सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 73
औत्तम मन्वन्तर के देवता
श्लोक 1 (markandeya.73.1)
मार्कण्डेय उवाच मन्वन्तरे तृतीयेऽस्मिन् औत्तमस्य प्रजापतेः । देवानिन्द्रमृषीन् भूपान् निबोध गदतो मम ॥ 73.1 ॥
mārkaṇḍeya uvāca manvantare tṛtīye'smin auttamasya prajāpateḥ devānindramṛṣīn bhūpān nibodha gadato mama
मार्कण्डेय ने कहा — इस तीसरे मन्वन्तर में, प्रजापति औत्तम के देवताओं, इन्द्र, ऋषियों और राजाओं को मुझसे सुनो, जो मैं कहता हूँ।
श्लोक 2 (markandeya.73.2)
स्वधामानस्तथा देवा यथानामानुकारिणः । सत्याख्यश्च द्वितीयोऽन्यस्त्रिदशानां तथा गणः ॥ 73.2 ॥
svadhāmānastathā devā yathānāmānukāriṇaḥ satyākhyaśca dvitīyo'nyastridaśānāṁ tathā gaṇaḥ
स्वधामा नामक देवगण थे, जो अपने नाम के अनुरूप ही थे; और दूसरा गण सत्य नामक था, हे त्रिदशों के [ज्ञाता]।
श्लोक 3 (markandeya.73.3)
तृतीये तु गणे देवाः शिवाख्या मुनिसत्तम । शिवाः स्वरूपतस्ते तु श्रुताः पापप्रणाशनाः ॥ 73.3 ॥
tṛtīye tu gaṇe devāḥ śivākhyā munisattama śivāḥ svarūpataste tu śrutāḥ pāpapraṇāśanāḥ
हे मुनिसत्तम! तीसरे गण में शिव नामक देवता थे; वे स्वयं शिव-स्वरूप होने के कारण पापनाशक कहलाते हैं, ऐसा सुना गया है।
श्लोक 4 (markandeya.73.4)
प्रतर्दनाख्यश्च गणो देवानां मुनिसत्तम । चतुर्थस्तत्र कथित औत्तमस्यान्तरे मनोः ॥ 73.4 ॥
pratardanākhyaśca gaṇo devānāṁ munisattama caturthastatra kathita auttamasyāntare manoḥ
हे मुनिसत्तम! प्रतर्दन नामक चौथा देवगण, औत्तम मनु के इस अन्तर में, वहाँ कहा गया है।
श्लोक 5 (markandeya.73.5)
वशवर्तिनः पञ्चमेऽपि देवास्तत्र गणे द्विज । यथाख्यातस्वरूपास्तु सर्व एव महामुने ॥ 73.5 ॥
vaśavartinaḥ pañcame'pi devāstatra gaṇe dvija yathākhyātasvarūpāstu sarva eva mahāmune
हे द्विज! पाँचवें गण में भी वशवर्ती नामक देवता थे, हे महामुने, जो सभी अपने ज्ञात स्वरूप वाले ही थे।
श्लोक 6 (markandeya.73.6)
एते देवगणाः पञ्च स्मृता यज्ञभुजस्तथा । मन्वन्तरे मनुश्रेष्ठे सर्वे द्वादशका गणाः ॥ 73.6 ॥
ete devagaṇāḥ pañca smṛtā yajñabhujastathā manvantare manuśreṣṭhe sarve dvādaśakā gaṇāḥ
ये पाँचों देवगण, यज्ञभुक् नाम से स्मृत हैं; उस मनुश्रेष्ठ के मन्वन्तर में वे सभी बारह-बारह की संख्या में थे।
श्लोक 7 (markandeya.73.7)
तेषामिन्द्रो महाभागस्त्रैलोक्ये स गुरुर्भवेत् । शतं क्रतूनामाहृत्य सुशान्तिर्नाम नामतः ॥ 73.7 ॥
teṣāmindro mahābhāgastrailokye sa gururbhavet śataṁ kratūnāmāhṛtya suśāntirnāma nāmataḥ
उनके इन्द्र, महाभाग्यशाली, त्रिलोक के गुरु हुए; सौ यज्ञ सम्पन्न करके वे 'सुशान्ति' नाम से प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 8 (markandeya.73.8)
यस्योपसर्गनाशाय नामाक्षरविभूषिता । अद्यापि मानवैर्गाथा गीयते तु महीतले ॥ 73.8 ॥
yasyopasarganāśāya nāmākṣaravibhūṣitā adyāpi mānavairgāthā gīyate tu mahītale
जिनके नाम के अक्षरों से अलंकृत गाथा, उपद्रव के नाश के लिए, आज भी मनुष्यों द्वारा इस पृथ्वी पर गाई जाती है।
श्लोक 9 (markandeya.73.9)
शुशान्तिर्देवराट् कान्तः शुशान्तिं स प्रयच्छति । सहितः शिवसत्याद्यैस्तथैव वशवर्तिभिः ॥ 73.9 ॥
śuśāntirdevarāṭ kāntaḥ śuśāntiṁ sa prayacchati sahitaḥ śivasatyādyaistathaiva vaśavartibhiḥ
वह सुशान्ति, देवताओं का सुन्दर राजा, शान्ति प्रदान करता है, शिव, सत्य आदि तथा वशवर्ती देवताओं के साथ मिलकर।
श्लोक 10 (markandeya.73.10)
अजः परशुचिर्दिव्यो महाबलपराक्रमः । पुत्रस्तस्य मनोरासन् विख्यातास्त्रिदशोपमाः ॥ 73.10 ॥
ajaḥ paraśucirdivyo mahābalaparākramaḥ putrastasya manorāsan vikhyātāstridaśopamāḥ
अज, परमशुचि, दिव्य, महाबलपराक्रमी — उस मनु के पुत्र देवताओं के समान विख्यात हुए।
श्लोक 11 (markandeya.73.11)
तत्सूतिसम्भवैर्भूमिः पालिताभून्नरेश्वरैः । यावन्मन्वन्तर तस्य मनोरुत्तमतेजसः ॥ 73.11 ॥
tatsūtisambhavairbhūmiḥ pālitābhūnnareśvaraiḥ yāvanmanvantara tasya manoruttamatejasaḥ
उन्हीं की सन्तान से उत्पन्न राजाओं द्वारा पृथ्वी का पालन होता रहा, जब तक उस अत्यन्त तेजस्वी मनु का मन्वन्तर रहा।
श्लोक 12 (markandeya.73.12)
चतुर्युगानां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः । कृतत्रेतादिसंज्ञानां यान्युक्तानि युगे मया ॥ 73.12 ॥
caturyugānāṁ saṁkhyātā sādhikā hyekasaptatiḥ kṛtatretādisaṁjñānāṁ yānyuktāni yuge mayā
जो कृत, त्रेता आदि युगों का प्रमाण मैंने युग-वर्णन में बताया है, उन चतुर्युगों की संख्या इकहत्तर से कुछ अधिक होती है।
श्लोक 13 (markandeya.73.13)
स्वतेजसा हि तपसो वरिष्ठस्य महात्मनः । तनयाश्चान्तरे तस्मिन् सप्त सप्तर्षयोऽभवन् ॥ 73.13 ॥
svatejasā hi tapaso variṣṭhasya mahātmanaḥ tanayāścāntare tasmin sapta saptarṣayo'bhavan
उस तपस्या में श्रेष्ठ महात्मा के अपने ही तेज से, उस अन्तर में सात पुत्र सप्तर्षि हुए।
श्लोक 14 (markandeya.73.14)
तृतीयमेतत्कथितं तव मन्वन्तरं मया । तामसस्य चतुर्थन्तु मनोरन्तरमुच्यते ॥ 73.14 ॥
tṛtīyametatkathitaṁ tava manvantaraṁ mayā tāmasasya caturthantu manorantaramucyate
यह तुम्हें मेरे द्वारा कहा गया तीसरा मन्वन्तर है; अब चौथा मन्वन्तर, तामस मनु का, कहा जाता है।
श्लोक 15 (markandeya.73.15)
वियोनिजन्मनो यस्य यशसा द्योतितं जगत् । जन्म तस्य मनोर्ब्रह्मन् ! श्रुयतां गदतो मम ॥ 73.15 ॥
viyonijanmano yasya yaśasā dyotitaṁ jagat janma tasya manorbrahman ! śruyatāṁ gadato mama
जिसका जन्म गर्भ से न होकर भी अपनी कीर्ति से जगत् को प्रकाशित करने वाला था — हे ब्रह्मन्! उस मनु का जन्म, जो मैं कहता हूँ, सुनो।
श्लोक 16 (markandeya.73.16)
अतीन्द्रियमशेषाणां मनूनाञ्चरितन्तथा । तथा जन्मापि विज्ञेयं प्रभावश्च महात्मनाम् ॥ 73.16 ॥
atīndriyamaśeṣāṇāṁ manūnāñcaritantathā tathā janmāpi vijñeyaṁ prabhāvaśca mahātmanām
सभी मनुओं का चरित्र इन्द्रियों की पहुँच से परे है, और वैसे ही उनका जन्म भी; महात्माओं के इस प्रभाव को जान लेना चाहिए।