सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 98
मालिनीपरिणय
श्लोक 1 (markandeya.98.1)
मार्कण्डेय उवाच ततस्तस्मान्नदीमध्यात्समुत्तस्थौ मनोरमा । प्रम्लोचा नाम तन्वङ्गी तत्समीपे वराप्सराः ॥ 98.1 ॥
mārkaṇḍeya uvāca tatastasmānnadīmadhyātsamuttasthau manoramā pramlocā nāma tanvaṅgī tatsamīpe varāpsarāḥ
मार्कण्डेय ने कहा — तब उस नदी के बीच से एक सुन्दर, कोमलांगी, श्रेष्ठ अप्सरा प्रम्लोचा नामक उसके निकट प्रकट हुई।
श्लोक 2 (markandeya.98.2)
सा चोवाच महात्मानं रुचिं सुमधुराक्षरम् । प्रश्रयावनता सुभूः प्रम्लोचा वै वराप्सराः ॥ 98.2 ॥
sā covāca mahātmānaṁ ruciṁ sumadhurākṣaram praśrayāvanatā subhūḥ pramlocā vai varāpsarāḥ
सुन्दर भौंहों वाली वह श्रेष्ठ अप्सरा प्रम्लोचा, विनयपूर्वक झुककर, महात्मा रुचि से मधुर वाणी में बोली।
श्लोक 3 (markandeya.98.3)
अतीव रूपिणी कन्या मत्सुता तपतां वर । जाता वरुणपुत्रेण पुष्करेण महात्मना ॥ 98.3 ॥
atīva rūpiṇī kanyā matsutā tapatāṁ vara jātā varuṇaputreṇa puṣkareṇa mahātmanā
हे तपस्वियों में श्रेष्ठ! मेरी एक अत्यन्त रूपवती कन्या है, जो महात्मा वरुणपुत्र पुष्कर से उत्पन्न हुई है।
श्लोक 4 (markandeya.98.4)
तां गृहाण मया दत्तां भार्यार्थे वरवर्णिनीम् । मनुर्महामतिस्तस्यां समुत्पस्यति ते सुतः ॥ 98.4 ॥
tāṁ gṛhāṇa mayā dattāṁ bhāryārthe varavarṇinīm manurmahāmatistasyāṁ samutpasyati te sutaḥ
उस सुन्दर वर्ण वाली कन्या को मेरे द्वारा दी गई पत्नी के रूप में ग्रहण करो; उसमें महाबुद्धिमान् मनु तुम्हारे पुत्र रूप में उत्पन्न होंगे।
श्लोक 5 (markandeya.98.5)
मार्कण्डेय उवाच तथेति तेन साऽप्युक्ता तस्मात्तोयाद्वपुष्मतीम् । उज्जहार ततः कन्यां मालिनी नाम नामतः ॥ 98.5 ॥
mārkaṇḍeya uvāca tatheti tena sā 'pyuktā tasmāttoyādvapuṣmatīm ujjahāra tataḥ kanyāṁ mālinī nāma nāmataḥ
मार्कण्डेय ने कहा — 'ऐसा ही हो' यह कहकर उन्होंने उस जल से मालिनी नामक उस सुन्दर-शरीर वाली कन्या को बाहर निकाला।
श्लोक 6 (markandeya.98.6)
नद्याश्च पुलिने तस्मिन्स रुचिर्मुनिसत्तमः । जग्राह पाणिं विधिवत्समानाय्य महामुनीन् ॥ 98.6 ॥
nadyāśca puline tasminsa rucirmunisattamaḥ jagrāha pāṇiṁ vidhivatsamānāyya mahāmunīn
उस मुनिश्रेष्ठ रुचि ने महान् मुनियों को एकत्र कर, उसी नदी-तट पर विधिपूर्वक उसका पाणिग्रहण किया।
श्लोक 7 (markandeya.98.7)
तस्यां तस्य सुतो जज्ञे महावीर्यो महामतिः । रौच्योऽभवत्पितुर्नाम्ना ख्यातोऽत्र वसुधातले ॥ 98.7 ॥
tasyāṁ tasya suto jajñe mahāvīryo mahāmatiḥ raucyo 'bhavatpiturnāmnā khyāto 'tra vasudhātale
उसमें उनका महापराक्रमी तथा महाबुद्धिमान् पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पिता के नाम से 'रौच्य' नाम से इस पृथ्वीतल पर विख्यात हुआ।
श्लोक 8 (markandeya.98.8)
तस्य मन्वन्तरे देवास्तथा सप्तर्षयश्च ये । तनयाश्च नृपाश्चैव ते सम्यक्कथितास्तव ॥ 98.8 ॥
tasya manvantare devāstathā saptarṣayaśca ye tanayāśca nṛpāścaiva te samyakkathitāstava
उनके मन्वन्तर के देवता, सप्तर्षि, तथा राजा हुए उनके पुत्र — यह सब तुम्हें भलीभाँति कहा जा चुका।
श्लोक 9 (markandeya.98.9)
धर्मवृद्धिस्तथारोग्यं धनधान्यसुतोद्भवः । नृणां भवत्यसन्दिग्धमस्मिन्मन्वन्तरे श्रुते ॥ 98.9 ॥
dharmavṛddhistathārogyaṁ dhanadhānyasutodbhavaḥ nṛṇāṁ bhavatyasandigdhamasminmanvantare śrute
इस मन्वन्तर के श्रवण से मनुष्यों को निःसन्देह धर्म की वृद्धि, आरोग्य, तथा धन-धान्य और सन्तान की उत्पत्ति प्राप्त होती है।
श्लोक 10 (markandeya.98.10)
पितृस्तवं तथा श्रुत्वा पितॄणां च तथा गणान् । सर्वान्कामानवाप्नोति तत्प्रसादान्महामुने ॥ 98.10 ॥
pitṛstavaṁ tathā śrutvā pitṝṇāṁ ca tathā gaṇān sarvānkāmānavāpnoti tatprasādānmahāmune
हे महामुने! इसी प्रकार पितृ-स्तव तथा पितृगणों का श्रवण करने से भी, उनकी कृपा से मनुष्य समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।