सृष्टि खण्ड · अध्याय 12
सोमवंश एवं यदुवंश-कीर्तन
श्लोक 1 (padma.1.12.1)
भीष्म उवाच। सोमवंशः कथं जातः कथयात्र विशारद। तद्वंशे केतुराजानो बभूवुः कीर्तिवर्द्धनाः।
bhīṣma uvāca somavaṁśaḥ kathaṁ jātaḥ kathayātra viśārada tadvaṁśe keturājāno babhūvuḥ kīrtivarddhanāḥ
भीष्म ने कहा — हे विशारद! सोमवंश किस प्रकार उत्पन्न हुआ, यह मुझे बताइए। उस वंश में कीर्तिवर्धक राजा कौन-कौन हुए?
श्लोक 2 (padma.1.12.2)
पुलस्त्य उवाच। आदिष्टो ब्रह्मणा पूर्वमत्रिः सर्गविधौ पुरा। अनंतरं नाम तपः सृष्ट्यर्थं तप्तवान्विभुः।
pulastya uvāca ādiṣṭo brahmaṇā pūrvamatriḥ sargavidhau purā anaṁtaraṁ nāma tapaḥ sṛṣṭyarthaṁ taptavānvibhuḥ
पुलस्त्य ने कहा — पूर्वकाल में सृष्टि-कार्य में ब्रह्मा द्वारा आदेशित होकर अत्रि ने सृष्टि हेतु 'अनन्तर' नामक तप किया।
श्लोक 3 (padma.1.12.3)
यदानंदकरं ब्रह्म भगवन्क्लेशनाशनं। ब्रह्मरुद्रेन्द्रसूर्याणामभ्यंतरमतींद्रियं।
yadānaṁdakaraṁ brahma bhagavankleśanāśanaṁ brahmarudrendrasūryāṇāmabhyaṁtaramatīṁdriyaṁ
जब उन्होंने उस आनन्दकारी, क्लेश-नाशक, ब्रह्मा-रुद्र-इन्द्र-सूर्य के भी अन्तर्गत, इन्द्रियातीत ब्रह्म का,
श्लोक 4 (padma.1.12.4)
शान्तिं कृत्वात्ममनसा तदत्रिः संयमे स्थितः। माहात्म्यं तपसो वापि परमानंदकारकं।
śāntiṁ kṛtvātmamanasā tadatriḥ saṁyame sthitaḥ māhātmyaṁ tapaso vāpi paramānaṁdakārakaṁ
अपने मन से चिन्तन कर शान्ति प्राप्त की, तब अत्रि संयम में स्थित हो गए। उस तप की महिमा भी परम आनन्द उत्पन्न करने वाली थी।
श्लोक 5 (padma.1.12.5)
यस्माद्वंशपतिः सार्द्धं समये तदधिष्ठितः। तं दृष्ट्वाचष्ट सोमेन तस्मात्सोमोभवद्विभुः।
yasmādvaṁśapatiḥ sārddhaṁ samaye tadadhiṣṭhitaḥ taṁ dṛṣṭvācaṣṭa somena tasmātsomobhavadvibhuḥ
क्योंकि उस समय वंशपति (आने वाली सन्तान का स्वामी) उसमें स्थित हुआ, उसे देखकर 'सोम' कहा गया, इसीलिए वे प्रभु सोम कहलाए।
श्लोक 6 (padma.1.12.6)
अथ सुस्राव नेत्राभ्यां जलं तत्रात्रिसंभवम्। द्योतयद्विश्वमखिलं ज्योत्स्नया सचराचरम्।
atha susrāva netrābhyāṁ jalaṁ tatrātrisaṁbhavam dyotayadviśvamakhilaṁ jyotsnayā sacarācaram
तब वहाँ अत्रि के नेत्रों से जल बह निकला, जो अपनी ज्योत्स्ना से सम्पूर्ण चराचर विश्व को प्रकाशित करने लगा।
श्लोक 7 (padma.1.12.7)
तद्दिशो जगृहुस्तत्र स्त्रीरूपेणासहृच्छयाः। गर्भो भूत्वोदरे तासां स्थितः सोप्यत्रिसंभवः।
taddiśo jagṛhustatra strīrūpeṇāsahṛcchayāḥ garbho bhūtvodare tāsāṁ sthitaḥ sopyatrisaṁbhavaḥ
वहाँ दिशाओं ने स्त्री-रूप में उसे न सहते हुए भी ग्रहण किया। उनके उदर में गर्भ बनकर अत्रि की वह सन्तान स्थित हो गई।
श्लोक 8 (padma.1.12.8)
आशाश्च मुमुचुर्गर्भमशक्ता धारणे ततः। समादायाथ तं गर्भमेकीकृत्य चतुर्मुखः।
āśāśca mumucurgarbhamaśaktā dhāraṇe tataḥ samādāyātha taṁ garbhamekīkṛtya caturmukhaḥ
किन्तु दिशाओं ने उस गर्भ को धारण करने में असमर्थ होकर छोड़ दिया। तब चतुर्मुख ब्रह्मा ने उस गर्भ को लेकर एक किया,
श्लोक 9 (padma.1.12.9)
युवानमकरोद्ब्रह्मा सर्वायुधधरं नरम्। स्यंदनेथ सहस्तेन वेदशक्तिमये प्रभुः।
yuvānamakarodbrahmā sarvāyudhadharaṁ naram syaṁdanetha sahastena vedaśaktimaye prabhuḥ
और उसे युवा, सर्व-आयुध-धारी पुरुष बना दिया। फिर उस प्रभु ने उसे अपने ही हाथ से, वेद-शक्तिमय रथ पर,
श्लोक 10 (padma.1.12.10)
आरोप्य लोकमनयदात्मीयं स पितामहः। ततो ब्रह्मर्षिभिः प्रोक्तं ह्यस्मत्स्वामीभवत्वयम्।
āropya lokamanayadātmīyaṁ sa pitāmahaḥ tato brahmarṣibhiḥ proktaṁ hyasmatsvāmībhavatvayam
चढ़ाकर उस पितामह ने अपने लोक ले लिया। तब ब्रह्मर्षियों ने कहा — 'तुम हमारे स्वामी बनो।'
श्लोक 11 (padma.1.12.11)
ऋषिभिर्देवगंधर्वैरप्सरोभिस्तथैव च। स्तूयमानस्य तस्याभूदधिकं महदंतरम्।
ṛṣibhirdevagaṁdharvairapsarobhistathaiva ca stūyamānasya tasyābhūdadhikaṁ mahadaṁtaram
ऋषियों, देवताओं, गन्धर्वों तथा अप्सराओं द्वारा भी स्तुति किए जाने पर, उसमें एक महान् अधिक तेज उत्पन्न हुआ,
श्लोक 12 (padma.1.12.12)
तेजोवितानादभवद्भुवि दिव्यौषधीगणः। तद्दीप्तिरधिका तस्माद्रात्रौ भवति सर्वदा।
tejovitānādabhavadbhuvi divyauṣadhīgaṇaḥ taddīptiradhikā tasmādrātrau bhavati sarvadā
जिसके विस्तार से पृथ्वी पर दिव्य औषधियों का समूह उत्पन्न हुआ। इसीलिए उसकी चमक रात्रि में सदा अधिक होती है।
श्लोक 13 (padma.1.12.13)
तेनौषधीशः सोमोभूद्द्विजेष्वपि हि गण्यते। वेदधामा रसश्चायं यदिदं मंडलं शुभम्।
tenauṣadhīśaḥ somobhūddvijeṣvapi hi gaṇyate vedadhāmā rasaścāyaṁ yadidaṁ maṁḍalaṁ śubham
इसी से वे औषधियों के स्वामी सोम बने, और द्विजों में भी गिने जाते हैं। यह शुभ मण्डल वेदों का धाम और सार है।
श्लोक 14 (padma.1.12.14)
क्षीयते वर्द्धते चैव शुक्ले कृष्णे च सर्वदा। विंशतिं च तथा सप्त दक्षः प्राचेतसो ददौ।
kṣīyate varddhate caiva śukle kṛṣṇe ca sarvadā viṁśatiṁ ca tathā sapta dakṣaḥ prācetaso dadau
वह सदा शुक्ल और कृष्ण पक्षों में क्षीण और वृद्धि को प्राप्त होता है। प्राचेतस दक्ष ने उन्हें सत्ताईस,
श्लोक 15 (padma.1.12.15)
रूपलावण्यसंयुक्तास्तस्मै कन्याः सुवर्चसः। ततः शक्तिसहस्राणां सहस्राणि दशैव तु।
rūpalāvaṇyasaṁyuktāstasmai kanyāḥ suvarcasaḥ tataḥ śaktisahasrāṇāṁ sahasrāṇi daśaiva tu
रूप-लावण्य से युक्त, तेजस्विनी कन्याएँ दीं। तत्पश्चात् दस सहस्र सहस्र वर्षों तक,
श्लोक 16 (padma.1.12.16)
तपश्चकार शीतांशुर्विष्णुध्यानैकतत्परः। ततस्तुष्टश्च भगवांस्तस्मै नारायणो हरिः।
tapaścakāra śītāṁśurviṣṇudhyānaikatatparaḥ tatastuṣṭaśca bhagavāṁstasmai nārāyaṇo hariḥ
शीतांशु (सोम) ने विष्णु-ध्यान में तत्पर होकर तप किया। तब प्रसन्न होकर भगवान् नारायण हरि ने उनसे कहा,
श्लोक 17 (padma.1.12.17)
वरं वृणीष्व चोवाच परमात्मा जनार्दनः। ततो वव्रे वरं सोमः शक्रलोके यजाम्यहम्।
varaṁ vṛṇīṣva covāca paramātmā janārdanaḥ tato vavre varaṁ somaḥ śakraloke yajāmyaham
'वर माँगो' — यह परमात्मा जनार्दन बोले। तब सोम ने वर माँगा — 'मैं शक्र के लोक में यज्ञ करूँ,'
श्लोक 18 (padma.1.12.18)
प्रत्यक्षमेव भोक्तारो भवंतु मम मंदिरे। राजसूये सुरगणा ब्रह्माद्या ये चतुर्विधाः।
pratyakṣameva bhoktāro bhavaṁtu mama maṁdire rājasūye suragaṇā brahmādyā ye caturvidhāḥ
'तथा ब्रह्मा आदि चारों प्रकार के देवगण मेरे मन्दिर में प्रत्यक्ष भोक्ता बनें, राजसूय में।'
श्लोक 19 (padma.1.12.19)
रक्षपालः सुरोस्माकमास्तां शूलधरो हरः। तथेत्युक्तः समाजह्रे राजसूयं तु विष्णुना।
rakṣapālaḥ surosmākamāstāṁ śūladharo haraḥ tathetyuktaḥ samājahre rājasūyaṁ tu viṣṇunā
'और शूलधारी हर हमारे रक्षपाल बनें।' 'ऐसा ही हो' कहकर, विष्णु की सहमति से उन्होंने राजसूय का आयोजन किया।
श्लोक 20 (padma.1.12.20)
होतात्रिर्भृगुरध्वर्युरुद्गाता च चतुर्मुखः। ब्रह्मत्वमगमत्तस्य उपद्रष्टा हरिः स्वयम्।
hotātrirbhṛguradhvaryurudgātā ca caturmukhaḥ brahmatvamagamattasya upadraṣṭā hariḥ svayam
अत्रि होता बने, भृगु अध्वर्यु, तथा चतुर्मुख ब्रह्मा उद्गाता। और उसका ब्रह्मत्व (चौथे होता का पद) स्वयं हरि ने उपद्रष्टा के रूप में लिया।
श्लोक 21 (padma.1.12.21)
सदस्याः सर्वदेवास्तु राजसूयविधिः स्मृतः। वसवोध्वर्यवस्तद्वद्विश्वेदेवास्तथैव च।
sadasyāḥ sarvadevāstu rājasūyavidhiḥ smṛtaḥ vasavodhvaryavastadvadviśvedevāstathaiva ca
सभी देवगण सभासद बने — यही राजसूय की विधि स्मरण की गई है। वसुगण अध्वर्यु बने, तथा विश्वेदेव भी उसी प्रकार,
श्लोक 22 (padma.1.12.22)
त्रैलोक्यं दक्षिणा तेन ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादिता। सोमः प्राप्याथदुष्प्राप्यमैश्वर्यं सृष्टिसत्कृतं।
trailokyaṁ dakṣiṇā tena ṛtvigbhyaḥ pratipāditā somaḥ prāpyāthaduṣprāpyamaiśvaryaṁ sṛṣṭisatkṛtaṁ
और त्रिलोक को उन्होंने ऋत्विजों को दक्षिणा में दिया। सोम ने इस प्रकार सृष्टि में सम्मानित, दुर्लभ ऐश्वर्य को प्राप्त कर,
श्लोक 23 (padma.1.12.23)
सप्तलोकैकनाथत्वं प्राप्तस्स्वतपसा तदा। कदाचिदुद्यानगतामपश्यदनेकपुष्पाभरणोपशोभाम्।
saptalokaikanāthatvaṁ prāptassvatapasā tadā kadācidudyānagatāmapaśyadanekapuṣpābharaṇopaśobhām
अपने तप से सातों लोकों का एकमात्र स्वामित्व प्राप्त किया। एक बार उद्यान में जाकर उन्होंने अनेक पुष्पाभूषणों से सुशोभित,
श्लोक 24 (padma.1.12.24)
बृहन्नितंबस्तनभारखेदां पुष्पावभंगेप्यतिदुर्बलांगीं। भार्यां च तां देवगुरोरनंगबाणाभिरामायत चारुनेत्रां।
bṛhannitaṁbastanabhārakhedāṁ puṣpāvabhaṁgepyatidurbalāṁgīṁ bhāryāṁ ca tāṁ devaguroranaṁgabāṇābhirāmāyata cārunetrāṁ
विशाल नितम्ब-स्तनों के भार से थकी, फूल तोड़ने मात्र से भी अत्यन्त दुर्बल-अंगी, देवगुरु की उस पत्नी को, कामबाणों से घायल, सुन्दर नेत्रों वाली को देखा।
श्लोक 25 (padma.1.12.25)
तारां स ताराधिपतिः स्मरार्तः केशेषु जग्राह विविक्तभूमौ। सापि स्मरार्ता सहते न रेमे तद्रूपकांत्याहृतमानसैव।
tārāṁ sa tārādhipatiḥ smarārtaḥ keśeṣu jagrāha viviktabhūmau sāpi smarārtā sahate na reme tadrūpakāṁtyāhṛtamānasaiva
वह ताराधिपति (सोम) काम से पीड़ित होकर उस एकान्त भूमि में तारा के केश पकड़ बैठे। वह भी काम से पीड़ित होकर विरोध न कर सकी, उनके रूप-कान्ति से मन हरा हुआ, उनमें रम गई।
श्लोक 26 (padma.1.12.26)
चिरं विहृत्याथ जगाम तारां विधुर्गृहीत्वा स्वगृहं ततोपि। न तृप्तिरासीत्स्वगृहेपि तस्य तारानुरक्तस्य सुखागमेषु।
ciraṁ vihṛtyātha jagāma tārāṁ vidhurgṛhītvā svagṛhaṁ tatopi na tṛptirāsītsvagṛhepi tasya tārānuraktasya sukhāgameṣu
बहुत समय तक विहार कर, चन्द्रमा तब तारा को लेकर अपने घर गए। किन्तु तारा में अनुरक्त उन्हें अपने घर में भी सुख-प्राप्ति में तृप्ति नहीं मिली।
श्लोक 27 (padma.1.12.27)
बृहस्पतिस्तद्विरहाग्निदग्धस्तद्ध्याननिष्ठैकमना बभूव। शशाक शापं न च दातुमस्मै न मंत्रशस्त्राग्निविषैरनेकैः।
bṛhaspatistadvirahāgnidagdhastaddhyānaniṣṭhaikamanā babhūva śaśāka śāpaṁ na ca dātumasmai na maṁtraśastrāgniviṣairanekaiḥ
बृहस्पति उसके वियोग की अग्नि से जलकर, उसी के ध्यान में एकाग्रचित्त हो गए। किन्तु वे न तो शाप दे सके, न अनेक मंत्र-शस्त्र-अग्नि-विषों से
श्लोक 28 (padma.1.12.28)
तस्यापकर्तुं विविधैरुपायैर्नैवाभिचारैरपि वागधीशः। स याचयामास ततस्तु देवं सोमं स्वभार्यार्थमनंगतप्तः।
tasyāpakartuṁ vividhairupāyairnaivābhicārairapi vāgadhīśaḥ sa yācayāmāsa tatastu devaṁ somaṁ svabhāryārthamanaṁgataptaḥ
नाना उपायों से, यहाँ तक कि अभिचार (तंत्र-टोटके) से भी उसे हानि पहुँचा सके, वह वाणी के स्वामी। तब उन्होंने अपनी पत्नी के लिए, कामातुर होकर देव सोम से याचना की।
श्लोक 29 (padma.1.12.29)
स याच्यमानोपि ददौ न भार्यां बृहस्पतेः कामवशेन मोहितः। महेश्वरेणाथ चतुर्मुखेन साध्यैर्मरुद्भिः सह लोकपालैः।
sa yācyamānopi dadau na bhāryāṁ bṛhaspateḥ kāmavaśena mohitaḥ maheśvareṇātha caturmukhena sādhyairmarudbhiḥ saha lokapālaiḥ
वे याचना किए जाने पर भी, काम के वशीभूत होकर मोहित, बृहस्पति की पत्नी नहीं लौटाते थे। तब महेश्वर, चतुर्मुख ब्रह्मा, साध्यों, मरुतों तथा लोकपालों सहित (याचना की),
श्लोक 30 (padma.1.12.30)
ददौ यदा तां न कथंचिदिंदुस्तदा शिवः क्रोधपरो बभूव। यो वामदेवप्रथितः पृथिव्यामनेकरुद्रार्चितपादपद्मः।
dadau yadā tāṁ na kathaṁcidiṁdustadā śivaḥ krodhaparo babhūva yo vāmadevaprathitaḥ pṛthivyāmanekarudrārcitapādapadmaḥ
किन्तु जब चन्द्रमा ने किसी भी प्रकार उसे नहीं लौटाया, तब शिव अत्यन्त क्रोधित हो उठे — जो पृथ्वी पर वामदेव नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनके चरण-कमल अनेक रुद्रों द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 31 (padma.1.12.31)
ततः सशिष्यो गिरिशः पिनाकी बृहस्पतेः स्नेहवशानुबद्धः। धनुर्गृहीत्वाजगवं पुरारिर्जगाम भूतेश्वरसिद्धजुष्टः।
tataḥ saśiṣyo giriśaḥ pinākī bṛhaspateḥ snehavaśānubaddhaḥ dhanurgṛhītvājagavaṁ purārirjagāma bhūteśvarasiddhajuṣṭaḥ
तब गिरिश, पिनाकधारी, बृहस्पति के प्रति स्नेह-वश बद्ध होकर, अपने शिष्य सहित अजगव धनुष लेकर, त्रिपुरारि, भूतेश्वरों और सिद्धों से सेवित होकर चल पड़े,
श्लोक 32 (padma.1.12.32)
युद्धाय सोमेन विशेषदीप्तस्तृतीयनेत्रानलभीमवक्त्रः। सहैव जग्मुश्च गणेश्वराणां विंशाधिका षष्टिरथोग्रमूर्तिः।
yuddhāya somena viśeṣadīptastṛtīyanetrānalabhīmavaktraḥ sahaiva jagmuśca gaṇeśvarāṇāṁ viṁśādhikā ṣaṣṭirathogramūrtiḥ
सोम से युद्ध हेतु, विशेष रूप से देदीप्यमान, तीसरे नेत्र की अग्नि से भयंकर मुख वाले। साथ ही अस्सी अत्यन्त उग्र-रूप गणेश्वर भी चले,
श्लोक 33 (padma.1.12.33)
यक्षेश्वराणां सगणैरनेकैर्युतोन्वगात्स्यंदनसंस्थितानां। वेतालयक्षोरगकिन्नराणां पद्मेन चैकेन तथार्बुदानाम्।
yakṣeśvarāṇāṁ sagaṇairanekairyutonvagātsyaṁdanasaṁsthitānāṁ vetālayakṣoragakinnarāṇāṁ padmena caikena tathārbudānām
यक्ष-स्वामियों के अनेक गणों सहित, रथों पर स्थित; एक पद्म (असंख्य) वेताल-यक्ष-नाग-किन्नरों तथा अर्बुदों सहित,
श्लोक 34 (padma.1.12.34)
लक्षैस्त्रिभिर्द्वा दशभी रथानां सोमोप्यगात्तत्र विवृद्धमन्युः। शनैश्चरांगारकवृद्धतेजा नक्षत्रदैत्यासुरसैन्ययुक्तः।
lakṣaistribhirdvā daśabhī rathānāṁ somopyagāttatra vivṛddhamanyuḥ śanaiścarāṁgārakavṛddhatejā nakṣatradaityāsurasainyayuktaḥ
तथा तीन लाख बारह रथों सहित। सोम भी वहाँ अत्यन्त क्रोधित होकर गए, शनि-मंगल से बढ़े हुए तेज वाले, नक्षत्र-दैत्य-असुर-सेना से युक्त।
श्लोक 35 (padma.1.12.35)
जग्मुर्भयं सप्त तथैव लोका धरावनद्वीपसमुद्रगर्भाः। ससोममेवाभ्यगमत्पिनाकी गृहीतदीप्तास्त्रविशालवह्निः।
jagmurbhayaṁ sapta tathaiva lokā dharāvanadvīpasamudragarbhāḥ sasomamevābhyagamatpinākī gṛhītadīptāstraviśālavahniḥ
सातों लोक भयभीत हो उठे, पृथ्वी, वन, द्वीप, समुद्र और उनकी गहराइयाँ सहित। पिनाकधारी ने अपने देदीप्यमान, विशाल अग्नि-अस्त्र को उठाकर सोम पर धावा बोल दिया।
श्लोक 36 (padma.1.12.36)
अथाभवद्भीषण भीम सोम सैन्यद्वयस्याथ महाहवोसौ। अशेषसत्वक्षयकृत्प्रवृद्धस्तीक्ष्णप्रधानो ज्वलनैकरूपः।
athābhavadbhīṣaṇa bhīma soma sainyadvayasyātha mahāhavosau aśeṣasatvakṣayakṛtpravṛddhastīkṣṇapradhāno jvalanaikarūpaḥ
तब शिव और सोम की दोनों सेनाओं के मध्य एक भयंकर, दारुण महायुद्ध हुआ — सभी प्राणियों का नाश करने वाला, निरन्तर बढ़ता हुआ, तीक्ष्ण शस्त्रों से प्रधान, अग्नि के समान रूप वाला।
श्लोक 37 (padma.1.12.37)
शस्त्रैरथान्योन्यमशेषसैन्यं द्वयोर्जगामक्षयमुग्रतीक्ष्णैः। पतंति शस्त्राणि तथोज्वलानि स्वर्भूमिपातालमलं दहंति।
śastrairathānyonyamaśeṣasainyaṁ dvayorjagāmakṣayamugratīkṣṇaiḥ pataṁti śastrāṇi tathojvalāni svarbhūmipātālamalaṁ dahaṁti
उग्र-तीक्ष्ण शस्त्रों से दोनों की सम्पूर्ण सेनाएँ आपस में नष्ट हो गईं। जलते हुए शस्त्र गिरने लगे, जो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल को भी भस्म करने लगे।
श्लोक 38 (padma.1.12.38)
रुद्रः क्रोधाद्ब्रह्मशिरो मुमोच सोमोपि सोमास्त्रममोघवीर्यं। तयोर्निपातेन समुद्रभूम्योरथांतरिक्षस्य च भीतिरासीत्।
rudraḥ krodhādbrahmaśiro mumoca somopi somāstramamoghavīryaṁ tayornipātena samudrabhūmyorathāṁtarikṣasya ca bhītirāsīt
रुद्र ने क्रोध से ब्रह्मशिर अस्त्र छोड़ा, सोम ने भी अमोघ-वीर्य सोम-अस्त्र। उन दोनों के गिरने से समुद्र, पृथ्वी और आकाश तक भयभीत हो उठे।
श्लोक 39 (padma.1.12.39)
तदा सुयुद्धं जगतां क्षयाय प्रवृद्धमालोक्य पितामहोपि। ततः प्रविश्याथ कथंचिदेव निवारयामास सुरैः सहैव।
tadā suyuddhaṁ jagatāṁ kṣayāya pravṛddhamālokya pitāmahopi tataḥ praviśyātha kathaṁcideva nivārayāmāsa suraiḥ sahaiva
तब जगत् के विनाश हेतु बढ़ते उस महायुद्ध को देखकर, पितामह ने भी किसी प्रकार उसमें प्रवेश कर, देवताओं सहित उसे रोक दिया।
श्लोक 40 (padma.1.12.40)
अकारणं किं क्षयकृज्जनानां सोम त्वयापीदमकार्यकार्यं। यस्मात्परस्त्रीहरणाय सोम त्वया कृतं युद्धमतीव भीमम्।
akāraṇaṁ kiṁ kṣayakṛjjanānāṁ soma tvayāpīdamakāryakāryaṁ yasmātparastrīharaṇāya soma tvayā kṛtaṁ yuddhamatīva bhīmam
'हे सोम! लोगों का यह विनाश किस कारण से, बिना कारण के हो रहा है? तुमने यह अकार्य किया है। हे सोम! परस्त्री-हरण के लिए तुमने यह अत्यन्त भयंकर युद्ध किया है।
श्लोक 41 (padma.1.12.41)
पापग्रहस्त्वं भविता जनेषु पापोस्यलं वह्निमुखाशिनां त्वं। भार्यामिमामर्पय वाक्पतेस्त्वं प्रमाणयन्नेव मदीय वाचम्।
pāpagrahastvaṁ bhavitā janeṣu pāposyalaṁ vahnimukhāśināṁ tvaṁ bhāryāmimāmarpaya vākpatestvaṁ pramāṇayanneva madīya vācam
'तुम मनुष्यों में पापग्रह बनोगे, तुम पापी हो, यद्यपि अग्नि-मुख से भोजन करने वालों (देवताओं) के लिए तुम आधार हो। मेरे वचन को प्रमाण मानकर वाक्पति (बृहस्पति) की इस पत्नी को लौटा दो।'
श्लोक 42 (padma.1.12.42)
तथेति चोवाच हिमांशुमाली युद्धादपाक्रामदतः प्रशांतः। बृहस्पतिस्तामथ गृह्य तारां हृष्टो जगाम स्वगृहं च रुद्रः।
tatheti covāca himāṁśumālī yuddhādapākrāmadataḥ praśāṁtaḥ bṛhaspatistāmatha gṛhya tārāṁ hṛṣṭo jagāma svagṛhaṁ ca rudraḥ
'ऐसा ही हो' कहकर हिमांशुमाली (चन्द्रमा) युद्ध से शान्त होकर हट गए। तब बृहस्पति तारा को लेकर, और रुद्र भी प्रसन्न होकर, अपने-अपने घर चले गए।
श्लोक 43 (padma.1.12.43)
पुलस्त्य उवाच। ततः संवत्सरस्यांते द्वादशादित्यसन्निभः। दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः।
pulastya uvāca tataḥ saṁvatsarasyāṁte dvādaśādityasannibhaḥ divyapītāmbaradharo divyābharaṇabhūṣitaḥ
पुलस्त्य ने कहा — तत्पश्चात् एक वर्ष के अन्त में, बारह आदित्यों के समान तेजस्वी, दिव्य पीत वस्त्र धारण किए, दिव्य आभूषणों से भूषित,
श्लोक 44 (padma.1.12.44)
तारोदरविनिष्क्रान्तः कुमारस्सूर्यसन्निभः। सर्वार्थशास्त्रविद्विद्वान्हस्तिशास्त्रप्रवर्त्तकः।
tārodaraviniṣkrāntaḥ kumārassūryasannibhaḥ sarvārthaśāstravidvidvānhastiśāstrapravarttakaḥ
तारा के उदर से एक कुमार उत्पन्न हुआ, सूर्य के समान तेजस्वी, सभी शास्त्रों का ज्ञाता, हस्ति-शास्त्र का प्रवर्तक,
श्लोक 45 (padma.1.12.45)
नामयद्राजपुत्रोयं विश्रुतो राजवैद्यकः। राज्ञः सोमस्य पुत्रत्वाद्राजपुत्रो बुधः स्मृतः।
nāmayadrājaputroyaṁ viśruto rājavaidyakaḥ rājñaḥ somasya putratvādrājaputro budhaḥ smṛtaḥ
राजपुत्र नाम से प्रसिद्ध, राजवैद्य। राजा सोम का पुत्र होने के कारण वह बुध, 'राजपुत्र' नाम से स्मरण किया गया।
श्लोक 46 (padma.1.12.46)
जनानां तु स तेजांसि सर्वाण्येवाक्षिपद्बली। ब्रह्माद्यास्तत्र चाजग्मुर्देवा देवर्षिभिः सह।
janānāṁ tu sa tejāṁsi sarvāṇyevākṣipadbalī brahmādyāstatra cājagmurdevā devarṣibhiḥ saha
उस बलवान् बालक ने लोगों के सभी तेज को हर लिया। तब ब्रह्मा आदि देवगण ऋषियों सहित वहाँ आए,
श्लोक 47 (padma.1.12.47)
बृहस्पतिगृहे सर्वे जातकर्मोत्सवे तदा। पप्रच्छुस्ते सुरास्तारां केन जातः कुमारकः।
bṛhaspatigṛhe sarve jātakarmotsave tadā papracchuste surāstārāṁ kena jātaḥ kumārakaḥ
बृहस्पति के घर उस जातकर्म-उत्सव में। उन देवताओं ने तारा से पूछा — 'यह बालक किससे उत्पन्न हुआ?'
श्लोक 48 (padma.1.12.48)
ततः सा लज्जिता तेषां न किंचिदवदत्तदा। पुनः पुनस्तदा पृष्टा लज्जयंती वरांगना।
tataḥ sā lajjitā teṣāṁ na kiṁcidavadattadā punaḥ punastadā pṛṣṭā lajjayaṁtī varāṁganā
तब वह लज्जित होकर उनसे कुछ नहीं बोली। बार-बार पूछे जाने पर भी वह सुन्दरी लज्जा से,
श्लोक 49 (padma.1.12.49)
सोमस्येति चिरादाह ततो गृह्णाद्विधुः सुतं। बुध इत्यकरोन्नाम प्रादाद्राज्यं च भूतले।
somasyeti cirādāha tato gṛhṇādvidhuḥ sutaṁ budha ityakaronnāma prādādrājyaṁ ca bhūtale
बहुत समय बाद बोली — 'यह सोम का है।' तब चन्द्रमा ने पुत्र को स्वीकार किया, उसका नाम बुध रखा, और उसे भूतल पर राज्य दिया।
श्लोक 50 (padma.1.12.50)
अभिषेकं ततः कृत्वा प्रदानमकरोद्विभुः। ग्रहमध्यं प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिर्युतः।
abhiṣekaṁ tataḥ kṛtvā pradānamakarodvibhuḥ grahamadhyaṁ pradāyātha brahmā brahmarṣibhiryutaḥ
तत्पश्चात् अभिषेक करके उस प्रभु ने दान दिया। फिर ग्रहों के मध्य उसे स्थान देकर, ब्रह्मर्षियों सहित ब्रह्मा,
श्लोक 51 (padma.1.12.51)
पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवांतरधीयत। इलोदरे च धर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत्।
paśyatāṁ sarvabhūtānāṁ tatraivāṁtaradhīyata ilodare ca dharmiṣṭhaṁ budhaḥ putramajījanat
सभी प्राणियों के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गए। और इला के उदर से बुध ने धर्मिष्ठ पुत्र को जन्म दिया,
श्लोक 52 (padma.1.12.52)
अश्वमेधशतंसाग्रमकरोद्यस्स्वतेजसा। पुरूरवा इति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः।
aśvamedhaśataṁsāgramakarodyassvatejasā purūravā iti khyātaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ
जिसने अपने तेज से पूरे सौ अश्वमेध यज्ञ किए, पुरूरवा नाम से विख्यात, सभी लोकों द्वारा नमस्कृत।
श्लोक 53 (padma.1.12.53)
हिमवच्छिखरे रम्ये समाराध्य पितामहं। लोकैश्वर्यमगाद्राजन्सप्तद्वीपपतिस्तदा।
himavacchikhare ramye samārādhya pitāmahaṁ lokaiśvaryamagādrājansaptadvīpapatistadā
हिमालय के रमणीय शिखर पर पितामह की आराधना करके, हे राजन्! वे तब सातों द्वीपों के स्वामी होकर लोकैश्वर्य को प्राप्त हुए।
श्लोक 54 (padma.1.12.54)
केशिप्रभृतयो दैत्यास्तद्भृत्यत्वं समागताः। उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमद्रूपमोहिता।
keśiprabhṛtayo daityāstadbhṛtyatvaṁ samāgatāḥ urvaśī yasya patnītvamagamadrūpamohitā
केशि आदि दैत्य उसके सेवक बन गए। और उर्वशी, उसके रूप से मोहित होकर, उसकी पत्नी बन गई।
श्लोक 55 (padma.1.12.55)
सप्तद्वीपावसुमती सशैलवनकानना। धर्मेण पालिता तेन सर्वलोकहितैषिणा।
saptadvīpāvasumatī saśailavanakānanā dharmeṇa pālitā tena sarvalokahitaiṣiṇā
सातों द्वीपों वाली, पर्वत-वन-कानन सहित वह पृथ्वी, सभी लोकों के हित की कामना करने वाले उसके द्वारा धर्मपूर्वक पालित हुई।
श्लोक 56 (padma.1.12.56)
चामरग्रहणाकीर्तिः स्वयं चैवांगवाहिका। ब्रह्मप्रसादाद्देवेंद्रो ददावर्द्धासनं तदा।
cāmaragrahaṇākīrtiḥ svayaṁ caivāṁgavāhikā brahmaprasādāddeveṁdro dadāvarddhāsanaṁ tadā
चँवर धारण करने की कीर्ति स्वयं उसकी थी, और वह स्वयं भी उस कार्य को वहन करता था। ब्रह्मा की कृपा से देवेन्द्र ने तब उसे अपना आधा सिंहासन दिया।
श्लोक 57 (padma.1.12.57)
धर्मार्थकामान्धर्मेण समवेतोभ्यपालयत्। धर्मार्थकामास्तं द्रष्टुमाजग्मुः कौतुकान्विताः।
dharmārthakāmāndharmeṇa samavetobhyapālayat dharmārthakāmāstaṁ draṣṭumājagmuḥ kautukānvitāḥ
वह धर्म-अर्थ-काम की धर्मपूर्वक समान रक्षा करता था। धर्म, अर्थ और काम उसे देखने के लिए कौतूहलवश आए,
श्लोक 58 (padma.1.12.58)
जिज्ञासवस्तच्चरितं कथं पश्यति नः समम्। भक्त्या चक्रे ततस्तेषामर्घ्यपाद्यादिकं ततः।
jijñāsavastaccaritaṁ kathaṁ paśyati naḥ samam bhaktyā cakre tatasteṣāmarghyapādyādikaṁ tataḥ
जानने के इच्छुक कि वह हमें समान दृष्टि से कैसे देखता है। उसने तब भक्तिपूर्वक उन्हें अर्घ्य-पाद्य आदि दिया,
श्लोक 59 (padma.1.12.59)
आसनत्रयमानीय दिव्यं कनकभूषणम्। निवेश्याथाकरोत्पूजामीषद्धर्मेधिकां पुनः।
āsanatrayamānīya divyaṁ kanakabhūṣaṇam niveśyāthākarotpūjāmīṣaddharmedhikāṁ punaḥ
तीन दिव्य, स्वर्ण-भूषित आसन लाकर, उन्हें बिठाकर पूजा की, किन्तु धर्म को थोड़ा अधिक (सम्मान) दिया।
श्लोक 60 (padma.1.12.60)
जग्मतुस्तौ च कामार्थावतिकोपं नृपं प्रति। अर्थः शापमदात्तस्मै लोभात्त्वं नाशमेष्यसि।
jagmatustau ca kāmārthāvatikopaṁ nṛpaṁ prati arthaḥ śāpamadāttasmai lobhāttvaṁ nāśameṣyasi
तब काम और अर्थ उस राजा के प्रति अत्यन्त क्रोधित हो गए। अर्थ ने उसे शाप दिया — 'लोभ से तुम्हारा नाश होगा।'
श्लोक 61 (padma.1.12.61)
कामोप्याह तवोन्मादो भविता गंधमादने। कुमारवनमाश्रित्य वियोगाच्चोर्वशीभवात्।
kāmopyāha tavonmādo bhavitā gaṁdhamādane kumāravanamāśritya viyogāccorvaśībhavāt
काम ने भी कहा — 'गन्धमादन पर, कुमार-वन में, उर्वशी के वियोग से तुम्हें उन्माद होगा।'
श्लोक 62 (padma.1.12.62)
धर्मोप्याह चिरायुस्त्वं धार्मिकश्च भविष्यसि। संततिस्तव राजेंद्र यावदाचंद्रतारकम्।
dharmopyāha cirāyustvaṁ dhārmikaśca bhaviṣyasi saṁtatistava rājeṁdra yāvadācaṁdratārakam
धर्म ने कहा — 'तुम दीर्घायु और धार्मिक बनोगे। हे राजेन्द्र! तुम्हारी सन्तति चन्द्र-तारों के रहने तक,
श्लोक 63 (padma.1.12.63)
शतशो वृद्धिमायाति न नाशं भुवि यास्यति। षष्टिं वर्षाणि चोन्माद ऊर्वशीकामसंभवः।
śataśo vṛddhimāyāti na nāśaṁ bhuvi yāsyati ṣaṣṭiṁ varṣāṇi conmāda ūrvaśīkāmasaṁbhavaḥ
सौ गुना बढ़ेगी, पृथ्वी पर कभी नष्ट नहीं होगी।' (शाप के विषय में:) 'साठ वर्षों तक उर्वशी-प्रेम से जनित उन्माद रहेगा,
श्लोक 64 (padma.1.12.64)
अचिरादेव भार्यापि वशमेष्यति चाप्सराः। इत्युक्त्वांतर्दधुः सर्वे राजा राज्यं तदान्वभूत्।
acirādeva bhāryāpi vaśameṣyati cāpsarāḥ ityuktvāṁtardadhuḥ sarve rājā rājyaṁ tadānvabhūt
किन्तु शीघ्र ही वह अप्सरा पत्नी भी पुनः तुम्हारे वश में आ जाएगी।' ऐसा कहकर सभी अन्तर्धान हो गए। राजा तब अपने राज्य का उपभोग करने लगा।
श्लोक 65 (padma.1.12.65)
अहन्यहनि देवेंद्रं द्रष्टुं याति पुरूरवाः। कदाचिदारुह्य रथं दक्षिणांबरचारिणा।
ahanyahani deveṁdraṁ draṣṭuṁ yāti purūravāḥ kadācidāruhya rathaṁ dakṣiṇāṁbaracāriṇā
प्रतिदिन पुरूरवा देवेन्द्र को देखने जाते थे। एक बार रथ पर सवार होकर दक्षिण आकाश में विचरण करते हुए,
श्लोक 66 (padma.1.12.66)
सार्धं शक्रेण सोऽपश्यन्नीयमानामथांबरे। केशिना दानवेंद्रेण चित्रलेखामथोर्वशीम्।
sārdhaṁ śakreṇa so'paśyannīyamānāmathāṁbare keśinā dānaveṁdreṇa citralekhāmathorvaśīm
शक्र के साथ उन्होंने आकाश में देखा — दानवराज केशि द्वारा चित्रलेखा और उर्वशी को ले जाया जा रहा था।
श्लोक 67 (padma.1.12.67)
तं विनिर्जित्य समरे विविधायुधपातनैः। पुरा शक्रोपि समरे येन वज्री विनिर्जितः।
taṁ vinirjitya samare vividhāyudhapātanaiḥ purā śakropi samare yena vajrī vinirjitaḥ
नाना अस्त्रों के प्रहार से युद्ध में उसे परास्त करके — जिस केशि द्वारा पूर्वकाल में वज्रधारी शक्र भी युद्ध में परास्त हुए थे —
श्लोक 68 (padma.1.12.68)
मित्रत्वमगमत्तेन प्रादादिंद्राय चोर्वशीं। ततःप्रभृति मित्रत्वमगमत्पाकशासनः।
mitratvamagamattena prādādiṁdrāya corvaśīṁ tataḥprabhṛti mitratvamagamatpākaśāsanaḥ
उन्होंने उसके (शक्र के) साथ मित्रता प्राप्त की, और इन्द्र को उर्वशी लौटा दी। तभी से इन्द्र,
श्लोक 69 (padma.1.12.69)
सर्वलोकेतिशयितं पुरूरवसमेव तम्। प्राह वज्री तु संतुष्टो नीयतामियमेव च।
sarvaloketiśayitaṁ purūravasameva tam prāha vajrī tu saṁtuṣṭo nīyatāmiyameva ca
पुरूरवा को सर्वलोक-श्रेष्ठ मानने लगे। और वज्रधारी ने प्रसन्न होकर कहा — 'यह इसी को ले जाई जाए।'
श्लोक 70 (padma.1.12.70)
सा पुरूरवसः प्रीत्यै चागायच्चरितं महत्। लक्ष्मीस्वयंवरंनाम भरतेन प्रवर्तितम्।
sā purūravasaḥ prītyai cāgāyaccaritaṁ mahat lakṣmīsvayaṁvaraṁnāma bharatena pravartitam
उसने पुरूरवा की प्रसन्नता के लिए भरत द्वारा रचित 'लक्ष्मी-स्वयंवर' नामक महान् चरित गाया,
श्लोक 71 (padma.1.12.71)
मेनकां चोर्वशीं रंभां नृत्यध्वमिति चादिशत्। ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी।
menakāṁ corvaśīṁ raṁbhāṁ nṛtyadhvamiti cādiśat nanarta salayaṁ tatra lakṣmīrūpeṇa corvaśī
तथा मेनका, उर्वशी और रम्भा को नृत्य करने का आदेश दिया। वहाँ उर्वशी लक्ष्मी के रूप में लयबद्ध नृत्य करने लगी।
श्लोक 72 (padma.1.12.72)
सा पुरूरवसं दृष्ट्वा नृत्यंती कामपीडिता। विस्मृताभिनयं सर्वं यत्पुरातनचोदितम्।
sā purūravasaṁ dṛṣṭvā nṛtyaṁtī kāmapīḍitā vismṛtābhinayaṁ sarvaṁ yatpurātanacoditam
नृत्य करते हुए वह पुरूरवा को देखकर काम-पीड़ित हो गई, और भरत द्वारा पूर्व-निर्देशित सम्पूर्ण अभिनय भूल गई।
श्लोक 73 (padma.1.12.73)
शशाप भरतः क्रोधाद्वियोगात्तस्य भूतले। पंचपंचाशदब्दानि लताभूता भविष्यसि।
śaśāpa bharataḥ krodhādviyogāttasya bhūtale paṁcapaṁcāśadabdāni latābhūtā bhaviṣyasi
क्रोध से भरत ने शाप दिया — 'उसके वियोग से पृथ्वी पर तुम पचपन वर्षों तक लता बन जाओगी।'
श्लोक 74 (padma.1.12.74)
ततस्तमुर्वशी गत्वा भर्त्तारमकरोच्चिरं। शापानुभवनांते च उर्वशी बुधसूनुना।
tatastamurvaśī gatvā bharttāramakarocciraṁ śāpānubhavanāṁte ca urvaśī budhasūnunā
तत्पश्चात् उर्वशी उसके पास जाकर दीर्घकाल तक उसे अपना पति बनाए रही। शाप-भोग के अन्त में उर्वशी ने बुध-वंशज (पुरूरवा) से
श्लोक 75 (padma.1.12.75)
अजीजनत्सुतानष्टौ नामतस्तान्निबोध मे। आयुर्दृढायुर्वश्यायुर्बलायुर्धृतिमान्वसुः।
ajījanatsutānaṣṭau nāmatastānnibodha me āyurdṛḍhāyurvaśyāyurbalāyurdhṛtimānvasuḥ
आठ पुत्रों को जन्म दिया; उनके नाम मुझसे जानो — आयु, दृढायु, वश्यायु, बलायु, धृतिमान्, वसु,
श्लोक 76 (padma.1.12.76)
दिव्यजायुः शतायुश्च सर्वे दिव्यबलौजसः। आयुषो नहुषः पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च।
divyajāyuḥ śatāyuśca sarve divyabalaujasaḥ āyuṣo nahuṣaḥ putro vṛddhaśarmā tathaiva ca
दिव्यजायु और शतायु — सभी दिव्य बल-ओज से युक्त। आयु का पुत्र नहुष हुआ, तथा उसी प्रकार वृद्धशर्मा,
श्लोक 77 (padma.1.12.77)
रजिर्दंडो विशाखश्च वीराः पंचमहारथाः। रजेः पुत्रशतं जज्ञे राजेया इति विश्रुतं।
rajirdaṁḍo viśākhaśca vīrāḥ paṁcamahārathāḥ rajeḥ putraśataṁ jajñe rājeyā iti viśrutaṁ
रजि, दण्ड और विशाख — पाँच महारथी वीर। रजि से सौ पुत्र उत्पन्न हुए, जो 'राजेय' नाम से विख्यात हुए।
श्लोक 78 (padma.1.12.78)
रजिराराधयामास नारायणमकल्मषं। तपसा तोषितो विष्णुर्वरं प्रादान्महीपतेः।
rajirārādhayāmāsa nārāyaṇamakalmaṣaṁ tapasā toṣito viṣṇurvaraṁ prādānmahīpateḥ
रजि ने निष्पाप नारायण की आराधना की। तप से सन्तुष्ट होकर विष्णु ने उस भूपति को वर दिया।
श्लोक 79 (padma.1.12.79)
देवासुरमनुष्याणामभूत्स विजयी तदा। अथ देवासुरं युद्धमभूद्वर्षशतत्रयम्।
devāsuramanuṣyāṇāmabhūtsa vijayī tadā atha devāsuraṁ yuddhamabhūdvarṣaśatatrayam
तब वह देव-असुर-मनुष्यों पर विजयी हो गया। फिर देव-असुरों में तीन सौ वर्षों तक युद्ध हुआ,
श्लोक 80 (padma.1.12.80)
प्रह्लादशक्रयोर्भीमं न कश्चिद्विजयी तयोः। ततो देवासुरैः पृष्टः पृथग्देवश्चतुर्मुखः।
prahlādaśakrayorbhīmaṁ na kaścidvijayī tayoḥ tato devāsuraiḥ pṛṣṭaḥ pṛthagdevaścaturmukhaḥ
प्रह्लाद और शक्र में भयंकर, और उन दोनों में कोई विजयी न हुआ। तब देवों और असुरों दोनों ने अलग-अलग चतुर्मुख से पूछा —
श्लोक 81 (padma.1.12.81)
अनयोर्विजयी कः स्याद्रजिर्यत्रेति सोब्रवीत्। जयाय प्रार्थितो राजा सहायस्त्वं भवस्व नः।
anayorvijayī kaḥ syādrajiryatreti sobravīt jayāya prārthito rājā sahāyastvaṁ bhavasva naḥ
'इन दोनों में विजयी कौन होगा?' उन्होंने कहा — 'जहाँ रजि होगा (वही जीतेगा)।' विजय के लिए प्रार्थना किए जाने पर राजा से (दोनों ने कहा) — 'तुम हमारे सहायक बनो।'
श्लोक 82 (padma.1.12.82)
दैत्यैः प्राह यदि स्वामी वो भवामि ततस्त्वलम्। नासुरैः प्रतिपन्नं तत्प्रतिपन्नं सुरैस्तदा।
daityaiḥ prāha yadi svāmī vo bhavāmi tatastvalam nāsuraiḥ pratipannaṁ tatpratipannaṁ suraistadā
दैत्यों से उसने कहा — 'यदि मैं तुम्हारा स्वामी बनूँ, तो ही (सहायता करूँगा)।' यह असुरों को स्वीकार्य न हुआ; किन्तु देवताओं ने इसे स्वीकार कर लिया —
श्लोक 83 (padma.1.12.83)
स्वामी भव त्वमस्माकं बलनाशय विद्विषः। ततो विनाशिताः सर्वे ये वध्या वज्रपाणिनः।
svāmī bhava tvamasmākaṁ balanāśaya vidviṣaḥ tato vināśitāḥ sarve ye vadhyā vajrapāṇinaḥ
'तुम हमारे स्वामी बनो, अपने बल से शत्रुओं का नाश करो।' तब वे सभी नष्ट कर दिए गए, जो वज्रधारी के वध्य थे।
श्लोक 84 (padma.1.12.84)
पुत्रत्वमगमत्तुष्टस्तस्येंद्रः कर्मणा ततः। दत्त्वेंद्राय पुरा राज्यं जगाम तपसे रजिः।
putratvamagamattuṣṭastasyeṁdraḥ karmaṇā tataḥ dattveṁdrāya purā rājyaṁ jagāma tapase rajiḥ
प्रसन्न इन्द्र ने तब उस कर्म के कारण उसका पुत्रत्व स्वीकार किया। इन्द्र को राज्य देकर रजि पूर्वकाल में तप के लिए चले गए।
श्लोक 85 (padma.1.12.85)
रजिपुत्रैस्तदाछिन्नं बलादिंद्रस्य वैयदा। यज्ञभागश्च राज्यं च तपोबलगुणान्वितैः।
rajiputraistadāchinnaṁ balādiṁdrasya vaiyadā yajñabhāgaśca rājyaṁ ca tapobalaguṇānvitaiḥ
तब रजि के पुत्रों ने, तप-बल के गुणों से युक्त होकर, इन्द्र का यज्ञ-भाग और राज्य बलपूर्वक छीन लिया।
श्लोक 86 (padma.1.12.86)
राज्यभ्रष्टस्ततः शक्रो रजिपुत्रनिपीडितः। प्राह वाचस्पतिं दीनः पीडितोऽस्मि रजेः सुतैः।
rājyabhraṣṭastataḥ śakro rajiputranipīḍitaḥ prāha vācaspatiṁ dīnaḥ pīḍito'smi rajeḥ sutaiḥ
राज्य-भ्रष्ट हुए, रजि-पुत्रों द्वारा पीड़ित शक्र ने बृहस्पति से दीनतापूर्वक कहा — 'मैं रजि के पुत्रों से पीड़ित हूँ।'
श्लोक 87 (padma.1.12.87)
न यज्ञभागो राज्यं मे पीडितस्य बृहस्पते। राज्यलाभाय मे यत्नं विधत्स्व धिषणाधिप।
na yajñabhāgo rājyaṁ me pīḍitasya bṛhaspate rājyalābhāya me yatnaṁ vidhatsva dhiṣaṇādhipa
'हे बृहस्पते! मुझे पीड़ित को न यज्ञ-भाग है, न राज्य। हे धिषणाधिप! मेरे राज्य-लाभ के लिए प्रयत्न करो।'
श्लोक 88 (padma.1.12.88)
ततो बृहस्पतिः शक्रमकरोद्बलदर्पितम्। ग्रहशांतिविधानेन पौष्टिकेन च कर्मणा।
tato bṛhaspatiḥ śakramakarodbaladarpitam grahaśāṁtividhānena pauṣṭikena ca karmaṇā
तब बृहस्पति ने ग्रह-शान्ति-विधान और पौष्टिक कर्म से शक्र को पुनः बल से गर्वित बनाया,
श्लोक 89 (padma.1.12.89)
गत्वाथ मोहयामास रजिपुत्रान्बृहस्पतिः। जिनधर्मं समास्थाय वेदबाह्यं स धर्मवित्।
gatvātha mohayāmāsa rajiputrānbṛhaspatiḥ jinadharmaṁ samāsthāya vedabāhyaṁ sa dharmavit
और जाकर धर्मज्ञ बृहस्पति ने रजि-पुत्रों को मोहित कर, वेद-बाह्य जिन-धर्म का आश्रय दिलाकर,
श्लोक 90 (padma.1.12.90)
वेदत्रयीपरिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः। वेदबाह्यान्परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान्।
vedatrayīparibhraṣṭāṁścakāra dhiṣaṇādhipaḥ vedabāhyānparijñāya hetuvādasamanvitān
धिषणाधिप ने उन्हें त्रयी-वेद से भ्रष्ट कर दिया। हेतुवाद से युक्त, वेद-बाह्य जानकर,
श्लोक 91 (padma.1.12.91)
जघान शक्रो वज्रेण सर्वान्धर्मबहिष्कृतान्। नहुषस्य प्रवक्ष्यामि पुत्रान्सप्तैव धार्मिकान्।
jaghāna śakro vajreṇa sarvāndharmabahiṣkṛtān nahuṣasya pravakṣyāmi putrānsaptaiva dhārmikān
शक्र ने उन सब धर्म-बहिष्कृतों को वज्र से मार डाला। अब मैं नहुष के सात धार्मिक पुत्रों को बताता हूँ —
श्लोक 92 (padma.1.12.92)
यतिर्ययातिश्शर्यातिरुत्तरः पर एव च। अयतिर्वियतिश्चैव सप्तैते वंशवर्द्धनाः।
yatiryayātiśśaryātiruttaraḥ para eva ca ayatirviyatiścaiva saptaite vaṁśavarddhanāḥ
यति, ययाति, शर्याति, उत्तर तथा पर, अयति और वियति — ये सात वंश-वर्धक थे।
श्लोक 93 (padma.1.12.93)
यतिः कुमारभावेपि योगी वैखानसोभवत्। ययातिरकरोद्राज्यं धर्मैकशरणः सदा।
yatiḥ kumārabhāvepi yogī vaikhānasobhavat yayātirakarodrājyaṁ dharmaikaśaraṇaḥ sadā
यति कुमार-अवस्था में ही योगी, वैखानस तपस्वी बन गए। ययाति ने सदा धर्म-परायण होकर राज्य किया।
श्लोक 94 (padma.1.12.94)
शर्मिष्ठा तस्य भार्याभूद्दुहिता वृषपर्वणः। भार्गवस्यात्मजा चैव देवयानी च सुव्रता।
śarmiṣṭhā tasya bhāryābhūdduhitā vṛṣaparvaṇaḥ bhārgavasyātmajā caiva devayānī ca suvratā
वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा उनकी पत्नी थी; तथा भार्गव (शुक्राचार्य) की पुत्री, सुव्रता देवयानी भी।
श्लोक 95 (padma.1.12.95)
ययातेः पंचदायादास्तान्प्रवक्ष्यामि नामतः। देवयानी यदुं पुत्रं तुर्वसुं चाप्यजीजनत्।
yayāteḥ paṁcadāyādāstānpravakṣyāmi nāmataḥ devayānī yaduṁ putraṁ turvasuṁ cāpyajījanat
ययाति के पाँच उत्तराधिकारी थे; उन्हें नाम से बताता हूँ। देवयानी ने यदु और तुर्वसु पुत्रों को जन्म दिया,
श्लोक 96 (padma.1.12.96)
तथा द्रुह्यमणं पूरुं शर्मिष्ठाजनयत्सुतान्। यदुः पूरूश्च भरतस्ते वै वंशविवर्द्धनाः।
tathā druhyamaṇaṁ pūruṁ śarmiṣṭhājanayatsutān yaduḥ pūrūśca bharataste vai vaṁśavivarddhanāḥ
तथा शर्मिष्ठा ने द्रुह्यु, अनु और पूरु पुत्रों को जन्म दिया। यदु, पूरु और भरत ही वंश-वर्धक थे।
श्लोक 97 (padma.1.12.97)
पूरोर्वंशं प्रवक्ष्यामि यत्र जातोसि पार्थिव। यदोस्तु यादवा जाता यत्र तौ बलकेशवौ।
pūrorvaṁśaṁ pravakṣyāmi yatra jātosi pārthiva yadostu yādavā jātā yatra tau balakeśavau
हे राजन्! अब मैं पूरु के वंश को बताता हूँ, जिसमें आप उत्पन्न हुए हैं; तथा यदु से यादव उत्पन्न हुए, जिस वंश में बल (बलराम) और केशव (कृष्ण) हुए,
श्लोक 98 (padma.1.12.98)
भारावतारणार्थाय पांडवानां हिताय च। यदोः पुत्रा बभूवुश्च पंच देवसुतोपमाः।
bhārāvatāraṇārthāya pāṁḍavānāṁ hitāya ca yadoḥ putrā babhūvuśca paṁca devasutopamāḥ
पृथ्वी का भार उतारने तथा पाण्डवों के हित के लिए। यदु के पाँच पुत्र देवपुत्रों के समान उत्पन्न हुए —
श्लोक 99 (padma.1.12.99)
सहस्रजित्तथा ज्येष्ठः क्रोष्टा नीलोञ्जिको रघुः। सहस्रजितो दायादः शतजिन्नाम पार्थिवः।
sahasrajittathā jyeṣṭhaḥ kroṣṭā nīloñjiko raghuḥ sahasrajito dāyādaḥ śatajinnāma pārthivaḥ
सहस्रजित् ज्येष्ठ, तथा क्रोष्टा, नील, अंजिक, रघु। सहस्रजित् का उत्तराधिकारी शतजित् नामक राजा हुआ,
श्लोक 100 (padma.1.12.100)
शतजितश्च दायादास्त्रयः परमधार्मिकाः। हैहयश्च हयश्चैव तथा तालहयश्च यः।
śatajitaśca dāyādāstrayaḥ paramadhārmikāḥ haihayaśca hayaścaiva tathā tālahayaśca yaḥ
और शतजित् के तीन परम धार्मिक उत्तराधिकारी हुए — हैहय, हय, तथा तालहय।
श्लोक 101 (padma.1.12.101)
हैहयस्य तु दायादो धर्मनेत्रः प्रतिश्रुतः। धर्मनेत्रस्य कुंतिस्तु संहतस्तस्य चात्मजः।
haihayasya tu dāyādo dharmanetraḥ pratiśrutaḥ dharmanetrasya kuṁtistu saṁhatastasya cātmajaḥ
हैहय का उत्तराधिकारी प्रसिद्ध धर्मनेत्र हुआ; धर्मनेत्र का पुत्र कुन्ति, और उसका पुत्र संहत।
श्लोक 102 (padma.1.12.102)
संहतस्य तु दायादो महिष्मान्नाम पार्थिवः। आसीन्महिष्मतः पुत्रो भद्रसेनः प्रतापवान्।
saṁhatasya tu dāyādo mahiṣmānnāma pārthivaḥ āsīnmahiṣmataḥ putro bhadrasenaḥ pratāpavān
संहत का उत्तराधिकारी महिष्मान् नामक राजा हुआ; महिष्मान् का पुत्र प्रतापी भद्रसेन हुआ।
श्लोक 103 (padma.1.12.103)
वाराणस्यामभूद्राजा कथितः पूर्वमेव हि। भद्रसेनस्य पुत्रस्तु दुर्दमो नाम धार्मिकः।
vārāṇasyāmabhūdrājā kathitaḥ pūrvameva hi bhadrasenasya putrastu durdamo nāma dhārmikaḥ
वे वाराणसी में राजा हुए, जैसा पहले ही बताया गया है। भद्रसेन का पुत्र धार्मिक दुर्दम नामक हुआ।
श्लोक 104 (padma.1.12.104)
दुर्दमस्य सुतो भीमो धनको नाम वीर्यवान्। धनकस्य सुता ह्यासन्चत्वारो लोकविश्रुताः।
durdamasya suto bhīmo dhanako nāma vīryavān dhanakasya sutā hyāsancatvāro lokaviśrutāḥ
दुर्दम का पराक्रमी पुत्र धनक नामक हुआ। धनक के चार पुत्र थे, जो लोकविख्यात हुए —
श्लोक 105 (padma.1.12.105)
कृताग्निः कृतवीर्यश्च कृतधर्मा तथैव च। कृतौजाश्च चतुर्थोभूत्कृतवीर्याच्च सोर्जुनः।
kṛtāgniḥ kṛtavīryaśca kṛtadharmā tathaiva ca kṛtaujāśca caturthobhūtkṛtavīryācca sorjunaḥ
कृताग्नि, कृतवीर्य, तथा कृतधर्मा, और कृतौज चौथा हुआ। कृतवीर्य से अर्जुन उत्पन्न हुआ,
श्लोक 106 (padma.1.12.106)
जातो बाहुसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरो नृपः। वर्षायुतं तपस्तेपे दुश्चरं पृथिवीपतिः।
jāto bāhusahasreṇa saptadvīpeśvaro nṛpaḥ varṣāyutaṁ tapastepe duścaraṁ pṛthivīpatiḥ
जो सहस्र-भुजाओं सहित, सातों द्वीपों का स्वामी राजा हुआ। उस पृथ्वीपति ने दस सहस्र वर्षों तक दुष्कर तप किया,
श्लोक 107 (padma.1.12.107)
दत्तमाराधयामास कार्त्तवीर्योत्रिसंभवम्। तस्मै दत्तो वरान्प्रादाच्चतुरः पुरुषोत्तमः।
dattamārādhayāmāsa kārttavīryotrisaṁbhavam tasmai datto varānprādāccaturaḥ puruṣottamaḥ
कार्तवीर्य ने अत्रि-पुत्र दत्त (दत्तात्रेय) की आराधना की। पुरुषोत्तम दत्त ने उसे चार वर दिए।
श्लोक 108 (padma.1.12.108)
पूर्वं बाहुसहस्रं तु स वव्रे राजसत्तमः। अधर्मं ध्यायमानस्य भीतिश्चापि निवारणम्।
pūrvaṁ bāhusahasraṁ tu sa vavre rājasattamaḥ adharmaṁ dhyāyamānasya bhītiścāpi nivāraṇam
पहले उस श्रेष्ठ राजा ने सहस्र भुजाएँ माँगीं; तथा अधर्म का चिन्तन करने पर भय, और उससे निवृत्ति भी;
श्लोक 109 (padma.1.12.109)
युद्धेन पृथिवीं जित्वा धर्मेणावाप्य वै बलम्। संग्रामे वर्तमानस्य वधश्चैवाधिकाद्भवेत्।
yuddhena pṛthivīṁ jitvā dharmeṇāvāpya vai balam saṁgrāme vartamānasya vadhaścaivādhikādbhavet
युद्ध से पृथ्वी को जीतना, धर्म से बल प्राप्त करना; और युद्ध में लगे रहते हुए, केवल किसी श्रेष्ठ (व्यक्ति) से ही वध हो।
श्लोक 110 (padma.1.12.110)
एतेनेयं वसुमती सप्तद्वीपा सपत्तना। सप्तोदधि परिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता।
eteneyaṁ vasumatī saptadvīpā sapattanā saptodadhi parikṣiptā kṣātreṇa vidhinā jitā
इसी से यह सातों द्वीपों वाली, नगरों सहित, सातों समुद्रों से घिरी वसुधा उसने क्षत्रिय-विधि से जीती।
श्लोक 111 (padma.1.12.111)
जज्ञे बाहुसहस्रं च इच्छतस्तस्य धीमतः। सर्वे यज्ञा महाबाहोस्तस्यासन्भूरिदक्षिणाः।
jajñe bāhusahasraṁ ca icchatastasya dhīmataḥ sarve yajñā mahābāhostasyāsanbhūridakṣiṇāḥ
उस बुद्धिमान् की इच्छानुसार सहस्र भुजाएँ उत्पन्न हुईं। उस महाबाहु के सभी यज्ञ प्रचुर दक्षिणाओं वाले थे;
श्लोक 112 (padma.1.12.112)
सर्वे कांचनयूपास्ते सर्वे कांचनवेदिकाः। सर्वे देवैश्च संप्राप्ता विमानस्थैरलंकृतैः।
sarve kāṁcanayūpāste sarve kāṁcanavedikāḥ sarve devaiśca saṁprāptā vimānasthairalaṁkṛtaiḥ
सभी में स्वर्ण के यूप, सभी में स्वर्ण की वेदियाँ; सभी देवताओं द्वारा, अलंकृत विमानों पर सवार होकर,
श्लोक 113 (padma.1.12.113)
गंधर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवापि सेविताः। यस्य यज्ञे जगौ गाथा गंधंर्वो नारदस्तथा।
gaṁdharvairapsarobhiśca nityamevāpi sevitāḥ yasya yajñe jagau gāthā gaṁdhaṁrvo nāradastathā
गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा नित्य सेवित थे। जिसके यज्ञ में गन्धर्व और नारद ने यह गाथा गाई —
श्लोक 114 (padma.1.12.114)
कार्त्तवीर्यस्य राजर्षेर्महिमानं निरीक्ष्य सः। न नूनं कार्त्तवीर्यस्य गतिं यास्यंति पार्थिवाः।
kārttavīryasya rājarṣermahimānaṁ nirīkṣya saḥ na nūnaṁ kārttavīryasya gatiṁ yāsyaṁti pārthivāḥ
राजर्षि कार्तवीर्य की महिमा देखकर — 'निश्चय ही कोई राजा कार्तवीर्य की गति को नहीं प्राप्त कर सकेंगे —
श्लोक 115 (padma.1.12.115)
यज्ञैर्दानैस्तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च। सप्तद्वीपाननुचरन्वेगेन पवनोपमः।
yajñairdānaistapobhiśca vikrameṇa śrutena ca saptadvīpānanucaranvegena pavanopamaḥ
यज्ञों, दानों, तपस्याओं, पराक्रम और विद्या से' — पवन के समान वेग से सातों द्वीपों में विचरण करते हुए,
श्लोक 116 (padma.1.12.116)
पंचाशीतिसहस्राणि वर्षाणां च नराधिपः। सप्तद्वीपपृथिव्याश्च चक्रवर्ती बभूव ह।
paṁcāśītisahasrāṇi varṣāṇāṁ ca narādhipaḥ saptadvīpapṛthivyāśca cakravartī babhūva ha
पचासी हजार वर्षों तक वह नराधिप सातों द्वीपों वाली पृथ्वी का चक्रवर्ती सम्राट् बना रहा।
श्लोक 117 (padma.1.12.117)
स एव पशुपालोभूत्क्षेत्रपालः स एव हि। स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोभवत्।
sa eva paśupālobhūtkṣetrapālaḥ sa eva hi sa eva vṛṣṭyā parjanyo yogitvādarjunobhavat
वही पशुओं का पालक बना, वही क्षेत्रपाल भी; वही वर्षा से पर्जन्य के समान, और योग से अर्जुन (उज्ज्वल) बना।
श्लोक 118 (padma.1.12.118)
योसौ बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा। भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनेव भास्करः।
yosau bāhusahasreṇa jyāghātakaṭhinatvacā bhāti raśmisahasreṇa śāradeneva bhāskaraḥ
जो सहस्र भुजाओं से, धनुष की डोरी के आघात से कठोर त्वचा वाला, सहस्र किरणों से युक्त शरद्-सूर्य के समान चमकता है।
श्लोक 119 (padma.1.12.119)
एष नाम मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः। एष वेगं समुद्रस्य प्रावृट्काले भजेत वै।
eṣa nāma manuṣyeṣu māhiṣmatyāṁ mahādyutiḥ eṣa vegaṁ samudrasya prāvṛṭkāle bhajeta vai
वही महातेजस्वी माहिष्मती में मनुष्यों में प्रसिद्ध है। वही वर्षा-काल में समुद्र के वेग को स्वीकार करता,
श्लोक 120 (padma.1.12.120)
क्रीडते स्वसुखा ये विप्रतिस्रोतो महीपतिः। ललनाः क्रीडता तेन प्रतिबद्धोर्मिमालिनी।
krīḍate svasukhā ye vipratisroto mahīpatiḥ lalanāḥ krīḍatā tena pratibaddhormimālinī
अपने सुख के लिए धारा के विपरीत क्रीड़ा करने वाला वह भूपति। उसके साथ क्रीड़ा करती सुन्दरियों से बाधित लहरों की माला —
श्लोक 121 (padma.1.12.121)
ऊर्मिभ्रुकुटिमाला सा शंकिताभ्येति नर्मदा। एष एव मनोर्वंशे त्ववगाहेन्महार्णवम्।
ūrmibhrukuṭimālā sā śaṁkitābhyeti narmadā eṣa eva manorvaṁśe tvavagāhenmahārṇavam
वह लहर-रूपी भौंहों वाली नर्मदा शंकित होकर पास आती। वही मनु के वंश में महासागर में गोता लगाकर,
श्लोक 122 (padma.1.12.122)
करेणोद्धृत्य वेगं तु कामिनीप्रीणनेन तु। तस्य बाहुसहस्रेण क्षोभ्यमाणे महोदधौ।
kareṇoddhṛtya vegaṁ tu kāminīprīṇanena tu tasya bāhusahasreṇa kṣobhyamāṇe mahodadhau
अपनी भुजा से उसके वेग को उठाकर, प्रियतमाओं को प्रसन्न करने के लिए (क्रीड़ा करता)। उसकी सहस्र भुजाओं से जब महासागर क्षुब्ध हो जाता,
श्लोक 123 (padma.1.12.123)
भवंति लीना निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः। तदूरुक्षोभचकिता अमृतोत्पादशंकिताः।
bhavaṁti līnā niśceṣṭāḥ pātālasthā mahāsurāḥ tadūrukṣobhacakitā amṛtotpādaśaṁkitāḥ
तब पाताल में स्थित महासुर स्तब्ध, निश्चेष्ट हो जाते, उसकी जाँघों के क्षोभ से भयभीत होकर, फिर से अमृत-उत्पत्ति की आशंका से,
श्लोक 124 (padma.1.12.124)
नता निश्चलमूर्द्धानो भवंति च महोरगाः। एष धन्वी च चिक्षेप रावणं प्रति सायकान्।
natā niścalamūrddhāno bhavaṁti ca mahoragāḥ eṣa dhanvī ca cikṣepa rāvaṇaṁ prati sāyakān
तथा महानाग नतमस्तक, निश्चल हो जाते। इसी धनुर्धारी ने रावण के प्रति बाण चलाए थे —
श्लोक 125 (padma.1.12.125)
एष धन्वी धनुर्गृह्य उत्सिक्तं पंचभिः शरैः। लंकेशं मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात्।
eṣa dhanvī dhanurgṛhya utsiktaṁ paṁcabhiḥ śaraiḥ laṁkeśaṁ mohayitvā tu sabalaṁ rāvaṇaṁ balāt
इस धनुर्धारी ने धनुष लेकर, पाँच बाणों से उद्दण्ड, सेना सहित लंकेश रावण को बलपूर्वक मोहित कर,
श्लोक 126 (padma.1.12.126)
निर्जित्य बद्ध्वा त्वानीय माहिष्मत्याम्बबंध तम्। ततो गतोहं तस्याग्रे अर्जुनं संप्रसादयन्।
nirjitya baddhvā tvānīya māhiṣmatyāmbabaṁdha tam tato gatohaṁ tasyāgre arjunaṁ saṁprasādayan
पराजित करके बाँधकर लाकर उसे माहिष्मती में बाँध रखा। तब मैं (नारद) उसके सामने जाकर अर्जुन को प्रसन्न करते हुए,
श्लोक 127 (padma.1.12.127)
मुमोच राजन्पौत्रं मे सख्यं कृत्वा च पार्थिवः। तस्य बाहुसहस्रस्य बभूव ज्यातलस्वनः।
mumoca rājanpautraṁ me sakhyaṁ kṛtvā ca pārthivaḥ tasya bāhusahasrasya babhūva jyātalasvanaḥ
'हे राजन्! मेरे पौत्र को छोड़ दीजिए' — यह कहा, और उस राजा ने मित्रता करके उसे छोड़ दिया। उसकी सहस्र भुजाओं की धनुष-टंकार की ध्वनि,
श्लोक 128 (padma.1.12.128)
युगांताग्नेः प्रवृत्तस्य यथा ज्यातलनिःस्वनः। अहो बलं विधेर्वीर्यं भार्गवः स यदाच्छिनत्।
yugāṁtāgneḥ pravṛttasya yathā jyātalaniḥsvanaḥ aho balaṁ vidhervīryaṁ bhārgavaḥ sa yadācchinat
युगान्त की अग्नि के समान गूँजती थी। 'अहो! क्या बल! क्या विधि का पराक्रम!' — जब उस भार्गव (परशुराम) ने काट डाला,
श्लोक 129 (padma.1.12.129)
मृधे सहस्रं बाहूनां हेमतालवनं यथा। यं वसिष्ठस्तु संक्रुद्धो ह्यर्जुनं शप्तवान्विभुः।
mṛdhe sahasraṁ bāhūnāṁ hematālavanaṁ yathā yaṁ vasiṣṭhastu saṁkruddho hyarjunaṁ śaptavānvibhuḥ
युद्ध में उसकी सहस्र भुजाओं को, जैसे स्वर्ण-ताल के वन को। जिस अर्जुन को अत्यन्त क्रोधित वसिष्ठ ने शाप दिया था —
श्लोक 130 (padma.1.12.130)
यस्माद्वनं प्रदग्धं ते विश्रुतं मम हैहय। तस्मात्ते दुष्कृतं कर्म कृतमन्यो हनिष्यति।
yasmādvanaṁ pradagdhaṁ te viśrutaṁ mama haihaya tasmātte duṣkṛtaṁ karma kṛtamanyo haniṣyati
'हे हैहय! चूँकि तुमने मेरा प्रसिद्ध वन जला दिया है, इसलिए तुम्हारे इस दुष्कर्म के कारण कोई अन्य तुम्हें मार डालेगा —
श्लोक 131 (padma.1.12.131)
छित्वा बाहुसहस्रं ते प्रमथ्य तरसा बली। तपस्वी ब्राह्मणस्त्वां वै वधिष्यति स भार्गवः।
chitvā bāhusahasraṁ te pramathya tarasā balī tapasvī brāhmaṇastvāṁ vai vadhiṣyati sa bhārgavaḥ
तुम्हारी सहस्र भुजाओं को काटकर, बलपूर्वक कुचलकर, वह तपस्वी ब्राह्मण भार्गव तुम्हें मार डालेगा।'
श्लोक 132 (padma.1.12.132)
तस्य रामोथ हंतासीन्मुनिशापेन धीमतः। तस्य पुत्रशतं त्वासीत्पंच तत्र महारथाः।
tasya rāmotha haṁtāsīnmuniśāpena dhīmataḥ tasya putraśataṁ tvāsītpaṁca tatra mahārathāḥ
मुनि के शाप से उस बुद्धिमान् (कार्तवीर्य) का वधकर्ता राम (परशुराम) बने। उसके सौ पुत्र थे, जिनमें से पाँच महारथी थे —
श्लोक 133 (padma.1.12.133)
कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो महाबल। शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टो वै कृष्ण एव च।
kṛtāstrā balinaḥ śūrā dharmātmāno mahābala śūrasenaśca śūraśca dhṛṣṭo vai kṛṣṇa eva ca
अस्त्र-कुशल, बलवान्, शूर, धर्मात्मा, महाबली — शूरसेन, शूर, धृष्ट तथा कृष्ण,
श्लोक 134 (padma.1.12.134)
जयद्ध्वजः स वै कर्ता अवन्तिश्च रसापतिः। जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजंघो महाबलः।
jayaddhvajaḥ sa vai kartā avantiśca rasāpatiḥ jayadhvajasya putrastu tālajaṁgho mahābalaḥ
और जयध्वज, जो अवन्ति का, रसा-नदी का स्वामी बना। जयध्वज का पुत्र महाबली तालजंघ हुआ,
श्लोक 135 (padma.1.12.135)
तस्य पुत्राश्शतान्येव तालजंघा इति स्मृताः। तेषां पंचकुलान्यासन्हैहयानां महात्मनाम्।
tasya putrāśśatānyeva tālajaṁghā iti smṛtāḥ teṣāṁ paṁcakulānyāsanhaihayānāṁ mahātmanām
जिसके सौ पुत्र 'तालजंघ' नाम से स्मरण किए गए। इन महात्मा हैहयों के पाँच कुल थे —
श्लोक 136 (padma.1.12.136)
वीतिहोत्राश्च संजाता भोजाश्चावंतयस्तथा। तुंडकेराश्च विक्रांतास्तालजंघाः प्रकीर्तिताः।
vītihotrāśca saṁjātā bhojāścāvaṁtayastathā tuṁḍakerāśca vikrāṁtāstālajaṁghāḥ prakīrtitāḥ
वीतिहोत्र, तथा भोज, अवन्ति, और पराक्रमी तुण्डकेर उत्पन्न हुए — ये तालजंघ कहे गए हैं।
श्लोक 137 (padma.1.12.137)
वीतिहोत्रसुतश्चापि अनंतो नाम वीर्यवान्। दुर्जयस्तस्य पुत्रस्तु बभूवामित्रकर्षणः।
vītihotrasutaścāpi anaṁto nāma vīryavān durjayastasya putrastu babhūvāmitrakarṣaṇaḥ
वीतिहोत्र के पराक्रमी पुत्र का नाम अनन्त था; उसका पुत्र दुर्जय शत्रु-संतापक हुआ।
श्लोक 138 (padma.1.12.138)
सद्भावेन महाराजः प्रजाधर्मेण पालयन्। कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रधृत्।
sadbhāvena mahārājaḥ prajādharmeṇa pālayan kārtavīryārjuno nāma rājā bāhusahasradhṛt
वह महाराज सद्भाव से धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करता था — सहस्र-भुजाधारी राजा कार्तवीर्य अर्जुन नामक,
श्लोक 139 (padma.1.12.139)
येन सागरपर्यंता धनुषा निर्जिता मही। यस्तस्यकीर्तयेन्नाम कल्यमुत्थाय मानवः।
yena sāgaraparyaṁtā dhanuṣā nirjitā mahī yastasyakīrtayennāma kalyamutthāya mānavaḥ
जिसने अपने धनुष से समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी को जीत लिया। जो भी मनुष्य प्रातःकाल उठकर उसका नाम कीर्तन करता है,
श्लोक 140 (padma.1.12.140)
न तस्य वित्तनाशः स्यान्नष्टं च लभते पुनः। कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह धीमतः। यथा यष्टा यथा दाता स्वर्गलोके महीयते।
na tasya vittanāśaḥ syānnaṣṭaṁ ca labhate punaḥ kārtavīryasya yo janma kathayediha dhīmataḥ yathā yaṣṭā yathā dātā svargaloke mahīyate
उसका धन नष्ट नहीं होता, और नष्ट धन पुनः प्राप्त होता है। जो भी बुद्धिमान् यहाँ कार्तवीर्य के जन्म का वर्णन करता है, वह यज्ञकर्ता और दानी के समान स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।