सृष्टि खण्ड · अध्याय 34
ब्रह्मांडदान
श्लोक 1 (padma.1.34.1)
भीष्म उवाच॥ कस्मिन्काले भगवता ब्रह्मणा लोककारिणा। यज्ञियैर्यष्टुमारब्धं तद्भवान्वक्तुमर्हति॥
bhīṣma uvāca kasminkāle bhagavatā brahmaṇā lokakāriṇā yajñiyairyaṣṭumārabdhaṁ tadbhavānvaktumarhati
भीष्म ने कहा — किस काल में लोकनिर्माता भगवान् ब्रह्मा ने ऋत्विजों द्वारा यज्ञ आरंभ किया, यह आप कहने योग्य हैं।
श्लोक 2 (padma.1.34.2)
किं नामान ऋत्विजस्ते ब्रह्मणा ये प्रकल्पिताः। का च वै दक्षिणा तेषां दत्ता तेन महात्मना॥
kiṁ nāmāna ṛtvijaste brahmaṇā ye prakalpitāḥ kā ca vai dakṣiṇā teṣāṁ dattā tena mahātmanā
ब्रह्मा द्वारा नियुक्त उनके ऋत्विजों के क्या नाम थे? और उन्हें उस महात्मा द्वारा क्या दक्षिणा दी गई?
श्लोक 3 (padma.1.34.3)
यथाभूतं यथावृत्तं तथा त्वं मे प्रकीर्तय। सुमहत्कौतुकं जातं यज्ञं पैतामहं प्रति॥
yathābhūtaṁ yathāvṛttaṁ tathā tvaṁ me prakīrtaya sumahatkautukaṁ jātaṁ yajñaṁ paitāmahaṁ prati
जैसा हुआ, जैसा घटित हुआ, वह आप मुझे बताइए। पितामह के यज्ञ के विषय में मुझे बड़ा कौतुक हुआ है।
श्लोक 4 (padma.1.34.4)
पुलस्त्य उवाच॥ पूर्वमेव मया ख्यातं यदा स्वायंभुवो मनुः। सृष्ट्वा प्रजापतीन्सर्वानुक्तः सृष्टिं कुरुष्व वै॥
pulastya uvāca pūrvameva mayā khyātaṁ yadā svāyaṁbhuvo manuḥ sṛṣṭvā prajāpatīnsarvānuktaḥ sṛṣṭiṁ kuruṣva vai
पुलस्त्य ने कहा — पहले मैंने बताया था कि जब स्वायंभुव मनु को समस्त प्रजापतियों की सृष्टि करके 'सृष्टि करो' ऐसा कहा गया—
श्लोक 5 (padma.1.34.5)
स्वयं तु पुष्करं गत्वा यज्ञस्याहृत्य विस्तरम्। ससंभारान्समानाय्य वह्न्यगारे स्थितोभवत्॥
svayaṁ tu puṣkaraṁ gatvā yajñasyāhṛtya vistaram sasaṁbhārānsamānāyya vahnyagāre sthitobhavat
—तब स्वयं पुष्कर जाकर, यज्ञ का विस्तार लाकर, सामग्री सहित एकत्र कर ब्रह्मा अग्निशाला में स्थित हुए।
श्लोक 6 (padma.1.34.6)
गायंति नित्यं गंधर्वा नृत्यंत्यप्सरसां गणाः। ब्रह्मोद्गाता होताध्वर्युश्चत्वारो यज्ञवाहकाः॥
gāyaṁti nityaṁ gaṁdharvā nṛtyaṁtyapsarasāṁ gaṇāḥ brahmodgātā hotādhvaryuścatvāro yajñavāhakāḥ
गंधर्व नित्य गान करते थे, अप्सराओं के समूह नृत्य करते थे। ब्रह्मा, उद्गाता, होता, अध्वर्यु — ये चार यज्ञ-वाहक थे।
श्लोक 7 (padma.1.34.7)
एकैकस्य त्रयश्चान्ये परिवाराः स्वयंकृताः। ब्रह्मा च ब्रह्मणाच्छंसी पोता चाग्नीध्र एव च॥
ekaikasya trayaścānye parivārāḥ svayaṁkṛtāḥ brahmā ca brahmaṇācchaṁsī potā cāgnīdhra eva ca
एक-एक के तीन-तीन अन्य सहायक स्वयं नियुक्त थे: ब्रह्मा के लिए ब्रह्मणाच्छंसी, पोता तथा आग्नीध्र।
श्लोक 8 (padma.1.34.8)
आन्वीक्षिकी सर्वविद्या ब्राह्मी ह्येषा चतुष्टयी। उद्गाता च प्रत्युद्गाता प्रतिहर्ता सुब्रह्मण्यः॥
ānvīkṣikī sarvavidyā brāhmī hyeṣā catuṣṭayī udgātā ca pratyudgātā pratihartā subrahmaṇyaḥ
यह चतुष्टय आन्वीक्षिकी, सर्वविद्या तथा ब्राह्मी विद्याओं वाला था। उद्गाता के लिए प्रत्युद्गाता, प्रतिहर्ता तथा सुब्रह्मण्य नियुक्त थे।
श्लोक 9 (padma.1.34.9)
चतुष्टयी द्वितीयैषा तूद्गातुश्च प्रकीर्तिता। होता च मैत्रावरुणस्तथाऽच्छावाक एव च॥
catuṣṭayī dvitīyaiṣā tūdgātuśca prakīrtitā hotā ca maitrāvaruṇastathā'cchāvāka eva ca
उद्गाता का यह दूसरा चतुष्टय कहा गया। होता के लिए मैत्रावरुण तथा अच्छावाक नियुक्त थे।
श्लोक 10 (padma.1.34.10)
ग्रावस्तुच्च चतुर्थोत्र तृतीया च चतुष्टयी। अध्वर्युश्च प्रतिष्ठाता नेष्टोन्नेता तथैव च॥
grāvastucca caturthotra tṛtīyā ca catuṣṭayī adhvaryuśca pratiṣṭhātā neṣṭonnetā tathaiva ca
यहाँ चौथा ग्रावस्तुत् और तीसरा चतुष्टय था। अध्वर्यु के लिए प्रतिष्ठाता, नेष्टा तथा उन्नेता नियुक्त थे।
श्लोक 11 (padma.1.34.11)
चतुष्टयी चतुर्थ्येषा प्रोक्ता शंतनुनंदन। एते वै षोडश प्रोक्ता ऋत्विजो वेदचिंतकैः॥
catuṣṭayī caturthyeṣā proktā śaṁtanunaṁdana ete vai ṣoḍaśa proktā ṛtvijo vedaciṁtakaiḥ
हे शंतनुनंदन! यह चौथा चतुष्टय कहा गया। इन सोलह को ही वेदवेत्ताओं ने ऋत्विज कहा है।
श्लोक 12 (padma.1.34.12)
शतानि त्रीणि षष्टिश्च यज्ञाः सृष्टाः स्वयंभुवा॥ एतांश्चैतेषु सर्वेषु प्रवदंति सदा द्विजान्॥
śatāni trīṇi ṣaṣṭiśca yajñāḥ sṛṣṭāḥ svayaṁbhuvā etāṁścaiteṣu sarveṣu pravadaṁti sadā dvijān
स्वयंभू ने तीन सौ साठ यज्ञ रचे। इन सबमें द्विजों को सदा यह क्रम बताते हैं।
श्लोक 13 (padma.1.34.13)
सदस्यं केचिदिच्छंति त्रिसामाध्वर्युमेव च। ब्रह्माणं नारदं चक्रे ब्राह्मणाच्छंसि गौतमम्॥
sadasyaṁ kecidicchaṁti trisāmādhvaryumeva ca brahmāṇaṁ nāradaṁ cakre brāhmaṇācchaṁsi gautamam
कुछ लोग त्रिसाम अध्वर्यु को भी सदस्य मानना चाहते हैं। ब्रह्मा ने नारद को अपना ब्रह्मा-ऋत्विज बनाया, गौतम को ब्रह्मणाच्छंसी।
श्लोक 14 (padma.1.34.14)
देवगर्भं च पोतारमाग्नीध्रं चैव देवलम्। उद्गातांगिरसः प्रत्युद्गाता च पुलहस्तथा॥
devagarbhaṁ ca potāramāgnīdhraṁ caiva devalam udgātāṁgirasaḥ pratyudgātā ca pulahastathā
देवगर्भ को पोता तथा देवल को आग्नीध्र बनाया। उद्गाता अंगिरा हुए, प्रत्युद्गाता पुलह हुए।
श्लोक 15 (padma.1.34.15)
नारायणः प्रतिहर्ता सुब्रह्मण्योत्रिरुच्यते। तस्मिन्यज्ञे भृगुर्होता वसिष्ठो मैत्र एव च॥
nārāyaṇaḥ pratihartā subrahmaṇyotrirucyate tasminyajñe bhṛgurhotā vasiṣṭho maitra eva ca
नारायण प्रतिहर्ता हुए, सुब्रह्मण्य अत्रि कहलाए। उस यज्ञ में भृगु होता तथा वसिष्ठ मैत्रावरुण थे।
श्लोक 16 (padma.1.34.16)
अच्छावाकः क्रतुः प्रोक्तो ग्रावस्तुच्च्यवनस्तथा। पुलस्त्योद्ध्वर्युरेवासीत्प्रतिष्ठाता च वै शिबिः॥
acchāvākaḥ kratuḥ prokto grāvastuccyavanastathā pulastyoddhvaryurevāsītpratiṣṭhātā ca vai śibiḥ
अच्छावाक क्रतु कहा गया, ग्रावस्तुत् च्यवन थे। पुलस्त्य ही अध्वर्यु थे, और शिबि प्रतिष्ठाता थे।
श्लोक 17 (padma.1.34.17)
बृहस्पतिस्तत्र नेष्टा उन्नेता शांशपायनः। धर्मः सदस्यस्तत्रासीत्पुत्रपौत्रसहायवान्॥
bṛhaspatistatra neṣṭā unnetā śāṁśapāyanaḥ dharmaḥ sadasyastatrāsītputrapautrasahāyavān
वहाँ बृहस्पति नेष्टा थे, शांशपायन उन्नेता थे। पुत्र-पौत्रों के सहायक सहित धर्म वहाँ सदस्य थे।
श्लोक 18 (padma.1.34.18)
भरद्वाजः शमीकश्च पुरुकुत्सो युगंधरः। एनकस्तीर्णकश्चैव केशः कुतप एव च॥
bharadvājaḥ śamīkaśca purukutso yugaṁdharaḥ enakastīrṇakaścaiva keśaḥ kutapa eva ca
भरद्वाज, शमीक, पुरुकुत्स, युगंधर, एनक, तीर्णक, केश तथा कुतप—
श्लोक 19 (padma.1.34.19)
गर्गो वेदशिराश्चैव त्रिसामाद्ध्वर्यवः कृताः। कण्वादयस्तथा चान्ये मार्कंडो गंडिरेव च॥
gargo vedaśirāścaiva trisāmāddhvaryavaḥ kṛtāḥ kaṇvādayastathā cānye mārkaṁḍo gaṁḍireva ca
—गर्ग तथा वेदशिरा — ये त्रिसाम अध्वर्यु बनाए गए। कण्व आदि तथा अन्य, मार्कंड और गंडि भी—
श्लोक 20 (padma.1.34.20)
पुत्रपौत्रसमेताश्च सशिष्याः सहबांधवाः। कर्माणि तत्र कुर्वाणा दिवानिशमतंद्रिताः॥
putrapautrasametāśca saśiṣyāḥ sahabāṁdhavāḥ karmāṇi tatra kurvāṇā divāniśamataṁdritāḥ
—पुत्र-पौत्रों, शिष्यों तथा बांधवों सहित वहाँ यज्ञ-कर्म करते हुए दिन-रात अथक रहते थे।
श्लोक 21 (padma.1.34.21)
मन्वंतरे व्यतीते तु यज्ञस्यावभृथोभवत्। दक्षिणा ब्रह्मणे दत्ता प्राची होतुस्तु दक्षिणा॥
manvaṁtare vyatīte tu yajñasyāvabhṛthobhavat dakṣiṇā brahmaṇe dattā prācī hotustu dakṣiṇā
एक मन्वंतर बीत जाने पर यज्ञ का अवभृथ (समापन-स्नान) हुआ। ब्रह्मा-ऋत्विज को पूर्व दिशा की दक्षिणा दी गई, होता को भी—
श्लोक 22 (padma.1.34.22)
अद्ध्वर्यवे प्रतीची तु उद्गातुश्चोत्तरा तथा। त्रैलोक्यं सकलं ब्रह्मा ददौ तेषां तु दक्षिणाम्॥
addhvaryave pratīcī tu udgātuścottarā tathā trailokyaṁ sakalaṁ brahmā dadau teṣāṁ tu dakṣiṇām
—अध्वर्यु को पश्चिम दिशा, उद्गाता को उत्तर दिशा। ब्रह्मा ने उन्हें संपूर्ण त्रिलोक ही दक्षिणा के रूप में दिया।
श्लोक 23 (padma.1.34.23)
धेनूनां च शतं प्राज्ञैर्दातव्यं यज्ञसिद्धये। अष्टौ तु यज्ञवाहानां चत्वारिंशाधिकास्तथा॥
dhenūnāṁ ca śataṁ prājñairdātavyaṁ yajñasiddhaye aṣṭau tu yajñavāhānāṁ catvāriṁśādhikāstathā
यज्ञ की सिद्धि के लिए विद्वानों को सौ गौएँ देनी चाहिए। यज्ञ-वाहकों में से आठ को चालीस अधिक (गौएँ)—
श्लोक 24 (padma.1.34.24)
द्वितीयस्थानिनां चैव चतुर्विंशत्प्रकीर्तिताः। षोडशैव तृतीयानां देया वै धेनवः शुभाः॥
dvitīyasthānināṁ caiva caturviṁśatprakīrtitāḥ ṣoḍaśaiva tṛtīyānāṁ deyā vai dhenavaḥ śubhāḥ
—द्वितीय-स्थानीय पुरोहितों को चौबीस गौएँ बताई गई हैं। तृतीय वर्ग को सोलह शुभ गौएँ देनी चाहिए।
श्लोक 25 (padma.1.34.25)
द्वादशैव तथा चान्या आग्नीध्रादिषु दापयेत्। अनया संख्यया चैव ग्रामान्दासीरजाविकं॥
dvādaśaiva tathā cānyā āgnīdhrādiṣu dāpayet anayā saṁkhyayā caiva grāmāndāsīrajāvikaṁ
आग्नीध्र आदि को बारह अन्य गौएँ देनी चाहिए। इसी संख्या के अनुसार गाँव, दासियाँ, बकरी-भेड़—
श्लोक 26 (padma.1.34.26)
सहस्रभोज्यं दातव्यं स्नात्वा चावभृथे क्रतौ। यजमानेन सर्वस्वं देयं स्वायंभुवोब्रवीत्॥
sahasrabhojyaṁ dātavyaṁ snātvā cāvabhṛthe kratau yajamānena sarvasvaṁ deyaṁ svāyaṁbhuvobravīt
—और सहस्रभोज्य (हजार को भोजन कराने योग्य सामग्री) देनी चाहिए, अवभृथ यज्ञ में स्नान करके। यजमान को सर्वस्व दे देना चाहिए, ऐसा स्वायंभुव ने कहा।
श्लोक 27 (padma.1.34.27)
अद्ध्वर्यूणां सदस्यानां स्वेच्छया दानमिष्यते। विष्णुं चाहूय वै ब्रह्मा वाक्यमाह मुदान्वितः॥
addhvaryūṇāṁ sadasyānāṁ svecchayā dānamiṣyate viṣṇuṁ cāhūya vai brahmā vākyamāha mudānvitaḥ
अध्वर्युओं और सदस्यों को स्वेच्छा से दान देना अभीष्ट है। तब ब्रह्मा ने विष्णु को बुलाकर हर्षित होकर यह वचन कहा।
श्लोक 28 (padma.1.34.28)
अभिप्रसाद्य सावित्रीं त्वमिहानय सुव्रत। त्वयि दृष्टे न सा कोपं करिष्यति शुभानना॥
abhiprasādya sāvitrīṁ tvamihānaya suvrata tvayi dṛṣṭe na sā kopaṁ kariṣyati śubhānanā
'हे सुव्रत! तुम सावित्री को प्रसन्न कर यहाँ ले आओ। तुम्हें देखकर वह शुभानना क्रोध नहीं करेगी।'
श्लोक 29 (padma.1.34.29)
स्निग्धैः सानुनयैर्वाक्यैर्हेतुयुक्तैर्विशेषतः। त्वं सदा मधुराभाषी जिह्वा ते स्रवतेमृतम्॥
snigdhaiḥ sānunayairvākyairhetuyuktairviśeṣataḥ tvaṁ sadā madhurābhāṣī jihvā te sravatemṛtam
'स्नेहभरी, विनयपूर्ण, विशेष रूप से युक्तिसंगत वाणी से — तुम सदा मधुरभाषी हो, तुम्हारी जिह्वा से अमृत झरता है।'
श्लोक 30 (padma.1.34.30)
यः करोति न ते वाक्यं त्रैलोक्ये न स दृश्यते। गंधर्वैः सहितो गत्वा प्रियां मम समानय॥
yaḥ karoti na te vākyaṁ trailokye na sa dṛśyate gaṁdharvaiḥ sahito gatvā priyāṁ mama samānaya
'जो तुम्हारी बात नहीं मानता, वह त्रिलोक में कहीं दिखाई नहीं देता। गंधर्वों सहित जाकर मेरी प्रिया को ले आओ।'
श्लोक 31 (padma.1.34.31)
त्वया प्रसादिता साद्ध्वी तुष्टा सा त्वेष्यति ध्रुवम्। विलंबो न त्वया कार्यो व्रज माधव माचिरम्॥
tvayā prasāditā sāddhvī tuṣṭā sā tveṣyati dhruvam vilaṁbo na tvayā kāryo vraja mādhava māciram
'तुम्हारे द्वारा प्रसन्न की गई वह साध्वी संतुष्ट होकर निश्चय ही आएगी। तुम्हें विलंब नहीं करना चाहिए; हे माधव! शीघ्र जाओ।'
श्लोक 32 (padma.1.34.32)
लक्ष्मीस्ते पुरतो यातु सावित्र्याः सदनं शुभा। तस्यास्त्वं पदवीं गच्छ सांत्वयस्व प्रियां मम॥
lakṣmīste purato yātu sāvitryāḥ sadanaṁ śubhā tasyāstvaṁ padavīṁ gaccha sāṁtvayasva priyāṁ mama
'लक्ष्मी तुम्हारे आगे-आगे सावित्री के शुभ भवन तक जाए। तुम उसके पथ पर जाओ, मेरी प्रिया को समझाओ।'
श्लोक 33 (padma.1.34.33)
न च ते विप्रियं देवि विविक्तं कर्तुमीहते। मुखं प्रेक्ष्य सदा कालं वर्तते तव सुंदरि॥
na ca te vipriyaṁ devi viviktaṁ kartumīhate mukhaṁ prekṣya sadā kālaṁ vartate tava suṁdari
'हे देवि! वह तुम्हारे साथ पृथक् होकर कोई अप्रिय कार्य करना नहीं चाहती। हे सुंदरी! वह सदैव तुम्हारे मुख की ओर देखती रहती है।'
श्लोक 34 (padma.1.34.34)
एवंविधानि वाक्यानि मधुराणि बहूनि च। देवी श्रावयितव्या सा यथातुष्टाऽचिराद्भवेत्॥
evaṁvidhāni vākyāni madhurāṇi bahūni ca devī śrāvayitavyā sā yathātuṣṭā'cirādbhavet
'ऐसे अनेक मधुर वचन उस देवी को सुनाने चाहिए, जिससे वह शीघ्र ही संतुष्ट हो जाए।'
श्लोक 35 (padma.1.34.35)
एवमुक्तस्तदा विष्णुर्ब्रह्मणा लोककारिणा। जगाम त्वरितो भूत्वा सावित्री यत्र तिष्ठति॥
evamuktastadā viṣṇurbrahmaṇā lokakāriṇā jagāma tvarito bhūtvā sāvitrī yatra tiṣṭhati
लोककर्ता ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर विष्णु त्वरित होकर वहाँ गए जहाँ सावित्री विराजमान थीं।
श्लोक 36 (padma.1.34.36)
दूरादेवागच्छमानं पत्न्या सह च केशवम्। उत्तस्थौ सत्वरा भूत्वा विष्णुना चाभिवंदिता॥
dūrādevāgacchamānaṁ patnyā saha ca keśavam uttasthau satvarā bhūtvā viṣṇunā cābhivaṁditā
अपनी पत्नी सहित दूर से आते हुए केशव को देखकर वह त्वरित होकर उठ खड़ी हुईं, और विष्णु द्वारा अभिवादन की गईं।
श्लोक 37 (padma.1.34.37)
नमस्ते देवदेवेशि ब्रह्मपत्नि नमोस्तु ते। त्वां नमस्कृत्य सर्वो हि जनः पापात्प्रमुच्यते॥
namaste devadeveśi brahmapatni namostu te tvāṁ namaskṛtya sarvo hi janaḥ pāpātpramucyate
'हे देवदेवेशी! तुम्हें नमस्कार। हे ब्रह्मपत्नी! तुम्हें नमस्कार। तुम्हें नमन करके सारा जन पाप से मुक्त हो जाता है।'
श्लोक 38 (padma.1.34.38)
पतिव्रता महाभागा ब्रह्मणस्त्वं हृदि स्थिता। अहर्निशं चिंतयंस्त्वां प्रसादं तेभिकांक्षति॥
pativratā mahābhāgā brahmaṇastvaṁ hṛdi sthitā aharniśaṁ ciṁtayaṁstvāṁ prasādaṁ tebhikāṁkṣati
'हे महाभागा! तुम पतिव्रता हो, ब्रह्मा के हृदय में स्थित हो। वे दिन-रात तुम्हारा चिंतन करते हुए तुम्हारी कृपा चाहते हैं।'
श्लोक 39 (padma.1.34.39)
सखीं चैनां प्रियां पृच्छ लक्ष्मीं भृगुसुतां सतीम्। यदि च श्रद्दधा नासि वाक्यादस्मात्सुलोचने॥
sakhīṁ caināṁ priyāṁ pṛccha lakṣmīṁ bhṛgusutāṁ satīm yadi ca śraddadhā nāsi vākyādasmātsulocane
'अपनी सखी, भृगु-पुत्री साध्वी लक्ष्मी से भी पूछ लो। हे सुलोचना! यदि इस वचन पर तुम्हें विश्वास न हो—'
श्लोक 40 (padma.1.34.40)
एवमुक्त्वा ततः शौरिः सावित्र्याश्चरणद्वयम्। उभाभ्यां चैव हस्ताभ्यां क्षम देवि नमोस्तु ते॥
evamuktvā tataḥ śauriḥ sāvitryāścaraṇadvayam ubhābhyāṁ caiva hastābhyāṁ kṣama devi namostu te
ऐसा कहकर विष्णु ने सावित्री के दोनों चरणों को अपने दोनों हाथों से स्पर्श किया: 'हे देवि! क्षमा करो, तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 41 (padma.1.34.41)
जगद्वंद्ये जगन्मातरिति स्पृष्ट्वाऽभ्यवन्दत। संकोच्य पादौ सा देवी स्वकरेण करौ हरेः॥
jagadvaṁdye jaganmātariti spṛṣṭvā'bhyavandata saṁkocya pādau sā devī svakareṇa karau hareḥ
'हे जगद्वंद्ये, हे जगन्मातः' कहकर उन्होंने स्पर्श कर वंदन किया। उस देवी ने अपने चरणों को संकोचकर हरि के दोनों हाथों को—
श्लोक 42 (padma.1.34.42)
गृहीत्वोवाच तं विष्णुं सर्वं क्षान्तं मयाच्युत। इयं लक्ष्मीः सदा वत्स हृदये ते निवत्स्यति॥
gṛhītvovāca taṁ viṣṇuṁ sarvaṁ kṣāntaṁ mayācyuta iyaṁ lakṣmīḥ sadā vatsa hṛdaye te nivatsyati
—अपने हाथों से पकड़कर विष्णु से कहा: 'हे अच्युत! मैंने सब कुछ क्षमा कर दिया है। यह लक्ष्मी, हे वत्स, सदा तुम्हारे हृदय में निवास करेगी।'
श्लोक 43 (padma.1.34.43)
विना त्वया न चान्यत्र रतिं यास्यति कर्हिचित्। भृगोः पत्न्यां समुत्पन्ना पत्न्येषा तव सुव्रता॥
vinā tvayā na cānyatra ratiṁ yāsyati karhicit bhṛgoḥ patnyāṁ samutpannā patnyeṣā tava suvratā
'तुम्हारे बिना वह कभी अन्यत्र आसक्ति नहीं पाएगी। भृगु की पत्नी से उत्पन्न यह तुम्हारी सुव्रता पत्नी है।'
श्लोक 44 (padma.1.34.44)
देवदानवयत्नेन संभूता चोदधौ पुनः। भगवान्यत्र तत्रैषा अवतारं च कुर्वती॥
devadānavayatnena saṁbhūtā codadhau punaḥ bhagavānyatra tatraiṣā avatāraṁ ca kurvatī
'देवों और दानवों के प्रयास से यह पुनः समुद्र में प्रकट हुई। यह भगवती जहाँ-जहाँ आप अवतार लेते हैं, वहीं-वहीं—'
श्लोक 45 (padma.1.34.45)
देवत्वे देवदेहा वै मानुषत्वे च मानुषी। त्वत्सहाया न संदेहो दांपत्यव्रतिनी चिरम्॥
devatve devadehā vai mānuṣatve ca mānuṣī tvatsahāyā na saṁdeho dāṁpatyavratinī ciram
'—देवत्व में देव-देह वाली और मानुषत्व में मानुषी होकर सदैव तुम्हारी सहचरी बनती है; इसमें संदेह नहीं, वह चिरकाल तक दांपत्य-व्रत में रहने वाली है।'
श्लोक 46 (padma.1.34.46)
यन्मया चात्र कर्त्तव्यं प्रभोतन्मां वदस्व वै। विष्णुरुवाच॥ यज्ञावसानं संजातं प्रेषितोहं तवांतिकं॥
yanmayā cātra karttavyaṁ prabhotanmāṁ vadasva vai viṣṇuruvāca yajñāvasānaṁ saṁjātaṁ preṣitohaṁ tavāṁtikaṁ
'हे प्रभो! अब मुझे यहाँ जो करना है, वह मुझसे कहो।' विष्णु ने कहा — 'यज्ञ की समाप्ति हो चुकी है, मैं तुम्हारे समीप भेजा गया हूँ।'
श्लोक 47 (padma.1.34.47)
सावित्रीमानय क्षिप्रं मया स्नानं समाचरेत्। आगच्छ त्वरिता देवि याहि तत्र मुदान्विता॥
sāvitrīmānaya kṣipraṁ mayā snānaṁ samācaret āgaccha tvaritā devi yāhi tatra mudānvitā
'सावित्री को शीघ्र ले आओ, मैं स्नान का आयोजन करूँ। हे देवी! त्वरित होकर, प्रसन्नचित्त होकर वहाँ आओ।'
श्लोक 48 (padma.1.34.48)
पश्यस्व स्वपतिं गत्वा देवैः सर्वैस्समन्वितम्। लक्ष्मीरुवाच॥ आर्ये उत्तिष्ठ शीघ्रं त्वं याहि यत्र पितामहः॥
paśyasva svapatiṁ gatvā devaiḥ sarvaissamanvitam lakṣmīruvāca ārye uttiṣṭha śīghraṁ tvaṁ yāhi yatra pitāmahaḥ
'जाकर अपने पति को समस्त देवों सहित देखो।' लक्ष्मी ने कहा — 'हे आर्ये! शीघ्र उठो, जहाँ पितामह हैं, वहाँ चलो।'
श्लोक 49 (padma.1.34.49)
विना त्वया न यास्यामि स्पृष्टौ पादौ मया तव। उत्थाप्य साग्रहीद्धस्तं दक्षिणा दक्षिणे करे॥
vinā tvayā na yāsyāmi spṛṣṭau pādau mayā tava utthāpya sāgrahīddhastaṁ dakṣiṇā dakṣiṇe kare
'तुम्हारे बिना मैं नहीं जाऊँगी, तुम्हारे चरण मेरे द्वारा स्पर्श किए गए हैं।' उठाकर उसने दाहिने हाथ को दाहिने हाथ में ग्रहण किया।
श्लोक 50 (padma.1.34.50)
चिरायमाणां सावित्रीं ज्ञात्वा देवः पितामहः। समीपस्थं महादेवमिदमाह तदा वचः॥
cirāyamāṇāṁ sāvitrīṁ jñātvā devaḥ pitāmahaḥ samīpasthaṁ mahādevamidamāha tadā vacaḥ
सावित्री के विलंब करने को जानकर देव पितामह ने समीप खड़े महादेव से यह वचन कहा।
श्लोक 51 (padma.1.34.51)
गच्छ त्वमनया सार्द्धं पार्वत्याऽसुरदूषण। गौरी त्वदग्रतो यातु पश्चात्त्वं गच्छ शंकर॥
gaccha tvamanayā sārddhaṁ pārvatyā'suradūṣaṇa gaurī tvadagrato yātu paścāttvaṁ gaccha śaṁkara
'हे असुर-दूषण! तुम पार्वती सहित जाओ। गौरी तुम्हारे आगे-आगे जाए, तुम पीछे-पीछे जाओ, हे शंकर।'
श्लोक 52 (padma.1.34.52)
प्रतिबोध्यानय यथा शीघ्रमायाति तत्कुरु। एवमुक्तौ तदा तौ तु पार्वतीपरमेश्वरौ॥
pratibodhyānaya yathā śīghramāyāti tatkuru evamuktau tadā tau tu pārvatīparameśvarau
'उसे समझाकर ले आओ, जिससे वह शीघ्र आ जाए, ऐसा करो।' इस प्रकार कहे जाने पर पार्वती-परमेश्वर दोनों—
श्लोक 53 (padma.1.34.53)
गत्वादिष्टौ दंपती तां प्रोचतुर्ब्रह्मणः प्रियाम्। बृहत्कृत्यं त्वया तत्र करणीयं पतिव्रते॥
gatvādiṣṭau daṁpatī tāṁ procaturbrahmaṇaḥ priyām bṛhatkṛtyaṁ tvayā tatra karaṇīyaṁ pativrate
—आज्ञा पाकर वहाँ गए, वह दंपती ब्रह्मा की प्रिया से बोले: 'हे पतिव्रते! वहाँ तुम्हें एक महान् कार्य करना है।'
श्लोक 54 (padma.1.34.54)
पृच्छस्वेमां वरारोहां गौरीं पर्वतनंदिनीम्। लक्ष्मीं चैतां विशालाक्षीमिंद्राणीं वा शुभानने॥
pṛcchasvemāṁ varārohāṁ gaurīṁ parvatanaṁdinīm lakṣmīṁ caitāṁ viśālākṣīmiṁdrāṇīṁ vā śubhānane
'हे शुभानने! इस वरारोहा, पर्वतनंदिनी गौरी से पूछ लो, अथवा इस विशालाक्षी लक्ष्मी से, या इंद्राणी से—'
श्लोक 55 (padma.1.34.55)
यासां वा श्रद्धधासि त्वं पृच्छ देवि नमोस्तु ते। आशीर्वादस्तया दत्तो देवदेवस्य शूलिनः॥
yāsāṁ vā śraddhadhāsi tvaṁ pṛccha devi namostu te āśīrvādastayā datto devadevasya śūlinaḥ
'—जिसमें भी तुम्हें विश्वास हो, हे देवि, उससे पूछो, तुम्हें नमस्कार है।' शूलधारी देवदेव के इस आशीर्वाद ने—
श्लोक 56 (padma.1.34.56)
शरीरार्धे च ते गौरी सदा स्थास्यति शंकर। अनया शोभसे देव त्वया त्रैलोक्यसुंदर॥
śarīrārdhe ca te gaurī sadā sthāsyati śaṁkara anayā śobhase deva tvayā trailokyasuṁdara
'तुम्हारे शरीर के आधे भाग में, हे शंकर, सदा गौरी रहेगी। इससे तुम, हे देव, त्रैलोक्य-सुंदर होकर सुशोभित हो।'
श्लोक 57 (padma.1.34.57)
सुखभागि जगत्सर्वं त्वया नाथेन शत्रुहन्। एवं ब्रुवंती सावित्री गृहीता ब्रह्मणः प्रिया॥
sukhabhāgi jagatsarvaṁ tvayā nāthena śatruhan evaṁ bruvaṁtī sāvitrī gṛhītā brahmaṇaḥ priyā
'हे शत्रुहन्! तुम्हारे नाथ होने से सारा जगत् सुखभागी होता है।' ऐसा कहती हुई सावित्री ब्रह्मा की प्रिया को ग्रहण किया गया—
श्लोक 58 (padma.1.34.58)
गौर्य्या च वामहस्ते तु लक्ष्म्या वै दक्षिणे करे। अभिवंद्य तु तां देवीं शंकरो वाक्यमब्रवीत्॥
gauryyā ca vāmahaste tu lakṣmyā vai dakṣiṇe kare abhivaṁdya tu tāṁ devīṁ śaṁkaro vākyamabravīt
—गौरी के बाएँ हाथ से और लक्ष्मी के दाहिने हाथ से। उस देवी को प्रणाम कर शंकर ने यह वचन कहा।
श्लोक 59 (padma.1.34.59)
एह्यागच्छ महाभागे यत्र तिष्ठति ते पतिः। तत्र गच्छ वरारोहे स्त्रीणां भर्ता परागतिः॥
ehyāgaccha mahābhāge yatra tiṣṭhati te patiḥ tatra gaccha varārohe strīṇāṁ bhartā parāgatiḥ
'आओ, हे महाभागे! जहाँ तुम्हारा पति है वहाँ चलो। हे वरारोहे! वहाँ जाओ; स्त्रियों का पति ही परम गति है।'
श्लोक 60 (padma.1.34.60)
बृहदाग्रहणे देवि प्रणयाद्गंतुमर्हसि। लक्ष्मीश्चैषा पार्वती च स्थिता देवि तवाग्रतः॥
bṛhadāgrahaṇe devi praṇayādgaṁtumarhasi lakṣmīścaiṣā pārvatī ca sthitā devi tavāgrataḥ
'हे देवि! प्रेमपूर्वक आग्रह से जाने योग्य हो। यह लक्ष्मी और यह पार्वती तुम्हारे सामने स्थित हैं।'
श्लोक 61 (padma.1.34.61)
एतयोर्वचसा देवि आवयोश्च शुभानने। मानभंगो न ते कर्तुं यज्यते ब्रह्मणः प्रिये॥
etayorvacasā devi āvayośca śubhānane mānabhaṁgo na te kartuṁ yajyate brahmaṇaḥ priye
'हे शुभानने देवि! इन दोनों तथा हम दोनों के वचन से तुम्हारे मान का भंग करना उचित नहीं, हे ब्रह्मा की प्रिये।'
श्लोक 62 (padma.1.34.62)
अस्मदभ्यर्थिता देवि तत्र याहि मुदान्विता। गौर्युवाच॥ अहं च ते प्रिया देवि सर्वदा वदसि स्वयम्॥
asmadabhyarthitā devi tatra yāhi mudānvitā gauryuvāca ahaṁ ca te priyā devi sarvadā vadasi svayam
'हम सबके अनुरोध पर, हे देवि, प्रसन्नचित्त होकर वहाँ चलो।' गौरी ने कहा — 'मैं तुम्हारी प्रिया हूँ, हे देवि, तुम स्वयं सदा कहती हो—'
श्लोक 63 (padma.1.34.63)
लक्ष्मीश्च ते करे लग्ना दक्षिणे च मया धृता। एह्यागच्छ महाभागे यत्र तिष्ठति ते पतिः॥
lakṣmīśca te kare lagnā dakṣiṇe ca mayā dhṛtā ehyāgaccha mahābhāge yatra tiṣṭhati te patiḥ
'—और लक्ष्मी तुम्हारे हाथ में लगी है, जिसे मैंने दाहिने हाथ से पकड़ रखा है। आओ, हे महाभागे! जहाँ तुम्हारा पति है वहाँ चलो।'
श्लोक 64 (padma.1.34.64)
नीता सा तु तदा ताभ्यां देवी सा मध्यतः कृता। पुरस्सरौ विष्णुरुद्रौ शक्राद्याश्च तथा सुराः॥
nītā sā tu tadā tābhyāṁ devī sā madhyataḥ kṛtā purassarau viṣṇurudrau śakrādyāśca tathā surāḥ
तब उन दोनों द्वारा वह देवी वहाँ ले जाई गई, वे उसे मध्य में करके — विष्णु-रुद्र आगे-आगे, इंद्र आदि देवगण भी—
श्लोक 65 (padma.1.34.65)
गंधर्वाप्सरसश्चैव त्रैलोक्यं सचराचम्। तत्रायाता च सा देवी सावित्री ब्रह्मणः प्रिया॥
gaṁdharvāpsarasaścaiva trailokyaṁ sacarācam tatrāyātā ca sā devī sāvitrī brahmaṇaḥ priyā
—गंधर्व-अप्सराएँ तथा चराचरसहित त्रैलोक्य साथ चला। वहाँ ब्रह्मा की प्रिया वह देवी सावित्री आईं।
श्लोक 66 (padma.1.34.66)
सावित्रीं सुमुखीं दृष्ट्वा सर्वलोकपितामहः। गायत्र्या सहितो ब्रह्मा इदं वचनमब्रवीत्॥
sāvitrīṁ sumukhīṁ dṛṣṭvā sarvalokapitāmahaḥ gāyatryā sahito brahmā idaṁ vacanamabravīt
सुमुखी सावित्री को देखकर समस्त लोकों के पितामह गायत्री सहित ब्रह्मा ने यह वचन कहा।
श्लोक 67 (padma.1.34.67)
एषा देवी कर्मकरी अहं ते वशगस्थितः। समादिश वरारोहे यत्ते कार्यं मया त्विह॥
eṣā devī karmakarī ahaṁ te vaśagasthitaḥ samādiśa varārohe yatte kāryaṁ mayā tviha
'यह देवी कर्मकर्त्री (सेविका) है, मैं तुम्हारे वश में स्थित हूँ। हे वरारोहे! जो भी कार्य तुम्हारा हो, मुझे यहाँ आज्ञा दो।'
श्लोक 68 (padma.1.34.68)
एवमुक्ता च सा देवी स्वयं देवेन ब्रह्मणा। त्रपयाधोमुखी देवी न च किंचिदवोचत॥
evamuktā ca sā devī svayaṁ devena brahmaṇā trapayādhomukhī devī na ca kiṁcidavocata
स्वयं ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह देवी (गायत्री) लज्जा से मुख नीचा किए कुछ नहीं बोलीं।
श्लोक 69 (padma.1.34.69)
पादयोः पतिता देवी गायत्री ब्रह्मचोदिता। कृतवत्यपराधं ते क्षम देवि नमोस्तु ते॥
pādayoḥ patitā devī gāyatrī brahmacoditā kṛtavatyaparādhaṁ te kṣama devi namostu te
ब्रह्मा द्वारा प्रेरित गायत्री देवी उनके चरणों में गिर पड़ीं: 'तुमने अपराध किया है, हे देवि! तुम्हें क्षमा है, तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 70 (padma.1.34.70)
आलिंग्य सादरं कंठे सा परिष्वज्य पीडितां। गायत्रीं सांत्वयामास मान्यश्चैष पतिर्मम॥
āliṁgya sādaraṁ kaṁṭhe sā pariṣvajya pīḍitāṁ gāyatrīṁ sāṁtvayāmāsa mānyaścaiṣa patirmama
आदरपूर्वक गले लगाकर उस पीड़ित गायत्री को आलिंगन कर सावित्री ने उसे सांत्वना दी: 'यह मेरा पति भी माननीय है।'
श्लोक 71 (padma.1.34.71)
कर्त्तव्यं वचनं तस्य स्त्रीणां प्राणेश्वरः पतिः। उक्तं भगवता पूर्वं सृष्टिकाले विरिंचिना॥
karttavyaṁ vacanaṁ tasya strīṇāṁ prāṇeśvaraḥ patiḥ uktaṁ bhagavatā pūrvaṁ sṛṣṭikāle viriṁcinā
'पति ही स्त्रियों का प्राणेश्वर है, उसकी बात माननी चाहिए। यह पूर्वकाल में भगवान् विरिंचि ने सृष्टिकाल में ही कहा था।'
श्लोक 72 (padma.1.34.72)
न च स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम्। भर्ता यद्वदते वाक्यं तत्तु कुर्यादकुत्सया॥
na ca strīṇāṁ pṛthagyajño na vrataṁ nāpyupoṣaṇam bhartā yadvadate vākyaṁ tattu kuryādakutsayā
'स्त्रियों के लिए न पृथक् यज्ञ है, न व्रत, न उपवास। पति जो वचन कहे, उसे निंदा किए बिना करना चाहिए।'
श्लोक 73 (padma.1.34.73)
भर्तृनिंदां या कुरुते स्वसृनिंदां तथैव च। परिवादं प्रलापं वा नरकं सा तु गच्छति॥
bhartṛniṁdāṁ yā kurute svasṛniṁdāṁ tathaiva ca parivādaṁ pralāpaṁ vā narakaṁ sā tu gacchati
'जो पति की निंदा करती है, या अपनी ननद की निंदा करती है, या परनिंदा या प्रलाप करती है, वह नरक को जाती है।'
श्लोक 74 (padma.1.34.74)
पत्यौ जीवति या नारी उपवासव्रतं चरेत्। आयुष्यं हरते भर्तुर्मृता नरकमिच्छति॥
patyau jīvati yā nārī upavāsavrataṁ caret āyuṣyaṁ harate bharturmṛtā narakamicchati
'जो स्त्री पति के जीवित रहते उपवास-व्रत करती है, वह पति की आयु हर लेती है, और मरकर नरक चाहती है।'
श्लोक 75 (padma.1.34.75)
एवं ज्ञात्वा त्वया भर्तुर्न कार्यं विप्रियं सति। न चास्य दक्षिणं त्वंगं त्वया सेव्यं कथंचन॥
evaṁ jñātvā tvayā bharturna kāryaṁ vipriyaṁ sati na cāsya dakṣiṇaṁ tvaṁgaṁ tvayā sevyaṁ kathaṁcana
'यह जानकर, हे सती! तुम्हें कभी पति के प्रतिकूल कार्य नहीं करना चाहिए। और उसके दाहिने अंग की सेवा तुम्हें किसी भी प्रकार नहीं करनी चाहिए।'
श्लोक 76 (padma.1.34.76)
सर्वकार्ये त्वहं चास्य दक्षिणं पक्षमाश्रिता। सव्यं त्वमायेस्साध्वि पार्श्वे नारदपुष्करौ॥
sarvakārye tvahaṁ cāsya dakṣiṇaṁ pakṣamāśritā savyaṁ tvamāyessādhvi pārśve nāradapuṣkarau
'सभी कार्यों में मैं ही उसके दाहिने पक्ष में स्थित रहूँगी। तुम, हे साध्वी, बाईं ओर आना, जहाँ नारद और पुष्कर हैं।'
श्लोक 77 (padma.1.34.77)
ब्रह्मस्थानानि चान्यानि स्थितान्यायतनानि च। लभे वै शोभमानेह यावत्सृष्टिः प्रजायते॥
brahmasthānāni cānyāni sthitānyāyatanāni ca labhe vai śobhamāneha yāvatsṛṣṭiḥ prajāyate
'ब्रह्मा के अन्य स्थान तथा अन्य निवास-स्थल — इन्हें मैं शोभायमान होकर तब तक प्राप्त करती रहूँगी जब तक सृष्टि रहेगी।'
श्लोक 78 (padma.1.34.78)
भवत्या च मया चैव स्थातव्यं च न संशयः। पुष्करे ब्रह्मणः पार्श्वे वामं च त्वं समाश्रय॥
bhavatyā ca mayā caiva sthātavyaṁ ca na saṁśayaḥ puṣkare brahmaṇaḥ pārśve vāmaṁ ca tvaṁ samāśraya
'तुम्हें और मुझे दोनों को रहना है, इसमें संदेह नहीं। पुष्कर में ब्रह्मा के समीप बाईं ओर तुम आश्रय लो।'
श्लोक 79 (padma.1.34.79)
अनेन चोपदेशेन सुखं तिष्ठ मयान्विता। गायत्र्युवाच॥ एवमेतत्करिष्यामि तव निर्देशकारिका॥
anena copadeśena sukhaṁ tiṣṭha mayānvitā gāyatryuvāca evametatkariṣyāmi tava nirdeśakārikā
'इस उपदेश के अनुसार सुखपूर्वक मेरे साथ रहो।' गायत्री ने कहा — 'ऐसा ही मैं करूँगी, मैं तुम्हारे निर्देश का पालन करूँगी।'
श्लोक 80 (padma.1.34.80)
तवैवाज्ञा मया कार्या त्वं मे प्राणसमा सखी। अहं ते त्वनुजा देवि सदा मां पातुमर्हसि॥
tavaivājñā mayā kāryā tvaṁ me prāṇasamā sakhī ahaṁ te tvanujā devi sadā māṁ pātumarhasi
'तुम्हारी ही आज्ञा मुझे माननी है, तुम मेरी प्राणसमान सखी हो। हे देवि! मैं तुम्हारी छोटी बहन हूँ, तुम्हें सदा मेरी रक्षा करनी चाहिए।'
श्लोक 81 (padma.1.34.81)
देवदेवस्तदा ब्रह्मा पुष्करे विष्णुना सह। स्नानावसाने देवानां सर्वेषां प्रददौ वरान्॥
devadevastadā brahmā puṣkare viṣṇunā saha snānāvasāne devānāṁ sarveṣāṁ pradadau varān
तब देवदेव ब्रह्मा ने विष्णु सहित पुष्कर में स्नान की समाप्ति पर समस्त देवों को वरदान दिए।
श्लोक 82 (padma.1.34.82)
देवानां च पतिं शक्रं ज्योतिषां च दिवाकरं। नक्षत्राणां तथा सोमं रसानां वरुणं तथा॥
devānāṁ ca patiṁ śakraṁ jyotiṣāṁ ca divākaraṁ nakṣatrāṇāṁ tathā somaṁ rasānāṁ varuṇaṁ tathā
देवों के स्वामी इंद्र को, ज्योतियों में सूर्य को, नक्षत्रों में चंद्रमा को, रसों में वरुण को—
श्लोक 83 (padma.1.34.83)
प्रजापतीनां दक्षं च नदीनां चैव सागरं। कुबेरं च धनाध्यक्षं तथा चक्रे च रक्षसां॥
prajāpatīnāṁ dakṣaṁ ca nadīnāṁ caiva sāgaraṁ kuberaṁ ca dhanādhyakṣaṁ tathā cakre ca rakṣasāṁ
—प्रजापतियों में दक्ष को, नदियों में सागर को, धन के अधीश कुबेर को तथा राक्षसों के चक्र को—
श्लोक 84 (padma.1.34.84)
भूतानां चैव सर्वेषां गणानां च पिनाकिनम्। मानवानां मनुं चैव पक्षिणां गरुडं तथा॥
bhūtānāṁ caiva sarveṣāṁ gaṇānāṁ ca pinākinam mānavānāṁ manuṁ caiva pakṣiṇāṁ garuḍaṁ tathā
—समस्त भूतों में पिनाकधारी को, गणों में भी उन्हें, मनुष्यों में मनु को, पक्षियों में गरुड़ को—
श्लोक 85 (padma.1.34.85)
ऋषीणां च वसिष्ठं च ग्रहाणां च प्रभाकरं। एवमादीनि वै दत्वा देवदेवः पितामहः॥
ṛṣīṇāṁ ca vasiṣṭhaṁ ca grahāṇāṁ ca prabhākaraṁ evamādīni vai datvā devadevaḥ pitāmahaḥ
—ऋषियों में वसिष्ठ को, ग्रहों में प्रभाकर (सूर्य) को — इस प्रकार इन्हें दान देकर देवदेव पितामह ने—
श्लोक 86 (padma.1.34.86)
विष्णुं च शंकरं चैव ब्रह्मा प्रोवाच सादरम्। पृथिव्याः सर्वतीर्थेषु भवंतौ पूज्यसत्तमौ॥
viṣṇuṁ ca śaṁkaraṁ caiva brahmā provāca sādaram pṛthivyāḥ sarvatīrtheṣu bhavaṁtau pūjyasattamau
—विष्णु और शंकर से आदरपूर्वक कहा: 'पृथ्वी के समस्त तीर्थों में तुम दोनों पूजनीयों में श्रेष्ठ हो।'
श्लोक 87 (padma.1.34.87)
भवद्भ्यां न विना तीर्थं पुण्यतामेति कर्हिचित्। लिंगं वा प्रतिमा वापि दृश्यते यत्रकुत्रचित्॥
bhavadbhyāṁ na vinā tīrthaṁ puṇyatāmeti karhicit liṁgaṁ vā pratimā vāpi dṛśyate yatrakutracit
'तुम दोनों के बिना कोई भी तीर्थ कभी पवित्रता को प्राप्त नहीं होता। जहाँ कहीं भी लिंग या प्रतिमा दिखाई देती है—'
श्लोक 88 (padma.1.34.88)
तत्तीर्थं पुण्यतां याति सर्वमेव फलप्रदं। मानवा ह्युपहारैश्च ये करिष्यंति पूजनं॥
tattīrthaṁ puṇyatāṁ yāti sarvameva phalapradaṁ mānavā hyupahāraiśca ye kariṣyaṁti pūjanaṁ
'—वह तीर्थ पवित्रता को प्राप्त होता है, सभी फल देने वाला बनता है। जो मनुष्य उपहारों द्वारा तुम्हारी पूजा करेंगे—'
श्लोक 89 (padma.1.34.89)
युष्माकं मां पुरस्कृत्य तेषां रोगभयं कुतः। येषु राष्ट्रेषु युष्माकमुत्सवाः पूजनादिकाः॥
yuṣmākaṁ māṁ puraskṛtya teṣāṁ rogabhayaṁ kutaḥ yeṣu rāṣṭreṣu yuṣmākamutsavāḥ pūjanādikāḥ
'—मुझे आगे रखकर, उन्हें रोग का भय कहाँ से होगा? जिन राष्ट्रों में तुम्हारे उत्सव और पूजा आदि—'
श्लोक 90 (padma.1.34.90)
प्रवर्त्स्यंति क्रियाः सर्वा यत्फलं तेषु तच्छृणु। नाधयो व्याधयश्चैव नोपसर्गा न क्षुद्भयं॥
pravartsyaṁti kriyāḥ sarvā yatphalaṁ teṣu tacchṛṇu nādhayo vyādhayaścaiva nopasargā na kṣudbhayaṁ
'—सभी क्रियाएँ चलती रहेंगी, उनका जो फल होगा वह सुनो: न मानसिक व्याधि, न शारीरिक व्याधि, न उपद्रव, न भूख का भय—'
श्लोक 91 (padma.1.34.91)
विप्रयोगो न चापीष्टैरनिष्टैर्नापि संगतिः। नाक्षिरोगः शिरार्तिर्वा पित्तशूल भगंदराः॥
viprayogo na cāpīṣṭairaniṣṭairnāpi saṁgatiḥ nākṣirogaḥ śirārtirvā pittaśūla bhagaṁdarāḥ
'—न प्रियजनों से वियोग, न अप्रियों से संगति। न नेत्ररोग, न सिरदर्द, न पित्तशूल, न भगंदर—'
श्लोक 92 (padma.1.34.92)
नाभिचारं भयं तत्रापस्मारो न विषूचिका। वृद्धिर्निकामतस्तस्मिन्सम्यग्बुद्धिरनुत्तमा॥
nābhicāraṁ bhayaṁ tatrāpasmāro na viṣūcikā vṛddhirnikāmatastasminsamyagbuddhiranuttamā
'—न अभिचार-भय, न मिर्गी, न हैजा। वहाँ इच्छानुसार वृद्धि होगी, तथा उत्तम सम्यक् बुद्धि होगी।'
श्लोक 93 (padma.1.34.93)
आरोग्यं सर्वतश्चैव दीर्घायुश्च प्रजाधनं। नाकाले भविता मृत्युर्गावो नाल्पपयोमुचः॥
ārogyaṁ sarvataścaiva dīrghāyuśca prajādhanaṁ nākāle bhavitā mṛtyurgāvo nālpapayomucaḥ
'सर्वत्र आरोग्य होगा, दीर्घायु और प्रजा-धन होगा। असमय मृत्यु नहीं होगी, गौएँ कम दूध देने वाली नहीं होंगी—'
श्लोक 94 (padma.1.34.94)
नाकालफलिता वृक्षा नोत्पातभयमण्वपि। एतच्छ्रुत्वा ततो विष्णुर्ब्रह्माणं स्तोतुमुद्यतः॥
nākālaphalitā vṛkṣā notpātabhayamaṇvapi etacchrutvā tato viṣṇurbrahmāṇaṁ stotumudyataḥ
'—वृक्ष असमय फल देने वाले नहीं होंगे, न रत्तीभर भी उत्पात का भय होगा।' यह सुनकर विष्णु ब्रह्मा की स्तुति करने को उद्यत हुए।
श्लोक 95 (padma.1.34.95)
विष्णुरुवाच॥ नमोस्त्वनंताय विशुद्धचेतसे स्वरूपरूपाय सहस्रबाहवे। सहस्ररश्मिप्रभवाय वेधसे विशालदेहाय विशुद्धकर्मणे॥
viṣṇuruvāca namostvanaṁtāya viśuddhacetase svarūparūpāya sahasrabāhave sahasraraśmiprabhavāya vedhase viśāladehāya viśuddhakarmaṇe
विष्णु ने कहा — अनंत, विशुद्ध चित्त वाले, स्वरूप ही जिनका रूप है, सहस्रबाहु, सहस्र किरणों के उत्पत्ति-स्थान, विधाता, विशाल देह वाले, विशुद्ध कर्म वाले — तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 96 (padma.1.34.96)
समस्तविश्वार्तिहराय शंभवे समस्तसूर्यानलतिग्मतेजसे। नमोस्तु विद्यावितताय चक्रिणे समस्तधीस्थानकृते सदा नमः॥
samastaviśvārtiharāya śaṁbhave samastasūryānalatigmatejase namostu vidyāvitatāya cakriṇe samastadhīsthānakṛte sadā namaḥ
समस्त विश्व की पीड़ा हरने वाले, शंभु, समस्त सूर्यों और अग्नियों के समान तीव्र तेज वाले — विद्या में व्याप्त, चक्रधारी को नमस्कार हो; समस्त बुद्धि के स्थान बनाने वाले को सदा नमस्कार।
श्लोक 97 (padma.1.34.97)
अनादिदेवाच्युत शेखरप्रभो भाव्युद्भवद्भूतपते महेश्वर। महत्पते सर्वपते जगत्पते भुवस्पते भुवनपते सदा नमः॥
anādidevācyuta śekharaprabho bhāvyudbhavadbhūtapate maheśvara mahatpate sarvapate jagatpate bhuvaspate bhuvanapate sadā namaḥ
हे अनादि देव, अच्युत, शिखर-तेज, प्रभो, भविष्य-वर्तमान-भूत के स्वामी, महेश्वर — हे महत्पते, सर्वपते, जगत्पते, भुवस्पते, भुवनपते — सदा नमस्कार।
श्लोक 98 (padma.1.34.98)
यज्ञेश नारायण जिष्णु शंकर क्षितीश विश्वेश्वर विश्वलोचन। शशांकसूर्याच्युतवीरविश्वप्रवृत्तमूर्तेमृतमूर्त अव्यय॥
yajñeśa nārāyaṇa jiṣṇu śaṁkara kṣitīśa viśveśvara viśvalocana śaśāṁkasūryācyutavīraviśvapravṛttamūrtemṛtamūrta avyaya
हे यज्ञेश, नारायण, जिष्णु, शंकर, क्षितीश, विश्वेश्वर, विश्वलोचन; चंद्र-सूर्य-अच्युत-वीर, समस्त गति के प्रवर्तक स्वरूप, अमृतमूर्ति, अव्यय—
श्लोक 99 (padma.1.34.99)
ज्वलद्धुताशार्चि निरुद्धमंडल प्रदेशनारायण विश्वतोमुख। समस्तदेवार्तिहरामृताव्यय प्रपाहि मां शरणगतं तथा विभो॥
jvaladdhutāśārci niruddhamaṁḍala pradeśanārāyaṇa viśvatomukha samastadevārtiharāmṛtāvyaya prapāhi māṁ śaraṇagataṁ tathā vibho
ज्वलित अग्निशिखा वाले, अवरुद्ध मंडल-प्रदेश वाले नारायण, विश्वतोमुख — समस्त देवों की पीड़ा हरने वाले, अमृत, अव्यय; हे विभो! शरणागत मुझे बचाइए।
श्लोक 100 (padma.1.34.100)
वक्त्राण्यनेकानि विभो तवाहं पश्यामि यज्ञस्य गतिं पुराणम्। ब्रह्माणमीशं जगतां प्रसूतिं नमोस्तु तुभ्यं प्रपितामहाय॥
vaktrāṇyanekāni vibho tavāhaṁ paśyāmi yajñasya gatiṁ purāṇam brahmāṇamīśaṁ jagatāṁ prasūtiṁ namostu tubhyaṁ prapitāmahāya
हे विभो! मैं आपके अनेक मुखों को देखता हूँ, यज्ञ की पुरातन गति को देखता हूँ। ब्रह्मा, ईश, जगतों के उत्पत्तिकर्ता — हे प्रपितामह, आपको नमस्कार हो।
श्लोक 101 (padma.1.34.101)
संसारचक्रक्रमणैरनेकैः क्वचिद्भवान्देववराधिदेवः। तत्सर्वविज्ञानविशुद्धसत्वैरुपास्यसे किं प्रणमाम्यहं त्वाम्॥
saṁsāracakrakramaṇairanekaiḥ kvacidbhavāndevavarādhidevaḥ tatsarvavijñānaviśuddhasatvairupāsyase kiṁ praṇamāmyahaṁ tvām
संसार-चक्र के अनेक भ्रमणों में, हे देवश्रेष्ठ अधिदेव, आप कहीं-कहीं समस्त विज्ञान से विशुद्ध सत्त्व वालों द्वारा उपासित होते हैं — मैं आपको कैसे नमन करूँ?
श्लोक 102 (padma.1.34.102)
एवं भवंतं प्रकृतेः पुरस्ताद्यो वेत्त्यसौ सर्वविदां वरिष्ठः। गुणान्वितेषु प्रसभं विवेद्यो विशालमूर्तिस्त्विह सूक्ष्मरूपः॥
evaṁ bhavaṁtaṁ prakṛteḥ purastādyo vettyasau sarvavidāṁ variṣṭhaḥ guṇānviteṣu prasabhaṁ vivedyo viśālamūrtistviha sūkṣmarūpaḥ
इस प्रकार जो प्रकृति से पूर्व आपको जानता है, वही समस्त ज्ञानियों में श्रेष्ठ है; गुणयुक्त प्राणियों में बलपूर्वक जानने योग्य, आप यहाँ विशाल-रूप होते हुए भी सूक्ष्म-रूप हैं।
श्लोक 103 (padma.1.34.103)
वाक्पाणिपादैर्विगतेन्द्रियोपि कथं भवान्वै सुगतिस्सुकर्मा। संसारबंधे निहितेंद्रियोपि पुनः कथं देववरोसि वेद्यः॥
vākpāṇipādairvigatendriyopi kathaṁ bhavānvai sugatissukarmā saṁsārabaṁdhe nihiteṁdriyopi punaḥ kathaṁ devavarosi vedyaḥ
वाणी, हाथ और पैरों से रहित, इंद्रियों से परे होते हुए भी आप कैसे सुगति और सुकर्मी हैं? संसार-बंधन में इंद्रियाँ स्थापित होते हुए भी आप श्रेष्ठ देव के रूप में कैसे जानने योग्य हैं?
श्लोक 104 (padma.1.34.104)
मूर्त्तादमूर्त्तं न तु लभ्यते परं परं वपुर्देवविशुद्धभावैः। संसारविच्छित्तिकरैर्यजद्भिरतोवसीयेत चतुर्मुख त्वम्॥
mūrttādamūrttaṁ na tu labhyate paraṁ paraṁ vapurdevaviśuddhabhāvaiḥ saṁsāravicchittikarairyajadbhiratovasīyeta caturmukha tvam
मूर्त रूप से अमूर्त परम रूप देवताओं के विशुद्ध भावों से भी प्राप्त नहीं होता; संसार को काट देने वाले यजन करने वालों द्वारा ही, हे चतुर्मुख, आप निश्चित होते हैं।
श्लोक 105 (padma.1.34.105)
परं न जानंति यतो वपुस्ते देवादयोप्यद्भुतरूपधारिन्। विभोवतारेग्रतरं पुराणमाराधयेद्यत्कमलासनस्थम्॥
paraṁ na jānaṁti yato vapuste devādayopyadbhutarūpadhārin vibhovatāregrataraṁ purāṇamārādhayedyatkamalāsanastham
जब से देव आदि भी आपके परम स्वरूप को नहीं जानते, अद्भुत रूपधारी हे विभो, आपके अवतार में — कमलासन पर स्थित आपकी वह अत्यंत प्राचीन आराधना ही करनी चाहिए।
श्लोक 106 (padma.1.34.106)
न ते तत्त्वं विश्वसृजोपि योनिमेकांततो वेत्ति विशुद्धभावः। परं त्वहं वेद्मि कथं पुराणं भवंतमाद्यं तपसा विशुद्धम्॥
na te tattvaṁ viśvasṛjopi yonimekāṁtato vetti viśuddhabhāvaḥ paraṁ tvahaṁ vedmi kathaṁ purāṇaṁ bhavaṁtamādyaṁ tapasā viśuddham
विश्व के स्रष्टा होते हुए भी आपकी योनि को कोई एकांततः विशुद्ध-भाव से नहीं जानता; परंतु मैं तपस्या से विशुद्ध, आद्य, पुरातन आपको कैसे जानूँ?
श्लोक 107 (padma.1.34.107)
पद्मासनो वै जनकः प्रसिद्ध एवं प्रसिद्धिर्ह्यसकृत्पुराणात्। संचिंत्य ते नाथ विभुं भवंतं जानाति नैवं तपसाविहीनः॥
padmāsano vai janakaḥ prasiddha evaṁ prasiddhirhyasakṛtpurāṇāt saṁciṁtya te nātha vibhuṁ bhavaṁtaṁ jānāti naivaṁ tapasāvihīnaḥ
पद्मासन पर विराजमान जनक (आप) ही प्रसिद्ध हैं; इसी प्रकार यह प्रसिद्धि बार-बार पुराणों से प्राप्त होती है। हे नाथ! विभु आपका ऐसा चिंतन कर, तपोहीन व्यक्ति कभी नहीं जान सकता।
श्लोक 108 (padma.1.34.108)
अस्मादृशैश्च प्रवरैर्विबोध्यं त्वां देवमूर्खाः स्वमतिं विभज्य। प्रबोद्धुमिच्छन्ति न तेषु बुद्धिरुदारकीर्तिष्वपि वेदहीनाः॥
asmādṛśaiśca pravarairvibodhyaṁ tvāṁ devamūrkhāḥ svamatiṁ vibhajya praboddhumicchanti na teṣu buddhirudārakīrtiṣvapi vedahīnāḥ
हमारे जैसे श्रेष्ठजनों द्वारा ही आप, हे देव, जानने योग्य हैं; मूर्ख लोग अपनी बुद्धि के अनुसार बाँटकर आपको जानना चाहते हैं, परंतु वेदहीन लोगों में, चाहे उदार कीर्ति वाले भी हों, वह बुद्धि नहीं होती।
श्लोक 109 (padma.1.34.109)
जन्मांतरैर्वेद विवेकबुद्धिभिर्भवेद्यथा वा यदि वा प्रकाशः। तल्लाभलुब्धस्य न मानुषत्वं न देवगंधर्वपतिः शिवः स्यात्॥
janmāṁtarairveda vivekabuddhibhirbhavedyathā vā yadi vā prakāśaḥ tallābhalubdhasya na mānuṣatvaṁ na devagaṁdharvapatiḥ śivaḥ syāt
अनेक जन्मों में वेद-विवेक-बुद्धि से जैसे भी प्रकाश हो, उसकी प्राप्ति के लोभी को न मनुष्यत्व मिलता है, न देव-गंधर्वपति शिव ही प्राप्त होते हैं।
श्लोक 110 (padma.1.34.110)
न विष्णुरूपो भगवान्सुसूक्ष्मः स्थूलोसि देवः कृतकृत्यतायाः। स्थूलोपि सूक्ष्मः सुलभोसि देव त्वद्बाह्यकृत्या नरकेपतंति॥
na viṣṇurūpo bhagavānsusūkṣmaḥ sthūlosi devaḥ kṛtakṛtyatāyāḥ sthūlopi sūkṣmaḥ sulabhosi deva tvadbāhyakṛtyā narakepataṁti
भगवान् विष्णु-रूप अत्यंत सूक्ष्म नहीं हैं; आप स्थूल भी हैं, हे देव, कृतकृत्यता के लिए। स्थूल होते हुए भी सूक्ष्म आप, हे देव, सुलभ हैं; परंतु आपके प्रति बाह्य आचरण करने वाले नरक में गिरते हैं।
श्लोक 111 (padma.1.34.111)
विमुच्यते वा भवति स्थितेस्मिन्दस्रेन्दुवह्न्यर्कमरुन्महीभिः। तत्वैः स्वरूपैः समरूपधारिभिरात्मस्वरूपे वितत स्वभावः॥
vimucyate vā bhavati sthitesmindasrenduvahnyarkamarunmahībhiḥ tatvaiḥ svarūpaiḥ samarūpadhāribhirātmasvarūpe vitata svabhāvaḥ
इस दस-इंद्रिय, चंद्र-अग्नि-सूर्य-वायु-पृथ्वी रूपी तत्त्वों में, अपने ही स्वरूप को धारण करने वाले, आत्म-स्वरूप में विस्तृत स्वभाव द्वारा ही मुक्ति होती है, या (बंधन में) स्थिति होती है।
श्लोक 112 (padma.1.34.112)
इति स्तुतिं मे भगवन्ह्यनंत जुषस्व भक्तस्य विशेषतश्च। समाधियुक्तस्य विशुद्धचेतसस्त्वद्भावभावैकमनोनुगस्य॥
iti stutiṁ me bhagavanhyanaṁta juṣasva bhaktasya viśeṣataśca samādhiyuktasya viśuddhacetasastvadbhāvabhāvaikamanonugasya
हे अनंत भगवन्! मेरी इस स्तुति को स्वीकार कीजिए — विशेष रूप से समाधियुक्त, विशुद्धचित्त, आपके भाव में ही तल्लीन मन वाले भक्त की।
श्लोक 113 (padma.1.34.113)
सदा हृदिस्थो भगवन्नमस्ते नमामि नित्यं भगवन्पुराण। इति प्रकाशं तव मे तदीशस्तवं मया सर्वगतिप्रबुद्ध॥
sadā hṛdistho bhagavannamaste namāmi nityaṁ bhagavanpurāṇa iti prakāśaṁ tava me tadīśastavaṁ mayā sarvagatiprabuddha
हे भगवन्! आप सदा हृदय में स्थित हैं, आपको नमस्कार है; हे भगवन्, हे पुरातन! मैं नित्य आपको नमन करता हूँ। इस प्रकार आपका यह प्रकाश मुझे प्राप्त हुआ — हे ईश! मैं आपकी सर्वगति से प्रबुद्ध हुआ।
श्लोक 114 (padma.1.34.114)
संसारचक्रे भ्रमणादियुक्ता भीतिं पुनर्नः प्रतिपालयस्व॥
saṁsāracakre bhramaṇādiyuktā bhītiṁ punarnaḥ pratipālayasva
संसार-चक्र में घूमते-घूमते जो भय हमें बार-बार घेरता है, हे प्रभो, उससे हमारी रक्षा कीजिए।
श्लोक 115 (padma.1.34.115)
ब्रह्मोवाच॥ सर्वज्ञस्त्वं न संदेहो प्रज्ञाराशिश्च केशव। देवानां प्रथमः पूज्यः सर्वदा त्वं भविष्यसि॥
brahmovāca sarvajñastvaṁ na saṁdeho prajñārāśiśca keśava devānāṁ prathamaḥ pūjyaḥ sarvadā tvaṁ bhaviṣyasi
ब्रह्मा ने कहा — हे केशव! तुम सर्वज्ञ हो, इसमें संदेह नहीं, तुम बुद्धि की राशि हो। तुम देवताओं में प्रथम पूज्य सदा बने रहोगे।
श्लोक 116 (padma.1.34.116)
नारायणादनंतरं रुद्रो भक्त्या विरिंचनम्। तुष्टाव प्रणतो भूत्वा ब्रह्माणं कमलोद्भवम्॥
nārāyaṇādanaṁtaraṁ rudro bhaktyā viriṁcanam tuṣṭāva praṇato bhūtvā brahmāṇaṁ kamalodbhavam
नारायण के पश्चात् रुद्र ने भक्तिपूर्वक विरिंचि की, कमलोद्भव ब्रह्मा की, प्रणत होकर स्तुति की।
श्लोक 117 (padma.1.34.117)
नमः कमलपत्राक्ष नमस्ते पद्मजन्मने। नमः सुरासुरगुरो कारिणे परमात्मने॥
namaḥ kamalapatrākṣa namaste padmajanmane namaḥ surāsuraguro kāriṇe paramātmane
हे कमलपत्राक्ष! नमस्कार। हे पद्मजन्मा! तुम्हें नमस्कार। हे सुर-असुरों के गुरु, सृष्टिकर्ता, परमात्मा! नमस्कार।
श्लोक 118 (padma.1.34.118)
नमस्ते सर्वदेवेश नमो वै मोहनाशन। विष्णोर्नाभिस्थितवते कमलासन जन्मने॥
namaste sarvadeveśa namo vai mohanāśana viṣṇornābhisthitavate kamalāsana janmane
हे सर्वदेवेश! तुम्हें नमस्कार। हे मोहनाशन! नमस्कार। विष्णु की नाभि में स्थित, कमलासन में जन्मे — नमस्कार।
श्लोक 119 (padma.1.34.119)
नमो विद्रुमरक्तांग पाणिपल्लवशोभिने। शरणं त्वां प्रपन्नोस्मि त्राहि मां भवसंसृतेः॥
namo vidrumaraktāṁga pāṇipallavaśobhine śaraṇaṁ tvāṁ prapannosmi trāhi māṁ bhavasaṁsṛteḥ
हे मूँगे के समान लाल अंगों वाले, पल्लव-सी शोभा वाले हाथों वाले! नमस्कार। मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ; संसार-चक्र से मुझे बचाओ।
श्लोक 120 (padma.1.34.120)
पूर्वं नीलांबुदाकारं कुड्मलं ते पितामह। दृष्ट्वा रक्तमुखं भूयः पत्रकेसरसंयुतम्॥
pūrvaṁ nīlāṁbudākāraṁ kuḍmalaṁ te pitāmaha dṛṣṭvā raktamukhaṁ bhūyaḥ patrakesarasaṁyutam
हे पितामह! पहले नीले मेघ के समान कली को देखकर, फिर लाल मुख वाले, पंखुड़ी और केसर से युक्त—
श्लोक 121 (padma.1.34.121)
पद्मं चानेकपत्रान्तमसंख्यातं निरंजनम्। तत्र स्थितेन त्वयैषा सृष्टिश्चैव प्रवर्तिता॥
padmaṁ cānekapatrāntamasaṁkhyātaṁ niraṁjanam tatra sthitena tvayaiṣā sṛṣṭiścaiva pravartitā
—अनगिनत पंखुड़ियों वाले, निर्मल कमल को देखा; उसी में स्थित तुमने ही इस सृष्टि को प्रवर्तित किया।
श्लोक 122 (padma.1.34.122)
त्वां मुक्त्वा नान्यतस्त्राणं जगद्वंद्य नमोस्तु ते। सावित्रीशापदग्धोहं लिंगं मे पतितं क्षितौ॥
tvāṁ muktvā nānyatastrāṇaṁ jagadvaṁdya namostu te sāvitrīśāpadagdhohaṁ liṁgaṁ me patitaṁ kṣitau
तुम्हें छोड़कर अन्य कोई रक्षा नहीं, हे जगत्पूज्य! तुम्हें नमस्कार। सावित्री के शाप से दग्ध होकर मेरा लिंग पृथ्वी पर गिर पड़ा था।
श्लोक 123 (padma.1.34.123)
इदानीं कुरु मे शांतिं त्राहि मां सह भार्यया। ब्रह्मा वै पातु मे पादौ जंघे वै कमलासनः॥
idānīṁ kuru me śāṁtiṁ trāhi māṁ saha bhāryayā brahmā vai pātu me pādau jaṁghe vai kamalāsanaḥ
अब मेरी शांति करो, मुझे मेरी पत्नी सहित बचाओ। कमलासन ब्रह्मा मेरे दोनों चरणों तथा जंघाओं की रक्षा करें।
श्लोक 124 (padma.1.34.124)
विरिंचो मे कटिं पातु सृष्टिकृद्गुह्यमेव च। नाभिं पद्मनिभः पातु जठरं चतुराननः॥
viriṁco me kaṭiṁ pātu sṛṣṭikṛdguhyameva ca nābhiṁ padmanibhaḥ pātu jaṭharaṁ caturānanaḥ
विरिंचि मेरी कमर की, सृष्टिकर्ता मेरी गुह्य-स्थली की रक्षा करें। कमल-सम ब्रह्मा मेरी नाभि की, चतुरानन मेरे उदर की रक्षा करें।
श्लोक 125 (padma.1.34.125)
उरस्तु विश्वसृक्पातु हृदयं पातु पद्मजः। सावित्रीपतिर्मे कंठं हृषीकेशो मुखं मम॥
urastu viśvasṛkpātu hṛdayaṁ pātu padmajaḥ sāvitrīpatirme kaṁṭhaṁ hṛṣīkeśo mukhaṁ mama
विश्वसृष्टिकर्ता मेरे वक्षस्थल की, पद्मज मेरे हृदय की रक्षा करें। सावित्री के पति मेरे कंठ की, हृषीकेश मेरे मुख की रक्षा करें।
श्लोक 126 (padma.1.34.126)
पद्मवर्णश्च नयने परमात्मा शिरो मम। एवं न्यस्य गुरोर्नाम शंकरो नामशंकरः॥
padmavarṇaśca nayane paramātmā śiro mama evaṁ nyasya gurornāma śaṁkaro nāmaśaṁkaraḥ
कमल-वर्ण परमात्मा मेरे नेत्रों तथा मस्तक की रक्षा करें। इस प्रकार गुरु का नाम रखकर शंकर, नामशंकर हुए—
श्लोक 127 (padma.1.34.127)
नमस्ते भगवन्ब्रह्मन्नित्युक्त्वा विरराम ह। ततस्तुष्टो हरं ब्रह्मा वाक्यमेतदुवाच ह॥
namaste bhagavanbrahmannityuktvā virarāma ha tatastuṣṭo haraṁ brahmā vākyametaduvāca ha
—'हे भगवन् ब्रह्मन्, तुम्हें नमस्कार' — यह कहकर चुप हो गए। तब प्रसन्न हुए ब्रह्मा ने शिव से यह वचन कहा।
श्लोक 128 (padma.1.34.128)
कं ते कामं करोम्यद्य पृच्छ मां यद्यदिच्छसि। रुद्र उवाच॥ यदि प्रसन्नो मे नाथ वरदो यदि वा मम॥
kaṁ te kāmaṁ karomyadya pṛccha māṁ yadyadicchasi rudra uvāca yadi prasanno me nātha varado yadi vā mama
'आज मैं तुम्हारी क्या इच्छा पूर्ण करूँ? पूछो, जो कुछ तुम चाहो।' रुद्र ने कहा — 'हे नाथ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, यदि आप मुझे वर देने वाले हैं—'
श्लोक 129 (padma.1.34.129)
तदेकं मे वद विभो यस्मिन्स्थाने भवान्स्थितः। केषुकेषु च स्थानेषु त्वां पश्यंति सदा द्विजाः॥
tadekaṁ me vada vibho yasminsthāne bhavānsthitaḥ keṣukeṣu ca sthāneṣu tvāṁ paśyaṁti sadā dvijāḥ
'—तो, हे विभो! मुझे यह एक बात बताओ: तुम किस स्थान में स्थित रहते हो? किन-किन स्थानों में—'
श्लोक 130 (padma.1.34.130)
नाम्ना च केन ते स्थानं शोभते धरणीतले। तन्मे वदस्व सर्वेश तव भक्तिरतस्य च॥
nāmnā ca kena te sthānaṁ śobhate dharaṇītale tanme vadasva sarveśa tava bhaktiratasya ca
'—द्विजगण तुम्हें सदा देखते हैं? और किस-किस नाम से तुम्हारा स्थान पृथ्वीतल पर सुशोभित होता है? हे सर्वेश! अपने भक्त को यह बताइए।'
श्लोक 131 (padma.1.34.131)
ब्रह्मोवाच॥ पुष्करेहं सुरश्रेष्ठो गयायां च चतुर्मुखः। कान्यकुब्जे देवगर्भो भृगुकक्षे पितामहः॥
brahmovāca puṣkarehaṁ suraśreṣṭho gayāyāṁ ca caturmukhaḥ kānyakubje devagarbho bhṛgukakṣe pitāmahaḥ
ब्रह्मा ने कहा — पुष्कर में मैं देवश्रेष्ठ हूँ, गया में चतुर्मुख हूँ। कान्यकुब्ज में देवगर्भ हूँ, भृगुकक्ष में पितामह हूँ।
श्लोक 132 (padma.1.34.132)
कावेर्य्यां सृष्टिकर्ता च नंदिपुर्य्यां बृहस्पतिः। प्रभासे पद्मजन्मा च वानर्यां च सुरप्रियः॥
kāveryyāṁ sṛṣṭikartā ca naṁdipuryyāṁ bṛhaspatiḥ prabhāse padmajanmā ca vānaryāṁ ca surapriyaḥ
कावेरी में सृष्टिकर्ता हूँ, नंदिपुरी में बृहस्पति हूँ। प्रभास में पद्मजन्मा हूँ, वानरी में सुरप्रिय हूँ।
श्लोक 133 (padma.1.34.133)
द्वारवत्यां तु ऋग्वेदी वैदिशे भुवनाधिपः। पौंड्रके पुंडरीकाक्षः पिंगाक्षो हस्तिनापुरे॥
dvāravatyāṁ tu ṛgvedī vaidiśe bhuvanādhipaḥ pauṁḍrake puṁḍarīkākṣaḥ piṁgākṣo hastināpure
द्वारवती में ऋग्वेदी हूँ, विदिशा में भुवनाधिप हूँ। पौंड्रक में पुंडरीकाक्ष हूँ, हस्तिनापुर में पिंगाक्ष हूँ।
श्लोक 134 (padma.1.34.134)
जयंत्यां विजयश्चास्मि जयंतः पुष्करावते। उग्रेषु पद्महस्तोहं तमोनद्यां तमोनुदः॥
jayaṁtyāṁ vijayaścāsmi jayaṁtaḥ puṣkarāvate ugreṣu padmahastohaṁ tamonadyāṁ tamonudaḥ
जयंती में विजय हूँ, पुष्करावत में जयंत हूँ। उग्रों में पद्महस्त हूँ, तमोनदी में तमोनुद हूँ।
श्लोक 135 (padma.1.34.135)
अहिच्छन्ने जया नंदी कांचीपुर्यां जनप्रियः। ब्रह्माहं पाटलीपुत्रे ऋषिकुंडे मुनिस्तथा॥
ahicchanne jayā naṁdī kāṁcīpuryāṁ janapriyaḥ brahmāhaṁ pāṭalīputre ṛṣikuṁḍe munistathā
अहिच्छत्र में जय-नंदी हूँ, कांचीपुरी में जनप्रिय हूँ। पाटलीपुत्र में ब्रह्मा हूँ, ऋषिकुंड में मुनि हूँ।
श्लोक 136 (padma.1.34.136)
महितारे मुकुंदश्च श्रीकंठः श्रीनिवासिते। कामरूपे शुभाकारो वाराणस्यां शिवप्रियः॥
mahitāre mukuṁdaśca śrīkaṁṭhaḥ śrīnivāsite kāmarūpe śubhākāro vārāṇasyāṁ śivapriyaḥ
महितार में मुकुंद हूँ, श्रीनिवासित में श्रीकंठ हूँ। कामरूप में शुभाकार हूँ, वाराणसी में शिवप्रिय हूँ।
श्लोक 137 (padma.1.34.137)
मल्लिकाक्षे तथा विष्णुर्महेंद्रे भार्गवस्तथा। गोनर्दे स्थविराकार उज्जयिन्यां पितामहः॥
mallikākṣe tathā viṣṇurmaheṁdre bhārgavastathā gonarde sthavirākāra ujjayinyāṁ pitāmahaḥ
मल्लिकाक्ष में विष्णु हूँ, महेंद्र में भार्गव हूँ। गोनर्द में स्थविराकार हूँ, उज्जयिनी में पितामह हूँ।
श्लोक 138 (padma.1.34.138)
कौशांब्यां तु महाबोधिरयोध्यायां च राघवः। मुंनींद्रश्चित्रकूटे तु वाराहो विंध्यपर्वते॥
kauśāṁbyāṁ tu mahābodhirayodhyāyāṁ ca rāghavaḥ muṁnīṁdraścitrakūṭe tu vārāho viṁdhyaparvate
कौशांबी में महाबोधि हूँ, अयोध्या में राघव हूँ। चित्रकूट में मुनींद्र हूँ, विंध्य-पर्वत में वाराह हूँ।
श्लोक 139 (padma.1.34.139)
गंगाद्वारे परमेष्ठी हिमवत्यपि शंकरः। देविकायां स्रुचाहस्तः स्रुवहस्तश्चतुर्वटे॥
gaṁgādvāre parameṣṭhī himavatyapi śaṁkaraḥ devikāyāṁ srucāhastaḥ sruvahastaścaturvaṭe
गंगाद्वार में परमेष्ठी हूँ, हिमवत् में भी शंकर हूँ। देविका में स्रुक्-हस्त हूँ, चतुर्वट में स्रुव-हस्त हूँ।
श्लोक 140 (padma.1.34.140)
वृंदावने पद्मपाणिः कुशहस्तश्च नैमिषे। गोप्लक्षे चैव गोपीन्द्रः सचंद्रो यमुनातटे॥
vṛṁdāvane padmapāṇiḥ kuśahastaśca naimiṣe goplakṣe caiva gopīndraḥ sacaṁdro yamunātaṭe
वृंदावन में पद्मपाणि हूँ, नैमिष में कुशहस्त हूँ। गोप्लक्ष में गोपींद्र हूँ, यमुना-तट पर सचंद्र हूँ।
श्लोक 141 (padma.1.34.141)
भागीरथ्यां पद्मतनुर्जलानंदो जलंधरे। कौंकणे चैव मद्राक्षः कांपिल्ये कनकप्रियः॥
bhāgīrathyāṁ padmatanurjalānaṁdo jalaṁdhare kauṁkaṇe caiva madrākṣaḥ kāṁpilye kanakapriyaḥ
भागीरथी में पद्मतनु हूँ, जलंधर में जलानंद हूँ। कोंकण में मद्राक्ष हूँ, कांपिल्य में कनकप्रिय हूँ।
श्लोक 142 (padma.1.34.142)
वेंकटे चान्नदाता च शंभुश्चैव क्रतुस्थले। लंकायां च पुलस्त्योहं काश्मीरे हंसवाहनः॥
veṁkaṭe cānnadātā ca śaṁbhuścaiva kratusthale laṁkāyāṁ ca pulastyohaṁ kāśmīre haṁsavāhanaḥ
वेंकट में अन्नदाता हूँ, क्रतुस्थल में शंभु हूँ। लंका में मैं पुलस्त्य हूँ, कश्मीर में हंसवाहन हूँ।
श्लोक 143 (padma.1.34.143)
वसिष्ठश्चार्बुदे चैव नारदश्चोत्पलावते। मेलके श्रुतिदाताहं प्रपाते यादसांपतिः॥
vasiṣṭhaścārbude caiva nāradaścotpalāvate melake śrutidātāhaṁ prapāte yādasāṁpatiḥ
अर्बुद में वसिष्ठ हूँ, उत्पलावत में नारद हूँ। मेलक में मैं श्रुतिदाता हूँ, प्रपात में यादसांपति (सागर) हूँ।
श्लोक 144 (padma.1.34.144)
सामवेदस्तथा यज्ञे मधुरे मधुरप्रियः। अंकोटे यज्ञभोक्ता च ब्रह्मवादे सुरप्रियः॥
sāmavedastathā yajñe madhure madhurapriyaḥ aṁkoṭe yajñabhoktā ca brahmavāde surapriyaḥ
यज्ञ में सामवेद हूँ, मधुरा में मधुरप्रिय हूँ। अंकोट में यज्ञभोक्ता हूँ, ब्रह्मवाद में सुरप्रिय हूँ।
श्लोक 145 (padma.1.34.145)
नारायणश्च गोमंते मायापुर्यां द्विजप्रियः। ऋषिवेदे दुराधर्षो देवायां सुरमर्दनः॥
nārāyaṇaśca gomaṁte māyāpuryāṁ dvijapriyaḥ ṛṣivede durādharṣo devāyāṁ suramardanaḥ
गोमंत में नारायण हूँ, मायापुरी में द्विजप्रिय हूँ। ऋषिवेद में दुराधर्ष हूँ, देवा में सुरमर्दन हूँ।
श्लोक 146 (padma.1.34.146)
विजयायां महारूपः स्वरूपो राष्ट्रवर्द्धने। पृथूदरस्तु मालव्यां शाकंभर्यां रसप्रियः॥
vijayāyāṁ mahārūpaḥ svarūpo rāṣṭravarddhane pṛthūdarastu mālavyāṁ śākaṁbharyāṁ rasapriyaḥ
विजया में महारूप हूँ, राष्ट्रवर्धन में स्वरूप हूँ। मालवी में पृथूदर हूँ, शाकंभरी में रसप्रिय हूँ।
श्लोक 147 (padma.1.34.147)
पिंडारके तु गोपालः शंखोद्धारेंगवर्द्धनः। कादंबके प्रजाध्यक्षो देवाध्यक्षः समस्थले॥
piṁḍārake tu gopālaḥ śaṁkhoddhāreṁgavarddhanaḥ kādaṁbake prajādhyakṣo devādhyakṣaḥ samasthale
पिंडारक में गोपाल हूँ, शंखोद्धार में गोवर्धन हूँ। कादंबक में प्रजाध्यक्ष हूँ, समस्थल में देवाध्यक्ष हूँ।
श्लोक 148 (padma.1.34.148)
गंगाधरो भद्रपीठे जलशाय्यप्यहमर्बुदे। त्र्यंबके त्रिपुराधीशः श्रीपर्वते त्रिलोचनः॥
gaṁgādharo bhadrapīṭhe jalaśāyyapyahamarbude tryaṁbake tripurādhīśaḥ śrīparvate trilocanaḥ
भद्रपीठ में गंगाधर हूँ, अर्बुद में जलशायी भी हूँ। त्र्यंबक में त्रिपुराधीश हूँ, श्रीपर्वत में त्रिलोचन हूँ।
श्लोक 149 (padma.1.34.149)
महादेवः पद्मपुरे कापाले वैधसस्तथा। शृंगिबेरपुरे शौरिर्नैमिषे चक्रपाणिकः॥
mahādevaḥ padmapure kāpāle vaidhasastathā śṛṁgiberapure śaurirnaimiṣe cakrapāṇikaḥ
पद्मपुर में महादेव हूँ, कापाल में विधाता हूँ। शृंगिबेरपुर में शौरि हूँ, नैमिष में चक्रपाणि हूँ।
श्लोक 150 (padma.1.34.150)
दंडपुर्यां विरूपाक्षो गौतमो धूतपापके। हंसनाथो माल्यवति द्विजेंद्रो वलिके तथा॥
daṁḍapuryāṁ virūpākṣo gautamo dhūtapāpake haṁsanātho mālyavati dvijeṁdro valike tathā
दंडपुरी में विरूपाक्ष हूँ, धूतपापक में गौतम हूँ। माल्यवत में हंसनाथ हूँ, वलिक में द्विजेंद्र हूँ।
श्लोक 151 (padma.1.34.151)
इंद्रपुर्यां देवनाथो द्यूतपायां पुरंदरः। हंसवाहस्तु लंबायां चंडायां गरुडप्रियः॥
iṁdrapuryāṁ devanātho dyūtapāyāṁ puraṁdaraḥ haṁsavāhastu laṁbāyāṁ caṁḍāyāṁ garuḍapriyaḥ
इंद्रपुरी में देवनाथ हूँ, द्यूतपा में पुरंदर हूँ। लंबा में हंसवाहन हूँ, चंडा में गरुड़प्रिय हूँ।
श्लोक 152 (padma.1.34.152)
महोदये महायज्ञः सुयज्ञो यज्ञकेतने। सिद्धिस्मरे पद्मवर्णः विभायां पद्मबोधनः॥
mahodaye mahāyajñaḥ suyajño yajñaketane siddhismare padmavarṇaḥ vibhāyāṁ padmabodhanaḥ
महोदय में महायज्ञ हूँ, यज्ञकेतन में सुयज्ञ हूँ। सिद्धिस्मर में पद्मवर्ण हूँ, विभा में पद्मबोधन हूँ।
श्लोक 153 (padma.1.34.153)
देवदारुवने लिंगं महापत्तौ विनायकः। त्र्यंबको मातृकास्थाने अलकायां कुलाधिपः॥
devadāruvane liṁgaṁ mahāpattau vināyakaḥ tryaṁbako mātṛkāsthāne alakāyāṁ kulādhipaḥ
देवदारुवन में लिंग हूँ, महापत्तन में विनायक हूँ। त्र्यंबक हूँ मातृका-स्थान में, अलका में कुलाधिप हूँ।
श्लोक 154 (padma.1.34.154)
त्रिकूटे चैव गोनर्दः पाताले वासुकिस्तथा। पद्माध्यक्षश्च केदारे कूष्मांडे सुरतप्रियः॥
trikūṭe caiva gonardaḥ pātāle vāsukistathā padmādhyakṣaśca kedāre kūṣmāṁḍe suratapriyaḥ
त्रिकूट में गोनर्द हूँ, पाताल में वासुकि हूँ। केदार में पद्माध्यक्ष हूँ, कूष्मांड में सुरतप्रिय हूँ।
श्लोक 155 (padma.1.34.155)
कुंडवाप्यां शुभांगस्तु सारण्यां तक्षकस्तथा। अक्षोटे पापहा चैव अंबिकायां सुदर्शनः॥
kuṁḍavāpyāṁ śubhāṁgastu sāraṇyāṁ takṣakastathā akṣoṭe pāpahā caiva aṁbikāyāṁ sudarśanaḥ
कुंडवापी में शुभांग हूँ, सारण्य में तक्षक हूँ। अक्षोट में पापहा हूँ, अंबिका में सुदर्शन हूँ।
श्लोक 156 (padma.1.34.156)
वरदायां महावीरः कांतारे दुर्गनाशनः। अनंतश्चैव पर्णाटे प्रकाशायां दिवाकरः॥
varadāyāṁ mahāvīraḥ kāṁtāre durganāśanaḥ anaṁtaścaiva parṇāṭe prakāśāyāṁ divākaraḥ
वरदा में महावीर हूँ, कांतार में दुर्गनाशन हूँ। पर्णाट में अनंत हूँ, प्रकाशा में दिवाकर हूँ।
श्लोक 157 (padma.1.34.157)
विराजायां पद्मनाभः स्वरुद्रश्च वृकस्थले। मार्कंडो वटके चैव वाहिन्यां मृगकेतनः॥
virājāyāṁ padmanābhaḥ svarudraśca vṛkasthale mārkaṁḍo vaṭake caiva vāhinyāṁ mṛgaketanaḥ
विराजा में पद्मनाभ हूँ, वृकस्थल में स्वरुद्र हूँ। वटक में मार्कंड हूँ, वाहिनी में मृगकेतन हूँ।
श्लोक 158 (padma.1.34.158)
पद्मावत्यां पद्मगृहो गगने पद्मकेतनः। अष्टोत्तरं स्थानशतं मया ते परिकीर्तितम्॥
padmāvatyāṁ padmagṛho gagane padmaketanaḥ aṣṭottaraṁ sthānaśataṁ mayā te parikīrtitam
पद्मावती में पद्मगृह हूँ, आकाश में पद्मकेतन हूँ। इस प्रकार मैंने तुम्हें एक सौ आठ स्थान बताए हैं।
श्लोक 159 (padma.1.34.159)
यत्र वै मम सांनिध्यं त्रिसंध्यं त्रिपुरांतक। एतेषामपि यस्त्वेकं पश्यते भक्तिमान्नरः॥
yatra vai mama sāṁnidhyaṁ trisaṁdhyaṁ tripurāṁtaka eteṣāmapi yastvekaṁ paśyate bhaktimānnaraḥ
हे त्रिपुरांतक! जहाँ भी मेरी त्रिकाल सांनिध्यता है — इनमें से भी जो भक्तिमान् मनुष्य केवल एक को भी देख लेता है—
श्लोक 160 (padma.1.34.160)
स्थानं सुविरजं लब्ध्वा मोदते शाश्वतीः समाः। मानसं वाचिकं चैव कायिकं यच्च दुष्कृतम्॥
sthānaṁ suvirajaṁ labdhvā modate śāśvatīḥ samāḥ mānasaṁ vācikaṁ caiva kāyikaṁ yacca duṣkṛtam
'—वह विरजा-स्थान को पाकर शाश्वत वर्षों तक आनंदित होता है। मानसिक, वाचिक और शारीरिक जो भी दुष्कर्म हो—'
श्लोक 161 (padma.1.34.161)
तत्सर्वं नाशमायाति नात्र कार्या विचारणा। यस्त्वेतानि च सर्वाणि गत्वा मां पश्यते नरः॥
tatsarvaṁ nāśamāyāti nātra kāryā vicāraṇā yastvetāni ca sarvāṇi gatvā māṁ paśyate naraḥ
—वह सब नष्ट हो जाता है, इसमें विचार नहीं करना चाहिए। जो मनुष्य इन सभी स्थानों पर जाकर मुझे देखता है—
श्लोक 162 (padma.1.34.162)
भवते मोक्षभागी च यत्राहं तत्र वै स्थितः। पुष्पोपहारैर्धूपैश्च ब्राह्मणानां च तर्पणैः॥
bhavate mokṣabhāgī ca yatrāhaṁ tatra vai sthitaḥ puṣpopahārairdhūpaiśca brāhmaṇānāṁ ca tarpaṇaiḥ
वह मोक्ष का भागी होता है; जहाँ भी मैं स्थित हूँ, वहाँ पुष्प, उपहार, धूप, तथा ब्राह्मणों के तर्पण से—
श्लोक 163 (padma.1.34.163)
ध्यानेन च स्थिरेणाशु प्राप्यते परमेश्वरः। तस्य पुण्यफलं चाग्र्यमंते मोक्षफलं तथा॥
dhyānena ca sthireṇāśu prāpyate parameśvaraḥ tasya puṇyaphalaṁ cāgryamaṁte mokṣaphalaṁ tathā
—तथा स्थिर ध्यान से शीघ्र ही परमेश्वर प्राप्त हो जाते हैं। उसका पुण्यफल प्रधान है, और अंत में मोक्षफल भी।
श्लोक 164 (padma.1.34.164)
स ब्रह्मलोकमासाद्य तत्कालं तत्र तिष्ठति। पुनः सृष्टौ भवेद्देवो वैराजानां महातपाः॥
sa brahmalokamāsādya tatkālaṁ tatra tiṣṭhati punaḥ sṛṣṭau bhaveddevo vairājānāṁ mahātapāḥ
वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर तब तक वहाँ रहता है; पुनः सृष्टि होने पर महातपस्वी वैराज देवों में जन्म लेता है।
श्लोक 165 (padma.1.34.165)
ब्रह्महत्यादि पापानि इहलोके कृतान्यपि। अकामतः कामतो वा तानि नश्यंति तत्क्षणात्॥
brahmahatyādi pāpāni ihaloke kṛtānyapi akāmataḥ kāmato vā tāni naśyaṁti tatkṣaṇāt
ब्रह्महत्या आदि पाप इस लोक में किए गए हों, चाहे इच्छा से या अनिच्छा से — वे उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 166 (padma.1.34.166)
इहलोके दरिद्रो यो भ्रष्टराज्योथवा पुनः। स्थानेष्वेतेषु वै गत्वा मां पश्यति समाधिना॥
ihaloke daridro yo bhraṣṭarājyothavā punaḥ sthāneṣveteṣu vai gatvā māṁ paśyati samādhinā
इस लोक में जो दरिद्र है, या जिसका राज्य नष्ट हो गया हो, वह भी इन स्थानों में जाकर एकाग्रचित्त होकर मुझे देखता है—
श्लोक 167 (padma.1.34.167)
कृत्वा पूजोपहारं च स्नानं च पितृतर्पणम्। कृत्वा पिंडप्रदानं च सोचिराद्दुःखवर्जितः॥
kṛtvā pūjopahāraṁ ca snānaṁ ca pitṛtarpaṇam kṛtvā piṁḍapradānaṁ ca socirādduḥkhavarjitaḥ
—पूजा-उपहार करके, स्नान और पितृ-तर्पण करके, पिंडदान करके — शीघ्र ही दुःखरहित हो जाता है।
श्लोक 168 (padma.1.34.168)
एकच्छत्रो भवेद्राजा सत्यमेतन्न संशयः। इह राज्यानि सौभाग्यं धनं धान्यं वरस्त्रियः॥
ekacchatro bhavedrājā satyametanna saṁśayaḥ iha rājyāni saubhāgyaṁ dhanaṁ dhānyaṁ varastriyaḥ
वह अकेला ही राजा बनता है — यह सत्य है, इसमें संदेह नहीं। यहाँ जिन्होंने पुष्कर की यात्रा की, उन्हें राज्य, सौभाग्य—
श्लोक 169 (padma.1.34.169)
भवंति विविधास्तस्य यैर्यात्रा पुष्करे कृता। इदं यात्राविधानं यः कुरुते कारयेत वा॥
bhavaṁti vividhāstasya yairyātrā puṣkare kṛtā idaṁ yātrāvidhānaṁ yaḥ kurute kārayeta vā
—धन, धान्य तथा उत्तम स्त्रियाँ नाना प्रकार से प्राप्त होती हैं। जो कोई इस यात्रा-विधान को करता है, या करवाता है—
श्लोक 170 (padma.1.34.170)
शृणोति वा स पापैस्तु सर्वैरेव प्रमुच्यते। अगम्यागमनं येन कृतं जानाति मानवः॥
śṛṇoti vā sa pāpaistu sarvaireva pramucyate agamyāgamanaṁ yena kṛtaṁ jānāti mānavaḥ
—या सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य अगम्यागमन जैसा पाप जानता है, फिर भी करता है—
श्लोक 171 (padma.1.34.171)
ब्रह्मक्रियाया लोपेन बहुवर्षकृतेन च। यात्रां चेमां सकृत्कृत्वा वेदसंस्कारमाप्नुयात्॥
brahmakriyāyā lopena bahuvarṣakṛtena ca yātrāṁ cemāṁ sakṛtkṛtvā vedasaṁskāramāpnuyāt
—अथवा अनेक वर्षों से ब्रह्म-क्रिया के लोप से युक्त हो, वह भी एक बार इस यात्रा को करके वेद-संस्कार प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 172 (padma.1.34.172)
किमत्र बहुनोक्तेन इदमस्तीह शंकर। अप्राप्यं प्राप्यते तेन पापं चापि विनश्यति॥
kimatra bahunoktena idamastīha śaṁkara aprāpyaṁ prāpyate tena pāpaṁ cāpi vinaśyati
हे शंकर! यहाँ अधिक कहने से क्या — यह तो ऐसा है कि इससे अप्राप्य भी प्राप्त हो जाता है, और पाप भी नष्ट हो जाता है।
श्लोक 173 (padma.1.34.173)
सर्वयज्ञफलैस्तुल्यं सर्वतीर्थफलप्रदम्। सर्वेषां चैव वेदानां समाप्तिस्तेन वै कृता॥
sarvayajñaphalaistulyaṁ sarvatīrthaphalapradam sarveṣāṁ caiva vedānāṁ samāptistena vai kṛtā
यह समस्त यज्ञों के फल के तुल्य है, समस्त तीर्थों का फल देने वाला है। इसके द्वारा समस्त वेदों की समाप्ति भी सिद्ध हो जाती है।
श्लोक 174 (padma.1.34.174)
यैः कृत्वा पुष्करे संध्यां सावित्री समुपासिता। स्वपत्नीहस्तदत्तेन पौष्करेण जलेन तु॥
yaiḥ kṛtvā puṣkare saṁdhyāṁ sāvitrī samupāsitā svapatnīhastadattena pauṣkareṇa jalena tu
जिन्होंने पुष्कर में संध्या करके सावित्री की उपासना की — अपनी पत्नी के हाथ से दिए गए, पौष्करी जल से—
श्लोक 175 (padma.1.34.175)
भृंगारेण वरेणैव मृण्मयेनापि शंकर। आनीय तज्जलं पुण्यं संध्योपास्तिर्दिनक्षये॥
bhṛṁgāreṇa vareṇaiva mṛṇmayenāpi śaṁkara ānīya tajjalaṁ puṇyaṁ saṁdhyopāstirdinakṣaye
—उत्तम भृंगार (जलपात्र) से, या मिट्टी के पात्र से भी, हे शंकर, उस पवित्र जल को लाकर, दिन के अंत में संध्या-उपासना—
श्लोक 176 (padma.1.34.176)
समाधिना समाधेया सप्राणायामपूर्विका। तस्यां कृतायां यत्पुण्यं तच्छृणुष्व हराद्य मे॥
samādhinā samādheyā saprāṇāyāmapūrvikā tasyāṁ kṛtāyāṁ yatpuṇyaṁ tacchṛṇuṣva harādya me
—समाधिपूर्वक, प्राणायाम-पूर्वक करनी चाहिए। हे हर! उस उपासना का जो पुण्य होता है, वह मुझसे आज सुनो।
श्लोक 177 (padma.1.34.177)
तेन द्वादशवर्षाणि भवेत्संध्या सुवंदिता। अश्वमेधफलं स्नाने दाने दशगुणं तथा॥
tena dvādaśavarṣāṇi bhavetsaṁdhyā suvaṁditā aśvamedhaphalaṁ snāne dāne daśaguṇaṁ tathā
उससे बारह वर्षों तक की संध्या-वंदना का फल प्राप्त होता है। स्नान में अश्वमेध का फल, दान में उसका दस गुना फल मिलता है।
श्लोक 178 (padma.1.34.178)
उपवासेप्यनंतं च स्वयं प्रोक्तं मयानघ। सावित्र्याः पुरतो यस्तु दंपत्योर्भोजनं ददेत्॥
upavāsepyanaṁtaṁ ca svayaṁ proktaṁ mayānagha sāvitryāḥ purato yastu daṁpatyorbhojanaṁ dadet
हे निष्पाप! उपवास में तो अनंत फल स्वयं मेरे द्वारा ही कहा गया है। जो सावित्री के समक्ष दंपती को भोजन कराता है—
श्लोक 179 (padma.1.34.179)
तेनाहं भोजितस्तत्र भवामीह न संशयः। द्वितीयं भोजयेद्यस्तु भोजितस्तेन केशवः॥
tenāhaṁ bhojitastatra bhavāmīha na saṁśayaḥ dvitīyaṁ bhojayedyastu bhojitastena keśavaḥ
—उसके द्वारा मैं वहाँ भोजन कराया गया मानता हूँ, इसमें संदेह नहीं। जो दूसरे को भी भोजन कराता है, उसके द्वारा केशव भोजन कराए जाते हैं—
श्लोक 180 (padma.1.34.180)
लक्ष्मीसहायो वरदो वरांस्तस्य प्रयच्छति। उमासहायस्तार्तीये भोजितोसि न संशयः॥
lakṣmīsahāyo varado varāṁstasya prayacchati umāsahāyastārtīye bhojitosi na saṁśayaḥ
—लक्ष्मी सहित, वरदाता, वह उन्हें वर प्रदान करता है। तीसरे को भोजन कराने पर उमा सहित मैं ही भोजन किया गया मानता हूँ, संदेह नहीं।
श्लोक 181 (padma.1.34.181)
अथवा या कुमारीणां भक्त्या दद्याच्च भोजनम्। तस्याः कुले भवेद्वंध्या न कदाचिच्च दुर्भगा॥
athavā yā kumārīṇāṁ bhaktyā dadyācca bhojanam tasyāḥ kule bhavedvaṁdhyā na kadācicca durbhagā
अथवा जो कुमारियों को भक्तिपूर्वक भोजन कराती है, उसके कुल में कोई स्त्री कभी वंध्या या दुर्भाग्यशाली नहीं होती।
श्लोक 182 (padma.1.34.182)
न कन्या जननी क्वापि न भर्तुर्या न वल्लभा। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सावित्र्यग्रे तु भोजनम्॥
na kanyā jananī kvāpi na bharturyā na vallabhā tasmātsarvaprayatnena sāvitryagre tu bhojanam
न कोई कन्या माँ बनने से वंचित रहती है, न पति की अप्रिय बनती है। इसलिए, हे भीष्म! पूर्ण प्रयत्न से सावित्री के समक्ष भोजन—
श्लोक 183 (padma.1.34.183)
पारत्रमैहिकं वापि कामयद्भिर्नरैः सदा। दातव्यं सर्वदा भीष्म कटुतैलविवर्जितम्॥
pāratramaihikaṁ vāpi kāmayadbhirnaraiḥ sadā dātavyaṁ sarvadā bhīṣma kaṭutailavivarjitam
—परलोक तथा इहलोक की इच्छा रखने वाले मनुष्यों द्वारा सदा कराया जाना चाहिए, कड़वे तेल से रहित—
श्लोक 184 (padma.1.34.184)
न चाम्लं न च वै क्षारं स्त्रीणां भोज्यं कदाचन। भक्ष्यं पंचप्रकारं च रसैः सर्वैस्सुसंस्कृतम्॥
na cāmlaṁ na ca vai kṣāraṁ strīṇāṁ bhojyaṁ kadācana bhakṣyaṁ paṁcaprakāraṁ ca rasaiḥ sarvaissusaṁskṛtam
—न खट्टा, न क्षारयुक्त — स्त्रियों का भोजन कभी ऐसा नहीं होना चाहिए। भक्ष्य पाँच प्रकार का हो, समस्त रसों से सुसंस्कृत—
श्लोक 185 (padma.1.34.185)
घृतपूर्यः सुपक्वाश्च बहुक्षीरसमन्विताः। शिखरिणी तथा पेया दधिक्षीरसमन्विता॥
ghṛtapūryaḥ supakvāśca bahukṣīrasamanvitāḥ śikhariṇī tathā peyā dadhikṣīrasamanvitā
—घी में पकी हुई, अच्छी तरह पकाई हुई, दूध से भरपूर पूरियाँ; तथा दही-दूध से युक्त पेय शिखरिणी—
श्लोक 186 (padma.1.34.186)
आह्लादकारिणी पुंसां स्त्रीणां चातीव वल्लभा। धनधान्यां जनोपेतं नारीणां च शताकुलम्॥
āhlādakāriṇī puṁsāṁ strīṇāṁ cātīva vallabhā dhanadhānyāṁ janopetaṁ nārīṇāṁ ca śatākulam
—पुरुषों को आह्लादित करने वाली, स्त्रियों को अत्यंत प्रिय — धन-धान्य से युक्त, सैकड़ों स्त्रियों के समूह वाला परिवार—
श्लोक 187 (padma.1.34.187)
पूपकं शष्कुलं तस्यां जायते नात्र संशयः। न ज्वरो न च संतापो न दुःखं न वियोगिता॥
pūpakaṁ śaṣkulaṁ tasyāṁ jāyate nātra saṁśayaḥ na jvaro na ca saṁtāpo na duḥkhaṁ na viyogitā
—इसमें कोई संदेह नहीं कि जो पूपक और शष्कुल (पकवान) देती है, उसके यहाँ न ज्वर होता है, न संताप, न दुःख, न वियोग।
श्लोक 188 (padma.1.34.188)
असौ तारयते स्वानां कुलानामेकविंशतिं। बंधुभिश्च सुतैश्चैव दासीदासैरनंतकैः॥
asau tārayate svānāṁ kulānāmekaviṁśatiṁ baṁdhubhiśca sutaiścaiva dāsīdāsairanaṁtakaiḥ
यह उसके इक्कीस कुलों को तार देता है — बंधुओं, पुत्रों, दासी-दासों और अनंत जनों सहित पूर्ण हुए उसके कुल को।
श्लोक 189 (padma.1.34.189)
पूरितं च कुलं तस्याः पूरिकां या प्रदास्यति। एधते च चिरं कालं पुत्रपौत्रसमन्वितम्॥
pūritaṁ ca kulaṁ tasyāḥ pūrikāṁ yā pradāsyati edhate ca ciraṁ kālaṁ putrapautrasamanvitam
जो पूरिका (एक प्रकार की पूरी) देती है, उसका कुल दीर्घकाल तक पुत्र-पौत्रों सहित बढ़ता रहता है।
श्लोक 190 (padma.1.34.190)
कुलं च सकलं तस्य शष्कुलं यः प्रयच्छति। पुत्रिण्यो वै दुहितरो बंधुभिः सहितं कुलम्॥
kulaṁ ca sakalaṁ tasya śaṣkulaṁ yaḥ prayacchati putriṇyo vai duhitaro baṁdhubhiḥ sahitaṁ kulam
जो शष्कुल (मिठाई) देती है, उसका सारा कुल — पुत्रवती कन्याएँ, बंधुओं सहित कुल — निस्संदेह ऐसा ही होता है।
श्लोक 191 (padma.1.34.191)
शिखरिणीप्रदात्रीणां युवतीनां न संशयः। मोदते तु कुलं तस्याः सर्वसिद्धिप्रपूरितम्॥
śikhariṇīpradātrīṇāṁ yuvatīnāṁ na saṁśayaḥ modate tu kulaṁ tasyāḥ sarvasiddhiprapūritam
शिखरिणी देने वाली युवतियों का कुल, समस्त सिद्धियों से परिपूर्ण होकर आनंदित होता है।
श्लोक 192 (padma.1.34.192)
मोदकानां प्रदानेन एवमाह प्रजापतिः। एतदेव तु गौरीणां भोजनं हर शस्यते॥
modakānāṁ pradānena evamāha prajāpatiḥ etadeva tu gaurīṇāṁ bhojanaṁ hara śasyate
मोदक देने से यही फल होता है, ऐसा प्रजापति ने कहा। हे हर! गौरी के लिए भी यही भोजन शस्त कहा गया है।
श्लोक 193 (padma.1.34.193)
सुभगा पुत्रिणी साध्वी धनऋद्धिसमन्विता। सहस्रभोजिनी शंभो जन्मजन्म भविष्यति॥
subhagā putriṇī sādhvī dhanaṛddhisamanvitā sahasrabhojinī śaṁbho janmajanma bhaviṣyati
हे शंभो! सौभाग्यशालिनी, पुत्रवती, साध्वी, धन-समृद्धि से युक्त वह स्त्री जन्म-जन्म में सहस्रों को भोजन कराने वाली बनेगी।
श्लोक 194 (padma.1.34.194)
पूपानि चैव पुण्यानि कृतानि मधुराणि च। द्राक्षारसप्रधानं च गुडखंडसमन्वितम्॥
pūpāni caiva puṇyāni kṛtāni madhurāṇi ca drākṣārasapradhānaṁ ca guḍakhaṁḍasamanvitam
पवित्र और मधुर बने हुए पूए, द्राक्षा-रस प्रधान, गुड़-खांड से युक्त—
श्लोक 195 (padma.1.34.195)
शारदेन तु धान्येन कृत्वा खंडं विमिश्रितत्। स्त्रीणां चैव तु पेयानि भक्ष्याणि च द्विजन्मनाम्॥
śāradena tu dhānyena kṛtvā khaṁḍaṁ vimiśritat strīṇāṁ caiva tu peyāni bhakṣyāṇi ca dvijanmanām
—शरद ऋतु के धान्य से बनाया गया खांड-मिश्रित पदार्थ; स्त्रियों तथा द्विजों के लिए पेय और भक्ष्य—
श्लोक 196 (padma.1.34.196)
इह चाविकवासांसि वर्षायोग्यानि सर्वशः। यानियानि च पेयानि तानि योग्यानि दापयेत्॥
iha cāvikavāsāṁsi varṣāyogyāni sarvaśaḥ yāniyāni ca peyāni tāni yogyāni dāpayet
—यहाँ भेड़ के वस्त्र भी वर्षा-योग्य, सभी प्रकार से देने चाहिए। जो-जो पेय पदार्थ हों, वे भी योग्य रूप से दान करने चाहिए।
श्लोक 197 (padma.1.34.197)
प्रतिपूज्य विधानेन वसुदानैः सकंचुकैः। कुंकुमेनानुलिप्तांग्यः स्रग्दामभिरलंकृताः॥
pratipūjya vidhānena vasudānaiḥ sakaṁcukaiḥ kuṁkumenānuliptāṁgyaḥ sragdāmabhiralaṁkṛtāḥ
विधिपूर्वक पूजा करके, धन-दान तथा चोली सहित वस्त्र देकर, कुंकुम से अंग-अनुलेपन करके, माला से अलंकृत करके—
श्लोक 198 (padma.1.34.198)
दत्वा तूपानहावङ्घ्र्योर्नारिकेलं करे तथा। अक्ष्णोश्चैवांजनं दत्वा सिंदूरं चैव मस्तके॥
datvā tūpānahāvaṅghryornārikelaṁ kare tathā akṣṇoścaivāṁjanaṁ datvā siṁdūraṁ caiva mastake
—चरणों में जूतियाँ, हाथ में नारियल देकर, आँखों में अंजन तथा मस्तक पर सिंदूर देकर—
श्लोक 199 (padma.1.34.199)
गुडं फलानि हृद्यानि वांछितानि मृदूनि च। हस्ते दत्वा सपात्राणि प्रणिपत्य विसर्जयेत्॥
guḍaṁ phalāni hṛdyāni vāṁchitāni mṛdūni ca haste datvā sapātrāṇi praṇipatya visarjayet
—गुड़, मनभावन तथा वांछित मृदु फल हाथ में पात्रों सहित देकर, प्रणाम करके विदा करना चाहिए।
श्लोक 200 (padma.1.34.200)
स्वयं भुंजीत वै पश्चात्सबंधुर्बालकैः सह। अथवा नैव संपत्तिस्तीर्थे दानं च भाजनम्॥
svayaṁ bhuṁjīta vai paścātsabaṁdhurbālakaiḥ saha athavā naiva saṁpattistīrthe dānaṁ ca bhājanam
फिर स्वयं बंधुओं और बालकों सहित भोजन करना चाहिए। अथवा यदि सामर्थ्य न हो, तो तीर्थ में दान करना भी उचित है।
श्लोक 201 (padma.1.34.201)
गृहे गतः प्रदास्यामि हृष्टो देव प्रसीद मे। एवमेव पितॄणां च आगत्य स्वीय मंदिरे॥
gṛhe gataḥ pradāsyāmi hṛṣṭo deva prasīda me evameva pitṝṇāṁ ca āgatya svīya maṁdire
'घर पहुँचकर मैं प्रसन्नतापूर्वक दूँगा, हे देव! मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।' — इसी प्रकार पितरों के लिए भी अपने घर आकर—
श्लोक 202 (padma.1.34.202)
पिंडप्रदानपूर्वं तु श्राद्धं कुर्याद्विधानतः। पितरस्तस्य वै तृप्ता भवंति ब्रह्मणो दिनम्॥
piṁḍapradānapūrvaṁ tu śrāddhaṁ kuryādvidhānataḥ pitarastasya vai tṛptā bhavaṁti brahmaṇo dinam
—विधिपूर्वक पिंडदान-पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। उसके पितर ब्रह्मा के एक दिन तक तृप्त रहते हैं।
श्लोक 203 (padma.1.34.203)
तीर्थादष्टगुणं पुण्यं स्वगृहे ददतां शिव। न च पश्यंति वै नीचाः श्राद्धं द्विजातिभिः कृतं॥
tīrthādaṣṭaguṇaṁ puṇyaṁ svagṛhe dadatāṁ śiva na ca paśyaṁti vai nīcāḥ śrāddhaṁ dvijātibhiḥ kṛtaṁ
हे शिव! अपने घर में देने पर तीर्थ से आठ गुना पुण्य मिलता है। और नीच लोग द्विजों द्वारा किए गए श्राद्ध को नहीं देखते।
श्लोक 204 (padma.1.34.204)
एकांते तु गृहे गुप्ते पितॄणां श्राद्धमिष्यते। नीचदृष्ट्या हतं तच्च पितॄन्नैवोपतिष्ठति॥
ekāṁte tu gṛhe gupte pitṝṇāṁ śrāddhamiṣyate nīcadṛṣṭyā hataṁ tacca pitṝnnaivopatiṣṭhati
एकांत, गुप्त घर में ही पितरों का श्राद्ध वांछित है। नीच दृष्टि से हत होकर वह पितरों तक नहीं पहुँचता।
श्लोक 205 (padma.1.34.205)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं गुप्तं च कारयेत्। पितॄणां तृप्तिदं प्रोक्तं स्वयमेव स्वयंभुवा॥
tasmātsarvaprayatnena śrāddhaṁ guptaṁ ca kārayet pitṝṇāṁ tṛptidaṁ proktaṁ svayameva svayaṁbhuvā
इसलिए पूर्ण प्रयत्न से श्राद्ध गुप्त रूप से कराना चाहिए। स्वयं स्वयंभू ने ही इसे पितरों की तृप्ति देने वाला बताया है।
श्लोक 206 (padma.1.34.206)
गौरीभक्त्याधिका या तु शस्ता ज्ञातक्रिया तु सा। राजसी मनसा ज्ञाता जनानां कीर्तिदायिनी॥
gaurībhaktyādhikā yā tu śastā jñātakriyā tu sā rājasī manasā jñātā janānāṁ kīrtidāyinī
गौरी के प्रति जो भक्ति अधिक हो, वही प्रशंसित और ज्ञात-क्रिया कही जाती है। मन से जानी गई राजसी क्रिया, जनों की कीर्ति देने वाली होती है।
श्लोक 207 (padma.1.34.207)
गुप्तं दानं सदा देयमात्मनो हितमिच्छता। पक्वान्नं दृश्यतामेति दीयमानं जनैर्भुवि॥
guptaṁ dānaṁ sadā deyamātmano hitamicchatā pakvānnaṁ dṛśyatāmeti dīyamānaṁ janairbhuvi
अपना हित चाहने वाले को सदा गुप्त दान देना चाहिए। पका हुआ अन्न दिखावे के लिए लोगों में देते हुए दिखाई पड़ता है—
श्लोक 208 (padma.1.34.208)
दृश्यमानं तु तत्तुष्ट्यै दृश्यते नेह कर्हिचित्। एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता॥
dṛśyamānaṁ tu tattuṣṭyai dṛśyate neha karhicit ekasminbhojite vipre koṭirbhavati bhojitā
—दिखाई देना उसकी संतुष्टि के लिए है, परंतु यह यहाँ कहीं भी देखा नहीं जाना चाहिए। एक ब्राह्मण को भोजन कराने पर करोड़ों को भोजन कराया हुआ होता है—
श्लोक 209 (padma.1.34.209)
भवने नात्र संदेहः सत्यं पौराणिकं वचः। तीर्थे तु ब्राह्मणं नैव परीक्षेत कथंचन॥
bhavane nātra saṁdehaḥ satyaṁ paurāṇikaṁ vacaḥ tīrthe tu brāhmaṇaṁ naiva parīkṣeta kathaṁcana
—घर में, इसमें संदेह नहीं; यह पौराणिक सत्य वचन है। परंतु तीर्थ में ब्राह्मण की कभी परीक्षा नहीं लेनी चाहिए।
श्लोक 210 (padma.1.34.210)
अन्नार्थिनमनुप्राप्तं भोज्यं तं मनुरब्रवीत्। सक्तुभिः पिंडदानं च संयावैः पायसेन वा॥
annārthinamanuprāptaṁ bhojyaṁ taṁ manurabravīt saktubhiḥ piṁḍadānaṁ ca saṁyāvaiḥ pāyasena vā
अन्न चाहने वाला जो भी वहाँ आए, उसे भोजन कराना चाहिए, ऐसा मनु ने कहा। सत्तू, पिंड-दान, संयाव या खीर से—
श्लोक 211 (padma.1.34.211)
कर्त्तव्यमृषिभिर्दृष्टं पिण्याकेनैंगुदेन वा। तिलपिण्याककैर्देयं भक्तिमद्भिर्नरैः सदा॥
karttavyamṛṣibhirdṛṣṭaṁ piṇyākenaiṁgudena vā tilapiṇyākakairdeyaṁ bhaktimadbhirnaraiḥ sadā
—ऋषियों द्वारा दृष्ट विधि से, तिल-खली या इंगुदी से यह करना चाहिए। भक्तिमान् मनुष्यों को सदा तिल-खली से दान देना चाहिए।
श्लोक 212 (padma.1.34.212)
श्राद्धं तत्र तु कर्तव्यमर्घ्यावाहनवर्जितम्। स्वधां तु गृध्राः काका वा नैव दृष्ट्या हरन्ति ते॥
śrāddhaṁ tatra tu kartavyamarghyāvāhanavarjitam svadhāṁ tu gṛdhrāḥ kākā vā naiva dṛṣṭyā haranti te
वहाँ अर्घ्य और आवाहन से रहित श्राद्ध करना चाहिए। गीध या कौवे भी उस स्वधा को देखकर छीन नहीं सकते—
श्लोक 213 (padma.1.34.213)
श्राद्धं तत्तैर्थिकं प्रोक्तं पितॄणां तृप्तिदं परम्। कर्तव्यं तत्प्रयत्नेन भक्तिरेवात्र कारणम्॥
śrāddhaṁ tattairthikaṁ proktaṁ pitṝṇāṁ tṛptidaṁ param kartavyaṁ tatprayatnena bhaktirevātra kāraṇam
—यह तीर्थ-श्राद्ध कहलाता है, पितरों को परम तृप्ति देने वाला। यह पूर्ण प्रयत्न से करना चाहिए; इसमें भक्ति ही कारण है।
श्लोक 214 (padma.1.34.214)
भक्त्या तुष्यन्ति पितरस्तुष्टाः कामान्दिशन्ति ते। पुत्रं पौत्रं धनं धान्यं कामान्यान्मनसेच्छति॥
bhaktyā tuṣyanti pitarastuṣṭāḥ kāmāndiśanti te putraṁ pautraṁ dhanaṁ dhānyaṁ kāmānyānmanasecchati
भक्ति से पितर संतुष्ट होते हैं; संतुष्ट होकर वे मनोकामनाएँ देते हैं — पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, जो भी मन चाहे।
श्लोक 215 (padma.1.34.215)
भक्त्या चाराधितो दद्यान्नृणां प्रीतः पितामहः। अकालेप्यथ काले वा तीर्थे श्राद्धं सदा नरैः॥
bhaktyā cārādhito dadyānnṛṇāṁ prītaḥ pitāmahaḥ akālepyatha kāle vā tīrthe śrāddhaṁ sadā naraiḥ
भक्ति से आराधित होकर प्रसन्न पितामह मनुष्यों को देते हैं। असमय हो या समय पर, तीर्थ में मनुष्यों द्वारा सदा श्राद्ध—
श्लोक 216 (padma.1.34.216)
प्राप्तैरेव सदा स्नानं कर्तव्यं पितृतर्पणम्। पिंडदानं च कर्तव्यं पितॄणां चातिवल्लभम्॥
prāptaireva sadā snānaṁ kartavyaṁ pitṛtarpaṇam piṁḍadānaṁ ca kartavyaṁ pitṝṇāṁ cātivallabham
—प्राप्त होते ही स्नान और पितृ-तर्पण करना चाहिए। पिंडदान भी करना चाहिए, जो पितरों को अत्यंत प्रिय है।
श्लोक 217 (padma.1.34.217)
पितरो हि निरीक्षन्ते गोत्रजं समुपागतम्। आशया परया युक्ताः कांक्षंतस्सलिलं च ते॥
pitaro hi nirīkṣante gotrajaṁ samupāgatam āśayā parayā yuktāḥ kāṁkṣaṁtassalilaṁ ca te
पितर अपने गोत्रज (वंशज) के आने की प्रतीक्षा करते हैं; परम आशा से युक्त होकर वे जल की कामना करते हैं।
श्लोक 218 (padma.1.34.218)
विलम्बो नैव कर्तव्यो नैव विघ्नं समाचरेत्। अच्छिन्ना सन्ततिस्तेषां सदा कालं भविष्यति॥
vilambo naiva kartavyo naiva vighnaṁ samācaret acchinnā santatisteṣāṁ sadā kālaṁ bhaviṣyati
विलंब नहीं करना चाहिए, न कोई विघ्न लाना चाहिए। उनकी संतति कभी नहीं कटेगी, सदा-सर्वदा।
श्लोक 219 (padma.1.34.219)
पितरः पुत्रदातारं वृद्धिश्राद्धाभिकांक्षिणः। तेन ते सन्ततिच्छेदं न कुर्वन्ति हि कर्हिचित्॥
pitaraḥ putradātāraṁ vṛddhiśrāddhābhikāṁkṣiṇaḥ tena te santaticchedaṁ na kurvanti hi karhicit
पितर पुत्र देने वाले, वृद्धि और श्राद्ध की कामना करने वाले हैं। इसलिए वे कभी उनकी संतति का विच्छेद नहीं करते।
श्लोक 220 (padma.1.34.220)
अतः श्राद्धं पुरा प्रोक्तं स्वयमेव स्वयंभुवा। गुणोत्तरंतुयत्कार्यंद्विजैःपितृपरायणैः॥
ataḥ śrāddhaṁ purā proktaṁ svayameva svayaṁbhuvā guṇottaraṁtuyatkāryaṁdvijaiḥpitṛparāyaṇaiḥ
इसलिए स्वायंभुव ने स्वयं ही पहले श्राद्ध बताया। पितृ-परायण द्विजों को जो गुणोत्तर कार्य करना चाहिए—
श्लोक 221 (padma.1.34.221)
तीर्थे क्षेत्रे गृहे वापि संक्रांतौ ग्रहणेपि वा। विषुवे अयने चापि जन्मर्क्षे च प्रपीडिते॥
tīrthe kṣetre gṛhe vāpi saṁkrāṁtau grahaṇepi vā viṣuve ayane cāpi janmarkṣe ca prapīḍite
—तीर्थ में, क्षेत्र में, घर में, संक्रांति में, ग्रहण में भी, विषुव में, अयन में भी, तथा पीड़ित जन्म-नक्षत्र में—
श्लोक 222 (padma.1.34.222)
एतान्वै श्राद्धकालांस्तु पुरा स्वायंभुवोब्रवीत्। कृते श्राद्धे न वै पुंसां पीडा भवति देहजा॥
etānvai śrāddhakālāṁstu purā svāyaṁbhuvobravīt kṛte śrāddhe na vai puṁsāṁ pīḍā bhavati dehajā
—इन सब को श्राद्ध-कालों के रूप में पूर्वकाल में स्वायंभुव ने बताया। श्राद्ध किए जाने पर मनुष्यों को शरीर-जनित पीड़ा नहीं होती।
श्लोक 223 (padma.1.34.223)
तदा पुत्रकृतं वापि सर्वं त्यजति दुष्कृतम्। यथा न भविता पीडा ग्रहचोरनृपादिकात्॥
tadā putrakṛtaṁ vāpi sarvaṁ tyajati duṣkṛtam yathā na bhavitā pīḍā grahacoranṛpādikāt
तब पुत्र द्वारा किया गया वह श्राद्ध सारे पाप को त्याग देता है, जिससे ग्रह, चोर, राजा आदि से पीड़ा नहीं होगी।
श्लोक 224 (padma.1.34.224)
दुष्कृतं नश्यते सर्वं परत्र च गतिं शुभाम्। लभते नात्र सन्देहः प्रजापतिवचो यथा॥
duṣkṛtaṁ naśyate sarvaṁ paratra ca gatiṁ śubhām labhate nātra sandehaḥ prajāpativaco yathā
समस्त दुष्कर्म नष्ट हो जाता है, और परलोक में शुभ गति प्राप्त होती है — इसमें कोई संदेह नहीं, ऐसा प्रजापति का वचन है।
श्लोक 225 (padma.1.34.225)
कृते युगे पुष्कराणि त्रेतायां नैमिषं स्मृतम्। द्वापरे च कुरुक्षेत्रं कलौ गंगां समाश्रयेत्॥
kṛte yuge puṣkarāṇi tretāyāṁ naimiṣaṁ smṛtam dvāpare ca kurukṣetraṁ kalau gaṁgāṁ samāśrayet
सत्ययुग में पुष्कर श्रेष्ठ है, त्रेता में नैमिष स्मरण किया गया है। द्वापर में कुरुक्षेत्र, और कलियुग में गंगा का आश्रय लेना चाहिए।
श्लोक 226 (padma.1.34.226)
दुष्करः पुष्करे वासो दुष्करं पुष्करे तपः। यदन्यत्र कृतं पापं तीर्थे तद्याति लाघवम्॥
duṣkaraḥ puṣkare vāso duṣkaraṁ puṣkare tapaḥ yadanyatra kṛtaṁ pāpaṁ tīrthe tadyāti lāghavam
पुष्कर में वास दुष्कर है, पुष्कर में तप भी दुष्कर है। जो पाप अन्यत्र किया गया हो, वह इस तीर्थ में हलका हो जाता है।
श्लोक 227 (padma.1.34.227)
न तीर्थकृतमन्यत्र क्वचित्पापं व्यपोहति। सायंप्रातः स्मरेद्यस्तु पुष्कराणि कृताञ्जलि॥
na tīrthakṛtamanyatra kvacitpāpaṁ vyapohati sāyaṁprātaḥ smaredyastu puṣkarāṇi kṛtāñjali
परंतु तीर्थ में किया गया पाप कहीं भी दूर नहीं होता। जो प्रातः-सायं हाथ जोड़कर पुष्करों का स्मरण करता है—
श्लोक 228 (padma.1.34.228)
उपस्पृष्टं भवेत्तेन सर्वतीर्थेषु भारत। सायंप्रातरुपस्पृश्य पुष्करे नियतेन्द्रियः॥
upaspṛṣṭaṁ bhavettena sarvatīrtheṣu bhārata sāyaṁprātarupaspṛśya puṣkare niyatendriyaḥ
—हे भरत! उसके द्वारा सभी तीर्थों में स्पर्श किया हुआ माना जाता है। इंद्रियों को संयमित कर, प्रातः-सायं पुष्कर में स्पर्श करके—
श्लोक 229 (padma.1.34.229)
क्रतून्सर्वानवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति। द्वादशाब्दं द्वादशाहं मासं मासार्धमेव च॥
kratūnsarvānavāpnoti brahmalokaṁ ca gacchati dvādaśābdaṁ dvādaśāhaṁ māsaṁ māsārdhameva ca
—मनुष्य समस्त क्रतुओं (यज्ञों) को प्राप्त कर लेता है, और ब्रह्मलोक को जाता है। बारह वर्ष, बारह दिन, एक मास, या आधा मास—
श्लोक 230 (padma.1.34.230)
यो वसेत्पुष्करे नित्यं स गच्छेत्परमांगतिम्। सर्वेषामेवलोकानांब्रह्मलोकोपरिस्थितः॥
yo vasetpuṣkare nityaṁ sa gacchetparamāṁgatim sarveṣāmevalokānāṁbrahmalokoparisthitaḥ
—जो नित्य पुष्कर में निवास करता है, वह परम गति को जाता है — जो समस्त लोकों में ब्रह्मलोक से भी ऊपर स्थित है।
श्लोक 231 (padma.1.34.231)
यइच्छेत्पुष्करंगन्तुंसोनुसेवेतपुष्करम्। यथा लोमविलोमाभ्यां तथा व्यस्तसमस्तयोः॥
yaicchetpuṣkaraṁgantuṁsonusevetapuṣkaram yathā lomavilomābhyāṁ tathā vyastasamastayoḥ
जो पुष्कर जाना चाहे, उसे पुष्कर का निरंतर सेवन करना चाहिए, चाहे क्रम से हो या विपरीत क्रम से, पृथक् हो या समष्टि रूप से।
श्लोक 232 (padma.1.34.232)
स्नातस्तु पुष्करे सम्यक्कोट्याश्च फलमुश्नुते। विधिवत्क्रियमाणेषु सर्वतीर्थेषु यत्फलम्॥
snātastu puṣkare samyakkoṭyāśca phalamuśnute vidhivatkriyamāṇeṣu sarvatīrtheṣu yatphalam
पुष्कर में भली-भाँति स्नान किया हुआ व्यक्ति करोड़ों (यज्ञों) का फल पाता है। विधिपूर्वक किए गए समस्त तीर्थों में जो फल प्राप्त होता है—
श्लोक 233 (padma.1.34.233)
पुष्करालोकनादेव नरः प्राप्नोति तत्फलम्। दशकोटिसहस्राणि तीर्थानां वै महीतले॥
puṣkarālokanādeva naraḥ prāpnoti tatphalam daśakoṭisahasrāṇi tīrthānāṁ vai mahītale
—वह फल मनुष्य को केवल पुष्कर के दर्शन से ही प्राप्त हो जाता है। पृथ्वीतल पर दस हज़ार करोड़ तीर्थों की—
श्लोक 234 (padma.1.34.234)
सान्निध्यं पुष्करे तेषां त्रिसंध्यं कुरुनन्दन। यावत्तिष्ठंति गिरयो यावत्तिष्ठन्तिसागराः॥
sānnidhyaṁ puṣkare teṣāṁ trisaṁdhyaṁ kurunandana yāvattiṣṭhaṁti girayo yāvattiṣṭhantisāgarāḥ
—हे कुरुनंदन! उन सबकी सांनिध्यता पुष्कर में तीनों संध्याओं में रहती है। जब तक पर्वत रहेंगे, जब तक सागर रहेंगे—
श्लोक 235 (padma.1.34.235)
तावत्पुष्कर मृत्यूनां ब्रह्मलोको न संशयः। जन्मान्तरसहस्रैश्च आजन्ममरणांन्तिकम्॥
tāvatpuṣkara mṛtyūnāṁ brahmaloko na saṁśayaḥ janmāntarasahasraiśca ājanmamaraṇāṁntikam
—तब तक पुष्कर में मरने वालों को ब्रह्मलोक अवश्य मिलता है, इसमें संदेह नहीं। हज़ारों जन्मों में, जन्म से मृत्युपर्यंत—
श्लोक 236 (padma.1.34.236)
निर्दहेद्दुष्कृतं सर्वं सकृत्स्नात्वा तु पुष्करे। पुष्करं दुष्करं क्षेत्रं सर्वपापप्रणाशनम्॥
nirdahedduṣkṛtaṁ sarvaṁ sakṛtsnātvā tu puṣkare puṣkaraṁ duṣkaraṁ kṣetraṁ sarvapāpapraṇāśanam
—जो दुष्कर्म संचित हुआ हो, उसे पुष्कर में एक ही बार स्नान करके भस्म कर देता है। पुष्कर एक दुष्कर क्षेत्र है, समस्त पापों का नाश करने वाला।
श्लोक 237 (padma.1.34.237)
इदानीं शृणु मे राजन्पञ्चपातकनाशनम्। यजनं देवदेवस्य ब्रह्मपुत्र वसुप्रदम्॥
idānīṁ śṛṇu me rājanpañcapātakanāśanam yajanaṁ devadevasya brahmaputra vasupradam
अब, हे राजन्! मुझसे पाँच महापातकों का नाश करने वाला सुनो — देवदेव के यजन को, हे ब्रह्मपुत्र! जो धन देने वाला है।
श्लोक 238 (padma.1.34.238)
इह जन्मनि दारिद्र्य व्याधिकुष्ठादिपीडितः। अलक्ष्मीवानपुत्रस्तु यो भवेत्पुरुषो भुवि॥
iha janmani dāridrya vyādhikuṣṭhādipīḍitaḥ alakṣmīvānaputrastu yo bhavetpuruṣo bhuvi
इस जन्म में जो मनुष्य दरिद्रता, व्याधि, कुष्ठ आदि से पीड़ित हो, अलक्ष्मीवान् या पुत्रहीन हो—
श्लोक 239 (padma.1.34.239)
तस्य सद्यो भवेल्लक्ष्मीरायुः पूर्णं सुतास्सुखम्। कृत्वा तु मण्डलगतं लोकपालसमन्वितम्॥
tasya sadyo bhavellakṣmīrāyuḥ pūrṇaṁ sutāssukham kṛtvā tu maṇḍalagataṁ lokapālasamanvitam
—उसे शीघ्र ही लक्ष्मी, पूर्ण आयु, पुत्र-सुख प्राप्त होते हैं — मंडल में स्थित लोकपालों सहित—
श्लोक 240 (padma.1.34.240)
ब्रह्माणं तु परं देवं यः पश्यति विधानतः। पूजितं नवनाभेन मन्त्रमूर्तिमयो निजम्॥
brahmāṇaṁ tu paraṁ devaṁ yaḥ paśyati vidhānataḥ pūjitaṁ navanābhena mantramūrtimayo nijam
—परम देव ब्रह्मा को विधिपूर्वक जो देखता है, नवनाभ मंत्र-मूर्ति में पूजित अपने स्वरूप को—
श्लोक 241 (padma.1.34.241)
कार्तिके मासि शुक्लायां पौर्णमास्यां विशेषतः। सर्वासु वा यजेदेवं पूर्णिमासु विधानतः॥
kārtike māsi śuklāyāṁ paurṇamāsyāṁ viśeṣataḥ sarvāsu vā yajedevaṁ pūrṇimāsu vidhānataḥ
—कार्तिक मास की शुक्ल पूर्णिमा को विशेष रूप से, अथवा सभी पूर्णिमाओं में विधिपूर्वक ऐसी पूजा करे।
श्लोक 242 (padma.1.34.242)
संक्रान्तौ च महाबाहो चन्द्रसूर्यग्रहेपि वा। यः पश्यति विभुं देवं पूजितं गुरुणा नृप॥
saṁkrāntau ca mahābāho candrasūryagrahepi vā yaḥ paśyati vibhuṁ devaṁ pūjitaṁ guruṇā nṛpa
हे महाबाहो! संक्रांति में तथा चंद्र-सूर्य ग्रहण में भी, हे राजन्! जो गुरु द्वारा पूजित विभु देव को देखता है—
श्लोक 243 (padma.1.34.243)
तस्य सद्यो भवेत्तुष्टिः पापध्वंसश्च जायते। स मान्यो देवतानां च भवतीह नराधिप॥
tasya sadyo bhavettuṣṭiḥ pāpadhvaṁsaśca jāyate sa mānyo devatānāṁ ca bhavatīha narādhipa
—उसे तत्काल संतुष्टि प्राप्त होती है, और पाप-नाश होता है। हे नराधिप! वह इस लोक में देवताओं द्वारा भी मान्य होता है।
श्लोक 244 (padma.1.34.244)
ब्राह्मणक्षत्रियविशां भक्तानां तु परीक्षणम्। संवत्सरं गुरुः कुर्याज्जातिशौचक्रियादिभिः॥
brāhmaṇakṣatriyaviśāṁ bhaktānāṁ tu parīkṣaṇam saṁvatsaraṁ guruḥ kuryājjātiśaucakriyādibhiḥ
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य भक्तों की परीक्षा गुरु को एक वर्ष तक जाति, शौच और क्रिया आदि से करनी चाहिए।
श्लोक 245 (padma.1.34.245)
उपपन्नमिति ज्ञात्वा हृदये नावधारयेत्॥ तेपि भक्तियुता ध्यात्वा त्वाचार्यं परमेश्वरम्॥
upapannamiti jñātvā hṛdaye nāvadhārayet tepi bhaktiyutā dhyātvā tvācāryaṁ parameśvaram
योग्य जानकर उन्हें हृदय में धारण करना चाहिए। वे भी भक्तियुक्त होकर आचार्य को साक्षात् परमेश्वर मानकर—
श्लोक 246 (padma.1.34.246)
संवत्सरं गुरौ भक्तिं कुर्युर्विष्णौ यथा तथा। प्रसादयेयुश्च ततः पूर्णे संवत्सरे गुरुम्॥
saṁvatsaraṁ gurau bhaktiṁ kuryurviṣṇau yathā tathā prasādayeyuśca tataḥ pūrṇe saṁvatsare gurum
—एक वर्ष तक गुरु में विष्णु के समान भक्ति करते हुए, वर्ष पूर्ण होने पर गुरु को प्रसन्न करें।
श्लोक 247 (padma.1.34.247)
भगवंस्त्वत्प्रसादेन संसारार्णवतारणम्। परब्रह्मोपासनेन विरिंच्याराधनेन च॥
bhagavaṁstvatprasādena saṁsārārṇavatāraṇam parabrahmopāsanena viriṁcyārādhanena ca
'हे भगवन्! आपकी कृपा से हम संसार-सागर को पार करें। परब्रह्म की उपासना से तथा विरिंचि की आराधना से—'
श्लोक 248 (padma.1.34.248)
सहस्रशीर्षजप्येन मण्डलब्राह्मणेन च। ध्यानेन स्यात्तथास्माकमुपदेशः प्रदीयताम्॥
sahasraśīrṣajapyena maṇḍalabrāhmaṇena ca dhyānena syāttathāsmākamupadeśaḥ pradīyatām
'—सहस्रशीर्ष-जप से तथा ब्राह्मण-मंडल से, स्थिर ध्यान से हमें भी वह उपदेश दिया जाए।'
श्लोक 249 (padma.1.34.249)
इच्छामो वैदिकीं लक्ष्मीं विशेषेण प्रसीदताम्। अभ्यर्थितो गुरुस्त्वेवं मेधावी तैस्तदा ततः॥
icchāmo vaidikīṁ lakṣmīṁ viśeṣeṇa prasīdatām abhyarthito gurustvevaṁ medhāvī taistadā tataḥ
'हम वैदिक लक्ष्मी विशेष रूप से प्राप्त करना चाहते हैं; कृपा करें।' इस प्रकार बुद्धिमान् गुरु से जब वे प्रार्थना करें—
श्लोक 250 (padma.1.34.250)
यथाविधि समभ्यर्चेद्ब्रह्माणं विष्णुमग्रतः। ते बद्धनेत्राः स्वाप्यास्तु कार्तिकस्य चतुर्दशीम्॥
yathāvidhi samabhyarcedbrahmāṇaṁ viṣṇumagrataḥ te baddhanetrāḥ svāpyāstu kārtikasya caturdaśīm
—तब विधिपूर्वक विष्णु सहित ब्रह्मा की पूजा करे। वे नेत्र बाँधे, कार्तिक की चतुर्दशी की रात्रि को सोकर—
श्लोक 251 (padma.1.34.251)
ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्त्थाय बद्धपद्मासनास्तु ते। ध्यात्वा गुरुं सहस्रारे श्वेतवस्त्रोपवीतकम्॥
brāhme muhūrte cottthāya baddhapadmāsanāstu te dhyātvā guruṁ sahasrāre śvetavastropavītakam
—ब्राह्ममुहूर्त में उठकर, पद्मासन में बैठकर, सहस्रार में गुरु का श्वेत वस्त्र, यज्ञोपवीत सहित ध्यान करके—
श्लोक 252 (padma.1.34.252)
श्वेतमाल्यांबरधरं श्वेतगंधानुलेपनम्। निर्गम्य च बहिर्नद्यां कुर्युर्नित्यमतन्द्रिताः॥
śvetamālyāṁbaradharaṁ śvetagaṁdhānulepanam nirgamya ca bahirnadyāṁ kuryurnityamatandritāḥ
—श्वेत माला-वस्त्र धारण किए, श्वेत गंध से अनुलिप्त गुरु को ध्यान कर, बाहर नदी में जाकर नित्य अथक होकर—
श्लोक 253 (padma.1.34.253)
क्षीरवृक्षोत्थमाचार्यो दापयेद्दन्तधावनम्। ते च तं भक्षयेयुर्हि नदीं गत्वा समुद्रगाम्॥
kṣīravṛkṣotthamācāryo dāpayeddantadhāvanam te ca taṁ bhakṣayeyurhi nadīṁ gatvā samudragām
—आचार्य को दन्तधावन (दतवन) दूध-वृक्ष से बनवाना चाहिए। वे नदी में जाकर, समुद्रगामिनी नदी को प्राप्तकर उसे चबाएँ—
श्लोक 254 (padma.1.34.254)
इतरद्वा तटाकं वा गृहे वापि विधानतः। तद्भक्षयेयुर्मंत्रेण मंत्रितं परमेष्ठिनः॥
itaradvā taṭākaṁ vā gṛhe vāpi vidhānataḥ tadbhakṣayeyurmaṁtreṇa maṁtritaṁ parameṣṭhinaḥ
—अथवा किसी अन्य तालाब में, या घर में भी विधिपूर्वक। परमेष्ठी के मंत्र से मंत्रित करके उसे चबाना चाहिए।
श्लोक 255 (padma.1.34.255)
आपोहिष्ठेति मंत्रेण सप्तकृत्वोभिमंत्रितं। देवस्य त्वेति वै जप्त्वा युंजानेति करे न्यसेत्॥
āpohiṣṭheti maṁtreṇa saptakṛtvobhimaṁtritaṁ devasya tveti vai japtvā yuṁjāneti kare nyaset
'आपोहिष्ठा' मंत्र से सात बार अभिमंत्रित करके, 'देवस्य त्वा' कहकर जपकर, 'युंजाने' कहकर हाथ में रखना चाहिए।
श्लोक 256 (padma.1.34.256)
इरावत्येति प्रक्षाल्य ब्रह्मोदनेति वै मुखे। भक्षयित्वा क्षिपेद्दूरं पतितं च निरीक्षयेत्॥
irāvatyeti prakṣālya brahmodaneti vai mukhe bhakṣayitvā kṣipeddūraṁ patitaṁ ca nirīkṣayet
'इरावती' कहकर धोकर, 'ब्रह्मोदन' कहकर मुख में लेकर, चबाकर दूर फेंक देना चाहिए, और जहाँ गिरे वहाँ देखना चाहिए।
श्लोक 257 (padma.1.34.257)
सम्मुखं प्राङ्मुखं वापि विदिशं चापि वा गतम्। संमुखे देवतालब्धिर्मंत्रसिद्धिश्च जायते॥
sammukhaṁ prāṅmukhaṁ vāpi vidiśaṁ cāpi vā gatam saṁmukhe devatālabdhirmaṁtrasiddhiśca jāyate
सम्मुख, पूर्वाभिमुख, या विदिशा में गिरा हो — सम्मुख गिरने पर देवता-लाभ और मंत्र-सिद्धि होती है।
श्लोक 258 (padma.1.34.258)
पराङ्मुखे दंतकाष्ठे सर्वे देवाः पराङ्मुखाः। उत्तरेण गते तस्मिन्सिद्धिर्भवति वा न वा॥
parāṅmukhe daṁtakāṣṭhe sarve devāḥ parāṅmukhāḥ uttareṇa gate tasminsiddhirbhavati vā na vā
उलटी दिशा में गिरे तो समस्त देवता विमुख हो जाते हैं। उत्तर में गिरने पर सिद्धि होती है या नहीं भी होती।
श्लोक 259 (padma.1.34.259)
दक्षिणेन भवेन्मृत्युर्गुरोस्तस्य न संशयः। प्रेक्ष्याशुभं स्वपेद्भूमौ देवदेवस्य सन्निधौ॥
dakṣiṇena bhavenmṛtyurgurostasya na saṁśayaḥ prekṣyāśubhaṁ svapedbhūmau devadevasya sannidhau
दक्षिण में गिरने पर गुरु की मृत्यु होती है, इसमें संदेह नहीं। अशुभ देखकर देवदेव की सन्निधि में भूमि पर सो जाना चाहिए।
श्लोक 260 (padma.1.34.260)
स्वप्नान्दृष्ट्वा गुरोरग्रे श्रावयेयुर्विचक्षणाः। ततः शुभाशुभं तत्र लक्षयेत्परमो गुरुः॥
svapnāndṛṣṭvā guroragre śrāvayeyurvicakṣaṇāḥ tataḥ śubhāśubhaṁ tatra lakṣayetparamo guruḥ
बुद्धिमान् शिष्य स्वप्न देखकर उसे गुरु के सामने सुनाएँ। तब परम गुरु शुभ-अशुभ को पहचान लें।
श्लोक 261 (padma.1.34.261)
पौर्णमास्यामथ स्नात्वा ततो देवालयं व्रजेत्। गुरुश्च मंडलं भूमौ कल्पितायां तु वर्तयेत्॥
paurṇamāsyāmatha snātvā tato devālayaṁ vrajet guruśca maṁḍalaṁ bhūmau kalpitāyāṁ tu vartayet
फिर पूर्णिमा को स्नान करके देवालय जाना चाहिए। गुरु को भूमि पर तैयार किए गए मंडल पर—
श्लोक 262 (padma.1.34.262)
लक्षणैर्विविधैर्भूमिं लक्षयित्वा विधानतः। षोडशारं लिखेत्पद्मं नवधारमथापि वा॥
lakṣaṇairvividhairbhūmiṁ lakṣayitvā vidhānataḥ ṣoḍaśāraṁ likhetpadmaṁ navadhāramathāpi vā
—विविध लक्षणों से भूमि की जाँच कर विधिपूर्वक, सोलह आर वाला कमल लिखे, अथवा नौ आर वाला भी।
श्लोक 263 (padma.1.34.263)
अष्टपत्रमथो वापि लिखित्त्वा दर्शयेद्बुधः। नेत्रबंधं तु कुर्वीत सितवस्त्रेण यत्नतः॥
aṣṭapatramatho vāpi likhittvā darśayedbudhaḥ netrabaṁdhaṁ tu kurvīta sitavastreṇa yatnataḥ
अथवा आठ पंखुड़ियों वाला भी लिखकर विद्वान् उसे प्रकट करे। श्वेत वस्त्र से यत्नपूर्वक नेत्र-बंधन करना चाहिए।
श्लोक 264 (padma.1.34.264)
वर्णानुक्रमतः शिष्यान्पुष्पहस्तान्प्रवेशयेत्। नवनाभं यदा कुर्यान्मंडलं वर्णकैर्बुधः॥
varṇānukramataḥ śiṣyānpuṣpahastānpraveśayet navanābhaṁ yadā kuryānmaṁḍalaṁ varṇakairbudhaḥ
वर्णों के क्रम के अनुसार पुष्प-हस्त शिष्यों को प्रवेश कराना चाहिए। जब विद्वान् वर्णकों से नवनाभ मंडल बनाए—
श्लोक 265 (padma.1.34.265)
इंद्राणीपूर्वकं देवमिंद्रमैंद्र्यां तु पूजयेत्। लोकपालैः समं तद्वदग्निं संपूजयेन्नृप॥
iṁdrāṇīpūrvakaṁ devamiṁdramaiṁdryāṁ tu pūjayet lokapālaiḥ samaṁ tadvadagniṁ saṁpūjayennṛpa
—इंद्राणी-पूर्वक इंद्र देव की इंद्र-दिशा में पूजा करे। हे राजन्! उसी प्रकार लोकपालों सहित अग्नि की भी पूजा करे।
श्लोक 266 (padma.1.34.266)
दिशि वह्नेर्यमं याम्यां नैऋत्यां चैव निर्ऋतिम्। वरुणं वारुणाशायां वायुं वायव्यगोचरे॥
diśi vahneryamaṁ yāmyāṁ naiṛtyāṁ caiva nirṛtim varuṇaṁ vāruṇāśāyāṁ vāyuṁ vāyavyagocare
अग्नि की दिशा में यम को, याम्य दिशा में निर्ऋति को, वारुण दिशा में वरुण को, वायव्य दिशा में वायु को—
श्लोक 267 (padma.1.34.267)
धनदं चोत्तरे न्यस्य रुद्रमीशानगोचरे। कमंडलुं पूर्वतो हि स्रुचं वै दक्षिणे तथा॥
dhanadaṁ cottare nyasya rudramīśānagocare kamaṁḍaluṁ pūrvato hi srucaṁ vai dakṣiṇe tathā
—उत्तर में धनद (कुबेर) को स्थापित कर, ईशान दिशा में रुद्र को पूजे। पूर्व में कमंडलु, दक्षिण में स्रुक्—
श्लोक 268 (padma.1.34.268)
हंसं वै पश्चिमायां तु उत्तरायां स्रुवं तथा। आग्नेय्यां च ब्रसीं दद्यान्नैर्ऋत्यां पादुके तथा॥
haṁsaṁ vai paścimāyāṁ tu uttarāyāṁ sruvaṁ tathā āgneyyāṁ ca brasīṁ dadyānnairṛtyāṁ pāduke tathā
—पश्चिम में हंस, उत्तर में स्रुव रखे। आग्नेय में ब्रसी (यज्ञ-आसन), नैऋत्य में खड़ाऊँ—
श्लोक 269 (padma.1.34.269)
वायव्यां योगपट्टं च ऐशान्यां च गलंतिकाम्। विष्णुस्तु पूर्वतः पूज्यो दक्षिणे चापि शंकरः॥
vāyavyāṁ yogapaṭṭaṁ ca aiśānyāṁ ca galaṁtikām viṣṇustu pūrvataḥ pūjyo dakṣiṇe cāpi śaṁkaraḥ
—वायव्य में योगपट्ट, ईशान में जल-पात्र रखे। पूर्व में विष्णु पूज्य हैं, दक्षिण में शंकर—
श्लोक 270 (padma.1.34.270)
पश्चिमे तु रविर्देव ऋषयश्चोत्तरे तथा। मध्ये स्वयं पद्मजन्मा सावित्री दक्षिणे तथा॥
paścime tu ravirdeva ṛṣayaścottare tathā madhye svayaṁ padmajanmā sāvitrī dakṣiṇe tathā
—पश्चिम में सूर्य देव, उत्तर में ऋषिगण। मध्य में स्वयं पद्मजन्मा (ब्रह्मा), दक्षिण में सावित्री—
श्लोक 271 (padma.1.34.271)
उत्तरे चैव गायत्री देवी पद्मदलेक्षणा। ऋग्वेदं पूर्वतो न्यस्य यजुर्वेदं च दक्षिणे॥
uttare caiva gāyatrī devī padmadalekṣaṇā ṛgvedaṁ pūrvato nyasya yajurvedaṁ ca dakṣiṇe
—उत्तर में कमल-दल-नयन गायत्री देवी। पूर्व में ऋग्वेद, दक्षिण में यजुर्वेद—
श्लोक 272 (padma.1.34.272)
पश्चिमे सामवेदं च अथर्वं चोत्तरे तथा। इतिहासपुराणानिच्छंदोज्यौतिषमेवच॥
paścime sāmavedaṁ ca atharvaṁ cottare tathā itihāsapurāṇānicchaṁdojyautiṣamevaca
—पश्चिम में सामवेद, उत्तर में अथर्ववेद रखे। इतिहास-पुराण, छंद तथा ज्योतिष—
श्लोक 273 (padma.1.34.273)
धर्मशास्त्राणि चान्यानि इंद्रादि दिक्षु विन्यसेत्। पूर्वपत्रे बलं पूज्य प्रद्युम्नं दक्षिणे दले॥
dharmaśāstrāṇi cānyāni iṁdrādi dikṣu vinyaset pūrvapatre balaṁ pūjya pradyumnaṁ dakṣiṇe dale
—तथा अन्य धर्मशास्त्रों को इंद्र आदि की दिशाओं में स्थापित करे। पूर्व-पंखुड़ी में बल की पूजा करे, दक्षिण-दल में प्रद्युम्न की—
श्लोक 274 (padma.1.34.274)
पश्चिमे चानिरुद्धं च वासुदेवमथोत्तरे। पूर्वतो वामदेवं च सद्योजातं तु दक्षिणे॥
paścime cāniruddhaṁ ca vāsudevamathottare pūrvato vāmadevaṁ ca sadyojātaṁ tu dakṣiṇe
—पश्चिम में अनिरुद्ध, उत्तर में वासुदेव की। पूर्व में वामदेव, दक्षिण में सद्योजात—
श्लोक 275 (padma.1.34.275)
ईशानं पश्चिमे स्थाप्य तत्पुरुषं चोत्तरे तथा। अघोरस्सर्वतः पूज्य एषा पूजा तु मंडले॥
īśānaṁ paścime sthāpya tatpuruṣaṁ cottare tathā aghorassarvataḥ pūjya eṣā pūjā tu maṁḍale
—पश्चिम में ईशान स्थापित कर, उत्तर में तत्पुरुष रखे। अघोर की सर्वत्र पूजा करे — यह मंडल-पूजा है।
श्लोक 276 (padma.1.34.276)
पूर्वतो भास्करं पूज्य दक्षिणेन दिवाकरं। प्रभाकरं पश्चिमे तु ग्रहराजमथोत्तरे॥
pūrvato bhāskaraṁ pūjya dakṣiṇena divākaraṁ prabhākaraṁ paścime tu graharājamathottare
पूर्व में भास्कर की पूजा करे, दक्षिण में दिवाकर की। पश्चिम में प्रभाकर, उत्तर में ग्रहराज (चंद्र) की।
श्लोक 277 (padma.1.34.277)
एवं पूज्य विधानेन ब्रह्माणं परमेश्वरम्। दिङ्मंडले तु विन्यस्य अष्टौ कुंभान्विधानतः॥
evaṁ pūjya vidhānena brahmāṇaṁ parameśvaram diṅmaṁḍale tu vinyasya aṣṭau kuṁbhānvidhānataḥ
इस प्रकार विधिपूर्वक ब्रह्मा परमेश्वर की पूजा करके, दिक्-मंडल में विधिपूर्वक आठ कलश स्थापित करे।
श्लोक 278 (padma.1.34.278)
ब्राह्मं तु कलशं मध्ये नवमं तत्र कल्पयेत्। स्नापयेन्मुक्तिकामं तु ब्रह्मणो वै घटेन तु॥
brāhmaṁ tu kalaśaṁ madhye navamaṁ tatra kalpayet snāpayenmuktikāmaṁ tu brahmaṇo vai ghaṭena tu
मध्य में ब्राह्म कलश, नौवाँ वहाँ रखे। मोक्ष चाहने वाले को ब्रह्मा के कलश से स्नान कराए।
श्लोक 279 (padma.1.34.279)
श्रीकामं वैष्णवेनेह कलशेन तु पार्थिव। राज्यार्थिनं स्नापयेच्च ऐंद्रेण कलशेन तु॥
śrīkāmaṁ vaiṣṇaveneha kalaśena tu pārthiva rājyārthinaṁ snāpayecca aiṁdreṇa kalaśena tu
हे राजन्! श्री चाहने वाले को वैष्णव कलश से स्नान कराए। राज्य चाहने वाले को ऐंद्र कलश से स्नान कराए।
श्लोक 280 (padma.1.34.280)
द्रव्यप्रतापकामं तु आग्नेय घटवारिणा। मृत्युंजयविधानाय याम्येन स्नापयेन्नरम्॥
dravyapratāpakāmaṁ tu āgneya ghaṭavāriṇā mṛtyuṁjayavidhānāya yāmyena snāpayennaram
धन और प्रताप चाहने वाले को आग्नेय कलश के जल से; मृत्युंजय-सिद्धि के लिए याम्य कलश से स्नान कराना चाहिए।
श्लोक 281 (padma.1.34.281)
दुष्टप्रध्वंसनायालं नैर्ऋतेन विधीयते। स्नापयेद्वारुणेनाशु पापनाशाय मानवं॥
duṣṭapradhvaṁsanāyālaṁ nairṛtena vidhīyate snāpayedvāruṇenāśu pāpanāśāya mānavaṁ
दुष्टों के नाश के लिए नैर्ऋत कलश विधान है। पाप-नाश के लिए वारुण कलश से शीघ्र स्नान कराना चाहिए।
श्लोक 282 (padma.1.34.282)
शरीरारोग्यकामं तु वायव्येनाभिषेचयेत्। द्रव्यसंपत्तिकामस्य कौबेरेण विधीयते॥
śarīrārogyakāmaṁ tu vāyavyenābhiṣecayet dravyasaṁpattikāmasya kaubereṇa vidhīyate
शरीर के आरोग्य के लिए वायव्य कलश से अभिषेक करे। धन-संपत्ति की इच्छा वाले के लिए कौबेर कलश विधान है।
श्लोक 283 (padma.1.34.283)
रौद्रेण ज्ञानकामस्य लोकपालघटास्त्विमे। एकैकेन नरः स्नात्वा सर्वदोषविवर्जितः॥
raudreṇa jñānakāmasya lokapālaghaṭāstvime ekaikena naraḥ snātvā sarvadoṣavivarjitaḥ
ज्ञान चाहने वाले के लिए रौद्र कलश — ये लोकपालों के कलश हैं। इनमें से एक-एक से स्नान करने पर मनुष्य समस्त दोषों से रहित होकर—
श्लोक 284 (padma.1.34.284)
जायते ब्रह्मसदृशो राजासद्योऽथ वा नरः। अथवा दिक्षु सर्वासु यथासंख्येन लोकपान्॥
jāyate brahmasadṛśo rājāsadyo'tha vā naraḥ athavā dikṣu sarvāsu yathāsaṁkhyena lokapān
—ब्रह्मा के समान हो जाता है, या तुरंत राजा बन जाता है। अथवा समस्त दिशाओं में यथासंख्य लोकपालों को—
श्लोक 285 (padma.1.34.285)
पूजयेत्तु स्वनाम्ना तु कुंभैरेव विधानतः। एवं संपूज्य देवांस्तु लोकपालान्प्रसन्नधीः॥
pūjayettu svanāmnā tu kuṁbhaireva vidhānataḥ evaṁ saṁpūjya devāṁstu lokapālānprasannadhīḥ
—अपने-अपने नाम से कलशों द्वारा विधिपूर्वक पूजे। इस प्रकार देवताओं और लोकपालों की पूजा कर, प्रसन्नबुद्धि होकर—
श्लोक 286 (padma.1.34.286)
पश्चात्परीक्षितान्शिष्यान्बद्धनेत्रान्प्रवेशयेत्। दग्ध्वाग्नेय्या धारणया वायुना विधुनेत्ततः॥
paścātparīkṣitānśiṣyānbaddhanetrānpraveśayet dagdhvāgneyyā dhāraṇayā vāyunā vidhunettataḥ
—फिर परीक्षित शिष्यों को, जिनकी आँखें बँधी हों, प्रवेश कराए। आग्नेय धारणा से दग्ध कर, वायु से हिलाकर—
श्लोक 287 (padma.1.34.287)
सोमेनाप्यायितान्कृत्वा श्रावयेत्समयांस्ततः। न निंद्याद्ब्राह्मणान्देवान्विष्णुं ब्रह्माणमेव च॥
somenāpyāyitānkṛtvā śrāvayetsamayāṁstataḥ na niṁdyādbrāhmaṇāndevānviṣṇuṁ brahmāṇameva ca
—सोम से तृप्त कर, फिर उन्हें संकल्प (व्रत-नियम) सुनाए: ब्राह्मणों, देवों, विष्णु और ब्रह्मा की निंदा न करें—
श्लोक 288 (padma.1.34.288)
इंद्रमादित्यमग्निं च लोकपालान्ग्रहांस्तथा॥ गुरुं च ब्राह्मणं वापि मुनींद्रं पूर्वदीक्षितम्॥
iṁdramādityamagniṁ ca lokapālāngrahāṁstathā guruṁ ca brāhmaṇaṁ vāpi munīṁdraṁ pūrvadīkṣitam
—इंद्र, आदित्य, अग्नि, लोकपालों तथा ग्रहों की, गुरु या ब्राह्मण की, अथवा पहले दीक्षित मुनींद्र की भी निंदा न करें।
श्लोक 289 (padma.1.34.289)
एवं तु समयान्श्राव्य पश्चाद्धोमं तु कारयेत्। ऊँ नमो भगवते ब्रह्मणे सर्वरूपिणे हुंफट्स्वाहा॥
evaṁ tu samayānśrāvya paścāddhomaṁ tu kārayet ū~ namo bhagavate brahmaṇe sarvarūpiṇe huṁphaṭsvāhā
इस प्रकार व्रत सुनाकर फिर होम कराए: 'ॐ नमो भगवते ब्रह्मणे सर्वरूपिणे हुं फट् स्वाहा'।
श्लोक 290 (padma.1.34.290)
षोडशाक्षरमंत्रेण होमयेज्ज्वलितेनले। गर्भाधानादिकाः सर्वा आहुतीस्संप्रदापयेत्॥
ṣoḍaśākṣaramaṁtreṇa homayejjvalitenale garbhādhānādikāḥ sarvā āhutīssaṁpradāpayet
इस सोलह-अक्षर मंत्र से प्रज्वलित अग्नि में होम कराए। गर्भाधान आदि सभी संस्कारों की आहुतियाँ दिलवाए।
श्लोक 291 (padma.1.34.291)
तिसृभिस्तु व्याहृतिभिर्देवदेवस्य सन्निधौ। होमांते दीक्षितः पश्चाद्दापयेद्गुरुदक्षिणाम्॥
tisṛbhistu vyāhṛtibhirdevadevasya sannidhau homāṁte dīkṣitaḥ paścāddāpayedgurudakṣiṇām
देवदेव की उपस्थिति में तीन व्याहृतियों (भूः भुवः स्वः) से। होम के अंत में दीक्षित शिष्य को गुरु-दक्षिणा दिलवानी चाहिए।
श्लोक 292 (padma.1.34.292)
हस्त्यश्वयानशकटहेमधान्यादिकं नृप। दापयेद्गुरवे प्राज्ञो मध्यमे मध्यमं तथा॥
hastyaśvayānaśakaṭahemadhānyādikaṁ nṛpa dāpayedgurave prājño madhyame madhyamaṁ tathā
हे राजन्! हाथी, घोड़ा, वाहन, गाड़ी, सोना, धान्य आदि। बुद्धिमान् शिष्य श्रेष्ठ गुरु को श्रेष्ठ, मध्यम को मध्यम—
श्लोक 293 (padma.1.34.293)
दापयेदपरे युग्मं सहिरण्यं तु तद्गुरोः। एवं कृते तु यत्पुण्यं महत्संजायते तथा॥
dāpayedapare yugmaṁ sahiraṇyaṁ tu tadguroḥ evaṁ kṛte tu yatpuṇyaṁ mahatsaṁjāyate tathā
—और अन्य को स्वर्ण सहित युग्म (जोड़ा) गुरु को देना चाहिए। इस प्रकार करने से जो महान् पुण्य उत्पन्न होता है—
श्लोक 294 (padma.1.34.294)
तन्न शक्यं निगदितुमपि वर्षशतैरपि। दीक्षितोथ पुरा भूत्वा पाद्मं वै शृणुयाद्यदि॥
tanna śakyaṁ nigaditumapi varṣaśatairapi dīkṣitotha purā bhūtvā pādmaṁ vai śṛṇuyādyadi
—वह सौ वर्षों में भी कहा नहीं जा सकता। पूर्व में दीक्षित होकर यदि कोई पद्म पुराण को सुने—
श्लोक 295 (padma.1.34.295)
तेन वेदाः पुराणानि सर्वमंत्रास्ससंग्रहाः। जप्तास्स्युः पुष्करे तीर्थे प्रयागे सिंधुसागरे॥
tena vedāḥ purāṇāni sarvamaṁtrāssasaṁgrahāḥ japtāssyuḥ puṣkare tīrthe prayāge siṁdhusāgare
—तो उससे वेद, पुराण, तथा समस्त मंत्र समुदाय सहित पुष्कर तीर्थ में, प्रयाग में, सिंधु-सागर में—
श्लोक 296 (padma.1.34.296)
देवह्रदे कुरुक्षेत्रे वाराणस्यां विशेषतः। ग्रहणे विषुवे चैव यत्फलं जपतां भवेत्॥
devahrade kurukṣetre vārāṇasyāṁ viśeṣataḥ grahaṇe viṣuve caiva yatphalaṁ japatāṁ bhavet
—देवह्रद में, कुरुक्षेत्र में, वाराणसी में विशेष रूप से जपे जाने पर जो फल प्राप्त होता है—
श्लोक 297 (padma.1.34.297)
फलं शतगुणं तच्च पुष्करस्थं पितामहम्। दृष्ट्वा प्राप्नोति विविधान्कामान्कामयते यदि॥
phalaṁ śataguṇaṁ tacca puṣkarasthaṁ pitāmaham dṛṣṭvā prāpnoti vividhānkāmānkāmayate yadi
—ग्रहण में, विषुव में जो फल जप करने वालों को प्राप्त होता है — उससे सौ गुना फल पुष्करस्थित पितामह के दर्शन से प्राप्त होता है, यदि वह अपनी इच्छित कामनाएँ चाहे।
श्लोक 298 (padma.1.34.298)
पूजां वैधानिकीं कृत्वा दीक्षितो यः शृणोति च। देवा अपि तपः कृत्वा ध्यायंति च वदन्ति च॥
pūjāṁ vaidhānikīṁ kṛtvā dīkṣito yaḥ śṛṇoti ca devā api tapaḥ kṛtvā dhyāyaṁti ca vadanti ca
जो दीक्षित होकर, वैधानिक पूजा करके इसे सुनता है — देवगण भी तप करके इसका ध्यान करते हैं और कहते हैं—
श्लोक 299 (padma.1.34.299)
कदा मे भारते वर्षे जन्म स्यादिति पार्थिव। दीक्षिताश्च भविष्यामः पाद्मं श्रोष्यामहे कदा॥
kadā me bhārate varṣe janma syāditi pārthiva dīkṣitāśca bhaviṣyāmaḥ pādmaṁ śroṣyāmahe kadā
—'हे पार्थिव! कब हमारा जन्म भारतवर्ष में होगा? हम कब दीक्षित होंगे? हम पद्म पुराण को कब सुनेंगे?'
श्लोक 300 (padma.1.34.300)
पाद्मं तु षोडशात्मानं न्यस्य देहे कदा वयम्। यास्यामस्तु परं स्थानं यद्गत्वा न पुनर्भवेत्॥
pādmaṁ tu ṣoḍaśātmānaṁ nyasya dehe kadā vayam yāsyāmastu paraṁ sthānaṁ yadgatvā na punarbhavet
—'पद्म पुराण के सोलह अंगों को शरीर में कब स्थापित करेंगे? हम उस परम स्थान को कब जाएँगे, जहाँ जाकर पुनर्जन्म नहीं होता?'
श्लोक 301 (padma.1.34.301)
एवं जल्पंति विबुधा मनसा चिंतयंति च। ब्रह्मयज्ञं च कार्तिक्यां कदा द्रक्ष्यामहे नृप॥
evaṁ jalpaṁti vibudhā manasā ciṁtayaṁti ca brahmayajñaṁ ca kārtikyāṁ kadā drakṣyāmahe nṛpa
इस प्रकार देवगण मन से बातें करते और चिंतन करते हैं। हे राजन्! 'हम कार्तिकी में ब्रह्म-यज्ञ को कब देखेंगे?'
श्लोक 302 (padma.1.34.302)
एवं ते विधिरुद्दिष्टो मयायं कुरुसत्तम। देवगंधर्वयक्षाणां सर्वदा दुर्लभो ह्यसौ॥
evaṁ te vidhiruddiṣṭo mayāyaṁ kurusattama devagaṁdharvayakṣāṇāṁ sarvadā durlabho hyasau
हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार यह विधि मेरे द्वारा तुम्हें बताई गई है — जो देवों, गंधर्वों और यक्षों के लिए भी सदा दुर्लभ है।
श्लोक 303 (padma.1.34.303)
एवं यो वेत्ति तत्त्वेन यश्च पश्यति मंडलम्। यश्चेमं शृणुयाच्चैव सर्वे मुक्ता इति श्रुतिः॥
evaṁ yo vetti tattvena yaśca paśyati maṁḍalam yaścemaṁ śṛṇuyāccaiva sarve muktā iti śrutiḥ
जो इसे तत्त्वतः जानता है, और जो मंडल को देखता है, और जो इसे सुनता है — ये सभी मुक्त होते हैं, ऐसा श्रुति-वचन है।
श्लोक 304 (padma.1.34.304)
अतः परं प्रवक्ष्यामि रहस्यमिदमुत्तमम्। येन लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिश्चापि भवेन्नृणाम्॥
ataḥ paraṁ pravakṣyāmi rahasyamidamuttamam yena lakṣmīrdhṛtistuṣṭiḥ puṣṭiścāpi bhavennṛṇām
अब इससे आगे मैं यह उत्तम रहस्य बताता हूँ, जिससे मनुष्यों को लक्ष्मी, धृति, तुष्टि तथा पुष्टि प्राप्त होती है।
श्लोक 305 (padma.1.34.305)
सर्वे ग्रहास्सदा सौम्या जायंते येन पार्थिव। आदित्यवारं हस्तेन पूर्वमादाय भक्तितः॥
sarve grahāssadā saumyā jāyaṁte yena pārthiva ādityavāraṁ hastena pūrvamādāya bhaktitaḥ
हे राजन्! जिससे समस्त ग्रह सदा सौम्य हो जाते हैं। रविवार को भक्तिपूर्वक पहले हाथ में लेकर—
श्लोक 306 (padma.1.34.306)
भक्तैकेन क्षिपेत्तावद्यावत्सप्त च संख्यया। ततस्तु सप्तमे पूर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम्॥
bhaktaikena kṣipettāvadyāvatsapta ca saṁkhyayā tatastu saptame pūrṇe kuryādbrāhmaṇabhojanam
—भक्तिपूर्वक ही तब तक फेंकते रहे जब तक संख्या सात हो जाए। फिर सातवाँ पूर्ण होने पर ब्राह्मण-भोजन कराए।
श्लोक 307 (padma.1.34.307)
आदित्यं चैव सौवर्णं कृत्वा यत्नेन मानवः। रक्तवस्त्रयुगच्छन्नं छत्रिकां पादुके तथा॥
ādityaṁ caiva sauvarṇaṁ kṛtvā yatnena mānavaḥ raktavastrayugacchannaṁ chatrikāṁ pāduke tathā
यत्नपूर्वक सूर्य की स्वर्ण-प्रतिमा बनाकर, लाल वस्त्र-युगल से ढँककर, छाता, दोनों खड़ाऊँ—
श्लोक 308 (padma.1.34.308)
उपानहौ च दातव्ये स्थापयेत्ताम्रभाजने। घृतेन स्नपनं कृत्वा संपूर्णांग द्विजातये॥
upānahau ca dātavye sthāpayettāmrabhājane ghṛtena snapanaṁ kṛtvā saṁpūrṇāṁga dvijātaye
—और जूतियाँ भी देकर, ताँबे के पात्र में स्थापित करके, घी से स्नान कराकर, संपूर्ण अंगों सहित द्विज को—
श्लोक 309 (padma.1.34.309)
दापयेत्कृत्यविदुषे ब्राह्मणाय विशेषतः। एवं कृतौ फलं तस्य भवेदारोग्यमुत्तमम्॥
dāpayetkṛtyaviduṣe brāhmaṇāya viśeṣataḥ evaṁ kṛtau phalaṁ tasya bhavedārogyamuttamam
—कर्म-विद्या-निपुण विशेष ब्राह्मण को दान करना चाहिए। ऐसा करने पर उसका फल उत्तम आरोग्य होता है—
श्लोक 310 (padma.1.34.310)
द्रव्यसंपत्समग्राप्तिरिति पौराणिकी क्रिया। अविसंवादिनी चेयं शांति पुष्टिप्रदा नृणाम्॥
dravyasaṁpatsamagrāptiriti paurāṇikī kriyā avisaṁvādinī ceyaṁ śāṁti puṣṭipradā nṛṇām
—और धन-संपत्ति की पूर्ण प्राप्ति, ऐसी पौराणिक क्रिया है। यह अविफल है, मनुष्यों को शांति और पुष्टि देने वाली है।
श्लोक 311 (padma.1.34.311)
तद्वच्चित्रासु संगृह्य सोमवारं विचक्षणः। रात्रिभक्षः क्षिपेदष्टौ सोमवारान्प्रयत्नतः॥
tadvaccitrāsu saṁgṛhya somavāraṁ vicakṣaṇaḥ rātribhakṣaḥ kṣipedaṣṭau somavārānprayatnataḥ
उसी प्रकार बुद्धिमान् व्यक्ति चित्रा नक्षत्र में सोमवार को संग्रह करके, रात्रि-भोजन करके, यत्नपूर्वक आठ सोमवार तक फेंकते रहे।
श्लोक 312 (padma.1.34.312)
प्रत्येकं ब्राह्मणा भोज्या यथाशक्ति विचक्षणाः। नवमे तु ततः पूर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम्॥
pratyekaṁ brāhmaṇā bhojyā yathāśakti vicakṣaṇāḥ navame tu tataḥ pūrṇe kuryādbrāhmaṇabhojanam
प्रत्येक बार बुद्धिमान् लोगों को यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिए। फिर नौवाँ पूर्ण होने पर ब्राह्मण-भोजन कराए—
श्लोक 313 (padma.1.34.313)
वस्त्रयुग्मं च दातव्यं ततः सोमं प्रदापयेत्। कांस्यभाजनसंस्थं तु क्षीरसंपूरितं ततः॥
vastrayugmaṁ ca dātavyaṁ tataḥ somaṁ pradāpayet kāṁsyabhājanasaṁsthaṁ tu kṣīrasaṁpūritaṁ tataḥ
—और वस्त्र-युगल देना चाहिए, फिर चंद्रमा (की प्रतिमा) देनी चाहिए — काँसे के पात्र में स्थापित, दूध से भरी हुई—
श्लोक 314 (padma.1.34.314)
तद्वच्छत्रं पादुके च तथोपानत्समन्वितम्। संपूर्णांगाय दातव्यं ब्राह्मणाय विशेषतः॥
tadvacchatraṁ pāduke ca tathopānatsamanvitam saṁpūrṇāṁgāya dātavyaṁ brāhmaṇāya viśeṣataḥ
—इसी प्रकार छाता, दोनों खड़ाऊँ तथा जूतियाँ सहित संपूर्ण अंगों वाली प्रतिमा विशेष रूप से ब्राह्मण को देनी चाहिए।
श्लोक 315 (padma.1.34.315)
स्वात्यामंगारकं पूज्य क्षपयेन्नक्तभोजनैः। अष्टावेवं च यावच्च कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम्॥
svātyāmaṁgārakaṁ pūjya kṣapayennaktabhojanaiḥ aṣṭāvevaṁ ca yāvacca kuryādbrāhmaṇabhojanam
स्वाति नक्षत्र में मंगल को पूजकर, रात्रि-भोजन से आठ बार क्षय करे — इस प्रकार आठ बार करके ब्राह्मण-भोजन कराए।
श्लोक 316 (padma.1.34.316)
अंगारकं च सौवर्णं स्थापितं ताम्रभाजने। दापयेद्ब्राह्मणायाथ संपूर्णांगाय चैव हि॥
aṁgārakaṁ ca sauvarṇaṁ sthāpitaṁ tāmrabhājane dāpayedbrāhmaṇāyātha saṁpūrṇāṁgāya caiva hi
स्वर्ण से बना मंगल-प्रतिमा ताँबे के पात्र में स्थापित करके, संपूर्ण अंगों सहित ब्राह्मण को ही देनी चाहिए।
श्लोक 317 (padma.1.34.317)
नक्षत्रानुक्रमेणैव क्षिपेन्नक्तानि सप्त वै। अष्टमे तु क्रमात्खेटान्सौवर्णान्दापयेद्बुधः॥
nakṣatrānukrameṇaiva kṣipennaktāni sapta vai aṣṭame tu kramātkheṭānsauvarṇāndāpayedbudhaḥ
नक्षत्रों के क्रम से ही सात रात्रि-भोजन करते हुए फेंकना चाहिए। आठवें दिन क्रमशः ग्रहों की स्वर्ण-प्रतिमाएँ विद्वान् को देनी चाहिए।
श्लोक 318 (padma.1.34.318)
अग्निकार्यं च कुर्वीत यथादृष्टं विधानतः। एवं कृते भवेद्यद्वै तन्निबोध नराधिप॥
agnikāryaṁ ca kurvīta yathādṛṣṭaṁ vidhānataḥ evaṁ kṛte bhavedyadvai tannibodha narādhipa
अग्नि-कार्य भी यथादृष्ट विधि से करना चाहिए। हे नराधिप! ऐसा करने से जो होता है, वह सुनो।
श्लोक 319 (padma.1.34.319)
असौम्याश्च ग्रहास्सर्वे सौम्यरूपा भवंति च॥ सर्वे रोगा विनश्यन्ति तुष्टिमायान्ति देवताः॥
asaumyāśca grahāssarve saumyarūpā bhavaṁti ca sarve rogā vinaśyanti tuṣṭimāyānti devatāḥ
समस्त अशुभ ग्रह भी शुभ रूप वाले हो जाते हैं। समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं, देवता संतुष्ट होते हैं।
श्लोक 320 (padma.1.34.320)
न विरुन्धन्ति तं नागाः पितरस्तर्पितास्तथा। दुस्स्वप्ननाशो भवति शृण्वतां पठतां तथा॥
na virundhanti taṁ nāgāḥ pitarastarpitāstathā dussvapnanāśo bhavati śṛṇvatāṁ paṭhatāṁ tathā
नाग उसे बाधा नहीं पहुँचाते, तथा पितर तृप्त हो जाते हैं। सुनने वालों तथा पढ़ने वालों का बुरा स्वप्न नष्ट हो जाता है।
श्लोक 321 (padma.1.34.321)
यदि भौमो रविसुतो भास्करो राहुणा सह। केतुश्च मूर्ध्नि तिष्ठंति रौद्राः पीडाकरा ग्रहाः॥
yadi bhaumo ravisuto bhāskaro rāhuṇā saha ketuśca mūrdhni tiṣṭhaṁti raudrāḥ pīḍākarā grahāḥ
यदि मंगल, सूर्यपुत्र शनि, राहु और भास्कर, तथा केतु — ये रौद्र पीड़ादायक ग्रह मस्तक पर स्थित हों—
श्लोक 322 (padma.1.34.322)
अनेन कृतमात्रेण ससौभाग्या भवंति हि। य एवं कुरुते राजन्सदाभक्तिसमन्वितः॥
anena kṛtamātreṇa sasaubhāgyā bhavaṁti hi ya evaṁ kurute rājansadābhaktisamanvitaḥ
—यह करने मात्र से ही वे सौभाग्यशाली हो जाते हैं। हे राजन्! जो कोई सदा भक्तियुक्त होकर इसे करता है—
श्लोक 323 (padma.1.34.323)
तस्य सानुग्रहाः सर्वे शांतिं यच्छंति नान्यथा। शनैश्चरं राहुकेतू लोहपात्रेषु विन्यसेत्॥
tasya sānugrahāḥ sarve śāṁtiṁ yacchaṁti nānyathā śanaiścaraṁ rāhuketū lohapātreṣu vinyaset
—उसके प्रति सभी ग्रह अनुगृहीत होकर शांति ही देते हैं, अन्यथा नहीं। शनि, राहु और केतु को लौह-पात्रों में रखना चाहिए—
श्लोक 324 (padma.1.34.324)
लोहेन कारयेच्चैनान्ब्राह्मणेभ्यश्च दापयेत्। कृष्णं वस्त्रयुगं देयमेतेषां प्रीणनाय वै॥
lohena kārayeccainānbrāhmaṇebhyaśca dāpayet kṛṣṇaṁ vastrayugaṁ deyameteṣāṁ prīṇanāya vai
—और लोहे से ही इनकी प्रतिमाएँ बनवाकर ब्राह्मणों को देनी चाहिए। इन्हें प्रसन्न करने के लिए काला वस्त्र-युगल देना चाहिए।
श्लोक 325 (padma.1.34.325)
सौवर्णां गाश्च दातव्याः शांतिश्रीविजयेप्सुभिः। व्रतांते सर्व एते हि ग्रहास्सौवर्णका नृप॥
sauvarṇāṁ gāśca dātavyāḥ śāṁtiśrīvijayepsubhiḥ vratāṁte sarva ete hi grahāssauvarṇakā nṛpa
जो शांति, श्री और विजय चाहते हैं, उन्हें स्वर्ण-गौएँ दान करनी चाहिए। हे राजन्! व्रत के अंत में ये सभी ग्रह स्वर्णमय होकर—
श्लोक 326 (padma.1.34.326)
दातव्याः शांतिमिच्छद्भिर्व्रतांते द्विजभोजनम्। यथाशक्ति दक्षिणा च ग्रहाणां प्रीतये तथा॥
dātavyāḥ śāṁtimicchadbhirvratāṁte dvijabhojanam yathāśakti dakṣiṇā ca grahāṇāṁ prītaye tathā
—शांति चाहने वालों को व्रत के अंत में द्विज-भोजन करना चाहिए, यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिए — यह सब ग्रहों की प्रीति के लिए है।
श्लोक 327 (padma.1.34.327)
अल्पायासेन राजेंद्र सर्वान्कामानवाप्नुयात्। शंकराज्ज्ञानमन्विच्छेदारोग्यं भास्करात्तथा॥
alpāyāsena rājeṁdra sarvānkāmānavāpnuyāt śaṁkarājjñānamanvicchedārogyaṁ bhāskarāttathā
हे राजेंद्र! इससे अल्प प्रयास में ही समस्त कामनाएँ प्राप्त होती हैं। शंकर से ज्ञान की, सूर्य से आरोग्य की कामना करनी चाहिए—
श्लोक 328 (padma.1.34.328)
हुताशनाद्धनमिच्छेद्गतिमिच्छेज्जनार्दनात् । ॥ ब्राह्म्यं पितामहाच्चैव सर्वजन्तुप्रशांतिदम्॥
hutāśanāddhanamicchedgatimicchejjanārdanāt brāhmyaṁ pitāmahāccaiva sarvajantupraśāṁtidam
—अग्नि से धन की कामना, जनार्दन से गति की कामना करनी चाहिए। पितामह से ब्राह्म्य (ब्रह्म-पद) की, जो समस्त प्राणियों को शांति देने वाला है।
श्लोक 329 (padma.1.34.329)
भीष्म उवाच॥ यस्त्वया कथितो यज्ञो यज्वनां तु फलं महत्। तथायुषस्स्वल्पतया अन्यैः प्राप्तुं न शक्यते॥
bhīṣma uvāca yastvayā kathito yajño yajvanāṁ tu phalaṁ mahat tathāyuṣassvalpatayā anyaiḥ prāptuṁ na śakyate
भीष्म ने कहा — आपने जो यज्ञ बताया, वह यज्ञ करने वालों को महान् फल देने वाला है; परंतु आयु की अल्पता के कारण अन्य लोगों द्वारा उसे प्राप्त करना संभव नहीं है।
श्लोक 330 (padma.1.34.330)
स्वल्यायासेन यत्पुण्यं संवत्सरमुपोषजम्। भवेत्तन्मे मुनिश्रेष्ठ कथयस्व महाफलम्॥
svalyāyāsena yatpuṇyaṁ saṁvatsaramupoṣajam bhavettanme muniśreṣṭha kathayasva mahāphalam
अल्प प्रयास से जो पुण्य एक वर्ष के उपवास के बराबर हो, हे मुनिश्रेष्ठ, वह महान् फल देने वाला मुझे बताइए।
श्लोक 331 (padma.1.34.331)
पुलस्त्य उवाच॥ इदमर्थं महाराज श्वेतो राजा महायशाः। वसिष्ठं पृष्टवान्प्रश्नं क्षुधया पीडितो भृशम्॥
pulastya uvāca idamarthaṁ mahārāja śveto rājā mahāyaśāḥ vasiṣṭhaṁ pṛṣṭavānpraśnaṁ kṣudhayā pīḍito bhṛśam
पुलस्त्य ने कहा — इसी विषय पर, हे महाराज, अत्यंत यशस्वी राजा श्वेत ने भूख से अत्यंत पीड़ित होकर वसिष्ठ से प्रश्न पूछा था।
श्लोक 332 (padma.1.34.332)
आसीदिलावृते वर्षे श्वेतो राजा महाबलः। स महीं सकलां जिग्ये सप्तद्वीपां सपत्तनाम्॥
āsīdilāvṛte varṣe śveto rājā mahābalaḥ sa mahīṁ sakalāṁ jigye saptadvīpāṁ sapattanām
इलावृत वर्ष में महाबली राजा श्वेत रहते थे। उन्होंने नगरों सहित सप्तद्वीप वाली संपूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था।
श्लोक 333 (padma.1.34.333)
ब्रह्मपुत्रो वसिष्ठश्च आसीत्तस्य पुरोहितः। स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो जित्वा परमधार्मिकः॥
brahmaputro vasiṣṭhaśca āsīttasya purohitaḥ sa kadācinnṛpaśreṣṭho jitvā paramadhārmikaḥ
ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ उनके पुरोहित थे। एक बार वह परम धार्मिक, श्रेष्ठ राजा, विजय पाकर—
श्लोक 334 (padma.1.34.334)
पुरोहितमुवाचेदं वसिष्ठं जपतां वरम्। श्वेत उवाच॥ भगवन्नश्वमेधानां सहस्रं कर्तुमुत्सहे॥
purohitamuvācedaṁ vasiṣṭhaṁ japatāṁ varam śveta uvāca bhagavannaśvamedhānāṁ sahasraṁ kartumutsahe
—जप करने वालों में श्रेष्ठ पुरोहित वसिष्ठ से बोले। श्वेत ने कहा — 'हे भगवन्! मैं सहस्रों अश्वमेध यज्ञ करने में समर्थ हूँ—'
श्लोक 335 (padma.1.34.335)
सुवर्णरूप्यरत्नानां दानं कर्तुं द्विजातिषु। पृथिव्यामन्नदानं तु दातुन्नेच्छामि वै गुरो॥
suvarṇarūpyaratnānāṁ dānaṁ kartuṁ dvijātiṣu pṛthivyāmannadānaṁ tu dātunnecchāmi vai guro
'—सोना, चाँदी, रत्न ब्राह्मणों को दान करने में समर्थ हूँ; परंतु हे गुरु! मैं पृथ्वी पर अन्न-दान करना नहीं चाहता।'
श्लोक 336 (padma.1.34.336)
नान्नेन किंचिद्दत्तेन दत्ते होम्नि द्विजे प्रभो। न किंचिद्वस्त्विति ज्ञात्वा न दत्तं तत्कदाचन॥
nānnena kiṁciddattena datte homni dvije prabho na kiṁcidvastviti jñātvā na dattaṁ tatkadācana
'हे प्रभो! अन्न कुछ भी दिए बिना, केवल यज्ञ में द्विज को हवन देने से क्या होगा?' — ऐसा सोचकर उन्होंने कभी कुछ भी दान नहीं दिया।
श्लोक 337 (padma.1.34.337)
रक्तवस्त्रमलंकारं ग्रामांश्च नगराणि च। अददाद्ब्राह्मणेभ्योऽसौ श्वेतो राजा महायशाः॥
raktavastramalaṁkāraṁ grāmāṁśca nagarāṇi ca adadādbrāhmaṇebhyo'sau śveto rājā mahāyaśāḥ
अत्यंत यशस्वी राजा श्वेत ने ब्राह्मणों को लाल वस्त्र, आभूषण, गाँव तथा नगर दिए।
श्लोक 338 (padma.1.34.338)
नान्नं जलं तेन राज्ञा दत्तमासीत्कदाचन। ततोऽश्वमेधैर्बहुभिर्यज्वासौ नृपसत्तम॥
nānnaṁ jalaṁ tena rājñā dattamāsītkadācana tato'śvamedhairbahubhiryajvāsau nṛpasattama
परंतु उस राजा ने कभी अन्न या जल दान नहीं दिया। तत्पश्चात् अनेक अश्वमेधों के यजनकर्ता उस श्रेष्ठ राजा ने—
श्लोक 339 (padma.1.34.339)
स्वर्गं गतः पुण्यजितं तपस्तप्त्वार्बुदत्रयम्। ब्राह्मीं सलोकतां प्राप्तः सर्वालंकारभूषितः॥
svargaṁ gataḥ puṇyajitaṁ tapastaptvārbudatrayam brāhmīṁ salokatāṁ prāptaḥ sarvālaṁkārabhūṣitaḥ
—पुण्य से विजित स्वर्ग को प्राप्त किया, तीन अर्बुद वर्षों तक तप करके ब्रह्म-लोकवासिता प्राप्त की, समस्त आभूषणों से भूषित होकर।
श्लोक 340 (padma.1.34.340)
नृत्यंत्यप्सरसस्तत्र गायंते सिद्धयोषितः। तुंबुरुर्नारदस्तत्र द्वावप्यनुगतौ सदा॥
nṛtyaṁtyapsarasastatra gāyaṁte siddhayoṣitaḥ tuṁbururnāradastatra dvāvapyanugatau sadā
वहाँ अप्सराएँ नृत्य करती हैं, सिद्ध-स्त्रियाँ गान करती हैं। वहाँ तुंबुरु और नारद दोनों सदा उनके अनुगामी थे।
श्लोक 341 (padma.1.34.341)
अगायेतां महाप्राज्ञौ मुनयश्च तपोन्विताः। वेदोक्तमंत्रैः स्तुवन्ति अनेकक्रतुयाजिनम्॥
agāyetāṁ mahāprājñau munayaśca taponvitāḥ vedoktamaṁtraiḥ stuvanti anekakratuyājinam
वे दोनों महाप्राज्ञ, तथा तपस्वी मुनिगण, वेदोक्त मंत्रों से अनेक यज्ञों के यजनकर्ता (श्वेत) की स्तुति करते थे।
श्लोक 342 (padma.1.34.342)
एवं विभवयुक्तस्य राज्ञस्तस्य महात्मनः। क्षुधाया पीड्यते देहं तृष्णया च विशेषतः॥
evaṁ vibhavayuktasya rājñastasya mahātmanaḥ kṣudhāyā pīḍyate dehaṁ tṛṣṇayā ca viśeṣataḥ
इस प्रकार वैभव-संपन्न उस महात्मा राजा को, भूख और विशेष रूप से प्यास से शरीर पीड़ित होने लगा।
श्लोक 343 (padma.1.34.343)
स तया पीड्यमानस्तु क्षुधया राजसत्तमः॥ विमानेनाप्यसौ स्वर्गं त्यक्त्वागादृक्षपर्वतम्॥
sa tayā pīḍyamānastu kṣudhayā rājasattamaḥ vimānenāpyasau svargaṁ tyaktvāgādṛkṣaparvatam
उस भूख से पीड़ित होकर वह श्रेष्ठ राजा विमान से भी स्वर्ग छोड़कर ऋक्षपर्वत को गए।
श्लोक 344 (padma.1.34.344)
यत्रात्ममूर्तिस्तत्रागात्पुरा दग्धा महावने। तत्रास्थीनि स्वयं गृह्य लिहन्नास्ते स पार्थिवः॥
yatrātmamūrtistatrāgātpurā dagdhā mahāvane tatrāsthīni svayaṁ gṛhya lihannāste sa pārthivaḥ
जहाँ पहले महावन में उनका शरीर जलाया गया था, वहाँ वे गए; वहाँ अपनी ही हड्डियों को उठाकर वह राजा चाटने लगे।
श्लोक 345 (padma.1.34.345)
पुनर्विमानमारुह्य ययौ नाकं नराधिपः। अथ कालेन महता स राजा संशितव्रतः॥
punarvimānamāruhya yayau nākaṁ narādhipaḥ atha kālena mahatā sa rājā saṁśitavrataḥ
फिर पुनः विमान पर चढ़कर वह राजा स्वर्ग को चले गए। तत्पश्चात्, बहुत काल बीतने पर, वह दृढ़व्रती राजा—
श्लोक 346 (padma.1.34.346)
स्वान्यस्थीनि लिहन्दृष्टो वसिष्ठेन पुरोधसा। उक्तश्च किन्नु राजेन्द्र स्वास्थिभक्षो नराधिप॥
svānyasthīni lihandṛṣṭo vasiṣṭhena purodhasā uktaśca kinnu rājendra svāsthibhakṣo narādhipa
—अपनी ही हड्डियाँ चाटते हुए पुरोहित वसिष्ठ द्वारा देखा गया। उनसे कहा गया: 'हे राजेंद्र! यह क्या है? हे नराधिप! तुम अपनी हड्डियाँ क्यों खा रहे हो?'
श्लोक 347 (padma.1.34.347)
एवमुक्तस्ततो राजा वसिष्ठेन महर्षिणा। उवाच वचनं चेदं श्वेतो राजाथ तं मुनिम्॥
evamuktastato rājā vasiṣṭhena maharṣiṇā uvāca vacanaṁ cedaṁ śveto rājātha taṁ munim
महर्षि वसिष्ठ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर राजा श्वेत ने उस मुनि से यह वचन कहा।
श्लोक 348 (padma.1.34.348)
भगवंस्तृट्क्षुधार्तोहमन्नदानं पुरा मया। न दत्तं मुनिशार्दूल तेन मां क्षुत्प्रबाधते॥
bhagavaṁstṛṭkṣudhārtohamannadānaṁ purā mayā na dattaṁ muniśārdūla tena māṁ kṣutprabādhate
'हे भगवन्! मैं प्यास और भूख से पीड़ित हूँ; पूर्वकाल में मैंने अन्न-दान नहीं दिया, हे मुनिश्रेष्ठ, इसीलिए मुझे भूख पीड़ित कर रही है।'
श्लोक 349 (padma.1.34.349)
एवमुक्तस्तदा राजा वसिष्ठो मुनिपुंगवः। उवाच तं नृपं भूयो वाक्यमेतन्महामुनिः॥
evamuktastadā rājā vasiṣṭho munipuṁgavaḥ uvāca taṁ nṛpaṁ bhūyo vākyametanmahāmuniḥ
इस प्रकार राजा द्वारा कहे जाने पर मुनिश्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ ने पुनः उस राजा से यह वचन कहा।
श्लोक 350 (padma.1.34.350)
किं ते करोमि राजेंद्र क्षुधितस्य विशेषतः। वस्तु कस्यापि किंचिद्धि नाऽदत्तमुपतिष्ठति॥
kiṁ te karomi rājeṁdra kṣudhitasya viśeṣataḥ vastu kasyāpi kiṁciddhi nā'dattamupatiṣṭhati
'हे राजेंद्र! विशेष रूप से भूखे तुम्हारे लिए मैं क्या करूँ? बिना दिए हुए कोई भी वस्तु किसी के काम नहीं आती।'
श्लोक 351 (padma.1.34.351)
रत्नहेमप्रदानेन भोगवान्जायते नरः। अन्नदानप्रदानेन सर्वकामैः प्रदीपितः॥
ratnahemapradānena bhogavānjāyate naraḥ annadānapradānena sarvakāmaiḥ pradīpitaḥ
'रत्न-स्वर्ण के दान से मनुष्य भोगवान् बनता है; अन्न-दान से वह समस्त कामनाओं से प्रज्वलित हो जाता है (अर्थात् सर्वकामनापूर्ण होता है)।'
श्लोक 352 (padma.1.34.352)
तन्न दत्तं त्वया राजन्स्तोकं मत्वा नराधिपः। श्वेत उवाच॥ अदत्तस्य च संभूतिर्यथा भवति मे गुरो॥
tanna dattaṁ tvayā rājanstokaṁ matvā narādhipaḥ śveta uvāca adattasya ca saṁbhūtiryathā bhavati me guro
'हे राजन्! तुमने वह अन्न-दान, थोड़ा सा मानकर, नहीं दिया।' श्वेत ने कहा — 'हे गुरु! जो न दिए गए की उत्पत्ति मुझमें हो—'
श्लोक 353 (padma.1.34.353)
वसिष्ठ त्वत्प्रसादेन तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः। वसिष्ठ उवाच॥ अस्त्येकं कारणं येन जायते नात्र संशयः॥
vasiṣṭha tvatprasādena tanmamācakṣva pṛcchataḥ vasiṣṭha uvāca astyekaṁ kāraṇaṁ yena jāyate nātra saṁśayaḥ
'—हे वसिष्ठ! आपकी कृपा से पूछते हुए मुझे वह बताइए।' वसिष्ठ ने कहा — 'इसका एक कारण है, जिससे यह होता है, इसमें संदेह नहीं—'
श्लोक 354 (padma.1.34.354)
तच्छृणुष्व नरव्याघ्र कथ्यमानं मया तव। आसीद्राजा पुरा कल्पे विनीताश्वेति कीर्तितः॥
tacchṛṇuṣva naravyāghra kathyamānaṁ mayā tava āsīdrājā purā kalpe vinītāśveti kīrtitaḥ
'—हे नरव्याघ्र! उसे सुनो, जो मैं तुम्हें बता रहा हूँ। पूर्वकल्प में एक राजा था, विनीताश्व नाम से विख्यात।'
श्लोक 355 (padma.1.34.355)
स चाश्वमेधमारेभे यज्ञं कर्तुं वरं नृपः। यजनांते द्विजेंद्रेभ्यो दत्तं गोऽश्वादि याचितम्॥
sa cāśvamedhamārebhe yajñaṁ kartuṁ varaṁ nṛpaḥ yajanāṁte dvijeṁdrebhyo dattaṁ go'śvādi yācitam
'उस श्रेष्ठ राजा ने अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लिया। यज्ञ की समाप्ति पर द्विजश्रेष्ठों को गाय-घोड़े आदि जो माँगा गया, वह दिया गया—'
श्लोक 356 (padma.1.34.356)
नान्नं दत्तं तेन किंचित्स्वल्पं मत्वा यथा त्वया। ततः कालेन महता मृतोऽसौ जाह्नवी तटे॥
nānnaṁ dattaṁ tena kiṁcitsvalpaṁ matvā yathā tvayā tataḥ kālena mahatā mṛto'sau jāhnavī taṭe
'—परंतु उसने भी अन्न कुछ भी नहीं दिया, जैसे तुमने भी थोड़ा मानकर नहीं दिया। तत्पश्चात्, बहुत काल बीतने पर, वह जाह्नवी के तट पर मृत्यु को प्राप्त हुआ।'
श्लोक 357 (padma.1.34.357)
मायापुर्यां विनीताश्वः सार्वभौमोऽभवन्नृपः। स्वर्गं च गतवान्सोऽपि यथा राजा भवान्प्रभो॥
māyāpuryāṁ vinītāśvaḥ sārvabhaumo'bhavannṛpaḥ svargaṁ ca gatavānso'pi yathā rājā bhavānprabho
'मायापुरी में वह विनीताश्व सार्वभौम राजा बना। और वह भी, हे प्रभो, तुम्हारी ही तरह राजा होकर स्वर्ग को गया।'
श्लोक 358 (padma.1.34.358)
असावपि क्षुधाविष्ट एवमेवागतोऽभवत्। मर्त्यलोके नदीतीरे गंगायां नीलपर्वते॥
asāvapi kṣudhāviṣṭa evamevāgato'bhavat martyaloke nadītīre gaṁgāyāṁ nīlaparvate
'वह भी भूख से आक्रांत होकर इसी प्रकार आया — मर्त्यलोक में, गंगा के तट पर, नीलपर्वत पर—'
श्लोक 359 (padma.1.34.359)
विमानेनार्कवर्णेन भास्वता देववन्नृप। ददर्श तत्स्वकं देहं तथा स्वं च पुरोहितम्॥
vimānenārkavarṇena bhāsvatā devavannṛpa dadarśa tatsvakaṁ dehaṁ tathā svaṁ ca purohitam
'—हे राजन्! देवों की भाँति सूर्यवर्ण, दीप्तिमान् विमान से। उसने अपने ही शरीर को, तथा अपने ही पुरोहित को देखा—'
श्लोक 360 (padma.1.34.360)
होतारं ब्राह्मणं नाम यजंतं जाह्नवी तटे। तं दृष्ट्वाऽसावपि पुनः पर्यपृच्छदिद्वजोत्तमम्॥
hotāraṁ brāhmaṇaṁ nāma yajaṁtaṁ jāhnavī taṭe taṁ dṛṣṭvā'sāvapi punaḥ paryapṛcchadidvajottamam
'—होता नामक ब्राह्मण को, जो गंगा के तट पर यजन कर रहे थे। उन्हें देखकर उसने पुनः उस द्विजश्रेष्ठ से पूछा—'
श्लोक 361 (padma.1.34.361)
क्षुधायाः कारणं राजन्स होता तमुवाच ह। तिलधेनुं च वै राजन्घृतधेनुं च सत्तम॥
kṣudhāyāḥ kāraṇaṁ rājansa hotā tamuvāca ha tiladhenuṁ ca vai rājanghṛtadhenuṁ ca sattama
'—हे राजन्! भूख के कारण के विषय में। उस होता ने उससे कहा: तिलधेनु, हे राजन्, तथा घृतधेनु, हे उत्तम—'
श्लोक 362 (padma.1.34.362)
जलधेनुं च धेनुं च रसधेनुं च पार्थिव। देहि शीघ्रं येन भवांस्तृट्क्षुधावर्जितो दिवि॥
jaladhenuṁ ca dhenuṁ ca rasadhenuṁ ca pārthiva dehi śīghraṁ yena bhavāṁstṛṭkṣudhāvarjito divi
'—जलधेनु और रसधेनु भी, हे पार्थिव, शीघ्र दो, जिससे तुम स्वर्ग में प्यास-भूख से मुक्त होकर—'
श्लोक 363 (padma.1.34.363)
रमे तयावदादित्यस्तपते दिवि चंद्रमाः। एवमुक्तस्ततो राजा तं पुनः पृष्टवानिदम्॥
rame tayāvadādityastapate divi caṁdramāḥ evamuktastato rājā taṁ punaḥ pṛṣṭavānidam
'—जब तक सूर्य और आकाश में चंद्रमा तपते हैं, तब तक आनंद पाओ।' इस प्रकार कहे जाने पर राजा ने उससे पुनः यह पूछा।
श्लोक 364 (padma.1.34.364)
तिलधेनुस्थितिं ब्रूहि तथा कृत्वा ददाम्यहम्। पुरोहित उवाच॥ विधानं तिलधेनोस्तु तच्छृणुष्व नराधिप॥
tiladhenusthitiṁ brūhi tathā kṛtvā dadāmyaham purohita uvāca vidhānaṁ tiladhenostu tacchṛṇuṣva narādhipa
'तिलधेनु की विधि बताओ, तब मैं उसे बनाकर दूँगा।' पुरोहित ने कहा — 'हे नराधिप! तिलधेनु की विधि सुनो।'
श्लोक 365 (padma.1.34.365)
धेनुस्स्यात्षोडशाढक्य चतुर्भिर्वत्सको भवेत्। इक्षुदंडमयाः पादा दन्ताः पुष्पमयाः शुभाः॥
dhenussyātṣoḍaśāḍhakya caturbhirvatsako bhavet ikṣudaṁḍamayāḥ pādā dantāḥ puṣpamayāḥ śubhāḥ
'गाय सोलह आढ़क तिलों की हो, बछड़ा चार आढ़क का बने। इक्षु-दंड के पैर हों, शुभ पुष्पों के दाँत हों—'
श्लोक 366 (padma.1.34.366)
नासा गंधमयी तस्या जिह्वा गुडमयी तथा। पुच्छे स्रक्कल्पनीयास्याद्घंटाभरणभूषिता॥
nāsā gaṁdhamayī tasyā jihvā guḍamayī tathā pucche srakkalpanīyāsyādghaṁṭābharaṇabhūṣitā
'—उसकी नासिका सुगंध की, जिह्वा गुड़ की हो। पूँछ में माला बनाई जाए, घंटी और आभूषणों से सुशोभित की जाए।'
श्लोक 367 (padma.1.34.367)
ईदृशीं कल्पयित्वा तु स्वर्णशृंगीं तु कल्पयेत्। रौप्यखुरां कांस्यदोहां पूर्वधेनुविधानतः॥
īdṛśīṁ kalpayitvā tu svarṇaśṛṁgīṁ tu kalpayet raupyakhurāṁ kāṁsyadohāṁ pūrvadhenuvidhānataḥ
'इस प्रकार बनाकर, स्वर्ण के सींग वाली बनानी चाहिए, चाँदी के खुर वाली, काँसे की दुहनी वाली, पूर्व-कथित धेनु-विधि के अनुसार।'
श्लोक 368 (padma.1.34.368)
कृत्वा तां ब्राह्मणायाशु दापयेन्मंत्रतो नृप। स्थितां कृष्णाजिने धेनुं वासोभिर्गोपितां शुभाम्॥
kṛtvā tāṁ brāhmaṇāyāśu dāpayenmaṁtrato nṛpa sthitāṁ kṛṣṇājine dhenuṁ vāsobhirgopitāṁ śubhām
'हे राजन्! ऐसी बनाकर मंत्रपूर्वक शीघ्र ब्राह्मण को दे देनी चाहिए। कृष्णमृगचर्म पर स्थापित, शुभ वस्त्रों से ढकी हुई धेनु—'
श्लोक 369 (padma.1.34.369)
सूत्रेणासूत्रितां कृत्वा पंचरत्नसमन्विताम्। सर्वौषधिसमायुक्तां मंत्रपूतां तु दापयेत्॥
sūtreṇāsūtritāṁ kṛtvā paṁcaratnasamanvitām sarvauṣadhisamāyuktāṁ maṁtrapūtāṁ tu dāpayet
'—सूत्र से बाँधी हुई, पंच-रत्नों से युक्त, समस्त औषधियों से युक्त, मंत्र-पवित्रित करके देनी चाहिए।'
श्लोक 370 (padma.1.34.370)
अन्नम्मे जायतां सद्यः पानं सर्वरसास्तथा। कामान्संपादयास्माकं तिलधेनो द्विजेर्पिता॥
annamme jāyatāṁ sadyaḥ pānaṁ sarvarasāstathā kāmānsaṁpādayāsmākaṁ tiladheno dvijerpitā
'तिलधेनु मंत्र: मुझे अन्न शीघ्र प्राप्त हो, पान और समस्त रस भी। द्विज को अर्पित हे तिलधेनु! हमारी कामनाओं को पूर्ण करो।'
श्लोक 371 (padma.1.34.371)
गृह्णामि देवि त्वां भक्त्या कुटुम्बार्थे विशेषतः। देहि कामान्वितान्सर्वांस्तिलधेनो नमोस्तु ते॥
gṛhṇāmi devi tvāṁ bhaktyā kuṭumbārthe viśeṣataḥ dehi kāmānvitānsarvāṁstiladheno namostu te
'हे देवि! मैं तुम्हें भक्तिपूर्वक, विशेष रूप से कुटुंब के हेतु, ग्रहण करता हूँ। हे तिलधेनु! समस्त वांछित कामनाएँ दो, तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 372 (padma.1.34.372)
एवं विधानतो दत्ता तिलधेनुर्नृपोत्तम। सर्वकामसमावाप्तिं कुरुते नात्र संशयः॥
evaṁ vidhānato dattā tiladhenurnṛpottama sarvakāmasamāvāptiṁ kurute nātra saṁśayaḥ
हे नृपोत्तम! इस प्रकार विधि से दी गई तिलधेनु समस्त कामनाओं की प्राप्ति कराती है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 373 (padma.1.34.373)
जलधेनुस्तथैवेह कुंभैरेव प्रकल्पिता। दत्ता तु विधिना कामान्सद्यः सर्वान्प्रयच्छति॥
jaladhenustathaiveha kuṁbhaireva prakalpitā dattā tu vidhinā kāmānsadyaḥ sarvānprayacchati
जलधेनु भी इसी प्रकार कलशों से बनाई जाती है; विधिपूर्वक दी गई वह तत्काल समस्त कामनाएँ प्रदान करती है।
श्लोक 374 (padma.1.34.374)
धेनुशतं तथा दत्तं पूर्णिमा नियमेन हि। सावित्री इव वै स्वर्गे सर्वकामप्रदा भवेत्॥
dhenuśataṁ tathā dattaṁ pūrṇimā niyamena hi sāvitrī iva vai svarge sarvakāmapradā bhavet
इसी प्रकार पूर्णिमा को नियमपूर्वक सौ गौएँ भी दी जाती हैं — मानो स्वर्ग में सावित्री ही समस्त कामनाओं को देने वाली हो।
श्लोक 375 (padma.1.34.375)
घृतधेनुस्तथा दत्ता विधानेन विचक्षणैः। सर्वकामसमावाप्तिं कुरुते कांतिदा भवेत्॥
ghṛtadhenustathā dattā vidhānena vicakṣaṇaiḥ sarvakāmasamāvāptiṁ kurute kāṁtidā bhavet
इसी प्रकार विद्वानों द्वारा विधिपूर्वक दी गई घृतधेनु समस्त कामनाओं की प्राप्ति कराती है, कांति देने वाली होती है।
श्लोक 376 (padma.1.34.376)
रसधेनुस्तथा दत्ता कार्तिके मासि पार्थिव। सर्वान्कामान्प्रयच्छेत्तु नित्यं सा गतिदा भवेत्॥
rasadhenustathā dattā kārtike māsi pārthiva sarvānkāmānprayacchettu nityaṁ sā gatidā bhavet
हे पार्थिव! कार्तिक मास में विधिपूर्वक दी गई रसधेनु समस्त कामनाएँ प्रदान करती है, वह सदा शुभ गति देने वाली होती है।
श्लोक 377 (padma.1.34.377)
एतत्ते सर्वमाख्यातं समासाद्बहुविस्तरम्। अपारं फलमुद्दिष्टं ब्रह्मणा सर्वकर्मणा॥
etatte sarvamākhyātaṁ samāsādbahuvistaram apāraṁ phalamuddiṣṭaṁ brahmaṇā sarvakarmaṇā
यह सब तुम्हें संक्षेप में बताया गया, यद्यपि इसका विस्तार बहुत है। ब्रह्मा द्वारा दिखाया गया इसका फल अपार है, सर्वकर्मों में श्रेष्ठ है।
श्लोक 378 (padma.1.34.378)
तृष्णया क्षुधया यद्वा पीडितो राजसत्तम। तद्दानं कार्तिके देयं पूर्वं देहि नराधिप॥
tṛṣṇayā kṣudhayā yadvā pīḍito rājasattama taddānaṁ kārtike deyaṁ pūrvaṁ dehi narādhipa
हे राजश्रेष्ठ! प्यास या भूख से जो भी पीड़ित हो, उसे कार्तिक मास में यह दान देना चाहिए; हे राजन्! सबसे पहले यह दो—
श्लोक 379 (padma.1.34.379)
ब्रह्मांडं सर्वसंपन्नं भूतरत्नौषधीयुतम्। देवदानवयक्षैश्च युक्तमेतत्सदा विभो॥
brahmāṁḍaṁ sarvasaṁpannaṁ bhūtaratnauṣadhīyutam devadānavayakṣaiśca yuktametatsadā vibho
—ब्रह्मांड, जो सर्वसंपन्न है, प्राणियों, रत्नों और औषधियों से युक्त है, हे विभो! जो सदा देवों, दानवों और यक्षों सहित है।
श्लोक 380 (padma.1.34.380)
एतत्तु सकलं कृत्वा सर्वतो रजतान्वितम्। सुरत्नसूर्यचंद्राढ्यं कार्तिके द्वादशी दिने॥
etattu sakalaṁ kṛtvā sarvato rajatānvitam suratnasūryacaṁdrāḍhyaṁ kārtike dvādaśī dine
इसे संपूर्ण रूप से बनवाकर, चारों ओर चाँदी से युक्त, उत्तम रत्न, सूर्य-चंद्र से सम्पन्न, कार्तिक मास की द्वादशी तिथि को—
श्लोक 381 (padma.1.34.381)
अथवा पंचदश्यां तु कार्तिकस्यैव नान्यतः। पुरोहिताय गुरवे दापयेद्भक्तिमान्नरः॥
athavā paṁcadaśyāṁ tu kārtikasyaiva nānyataḥ purohitāya gurave dāpayedbhaktimānnaraḥ
—अथवा कार्तिक की पंचदशी को ही, अन्य किसी दिन नहीं — भक्तिमान् मनुष्य को यह अपने गुरु-पुरोहित को दान करना चाहिए।
श्लोक 382 (padma.1.34.382)
ब्रह्मांडोदरवर्तीनि यानि भूतानि पार्थिव। तानि दत्तानि वै तेन समासात्कथितं तव॥
brahmāṁḍodaravartīni yāni bhūtāni pārthiva tāni dattāni vai tena samāsātkathitaṁ tava
हे पार्थिव! ब्रह्मांड के भीतर स्थित जो भी प्राणी हैं, वे सब भी उसके द्वारा दान दिए गए माने जाते हैं — यह मैंने संक्षेप में तुम्हें बताया।
श्लोक 383 (padma.1.34.383)
यद्यज्ञैर्यजतो राजन्समाप्तवरदक्षिणैः। सर्वं फलं तत्खंडस्य ब्रह्मांडस्य विशेषतः॥
yadyajñairyajato rājansamāptavaradakṣiṇaiḥ sarvaṁ phalaṁ tatkhaṁḍasya brahmāṁḍasya viśeṣataḥ
हे राजन्! जो पूर्ण दक्षिणा वाले यज्ञों से यजन करता है, उसका सारा फल उस ब्रह्मांड के एक अंश के बराबर भी विशेष रूप से नहीं होता।
श्लोक 384 (padma.1.34.384)
यः पुनः सकलं चेदं ब्रह्मांडं प्रदिशेन्नरः। तेन जप्तं हुतं दत्तं पठितं कीर्तितं भवेत्॥
yaḥ punaḥ sakalaṁ cedaṁ brahmāṁḍaṁ pradiśennaraḥ tena japtaṁ hutaṁ dattaṁ paṭhitaṁ kīrtitaṁ bhavet
और जो मनुष्य यह संपूर्ण ब्रह्मांड ही दान दे देता है, उसके द्वारा (सब कुछ) जपा, हवन किया, दान दिया, पढ़ा, कीर्तन किया गया माना जाता है।
श्लोक 385 (padma.1.34.385)
राजोवाच॥ विधिं ब्रह्मांडदानस्य कृत्वा तत्मोक्षभाग्भवेत्। कालं देशं विप्रतीर्थं सर्वं त्वं वद मेनघ॥
rājovāca vidhiṁ brahmāṁḍadānasya kṛtvā tatmokṣabhāgbhavet kālaṁ deśaṁ vipratīrthaṁ sarvaṁ tvaṁ vada menagha
राजा (श्वेत) ने कहा — ब्रह्मांड-दान की विधि करके मनुष्य मोक्ष का भागी बने। काल, स्थान, विद्वान् (पुरोहित), तीर्थ — यह सब, हे निष्पाप, मुझे बताइए—
श्लोक 386 (padma.1.34.386)
कृतेन येन सर्वस्य फलभागी भवाम्यहम्। कुत्सितस्यास्य भावस्य मोक्षस्स्यादचिराच्च मे॥
kṛtena yena sarvasya phalabhāgī bhavāmyaham kutsitasyāsya bhāvasya mokṣassyādacirācca me
—जिसे करके मैं सब कुछ का फल पाने वाला बनूँ। इस दुःखद स्थिति से मुझे शीघ्र मुक्ति मिले।
श्लोक 387 (padma.1.34.387)
वसिष्ठ उवाच॥ एवं श्रुत्वा ततो राजन्पुरोधास्तस्य स द्विजः। ब्रह्मांडं कारयामास सौवर्णं सर्वधातुभिः॥
vasiṣṭha uvāca evaṁ śrutvā tato rājanpurodhāstasya sa dvijaḥ brahmāṁḍaṁ kārayāmāsa sauvarṇaṁ sarvadhātubhiḥ
वसिष्ठ ने कहा — हे राजन्! यह सुनकर, उनके उस पुरोहित द्विज ने संपूर्ण धातुओं से युक्त, स्वर्णमय ब्रह्मांड बनवाया।
श्लोक 388 (padma.1.34.388)
युतं निष्कसहस्रेण पद्मं तत्र ह्यकल्पयत्॥ तत्र ब्रह्मा तस्य मध्येपद्मरागैरलंकृतः॥
yutaṁ niṣkasahasreṇa padmaṁ tatra hyakalpayat tatra brahmā tasya madhyepadmarāgairalaṁkṛtaḥ
एक हजार निष्कों (स्वर्ण-मुद्राओं) से युक्त उसमें कमल भी बनवाया। उसके मध्य में पद्मराग मणियों से अलंकृत ब्रह्मा को—
श्लोक 389 (padma.1.34.389)
सावित्र्या चैव गायत्र्या ऋषिभिर्मुनिभिः सह। नारदाद्याः सुताः सर्व इन्द्राद्याश्च दिवौकसः॥
sāvitryā caiva gāyatryā ṛṣibhirmunibhiḥ saha nāradādyāḥ sutāḥ sarva indrādyāśca divaukasaḥ
—सावित्री और गायत्री सहित, ऋषियों और मुनियों सहित। नारद आदि पुत्र, इंद्र आदि देवगण—
श्लोक 390 (padma.1.34.390)
सौवर्णविग्रहाः सर्वे ब्रह्मणस्तु पुरःसराः। वराहरूपी भगवान्लक्ष्म्या सह सनातनः॥
sauvarṇavigrahāḥ sarve brahmaṇastu puraḥsarāḥ varāharūpī bhagavānlakṣmyā saha sanātanaḥ
—सभी स्वर्णमय मूर्तियाँ, ब्रह्मा को आगे रखकर बनाई गईं। वराह-रूपधारी सनातन भगवान् लक्ष्मी सहित (भी बनाए गए)।
श्लोक 391 (padma.1.34.391)
नीलं मरकतं चैव भूषायां तस्य कारयेत्। गोमेदैस्तस्य वै शोभां कारयेत च बुद्धिमान्॥
nīlaṁ marakataṁ caiva bhūṣāyāṁ tasya kārayet gomedaistasya vai śobhāṁ kārayeta ca buddhimān
उसके आभूषण में नीला मरकत मणि लगवाना चाहिए। बुद्धिमान् व्यक्ति को गोमेद मणियों से उसकी शोभा बढ़ानी चाहिए।
श्लोक 392 (padma.1.34.392)
मोक्तिकैश्चापि सोमस्य शोभां वज्रैर्दिवाकरे। ग्रहाणां चैव सर्वेषां सुवर्णानि च दापयेत्॥
moktikaiścāpi somasya śobhāṁ vajrairdivākare grahāṇāṁ caiva sarveṣāṁ suvarṇāni ca dāpayet
मोतियों से चंद्रमा की, हीरों से सूर्य की शोभा बनवानी चाहिए। समस्त ग्रहों की स्वर्ण-प्रतिमाएँ भी बनवाकर देनी चाहिए।
श्लोक 393 (padma.1.34.393)
स्वर्णात्सप्तगुणं रौप्यं रौप्यात्ताम्रं तथाविधम्। ततः सप्तगुणं कार्यं कांस्यं सप्तगुणं तथा॥
svarṇātsaptaguṇaṁ raupyaṁ raupyāttāmraṁ tathāvidham tataḥ saptaguṇaṁ kāryaṁ kāṁsyaṁ saptaguṇaṁ tathā
स्वर्ण से सात गुना चाँदी, चाँदी से उतना ही ताँबा, फिर उससे सात गुना काँसा, फिर सात गुना—
श्लोक 394 (padma.1.34.394)
कांस्यात्सप्तगुणं कार्यं त्रपु चैव नराधिप। त्रपुसप्तगुणं सीसं सीसाल्लोहं च कारयेत्॥
kāṁsyātsaptaguṇaṁ kāryaṁ trapu caiva narādhipa trapusaptaguṇaṁ sīsaṁ sīsāllohaṁ ca kārayet
—हे नराधिप! काँसे से सात गुना रांगा बनवाना चाहिए, रांगे से सात गुना सीसा, सीसे से लोहा।
श्लोक 395 (padma.1.34.395)
सप्तद्वीपास्समुद्राश्च सप्त वै कुलपर्वताः। अनया संख्यया कृत्वा निपुणैः शिल्पिभिस्ततः॥
saptadvīpāssamudrāśca sapta vai kulaparvatāḥ anayā saṁkhyayā kṛtvā nipuṇaiḥ śilpibhistataḥ
सप्तद्वीप, सप्त समुद्र, तथा सात कुलपर्वत — इसी संख्या के अनुसार निपुण शिल्पियों द्वारा बनवाकर—
श्लोक 396 (padma.1.34.396)
पादपादीनि भूतानि राजतान्येव कारयेत्। आरण्यानि च सत्त्वानि सौवर्णानि च कारयेत्॥
pādapādīni bhūtāni rājatānyeva kārayet āraṇyāni ca sattvāni sauvarṇāni ca kārayet
—पादप आदि प्राणियों को चाँदी से ही बनवाना चाहिए। वन्य जीवों को स्वर्ण से बनवाना चाहिए।
श्लोक 397 (padma.1.34.397)
वृक्षान्वनस्पतीन्गुल्मतृणपर्णानि वीरुधः। सर्वं प्रकल्प्य विधिवत्तीर्थे देयं विचक्षणैः॥
vṛkṣānvanaspatīngulmatṛṇaparṇāni vīrudhaḥ sarvaṁ prakalpya vidhivattīrthe deyaṁ vicakṣaṇaiḥ
वृक्षों, वनस्पतियों, झाड़ियों, तृणों, पत्तों तथा लताओं को — यह सब विधिपूर्वक बनवाकर विद्वानों को तीर्थ में देना चाहिए।
श्लोक 398 (padma.1.34.398)
कुरुक्षेत्रे गयायां च प्रयागेऽमरकंटके। द्वारवत्यां प्रभासे च गंगाद्वारे च पुष्करे॥
kurukṣetre gayāyāṁ ca prayāge'marakaṁṭake dvāravatyāṁ prabhāse ca gaṁgādvāre ca puṣkare
कुरुक्षेत्र में, गया में, प्रयाग में, अमरकंटक में, द्वारवती में, प्रभास में, गंगाद्वार में, तथा पुष्कर में—
श्लोक 399 (padma.1.34.399)
तीर्थेष्वेतेषु वै देयं ग्रहणे शशिसूर्ययोः। दिनच्छिद्रेषु सर्वेषु अयने दक्षिणोत्तरे॥
tīrtheṣveteṣu vai deyaṁ grahaṇe śaśisūryayoḥ dinacchidreṣu sarveṣu ayane dakṣiṇottare
—इन तीर्थों में ही, चंद्र या सूर्य-ग्रहण के समय दान देना चाहिए। समस्त दिन-छिद्रों (शुभ अवसरों) में, दक्षिण या उत्तर अयन में—
श्लोक 400 (padma.1.34.400)
व्यतीपाते बहुगुणं विषुवे च विशेषतः। दातव्यमेतद्राजेंद्र विचारं नैव कारयेत्॥
vyatīpāte bahuguṇaṁ viṣuve ca viśeṣataḥ dātavyametadrājeṁdra vicāraṁ naiva kārayet
—व्यतीपात में कई गुना अधिक, विषुव में विशेष रूप से। हे राजेंद्र! यह दान देना चाहिए, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 401 (padma.1.34.401)
शालाग्निहोत्रिणं कृत्वा सुरूपं च गुणान्वितम्। सपत्नीकं च संपूज्य भूषयित्वा च भूषणैः॥
śālāgnihotriṇaṁ kṛtvā surūpaṁ ca guṇānvitam sapatnīkaṁ ca saṁpūjya bhūṣayitvā ca bhūṣaṇaiḥ
शाला-अग्निहोत्री, सुरूप और गुणवान् पुरोहित को, पत्नी सहित पूजकर, आभूषणों से सुशोभित करके—
श्लोक 402 (padma.1.34.402)
पुरोहितं मुख्यतमं कृत्वाऽन्ये च तथा द्विजाः। चतुर्विंशद्गुणोपेताः सपत्नीका निमंत्रिताः॥
purohitaṁ mukhyatamaṁ kṛtvā'nye ca tathā dvijāḥ caturviṁśadguṇopetāḥ sapatnīkā nimaṁtritāḥ
—मुख्यतम पुरोहित को, तथा अन्य द्विजों को भी, चौबीस गुणों से युक्त, पत्नियों सहित आमंत्रित करके—
श्लोक 403 (padma.1.34.403)
अंगुलीयानि च तथा कर्णवेष्टं च दापयेत्। एवंविधांस्तु तान्पूज्य तेषामग्रे सुसंस्थितः॥
aṁgulīyāni ca tathā karṇaveṣṭaṁ ca dāpayet evaṁvidhāṁstu tānpūjya teṣāmagre susaṁsthitaḥ
—अंगूठियाँ तथा कर्णाभूषण भी देने चाहिए। इस प्रकार उन्हें पूजकर, उनके सामने भलीभाँति स्थित होकर—
श्लोक 404 (padma.1.34.404)
अष्टांगप्रणिपातेन प्रणम्य च पुनःपुन।ः॥ पुरोहिताय पुरतः कृत्वा वै करसंपुटम्॥
aṣṭāṁgapraṇipātena praṇamya ca punaḥpunaḥ purohitāya purataḥ kṛtvā vai karasaṁpuṭam
—अष्टांग प्रणाम से बार-बार प्रणाम करके, पुरोहित के सामने दोनों हाथ जोड़कर—
श्लोक 405 (padma.1.34.405)
यूयं वै ब्राह्मणाः प्रीता मैत्रत्वेनानुगृह्णत। सौमुख्येन द्विजश्रेष्ठा भूयः पूततरस्त्वहः॥
yūyaṁ vai brāhmaṇāḥ prītā maitratvenānugṛhṇata saumukhyena dvijaśreṣṭhā bhūyaḥ pūtatarastvahaḥ
'हे प्रसन्न ब्राह्मणो! मुझे मित्रभाव से अनुगृहीत करो। हे द्विजश्रेष्ठो! सुमुख होकर मुझे और अधिक पवित्र करो।'
श्लोक 406 (padma.1.34.406)
भवतां प्रीतियोगेन स्वयं प्रीतः पितामहः। ब्रह्मांडेन तु दत्तेन तोषं यातु जनार्दनः॥
bhavatāṁ prītiyogena svayaṁ prītaḥ pitāmahaḥ brahmāṁḍena tu dattena toṣaṁ yātu janārdanaḥ
'आपकी प्रीति-योग से स्वयं पितामह प्रसन्न हों। ब्रह्मांड के दिए जाने से जनार्दन को संतोष प्राप्त हो।'
श्लोक 407 (padma.1.34.407)
पिनाकपाणिर्भगवान्शक्रश्च त्रिदशेश्वरः। एते तोषं समायांतु अनुध्यानाद्द्विजोत्तमाः॥
pinākapāṇirbhagavānśakraśca tridaśeśvaraḥ ete toṣaṁ samāyāṁtu anudhyānāddvijottamāḥ
'पिनाकपाणि भगवान् तथा त्रिदशेश्वर इंद्र — हे द्विजश्रेष्ठो! आपके ध्यान से ये सब संतोष को प्राप्त हों।'
श्लोक 408 (padma.1.34.408)
एवं स्तुत्वा ततो राजा ब्राह्मणान्वेदपारगान्। ब्रह्माण्डं तु गुरोः प्रादात्सविधानं पुनः क्षणात्॥
evaṁ stutvā tato rājā brāhmaṇānvedapāragān brahmāṇḍaṁ tu guroḥ prādātsavidhānaṁ punaḥ kṣaṇāt
इस प्रकार वेदपारंगत ब्राह्मणों की स्तुति करके, उस राजा ने पुनः, एक ही क्षण में, विधिपूर्वक गुरु को ब्रह्मांड अर्पित कर दिया।
श्लोक 409 (padma.1.34.409)
सर्वकामैस्ततस्तृप्तो ययौ स्वर्गं नराधिपः। तेनैव गुरुणा तच्च विभक्तं ब्राह्मणैः सह॥
sarvakāmaistatastṛpto yayau svargaṁ narādhipaḥ tenaiva guruṇā tacca vibhaktaṁ brāhmaṇaiḥ saha
तत्पश्चात् समस्त कामनाओं से तृप्त होकर वह राजा स्वर्ग को गए। उसी गुरु द्वारा वह ब्रह्मांड ब्राह्मणों सहित बाँटा गया।
श्लोक 410 (padma.1.34.410)
दत्तं तेनापि चान्येभ्यो ब्रह्मांडं च नराधिप। ब्रह्मांडे भूमिदाने च ग्राही चैको न वै भवेत्॥
dattaṁ tenāpi cānyebhyo brahmāṁḍaṁ ca narādhipa brahmāṁḍe bhūmidāne ca grāhī caiko na vai bhavet
हे राजन्! उसके द्वारा भी वह अन्यों को दिया गया। ब्रह्मांड और भूमि-दान में, एक अकेला ग्रहणकर्ता नहीं होना चाहिए।
श्लोक 411 (padma.1.34.411)
गृह्णन्दोषमवाप्नोति ब्रह्महत्यां न संशयः। सर्वेषां चैव प्रत्यक्षं दातव्यं परिकीर्त्य वै॥
gṛhṇandoṣamavāpnoti brahmahatyāṁ na saṁśayaḥ sarveṣāṁ caiva pratyakṣaṁ dātavyaṁ parikīrtya vai
अकेला ग्रहण करने वाला दोष प्राप्त करता है — ब्रह्महत्या का, इसमें संदेह नहीं। सबके समक्ष ही यह दान देने योग्य कहा गया है।
श्लोक 412 (padma.1.34.412)
दीयमानं च पश्यंति तेपि पूता भवंति हि। दर्शनादेव ते मुक्ता भवंन्त्येव न संशयः॥
dīyamānaṁ ca paśyaṁti tepi pūtā bhavaṁti hi darśanādeva te muktā bhavaṁntyeva na saṁśayaḥ
जो लोग इसे दिए जाते हुए देखते हैं, वे भी पवित्र हो जाते हैं। दर्शन मात्र से ही वे मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 413 (padma.1.34.413)
या भीमद्वादशी प्रोक्ता स्वर्णं तोयं मृगाजिनं। एतानि कृत्वा पश्यन्तु दृष्टैरेतैः क्रियाफलं॥
yā bhīmadvādaśī proktā svarṇaṁ toyaṁ mṛgājinaṁ etāni kṛtvā paśyantu dṛṣṭairetaiḥ kriyāphalaṁ
जो भीम-द्वादशी कही गई है, उस पर स्वर्ण, जल तथा मृगचर्म — इन्हें बनवाकर देखने वाले भी इन कर्मों का फल पा जाते हैं।
श्लोक 414 (padma.1.34.414)
अयत्नादेव लभ्येत कर्तुश्चैव सलोकता। सदा गावः प्रणम्याश्च मंत्रेणानेन पार्थिव॥
ayatnādeva labhyeta kartuścaiva salokatā sadā gāvaḥ praṇamyāśca maṁtreṇānena pārthiva
बिना प्रयास के ही कर्ता को (देव-)समान लोक की प्राप्ति हो जाती है। गौओं को सदा इस मंत्र से प्रणाम करना चाहिए—
श्लोक 415 (padma.1.34.415)
नमो गोभ्यः श्रीमतीभ्यः सौरभेयीभ्य एव च। नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्यो नमोनमः॥
namo gobhyaḥ śrīmatībhyaḥ saurabheyībhya eva ca namo brahmasutābhyaśca pavitrābhyo namonamaḥ
'श्रीमती और सौरभेयी गौओं को नमस्कार। ब्रह्मा की पुत्रियों तथा पवित्र गौओं को बार-बार नमस्कार।'
श्लोक 416 (padma.1.34.416)
मंत्रस्य चास्य स्मरणाद्गोदानफलमाप्नुयात्। तस्मात्त्वमपि राजेंद्र पुष्करे तीर्थ उत्तमे॥
maṁtrasya cāsya smaraṇādgodānaphalamāpnuyāt tasmāttvamapi rājeṁdra puṣkare tīrtha uttame
इस मंत्र के स्मरण मात्र से ही गोदान का फल प्राप्त होता है। इसलिए, हे राजेंद्र! तुम भी उत्तम तीर्थ पुष्कर में—
श्लोक 417 (padma.1.34.417)
कार्तिक्यां तु विशेषेण गोदानफलमाप्स्यसि। यत्किंचिद्विद्यते पापं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा॥
kārtikyāṁ tu viśeṣeṇa godānaphalamāpsyasi yatkiṁcidvidyate pāpaṁ striyo vā puruṣasya vā
—विशेष रूप से कार्तिक मास में गोदान का फल प्राप्त करोगे। स्त्री या पुरुष का जो कुछ भी पाप विद्यमान हो—
श्लोक 418 (padma.1.34.418)
पुष्करे स्नानमात्रेण तदशेषं प्रणश्यति। पृथिव्यां यानि तीर्थानि आसमुद्रात्तु भारत॥
puṣkare snānamātreṇa tadaśeṣaṁ praṇaśyati pṛthivyāṁ yāni tīrthāni āsamudrāttu bhārata
—पुष्कर में केवल स्नान मात्र से वह सब समूल नष्ट हो जाता है। हे भारत! पृथ्वी पर समुद्र-पर्यंत जितने भी तीर्थ हैं—
श्लोक 419 (padma.1.34.419)
पुष्करे तान्युपायांति कार्तिक्यां तु विशेषतः॥
puṣkare tānyupāyāṁti kārtikyāṁ tu viśeṣataḥ
—वे सब पुष्कर में समाहित हो जाते हैं, विशेष रूप से कार्तिक मास में।