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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 99

मार्तण्ड-माहात्म्य

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100

श्लोक 1 (markandeya.99.1)

मार्कण्डेय उवाच तस्मादण्डाद्विभिन्नात्तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । ऋचो बभूवुः प्रथमं प्रथमाद्वदनान्मुने ॥ 99.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tasmādaṇḍādvibhinnāttu brahmaṇo ’vyaktajanmanaḥ ṛco babhūvuḥ prathamaṁ prathamādvadanānmune

मार्कण्डेय ने कहा—हे मुने! अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा के उस अण्डे के विभक्त होने पर, उनके प्रथम मुख से सबसे पहले ऋग्वेद के मन्त्र प्रकट हुए।

श्लोक 2 (markandeya.99.2)

जपापुष्पनिभाः सद्यस्तेजोरूपा ह्यसंहताः । पृथक्पृथग्विभिन्नाश्च रजोरूपवहास्ततः ॥ 99.2 ॥

japāpuṣpanibhāḥ sadyastejorūpā hyasaṁhatāḥ pṛthakpṛthagvibhinnāśca rajorūpavahāstataḥ

वे जपाकुसुम के समान कान्तिमान्, तेजोमय तथा तत्काल ही परस्पर असंलग्न रूप वाले थे; वे प्रत्येक पृथक्-पृथक् एवं भिन्न-भिन्न थे तथा रजोगुण को धारण करने वाले थे।

श्लोक 3 (markandeya.99.3)

यजूंषि दक्षिणाद्वक्त्रादनिरुद्धानि कानिचित् । यादृग्वर्णं तथा वर्णान्यसंहतिधराणि च ॥ 99.3 ॥

yajūṁṣi dakṣiṇādvaktrādaniruddhāni kānicit yādṛgvarṇaṁ tathā varṇānyasaṁhatidharāṇi ca

दक्षिण मुख से कुछ अनिरुद्ध यजुर्मन्त्र प्रकट हुए, जो नाना प्रकार के वर्णों वाले थे और पृथक्-पृथक् अपना स्वरूप धारण किये हुए थे, परस्पर संहत नहीं थे।

श्लोक 4 (markandeya.99.4)

पश्चिमं यद्विभोर्वक्त्रं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । आविर्भूतानि सामानि तत्तच्छन्दांसि तान्यथ ॥ 99.4 ॥

paścimaṁ yadvibhorvaktraṁ brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ āvirbhūtāni sāmāni tattacchandāṁsi tānyatha

उन विभु, परमेष्ठी ब्रह्मा के पश्चिम मुख से सामवेद के मन्त्र प्रकट हुए, प्रत्येक अपने-अपने छन्द में।

श्लोक 5 (markandeya.99.5)

अथर्वणामशेषं च भृङ्गाञ्जनचयप्रभम् । यावद्धोरस्वरूपं तदाभिचारिकशान्तिकम् ॥ 99.5 ॥

atharvaṇāmaśeṣaṁ ca bhṛṅgāñjanacayaprabham yāvaddhorasvarūpaṁ tadābhicārikaśāntikam

तथा अथर्ववेद के समस्त मन्त्र प्रकट हुए, जो भ्रमर-समूह अथवा अंजन के समान श्याम कान्ति वाले तथा अत्यन्त घोर रूप वाले थे—वे आभिचारिक (शत्रु-नाशक) तथा शान्तिक दोनों कर्मों के लिए उपयुक्त थे।

श्लोक 6 (markandeya.99.6)

उत्तरात्प्रकटीभूतं वदनात्तस्य वेधसः । सुखसत्त्वतमःप्रायं सौम्यासौम्यस्वरूपवत् ॥ 99.6 ॥

uttarātprakaṭībhūtaṁ vadanāttasya vedhasaḥ sukhasattvatamaḥprāyaṁ saumyāsaumyasvarūpavat

उन विधाता के उत्तर मुख से जो मन्त्र प्रकट हुए, वे प्रायः सुख, सत्त्व और तमोगुण से युक्त तथा सौम्य एवं असौम्य दोनों स्वरूप वाले थे।

श्लोक 7 (markandeya.99.7)

ऋचो रजोगुणाः सत्त्वं यजुषां च गुणा मुने । तमोगुणानि सामानि तमःसत्त्वमथर्वसु ॥ 99.7 ॥

ṛco rajoguṇāḥ sattvaṁ yajuṣāṁ ca guṇā mune tamoguṇāni sāmāni tamaḥsattvamatharvasu

हे मुने! ऋचाओं का गुण रजोगुण है और यजुर्मन्त्रों का गुण सत्त्वगुण है; सामवेद के मन्त्र तमोगुणी हैं तथा अथर्ववेद में तमोगुण और सत्त्वगुण दोनों विद्यमान हैं।

श्लोक 8 (markandeya.99.8)

एतानि ज्वलमानानि तेजसाऽप्रतिमेन वै । पृथक्पृथगवस्थानभाञ्जि पूर्वमिवाभवन् ॥ 99.8 ॥

etāni jvalamānāni tejasā ’pratimena vai pṛthakpṛthagavasthānabhāñji pūrvamivābhavan

ये सभी मन्त्र अनुपम तेज से प्रज्वलित होते हुए, प्रत्येक अपनी-अपनी पृथक् अवस्था को प्राप्त हुए—ठीक वैसे ही जैसे पूर्वकल्प में हुए थे।

श्लोक 9 (markandeya.99.9)

ततस्तदाद्यं यत्तेज ओमित्युक्त्वाभिशब्द्यते । तस्य स्वभावाद्यत्तेजस्तत्समावृत्य संस्थितम् ॥ 99.9 ॥

tatastadādyaṁ yatteja omityuktvābhiśabdyate tasya svabhāvādyattejastatsamāvṛtya saṁsthitam

तदनन्तर वह आदि तेज, जो 'ॐ' इस प्रकार उच्चारित होकर कहा जाता है—उसके अपने स्वभाव से उत्पन्न जो तेज है, वह उसे आवृत करके स्थित हो गया।

श्लोक 10 (markandeya.99.10)

यथा यजुर्मयं तेजस्तद्वत्साम्नां महामुने । एकत्वमुपयातानि परे तेजसि संश्रये ॥ 99.10 ॥

yathā yajurmayaṁ tejastadvatsāmnāṁ mahāmune ekatvamupayātāni pare tejasi saṁśraye

हे महामुने! जिस प्रकार यजुर्मय तेज है, उसी प्रकार सामवेद का तेज भी है—दोनों उस परम तेज के आश्रय में एकत्व को प्राप्त हो गये।

श्लोक 11 (markandeya.99.11)

शान्तिकं पौष्टिकं चैव तथा चैवाभिचारिकम् । ऋगादिषु लयं ब्रहमंस्त्रितयं त्रिष्वथागमत् ॥ 99.11 ॥

śāntikaṁ pauṣṭikaṁ caiva tathā caivābhicārikam ṛgādiṣu layaṁ brahamaṁstritayaṁ triṣvathāgamat

शान्तिक, पौष्टिक तथा आभिचारिक—हे ब्राह्मण, यह त्रिविध कर्म ऋग्वेद आदि तीनों वेदों में लीन होकर उनमें समा गया।

श्लोक 12 (markandeya.99.12)

ततो विश्वमिदं सद्यस्तमोनाशात्सुनिर्मलम् । विभावनीयं विप्रर्षे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ॥ 99.12 ॥

tato viśvamidaṁ sadyastamonāśātsunirmalam vibhāvanīyaṁ viprarṣe tiryagūrdhvamadhastathā

हे विप्रर्षे! तदनन्तर अन्धकार के नाश से यह सम्पूर्ण विश्व तत्काल अत्यन्त निर्मल होकर तिरछे, ऊपर तथा नीचे — सभी ओर प्रकाशित होने योग्य हो गया।

श्लोक 13 (markandeya.99.13)

ततस्तन्मण्डलीभूतं छान्दसं तेज उत्तमम् । परेण तेजसा ब्रह्मन्नेकत्वमुपगम्य तत् ॥ 99.13 ॥

tatastanmaṇḍalībhūtaṁ chāndasaṁ teja uttamam pareṇa tejasā brahmannekatvamupagamya tat

हे ब्रह्मन्! तत्पश्चात् वह उत्तम छान्दस तेज मण्डलाकार होकर उस परम तेज के साथ एकत्व को प्राप्त हो गया।

श्लोक 14 (markandeya.99.14)

आदित्यसंज्ञामगमदादावेव यतोऽभवत् । विश्वस्यास्य महाभाग कारणं चाव्ययात्मकम् ॥ 99.14 ॥

ādityasaṁjñāmagamadādāveva yato ’bhavat viśvasyāsya mahābhāga kāraṇaṁ cāvyayātmakam

वह प्रारम्भ से ही आदित्य नाम को प्राप्त हुआ, क्योंकि हे महाभाग! इसी से इस सम्पूर्ण विश्व का अव्यय कारण उत्पन्न हुआ था।

श्लोक 15 (markandeya.99.15)

प्रातर्मध्यन्दिने चैव तथा चैवापराह्णिके । त्रयी तपति सा काले ऋग्यजुःसामसंज्ञिता ॥ 99.15 ॥

prātarmadhyandine caiva tathā caivāparāhṇike trayī tapati sā kāle ṛgyajuḥsāmasaṁjñitā

वह ऋक्, यजुः और साम नामक त्रयी वेद अपने-अपने काल में — प्रातःकाल, मध्याह्न तथा अपराह्न में — तपता है।

श्लोक 16 (markandeya.99.16)

ऋचस्तपन्ति पूर्वाह्णे मध्याह्ने च यजूंषि वै । सामानि चापराह्णे वै तपन्ति मुनिसत्तम ॥ 99.16 ॥

ṛcastapanti pūrvāhṇe madhyāhne ca yajūṁṣi vai sāmāni cāparāhṇe vai tapanti munisattama

हे मुनिश्रेष्ठ! ऋचाएँ पूर्वाह्ण में, यजुर्मन्त्र मध्याह्न में, तथा सामवेद के मन्त्र अपराह्न में तपते हैं।

श्लोक 17 (markandeya.99.17)

शान्तिकमृक्षु पूर्वाह्णे यजुःष्वेव च पौष्टिकम् । विन्यस्तं साम्नि सायाह्ने ह्याभिचारिकमन्ततः ॥ 99.17 ॥

śāntikamṛkṣu pūrvāhṇe yajuḥṣveva ca pauṣṭikam vinyastaṁ sāmni sāyāhne hyābhicārikamantataḥ

पूर्वाह्ण में ऋचाओं में शान्तिक कर्म तथा यजुर्मन्त्रों में पौष्टिक कर्म स्थित है; अन्त में सायंकाल सामवेद में आभिचारिक कर्म विन्यस्त है।

श्लोक 18 (markandeya.99.18)

मध्यन्दिनेऽपराह्णे च समे चैवाभिचारिकम् । अपराह्णे पितॄणां तु साम्ना कार्याणि तानि वै ॥ 99.18 ॥

madhyandine ’parāhṇe ca same caivābhicārikam aparāhṇe pitṝṇāṁ tu sāmnā kāryāṇi tāni vai

मध्याह्न और अपराह्न दोनों में समान रूप से आभिचारिक कर्म होता है; तथा अपराह्न में पितरों के जो कार्य हैं, वे सामवेद के मन्त्रों से ही किये जाने चाहिए।

श्लोक 19 (markandeya.99.19)

विसृष्टौ ऋङ्मयो ब्रह्मा स्थितौ विष्णुर्यजुर्मयः । रुद्रः साममयोऽन्ते च तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः ॥ 99.19 ॥

visṛṣṭau ṛṅmayo brahmā sthitau viṣṇuryajurmayaḥ rudraḥ sāmamayo ’nte ca tasmāttasyāśucirdhvaniḥ

सृष्टि के समय ऋङ्मय ब्रह्मा, स्थिति के समय यजुर्मय विष्णु, तथा अन्त (प्रलय) के समय साममय रुद्र विद्यमान रहते हैं — इसीलिए उस समय का स्वर अशुभ माना जाता है।

श्लोक 20 (markandeya.99.20)

तदेवं भगवान्भास्वान्वेदात्मा वेदसंस्थितः । वेदविद्यात्मकश्चैव परः पुरुष उच्यते ॥ 99.20 ॥

tadevaṁ bhagavānbhāsvānvedātmā vedasaṁsthitaḥ vedavidyātmakaścaiva paraḥ puruṣa ucyate

इस प्रकार वह भगवान् भास्वान् वेदात्मा, वेद में संस्थित, तथा वेदविद्यास्वरूप हैं — वे ही परम पुरुष कहे जाते हैं।

श्लोक 21 (markandeya.99.21)

सर्गस्थित्यन्तहेतुश्च रजःसत्त्वादिकान्गुणान् । आश्रित्य ब्रह्मविष्ण्वादिसंज्ञामभ्येति शाश्वतः ॥ 99.21 ॥

sargasthityantahetuśca rajaḥsattvādikānguṇān āśritya brahmaviṣṇvādisaṁjñāmabhyeti śāśvataḥ

वह शाश्वत — सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय का कारण — रजस्, सत्त्व आदि गुणों का आश्रय लेकर ब्रह्मा, विष्णु आदि संज्ञाओं को प्राप्त होता है।

श्लोक 22 (markandeya.99.22)

देवैः सदेड्यः स तु वेदमूर्तिरमूर्तिराद्योऽखिलमर्त्यमूर्तिः । विश्वाश्रयं ज्योतिरवेद्यधर्मा वेदान्तगम्यः परमः परेशः ॥ 99.22 ॥

devaiḥ sadeḍyaḥ sa tu vedamūrtiramūrtirādyo ’khilamartyamūrtiḥ viśvāśrayaṁ jyotiravedyadharmā vedāntagamyaḥ paramaḥ pareśaḥ

देवताओं द्वारा सदा स्तुत्य, वेदमूर्ति होते हुए भी अमूर्त, आदि तथा समस्त प्राणियों के स्वरूप में विद्यमान, विश्व के आश्रयभूत ज्योतिस्वरूप, अवेद्य-धर्मा तथा केवल वेदान्त से जानने योग्य — वे ही परम परमेश्वर हैं।

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