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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 8

हरिश्चन्द्र-उपाख्यान

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (markandeya.8.1)

जैमिनिरुवाच । भवद्भिरिदमाख्यातं यथाप्रश्नमनुक्रमात् । महत् कौतूहलं मेऽस्ति हरिश्चन्द्र कथां प्रति ॥ 8.1 ॥

jaiminiruvāca / bhavadbhiridamākhyātaṃ yathāpraśnamanukramāt / mahat kautūhalaṃ me 'sti hariścandra kathāṃ prati // 8.1 //

जैमिनि ने कहा — आप लोगों ने प्रश्नानुक्रम से यह सब कह दिया। किन्तु मुझे हरिश्चन्द्र की कथा के विषय में बड़ी उत्सुकता है।

श्लोक 2 (markandeya.8.2)

अहो महात्मना तेन प्राप्तं कृच्छ्रमनुत्तमम् । कच्चित् सुखमनुप्राप्तं तादृगेव द्विजोत्तमाः ॥ 8.2 ॥

aho mahātmanā tena prāptaṃ kṛcchramanuttamam / kaccit sukhamanuprāptaṃ tādṛgeva dvijottamāḥ // 8.2 //

अहो, उस महात्मा ने कैसा अनुपम कष्ट सहा! हे द्विजोत्तमो, क्या उसे उतना ही महान सुख भी प्राप्त हुआ?

श्लोक 3 (markandeya.8.3)

पक्षिण ऊचुः । विश्वामित्रवचः श्रुत्वा स राजा प्रययौ शनैः । शैव्ययानुगतो दुः खी भार्यया बलापुत्रया ॥ 8.3 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / viśvāmitravacaḥ śrutvā sa rājā prayayau śanaiḥ / śaivyayānugato duḥ khī bhāryayā balāputrayā // 8.3 //

पक्षियों ने कहा — विश्वामित्र के वचन सुनकर वह राजा धीरे-धीरे चल पड़े, दुःखी, अपनी पत्नी शैव्या और छोटे पुत्र सहित।

श्लोक 4 (markandeya.8.4)

स गत्वा वसुधापालो दिव्यां वाराणसीं पुरीम् । नैषा मनुष्यभोग्येति शूलपाणेः परिग्रहः ॥ 8.4 ॥

sa gatvā vasudhāpālo divyāṃ vārāṇasīṃ purīm / naiṣā manuṣyabhogyeti śūlapāṇeḥ parigrahaḥ // 8.4 //

वह पृथ्वीपाल दिव्य वाराणसी नगरी में गये — यह नगरी मनुष्यों के भोग के लिए नहीं है, यह तो शूलपाणि शिव की ही सम्पत्ति है।

श्लोक 5 (markandeya.8.5)

जगाम पद्भ्यां दुः खार्तः सह पत्न्यानुकूलया । पुरीप्रवेशे ददृशे विश्वामित्रमुपस्थितम् ॥ 8.5 ॥

jagāma padbhyāṃ duḥ khārtaḥ saha patnyānukūlayā / purīpraveśe dadṛśe viśvāmitramupasthitam // 8.5 //

दुःख से पीड़ित वे अपनी अनुकूल पत्नी सहित पैदल ही चले; और नगर में प्रवेश करते ही उन्होंने विश्वामित्र को वहाँ उपस्थित देखा।

श्लोक 6 (markandeya.8.6)

तं दृष्ट्वा समनुप्राप्तं विनयावनतोऽभवत् । प्राह चैवाञ्जलिं कृत्वा हरिश्चन्द्रो महामुनिम् ॥ 8.6 ॥

taṃ dṛṣṭvā samanuprāptaṃ vinayāvanato 'bhavat / prāha caivāñjaliṃ kṛtvā hariścandro mahāmunim // 8.6 //

उन्हें आया देखकर हरिश्चन्द्र विनयपूर्वक झुक गये, और हाथ जोड़कर उस महामुनि से बोले —

श्लोक 7 (markandeya.8.7)

इमे प्राणाः सुतश्चायमियं पत्नी मुने ! मम । येन ते कृत्यमस्त्याशु तद्गृहाणार्घ्यमुत्तमम् ॥ 8.7 ॥

ime prāṇāḥ sutaścāyamiyaṃ patnī mune ! mama / yena te kṛtyamastyāśu tadgṛhāṇārghyamuttamam // 8.7 //

'हे मुने, यह मेरा प्राण है, यह पुत्र है, यह मेरी पत्नी है — जिसकी भी आपको तुरन्त आवश्यकता हो, उसे इस उत्तम अर्घ्य के रूप में ग्रहण कीजिए।'

श्लोक 8 (markandeya.8.8)

यद्वान्यत् कार्यमस्माभिस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ 8.8 ॥

yadvānyat kāryamasmābhistadanujñātumarhasi // 8.8 //

'अथवा हमसे जो भी अन्य कार्य कराना हो, उसकी आज्ञा दीजिए।'

श्लोक 9 (markandeya.8.9)

विश्वामित्र उवाच । पूर्णः स मासो राजर्षे दीयतां मम दक्षिणा । राजसूयनिमित्तं हि स्मर्यते स्ववचो यदि ॥ 8.9 ॥

viśvāmitra uvāca / pūrṇaḥ sa māso rājarṣe dīyatāṃ mama dakṣiṇā / rājasūyanimittaṃ hi smaryate svavaco yadi // 8.9 //

विश्वामित्र ने कहा — 'हे राजर्षे, वह मास अब पूरा हो चुका है, मुझे मेरी दक्षिणा दीजिए — यदि राजसूय के निमित्त अपना वचन आपको स्मरण हो।'

श्लोक 10 (markandeya.8.10)

हरिश्चन्द्र उवाच । ब्राह्मन्नद्यैव सम्पूर्णो मासोऽम्लानतपोधन । तिष्ठत्येतद् दनार्धं यत्तत् प्रतीक्षस्व माचिरम् ॥ 8.10 ॥

hariścandra uvāca / brāhmannadyaiva sampūrṇo māso 'mlānatapodhana / tiṣṭhatyetad danārdhaṃ yattat pratīkṣasva māciram // 8.10 //

हरिश्चन्द्र ने कहा — 'हे अक्षीण-तपोधन ब्राह्मण, आज ही मास पूर्ण हुआ है; इस दिन का आधा भाग अभी शेष है, उतनी देर बिना विलम्ब की प्रतीक्षा कीजिए।'

श्लोक 11 (markandeya.8.11)

विश्वामित्र उवाच । एवमस्तु महाराज आगमिष्याम्यहं पुनः । शापं तव प्रदास्यामि न चेदद्य प्रदास्यसि ॥ 8.11 ॥

viśvāmitra uvāca / evamastu mahārāja āgamiṣyāmyahaṃ punaḥ / śāpaṃ tava pradāsyāmi na cedadya pradāsyasi // 8.11 //

विश्वामित्र ने कहा — 'ऐसा ही हो, महाराज, मैं फिर आऊँगा। यदि आज न दोगे तो मैं तुम्हें शाप दे दूँगा।'

श्लोक 12 (markandeya.8.12)

पक्षिण ऊचुः । इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो राजा चाचिन्तयत् तदा । कथमस्मै प्रदास्यामि दक्षिणा या प्रतिश्रुता ॥ 8.12 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / ityuktvā prayayau vipro rājā cācintayat tadā / kathamasmai pradāsyāmi dakṣiṇā yā pratiśrutā // 8.12 //

पक्षियों ने कहा — ऐसा कहकर वह ब्राह्मण चले गये, और राजा तब यह सोचने लगे — 'मैं इन्हें वह प्रतिज्ञात दक्षिणा कैसे दूँ?'

श्लोक 13 (markandeya.8.13)

कुतः पुष्टानि मित्राणि कुतोर्ऽथः साम्प्रतं मम । प्रतिग्रहः प्रदुष्टो मे नाहं यायामधः कथम् ॥ 8.13 ॥

kutaḥ puṣṭāni mitrāṇi kutor'thaḥ sāmprataṃ mama / pratigrahaḥ praduṣṭo me nāhaṃ yāyāmadhaḥ katham // 8.13 //

'अब मेरे समृद्ध मित्र कहाँ हैं, अब मेरा धन कहाँ है? मेरा स्वीकार किया हुआ दान दूषित हो चुका है — मैं किस प्रकार अधोगति से बचूँ?'

श्लोक 14 (markandeya.8.14)

किमु प्राणान् विमुञ्चामि कां दिशं याम्यकिञ्चनः । यदि नाशं गमिष्यामि अप्रदाय प्रतिश्रुतम् ॥ 8.14 ॥

kimu prāṇān vimuñcāmi kāṃ diśaṃ yāmyakiñcanaḥ / yadi nāśaṃ gamiṣyāmi apradāya pratiśrutam // 8.14 //

'क्या मैं प्राण त्याग दूँ? किस दिशा में जाऊँ, कुछ भी न होते हुए? क्योंकि प्रतिज्ञात वस्तु दिए बिना तो मैं नाश को ही प्राप्त होऊँगा।'

श्लोक 15 (markandeya.8.15)

ब्रह्मस्वहृत्कृमिः पापो भविष्याम्यधमाधमः । अथवा प्रेष्यतां यास्ये वरमेवात्मविक्रयः ॥ 8.15 ॥

brahmasvahṛtkṛmiḥ pāpo bhaviṣyāmyadhamādhamaḥ / athavā preṣyatāṃ yāsye varamevātmavikrayaḥ // 8.15 //

'मैं ब्रह्मस्व चुराने वाला पापी, नीचों में भी नीच कीड़ा बन जाऊँगा। इससे तो अच्छा है कि मैं दासता को प्राप्त हो जाऊँ — आत्म-विक्रय ही श्रेष्ठ है।'

श्लोक 16 (markandeya.8.16)

पक्षिण ऊचुः । राजानं व्याकुलं दीनं चिन्तयानमधोमुखम् । प्रत्युवाच तदा पत्नी बाष्पगद्गदया गिरा ॥ 8.16 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / rājānaṃ vyākulaṃ dīnaṃ cintayānamadhomukham / pratyuvāca tadā patnī bāṣpagadgadayā girā // 8.16 //

पक्षियों ने कहा — राजा को इस प्रकार व्याकुल, दीन, सिर झुकाए हुए चिन्तामग्न देखकर उनकी पत्नी ने आँसुओं से रुँधे स्वर में उत्तर दिया —

श्लोक 17 (markandeya.8.17)

त्यज चिन्तां महारजा स्वसत्यमनुपालय । श्मशानवद् वर्जनीयो नरः सत्यबहिष्कृतः ॥ 8.17 ॥

tyaja cintāṃ mahārajā svasatyamanupālaya / śmaśānavad varjanīyo naraḥ satyabahiṣkṛtaḥ // 8.17 //

'हे महाराज, चिन्ता त्याग दीजिए, अपने सत्य का पालन कीजिए। सत्य से रहित पुरुष श्मशान के समान त्याज्य होता है।'

श्लोक 18 (markandeya.8.18)

नातः परतरं धर्मं वदन्ति पुरुषस्य तु । यादृशं पुरुषव्याघ्र स्वसत्यपरिपालनम् ॥ 8.18 ॥

nātaḥ parataraṃ dharmaṃ vadanti puruṣasya tu / yādṛśaṃ puruṣavyāghra svasatyaparipālanam // 8.18 //

'हे पुरुषव्याघ्र, वे कहते हैं कि पुरुष के लिए इससे बढ़कर कोई धर्म नहीं — जितना कि अपने सत्य का पालन करना।'

श्लोक 19 (markandeya.8.19)

अग्निहोत्रमधीतं वा दानाद्याश्चाखिलाः क्रियाः । भजन्ते तस्य वैफल्यं यस्य वाक्यमकारणम् ॥ 8.19 ॥

agnihotramadhītaṃ vā dānādyāścākhilāḥ kriyāḥ / bhajante tasya vaiphalyaṃ yasya vākyamakāraṇam // 8.19 //

'अग्निहोत्र, वेदाध्ययन, तथा दान आदि समस्त क्रियाएँ, जिसका वचन निरर्थक होता है, उसके लिए निष्फल हो जाती हैं।'

श्लोक 20 (markandeya.8.20)

सत्यमत्यन्तमुदितं धर्मशास्त्रेषु धीमताम् । तारणायानृतं तद्वत् पातनायाकृतात्मनाम् ॥ 8.20 ॥

satyamatyantamuditaṃ dharmaśāstreṣu dhīmatām / tāraṇāyānṛtaṃ tadvat pātanāyākṛtātmanām // 8.20 //

'धर्मशास्त्रों में बुद्धिमानों के लिए सत्य को तारने वाला बताया गया है; वैसे ही असत्य को अस्थिर-चित्त लोगों के पतन का कारण।'

श्लोक 21 (markandeya.8.21)

सप्ताश्वमेधानाहृत्य राजसूयं च पार्थिवः । कृतिर्नाम च्युतः स्वर्गादसत्यवचनात् सकृत् ॥ 8.21 ॥

saptāśvamedhānāhṛtya rājasūyaṃ ca pārthivaḥ / kṛtirnāma cyutaḥ svargādasatyavacanāt sakṛt // 8.21 //

'सात अश्वमेध और राजसूय यज्ञ करने वाला कृति नामक राजा भी एक ही असत्य वचन से स्वर्ग से च्युत हो गया था।'

श्लोक 22 (markandeya.8.22)

राजन् जातमपत्यं मे इत्युक्त्वा प्ररुरोद ह । बाष्पाम्बुप्लुतनेत्रान्तामुवाचेदं महीपतिः ॥ 8.22 ॥

rājan jātamapatyaṃ me ityuktvā praruroda ha / bāṣpāmbuplutanetrāntāmuvācedaṃ mahīpatiḥ // 8.22 //

'हे राजन्, मुझे सन्तान हुई है' — ऐसा कहकर वह रो पड़ीं। उनकी आँखों को आँसुओं से भरा देखकर राजा ने यह कहा —

श्लोक 23 (markandeya.8.23)

हरिश्चन्द्र उवाच । विमुञ्च भद्रे सन्तापमयं तिष्ठति बालकः । उच्यतां वक्तुकामासि यद्वा त्वं गजगामिनि ॥ 8.23 ॥

hariścandra uvāca / vimuñca bhadre santāpamayaṃ tiṣṭhati bālakaḥ / ucyatāṃ vaktukāmāsi yadvā tvaṃ gajagāmini // 8.23 //

हरिश्चन्द्र ने कहा — 'हे भद्रे, संताप त्याग दो, बालक तो यहीं है। हे गजगामिनी, जो कुछ भी कहना चाहती हो, वह कह दो।'

श्लोक 24 (markandeya.8.24)

पत्न्युवाच । राजन् जातमपत्यं मे सतां पुत्रफलाः स्त्रियः । स मां प्रदाय वित्तेन देहि विप्राय दक्षिणाम् ॥ 8.24 ॥

patnyuvāca / rājan jātamapatyaṃ me satāṃ putraphalāḥ striyaḥ / sa māṃ pradāya vittena dehi viprāya dakṣiṇām // 8.24 //

पत्नी ने कहा — 'हे राजन्, मुझे सन्तान हुई है — सज्जन स्त्रियों का फल पुत्र ही होता है। मुझे इस बालक सहित बेचकर वह धन ब्राह्मण को दक्षिणा में दे दीजिए।'

श्लोक 25 (markandeya.8.25)

पक्षिण ऊचुः । एतद्वाक्यमुपश्रुत्य ययौ मोहं महीपतिः । प्रतिलभ्य च संज्ञां स विललापातिदुः खितः ॥ 8.25 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / etadvākyamupaśrutya yayau mohaṃ mahīpatiḥ / pratilabhya ca saṃjñāṃ sa vilalāpātiduḥ khitaḥ // 8.25 //

पक्षियों ने कहा — यह वचन सुनकर राजा मूर्च्छित हो गये, और चेत पाकर अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे।

श्लोक 26 (markandeya.8.26)

महद्दुः खमिदं भद्रे यत् त्वमेवं ब्रवीषि माम् । किं तव स्मितसंलापा मम पापस्य विस्मृताः ॥ 8.26 ॥

mahadduḥ khamidaṃ bhadre yat tvamevaṃ bravīṣi mām / kiṃ tava smitasaṃlāpā mama pāpasya vismṛtāḥ // 8.26 //

'हे भद्रे, यह बड़ा दुःख है कि तुम मुझसे ऐसा कहती हो। क्या तुम्हें मेरी पापिष्ठता की मुस्कुराती हुई बातें भूल गयीं?'

श्लोक 27 (markandeya.8.27)

हा हा कथं त्वया शक्यं वक्तुमेतत् शुचिस्मिते । दुर्वाच्यमेतद्वचनं कर्तुं शक्नोम्यहं कथम् ॥ 8.27 ॥

hā hā kathaṃ tvayā śakyaṃ vaktumetat śucismite / durvācyametadvacanaṃ kartuṃ śaknomyahaṃ katham // 8.27 //

'हाय हाय, हे शुचिस्मिते, तुम यह कैसे कह सकीं? यह दुर्वचन मैं स्वयं कैसे कहूँगा, कैसे करूँगा?'

श्लोक 28 (markandeya.8.28)

इत्युक्त्वा स नरश्रेष्ठो धिग्धिगित्यसकृद् ब्रुवन् । निपपात महीपृष्ठे मूर्च्छयाभिपरिप्लुतः ॥ 8.28 ॥

ityuktvā sa naraśreṣṭho dhigdhigityasakṛd bruvan / nipapāta mahīpṛṣṭhe mūrcchayābhipariplutaḥ // 8.28 //

ऐसा कहकर वह नरश्रेष्ठ 'धिक्कार है, धिक्कार है' बारंबार कहते हुए मूर्च्छा से आच्छन्न होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 29 (markandeya.8.29)

शयानं भुवि तं दृष्ट्वा हरिश्चन्द्रं महीपतिम् । उवाचेदं सकरुणं राजपत्नी सुदुः खिता ॥ 8.29 ॥

śayānaṃ bhuvi taṃ dṛṣṭvā hariścandraṃ mahīpatim / uvācedaṃ sakaruṇaṃ rājapatnī suduḥ khitā // 8.29 //

भूमि पर पड़े हुए राजा हरिश्चन्द्र को देखकर अत्यन्त दुःखी राजपत्नी ने करुणापूर्वक यह कहा —

श्लोक 30 (markandeya.8.30)

पत्न्युवाच । हा महारजा कस्येदमपध्यानमुपस्थितम् । यत् त्वं निपतितो भूमौ राङ्कवास्तरणोचितः ॥ 8.30 ॥

patnyuvāca / hā mahārajā kasyedamapadhyānamupasthitam / yat tvaṃ nipatito bhūmau rāṅkavāstaraṇocitaḥ // 8.30 //

पत्नी ने कहा — 'हाय महाराज, यह किसका अशुभ विचार आ पहुँचा, कि आप, जो मृगचर्म-शय्या के योग्य थे, आज भूमि पर गिरे पड़े हैं?'

श्लोक 31 (markandeya.8.31)

येन कोट्यग्रगोवित्तं विप्राणामपवर्जितम् । स एष पृथिवीनाथो भूमौ स्वपिति मे पतिः ॥ 8.31 ॥

yena koṭyagragovittaṃ viprāṇāmapavarjitam / sa eṣa pṛthivīnātho bhūmau svapiti me patiḥ // 8.31 //

'जिसने करोड़ों गौएँ और धन ब्राह्मणों को दान में दिए, वही पृथ्वी के स्वामी, मेरे पति, आज भूमि पर सो रहे हैं।'

श्लोक 32 (markandeya.8.32)

हा कष्टं किं तवानेन कृतं देव ! महीक्षिता । यदिन्द्रोपेन्द्रतुल्योऽयं नीतः प्रस्वापनीं दशाम् ॥ 8.32 ॥

hā kaṣṭaṃ kiṃ tavānena kṛtaṃ deva ! mahīkṣitā / yadindropendratulyo 'yaṃ nītaḥ prasvāpanīṃ daśām // 8.32 //

'हाय कष्ट! हे देव, इस राजा ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, कि इन्द्र-उपेन्द्र के समान इन्हें इस मूर्च्छित अवस्था में ला दिया गया?'

श्लोक 33 (markandeya.8.33)

इत्युक्त्वा सापि सुश्रोणी मूर्च्छिता निपपात ह । भर्तृदुः खमहाभारेणासह्येन निपीडिता ॥ 8.33 ॥

ityuktvā sāpi suśroṇī mūrcchitā nipapāta ha / bhartṛduḥ khamahābhāreṇāsahyena nipīḍitā // 8.33 //

ऐसा कहकर वह सुन्दरी भी अपने पति के दुःख के असह्य महाभार से पीड़ित होकर मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं।

श्लोक 34 (markandeya.8.34)

तौ तथा पतितौ भूमावनाथौ पितरौ शिशुः । दृष्ट्वात्यन्तं क्षुधाविष्टः प्राह वाक्यं सुदुः खितः ॥ 8.34 ॥

tau tathā patitau bhūmāvanāthau pitarau śiśuḥ / dṛṣṭvātyantaṃ kṣudhāviṣṭaḥ prāha vākyaṃ suduḥ khitaḥ // 8.34 //

अपने माता-पिता को इस प्रकार असहाय भूमि पर पड़ा देखकर वह शिशु, अत्यन्त भूख से पीड़ित होकर, दुःखी होकर यह बोला —

श्लोक 35 (markandeya.8.35)

तात तात ! ददस्वान्नमम्बाम्ब ! भोजनं दद । क्षुन्मे बलवती जाता जिह्वाग्रं शुष्यते तथा ॥ 8.35 ॥

tāta tāta ! dadasvānnamambāmba ! bhojanaṃ dada / kṣunme balavatī jātā jihvāgraṃ śuṣyate tathā // 8.35 //

'तात, तात, मुझे अन्न दो! अम्ब, अम्ब, मुझे भोजन दो! मुझे तीव्र भूख लग रही है, मेरी जिह्वा का अग्रभाग भी सूख रहा है।'

श्लोक 36 (markandeya.8.36)

पक्षिण ऊचुः । एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो विश्वामित्रो महातपाः । दृष्ट्वा तु तं हरिश्चन्द्रं पतितं भुवि मूर्च्छितम् ॥ 8.36 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / etasminnantare prāpto viśvāmitro mahātapāḥ / dṛṣṭvā tu taṃ hariścandraṃ patitaṃ bhuvi mūrcchitam // 8.36 //

पक्षियों ने कहा — इसी बीच महातपस्वी विश्वामित्र वहाँ आ पहुँचे, और हरिश्चन्द्र को भूमि पर मूर्च्छित पड़ा देखकर —

श्लोक 37 (markandeya.8.37)

स वारिणा समभ्युक्ष्य राजानमिदमब्रवीत् । उत्तिष्ठोतिष्ठ राजेन्द्र तां ददस्वेष्टदक्षिणाम् ॥ 8.37 ॥

sa vāriṇā samabhyukṣya rājānamidamabravīt / uttiṣṭhotiṣṭha rājendra tāṃ dadasveṣṭadakṣiṇām // 8.37 //

— उन्होंने जल छिड़ककर राजा से यह कहा — 'उठो, उठो, हे राजेन्द्र, वह अभीष्ट दक्षिणा मुझे दो।'

श्लोक 38 (markandeya.8.38)

ऋणं धारयतो दुः खमहन्यहनि वर्धन्ते । आप्याय्यमानः स तदा हिमशीतेन वारिणा ॥ 8.38 ॥

ṛṇaṃ dhārayato duḥ khamahanyahani vardhante / āpyāyyamānaḥ sa tadā himaśītena vāriṇā // 8.38 //

'ऋण को धारण करने वाले का दुःख दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है।' तब उस बर्फ-सी शीतल जल से पुनः चेतना पाकर,

श्लोक 39 (markandeya.8.39)

अवाप्य चेतनां राजा विश्वामित्रमवेक्ष्य च । पुनर्मोहं समापेदे स च क्रोधं ययौ मुनिः ॥ 8.39 ॥

avāpya cetanāṃ rājā viśvāmitramavekṣya ca / punarmohaṃ samāpede sa ca krodhaṃ yayau muniḥ // 8.39 //

राजा ने चेत पाया, किन्तु विश्वामित्र को देखते ही वे पुनः मूर्च्छित हो गये; और वह मुनि क्रोधित हो उठे।

श्लोक 40 (markandeya.8.40)

स समाश्वास्य राजानं वाक्यमाह द्विजोत्तमः । दीयतां दक्षिणा सा मे यदि धर्ममवेक्षसे ॥ 8.40 ॥

sa samāśvāsya rājānaṃ vākyamāha dvijottamaḥ / dīyatāṃ dakṣiṇā sā me yadi dharmamavekṣase // 8.40 //

उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने राजा को समझाकर यह वचन कहा — 'यदि तुम धर्म का ध्यान रखते हो, तो मुझे वह दक्षिणा दो।'

श्लोक 41 (markandeya.8.41)

सत्येनार्कः प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी । सत्यं चोक्तं परो धर्मः स्वर्गः सत्ये प्रतिष्ठितः ॥ 8.41 ॥

satyenārkaḥ pratapati satye tiṣṭhati medinī / satyaṃ coktaṃ paro dharmaḥ svargaḥ satye pratiṣṭhitaḥ // 8.41 //

'सत्य से ही सूर्य तपता है, सत्य से ही पृथ्वी टिकी है, सत्य ही परम धर्म कहा गया है, स्वर्ग सत्य में ही प्रतिष्ठित है।'

श्लोक 42 (markandeya.8.42)

अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥ 8.42 ॥

aśvamedhasahasraṃ ca satyaṃ ca tulayā dhṛtam / aśvamedhasahasrāddhi satyameva viśiṣyate // 8.42 //

'एक ओर हजार अश्वमेध और दूसरी ओर सत्य को तराजू पर तौला गया — तो हजार अश्वमेधों से भी सत्य ही श्रेष्ठ सिद्ध हुआ।'

श्लोक 43 (markandeya.8.43)

अथवा किं ममैतेन साम्ना प्रोक्तेन कारणम् । अनार्त्ये पापसङ्कल्पे क्रूरे चानृतवादिनि ॥ 8.43 ॥

athavā kiṃ mamaitena sāmnā proktena kāraṇam / anārtye pāpasaṅkalpe krūre cānṛtavādini // 8.43 //

'अथवा इस मधुर वाणी से मुझे क्या प्रयोजन, जब तू आनन्दहीन, पापी संकल्प वाला, क्रूर और असत्यवादी है —'

श्लोक 44 (markandeya.8.44)

त्वयि राज्ञि प्रभवति सद्भावः श्रूयतामयम् । अद्य मे दक्षिणां राजन् न दास्यति भवान् यदि ॥ 8.44 ॥

tvayi rājñi prabhavati sadbhāvaḥ śrūyatāmayam / adya me dakṣiṇāṃ rājan na dāsyati bhavān yadi // 8.44 //

'— जब तुझ राजा में भी सद्भाव नहीं रहा? यह सुन लो: हे राजन्, यदि आज तू मुझे दक्षिणा नहीं देगा —'

श्लोक 45 (markandeya.8.45)

अस्ताचलं प्रयातेर्ऽके शप्स्यामि त्वां ततो ध्रुवम् । इत्युक्त्वा स ययौ विप्रो राजा चासीद्भयातुरः ॥ 8.45 ॥

astācalaṃ prayāter'ke śapsyāmi tvāṃ tato dhruvam / ityuktvā sa yayau vipro rājā cāsīdbhayāturaḥ // 8.45 //

'— तो सूर्य के अस्ताचल जाते ही मैं निश्चय ही तुझे शाप दे दूँगा।' ऐसा कहकर वह ब्राह्मण चले गये, और राजा भय से आतुर हो उठे।

श्लोक 46 (markandeya.8.46)

कान्दिग्भूतोऽधमो निः स्वो नृशंसधनिनार्दितः । भार्यास्य भूयः प्राहेदं क्रियतां वचनं मम ॥ 8.46 ॥

kāndigbhūto 'dhamo niḥ svo nṛśaṃsadhaninārditaḥ / bhāryāsya bhūyaḥ prāhedaṃ kriyatāṃ vacanaṃ mama // 8.46 //

व्याकुल, नीच, निर्धन, उस निष्ठुर धनी से पीड़ित राजा से उनकी पत्नी ने फिर कहा — 'मेरी बात मान लीजिए।'

श्लोक 47 (markandeya.8.47)

मा शापानलनिर्दग्धः पञ्चत्वमुपयास्यसि । स तथा चोद्यमानस्तु राजा पत्न्या पुनः पुनः ॥ 8.47 ॥

mā śāpānalanirdagdhaḥ pañcatvamupayāsyasi / sa tathā codyamānastu rājā patnyā punaḥ punaḥ // 8.47 //

'ऐसा न हो कि शाप की अग्नि से जलकर आप मृत्यु को प्राप्त हों' — इस प्रकार पत्नी द्वारा बारंबार प्रेरित किए जाने पर राजा ने —

श्लोक 48 (markandeya.8.48)

प्राह भद्रे करोम्येष विक्रयं तव निर्घृणः । नृशंसैरपि यद् कर्तुं न शक्यं तत् करोम्यहम् ॥ 8.48 ॥

prāha bhadre karomyeṣa vikrayaṃ tava nirghṛṇaḥ / nṛśaṃsairapi yad kartuṃ na śakyaṃ tat karomyaham // 8.48 //

— कहा, 'हे भद्रे, निर्दयी होकर मैं तुम्हें बेचता हूँ। मैं वह काम करने जा रहा हूँ जो क्रूर लोग भी नहीं कर पाते।'

श्लोक 49 (markandeya.8.49)

यदि मे शक्यते वाणी वक्तुमीदृक् सुदुर्वचः । एवमुक्त्वा ततो भार्यां गत्वा नागरमातुरः । बाष्पापिहितकण्ठाक्षस्ततो वचनमब्रवीत् ॥ 8.49 ॥

yadi me śakyate vāṇī vaktumīdṛk sudurvacaḥ / evamuktvā tato bhāryāṃ gatvā nāgaramāturaḥ / bāṣpāpihitakaṇṭhākṣastato vacanamabravīt // 8.49 //

'यदि मेरा स्वर ऐसे कठोर वचन बोल सके तो!' ऐसा पत्नी से कहकर, दुःखी होकर नगर में जाकर, आँसुओं से रुँधे कण्ठ और नेत्रों से उन्होंने यह वचन कहा —

श्लोक 50 (markandeya.8.50)

राजोवाच । भो भो नागरिकाः सर्वे शृणुध्वं वचनं मम । किं मां पृच्छथ कस्त्वं भो नृशंसोऽहममानुषः ॥ 8.50 ॥

rājovāca / bho bho nāgarikāḥ sarve śṛṇudhvaṃ vacanaṃ mama / kiṃ māṃ pṛcchatha kastvaṃ bho nṛśaṃso 'hamamānuṣaḥ // 8.50 //

राजा ने कहा — 'हे नगरवासियो, सब लोग मेरी बात सुनो। तुम मुझसे क्यों पूछते हो कि मैं कौन हूँ? मैं निर्दय, अमानुष हूँ —'

श्लोक 51 (markandeya.8.51)

राक्षसो वातिकठिनस्ततः पापतरोऽपि वा । विक्रेतुं दयितां प्राप्तो यो न प्राणांस्त्यजाम्यहम् ॥ 8.51 ॥

rākṣaso vātikaṭhinastataḥ pāpataro 'pi vā / vikretuṃ dayitāṃ prāpto yo na prāṇāṃstyajāmyaham // 8.51 //

'— राक्षस, या उससे भी कठोर, या उससे भी अधिक पापी, जो अपने प्राण त्यागने के बदले अपनी प्रियतमा को बेचने आया है।'

श्लोक 52 (markandeya.8.52)

यदि वः कस्यचित् कार्यं दास्या प्राणेष्टया मम । स ब्रीवीतु त्वरायुक्तो यावत् सन्धारयाम्यहम् ॥ 8.52 ॥

yadi vaḥ kasyacit kāryaṃ dāsyā prāṇeṣṭayā mama / sa brīvītu tvarāyukto yāvat sandhārayāmyaham // 8.52 //

'यदि तुममें से किसी को अपने प्राणों के समान प्रिय दासी की आवश्यकता हो, तो शीघ्र कह दे — जब तक मैं अपने को सँभाल सकूँ।'

श्लोक 53 (markandeya.8.53)

पक्षिण ऊचुः । अथ वृद्धो द्विजः कश्चिदागत्याह नराधिपम् । समर्पयस्व मे दासीमहं क्रेता धनप्रदः ॥ 8.53 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / atha vṛddho dvijaḥ kaścidāgatyāha narādhipam / samarpayasva me dāsīmahaṃ kretā dhanapradaḥ // 8.53 //

पक्षियों ने कहा — तब एक वृद्ध ब्राह्मण आकर राजा से बोले — 'यह दासी मुझे सौंप दो, मैं इसका मूल्य देने वाला क्रेता हूँ।'

श्लोक 54 (markandeya.8.54)

अस्ति मे वित्तमस्तोकं सुकुमारी च मे प्रिया । गृहकर्म न शक्नोति कर्तुमस्मात् प्रयच्छ मे ॥ 8.54 ॥

asti me vittamastokaṃ sukumārī ca me priyā / gṛhakarma na śaknoti kartumasmāt prayaccha me // 8.54 //

'मेरे पास पर्याप्त धन है, और मेरी प्रियतमा अत्यन्त सुकुमार है। वह गृहकार्य नहीं कर सकती — इसलिए इसे मुझे दे दो।'

श्लोक 55 (markandeya.8.55)

कर्मण्यता-वयो-रूप-शीलानां तव योषितः । अनुरूपमिदं वित्तं गृहाणार्पय मेऽबलाम् ॥ 8.55 ॥

karmaṇyatā-vayo-rūpa-śīlānāṃ tava yoṣitaḥ / anurūpamidaṃ vittaṃ gṛhāṇārpaya me 'balām // 8.55 //

'तुम्हारी इस स्त्री की कार्यकुशलता, आयु, रूप और शील के अनुरूप ही यह धन है — इसे ग्रहण करो, और इस अबला को मुझे सौंप दो।'

श्लोक 56 (markandeya.8.56)

एवमुक्तस्य विप्रेण हरिश्चन्द्रस्य भूपतेः । व्यदीर्यत मनो दुः खान्न चैनं किञ्चिदब्रवीत् ॥ 8.56 ॥

evamuktasya vipreṇa hariścandrasya bhūpateḥ / vyadīryata mano duḥ khānna cainaṃ kiñcidabravīt // 8.56 //

ब्राह्मण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर राजा हरिश्चन्द्र का हृदय दुःख से विदीर्ण हो गया, किन्तु उन्होंने उससे कुछ नहीं कहा।

श्लोक 57 (markandeya.8.57)

ततः स विप्रो नृपतेर्वल्कलान्ते दृढं धनम् । बद्ध्वा केशेष्वथादाय नृपपत्नीमकर्षयत् ॥ 8.57 ॥

tataḥ sa vipro nṛpatervalkalānte dṛḍhaṃ dhanam / baddhvā keśeṣvathādāya nṛpapatnīmakarṣayat // 8.57 //

तब उस ब्राह्मण ने राजा के वल्कल-वस्त्र के छोर में वह धन दृढ़तापूर्वक बाँधकर, राजपत्नी को उसके केशों से पकड़कर खींच लिया।

श्लोक 58 (markandeya.8.58)

रुरोद रोहिताश्वोऽपि दृष्ट्वा कृष्टां तु मातरम् । हस्तेन वस्त्रमाकर्षन् काकपक्षधरः शिशुः ॥ 8.58 ॥

ruroda rohitāśvo 'pi dṛṣṭvā kṛṣṭāṃ tu mātaram / hastena vastramākarṣan kākapakṣadharaḥ śiśuḥ // 8.58 //

अपनी माता को इस प्रकार खींची जाती देखकर वह काकपक्षधारी शिशु रोहिताश्व भी रोने लगा, हाथ से उसका वस्त्र पकड़ते हुए।

श्लोक 59 (markandeya.8.59)

राजपत्न्युवाच । मुञ्चार्य मुञ्च तावन्मां यावत्पश्याम्यहं शिशुम् । दुर्लभं दर्शनं तात पुनरस्य भविष्यति ॥ 8.59 ॥

rājapatnyuvāca / muñcārya muñca tāvanmāṃ yāvatpaśyāmyahaṃ śiśum / durlabhaṃ darśanaṃ tāta punarasya bhaviṣyati // 8.59 //

राजपत्नी ने कहा — 'हे आर्य, मुझे तब तक छोड़ दीजिए जब तक मैं इस शिशु को देख लूँ। हे तात, इसका पुनः दर्शन दुर्लभ ही होगा।'

श्लोक 60 (markandeya.8.60)

पश्यैहि वत्स मामेवं मातरं दास्यतां गताम् । मां मा स्प्रार्क्षो राजपुत्र ! अस्पृश्याहं तवाधुना ॥ 8.60 ॥

paśyaihi vatsa māmevaṃ mātaraṃ dāsyatāṃ gatām / māṃ mā sprārkṣo rājaputra ! aspṛśyāhaṃ tavādhunā // 8.60 //

'आओ वत्स, मुझे देखो — तुम्हारी यह माता अब दासत्व को प्राप्त हो गयी है। हे राजपुत्र, मुझे स्पर्श मत करो — अब मैं तुम्हारे स्पर्श के योग्य नहीं रही।'

श्लोक 61 (markandeya.8.61)

ततः स बालः सहसा दृष्ट्वा कृष्टां तु मातरम् । समभ्यधावदम्बेति रुदन् सास्त्राविलेक्षणः ॥ 8.61 ॥

tataḥ sa bālaḥ sahasā dṛṣṭvā kṛṣṭāṃ tu mātaram / samabhyadhāvadambeti rudan sāstrāvilekṣaṇaḥ // 8.61 //

तब वह बालक अपनी खींची जाती माता को देखते ही सहसा 'माँ, माँ' कहते हुए रोता हुआ, आँसुओं से धुँधली आँखों से उनकी ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 62 (markandeya.8.62)

तमागतं द्विजः क्रोधाद्वालमभ्याहनत् पदा । वदंस्तथापि सोऽम्बेति नैवामुञ्चत मातरम् ॥ 8.62 ॥

tamāgataṃ dvijaḥ krodhādvālamabhyāhanat padā / vadaṃstathāpi so 'mbeti naivāmuñcata mātaram // 8.62 //

निकट आए उस बालक को ब्राह्मण ने क्रोध से पैर से मार दिया, फिर भी वह 'माँ' कहता हुआ अपनी माता को नहीं छोड़ रहा था।

श्लोक 63 (markandeya.8.63)

राजपत्न्युवाच । प्रसादं कुरु में नाथ क्रीणीष्वेमं च बालकम् । क्रीतापि नाहं भवतो विनैनं कार्यसाधिका ॥ 8.63 ॥

rājapatnyuvāca / prasādaṃ kuru meṃ nātha krīṇīṣvemaṃ ca bālakam / krītāpi nāhaṃ bhavato vinainaṃ kāryasādhikā // 8.63 //

राजपत्नी ने कहा — 'हे स्वामी, मुझ पर कृपा कीजिए, इस बालक को भी खरीद लीजिए। खरीदी जाने पर भी इसके बिना मैं आपका कार्य ठीक से सिद्ध नहीं कर सकूँगी।'

श्लोक 64 (markandeya.8.64)

इत्थं ममाल्पभाग्यायाः प्रसादसुमुखो भव । मां संयोजय बालेन वत्सेनेव पयस्विनीम् ॥ 8.64 ॥

itthaṃ mamālpabhāgyāyāḥ prasādasumukho bhava / māṃ saṃyojaya bālena vatseneva payasvinīm // 8.64 //

'इस प्रकार मुझ अल्पभाग्या पर प्रसन्न-मुख होइए। मुझे इस बालक से मिला दीजिए, जैसे दुधारू गाय अपने बछड़े से मिलती है।'

श्लोक 65 (markandeya.8.65)

ब्राह्मण उवाच । गृह्यतां वित्तमेतत् ते दीयतां बालको मम । स्त्रीपुंसोर्धर्मशास्त्रज्ञैः कृतमेव हि वेतनम् । शतं सहस्रं लक्षं च कोटिमूल्यं तथा परैः ॥ 8.65 ॥

brāhmaṇa uvāca / gṛhyatāṃ vittametat te dīyatāṃ bālako mama / strīpuṃsordharmaśāstrajñaiḥ kṛtameva hi vetanam / śataṃ sahasraṃ lakṣaṃ ca koṭimūlyaṃ tathā paraiḥ // 8.65 //

ब्राह्मण ने कहा — 'यह धन भी ले लो, यह बालक मुझे दे दो। धर्मशास्त्र के ज्ञाताओं ने स्त्री-पुरुष का मूल्य निश्चित ही किया है — सौ, हजार, लाख, तथा अन्यों ने करोड़ भी।'

श्लोक 66 (markandeya.8.66)

पक्षिण ऊचुः । तथैव तस्य तद्वित्तं बद्ध्वोत्तरपटे ततः । प्रगृह्य बालकं मात्रा सहैकस्थमबन्धयत् ॥ 8.66 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / tathaiva tasya tadvittaṃ baddhvottarapaṭe tataḥ / pragṛhya bālakaṃ mātrā sahaikasthamabandhayat // 8.66 //

पक्षियों ने कहा — इसी प्रकार उस अतिरिक्त धन को भी अपने उत्तरीय में बाँधकर, उसने उस बालक को पकड़कर उसकी माता के साथ ही एक स्थान पर बाँध दिया।

श्लोक 67 (markandeya.8.67)

नीयमानौ तु तौ दृष्ट्वा भार्या-पुत्रौ स पार्थिवः । विललाप सुदुः खार्तो निः श्वस्योष्णं पुनः पुनः ॥ 8.67 ॥

nīyamānau tu tau dṛṣṭvā bhāryā-putrau sa pārthivaḥ / vilalāpa suduḥ khārto niḥ śvasyoṣṇaṃ punaḥ punaḥ // 8.67 //

अपनी पत्नी और पुत्र को इस प्रकार ले जाया जाता देखकर वह राजा अत्यन्त दुःखी होकर बारंबार गरम साँसें भरते हुए विलाप करने लगे।

श्लोक 68 (markandeya.8.68)

यां न वायुर्न चादित्यो नेन्दुर्न च पृथग्जनः । दृष्टवन्तः पुरा पत्नीं सेयं दासीत्वमागता ॥ 8.68 ॥

yāṃ na vāyurna cādityo nendurna ca pṛthagjanaḥ / dṛṣṭavantaḥ purā patnīṃ seyaṃ dāsītvamāgatā // 8.68 //

'जिसे न वायु, न सूर्य, न चन्द्रमा, न ही कोई सामान्य जन ने पहले कभी देखा था, वह मेरी पत्नी आज दासत्व को प्राप्त हो गयी है।'

श्लोक 69 (markandeya.8.69)

सूर्यवंशप्रसूतोऽयं सुकुमारकराङ्गुलिः । सम्प्राप्तो विक्रयं बालो धिङ्मामस्तु सुदुर्मतिम् ॥ 8.69 ॥

sūryavaṃśaprasūto 'yaṃ sukumārakarāṅguliḥ / samprāpto vikrayaṃ bālo dhiṅmāmastu sudurmatim // 8.69 //

'सूर्यवंश में उत्पन्न, सुकुमार अंगुलियों वाला यह बालक भी बिक गया — धिक्कार है मुझ अत्यन्त दुर्बुद्धि पर!'

श्लोक 70 (markandeya.8.70)

हा प्रिये ! हा शिशो ! नत्स ! ममानार्यस्य दुर्नयैः । दैवाधीनां दशां प्राप्तो न मृतोऽस्मि तथापि धिक् ॥ 8.70 ॥

hā priye ! hā śiśo ! natsa ! mamānāryasya durnayaiḥ / daivādhīnāṃ daśāṃ prāpto na mṛto 'smi tathāpi dhik // 8.70 //

'हाय प्रिये! हाय शिशु, वत्स! मेरे ही अनार्य दुष्कृत्यों और दैवाधीन दशा के कारण मैं यहाँ पहुँचा हूँ — फिर भी मैं मरा नहीं, धिक्कार है!'

श्लोक 71 (markandeya.8.71)

पक्षिण ऊचुः । एवं विलपतो राज्ञः स विप्रोऽन्तरधीयत । वृक्षगेहादिभिस्तुङ्गैस्तावादाय त्वरान्वितः ॥ 8.71 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / evaṃ vilapato rājñaḥ sa vipro 'ntaradhīyata / vṛkṣagehādibhistuṅgaistāvādāya tvarānvitaḥ // 8.71 //

पक्षियों ने कहा — राजा के इस प्रकार विलाप करते रहते ही वह ब्राह्मण ऊँचे वृक्षों और घरों के बीच से होते हुए शीघ्रता से अदृश्य हो गया।

श्लोक 72 (markandeya.8.72)

विश्वामित्रस्ततः प्राप्तो नृपं वित्तमयाचत । तस्मै समर्पयामास हरिश्चन्द्रोऽपि तद्धनम् ॥ 8.72 ॥

viśvāmitrastataḥ prāpto nṛpaṃ vittamayācata / tasmai samarpayāmāsa hariścandro 'pi taddhanam // 8.72 //

तब विश्वामित्र आ पहुँचे और राजा से धन माँगा; हरिश्चन्द्र ने वह सारा धन उन्हें सौंप दिया।

श्लोक 73 (markandeya.8.73)

तद्वित्तं स्तोकमालोक्य दारविक्रयसम्भवम् । शोकाभिभूतं राजानं कुपितः कौशिकोऽब्रवीत् ॥ 8.73 ॥

tadvittaṃ stokamālokya dāravikrayasambhavam / śokābhibhūtaṃ rājānaṃ kupitaḥ kauśiko 'bravīt // 8.73 //

पत्नी के विक्रय से प्राप्त उस अल्प धन को देखकर, शोक से अभिभूत राजा से क्रोधित कौशिक ने कहा —

श्लोक 74 (markandeya.8.74)

क्षत्रबन्धो ! ममेमां त्वं सदृशीं यज्ञदक्षिणाम् । मन्यसे यदि तत् क्षिप्रं पश्य त्वं मे बलं परम् ॥ 8.74 ॥

kṣatrabandho ! mamemāṃ tvaṃ sadṛśīṃ yajñadakṣiṇām / manyase yadi tat kṣipraṃ paśya tvaṃ me balaṃ param // 8.74 //

'हे नीच क्षत्रिय! यदि तू इसे मेरे योग्य यज्ञ-दक्षिणा मानता है, तो शीघ्र देख ले मेरा परम बल!'

श्लोक 75 (markandeya.8.75)

तपसोऽत्र सुतप्तस्य ब्राह्मण्यस्यामलस्य च । मत्प्रभावस्य चोग्रस्य शुद्धस्याध्ययनस्य च ॥ 8.75 ॥

tapaso 'tra sutaptasya brāhmaṇyasyāmalasya ca / matprabhāvasya cograsya śuddhasyādhyayanasya ca // 8.75 //

'मेरे इस भलीभाँति तप्त तप का, निर्मल ब्राह्मणत्व का, उग्र प्रभाव का, तथा शुद्ध अध्ययन का —'

श्लोक 76 (markandeya.8.76)

अन्यां दास्यामि भगवन् ! कालः कश्चित्प्रतीक्ष्यताम् । साम्प्रतं नास्ति विक्रीता पत्नी पुत्रश्च बालकः ॥ 8.76 ॥

anyāṃ dāsyāmi bhagavan ! kālaḥ kaścitpratīkṣyatām / sāmprataṃ nāsti vikrītā patnī putraśca bālakaḥ // 8.76 //

[हरिश्चन्द्र ने कहा —] 'हे भगवन्, मैं आपको और धन दूँगा, कुछ समय की प्रतीक्षा कीजिए। अभी मेरे पास कुछ नहीं है, क्योंकि पत्नी और छोटा पुत्र दोनों बिक चुके हैं।'

श्लोक 77 (markandeya.8.77)

विश्वामित्र उवाच । चतुर्भागः स्थितो योऽयं दिवसस्य नराधिप । एष एव प्रतीक्ष्यो मे वक्तव्यं नोत्तरं त्वया ॥ 8.77 ॥

viśvāmitra uvāca / caturbhāgaḥ sthito yo 'yaṃ divasasya narādhipa / eṣa eva pratīkṣyo me vaktavyaṃ nottaraṃ tvayā // 8.77 //

विश्वामित्र ने कहा — 'हे राजन्, दिन का जो चौथाई भाग शेष है, बस उतनी ही मैं प्रतीक्षा करूँगा। अब तुझसे कोई उत्तर नहीं लिया जाएगा।'

श्लोक 78 (markandeya.8.78)

पक्षिण ऊचुः । तमेवमुक्त्वा राजेन्द्रं निष्ठुरं निर्घृणं वचः । तदादाय धनं तूर्णं कुपितः कौशिको ययौ ॥ 8.78 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / tamevamuktvā rājendraṃ niṣṭhuraṃ nirghṛṇaṃ vacaḥ / tadādāya dhanaṃ tūrṇaṃ kupitaḥ kauśiko yayau // 8.78 //

पक्षियों ने कहा — राजेन्द्र से यह कठोर, निर्दय वचन कहकर, क्रोधित कौशिक वह धन लेकर शीघ्र चले गये।

श्लोक 79 (markandeya.8.79)

विश्वामित्रे गते राजा भयशोकाब्धिमध्यगः । सर्वाकारं विनिश्चित्य प्रोवाचोच्चैरधोमुखः ॥ 8.79 ॥

viśvāmitre gate rājā bhayaśokābdhimadhyagaḥ / sarvākāraṃ viniścitya provācoccairadhomukhaḥ // 8.79 //

विश्वामित्र के चले जाने पर, भय और शोक के सागर के मध्य डूबा हुआ राजा, हर सम्भावना पर विचार करके, सिर झुकाकर ऊँचे स्वर में बोला —

श्लोक 80 (markandeya.8.80)

वित्तक्रीतेन यो ह्यर्थो मया प्रेष्येण मानवः । स ब्रवीतु त्वरायुक्तो यावत् तपति भास्करः ॥ 8.80 ॥

vittakrītena yo hyartho mayā preṣyeṇa mānavaḥ / sa bravītu tvarāyukto yāvat tapati bhāskaraḥ // 8.80 //

'जिस किसी मनुष्य को धन से खरीदे हुए, मेरे-जैसे सेवक की आवश्यकता हो, वह शीघ्र कह दे — जब तक सूर्य तप रहा है।'

श्लोक 81 (markandeya.8.81)

अथाजगाम त्वरितो धर्मश्चण्डालरूपधृक् । दुर्गन्धो विकृतो रूक्षः श्मश्रुलो दन्तुरो घृणी ॥ 8.81 ॥

athājagāma tvarito dharmaścaṇḍālarūpadhṛk / durgandho vikṛto rūkṣaḥ śmaśrulo danturo ghṛṇī // 8.81 //

तब धर्म देवता चाण्डाल का रूप धारण कर शीघ्रता से आए — दुर्गन्धयुक्त, विकृत, रूखे, दाढ़ी-मूँछ वाले, टेढ़े दाँतों वाले, घृणित,

श्लोक 82 (markandeya.8.82)

कृष्णो लम्बोदरः पिङ्गरूक्षाक्षः परुषाक्षरः । गृहीतपक्षिपुञ्जश्च शवमाल्यैरलङ्कृतः ॥ 8.82 ॥

kṛṣṇo lambodaraḥ piṅgarūkṣākṣaḥ paruṣākṣaraḥ / gṛhītapakṣipuñjaśca śavamālyairalaṅkṛtaḥ // 8.82 //

काले, लटकते हुए पेट वाले, पिंगल और रूखी आँखों वाले, कठोर वाणी वाले, पक्षियों का गट्ठर लिए हुए, शव की मालाओं से सजे हुए,

श्लोक 83 (markandeya.8.83)

कपालहस्तो दीर्घास्यो भैरवोऽतिवदन् मुहुः । श्वगणाभिवृतो घोरो यष्टिहस्तो निराकृतिः ॥ 8.83 ॥

kapālahasto dīrghāsyo bhairavo 'tivadan muhuḥ / śvagaṇābhivṛto ghoro yaṣṭihasto nirākṛtiḥ // 8.83 //

हाथ में खोपड़ी लिए, लम्बे मुख वाले, भयंकर, बारंबार बड़बड़ाते हुए, कुत्तों के झुंड से घिरे, घोर, हाथ में डंडा लिए, कुरूप।

श्लोक 84 (markandeya.8.84)

चण्डाल उवाच । अहमर्थो त्वया शीघ्रं कथयस्वात्मवेतनम् । स्तोकेन बहुना वापि येन वै लभ्यते भवान् ॥ 8.84 ॥

caṇḍāla uvāca / ahamartho tvayā śīghraṃ kathayasvātmavetanam / stokena bahunā vāpi yena vai labhyate bhavān // 8.84 //

चाण्डाल ने कहा — 'मुझे तेरी आवश्यकता है, शीघ्र अपना मूल्य बता — चाहे थोड़ा हो या अधिक, जिससे तू प्राप्त हो सके।'

श्लोक 85 (markandeya.8.85)

पक्षिण ऊचुः । तं तादृशमथालक्ष्य क्रूरदृष्टिं सुनिष्ठुरम् । वदन्तमतिदुः शीलं कस्त्वमित्याह पार्थिवः ॥ 8.85 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / taṃ tādṛśamathālakṣya krūradṛṣṭiṃ suniṣṭhuram / vadantamatiduḥ śīlaṃ kastvamityāha pārthivaḥ // 8.85 //

पक्षियों ने कहा — इस प्रकार के क्रूर-दृष्टि, अत्यन्त निष्ठुर, दुःशील वचन बोलने वाले उस व्यक्ति को देखकर राजा ने पूछा — 'तू कौन है?'

श्लोक 86 (markandeya.8.86)

चण्डाल उवाच । चण्डालोऽहमिहाख्यातः प्रवीरेति पुरोत्तमे । विख्यातो वध्यवधको मृतकम्बलहारकः ॥ 8.86 ॥

caṇḍāla uvāca / caṇḍālo 'hamihākhyātaḥ pravīreti purottame / vikhyāto vadhyavadhako mṛtakambalahārakaḥ // 8.86 //

चाण्डाल ने कहा — 'मैं इस श्रेष्ठ नगरी में प्रवीर नाम से प्रसिद्ध चाण्डाल हूँ — मृत्युदण्ड देने वाले तथा मृतकों के वस्त्र लेने वाले के रूप में विख्यात।'

श्लोक 87 (markandeya.8.87)

हरिश्चन्द्र उवाच । नाहं चण्डालदासत्वमिच्छेयं सुविगर्हितम् । वरं सापाग्निना दग्धो न चण्डालवशं गतः ॥ 8.87 ॥

hariścandra uvāca / nāhaṃ caṇḍāladāsatvamiccheyaṃ suvigarhitam / varaṃ sāpāgninā dagdho na caṇḍālavaśaṃ gataḥ // 8.87 //

हरिश्चन्द्र ने कहा — 'मैं चाण्डाल की अत्यन्त निन्दनीय दासता नहीं चाहूँगा। शाप की अग्नि से जल जाना बेहतर है, चाण्डाल के वश में जाना नहीं।'

श्लोक 88 (markandeya.8.88)

पक्षिण ऊचुः । तस्यैवं वदतः प्राप्तो विश्वामित्रस्तपोनिधिः । कोपामर्षविवृताक्षः प्राह चेदं नराधैपम् ॥ 8.88 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / tasyaivaṃ vadataḥ prāpto viśvāmitrastaponidhiḥ / kopāmarṣavivṛtākṣaḥ prāha cedaṃ narādhaipam // 8.88 //

पक्षियों ने कहा — उनके इस प्रकार कहते ही तपोनिधि विश्वामित्र वहाँ आ पहुँचे, और क्रोध तथा असहनशीलता से आँखें फैलाकर राजा से यह बोले —

श्लोक 89 (markandeya.8.89)

विश्वामित्र उवाच । चण्डालोऽयमनल्पं ते दातुं वित्तमुपस्थितः । कस्मान्न दीयते मह्यमशेषा यज्ञदक्षिणा ॥ 8.89 ॥

viśvāmitra uvāca / caṇḍālo 'yamanalpaṃ te dātuṃ vittamupasthitaḥ / kasmānna dīyate mahyamaśeṣā yajñadakṣiṇā // 8.89 //

विश्वामित्र ने कहा — 'यह चाण्डाल तुम्हें कम नहीं, बहुत धन देने को तैयार है — फिर मुझे मेरी पूरी यज्ञ-दक्षिणा क्यों नहीं दी जाती?'

श्लोक 90 (markandeya.8.90)

हरिश्चन्द्र उवाच । भगवन् ! सूर्यवंशोत्थमात्मानं वेद्मे कौशिक । कथं चण्डालदासत्वं गमिष्ये वित्तकामुकः ॥ 8.90 ॥

hariścandra uvāca / bhagavan ! sūryavaṃśotthamātmānaṃ vedme kauśika / kathaṃ caṇḍāladāsatvaṃ gamiṣye vittakāmukaḥ // 8.90 //

हरिश्चन्द्र ने कहा — 'हे भगवन् कौशिक, मैं स्वयं को सूर्यवंश में उत्पन्न जानता हूँ — मैं धन के लोभ में चाण्डाल की दासता को कैसे प्राप्त होऊँ?'

श्लोक 91 (markandeya.8.91)

विश्वामित्र उवाच । यदि चण्डालवित्तं त्वमात्मविक्रयजं मम । न प्रदास्यसि कालेन शाप्स्यामि त्वामसंशयम् ॥ 8.91 ॥

viśvāmitra uvāca / yadi caṇḍālavittaṃ tvamātmavikrayajaṃ mama / na pradāsyasi kālena śāpsyāmi tvāmasaṃśayam // 8.91 //

विश्वामित्र ने कहा — 'यदि तू समय पर चाण्डाल का यह धन, अपने-आपको बेचकर उत्पन्न, मुझे न देगा, तो मैं निश्चय ही तुझे शाप दूँगा।'

श्लोक 92 (markandeya.8.92)

पक्षिण ऊचुः । हरिश्चन्द्रस्ततो राजा चिन्तावस्थितजीवितः । प्रसीदेति वदन् पादावृषेर्जग्राह विह्वलः ॥ 8.92 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / hariścandrastato rājā cintāvasthitajīvitaḥ / prasīdeti vadan pādāvṛṣerjagrāha vihvalaḥ // 8.92 //

पक्षियों ने कहा — तब राजा हरिश्चन्द्र, जिनका जीवन ही चिन्ता में अटका हुआ था, विह्वल होकर 'प्रसन्न होइए' कहते हुए ऋषि के चरण पकड़ लिए।

श्लोक 93 (markandeya.8.93)

दासोऽस्म्यार्तोऽस्मि भीतोऽस्मि त्वद्भक्तश्च विशेषतः । कुरु प्रसादं विप्रर्षे कष्टश्चण्डालसङ्करः ॥ 8.93 ॥

dāso 'smyārto 'smi bhīto 'smi tvadbhaktaśca viśeṣataḥ / kuru prasādaṃ viprarṣe kaṣṭaścaṇḍālasaṅkaraḥ // 8.93 //

'मैं दास हूँ, पीड़ित हूँ, भयभीत हूँ, और विशेष रूप से आपका भक्त हूँ। हे विप्रर्षे, कृपा कीजिए — चाण्डाल के साथ संसर्ग अत्यन्त कष्टकर है।'

श्लोक 94 (markandeya.8.94)

भवेयं वित्तशेषेण सर्वकर्मकरो वशः । तवैव मुनिशार्दूल ! प्रेष्यश्चित्तानुवर्तकः ॥ 8.94 ॥

bhaveyaṃ vittaśeṣeṇa sarvakarmakaro vaśaḥ / tavaiva muniśārdūla ! preṣyaścittānuvartakaḥ // 8.94 //

'मैं शेष धन के बदले सर्वकर्मकारी, वशवर्ती बन जाऊँ — हे मुनिश्रेष्ठ, आपका ही सेवक, आपके चित्त के अनुसार चलने वाला।'

श्लोक 95 (markandeya.8.95)

विश्वामित्र उवाच । यदि प्रेष्यो मम भवान् चण्डालाय ततो मया । दासभावमनुप्राप्तो दत्तो वित्तार्बुदेन वै ॥ 8.95 ॥

viśvāmitra uvāca / yadi preṣyo mama bhavān caṇḍālāya tato mayā / dāsabhāvamanuprāpto datto vittārbudena vai // 8.95 //

विश्वामित्र ने कहा — 'यदि तू मेरा दास बनता है, तो मैं ही तुझे चाण्डाल को सौंप दूँगा, दासभाव में लाकर, दस करोड़ के मूल्य पर।'

श्लोक 96 (markandeya.8.96)

पक्षिण ऊचुः । एकमुक्ते तदा तेन श्वपाको हृष्टमानसः । विश्वामित्राय तद्द्रव्यं दत्त्वा बद्ध्वा नरेश्वरम् ॥ 8.96 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / ekamukte tadā tena śvapāko hṛṣṭamānasaḥ / viśvāmitrāya taddravyaṃ dattvā baddhvā nareśvaram // 8.96 //

पक्षियों ने कहा — इतना कहते ही वह श्वपाक (चाण्डाल) प्रसन्न-मन होकर विश्वामित्र को वह धन देकर, राजा को बाँधकर,

श्लोक 97 (markandeya.8.97)

दण्डप्रहारसम्भ्रान्तमतीव व्याकुलेन्द्रियम् । इष्टबन्धुवियोगार्तमनयन्निजपत्तनम् ॥ 8.97 ॥

daṇḍaprahārasambhrāntamatīva vyākulendriyam / iṣṭabandhuviyogārtamanayannijapattanam // 8.97 //

दण्ड के प्रहारों से भयभीत, अत्यन्त व्याकुल-इन्द्रिय, अपने प्रिय बन्धुओं के वियोग से दुःखी उस राजा को अपने ही नगर में ले गया।

श्लोक 98 (markandeya.8.98)

हरिश्चन्द्रस्ततो राजा वसंश्चण्डालपत्तने । प्रातर्मध्याह्नसमये सायञ्चैतदगायत ॥ 8.98 ॥

hariścandrastato rājā vasaṃścaṇḍālapattane / prātarmadhyāhnasamaye sāyañcaitadagāyata // 8.98 //

चाण्डाल-नगर में निवास करते हुए राजा हरिश्चन्द्र प्रातः, मध्याह्न और सायं यह गाया करते थे —

श्लोक 99 (markandeya.8.99)

बाला दीनमुखी दृष्ट्वा बालं दीनमुखं पुरः । मां स्मरत्यसुखाविष्टा मोचयिष्यति नौ नृपः ॥ 8.99 ॥

bālā dīnamukhī dṛṣṭvā bālaṃ dīnamukhaṃ puraḥ / māṃ smaratyasukhāviṣṭā mocayiṣyati nau nṛpaḥ // 8.99 //

'वह दीन-मुखी बाला, अपने आगे उस दीन-मुखी बालक को देखकर, दुःखी होकर मुझे याद करती होगी — राजा हम दोनों को छुड़ाएगा।'

श्लोक 100 (markandeya.8.100)

उपात्तवित्तो विप्राय दत्त्वा वित्तमतोऽधिकम् । न सा मां मृगशावाक्षी वेत्ति पापतरं कृतम् ॥ 8.100 ॥

upāttavitto viprāya dattvā vittamato 'dhikam / na sā māṃ mṛgaśāvākṣī vetti pāpataraṃ kṛtam // 8.100 //

'प्राप्त धन में से और भी अधिक धन ब्राह्मण को देकर — वह मृगशावाक्षी नहीं जानती कि मैंने इससे भी बड़ा पाप किया है।'

श्लोक 101 (markandeya.8.101)

राज्यनाशः सुहृत्त्यागो भर्यातनयविक्रयः । प्राप्ता चण्डालता चेयमहो दुः खपरम्परा ॥ 8.101 ॥

rājyanāśaḥ suhṛttyāgo bharyātanayavikrayaḥ / prāptā caṇḍālatā ceyamaho duḥ khaparamparā // 8.101 //

'राज्य का नाश, मित्रों का त्याग, पत्नी-पुत्र का विक्रय, और अब यह चाण्डालता — अहो, यह कैसी दुःखों की परम्परा है!'

श्लोक 102 (markandeya.8.102)

एवं स निवसन् नित्यं सस्मार दयितं सुतम् । आर्याञ्चात्मसमाविष्टां हृतसर्वस्व आतुरः ॥ 8.102 ॥

evaṃ sa nivasan nityaṃ sasmāra dayitaṃ sutam / āryāñcātmasamāviṣṭāṃ hṛtasarvasva āturaḥ // 8.102 //

इस प्रकार वहाँ नित्य निवास करते हुए, सर्वस्व हरे जाने से दुःखी वे अपने प्रिय पुत्र और अपने ही समान प्रिय कुलीन पत्नी को निरन्तर स्मरण करते रहते।

श्लोक 103 (markandeya.8.103)

कस्यचित्त्वथ कालस्य मृतचेलापहारकः । हरिश्चन्द्रोऽभवद्राजा श्मशाने तद्वशानुगः ॥ 8.103 ॥

kasyacittvatha kālasya mṛtacelāpahārakaḥ / hariścandro 'bhavadrājā śmaśāne tadvaśānugaḥ // 8.103 //

कुछ समय पश्चात् राजा हरिश्चन्द्र, उस चाण्डाल के अधीन होकर, श्मशान में मृतकों के वस्त्र लेने वाले बन गये।

श्लोक 104 (markandeya.8.104)

चण्डालेनानुशिष्टश्व मृतचेलापहारिणा । शवागमनमन्विच्छन्निह तिष्ठ दिवानिशम् ॥ 8.104 ॥

caṇḍālenānuśiṣṭaśva mṛtacelāpahāriṇā / śavāgamanamanvicchanniha tiṣṭha divāniśam // 8.104 //

मृतकों के वस्त्र लेने वाले उस चाण्डाल ने उन्हें आदेश दिया — 'शवों के आने की प्रतीक्षा करते हुए तुम यहाँ दिन-रात रहो।'

श्लोक 105 (markandeya.8.105)

इदं राज्ञेऽपि देयञ्च षड्भागन्तु शवं प्रति । त्रयस्तु मम भागाः स्युर्द्वो भागौ तव वेतनम् ॥ 8.105 ॥

idaṃ rājñe 'pi deyañca ṣaḍbhāgantu śavaṃ prati / trayastu mama bhāgāḥ syurdvo bhāgau tava vetanam // 8.105 //

'प्रत्येक शव के प्रति राजा को भी यह देय है — छह भागों में से तीन भाग मेरे होंगे, और दो भाग तुम्हारी मजदूरी होगी।'

श्लोक 106 (markandeya.8.106)

इति प्रतिसमादिष्टो जगाम शवमन्दिरम् । दिशन्तु दक्षिणां यत्र वाराणस्यां स्थितं तदा ॥ 8.106 ॥

iti pratisamādiṣṭo jagāma śavamandiram / diśantu dakṣiṇāṃ yatra vārāṇasyāṃ sthitaṃ tadā // 8.106 //

इस प्रकार आदेश पाकर वे मृतक-मन्दिर (श्मशान) को गए, जो उस समय वाराणसी में दक्षिण दिशा की ओर स्थित था।

श्लोक 107 (markandeya.8.107)

श्मशानं घोरसंनादं शिवाशतसमाकुलम् । शवमौलिसमाकीर्णं दुर्गन्धं बहुधूमकम् ॥ 8.107 ॥

śmaśānaṃ ghorasaṃnādaṃ śivāśatasamākulam / śavamaulisamākīrṇaṃ durgandhaṃ bahudhūmakam // 8.107 //

वह श्मशान भयंकर ध्वनियों से भरा, सैकड़ों सियारों से व्याप्त, शवों के सिरों से भरा, दुर्गन्धयुक्त और अत्यन्त धुएँ से भरा था —

श्लोक 108 (markandeya.8.108)

पिशाच-भूत-वेताल-डाकिनी-यक्षसङ्कुलम् । गृध्रगोमायुसङ्कीर्णं श्ववृन्दपरिवारितम् ॥ 8.108 ॥

piśāca-bhūta-vetāla-ḍākinī-yakṣasaṅkulam / gṛdhragomāyusaṅkīrṇaṃ śvavṛndaparivāritam // 8.108 //

— पिशाच, भूत, वेताल, डाकिनी और यक्षों से भरा, गीध-सियारों से व्याप्त, कुत्तों के झुंडों से घिरा,

श्लोक 109 (markandeya.8.109)

अस्थिसंघातसङ्कीर्णं महादुर्गन्धसंकुलम् । नानामृतसुहृन्नाद-रौद्रकोलाहलायुतम् ॥ 8.109 ॥

asthisaṃghātasaṅkīrṇaṃ mahādurgandhasaṃkulam / nānāmṛtasuhṛnnāda-raudrakolāhalāyutam // 8.109 //

— हड्डियों के ढेरों से भरा, महाभयंकर दुर्गन्ध से युक्त, मृतकों के बन्धुओं की भाँति-भाँति की करुण, भयंकर चीत्कारों से भरा —

श्लोक 110 (markandeya.8.110)

हा पुत्र ! मित्र ! हा बन्धो ! भ्रातर्वत्स ! प्रियाद्य मे । हा पते ! भगिनि ! मातर्हा मातुल ! पितामह ॥ 8.110 ॥

hā putra ! mitra ! hā bandho ! bhrātarvatsa ! priyādya me / hā pate ! bhagini ! mātarhā mātula ! pitāmaha // 8.110 //

'हाय पुत्र! मित्र! हाय बन्धु! भाई, वत्स, मेरे प्रिय! हाय पति! बहन! माता! हाय मामा! पितामह!'

श्लोक 111 (markandeya.8.111)

मातामह ! पितः ! क्व गतोऽस्येहि बान्धव । इत्येवं वदतां यत्र ध्वनिः संश्रुयते महान् ॥ 8.111 ॥

mātāmaha ! pitaḥ ! kva gato 'syehi bāndhava / ityevaṃ vadatāṃ yatra dhvaniḥ saṃśruyate mahān // 8.111 //

'नाना! पिता! कहाँ चले गए, लौट आओ, हे बन्धु!' — इस प्रकार कहने वालों का महान् स्वर वहाँ सुनाई देता था।

श्लोक 112 (markandeya.8.112)

ज्वलन्मांस-वसा-मेदच्छमच्छमितसंकुलम् ॥ 8.112 ॥

jvalanmāṃsa-vasā-medacchamacchamitasaṃkulam // 8.112 //

जलते हुए मांस, वसा और मेद की चट-चट ध्वनि से वह स्थान भरा हुआ था —

श्लोक 113 (markandeya.8.113)

अर्धदग्धाः शवाः श्यामा विकसद्दन्तपङ्क्तयः । हसन्तीवाग्निमध्यस्थाः कायस्येयं दशा त्विति ॥ 8.113 ॥

ardhadagdhāḥ śavāḥ śyāmā vikasaddantapaṅktayaḥ / hasantīvāgnimadhyasthāḥ kāyasyeyaṃ daśā tviti // 8.113 //

आधे जले हुए, काले शव, जिनकी दाँतों की पंक्तियाँ खुली हुई थीं, अग्नि के मध्य मानो हँसते हुए-से कह रहे थे — 'शरीर की यही दशा है!'

श्लोक 114 (markandeya.8.114)

अग्नेश्चटचटाशब्दो वयसामस्थिपङ्क्तिषु । बान्धवाक्रान्दशब्दश्च पुक्कसेषु प्रहर्षजः ॥ 8.114 ॥

agneścaṭacaṭāśabdo vayasāmasthipaṅktiṣu / bāndhavākrāndaśabdaśca pukkaseṣu praharṣajaḥ // 8.114 //

हड्डियों की पंक्तियों में बैठे पक्षियों के बीच अग्नि की चट-चट ध्वनि, बन्धुओं के विलाप का स्वर, और पुक्कसों में हर्ष से उत्पन्न ध्वनि —

श्लोक 115 (markandeya.8.115)

गायतां भूत-वेताल-पिशाचगणः रक्षसाम् । श्रूयते सुमहान् घोरः कल्पान्त इव निः स्वनः ॥ 8.115 ॥

gāyatāṃ bhūta-vetāla-piśācagaṇaḥ rakṣasām / śrūyate sumahān ghoraḥ kalpānta iva niḥ svanaḥ // 8.115 //

— तथा गाते हुए भूत, वेताल, पिशाच और राक्षसों के समूहों की — वहाँ मानो प्रलय-काल के समान अत्यन्त भयंकर, महान् ध्वनि सुनाई देती थी।

श्लोक 116 (markandeya.8.116)

महामहिषकारीष-गोशकृद्राशिसङ्कुलम् । तदुत्थभस्मकूटैश्च वृतं सास्थिभिरुन्नतैः ॥ 8.116 ॥

mahāmahiṣakārīṣa-gośakṛdrāśisaṅkulam / tadutthabhasmakūṭaiśca vṛtaṃ sāsthibhirunnataiḥ // 8.116 //

वह स्थान भैंसों और गायों के गोबर-कण्डों के ढेरों से भरा, उनसे उठी राख के टीलों से तथा उठी हुई हड्डियों से घिरा हुआ था —

श्लोक 117 (markandeya.8.117)

नानोपहारस्त्रग्दीप-काकविक्षेपकालिकम् । अनेकशब्दबहुलं श्मशानं नरकायते ॥ 8.117 ॥

nānopahārastragdīpa-kākavikṣepakālikam / anekaśabdabahulaṃ śmaśānaṃ narakāyate // 8.117 //

— नाना उपहार-मालाओं, दीपकों और कौवों द्वारा बिखेरी गयी काली वस्तुओं से मलिन, अनेक ध्वनियों से भरा — वह श्मशान साक्षात् नरक-सा प्रतीत होता था।

श्लोक 118 (markandeya.8.118)

सवह्निगर्भैरशिवैः शिवारुतैर् । निनादितं भीषणरावगह्वरम् । भयं भयस्याप्युपसञ्जनैर्भृशं । श्मशानमाक्रन्दविरावदारुणम् ॥ 8.118 ॥

savahnigarbhairaśivaiḥ śivārutair / nināditaṃ bhīṣaṇarāvagahvaram / bhayaṃ bhayasyāpyupasañjanairbhṛśaṃ / śmaśānamākrandavirāvadāruṇam // 8.118 //

अग्नि की चटकन से मिली हुई सियारों की अशुभ चीत्कारों से गूँजता, भयंकर, गुहाओं-सी प्रतिध्वनि से भरा, भय को भी भयभीत करने वाला — वह विलाप और चीत्कार से दारुण श्मशान था।

श्लोक 119 (markandeya.8.119)

स राजा तत्र सम्प्राप्तो दुः खितः शोचनोद्यतः । हा भृत्या मन्त्रिणो विप्राः तद्राज्यं विधे गतम् ॥ 8.119 ॥

sa rājā tatra samprāpto duḥ khitaḥ śocanodyataḥ / hā bhṛtyā mantriṇo viprāḥ tadrājyaṃ vidhe gatam // 8.119 //

वहाँ पहुँचे हुए वे राजा दुःखी होकर, शोक में डूबकर कहने लगे — 'हाय मेरे सेवको, मंत्रियो, ब्राह्मणो! हे विधाता, वह राज्य कहाँ चला गया!'

श्लोक 120 (markandeya.8.120)

हा शैव्ये पुत्र हा बाल मां त्यक्त्वा मन्दभाग्यकम् । विश्वामित्रस्य दोषेण गताः कुत्रापि ते मम ॥ 8.120 ॥

hā śaivye putra hā bāla māṃ tyaktvā mandabhāgyakam / viśvāmitrasya doṣeṇa gatāḥ kutrāpi te mama // 8.120 //

'हाय शैव्ये! हाय पुत्र! हाय बालक! मुझ मन्दभाग्य को छोड़कर, विश्वामित्र के दोष से तुम दोनों कहाँ चले गए?'

श्लोक 121 (markandeya.8.121)

इत्येवं चिन्तयंस्तत्र चण्डालोक्तं पुनः पुनः । मलिनो रूक्षसर्वाङ्गः केशवान् गन्धवान् ध्वजी ॥ 8.121 ॥

ityevaṃ cintayaṃstatra caṇḍāloktaṃ punaḥ punaḥ / malino rūkṣasarvāṅgaḥ keśavān gandhavān dhvajī // 8.121 //

इस प्रकार वहाँ बारंबार सोचते हुए, चाण्डाल के आदेश का पालन करते हुए, मलिन, रूखे सर्वांग वाले, केश और दुर्गन्ध से युक्त, ध्वजा लिए हुए —

श्लोक 122 (markandeya.8.122)

लकुटी कालकल्पश्च धावंश्चापि ततस्ततः । अस्मिन् शव इदं मूल्यं प्राप्तं प्राप्स्यामि चाप्युत ॥ 8.122 ॥

lakuṭī kālakalpaśca dhāvaṃścāpi tatastataḥ / asmin śava idaṃ mūlyaṃ prāptaṃ prāpsyāmi cāpyuta // 8.122 //

— हाथ में लाठी लिए, मानो साक्षात् काल-सदृश, इधर-उधर दौड़ते हुए वे कहते — 'इस शव के लिए यह मूल्य मुझे मिला, और यह भी मिलेगा।'

श्लोक 123 (markandeya.8.123)

इदं मम इदं राज्ञे मुख्यचण्डालके त्विदम् । इति धावन् दिशो राजा जीवन् योन्यन्तरं गतः ॥ 8.123 ॥

idaṃ mama idaṃ rājñe mukhyacaṇḍālake tvidam / iti dhāvan diśo rājā jīvan yonyantaraṃ gataḥ // 8.123 //

'यह मेरा भाग, यह राजा का, और यह मुख्य चाण्डाल का' — इस प्रकार दिशाओं में दौड़ते हुए, जीवित होते हुए भी वह राजा मानो किसी दूसरी योनि को प्राप्त हो गए थे।

श्लोक 124 (markandeya.8.124)

जीर्णकर्पण्टसुग्रन्थि-कृतकन्थापरिग्रहः चिताभस्मरजोलिप्त-मुखबाहूदराङिघ्रकः ॥ 8.124 ॥

jīrṇakarpaṇṭasugranthi-kṛtakanthāparigrahaḥ citābhasmarajolipta-mukhabāhūdarāṅighrakaḥ // 8.124 //

जीर्ण, अच्छी तरह गँठी हुई गाँठों वाली कन्था धारण किए हुए, चिता की राख और धूल से लिपटे मुख, भुजाओं, उदर और चरणों वाले,

श्लोक 125 (markandeya.8.125)

नानामेदो-वसा-मज्जा लिप्तपाण्यङ्गुलिः श्वसन् । नानाशवोदनकृता-हारतृप्तिपरायणः ॥ 8.125 ॥

nānāmedo-vasā-majjā liptapāṇyaṅguliḥ śvasan / nānāśavodanakṛtā-hāratṛptiparāyaṇaḥ // 8.125 //

नाना प्रकार की चर्बी, वसा और मज्जा से सने हाथों-अंगुलियों वाले, हाँफते हुए, नाना शवों के लिए मिले अन्न से ही तृप्ति करने वाले,

श्लोक 126 (markandeya.8.126)

तदीयमाल्यसंश्लेषकृतमस्तकमण्डनः । न रात्रौ न दिवा शेते हा हेति प्रवदन् मुहुः ॥ 8.126 ॥

tadīyamālyasaṃśleṣakṛtamastakamaṇḍanaḥ / na rātrau na divā śete hā heti pravadan muhuḥ // 8.126 //

मृतकों की ही मालाओं से अपना सिर सजाए हुए, वे न रात्रि में सोते थे न दिन में — बारंबार 'हाय, हाय' कहते रहते थे।

श्लोक 127 (markandeya.8.127)

एवं द्वादशमासास्तु नीताः शतसमोपमाः । स कदाचिन्नृपश्रेष्ठः श्रान्तो बन्धुवियोगवान् ॥ 8.127 ॥

evaṃ dvādaśamāsāstu nītāḥ śatasamopamāḥ / sa kadācinnṛpaśreṣṭhaḥ śrānto bandhuviyogavān // 8.127 //

इस प्रकार बारह मास ऐसे बीते जो सौ वर्षों के समान लगे। एक बार वह श्रेष्ठ राजा, थका हुआ, अपने बन्धुओं के वियोग से पीड़ित —

श्लोक 128 (markandeya.8.128)

निद्राभिभूतो रूक्षाङ्गो निश्चेष्टः सुप्त एव च । तत्रापि शयनीये स दृष्टवानद्भुतं हमत् ॥ 8.128 ॥

nidrābhibhūto rūkṣāṅgo niśceṣṭaḥ supta eva ca / tatrāpi śayanīye sa dṛṣṭavānadbhutaṃ hamat // 8.128 //

— नींद से अभिभूत, रूखे अंगों वाला, निश्चेष्ट, वहीं सो गया; और उस शय्या पर भी उसने कुछ अद्भुत, महान् दृश्य देखा।

श्लोक 129 (markandeya.8.129)

श्मशानाभ्यासयोगेन दैवस्य बलवत्तया । अन्यदेहेन दत्त्वा तु गुरवे गुरुदक्षिणाम् ॥ 8.129 ॥

śmaśānābhyāsayogena daivasya balavattayā / anyadehena dattvā tu gurave gurudakṣiṇām // 8.129 //

श्मशान में लम्बे निवास के कारण, तथा दैव की प्रबलता से, [उसने देखा कि] अन्य शरीर से उसने अपने गुरु को गुरु-दक्षिणा दी है —

श्लोक 130 (markandeya.8.130)

तदा द्वादश वर्षाणि दुः खदानात्तु निष्कृतिः । आत्मानं स ददर्शाथ पुक्कसीगर्भसम्भवम् ॥ 8.130 ॥

tadā dvādaśa varṣāṇi duḥ khadānāttu niṣkṛtiḥ / ātmānaṃ sa dadarśātha pukkasīgarbhasambhavam // 8.130 //

— उस दक्षिणा के रूप में बारह वर्षों का दुःख देकर उऋण होना — और उसने अपने आपको एक पुक्कसी के गर्भ से उत्पन्न देखा।

श्लोक 131 (markandeya.8.131)

तत्रस्थश्चाप्यसौ राजा सोऽचिन्तयदिदं तदा । इतो निष्क्रान्तमात्रो हि दानधर्मं करोम्यहम् ॥ 8.131 ॥

tatrasthaścāpyasau rājā so 'cintayadidaṃ tadā / ito niṣkrāntamātro hi dānadharmaṃ karomyaham // 8.131 //

वहाँ स्थित वह राजा तब यह सोचने लगे — 'यहाँ से निकलते ही मैं दान-धर्म का पालन करूँगा।'

श्लोक 132 (markandeya.8.132)

अनन्तरं स जातस्तु तदा पुक्कसबालकः । श्मशानमृतसंस्कार-करणेषु सदोद्यतः ॥ 8.132 ॥

anantaraṃ sa jātastu tadā pukkasabālakaḥ / śmaśānamṛtasaṃskāra-karaṇeṣu sadodyataḥ // 8.132 //

तत्पश्चात् वह पुक्कस-बालक के रूप में उत्पन्न हुआ, जो श्मशान में मृतकों के संस्कार-कार्यों में सदा तत्पर रहता था।

श्लोक 133 (markandeya.8.133)

प्राप्ते तु सप्तमे वर्षे श्मशानेऽथ मृतो द्विजः । आनीतो बन्धुभिर्दृष्टस्तेन तत्राधनो गुणी ॥ 8.133 ॥

prāpte tu saptame varṣe śmaśāne 'tha mṛto dvijaḥ / ānīto bandhubhirdṛṣṭastena tatrādhano guṇī // 8.133 //

सातवें वर्ष में पहुँचने पर, श्मशान में एक मृत ब्राह्मण को उसके बन्धु लाए; वह [बालक] निर्धन होते हुए भी गुणवान था।

श्लोक 134 (markandeya.8.134)

मूल्यार्थिना तु तेनापि परिभूतास्तु ब्राह्मणाः । ऊचुस्ते ब्राह्मणास्तत्र विश्वामित्रस्य चेष्टितम् ॥ 8.134 ॥

mūlyārthinā tu tenāpi paribhūtāstu brāhmaṇāḥ / ūcuste brāhmaṇāstatra viśvāmitrasya ceṣṭitam // 8.134 //

उससे शुल्क माँगे जाने पर वे ब्राह्मण अपमानित अनुभव करने लगे, और वहाँ उन ब्राह्मणों ने विश्वामित्र के आचरण की कथा कही —

श्लोक 135 (markandeya.8.135)

पापिष्ठमशुभं कर्म कुरु त्वं पापकारक । हरिश्चन्द्रः पुरा राजा विश्वामित्रेण पुक्कसः ॥ 8.135 ॥

pāpiṣṭhamaśubhaṃ karma kuru tvaṃ pāpakāraka / hariścandraḥ purā rājā viśvāmitreṇa pukkasaḥ // 8.135 //

'तू भी यह अत्यन्त पापपूर्ण, अशुभ कर्म कर रहा है, हे पापकारी! प्राचीन काल में राजा हरिश्चन्द्र को भी विश्वामित्र ने पुक्कस बना दिया था —'

श्लोक 136 (markandeya.8.136)

कृतः पुण्यविनाशेन ब्राह्मणस्वापनाशनात् । यदा न क्षमते तेषां तैः स शप्तो रुषा तदा ॥ 8.136 ॥

kṛtaḥ puṇyavināśena brāhmaṇasvāpanāśanāt / yadā na kṣamate teṣāṃ taiḥ sa śapto ruṣā tadā // 8.136 //

'— पुण्य के नाश और ब्राह्मण-स्व के अपहरण के कारण। जब उन्होंने उसे क्षमा नहीं किया, तो क्रोध में उसे शाप दे दिया —'

श्लोक 137 (markandeya.8.137)

गच्छ त्वं नरकं घोरमधुनैव नराधम । इत्युक्तमात्रे वचने स्वप्नस्थः स नृपस्तदा ॥ 8.137 ॥

gaccha tvaṃ narakaṃ ghoramadhunaiva narādhama / ityuktamātre vacane svapnasthaḥ sa nṛpastadā // 8.137 //

'तू अभी इसी क्षण घोर नरक को जा, नराधम!' — यह वचन कहते ही, स्वप्न में स्थित वह राजा —

श्लोक 138 (markandeya.8.138)

अपश्यद्यमदूतान् वै पाशहस्तान् भयावहान् । तैः संगृहीतमात्मानं नीयमानं तदा बलात् ॥ 8.138 ॥

apaśyadyamadūtān vai pāśahastān bhayāvahān / taiḥ saṃgṛhītamātmānaṃ nīyamānaṃ tadā balāt // 8.138 //

— यम के दूतों को, हाथों में पाश लिए, भयंकर देखने लगा; और स्वयं को उनके द्वारा पकड़े जाकर बलपूर्वक ले जाया जाता देखा।

श्लोक 139 (markandeya.8.139)

पश्यति स्म भृशं खिन्नो हा मातः पितरद्य मे । एवंवादी स नरके तैलद्रोण्यां निपातितः ॥ 8.139 ॥

paśyati sma bhṛśaṃ khinno hā mātaḥ pitaradya me / evaṃvādī sa narake tailadroṇyāṃ nipātitaḥ // 8.139 //

वह अत्यन्त दुःखी होकर देखने लगा — 'हाय माता! हाय पिता!' — ऐसा कहते हुए उसे नरक में तेल की कड़ाही में डाल दिया गया।

श्लोक 140 (markandeya.8.140)

क्रकचैः पाट्यमानस्तु क्षुरधाराभिरप्यधः । अन्धे तमसि दुः खार्तः पूयशोणितभोजनः ॥ 8.140 ॥

krakacaiḥ pāṭyamānastu kṣuradhārābhirapyadhaḥ / andhe tamasi duḥ khārtaḥ pūyaśoṇitabhojanaḥ // 8.140 //

आरियों से चीरा जाता, नीचे छुरों की धारों से भी, अंधकार में दुःखी, मवाद और रक्त का भोजन करने वाला —

श्लोक 141 (markandeya.8.141)

सप्तवर्षं मृतात्मानं पुक्कसत्वे ददर्श ह । दिनं दिनन्तु नरके दह्यते पच्यतेऽन्यतः ॥ 8.141 ॥

saptavarṣaṃ mṛtātmānaṃ pukkasatve dadarśa ha / dinaṃ dinantu narake dahyate pacyate 'nyataḥ // 8.141 //

वह सात वर्ष की अवस्था में मरा हुआ अपने आपको उस पुक्कसत्व में देखता रहा; और नरक में वह प्रतिदिन जलाया जाता, कहीं पकाया जाता,

श्लोक 142 (markandeya.8.142)

खिद्यते क्षोभ्यतेऽन्यत्र मार्यते पाट्यतेऽन्यतः । क्षार्यते दीप्यतेऽन्यत्र शीतवाताहतोऽन्यतः ॥ 8.142 ॥

khidyate kṣobhyate 'nyatra māryate pāṭyate 'nyataḥ / kṣāryate dīpyate 'nyatra śītavātāhato 'nyataḥ // 8.142 //

कहीं पीड़ित किया जाता, कहीं मथा जाता, कहीं मारा जाता, कहीं चीरा जाता, कहीं दहलाया जाता, कहीं जलाया जाता, तथा कहीं शीतल वायु से प्रताड़ित होता।

श्लोक 143 (markandeya.8.143)

एवं दिनं वर्षशत-प्रमाणं नरकेऽभवत् । तथा वर्षशतं तत्र श्रीवितं नरके भटैः ॥ 8.143 ॥

evaṃ dinaṃ varṣaśata-pramāṇaṃ narake 'bhavat / tathā varṣaśataṃ tatra śrīvitaṃ narake bhaṭaiḥ // 8.143 //

इस प्रकार वहाँ नरक में एक-एक दिन सौ वर्षों के बराबर बीता; और सौ वर्षों तक उसे उन योद्धाओं द्वारा वहीं नरक में रखा गया।

श्लोक 144 (markandeya.8.144)

ततो निपातितो भूमौ विष्ठाशी श्वा व्यजायत । वान्ताशी शीतदग्धश्च मासमात्रे मृतोऽपि सः ॥ 8.144 ॥

tato nipātito bhūmau viṣṭhāśī śvā vyajāyata / vāntāśī śītadagdhaśca māsamātre mṛto 'pi saḥ // 8.144 //

तत्पश्चात् भूमि पर गिराए जाने पर वह मल खाने वाला कुत्ता बनकर जन्मा; वमन खाता, शीत से जलता हुआ वह एक मास में ही मर गया।

श्लोक 145 (markandeya.8.145)

अथापश्यत् खरं देहं हस्तिनं वानरं पशुम् । छागं विडालं कङ्कञ्च गामविं पक्षिणं कृमिम् ॥ 8.145 ॥

athāpaśyat kharaṃ dehaṃ hastinaṃ vānaraṃ paśum / chāgaṃ viḍālaṃ kaṅkañca gāmaviṃ pakṣiṇaṃ kṛmim // 8.145 //

फिर उसने गधे, हाथी, बन्दर, पशु, बकरे, बिल्ली, बगुले, गाय, भेड़, पक्षी और कीड़े का शरीर देखा,

श्लोक 146 (markandeya.8.146)

मत्स्यं कूर्मं वराहञ्च श्वाविधं कुक्कुटं शुकम् । शारिकां स्थावरांश्चैव सर्पमन्यांश्व देहिनः ॥ 8.146 ॥

matsyaṃ kūrmaṃ varāhañca śvāvidhaṃ kukkuṭaṃ śukam / śārikāṃ sthāvarāṃścaiva sarpamanyāṃśva dehinaḥ // 8.146 //

मछली, कछुआ, सूअर, साही, मुर्गा, तोता, मैना, वृक्ष तथा सर्प और अन्य प्राणियों के शरीर भी —

श्लोक 147 (markandeya.8.147)

दिवसे दिवसे जन्म प्राणिनः प्राणिनस्तदा । अपश्यद् दुः खसन्तप्तो दिनं वर्षशतं तथा ॥ 8.147 ॥

divase divase janma prāṇinaḥ prāṇinastadā / apaśyad duḥ khasantapto dinaṃ varṣaśataṃ tathā // 8.147 //

— प्रतिदिन एक अलग प्राणी के रूप में जन्म — इस प्रकार दुःख से संतप्त होकर उसने देखा, प्रत्येक दिन पुनः सौ वर्षों के बराबर था।

श्लोक 148 (markandeya.8.148)

एवं वर्षशतं पूर्णं गतं तत्र कुयोनिषु । अपश्यच्च कदाचित् स राजा तत् स्वकुलोद्भवम् ॥ 8.148 ॥

evaṃ varṣaśataṃ pūrṇaṃ gataṃ tatra kuyoniṣu / apaśyacca kadācit sa rājā tat svakulodbhavam // 8.148 //

इस प्रकार वहाँ उन नीच योनियों में पूरे सौ वर्ष बीत गए; और तब उस राजा ने अपने आपको अपने ही कुल में पुनः उत्पन्न होते देखा।

श्लोक 149 (markandeya.8.149)

तत्र स्थितस्य तस्यापि राज्यं द्यूतेन हारितम् । भार्या हृता च पुत्रश्च स चैकाकी वनं गतः ॥ 8.149 ॥

tatra sthitasya tasyāpi rājyaṃ dyūtena hāritam / bhāryā hṛtā ca putraśca sa caikākī vanaṃ gataḥ // 8.149 //

वहाँ स्थित उस [स्वयं] ने भी अपना राज्य द्यूत में हार दिया; उसकी पत्नी और पुत्र छीन लिए गए, और वह अकेला वन को चला गया।

श्लोक 150 (markandeya.8.150)

तत्रापश्यत स सिंहं वै व्यादितास्यं भयावहम् । बिभक्षयिषुमायातं शरभेण समन्वितम् ॥ 8.150 ॥

tatrāpaśyata sa siṃhaṃ vai vyāditāsyaṃ bhayāvaham / bibhakṣayiṣumāyātaṃ śarabheṇa samanvitam // 8.150 //

वहाँ उसने एक सिंह को देखा, मुख फैलाए हुए, भयंकर, शरभ के साथ उसे खाने के लिए आता हुआ।

श्लोक 151 (markandeya.8.151)

पुनश्च भक्षितः सोऽपि भार्यां शोचितुमुद्यतः । हा शैव्ये ! क्व गतास्यद्य मामिहापास्य दुः खितम् ॥ 8.151 ॥

punaśca bhakṣitaḥ so 'pi bhāryāṃ śocitumudyataḥ / hā śaivye ! kva gatāsyadya māmihāpāsya duḥ khitam // 8.151 //

और खाया जाते हुए भी वह अपनी पत्नी के लिए शोक करने लगा — 'हाय शैव्ये! मुझे यहाँ दुःखी छोड़कर आज तुम कहाँ चली गयी हो?'

श्लोक 152 (markandeya.8.152)

अपश्यत् पुनरेवापि भार्यां स्वं सहपुत्रकाम् । त्रायस्व त्वं हरिश्चन्द्र किं द्यूतेन तव प्रभो ॥ 8.152 ॥

apaśyat punarevāpi bhāryāṃ svaṃ sahaputrakām / trāyasva tvaṃ hariścandra kiṃ dyūtena tava prabho // 8.152 //

फिर उसने अपनी पत्नी को पुत्र सहित देखा — 'हे हरिश्चन्द्र, हमें बचाओ! तुम्हारे द्यूत से क्या लाभ हुआ, हे स्वामी?'

श्लोक 153 (markandeya.8.153)

पुत्रस्ते शोच्यतां प्राप्तो भर्यंया शैव्यया सह । स नापश्यत् पुनरपि धावमानः पुनः पुनः ॥ 8.153 ॥

putraste śocyatāṃ prāpto bharyaṃyā śaivyayā saha / sa nāpaśyat punarapi dhāvamānaḥ punaḥ punaḥ // 8.153 //

'तुम्हारा पुत्र शोक करने योग्य दशा को प्राप्त हुआ है, अपनी माता शैव्या सहित' — किन्तु दौड़ते-दौड़ते उसे वे फिर कहीं दिखाई न दिए।

श्लोक 154 (markandeya.8.154)

अथापश्यत् पुनरपि स्वर्गस्थः स नराधिपः । नीयते मुक्तकेशी सा दीना विवसना बलात् ॥ 8.154 ॥

athāpaśyat punarapi svargasthaḥ sa narādhipaḥ / nīyate muktakeśī sā dīnā vivasanā balāt // 8.154 //

फिर, मानो स्वर्ग में स्थित उस राजा ने पुनः देखा — वह [उसकी पत्नी] बालों के बिखरे हुए, दीन, वस्त्रहीन, बलपूर्वक खींची जा रही थी,

श्लोक 155 (markandeya.8.155)

हाहावाक्यं प्रमुञ्चन्ती त्रायस्वेत्यसकृत्स्वना । अथापश्यत् पुनस्तत्र धर्मराजस्य शासनात् ॥ 8.155 ॥

hāhāvākyaṃ pramuñcantī trāyasvetyasakṛtsvanā / athāpaśyat punastatra dharmarājasya śāsanāt // 8.155 //

बारंबार 'हाय, बचाओ' कहती हुई। फिर उसने देखा, वहाँ धर्मराज की आज्ञा से —

श्लोक 156 (markandeya.8.156)

आक्रान्दन्त्यन्तरीक्षस्था आगच्छेह नराधिप । विश्वामित्रेण विज्ञप्तो यमो राजंस्तवार्थतः ॥ 8.156 ॥

ākrāndantyantarīkṣasthā āgaccheha narādhipa / viśvāmitreṇa vijñapto yamo rājaṃstavārthataḥ // 8.156 //

'आकाश में विलाप करती हुई वह, यहाँ आओ हे राजन्! विश्वामित्र ने ही यम से तुम्हारे विषय में निवेदन किया है, हे राजन्!'

श्लोक 157 (markandeya.8.157)

इत्युक्त्वा सर्पपाशैस्तु नीयते बलवद्विभुः । श्राद्धदेवेन कथितं विश्वामित्रस्य चेष्टितम् ॥ 8.157 ॥

ityuktvā sarpapāśaistu nīyate balavadvibhuḥ / śrāddhadevena kathitaṃ viśvāmitrasya ceṣṭitam // 8.157 //

ऐसा कहकर, सर्प के पाशों से वह बलवती भी खींची जा रही थी। श्राद्धदेव यम ने उसे विश्वामित्र का यह आचरण बताया।

श्लोक 158 (markandeya.8.158)

तत्रापि तस्य विकृतिर्नाधर्मोत्था व्यवर्धत । एताः सर्वा दशास्तस्य याः स्वप्ने सम्प्रदर्शिताः ॥ 8.158 ॥

tatrāpi tasya vikṛtirnādharmotthā vyavardhata / etāḥ sarvā daśāstasya yāḥ svapne sampradarśitāḥ // 8.158 //

वहाँ भी उसका मन अधर्म से उत्पन्न विकार को प्राप्त नहीं हुआ। यह सब अवस्थाएँ उसे स्वप्न में ही दिखाई गयीं।

श्लोक 159 (markandeya.8.159)

सर्वास्तास्तेन सम्भुक्ता यावद्वर्षाणि द्वादश । अतीते द्वादशे वर्ष नीयमानो भटैर्बलात् ॥ 8.159 ॥

sarvāstāstena sambhuktā yāvadvarṣāṇi dvādaśa / atīte dvādaśe varṣa nīyamāno bhaṭairbalāt // 8.159 //

ये सब उसने बारह वर्षों तक भोगे; बारहवें वर्ष के बीत जाने पर, यम के सैनिकों द्वारा बलपूर्वक ले जाया जाता हुआ —

श्लोक 160 (markandeya.8.160)

यमं सोऽपश्यदाकारादुवाच च नराधिपम् । विश्वामित्रस्य कोपोऽयं दुर्निवार्यो महात्मनः ॥ 8.160 ॥

yamaṃ so 'paśyadākārāduvāca ca narādhipam / viśvāmitrasya kopo 'yaṃ durnivāryo mahātmanaḥ // 8.160 //

उसने यम को उनके स्वरूप से पहचाना, और यम ने राजा से कहा — 'उस महात्मा विश्वामित्र का यह क्रोध दुर्निवार्य है।'

श्लोक 161 (markandeya.8.161)

पुत्रस्य ते मृत्युमपि प्रदास्यति स कौशिकः । गच्छ त्वं मानुषं लोकं दुः खशेषञ्च भुङ्क्ष्व वै । गतस्य तत्र राजेन्द्र श्रेयस्तव भविष्यति ॥ 8.161 ॥

putrasya te mṛtyumapi pradāsyati sa kauśikaḥ / gaccha tvaṃ mānuṣaṃ lokaṃ duḥ khaśeṣañca bhuṅkṣva vai / gatasya tatra rājendra śreyastava bhaviṣyati // 8.161 //

'वह कौशिक तुम्हारे पुत्र की मृत्यु भी करा देगा। तुम अब मनुष्य-लोक को जाओ, और शेष दुःख भी भोगो — वहाँ जाकर, हे राजेन्द्र, तुम्हारा कल्याण होगा।'

श्लोक 162 (markandeya.8.162)

व्यतीते द्वादशे वर्षे दुः खस्यान्ते नराधिपः । अन्तरीक्षाच्च पतितो यमदूतैः प्रणोदितः ॥ 8.162 ॥

vyatīte dvādaśe varṣe duḥ khasyānte narādhipaḥ / antarīkṣācca patito yamadūtaiḥ praṇoditaḥ // 8.162 //

बारहवें वर्ष के बीत जाने पर, उस दुःख के अन्त में, यम के दूतों द्वारा धकेला गया राजा आकाश से नीचे गिर पड़ा —

श्लोक 163 (markandeya.8.163)

पतितो यमलोकाच्च विबुद्धो भयसम्भ्रमात् । अहो कष्टमिति ध्यात्वा क्षते क्षारावसेवनम् ॥ 8.163 ॥

patito yamalokācca vibuddho bhayasambhramāt / aho kaṣṭamiti dhyātvā kṣate kṣārāvasevanam // 8.163 //

— मानो यमलोक से गिरा हुआ, भय और घबराहट से जाग उठा। 'अहो, कैसा कष्ट!' ऐसा सोचते हुए, मानो घाव पर नमक-सा लगा —

श्लोक 164 (markandeya.8.164)

स्वप्ने दुः खं महद्दृष्टं यस्यान्तो नोपलभ्यते । स्वप्ने दृष्टं मया यत्तु किं नु मे द्वादशाः समाः ॥ 8.164 ॥

svapne duḥ khaṃ mahaddṛṣṭaṃ yasyānto nopalabhyate / svapne dṛṣṭaṃ mayā yattu kiṃ nu me dvādaśāḥ samāḥ // 8.164 //

'स्वप्न में मैंने कैसा महान दुःख देखा, जिसका अन्त ही न मिला। किन्तु जो मैंने स्वप्न में देखा — क्या वे सचमुच बारह वर्ष थे?'

श्लोक 165 (markandeya.8.165)

गतेत्यपृच्छत् तत्रस्थान् पुक्कसांस्तु स सम्भ्रमात् । नेत्युचुः केचित् तत्रस्था एवमेवापरेऽब्रुवन् ॥ 8.165 ॥

gatetyapṛcchat tatrasthān pukkasāṃstu sa sambhramāt / netyucuḥ kecit tatrasthā evamevāpare 'bruvan // 8.165 //

ऐसा घबराकर वहाँ खड़े पुक्कसों से उसने पूछा। कुछ ने कहा 'नहीं', और वहाँ खड़े अन्य लोगों ने भी वैसा ही कहा।

श्लोक 166 (markandeya.8.166)

श्रुत्वा दुः खी तदा राजा देवान् शरणमीयिवान् । स्वस्ति कुर्वन्तु मे देवाः शैव्याया बालकस्य च ॥ 8.166 ॥

śrutvā duḥ khī tadā rājā devān śaraṇamīyivān / svasti kurvantu me devāḥ śaivyāyā bālakasya ca // 8.166 //

यह सुनकर दुःखी राजा ने देवताओं की शरण ली — 'देवगण मेरा, शैव्या का, और बालक का कल्याण करें।'

श्लोक 167 (markandeya.8.167)

नमो धर्माय महते नमः कृष्णाय वेधसे । परावराय शुद्धाय पुराणायाव्ययाय च ॥ 8.167 ॥

namo dharmāya mahate namaḥ kṛṣṇāya vedhase / parāvarāya śuddhāya purāṇāyāvyayāya ca // 8.167 //

'महान् धर्म को नमस्कार; कृष्ण, उस विधाता को नमस्कार; परावर, शुद्ध, पुरातन और अव्यय को भी नमस्कार —'

श्लोक 168 (markandeya.8.168)

नमो बृहस्पते तुभ्यं नमस्ते वासवाय च । एवमुक्त्वा स राजा तु युक्तः पुक्कसकर्मणि ॥ 8.168 ॥

namo bṛhaspate tubhyaṃ namaste vāsavāya ca / evamuktvā sa rājā tu yuktaḥ pukkasakarmaṇi // 8.168 //

'बृहस्पति को नमस्कार, वासव (इन्द्र) को भी नमस्कार।' ऐसा कहकर वह राजा फिर पुक्कस-कर्म में लग गए —

श्लोक 169 (markandeya.8.169)

शवानां मूल्यकरणे पुनर्नष्टस्मृतिर्यथा । मलिनो जटिलः कृष्णो लकुटी विह्वलो नृपः ॥ 8.169 ॥

śavānāṃ mūlyakaraṇe punarnaṣṭasmṛtiryathā / malino jaṭilaḥ kṛṣṇo lakuṭī vihvalo nṛpaḥ // 8.169 //

शवों का शुल्क लेते हुए, मानो पुनः स्मृति खो चुके — मलिन, जटाधारी, श्याम, हाथ में लाठी लिए वह विह्वल राजा,

श्लोक 170 (markandeya.8.170)

नैव पुत्रो न भार्या तु तस्य वै स्मृतिगोचरे । नष्टोत्साहो राज्यनाशात् श्मशाने निवसंस्तदा ॥ 8.170 ॥

naiva putro na bhāryā tu tasya vai smṛtigocare / naṣṭotsāho rājyanāśāt śmaśāne nivasaṃstadā // 8.170 //

जिसे न पुत्र और न पत्नी की स्मृति रह गयी थी, राज्य के नाश से उत्साहरहित होकर, वहीं श्मशान में निवास करने लगे।

श्लोक 171 (markandeya.8.171)

अथाजगाम स्वसुतं मृतमादाय लापिनी । भार्या तस्य नरेन्द्रस्य सर्पदष्टं हि बालकम् ॥ 8.171 ॥

athājagāma svasutaṃ mṛtamādāya lāpinī / bhāryā tasya narendrasya sarpadaṣṭaṃ hi bālakam // 8.171 //

तभी विलाप करती हुई एक स्त्री अपने मृत पुत्र को लेकर आयी — वह उसी नरेन्द्र की पत्नी थी, और वह बालक सर्प-दंश से मरा था।

श्लोक 172 (markandeya.8.172)

हा वत्स ! हा पुत्र ! शिशो ! इत्येवं वदती मुहुः । कृशा विवर्णा विमनाः पांशुध्वस्तशिरोरुहा ॥ 8.172 ॥

hā vatsa ! hā putra ! śiśo ! ityevaṃ vadatī muhuḥ / kṛśā vivarṇā vimanāḥ pāṃśudhvastaśiroruhā // 8.172 //

'हाय वत्स! हाय पुत्र, शिशो!' — इस प्रकार बारंबार कहती हुई, कृश, विवर्ण, विक्षिप्त-मन, धूल से बिखरे केशों वाली वह —

श्लोक 173 (markandeya.8.173)

राजपत्न्युवाच । हा राजन्नद्य बालं त्वं पश्य सोमं महीतले । रममाणं पुरा दृष्टं दुष्टाहिना मृतम् ॥ 8.173 ॥

rājapatnyuvāca / hā rājannadya bālaṃ tvaṃ paśya somaṃ mahītale / ramamāṇaṃ purā dṛṣṭaṃ duṣṭāhinā mṛtam // 8.173 //

राजपत्नी ने कहा — 'हाय राजन्, आज इस बालक सोम को धरती पर देखो — जो पहले खेलता हुआ देखा गया था, अब दुष्ट सर्प से मरा हुआ।'

श्लोक 174 (markandeya.8.174)

तस्या विलापशब्दं तमाकर्ण्य स नराधिपः । जगाम त्वरितोऽत्रेति भविता मृतकम्बलः ॥ 8.174 ॥

tasyā vilāpaśabdaṃ tamākarṇya sa narādhipaḥ / jagāma tvarito 'treti bhavitā mṛtakambalaḥ // 8.174 //

उसकी विलाप-ध्वनि सुनकर वह राजा शीघ्रता से वहाँ गए, यह सोचते हुए कि यहाँ कोई मृतक का वस्त्र मिलेगा।

श्लोक 175 (markandeya.8.175)

स तां रोरुदतीं भार्यां नाभ्यजानात्तु पार्थिवः । चिरप्रवाससन्तप्तां पुनर्जातामिवाबलाम् ॥ 8.175 ॥

sa tāṃ rorudatīṃ bhāryāṃ nābhyajānāttu pārthivaḥ / cirapravāsasantaptāṃ punarjātāmivābalām // 8.175 //

किन्तु वह राजा अपनी उस रोती हुई पत्नी को नहीं पहचान सके — जो दीर्घ विरह से संतप्त, मानो पुनः जन्मी हुई अबला थी।

श्लोक 176 (markandeya.8.176)

सापि तं चारुकेशान्तं पुरा दृष्ट्वा जटालकम् । नाभ्यजानान्नृपसुता शुष्कवृक्षोपमं नृपम् ॥ 8.176 ॥

sāpi taṃ cārukeśāntaṃ purā dṛṣṭvā jaṭālakam / nābhyajānānnṛpasutā śuṣkavṛkṣopamaṃ nṛpam // 8.176 //

वह राजकुमारी भी, जिसने पहले उन्हें सुन्दर केशों वाला देखा था, अब जटाधारी, सूखे वृक्ष-सी उस राजा को नहीं पहचान सकी।

श्लोक 177 (markandeya.8.177)

सोऽपि कृष्णपटे बालं दृष्ट्वाशीविषपीडितम् । नरेन्द्रलक्षणोपेतं चिन्तामाप नरेश्वरः ॥ 8.177 ॥

so 'pi kṛṣṇapaṭe bālaṃ dṛṣṭvāśīviṣapīḍitam / narendralakṣaṇopetaṃ cintāmāpa nareśvaraḥ // 8.177 //

काले कपड़े पर पड़े, विषैले सर्प से पीड़ित, फिर भी राजोचित लक्षणों वाले उस बालक को देखकर वह नरेश्वर विचारमग्न हो गया —

श्लोक 178 (markandeya.8.178)

अहो कष्टं नरेन्द्रस्य कस्याप्येष कुले शिशुः । जातो नीतः कृतान्तेन कामप्याशां दुरात्मना ॥ 8.178 ॥

aho kaṣṭaṃ narendrasya kasyāpyeṣa kule śiśuḥ / jāto nītaḥ kṛtāntena kāmapyāśāṃ durātmanā // 8.178 //

'अहो कष्ट! किसी राजा के कुल में उत्पन्न यह शिशु, काल द्वारा ले लिया गया — किसी दुरात्मा की कोई आशा भी इसके साथ ही चली गयी।'

श्लोक 179 (markandeya.8.179)

एवं दृष्ट्वा हि मे बालं मातुरुत्सङ्गशायिनम् । स्मृतिमभ्यागतो बालो रोहिताश्वोऽब्जलोचनः ॥ 8.179 ॥

evaṃ dṛṣṭvā hi me bālaṃ māturutsaṅgaśāyinam / smṛtimabhyāgato bālo rohitāśvo 'bjalocanaḥ // 8.179 //

'इस बालक को अपनी माता की गोद में सोया हुआ देखकर मुझे मेरे अपने बालक, कमल-नेत्र रोहिताश्व की याद आ गयी है —'

श्लोक 180 (markandeya.8.180)

सोऽप्येतामेव मे वत्सो वयोऽवस्थामुपागतः । नीतो यदि न घोरेण कृतान्तेनात्मनो वशम् ॥ 8.180 ॥

so 'pyetāmeva me vatso vayo 'vasthāmupāgataḥ / nīto yadi na ghoreṇa kṛtāntenātmano vaśam // 8.180 //

'— यदि उसे भी उस भयंकर काल ने अपने वश में न किया हो, तो मेरा वह वत्स भी अब तक इसी उम्र को प्राप्त हो चुका होगा।'

श्लोक 181 (markandeya.8.181)

राजपत्न्युवाच । हा वत्स ! कस्य पापस्य अपध्यानादिदं महत् । दुः खमापतितं घोरं यस्यान्तो नोपलभ्यते ॥ 8.181 ॥

rājapatnyuvāca / hā vatsa ! kasya pāpasya apadhyānādidaṃ mahat / duḥ khamāpatitaṃ ghoraṃ yasyānto nopalabhyate // 8.181 //

राजपत्नी ने कहा — 'हाय वत्स! किसके पाप के, किसकी दुर्भावना के कारण यह इतना बड़ा, घोर दुःख आ पड़ा, जिसका अन्त ही नहीं मिलता?'

श्लोक 182 (markandeya.8.182)

हा नाथ ! राजन् ! भवता मामनाश्वास्य दुः खिताम् । क्वापि सन्तिष्ठता स्थाने विश्रब्धं स्थीयते कथम् ॥ 8.182 ॥

hā nātha ! rājan ! bhavatā māmanāśvāsya duḥ khitām / kvāpi santiṣṭhatā sthāne viśrabdhaṃ sthīyate katham // 8.182 //

'हाय स्वामी, राजन्! आप मुझ दुःखी को बिना सांत्वना दिए, कहीं और स्थित रहते हैं — मैं भला निश्चिन्त होकर कैसे रहूँ?'

श्लोक 183 (markandeya.8.183)

राज्यनाशः सुहृत्त्यागो भार्यातनयविक्रयः । हरिश्चन्द्रस्य राजर्षेः किं विधे ! न कृतं त्वया ॥ 8.183 ॥

rājyanāśaḥ suhṛttyāgo bhāryātanayavikrayaḥ / hariścandrasya rājarṣeḥ kiṃ vidhe ! na kṛtaṃ tvayā // 8.183 //

'राज्य का नाश, मित्रों का त्याग, पत्नी-पुत्र का विक्रय — हे विधाता, तुमने राजर्षि हरिश्चन्द्र के साथ क्या नहीं किया?'

श्लोक 184 (markandeya.8.184)

इति तस्या वचः श्रुत्वा राजा स्वस्थानतश्च्युतः । प्रत्यभिज्ञाय दयितां पुत्रञ्च निधनं गतम् ॥ 8.184 ॥

iti tasyā vacaḥ śrutvā rājā svasthānataścyutaḥ / pratyabhijñāya dayitāṃ putrañca nidhanaṃ gatam // 8.184 //

उसके ये वचन सुनकर, अपने ही स्थान से मानो च्युत हुआ राजा, अपनी प्रियतमा और अपने मृत पुत्र को पहचानकर —

श्लोक 185 (markandeya.8.185)

कष्टं शैव्येयमेषा हि स बालोऽयमितीरयन् । रुरोद दुः खसन्तप्तो मूर्च्छामभिजगाम च ॥ 8.185 ॥

kaṣṭaṃ śaivyeyameṣā hi sa bālo 'yamitīrayan / ruroda duḥ khasantapto mūrcchāmabhijagāma ca // 8.185 //

— 'हाय, यह तो वही शैव्या है, और यह वही बालक है' — ऐसा कहते हुए, दुःख से संतप्त होकर वे रो पड़े और मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 186 (markandeya.8.186)

सा च तं प्रत्यभिज्ञाय तामवस्थामुपागतम् । मूर्च्छिता निपपातार्ता निश्चेष्टा धरणीतले ॥ 8.186 ॥

sā ca taṃ pratyabhijñāya tāmavasthāmupāgatam / mūrcchitā nipapātārtā niśceṣṭā dharaṇītale // 8.186 //

और वह भी, उन्हें इस अवस्था में पहचानकर, पीड़ित होकर मूर्च्छित हो, निश्चेष्ट होकर धरती पर गिर पड़ीं।

श्लोक 187 (markandeya.8.187)

चेतः सम्प्राप्य राजेन्द्रो राजपत्नी च तै समम् । विलेपतुः सुसन्तप्तौ शोकभारावपीडितौ ॥ 8.187 ॥

cetaḥ samprāpya rājendro rājapatnī ca tai samam / vilepatuḥ susantaptau śokabhārāvapīḍitau // 8.187 //

चेत पाकर राजा और राजपत्नी दोनों ने शोक के भार से पीड़ित होकर साथ ही अत्यन्त संतप्त होकर विलाप किया।

श्लोक 188 (markandeya.8.188)

राजोवाच । हा वत्स ! सुकुमारं ते स्वक्षिभ्रूनासिकालकम् । पश्यतो मे मुखं दीनं हृदयं किं न दीर्यते ॥ 8.188 ॥

rājovāca / hā vatsa ! sukumāraṃ te svakṣibhrūnāsikālakam / paśyato me mukhaṃ dīnaṃ hṛdayaṃ kiṃ na dīryate // 8.188 //

राजा ने कहा — 'हाय वत्स! तेरे सुकुमार नेत्र, भौंह, नासिका और अलकों को देखते हुए, इस दीन मुख को देखकर भी क्या मेरा हृदय नहीं फटता?'

श्लोक 189 (markandeya.8.189)

तात ! तातेति मधुरं ब्रुवाणं स्वयमागतम् । उपगुह्य वदिष्ये कं वत्स ! वत्सेति सौहृदात् ॥ 8.189 ॥

tāta ! tāteti madhuraṃ bruvāṇaṃ svayamāgatam / upaguhya vadiṣye kaṃ vatsa ! vatseti sauhṛdāt // 8.189 //

'तात, तात कहकर मधुर वाणी में स्वयं दौड़कर आने वाले किसे अब गले लगाकर, वत्स, वत्स कहकर स्नेहवश पुकारूँगा?'

श्लोक 190 (markandeya.8.190)

कस्य जानुप्रणीतेन पिङ्गेन क्षितिरेणुना । ममोत्तरीयमुत्सङ्गं तथाङ्गं मलमेष्यति ॥ 8.190 ॥

kasya jānupraṇītena piṅgena kṣitireṇunā / mamottarīyamutsaṅgaṃ tathāṅgaṃ malameṣyati // 8.190 //

'अब किसकी घुटनों से उठी पिंगल मिट्टी मेरे उत्तरीय और मेरे अंगों को फिर मलिन करेगी?'

श्लोक 191 (markandeya.8.191)

अङ्गप्रत्यङ्गसम्भूतो मनोहृदयनन्दनः । मया कुपित्रा हा वत्स ! विक्रीतो येन वस्तुवत् ॥ 8.191 ॥

aṅgapratyaṅgasambhūto manohṛdayanandanaḥ / mayā kupitrā hā vatsa ! vikrīto yena vastuvat // 8.191 //

'अपने ही अंग-प्रत्यंग से उत्पन्न, मन और हृदय का आनन्द — हाय वत्स! मुझ कुपिता ने ही तुझे वस्तु के समान बेच दिया।'

श्लोक 192 (markandeya.8.192)

हृत्वा राज्यमशेषं मे ससाधनधनं महत् । दैवाहिना नृशंसेन दष्टो मे तनयस्ततः ॥ 8.192 ॥

hṛtvā rājyamaśeṣaṃ me sasādhanadhanaṃ mahat / daivāhinā nṛśaṃsena daṣṭo me tanayastataḥ // 8.192 //

'मेरा सम्पूर्ण राज्य, उसके साधन और महान् धन हरकर, फिर उस क्रूर दैव-सर्प ने मेरे पुत्र को भी डस लिया।'

श्लोक 193 (markandeya.8.193)

अहं दैवाहिदष्टस्य पुत्रस्याननपङ्कजम् । निरीक्षन्नपि घोरेण विषेणान्धीकृतोऽधुना ॥ 8.193 ॥

ahaṃ daivāhidaṣṭasya putrasyānanapaṅkajam / nirīkṣannapi ghoreṇa viṣeṇāndhīkṛto 'dhunā // 8.193 //

'दैव-सर्प से डँसे हुए अपने पुत्र के मुखकमल को देखते हुए भी, मैं मानो अभी उसी घोर विष से अंधा हो गया हूँ।'

श्लोक 194 (markandeya.8.194)

एकमुक्त्तवा तमादाय बालकं बाष्पगद्गदः । परिष्वज्य च निश्चेष्टो मूर्च्छया निपपात ह ॥ 8.194 ॥

ekamukttavā tamādāya bālakaṃ bāṣpagadgadaḥ / pariṣvajya ca niśceṣṭo mūrcchayā nipapāta ha // 8.194 //

इतना कहकर, आँसुओं से रुँधे स्वर में, उस बालक को उठाकर, गले लगाकर वे निश्चेष्ट होकर मूर्च्छित होकर गिर पड़े।

श्लोक 195 (markandeya.8.195)

राजपत्न्युवाच । अयं स पुरुषव्याघ्रः स्वरेणैवोपलक्ष्यते । विद्वज्जनमनश्चन्द्रो हरिश्चन्द्रो न संशयः ॥ 8.195 ॥

rājapatnyuvāca / ayaṃ sa puruṣavyāghraḥ svareṇaivopalakṣyate / vidvajjanamanaścandro hariścandro na saṃśayaḥ // 8.195 //

राजपत्नी ने कहा — 'यह वही पुरुषव्याघ्र है, इसके स्वर से ही पहचाना जा सकता है — यह निःसंदेह विद्वानों के मन का चन्द्रमा, हरिश्चन्द्र ही है।'

श्लोक 196 (markandeya.8.196)

तथास्य नासिका तुङ्गा अग्रतोऽधोमुखं गता । दन्ताश्च मुकुलप्रख्याः ख्यातकीर्तेर्महात्मनः ॥ 8.196 ॥

tathāsya nāsikā tuṅgā agrato 'dhomukhaṃ gatā / dantāśca mukulaprakhyāḥ khyātakīrtermahātmanaḥ // 8.196 //

'और इसकी यह ऊँची नासिका, जो अग्रभाग में कुछ झुकी हुई है, और कली-सी दाँतों की पंक्तियाँ भी उसी विख्यात-कीर्ति महात्मा की हैं।'

श्लोक 197 (markandeya.8.197)

श्मशानमागतः कस्मादद्यैष स नरेश्वरः । अपहाय पुत्रशोकं सापश्यत् पतितं पतिम् ॥ 8.197 ॥

śmaśānamāgataḥ kasmādadyaiṣa sa nareśvaraḥ / apahāya putraśokaṃ sāpaśyat patitaṃ patim // 8.197 //

'किन्तु यह नरेश्वर आज श्मशान में क्यों आया है?' — इस प्रकार पुत्र-शोक को क्षणभर के लिए छोड़कर उन्होंने अपने पति को गिरा हुआ देखा।

श्लोक 198 (markandeya.8.198)

प्रकृष्टा विस्मिता दीना भर्तृपुत्राधिपीडिता । वीक्षन्ती सा ततोऽपश्यद् भर्तृदण्डं जुगुप्सितम् ॥ 8.198 ॥

prakṛṣṭā vismitā dīnā bhartṛputrādhipīḍitā / vīkṣantī sā tato 'paśyad bhartṛdaṇḍaṃ jugupsitam // 8.198 //

विस्मित, दीन, पति और पुत्र दोनों के दुःख से पीड़ित वह ध्यान से देखती हुई, तब उसने अपने पति के उस घृणित दण्ड-चिह्न को देखा।

श्लोक 199 (markandeya.8.199)

श्वपाकार्हमतो मोहं जगामायतलोचना । प्राप्य चेतश्च शनकैः सगद्गदमभाषत ॥ 8.199 ॥

śvapākārhamato mohaṃ jagāmāyatalocanā / prāpya cetaśca śanakaiḥ sagadgadamabhāṣata // 8.199 //

उसने समझ लिया कि वे श्वपाक के योग्य कार्य में लगे हैं, और वह विशाल-नेत्रा मूर्च्छित हो गयी; धीरे-धीरे चेत पाकर रुँधे स्वर में यह कहने लगी —

श्लोक 200 (markandeya.8.200)

धिक् त्वां दैवातिकरुणां निर्मर्यादं जुगुप्सितम् । येनायममरप्रख्यो नीतो राजा श्वपाकताम् ॥ 8.200 ॥

dhik tvāṃ daivātikaruṇāṃ nirmaryādaṃ jugupsitam / yenāyamamaraprakhyo nīto rājā śvapākatām // 8.200 //

'धिक्कार है तुझ अत्यन्त निर्दय, सीमा-रहित, घृणित दैव को, जिसने इस देवोपम राजा को श्वपाक-दशा में ला दिया!'

श्लोक 201 (markandeya.8.201)

राज्यनाशं सुहृत्त्यागं भार्या-तनयविक्रयम् । प्रापयित्वापि नो कुक्तश्चण्डालोऽयं कृतो नृपः ॥ 8.201 ॥

rājyanāśaṃ suhṛttyāgaṃ bhāryā-tanayavikrayam / prāpayitvāpi no kuktaścaṇḍālo 'yaṃ kṛto nṛpaḥ // 8.201 //

'राज्य का नाश, मित्रों का त्याग, पत्नी-पुत्र का विक्रय दिलाकर भी संतुष्ट न होकर, इस राजा को तुमने चाण्डाल ही बना डाला!'

श्लोक 202 (markandeya.8.202)

हा राजन् ! जातसन्तापामित्थं मां धरणीतलात् । उत्थाप्य नाद्य पर्यङ्कमारोहेति किमुच्यते ॥ 8.202 ॥

hā rājan ! jātasantāpāmitthaṃ māṃ dharaṇītalāt / utthāpya nādya paryaṅkamāroheti kimucyate // 8.202 //

'हाय राजन्! आप मुझ संतप्त को इस प्रकार भूमि से उठाकर 'शय्या पर आओ' यह क्यों नहीं कहते, जैसा पहले कहा करते थे?'

श्लोक 203 (markandeya.8.203)

नाद्य पश्यामि ते छत्रं भृङ्गारमथवा पुनः । चामरं व्यजनञ्चापि कोऽयं विधिविपर्ययः ॥ 8.203 ॥

nādya paśyāmi te chatraṃ bhṛṅgāramathavā punaḥ / cāmaraṃ vyajanañcāpi ko 'yaṃ vidhiviparyayaḥ // 8.203 //

'आज मुझे न आपका छत्र दिखता है, न स्वर्ण-कलश, न चँवर, न पंखा — यह कैसा विधाता का विपर्यय है?'

श्लोक 204 (markandeya.8.204)

यस्याग्रे व्रजतः पूर्वं राजानो भृत्यतां गताः । स्वोत्तरीयैरकुर्वन्त नीरजस्कं महीतलम् ॥ 8.204 ॥

yasyāgre vrajataḥ pūrvaṃ rājāno bhṛtyatāṃ gatāḥ / svottarīyairakurvanta nīrajaskaṃ mahītalam // 8.204 //

'जिनके आगे चलने पर पहले राजा सेवक बनकर अपने ही उत्तरीय वस्त्रों से भूमि को धूलिरहित कर देते थे —'

श्लोक 205 (markandeya.8.205)

सोऽयं कपालसंलग्न-घटीघटनिरन्तरे । मृतनिर्माल्यसूत्रान्तर्गूग्केशे सुदारुणे ॥ 8.205 ॥

so 'yaṃ kapālasaṃlagna-ghaṭīghaṭanirantare / mṛtanirmālyasūtrāntargūgkeśe sudāruṇe // 8.205 //

'— वही आज इस अत्यन्त भयंकर स्थान में, खोपड़ियों से बँधे घड़ों की अनवरत पंक्तियों के बीच, मृतकों की मालाओं और सूत्रों के बीच निवास करते हैं,'

श्लोक 206 (markandeya.8.206)

वसानिस्यन्दसंशुष्क-महीपुटकमण्डिते । भस्माङ्गारार्धदग्धास्थि-मज्जासङ्घट्टभीषणे ॥ 8.206 ॥

vasānisyandasaṃśuṣka-mahīpuṭakamaṇḍite / bhasmāṅgārārdhadagdhāsthi-majjāsaṅghaṭṭabhīṣaṇe // 8.206 //

'— चर्बी के रिसाव से सूखी हुई कठोर भूमि पर, राख, अंगारों, आधे जले हुए अस्थि-मज्जा के संघर्षण से भयंकर,'

श्लोक 207 (markandeya.8.207)

गृध्र-गोमायुनादार्तनष्टक्षुद्रविहङ्गमे । चिताधूमाततिरुचा नीलीकृतदिगन्तरे ॥ 8.207 ॥

gṛdhra-gomāyunādārtanaṣṭakṣudravihaṅgame / citādhūmātatirucā nīlīkṛtadigantare // 8.207 //

'— जहाँ गीध-सियारों की चीत्कार से भयभीत छोटे पक्षी भाग जाते हैं, जहाँ चिता के धुएँ के फैलाव से दिशाएँ ही नीली हो गयी हैं,'

श्लोक 208 (markandeya.8.208)

कुणपास्वादनमुदा सम्प्रहृष्टनिशाचरे । चरत्यमेध्ये राजेन्द्रः श्मशाने दुः खपीडितः ॥ 8.208 ॥

kuṇapāsvādanamudā samprahṛṣṭaniśācare / caratyamedhye rājendraḥ śmaśāne duḥ khapīḍitaḥ // 8.208 //

'— जहाँ रात्रिचर प्राणी शव-मांस चखने के आनन्द से हर्षित होते हैं — उस अपवित्र श्मशान में यह राजाधिराज दुःख से पीड़ित होकर विचरता है।'

श्लोक 209 (markandeya.8.209)

एवमुक्त्वा समाश्लिष्य कण्ठं राज्ञो नृपात्मजा । कष्टशोकशताधारा विललापार्तया गिरा ॥ 8.209 ॥

evamuktvā samāśliṣya kaṇṭhaṃ rājño nṛpātmajā / kaṣṭaśokaśatādhārā vilalāpārtayā girā // 8.209 //

ऐसा कहकर उस राजकुमारी ने राजा के गले से लिपटकर सैकड़ों दुःख और शोक की धाराओं से युक्त, अत्यन्त पीड़ित वाणी में विलाप किया।

श्लोक 210 (markandeya.8.210)

राजपत्न्युवाच । राजन् ! स्वप्नोऽथ तथ्यं वा यदेतन्मन्यते भवान् । तत् कथ्यतां महाभाग मनो वै मुह्यते मम ॥ 8.210 ॥

rājapatnyuvāca / rājan ! svapno 'tha tathyaṃ vā yadetanmanyate bhavān / tat kathyatāṃ mahābhāga mano vai muhyate mama // 8.210 //

राजपत्नी ने कहा — 'हे राजन्, यह जो आप सोचते हैं, स्वप्न है या सत्य — वह मुझे बताइए, हे महाभाग, मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है।'

श्लोक 211 (markandeya.8.211)

यद्येतदेवं धर्मज्ञ नास्ति धर्मे सहायता । तथैव विप्रदेवादिपूजने पालने भुवः ॥ 8.211 ॥

yadyetadevaṃ dharmajña nāsti dharme sahāyatā / tathaiva vipradevādipūjane pālane bhuvaḥ // 8.211 //

'हे धर्मज्ञ, यदि यह ऐसा ही है, तो धर्म में कोई सहायता नहीं है, तथा ब्राह्मण-देवादि की पूजा में और पृथ्वी के पालन में भी नहीं,'

श्लोक 212 (markandeya.8.212)

नास्ति धर्मः कुतः सत्यमार्जवं चानृशंसता । यत्र त्वं धर्मपरमः स्वराज्यादवरोपितः ॥ 8.212 ॥

nāsti dharmaḥ kutaḥ satyamārjavaṃ cānṛśaṃsatā / yatra tvaṃ dharmaparamaḥ svarājyādavaropitaḥ // 8.212 //

'— न धर्म है, न सत्य, न सरलता, न निष्ठुरता का अभाव — जब आप, जो धर्म को परम मानते थे, अपने ही राज्य से उतार दिए गए!'

श्लोक 213 (markandeya.8.213)

इति तस्या वचः श्रुत्वा निश्वस्योष्णं सगद्गदम् । कथयामास तन्वङ्ग्या यथा प्राप्ता श्वपाकता ॥ 8.213 ॥

iti tasyā vacaḥ śrutvā niśvasyoṣṇaṃ sagadgadam / kathayāmāsa tanvaṅgyā yathā prāptā śvapākatā // 8.213 //

उसके ये वचन सुनकर, गरम साँस भरते हुए, रुँधे स्वर में, उन्होंने उस सुकुमारी को बताया कि वे किस प्रकार श्वपाकता को प्राप्त हुए।

श्लोक 214 (markandeya.8.214)

रुदित्वा सापि सुचिरं निश्वस्योष्णञ्च दुः खिता । स्वपुत्रमरणं भीरुर्यथावृत्तं न्यवेदयत् ॥ 8.214 ॥

ruditvā sāpi suciraṃ niśvasyoṣṇañca duḥ khitā / svaputramaraṇaṃ bhīruryathāvṛttaṃ nyavedayat // 8.214 //

वह भी बहुत देर तक रोकर, गरम साँसें भरकर, दुःखी होकर, भयभीत होकर, अपने पुत्र की मृत्यु का सारा वृत्तान्त उन्हें बताने लगीं।

श्लोक 215 (markandeya.8.215)

राजोवाच । प्रिये ! न रोचये दीर्घं कालं क्लेशमुपासितुम् । नात्मायत्तश्च तन्वङ्गि पश्य मे मन्दभाग्यताम् ॥ 8.215 ॥

rājovāca / priye ! na rocaye dīrghaṃ kālaṃ kleśamupāsitum / nātmāyattaśca tanvaṅgi paśya me mandabhāgyatām // 8.215 //

राजा ने कहा — 'हे प्रिये, मुझे यह क्लेश अब और अधिक समय सहना अच्छा नहीं लगता; और यह भी मेरे वश में नहीं — हे सुकुमारी, देखो मेरा यह दुर्भाग्य!'

श्लोक 216 (markandeya.8.216)

चण्डालेनाननुज्ञातः प्रवेक्ष्ये ज्वलनं यदि । चण्डालदासतां यास्ये पुनरप्यन्यजन्मनि ॥ 8.216 ॥

caṇḍālenānanujñātaḥ pravekṣye jvalanaṃ yadi / caṇḍāladāsatāṃ yāsye punarapyanyajanmani // 8.216 //

'यदि मैं चाण्डाल से बिना अनुमति लिए अग्नि में प्रवेश करूँ, तो दूसरे जन्म में मुझे फिर चाण्डाल की दासता ही प्राप्त होगी।'

श्लोक 217 (markandeya.8.217)

नरके च तपिष्यामि कोटकः कृमिभोजनः । वैतरण्यां महापूय-वसासृक्-स्नायुपिच्छिले ॥ 8.217 ॥

narake ca tapiṣyāmi koṭakaḥ kṛmibhojanaḥ / vaitaraṇyāṃ mahāpūya-vasāsṛk-snāyupicchile // 8.217 //

'और मुझे नरक में भी तपना होगा, कीड़ों का भोजन बनने वाला कीड़ा बनकर, महापूय-वसा-रक्त-स्नायुओं से भरी उस वैतरणी में,'

श्लोक 218 (markandeya.8.218)

असिपत्रवने प्राप्य छेदं प्राप्स्यामि दारुणम् । तापं प्राप्स्यामि वा प्राप्य महारौरवरौरवौ ॥ 8.218 ॥

asipatravane prāpya chedaṃ prāpsyāmi dāruṇam / tāpaṃ prāpsyāmi vā prāpya mahārauravarauravau // 8.218 //

'— असिपत्रवन में जाकर भयंकर छेदन सहना होगा, अथवा महारौरव और रौरव नरकों में जाकर दाह सहना होगा।'

श्लोक 219 (markandeya.8.219)

मग्नस्य दुः खजलधौ पारः प्राणवियोजनम् । एकोऽपि बालको योऽयमासीद्वंशकरः सुतः ॥ 8.219 ॥

magnasya duḥ khajaladhau pāraḥ prāṇaviyojanam / eko 'pi bālako yo 'yamāsīdvaṃśakaraḥ sutaḥ // 8.219 //

'दुःख के सागर में डूबे हुए के लिए प्राण-वियोग ही किनारा है — किन्तु यह जो अकेला पुत्र था, हमारे वंश को चलाने वाला —'

श्लोक 220 (markandeya.8.220)

मम दैवाम्बुवेगेन मग्नः सोऽपि बलीयसा । कथं प्राणान् विमुञ्चामि परायत्तोऽस्मि दुर्गतः ॥ 8.220 ॥

mama daivāmbuvegena magnaḥ so 'pi balīyasā / kathaṃ prāṇān vimuñcāmi parāyatto 'smi durgataḥ // 8.220 //

'— वह भी मेरे ही दुर्भाग्य की प्रबल जल-धारा में डूब गया। तब मैं प्राण कैसे त्याग दूँ, जब मैं स्वयं दुर्गति में पड़ा हुआ, पराधीन हूँ?'

श्लोक 221 (markandeya.8.221)

अथवा नार्तिना क्लिष्टो नरः पापमवेक्षते । तिर्यक्त्वे नास्ति तद्दुः शं नासिपत्रवने तथा ॥ 8.221 ॥

athavā nārtinā kliṣṭo naraḥ pāpamavekṣate / tiryaktve nāsti tadduḥ śaṃ nāsipatravane tathā // 8.221 //

'अथवा — दुःख से पीड़ित मनुष्य पाप का विचार नहीं करता। पशु-योनि में भी वैसा दुःख नहीं, न असिपत्रवन में —'

श्लोक 222 (markandeya.8.222)

वैतरण्याङ्कुतस्तादृग् यादृशं पुत्रविप्लवे । सोऽहं सुतशिरीरेण दीप्यमाने हुताशने ॥ 8.222 ॥

vaitaraṇyāṅkutastādṛg yādṛśaṃ putraviplave / so 'haṃ sutaśirīreṇa dīpyamāne hutāśane // 8.222 //

'— न वैतरणी में, जैसा पुत्र के विनाश में होता है। इसलिए मैं अपने पुत्र के शरीर सहित, प्रज्वलित अग्नि में —'

श्लोक 223 (markandeya.8.223)

निपतिष्यामि तन्वङ्गि क्षन्तव्यं कुकृतं मम । अनुज्ञाता च गच्छ त्वं विप्रवेश्म सुछिस्मिते ॥ 8.223 ॥

nipatiṣyāmi tanvaṅgi kṣantavyaṃ kukṛtaṃ mama / anujñātā ca gaccha tvaṃ vipraveśma suchismite // 8.223 //

'— गिर जाऊँगा, हे सुकुमारी; मेरा यह कुकृत्य क्षमा करना। और तुम मेरी अनुमति लेकर उस ब्राह्मण के घर चली जाओ, हे सुहासिनी।'

श्लोक 224 (markandeya.8.224)

मम वाक्यञ्च तन्वङ्गि निबोधादृतमानसा । यदि दत्तं यदि हुतं गुरवो यदि तोषिताः ॥ 8.224 ॥

mama vākyañca tanvaṅgi nibodhādṛtamānasā / yadi dattaṃ yadi hutaṃ guravo yadi toṣitāḥ // 8.224 //

'हे सुकुमारी, मेरा यह वचन भी आदरपूर्वक सुन लो — यदि मैंने कभी दान दिया हो, हवन किया हो, गुरुजनों को संतुष्ट किया हो —'

श्लोक 225 (markandeya.8.225)

परत्र सङ्गमो भूयात् पुत्रेण सह च त्वया । इह लोके कुतस्त्वेतद् भविष्यति ममेङ्गितम् ॥ 8.225 ॥

paratra saṅgamo bhūyāt putreṇa saha ca tvayā / iha loke kutastvetad bhaviṣyati mameṅgitam // 8.225 //

'— तो परलोक में पुत्र और तुम्हारे साथ मेरा पुनर्मिलन हो। इस लोक में तो अब यह मेरी इच्छा कैसे पूर्ण होगी?'

श्लोक 226 (markandeya.8.226)

त्वया सह मम श्रेयो गमनं पुत्रमार्गणे । यन्मया हसता किञ्चिद्रहस्ये वा शुचिस्मिते ॥ 8.226 ॥

tvayā saha mama śreyo gamanaṃ putramārgaṇe / yanmayā hasatā kiñcidrahasye vā śucismite // 8.226 //

'तुम्हारे साथ पुत्र की खोज में जाना ही मेरे लिए श्रेयस्कर है। तथा मैंने हँसते हुए, या एकांत में, जो भी —'

श्लोक 227 (markandeya.8.227)

अश्लीलमुक्तं तत् सर्वं क्षन्तव्यं मम याचतः । राजपत्नीति गर्वेण नावज्ञेयः स ते द्विजः । सर्वयत्नेन ते तोष्यः स्वामिदैवतवच्छुभे ॥ 8.227 ॥

aślīlamuktaṃ tat sarvaṃ kṣantavyaṃ mama yācataḥ / rājapatnīti garveṇa nāvajñeyaḥ sa te dvijaḥ / sarvayatnena te toṣyaḥ svāmidaivatavacchubhe // 8.227 //

'— अश्लील वचन तुमसे कहे हों, वे सब क्षमा करना, ऐसी मैं याचना करता हूँ। और राजपत्नी होने के गर्व से उस ब्राह्मण की अवहेलना कभी मत करना — हे शुभे, सर्वयत्न से उसे अपने स्वामी और देवता के समान संतुष्ट रखना।'

श्लोक 228 (markandeya.8.228)

राजपत्न्युवाच । अहमप्यत्र राजर्षे दीप्यमाने हुताशने । दुः खभारासहाद्यैव सह यास्यामि वै त्वया ॥ 8.228 ॥

rājapatnyuvāca / ahamapyatra rājarṣe dīpyamāne hutāśane / duḥ khabhārāsahādyaiva saha yāsyāmi vai tvayā // 8.228 //

राजपत्नी ने कहा — 'हे राजर्षे, मैं भी इस दुःख के असह्य भार को अब और नहीं सह सकती — मैं भी आज ही आपके साथ इस प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करूँगी।'

श्लोक 229 (markandeya.8.229)

पक्षिण ऊचुः । ततः कृत्वा चितां राजा आरोप्य तनयं स्वकम् । भार्यया सहितश्चासौ बद्धाञ्जलिपुटस्तदा ॥ 8.229 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / tataḥ kṛtvā citāṃ rājā āropya tanayaṃ svakam / bhāryayā sahitaścāsau baddhāñjalipuṭastadā // 8.229 //

पक्षियों ने कहा — तब राजा ने चिता बनाकर, उस पर अपने पुत्र को रखकर, अपनी पत्नी के साथ हाथ जोड़कर —

श्लोक 230 (markandeya.8.230)

चिन्तयन् परमात्मानमीशं नारायणं हरिम् । हृत्कोटरगुहासीनं वासुदेवं सुरेश्वरम् । अनादिनिधनं ब्रह्म कृष्णं पीताम्बरं शुभम् ॥ 8.230 ॥

cintayan paramātmānamīśaṃ nārāyaṇaṃ harim / hṛtkoṭaraguhāsīnaṃ vāsudevaṃ sureśvaram / anādinidhanaṃ brahma kṛṣṇaṃ pītāmbaraṃ śubham // 8.230 //

— परमात्मा, ईश, नारायण, हरि का ध्यान करते हुए — हृदय की गुहा में विराजमान वासुदेव, सुरेश्वर, अनादि-अनन्त ब्रह्म, श्याम-वर्ण, पीताम्बरधारी शुभ का —

श्लोक 231 (markandeya.8.231)

तस्य चिन्तयमानस्य सर्वे देवाः सवासवाः । धर्मं प्रमुखतः कृत्वा समाजग्मुस्त्वरान्विताः ॥ 8.231 ॥

tasya cintayamānasya sarve devāḥ savāsavāḥ / dharmaṃ pramukhataḥ kṛtvā samājagmustvarānvitāḥ // 8.231 //

— इस प्रकार ध्यान करते हुए राजा के पास, वासव सहित समस्त देवता, धर्म को आगे करके, शीघ्रतापूर्वक आ पहुँचे।

श्लोक 232 (markandeya.8.232)

आगत्य सर्वे प्रोचुस्ते भो भो राजन् ! शृणु प्रभो । अयं पितामहः साक्षाद्धर्मश्च भगवान् स्वयम् ॥ 8.232 ॥

āgatya sarve procuste bho bho rājan ! śṛṇu prabho / ayaṃ pitāmahaḥ sākṣāddharmaśca bhagavān svayam // 8.232 //

वहाँ आकर सब बोले — 'हे राजन्, हे प्रभो, सुनिए! ये साक्षात् पितामह हैं, और ये स्वयं भगवान् धर्म हैं,'

श्लोक 233 (markandeya.8.233)

साध्याश्च विश्वे मरुतो लोकपालाः सवाहनाः । नागाः सिद्धाः सगन्धर्वा रुद्राश्चैव तथाश्विनौ ॥ 8.233 ॥

sādhyāśca viśve maruto lokapālāḥ savāhanāḥ / nāgāḥ siddhāḥ sagandharvā rudrāścaiva tathāśvinau // 8.233 //

'— तथा साध्यगण, विश्वेदेव, मरुद्गण, अपने-अपने वाहनों सहित लोकपाल, नाग, सिद्ध, गन्धर्व, रुद्रगण, और दोनों अश्विनीकुमार भी हैं,'

श्लोक 234 (markandeya.8.234)

एते चान्ये च बहवो विश्वामित्रस्तथैव च । विश्वत्रयेण यो मित्रं कर्तुं न शकितः पुरा ॥ 8.234 ॥

ete cānye ca bahavo viśvāmitrastathaiva ca / viśvatrayeṇa yo mitraṃ kartuṃ na śakitaḥ purā // 8.234 //

'— ये और भी अनेक देवता, तथा स्वयं विश्वामित्र भी — जो कभी तीनों लोकों द्वारा भी मित्रता के योग्य नहीं बनाए जा सके थे,'

श्लोक 235 (markandeya.8.235)

विश्वामित्रस्तु ते मैत्रीमिष्टञ्चाहर्तुमिच्छति । आरुरोह ततः प्राप्तो धर्मः शक्रोऽथ गाधिजः ॥ 8.235 ॥

viśvāmitrastu te maitrīmiṣṭañcāhartumicchati / āruroha tataḥ prāpto dharmaḥ śakro 'tha gādhijaḥ // 8.235 //

'— वही विश्वामित्र अब आपसे मैत्री और अभीष्ट वरदान लाना चाहते हैं।' तब धर्म, इन्द्र और गाधि-पुत्र विश्वामित्र आगे आए और उठ खड़े हुए।

श्लोक 236 (markandeya.8.236)

धर्मि उवाच । मा राजन् ! साहसं कार्षोर्धर्मोऽहं त्वामुपागतः । तितिक्षा-दम-सत्याद्यैः स्वगुणैः परितोषितः ॥ 8.236 ॥

dharmi uvāca / mā rājan ! sāhasaṃ kārṣordharmo 'haṃ tvāmupāgataḥ / titikṣā-dama-satyādyaiḥ svaguṇaiḥ paritoṣitaḥ // 8.236 //

धर्म ने कहा — 'हे राजन्, यह दुःसाहस मत करो! मैं स्वयं धर्म, आपकी सहनशीलता, संयम, सत्य आदि गुणों से संतुष्ट होकर आपके पास आया हूँ।'

श्लोक 237 (markandeya.8.237)

इन्द्र उवाच । हरिश्चन्द्र माहभाग ! प्राप्तः शक्रोऽस्मितेऽन्तिकम् । त्वया सभार्यपुत्रेण जिता लोकाः सनातनाः ॥ 8.237 ॥

indra uvāca / hariścandra māhabhāga ! prāptaḥ śakro 'smite 'ntikam / tvayā sabhāryaputreṇa jitā lokāḥ sanātanāḥ // 8.237 //

इन्द्र ने कहा — 'हे महाभाग हरिश्चन्द्र! यह शक्र (इन्द्र) आपके निकट आया है। आपने अपनी पत्नी और पुत्र सहित सनातन लोकों को जीत लिया है।'

श्लोक 238 (markandeya.8.238)

आरोह त्रिदिवं राजन् ! भार्यापुत्रसमन्वितः । सुदुष्प्राप्तं नरैरन्यैर्जितमात्मीयकर्मभिः ॥ 8.238 ॥

āroha tridivaṃ rājan ! bhāryāputrasamanvitaḥ / suduṣprāptaṃ narairanyairjitamātmīyakarmabhiḥ // 8.238 //

'हे राजन्, अपनी पत्नी और पुत्र सहित त्रिदिव (स्वर्ग) में आरोहण कीजिए — वह लोक जो अन्य मनुष्यों को अत्यन्त दुर्लभ है, आपने अपने ही कर्मों से जीत लिया है।'

श्लोक 239 (markandeya.8.239)

पक्षिण ऊचुः । ततोऽमृतमयं वर्षमपमृत्युविनाशनम् । इन्द्रः प्रासृजदाकाशाच्चितास्थानगतः प्रभुः ॥ 8.239 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / tato 'mṛtamayaṃ varṣamapamṛtyuvināśanam / indraḥ prāsṛjadākāśāccitāsthānagataḥ prabhuḥ // 8.239 //

पक्षियों ने कहा — तब चिता के स्थान पर उपस्थित प्रभु इन्द्र ने आकाश से अमृतमय, अकाल-मृत्यु का नाश करने वाली वर्षा की —

श्लोक 240 (markandeya.8.240)

पुष्पवर्षञ्च सुमहद्देवदुन्दुभिनिस्वनम् । ततस्ततो वर्तमाने समाजे देवसंकुले ॥ 8.240 ॥

puṣpavarṣañca sumahaddevadundubhinisvanam / tatastato vartamāne samāje devasaṃkule // 8.240 //

— तथा महान् पुष्प-वर्षा और देव-दुन्दुभियों की ध्वनि भी। देवताओं से भरी उस सभा में, तभी वहाँ —

श्लोक 241 (markandeya.8.241)

समुत्तस्थौ ततः पुत्रो राज्ञस्तस्य महात्मनः । सुकुमारतनुः सुस्थः प्रसन्नेन्द्रियमानसः ॥ 8.241 ॥

samuttasthau tataḥ putro rājñastasya mahātmanaḥ / sukumāratanuḥ susthaḥ prasannendriyamānasaḥ // 8.241 //

— उस महात्मा राजा का पुत्र फिर उठ खड़ा हुआ, सुकुमार शरीर वाला, स्वस्थ, प्रसन्न इन्द्रिय और मन वाला।

श्लोक 242 (markandeya.8.242)

ततो राजा हरिश्चन्द्रः परिष्वज्य सुतं क्षणात् । सभार्यः स श्रिया युक्तो दिव्यमाल्याम्बरान्वितः ॥ 8.242 ॥

tato rājā hariścandraḥ pariṣvajya sutaṃ kṣaṇāt / sabhāryaḥ sa śriyā yukto divyamālyāmbarānvitaḥ // 8.242 //

तब राजा हरिश्चन्द्र ने क्षणभर में अपने पुत्र को गले लगाया, अपनी पत्नी सहित, राजलक्ष्मी से युक्त, दिव्य माला-वस्त्रों से सुशोभित होकर,

श्लोक 243 (markandeya.8.243)

सुस्थः सम्पूर्णहृदयो मुदा परमया युतः । बभूव तत्क्षणादिन्द्रो भूयश्चैनमभाषत ॥ 8.243 ॥

susthaḥ sampūrṇahṛdayo mudā paramayā yutaḥ / babhūva tatkṣaṇādindro bhūyaścainamabhāṣata // 8.243 //

स्वस्थ, पूर्ण हृदय, परम आनन्द से युक्त हो गए। उसी क्षण इन्द्र ने उनसे फिर कहा —

श्लोक 244 (markandeya.8.244)

सभार्यस्त्वं सपुत्रश्च प्राप्स्यसे सद्गतिं पराम् । समारोह माहभाग निजानां कर्मणां फलैः ॥ 8.244 ॥

sabhāryastvaṃ saputraśca prāpsyase sadgatiṃ parām / samāroha māhabhāga nijānāṃ karmaṇāṃ phalaiḥ // 8.244 //

'तुम अपनी पत्नी और पुत्र सहित परम सद्गति को प्राप्त होगे। हे महाभाग, अपने ही कर्मों के फलों के साथ आरोहण करो।'

श्लोक 245 (markandeya.8.245)

हरिश्चन्द्र उवाच । देवराजाननुज्ञातः स्वामिना श्वपचेन वै । अगत्वा निष्कृतिं तस्य नारोक्ष्येऽहं सुरालयम् ॥ 8.245 ॥

hariścandra uvāca / devarājānanujñātaḥ svāminā śvapacena vai / agatvā niṣkṛtiṃ tasya nārokṣye 'haṃ surālayam // 8.245 //

हरिश्चन्द्र ने कहा — 'हे देवराज, अपने स्वामी श्वपच की अनुमति लिए बिना, तथा उसका ऋण चुकाए बिना, मैं देवलोक में आरोहण नहीं करूँगा।'

श्लोक 246 (markandeya.8.246)

धर्म उवाच । तवैनं भाविनं क्लेशमवगम्यात्ममायया । आत्मा श्वपाकतां नीतो दर्शितं तच्च चापलम् ॥ 8.246 ॥

dharma uvāca / tavainaṃ bhāvinaṃ kleśamavagamyātmamāyayā / ātmā śvapākatāṃ nīto darśitaṃ tacca cāpalam // 8.246 //

धर्म ने कहा — 'तुम्हारे इस भावी क्लेश को जानकर, मैंने अपनी ही माया से स्वयं को श्वपाक बनाया था; वह [तुम्हारी] अटलता ही इस प्रकार दिखायी गयी।'

श्लोक 247 (markandeya.8.247)

इन्द्र उवाच । प्रार्थ्यते यत् परं स्थानं समस्तैर्मनुजैर्भुवि । तदारोह हरिश्चन्द्र स्थानं पुण्यकृतां नृणाम् ॥ 8.247 ॥

indra uvāca / prārthyate yat paraṃ sthānaṃ samastairmanujairbhuvi / tadāroha hariścandra sthānaṃ puṇyakṛtāṃ nṛṇām // 8.247 //

इन्द्र ने कहा — 'जिस परम स्थान की कामना पृथ्वी पर सभी मनुष्य करते हैं, उस पुण्यकर्मियों के स्थान में, हे हरिश्चन्द्र, अब आरोहण करो।'

श्लोक 248 (markandeya.8.248)

हरिश्चन्द्र उवाच । देवाराज ! नमस्तुभ्यं वाक्यञ्चैतन्निबोध मे । प्रसादसुमुखं यत् त्वां ब्रवीमि प्रश्रयान्वितः ॥ 8.248 ॥

hariścandra uvāca / devārāja ! namastubhyaṃ vākyañcaitannibodha me / prasādasumukhaṃ yat tvāṃ bravīmi praśrayānvitaḥ // 8.248 //

हरिश्चन्द्र ने कहा — 'हे देवराज, आपको नमस्कार; मेरा यह वचन भी सुनिए, जो मैं विनयपूर्वक, आपकी कृपा की आशा से कह रहा हूँ।'

श्लोक 249 (markandeya.8.249)

मच्छोकमग्नमनसः कोशलानगरे जनाः । तिष्ठन्ति तानपोह्याद्य कथं यास्याम्यहं दिवम् ॥ 8.249 ॥

macchokamagnamanasaḥ kośalānagare janāḥ / tiṣṭhanti tānapohyādya kathaṃ yāsyāmyahaṃ divam // 8.249 //

'मेरे शोक में डूबे हुए मन वाले कोसल-नगर के लोग वहीं रह गए हैं — उन्हें त्यागकर आज मैं स्वर्ग कैसे जाऊँ?'

श्लोक 250 (markandeya.8.250)

ब्रह्महत्या गुरोर्घातो गोवधः स्त्रीवधस्तथा । तुल्यमेभिर्महापापं भक्तत्यागेऽप्युदाहृतम् ॥ 8.250 ॥

brahmahatyā gurorghāto govadhaḥ strīvadhastathā / tulyamebhirmahāpāpaṃ bhaktatyāge 'pyudāhṛtam // 8.250 //

'ब्रह्महत्या, गुरु-हत्या, गौ-हत्या तथा स्त्री-हत्या — इनके समान महापाप भक्त के त्याग में भी बताया गया है।'

श्लोक 251 (markandeya.8.251)

भजन्तं भक्तमत्याज्यमदुष्टं त्यजतः सुखम् । नेह नामुत्र पश्यामि तस्माच्छक्र ! दिवं व्रज ॥ 8.251 ॥

bhajantaṃ bhaktamatyājyamaduṣṭaṃ tyajataḥ sukham / neha nāmutra paśyāmi tasmācchakra ! divaṃ vraja // 8.251 //

'अपने भक्त, त्याज्य न होने योग्य, निर्दोष भक्त को त्यागने वाले के लिए न इस लोक में, न परलोक में सुख दिखता है — इसलिए, हे शक्र, आप स्वयं ही स्वर्ग जाइए।'

श्लोक 252 (markandeya.8.252)

यदि ते सहिताः स्वर्गं मया यान्ति सुरेश्वर । ततोऽहमपि यास्यामि नरकं वापि तैः सह ॥ 8.252 ॥

yadi te sahitāḥ svargaṃ mayā yānti sureśvara / tato 'hamapi yāsyāmi narakaṃ vāpi taiḥ saha // 8.252 //

'हे सुरेश्वर, यदि वे भी मेरे साथ स्वर्ग जाते हैं, तो मैं भी जाऊँगा — अन्यथा उनके साथ नरक में भी जाऊँगा।'

श्लोक 253 (markandeya.8.253)

इन्द्र उवाच । बहूनि पुण्यपापानि तेषां भिन्नानि वै पृथक् । कथं सङ्घातभोग्यं त्वं भूयः स्वर्गमवाप्स्यसि ॥ 8.253 ॥

indra uvāca / bahūni puṇyapāpāni teṣāṃ bhinnāni vai pṛthak / kathaṃ saṅghātabhogyaṃ tvaṃ bhūyaḥ svargamavāpsyasi // 8.253 //

इन्द्र ने कहा — 'उनके पुण्य और पाप बहुत हैं, और सबके अलग-अलग हैं। तुम सबको एक साथ भोगने योग्य बनाकर फिर स्वर्ग कैसे प्राप्त करोगे?'

श्लोक 254 (markandeya.8.254)

हरिश्चन्द्र उवाच । शक्र भुङ्क्ते नृपो राज्यं प्रभावेण कुटुम्बिनाम् । यजते च महायज्ञैः कर्म पौर्तं करोति च ॥ 8.254 ॥

hariścandra uvāca / śakra bhuṅkte nṛpo rājyaṃ prabhāveṇa kuṭumbinām / yajate ca mahāyajñaiḥ karma paurtaṃ karoti ca // 8.254 //

हरिश्चन्द्र ने कहा — 'हे शक्र, राजा अपनी प्रजा के ही प्रभाव से राज्य भोगता है, महायज्ञों से यजन करता है, और पूर्त-कर्म भी करता है।'

श्लोक 255 (markandeya.8.255)

तच्च तेषां प्रभावेण मया सर्वमनुष्ठितम् । उपकर्तॄन् न सन्त्यक्ष्ये तानहं स्वर्गलिप्सया ॥ 8.255 ॥

tacca teṣāṃ prabhāveṇa mayā sarvamanuṣṭhitam / upakartṝn na santyakṣye tānahaṃ svargalipsayā // 8.255 //

'वह सब कुछ मैंने उन्हीं के प्रभाव से किया है। मैं स्वर्ग की इच्छा के कारण उन उपकारी लोगों को नहीं त्यागूँगा।'

श्लोक 256 (markandeya.8.256)

तस्माद्यन्मम देवेश किञ्चिदस्ति सुचेष्टितम् । दत्तमिष्टमथो जप्तं सामान्यं तैस्तदस्तु नः ॥ 8.256 ॥

tasmādyanmama deveśa kiñcidasti suceṣṭitam / dattamiṣṭamatho japtaṃ sāmānyaṃ taistadastu naḥ // 8.256 //

'इसलिए, हे देवेश, मेरा जो भी कोई सत्कर्म है — दिया हुआ, यज्ञ किया हुआ, अथवा जप किया हुआ — वह हम सबका समान हो जाए।'

श्लोक 257 (markandeya.8.257)

बहुकालोपभोग्यं हि फलं यन्मम कर्मणः । तदस्तु दिनमप्येकं तैः समं त्वत्प्रसादतः ॥ 8.257 ॥

bahukālopabhogyaṃ hi phalaṃ yanmama karmaṇaḥ / tadastu dinamapyekaṃ taiḥ samaṃ tvatprasādataḥ // 8.257 //

'मेरे कर्मों का जो फल दीर्घकाल तक भोगने योग्य है, वह आपकी कृपा से एक दिन के लिए ही सही, उनके साथ बराबर हो जाए।'

श्लोक 258 (markandeya.8.258)

पक्षिण ऊचुः । एवं भविष्यतीत्युक्त्वा शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः । प्रसन्नचेता धर्मश्च विश्वामित्रश्च गाधिजः ॥ 8.258 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / evaṃ bhaviṣyatītyuktvā śakrastribhuvaneśvaraḥ / prasannacetā dharmaśca viśvāmitraśca gādhijaḥ // 8.258 //

पक्षियों ने कहा — 'ऐसा ही होगा' कहकर त्रिभुवनेश्वर शक्र, तथा प्रसन्न-चित्त धर्म और गाधि-पुत्र विश्वामित्र —

श्लोक 259 (markandeya.8.259)

विमानकोटिसम्बद्धं स्वर्गलोकान्महीतलम् । गत्वायोध्याजनं प्राह दिवमारुह्यतामिति ॥ 8.259 ॥

vimānakoṭisambaddhaṃ svargalokānmahītalam / gatvāyodhyājanaṃ prāha divamāruhyatāmiti // 8.259 //

— करोड़ों विमानों से स्वर्गलोक को पृथ्वीतल से जोड़कर, अयोध्या के लोगों के पास जाकर बोले — 'स्वर्ग में आरोहण करो।'

श्लोक 260 (markandeya.8.260)

तदिन्द्रस्य वचः श्रुत्वा प्रीत्या तस्य च भूपतेः । आनीय रोहिताश्चञ्च विश्वामित्रो महातपाः ॥ 8.260 ॥

tadindrasya vacaḥ śrutvā prītyā tasya ca bhūpateḥ / ānīya rohitāścañca viśvāmitro mahātapāḥ // 8.260 //

इन्द्र के इस वचन को सुनकर, तथा उस राजा के प्रति स्नेहवश, महातपस्वी विश्वामित्र ने रोहिताश्व को बुलाकर,

श्लोक 261 (markandeya.8.261)

अयोध्याख्ये पुरे रम्ये सोऽभ्यसिञ्चन्नृपात्मजम् । देवैश्च मुनिभिः सिद्धैरभिषिच्य नराधिपम् ॥ 8.261 ॥

ayodhyākhye pure ramye so 'bhyasiñcannṛpātmajam / devaiśca munibhiḥ siddhairabhiṣicya narādhipam // 8.261 //

सुन्दर अयोध्या नामक नगरी में उस राजकुमार का राज्याभिषेक किया; देवताओं, मुनियों और सिद्धों के साथ उस नरेश को अभिषिक्त किया।

श्लोक 262 (markandeya.8.262)

राज्ञा सह तदा सर्वे हृष्टपुष्टसुहृज्जनाः । सपुत्रभृत्यदारास्ते दिवमारुरुहुर्जनाः ॥ 8.262 ॥

rājñā saha tadā sarve hṛṣṭapuṣṭasuhṛjjanāḥ / saputrabhṛtyadārāste divamāruruhurjanāḥ // 8.262 //

तब राजा के साथ सभी हर्षित, समृद्ध लोग, अपने पुत्रों, सेवकों और पत्नियों सहित स्वर्ग की ओर आरोहण करने लगे।

श्लोक 263 (markandeya.8.263)

पदे पदे विमानात् ते विमानमगमन् नराः । तदा सम्भूतहर्षोऽसौ हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः ॥ 8.263 ॥

pade pade vimānāt te vimānamagaman narāḥ / tadā sambhūtaharṣo 'sau hariścandraśca pārthivaḥ // 8.263 //

वे लोग एक विमान से दूसरे विमान में पद-पद पर चढ़ते गए; तब हर्ष से भरे हुए राजा हरिश्चन्द्र,

श्लोक 264 (markandeya.8.264)

सम्प्राप्य भूतिमतुलां विमानैः स महीपतिः । आसाञ्चक्रे पुराकारे वप्रप्राकारसंवृते ॥ 8.264 ॥

samprāpya bhūtimatulāṃ vimānaiḥ sa mahīpatiḥ / āsāñcakre purākāre vapraprākārasaṃvṛte // 8.264 //

उन विमानों द्वारा अनुपम वैभव को प्राप्त होकर, प्राचीरों और मीनारों से घिरी हुई एक नगरी-सी रचना में स्थित हो गए।

श्लोक 265 (markandeya.8.265)

ततस्तस्यर्धिमालोक्य श्लोकं तत्रोशना जगौ । दैत्याचार्यो महाभागः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥ 8.265 ॥

tatastasyardhimālokya ślokaṃ tatrośanā jagau / daityācāryo mahābhāgaḥ sarvaśāstrārthatattvavit // 8.265 //

तब उनकी उस समृद्धि को देखकर, सभी शास्त्रों के अर्थ-तत्त्व के ज्ञाता, दैत्यों के आचार्य महाभाग उशना (शुक्र) ने वहाँ यह श्लोक गाया —

श्लोक 266 (markandeya.8.266)

शुक्र उवाच । हरिश्चन्द्रसमो राजा न भूतो न भविष्यति । यः शृणोति स्वदुः खार्तः स सुखं महदाप्नुयात् ॥ 8.266 ॥

śukra uvāca / hariścandrasamo rājā na bhūto na bhaviṣyati / yaḥ śṛṇoti svaduḥ khārtaḥ sa sukhaṃ mahadāpnuyāt // 8.266 //

शुक्र ने कहा — 'हरिश्चन्द्र के समान कोई राजा न हुआ है, न होगा। जो अपने ही दुःख से पीड़ित होकर भी इसे सुनता है, वह महान सुख प्राप्त करेगा।'

श्लोक 267 (markandeya.8.267)

स्वर्गार्थोप्राप्नुयात् स्वर्गं पुत्रार्थो पुत्रमाप्नुयात् । भार्यार्थो प्राप्नुयाद्भार्यां राज्यार्थो राज्यमाप्नुयात् ॥ 8.267 ॥

svargārthoprāpnuyāt svargaṃ putrārtho putramāpnuyāt / bhāryārtho prāpnuyādbhāryāṃ rājyārtho rājyamāpnuyāt // 8.267 //

'स्वर्ग चाहने वाला स्वर्ग पाएगा, पुत्र चाहने वाला पुत्र पाएगा, पत्नी चाहने वाला पत्नी पाएगा, राज्य चाहने वाला राज्य पाएगा।'

श्लोक 268 (markandeya.8.268)

अहो तितिक्षामाहात्म्यमहो दानफलं महत् । यदागतो हरिश्चन्द्रः पुरीञ्चेन्द्रत्वमाप्तवान् ॥ 8.268 ॥

aho titikṣāmāhātmyamaho dānaphalaṃ mahat / yadāgato hariścandraḥ purīñcendratvamāptavān // 8.268 //

'अहो, सहनशीलता की महिमा! अहो, दान का यह महान फल! क्योंकि इस दशा को प्राप्त होकर भी हरिश्चन्द्र ने इन्द्र-पद ही प्राप्त कर लिया!'

श्लोक 269 (markandeya.8.269)

पक्षिण ऊचुः । एतत् ते सर्वमाख्यातं हरिश्चन्द्रविचेष्टितम् । अतः परं कथाशेषः श्रूयतां मुनिसत्तम ॥ 8.269 ॥

pakṣiṇa ūcuḥ / etat te sarvamākhyātaṃ hariścandraviceṣṭitam / ataḥ paraṃ kathāśeṣaḥ śrūyatāṃ munisattama // 8.269 //

पक्षियों ने कहा — यह हरिश्चन्द्र का सम्पूर्ण आचरण तुम्हें बता दिया गया; हे मुनिश्रेष्ठ, अब इससे आगे की शेष कथा सुनो।

श्लोक 270 (markandeya.8.270)

विपाको राजसूयस्य पृथिवीक्षयकारणम् । तद्विपाकनिमित्तञ्च युद्धमाडिबकं महत् ॥ 8.270 ॥

vipāko rājasūyasya pṛthivīkṣayakāraṇam / tadvipākanimittañca yuddhamāḍibakaṃ mahat // 8.270 //

वह राजसूय यज्ञ का ही परिपाक था, जो पृथ्वी के विनाश का कारण बना; और उसी परिपाक के निमित्त से आडि और बक का वह महान युद्ध हुआ।

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