवति सर्वदा । इत्येते निधयः ख्याता नराणामर्थदेवताः ॥ 68.45 ॥

svapoṣaṇaparaḥ śaṅkhī naro bhavati sarvadā ityete nidhayaḥ khyātā narāṇāmarthadevatāḥ

शंख-निधि से युक्त मनुष्य सदा केवल अपने ही पोषण में तत्पर रहता है। इस प्रकार ये निधियाँ मनुष्यों के लिए धन की अधिष्ठात्री देवताओं के रूप में विख्यात हैं।

श्लोक 46 (markandeya.68.46)

मिश्रावलोकनान्मिश्राः स्वभावफलदायिनः । यथाख्यातस्वभावस्तु भवत्येव विलोकनात् । सर्वेषामाधिपत्ये च श्रीरेषां द्विजपद्मिनी ॥ 68.46 ॥

miśrāvalokanānmiśrāḥ svabhāvaphaladāyinaḥ yathākhyātasvabhāvastu bhavatyeva vilokanāt sarveṣāmādhipatye ca śrīreṣāṁ dvijapadminī

मिश्रित रूप से देखे जाने पर वे मिश्रित फल देने वाले होते हैं, अपने-अपने स्वभाव के अनुसार फल प्रदान करते हुए; जैसा स्वभाव कहा गया है, वह दृष्टि पड़ने मात्र से ही प्रकट होता है। हे द्विज! इन सबके अधिपतित्व में लक्ष्मी और पद्मिनी विद्या ही हैं।

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69