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सृष्टि खण्ड · अध्याय 40

पौष्करक-सृष्टि एवं तारकामय-संग्राम

अध्याय 39अध्याय-सूचीअध्याय 41

श्लोक 1 (padma.1.40.1)

पुलस्त्य उवाच। अथ योगवतां श्रेष्ठमसृजद्भूरिवर्चसम्। स्रष्टारं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम्।

pulastya uvāca atha yogavatāṁ śreṣṭhamasṛjadbhūrivarcasam sraṣṭāraṁ sarvalokānāṁ brahmāṇaṁ sarvatomukham

पुलस्त्य ने कहा -- तब उन्होंने योगियों में श्रेष्ठ, अपार तेजस्वी, सर्वलोकों के स्रष्टा, सर्वतोमुख ब्रह्मा को रचा।

श्लोक 2 (padma.1.40.2)

तस्मिन्हिरण्मये पद्मे बहुयोजनविस्तृते। सर्वतेजोगुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्वृते।

tasminhiraṇmaye padme bahuyojanavistṛte sarvatejoguṇamaye pārthivairlakṣaṇairvṛte

उस सुवर्णमय, अनेक योजन विस्तृत, सर्वतेजोगुणमय, पार्थिव लक्षणों से युक्त कमल में,

श्लोक 3 (padma.1.40.3)

तच्च पद्मं पुराभूतं पृथिवीरूपमुत्तमम्। नारायणसमुद्भूतं प्रवदंति महर्षयः।

tacca padmaṁ purābhūtaṁ pṛthivīrūpamuttamam nārāyaṇasamudbhūtaṁ pravadaṁti maharṣayaḥ

उस कमल को, जो पूर्वकाल में उत्पन्न हुआ था, महर्षिगण नारायण से उत्पन्न पृथ्वी का ही उत्तम रूप कहते हैं।

श्लोक 4 (padma.1.40.4)

यत्पद्मं सा रसादेवी पृथिवी परिकथ्यते। ये पद्मकेसरा मुख्यास्तान्दिव्यान्पर्वतान्विदुः।

yatpadmaṁ sā rasādevī pṛthivī parikathyate ye padmakesarā mukhyāstāndivyānparvatānviduḥ

वह कमल ही रसमयी देवी पृथ्वी कही जाती है; और उस कमल के जो मुख्य केसर हैं, उन्हें दिव्य पर्वत जानो --

श्लोक 5 (padma.1.40.5)

हिमवंतं च नीलं च मेरुं निषधमेव च। कैलासं शृंगवंतं च तथाद्रिं गंधमादनम्।

himavaṁtaṁ ca nīlaṁ ca meruṁ niṣadhameva ca kailāsaṁ śṛṁgavaṁtaṁ ca tathādriṁ gaṁdhamādanam

हिमवान्, नील, मेरु और निषध, कैलास, शृंगवान् और गंधमादन पर्वत भी,

श्लोक 6 (padma.1.40.6)

पुण्यं त्रिशिखरं चैव कांतं मंदरमेव च। उदारं पिंजरं चैव विंध्यमस्तं च पर्वतम्।

puṇyaṁ triśikharaṁ caiva kāṁtaṁ maṁdarameva ca udāraṁ piṁjaraṁ caiva viṁdhyamastaṁ ca parvatam

पुण्य त्रिशिखर और सुंदर मंदर भी, उदार पिंजर तथा विंध्य और अस्त पर्वत भी।

श्लोक 7 (padma.1.40.7)

एत एव गणानां च सिद्धानां च महात्मनाम्। आश्रयाः पुण्यशीलानां सर्वकामफलप्रदाः।

eta eva gaṇānāṁ ca siddhānāṁ ca mahātmanām āśrayāḥ puṇyaśīlānāṁ sarvakāmaphalapradāḥ

ये ही गणों और सिद्ध महात्माओं के आश्रय, पुण्यशीलों को सर्वकामनाओं का फल देने वाले हैं।

श्लोक 8 (padma.1.40.8)

एतेषामंतरे द्वीपो जंबूद्वीप इति स्मृतः। जंबुद्वीपस्य संस्थानं याज्ञीया यत्र च क्रियाः।

eteṣāmaṁtare dvīpo jaṁbūdvīpa iti smṛtaḥ jaṁbudvīpasya saṁsthānaṁ yājñīyā yatra ca kriyāḥ

इनके बीच जो द्वीप है, वह जंबूद्वीप कहा जाता है; जंबूद्वीप की रचना और जहाँ यज्ञीय क्रियाएँ होती हैं --

श्लोक 9 (padma.1.40.9)

तेभ्यो यद्द्रवते तोयं दिव्यामृतरसोपमम्। दिव्यतीर्थशताधाराः सरस्यः सर्वतः स्मृताः।

tebhyo yaddravate toyaṁ divyāmṛtarasopamam divyatīrthaśatādhārāḥ sarasyaḥ sarvataḥ smṛtāḥ

उन पर्वतों से जो जल बहता है, वह दिव्य अमृतरस के समान है; उनसे सैकड़ों दिव्य तीर्थों की धाराओं वाले सरोवर सर्वत्र स्मरण किए जाते हैं।

श्लोक 10 (padma.1.40.10)

यान्येतानीहपद्मस्य केसराणि समंततः। असंख्येयाः पृथिव्यां ते विविधाश्चैव पर्वताः।

yānyetānīhapadmasya kesarāṇi samaṁtataḥ asaṁkhyeyāḥ pṛthivyāṁ te vividhāścaiva parvatāḥ

यहाँ जो चारों ओर कमल के केसर हैं, वे ही पृथ्वी पर असंख्य और विविध पर्वत हैं।

श्लोक 11 (padma.1.40.11)

यानि पर्णानि पद्मस्य भूरिपूर्वाणि पार्थिव। ते दुर्गमाः शैलचिता म्लेच्छदेशाः प्रकीर्तिताः।

yāni parṇāni padmasya bhūripūrvāṇi pārthiva te durgamāḥ śailacitā mlecchadeśāḥ prakīrtitāḥ

हे पार्थिव, कमल की जो अनेक पंखुड़ियाँ हैं, वे दुर्गम, पर्वतों से भरी हुई म्लेच्छ-देश कही गई हैं।

श्लोक 12 (padma.1.40.12)

यान्यधोभागपत्राणि ता निवासास्तु भागशः। दैत्यानामसुराणां च पन्नगानां च पार्थिव।

yānyadhobhāgapatrāṇi tā nivāsāstu bhāgaśaḥ daityānāmasurāṇāṁ ca pannagānāṁ ca pārthiva

जो निचले भाग की पंखुड़ियाँ हैं, वे भाग-भाग में दैत्यों, असुरों और सर्पों के निवास हैं, हे पार्थिव।

श्लोक 13 (padma.1.40.13)

तेषां मध्येंतरं यत्तु तद्रसातलसंज्ञितम्। महापातककर्माणो मज्जंते यत्र मानवाः।

teṣāṁ madhyeṁtaraṁ yattu tadrasātalasaṁjñitam mahāpātakakarmāṇo majjaṁte yatra mānavāḥ

उनके बीच का जो स्थान है, वह रसातल कहलाता है, जहाँ महापातकी मनुष्य डूबते हैं।

श्लोक 14 (padma.1.40.14)

चतुर्दिशासु संख्याताश्चत्वारः सलिलाकराः। एवं नारायणस्यार्थे मही पुष्कर संभवा।

caturdiśāsu saṁkhyātāścatvāraḥ salilākarāḥ evaṁ nārāyaṇasyārthe mahī puṣkara saṁbhavā

चारों दिशाओं में चार समुद्र गिने गए हैं। इस प्रकार नारायण के प्रयोजन से पुष्कर में पृथ्वी उत्पन्न हुई।

श्लोक 15 (padma.1.40.15)

प्रादुर्भावोप्ययं तस्मान्नाम्ना पुष्करसंज्ञितः। एतस्मात्कारणाद्यज्ञे पुराणैः परमर्षिभिः।

prādurbhāvopyayaṁ tasmānnāmnā puṣkarasaṁjñitaḥ etasmātkāraṇādyajñe purāṇaiḥ paramarṣibhiḥ

इसी से इसका यह प्रादुर्भाव पुष्कर नाम से जाना जाता है। इसी कारण यज्ञ में परमर्षियों द्वारा,

श्लोक 16 (padma.1.40.16)

यज्ञियैर्वेददृष्टांतैर्यज्ञैर्यूपचितिः कृता। एवं भगवता तेन विश्वव्याप्यधराचिता।

yajñiyairvedadṛṣṭāṁtairyajñairyūpacitiḥ kṛtā evaṁ bhagavatā tena viśvavyāpyadharācitā

वेद के दृष्टांतों के अनुसार यज्ञीय यज्ञों से यूपस्तंभ बनाए गए। इस प्रकार उन भगवान् ने विश्वव्यापी पृथ्वी की रचना की।

श्लोक 17 (padma.1.40.17)

पर्वतानां नदीनां च रचना चैव निर्मिता। विश्वस्य यश्चाप्रतिमप्रभावः प्रभाकरा भो वरुणोमितद्युतिः।

parvatānāṁ nadīnāṁ ca racanā caiva nirmitā viśvasya yaścāpratimaprabhāvaḥ prabhākarā bho varuṇomitadyutiḥ

पर्वतों और नदियों की रचना भी उन्होंने निर्मित की। जिनका विश्व पर अनुपम प्रभाव है, उन प्रभाकर (सूर्य) और अपार तेजस्वी वरुण को भी उन्होंने रचा।

श्लोक 18 (padma.1.40.18)

शनैः स्वयंभूर्व्यसृजत्सुषुप्तं जगन्मयः पद्मनिधिं महार्णवे। विघ्नस्तपसि संभूतो मधुर्नाम महासुरः।

śanaiḥ svayaṁbhūrvyasṛjatsuṣuptaṁ jaganmayaḥ padmanidhiṁ mahārṇave vighnastapasi saṁbhūto madhurnāma mahāsuraḥ

स्वयंभू ने धीरे-धीरे, स्वयं सुप्त रहते हुए, महासमुद्र में जगन्मय कमल-निधि को उत्पन्न किया। उस तप में विघ्न रूप में मधु नामक महासुर उत्पन्न हुआ,

श्लोक 19 (padma.1.40.19)

तेनैव च सहोद्भूतो ह्यसुरो नाम कैटभः। तौ रजस्तमसोर्भूतौ संभूतौ तामसौ गणौ।

tenaiva ca sahodbhūto hyasuro nāma kaiṭabhaḥ tau rajastamasorbhūtau saṁbhūtau tāmasau gaṇau

और उसी के साथ कैटभ नामक असुर भी उत्पन्न हुआ। रज और तम से उत्पन्न वे दोनों तामस गण थे,

श्लोक 20 (padma.1.40.20)

एकार्णवं जगत्सर्वं क्षोभयेतां महाबलौ। दिव्यरक्तांबरधरौ श्वेतदीप्तोग्रदंष्ट्रिणौ।

ekārṇavaṁ jagatsarvaṁ kṣobhayetāṁ mahābalau divyaraktāṁbaradharau śvetadīptogradaṁṣṭriṇau

उन दोनों महाबली ने एक समुद्र बने संपूर्ण जगत् को क्षुब्ध कर दिया -- दिव्य लाल वस्त्र धारण किए, श्वेत दीप्त उग्र दाढ़ों वाले,

श्लोक 21 (padma.1.40.21)

किरीटमकुटोदग्रौ केयूरवलयोज्ज्वलौ। महाविवृतताम्राक्षौ पीनोरस्कौ महाभुजौ।

kirīṭamakuṭodagrau keyūravalayojjvalau mahāvivṛtatāmrākṣau pīnoraskau mahābhujau

किरीट-मुकुट से ऊँचे, केयूर-कंकणों से उज्ज्वल, विस्तृत तांबई नेत्रों वाले, पुष्ट वक्ष और महाबाहु वाले,

श्लोक 22 (padma.1.40.22)

महागिरेः संहननौ जंगमाविव पर्वतौ। नवमेघप्रतीकाशावादित्यप्रतिमाननौ।

mahāgireḥ saṁhananau jaṁgamāviva parvatau navameghapratīkāśāvādityapratimānanau

महापर्वत जैसे गठन वाले, मानो दो चलते-फिरते पर्वत, नए मेघों-सम, आदित्य-सम मुखों वाले,

श्लोक 23 (padma.1.40.23)

विपुलाभोगकेयूर कराभ्यामतिभीषणौ। पादसंचारविन्यासैर्विक्षिपंताविवार्णवम्।

vipulābhogakeyūra karābhyāmatibhīṣaṇau pādasaṁcāravinyāsairvikṣipaṁtāvivārṇavam

विपुल केयूरधारी भुजाओं से अत्यंत भयंकर, अपने पैरों की गति से मानो समुद्र को उछालते हुए,

श्लोक 24 (padma.1.40.24)

कंपयंतौ हरिमिव शयानं मधुसूदनम्। तौ तत्र विचरंतौ तु पुष्करे विश्वतोमुखौ।

kaṁpayaṁtau harimiva śayānaṁ madhusūdanam tau tatra vicaraṁtau tu puṣkare viśvatomukhau

सोए हुए मधुसूदन हरि को भी कँपाते हुए -- वे दोनों वहाँ पुष्कर में विश्वतोमुख होकर विचरण करते हुए,

श्लोक 25 (padma.1.40.25)

योगिनां श्रेष्ठमत्यंतं दीप्तं ददृशतुस्तदा। नारायणसमाज्ञातं सृजंतमखिलाः प्रजाः।

yogināṁ śreṣṭhamatyaṁtaṁ dīptaṁ dadṛśatustadā nārāyaṇasamājñātaṁ sṛjaṁtamakhilāḥ prajāḥ

योगियों में परम श्रेष्ठ, अत्यंत तेजस्वी, नारायण द्वारा नियुक्त, समस्त प्रजाओं को रचते हुए उन्हें देखा --

श्लोक 26 (padma.1.40.26)

दैवतानि च विश्वानि मानसांश्च सुतानृषीन्। ततस्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणमसुरोत्तमौ।

daivatāni ca viśvāni mānasāṁśca sutānṛṣīn tatastāvūcatustatra brahmāṇamasurottamau

समस्त देवताओं और मानस पुत्रों, ऋषियों को भी। तब उन दोनों श्रेष्ठ असुरों ने वहाँ ब्रह्मा से कहा --

श्लोक 27 (padma.1.40.27)

दुष्टौ युयुत्सू संक्रुद्धौ क्रोधव्याकुलितेक्षणौ। कस्त्वं पुष्करमध्यस्थः सितोष्णीषश्चतुर्भुजः।

duṣṭau yuyutsū saṁkruddhau krodhavyākulitekṣaṇau kastvaṁ puṣkaramadhyasthaḥ sitoṣṇīṣaścaturbhujaḥ

दुष्ट, युद्धेच्छु, क्रुद्ध, क्रोध से व्याकुल नेत्रों वाले वे बोले -- तुम कौन हो जो पुष्कर के मध्य स्थित हो, श्वेत उष्णीष वाले, चतुर्भुज?

श्लोक 28 (padma.1.40.28)

आवामगणयन्मोहादास्से त्वं विगतस्पृहः। एह्यागच्छावयोर्युद्धं देहि त्वं कमलोद्भव।

āvāmagaṇayanmohādāsse tvaṁ vigataspṛhaḥ ehyāgacchāvayoryuddhaṁ dehi tvaṁ kamalodbhava

मोहवश हम दोनों की उपेक्षा करते हुए तुम निःस्पृह बैठे हो। आओ, हम दोनों से युद्ध करो, हे कमलोद्भव।

श्लोक 29 (padma.1.40.29)

आवाभ्यां परमेशाभ्यामशक्तः स्थातुमर्णवे। तत्र कश्च भवेत्तुभ्यं येन चात्र नियोजितः।

āvābhyāṁ parameśābhyāmaśaktaḥ sthātumarṇave tatra kaśca bhavettubhyaṁ yena cātra niyojitaḥ

हम दोनों परमेश्वरों के सामने कोई भी समुद्र में स्थिर नहीं रह सकता। तो फिर तुम किसके हो, किसने तुम्हें यहाँ नियुक्त किया है?

श्लोक 30 (padma.1.40.30)

कः स्रष्टा कश्च ते गोप्ता केन नाम्नाभिधीयते। ब्रह्मोवाच। ईश्वरः प्रोच्यते लोके विष्णुश्चानंतशक्तिधृत्।

kaḥ sraṣṭā kaśca te goptā kena nāmnābhidhīyate brahmovāca īśvaraḥ procyate loke viṣṇuścānaṁtaśaktidhṛt

कौन तुम्हारा स्रष्टा है, कौन तुम्हारा रक्षक है, तुम किस नाम से पुकारे जाते हो? ब्रह्मा ने कहा -- लोक में जिन्हें ईश्वर कहा जाता है, वे विष्णु, अनंतशक्तिधारी,

श्लोक 31 (padma.1.40.31)

तत्सकाशात्तु जातं मां स्रष्टारमवगच्छतम्। मधुकैटभा ऊचतुः। नावयोः परमं लोके किंचिदस्ति महामुने।

tatsakāśāttu jātaṁ māṁ sraṣṭāramavagacchatam madhukaiṭabhā ūcatuḥ nāvayoḥ paramaṁ loke kiṁcidasti mahāmune

उन्हीं से उत्पन्न हुए मुझे स्रष्टा समझो। मधु-कैटभ ने कहा -- हे महामुने, हम दोनों के लिए लोक में कुछ भी परम नहीं है --

श्लोक 32 (padma.1.40.32)

आवाभ्यां च्छाद्यते विश्वं तमसा रजसा च वै। रजस्तमोमयावावामृषीणामतिलंघिनौ।

āvābhyāṁ cchādyate viśvaṁ tamasā rajasā ca vai rajastamomayāvāvāmṛṣīṇāmatilaṁghinau

हम दोनों से ही विश्व तम और रज से आवृत होता है। रज-तम से बने हम ऋषियों को भी लांघ जाते हैं --

श्लोक 33 (padma.1.40.33)

धर्म शीलं च्छादयन्तौ नाशकौ सर्वदेहिनाम्। आवाभ्यां युज्यते लोको दुस्तराभ्यां युगे युगे।

dharma śīlaṁ cchādayantau nāśakau sarvadehinām āvābhyāṁ yujyate loko dustarābhyāṁ yuge yuge

धर्म और शील को आच्छादित करते हुए, सब देहधारियों के नाशक। हमारे द्वारा ही युग-युग में यह दुस्तर संसार जुड़ा रहता है।

श्लोक 34 (padma.1.40.34)

आवामर्थश्च कामश्च यज्ञस्सर्वपरिग्रहः। सुखं यत्र मदो यत्र यत्र श्रीः कीर्तिरेव च।

āvāmarthaśca kāmaśca yajñassarvaparigrahaḥ sukhaṁ yatra mado yatra yatra śrīḥ kīrtireva ca

हम दोनों ही अर्थ और काम हैं, यज्ञ और सर्वपरिग्रह हैं। जहाँ सुख है, जहाँ मद है, जहाँ श्री और कीर्ति है --

श्लोक 35 (padma.1.40.35)

येषां यत्कांक्षितं किंचित्तत्तदावां विचिंतय। ब्रह्मोवाच। आवाभ्यां संहतौ दृष्ट्वा युवां पूर्वं पराजितौ।

yeṣāṁ yatkāṁkṣitaṁ kiṁcittattadāvāṁ viciṁtaya brahmovāca āvābhyāṁ saṁhatau dṛṣṭvā yuvāṁ pūrvaṁ parājitau

जिस-जिस की जो-जो कामना है, वह सब हम ही हैं, ऐसा विचार करो। ब्रह्मा ने कहा -- तुम दोनों को संगठित देखकर, पहले भी पराजित,

श्लोक 36 (padma.1.40.36)

तं समाधाय गुणिनं सत्वं चास्मि समाश्रितः। यः परो योगयुक्तात्मा योक्षरः सत्वमेव च।

taṁ samādhāya guṇinaṁ satvaṁ cāsmi samāśritaḥ yaḥ paro yogayuktātmā yokṣaraḥ satvameva ca

मैंने उन गुणवान् सत्त्व का ही आश्रय लिया है। जो परम, योगयुक्तात्मा, अक्षर और सत्त्वस्वरूप ही हैं,

श्लोक 37 (padma.1.40.37)

रजसस्तमसश्चैव यः स्रष्टा विश्वसंभवः। ततो भूतानि जायंते सात्विकानीतराणि च।

rajasastamasaścaiva yaḥ sraṣṭā viśvasaṁbhavaḥ tato bhūtāni jāyaṁte sātvikānītarāṇi ca

और जो रज-तम के भी स्रष्टा, विश्व के उद्गम हैं -- उन्हीं से भूत उत्पन्न होते हैं, सात्त्विक और अन्य भी।

श्लोक 38 (padma.1.40.38)

स एव युवयोर्नाशं वासुदेवः करिष्यति। स्वपन्नेव ततो देवो बहुयोजनविस्तृतौ।

sa eva yuvayornāśaṁ vāsudevaḥ kariṣyati svapanneva tato devo bahuyojanavistṛtau

वही वासुदेव तुम दोनों का नाश करेंगे। तब सोए हुए ही, अनेक योजन विस्तृत उस देव ने --

श्लोक 39 (padma.1.40.39)

बाहू नारायणो ब्रह्म कृतवानात्ममायया। कृष्यमाणौ ततस्तस्य बाहुभ्यां बाहुशालिनौ।

bāhū nārāyaṇo brahma kṛtavānātmamāyayā kṛṣyamāṇau tatastasya bāhubhyāṁ bāhuśālinau

नारायण ब्रह्म ने अपनी माया से दो भुजाएँ बनाईं। फिर उनकी उन भुजाओं से खींचे जाते हुए वे दोनों महाबाहु,

श्लोक 40 (padma.1.40.40)

चेरतुस्तौ विगलितौ शकुनाविव पीवरौ। ततस्तावाहतुर्गत्वा वासुदेवं सनातनम्।

ceratustau vigalitau śakunāviva pīvarau tatastāvāhaturgatvā vāsudevaṁ sanātanam

शिथिल होकर, मानो दो पुष्ट पक्षी, विचरने लगे। फिर वे दोनों जाकर सनातन वासुदेव से बोले --

श्लोक 41 (padma.1.40.41)

पद्मनाभं हृषीकेशं प्रणिपत्य नतावुभौ। जानीवस्त्वां विश्वयोनिं त्वामेकं पुरुषोत्तमम्।

padmanābhaṁ hṛṣīkeśaṁ praṇipatya natāvubhau jānīvastvāṁ viśvayoniṁ tvāmekaṁ puruṣottamam

कमलनाभ हृषीकेश को प्रणाम करके, दोनों झुककर -- हम आपको विश्वयोनि, एकमात्र पुरुषोत्तम जानते हैं,

श्लोक 42 (padma.1.40.42)

आवयोश्चैव हेतुं त्वां जानन्तौ बुद्धिकारणम्। अमोघदर्शनं सत्यं यतस्त्वां विद्व(?)शाश्वतम्।

āvayoścaiva hetuṁ tvāṁ jānantau buddhikāraṇam amoghadarśanaṁ satyaṁ yatastvāṁ vidva(?)śāśvatam

आपको ही हम दोनों का हेतु, बुद्धि का कारण जानते हैं; क्योंकि आपका दर्शन सत्य और अमोघ है, आप शाश्वत हैं --

श्लोक 43 (padma.1.40.43)

ततस्त्वामभितो देव कांक्षावः प्रसमीक्षितुम्। अमोघदर्शनोसि त्वं नमस्ते समितिंजय।

tatastvāmabhito deva kāṁkṣāvaḥ prasamīkṣitum amoghadarśanosi tvaṁ namaste samitiṁjaya

अतः हे देव, हम आपको चारों ओर से भलीभाँति देखना चाहते हैं। आपका दर्शन अमोघ है, हे समितिंजय, आपको नमस्कार।

श्लोक 44 (padma.1.40.44)

श्रीभगवानुवाच। किमर्थं मामनुब्रूथ युवामसुरसत्तमौ। गतायुष्कौ युवां भूयस्त्वहो जीवितुमिच्छथः।

śrībhagavānuvāca kimarthaṁ māmanubrūtha yuvāmasurasattamau gatāyuṣkau yuvāṁ bhūyastvaho jīvitumicchathaḥ

श्रीभगवान् ने कहा -- हे असुरसत्तमो, तुम दोनों मुझसे यह क्यों कहते हो? तुम्हारी आयु समाप्त हो चुकी है, फिर भी क्या तुम अभी और जीना चाहते हो?

श्लोक 45 (padma.1.40.45)

मधुकैटभा ऊचतुः। यस्मिन्न कश्चिन्मृतवान्देव तस्मिन्वधं प्रभो। इच्छावः पुत्रतां चैव भवतः सुमहातपः।

madhukaiṭabhā ūcatuḥ yasminna kaścinmṛtavāndeva tasminvadhaṁ prabho icchāvaḥ putratāṁ caiva bhavataḥ sumahātapaḥ

मधु-कैटभ ने कहा -- हे देव, हे प्रभु, जहाँ कोई नहीं मरता, वहाँ हम अपने वध की इच्छा करते हैं; हे महातपस्वी, हम आपके पुत्रत्व की भी कामना करते हैं।

श्लोक 46 (padma.1.40.46)

श्रीभगवानुवाच। युवयोर्बाढमेतत्स्याद्भविष्ये कलिसंभवे। भविष्यथो न संदेहः सत्यमेतद्ब्रवीमि वाम्।

śrībhagavānuvāca yuvayorbāḍhametatsyādbhaviṣye kalisaṁbhave bhaviṣyatho na saṁdehaḥ satyametadbravīmi vām

श्रीभगवान् ने कहा -- तुम दोनों के लिए यह निश्चय ही आगामी कलियुग में होगा; निःसंदेह तुम उत्पन्न होगे, यह सत्य मैं तुमसे कहता हूँ।

श्लोक 47 (padma.1.40.47)

वरं प्रदायाथ महासुराभ्यां सनातनो विश्वधरः सुरोत्तमः। रजस्तमोजौ तु तदांजनोपमौ ममर्द तावूरुतलेऽमरप्रभुः।

varaṁ pradāyātha mahāsurābhyāṁ sanātano viśvadharaḥ surottamaḥ rajastamojau tu tadāṁjanopamau mamarda tāvūrutale'maraprabhuḥ

इस प्रकार उन महासुरों को वर देकर, सनातन, विश्वधर, सुरोत्तम, उन अमरप्रभु ने रज-तम से उत्पन्न, अंजन-सम उन दोनों को अपनी जांघों के नीचे मसल दिया।

श्लोक 48 (padma.1.40.48)

स्थित्वा तस्मिंस्तु कमले ब्रह्मा ब्रह्मविदांवरः। ऊर्ध्वबाहुर्महातेजास्तपोघोरं समाश्रितः।

sthitvā tasmiṁstu kamale brahmā brahmavidāṁvaraḥ ūrdhvabāhurmahātejāstapoghoraṁ samāśritaḥ

उस कमल पर स्थित होकर ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ ब्रह्मा, ऊर्ध्वबाहु, महातेजस्वी, घोर तप का आश्रय लेकर,

श्लोक 49 (padma.1.40.49)

प्रज्वलन्निव तेजोभिर्भाभिः स्वाभिस्तमोनुदः। बभाषे स तु धर्मात्मा सहस्रांशुरिवांशुभिः।

prajvalanniva tejobhirbhābhiḥ svābhistamonudaḥ babhāṣe sa tu dharmātmā sahasrāṁśurivāṁśubhiḥ

अपनी ही किरणों से प्रज्वलित-सा, तमोनाशक वह धर्मात्मा सहस्रकिरण सूर्य के समान अपनी किरणों से बोला।

श्लोक 50 (padma.1.40.50)

अथान्यद्रूपमास्थाय प्रभुर्नरायणोव्ययः। आजगाम महातेजा योगाचार्यो महायशाः।

athānyadrūpamāsthāya prabhurnarāyaṇovyayaḥ ājagāma mahātejā yogācāryo mahāyaśāḥ

फिर अन्य रूप धारण करके अव्यय प्रभु नारायण, महातेजस्वी, योगाचार्य, महायशस्वी पधारे --

श्लोक 51 (padma.1.40.51)

सांख्याचार्यश्च मतिमान्कपिलो ब्रह्मणां वरः। उभावपि महात्मानौ पूजितौ तत्र तत्परौ।

sāṁkhyācāryaśca matimānkapilo brahmaṇāṁ varaḥ ubhāvapi mahātmānau pūjitau tatra tatparau

बुद्धिमान् सांख्याचार्य, ब्राह्मणों में श्रेष्ठ कपिल के रूप में। वहाँ वे दोनों महात्मा तत्पर होकर पूजित हुए।

श्लोक 52 (padma.1.40.52)

तौ प्राप्तावूचतुस्तत्र ब्रह्माणममितौजसम्। परावरविशेषज्ञौ पूजितौ च महर्षिभिः।

tau prāptāvūcatustatra brahmāṇamamitaujasam parāvaraviśeṣajñau pūjitau ca maharṣibhiḥ

वे दोनों वहाँ पहुँचकर अपार तेजस्वी ब्रह्मा से बोले -- वे पर-अपर के विशेषज्ञ, महर्षियों द्वारा पूजित,

श्लोक 53 (padma.1.40.53)

ब्रह्म संपरिवेद्यं ते विशाल जगदास्थितौ। ग्रामणीस्सर्वभूतानां ब्रह्मा त्रैलोक्यपूजितः।

brahma saṁparivedyaṁ te viśāla jagadāsthitau grāmaṇīssarvabhūtānāṁ brahmā trailokyapūjitaḥ

हे विशाल, तुम्हें जगत् में स्थित होकर ब्रह्म को भलीभाँति जानना है -- ऐसा उन्होंने सर्वभूतों के अग्रणी, त्रैलोक्यपूजित ब्रह्मा से कहा।

श्लोक 54 (padma.1.40.54)

तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा विबोध्यगतयोः परम्। त्रीनिमान्कृतवान्लोकान्यथेयं ब्रह्मणः श्रुतिः।

tayostadvacanaṁ śrutvā vibodhyagatayoḥ param trīnimānkṛtavānlokānyatheyaṁ brahmaṇaḥ śrutiḥ

उन दोनों का वह वचन सुनकर, उनसे परम बोध पाकर, उन्होंने ये तीन लोक बनाए, जैसा यह ब्रह्मा की श्रुति कहती है।

श्लोक 55 (padma.1.40.55)

पुत्रं स्वसंभवं चैकं समुत्पादितवान्भुवम्। तदाग्रे चागतस्तस्य ब्रह्ममानससंभवः।

putraṁ svasaṁbhavaṁ caikaṁ samutpāditavānbhuvam tadāgre cāgatastasya brahmamānasasaṁbhavaḥ

उन्होंने पृथ्वी के लिए अपने से उत्पन्न एक पुत्र को जन्म दिया; तब सबसे पहले उनके पास उनका मानसपुत्र आया।

श्लोक 56 (padma.1.40.56)

उत्पन्नमात्रो ब्रह्माणमुक्तवान्मानसः सुतः। किं कुर्मस्तव साहाय्यं ब्रवीतु भगवानिति।

utpannamātro brahmāṇamuktavānmānasaḥ sutaḥ kiṁ kurmastava sāhāyyaṁ bravītu bhagavāniti

उत्पन्न होते ही उस मानसपुत्र ने ब्रह्मा से कहा -- हम आपकी क्या सहायता करें, भगवान् कहें।

श्लोक 57 (padma.1.40.57)

ब्रह्मोवाच। यदेष कपिलो नाम ब्रह्मनारायणस्तथा। वदतो भवतस्त्वं तु तत्कुरुष्व महामते।

brahmovāca yadeṣa kapilo nāma brahmanārāyaṇastathā vadato bhavatastvaṁ tu tatkuruṣva mahāmate

ब्रह्मा ने कहा -- यह जो कपिल नामक और वैसे ही नारायण-ब्रह्म हैं, ये जो कहें, हे महामते, वही तुम करो।

श्लोक 58 (padma.1.40.58)

ब्रह्मणा स तथोक्तस्तौ प्राह भूप समुत्थितः। शुश्रूषुरस्मि युवयोः किं करोमि कृतांजलि।

brahmaṇā sa tathoktastau prāha bhūpa samutthitaḥ śuśrūṣurasmi yuvayoḥ kiṁ karomi kṛtāṁjali

ब्रह्मा द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह उठकर उन दोनों से बोला, हे भूप -- मैं तुम दोनों की सेवा करना चाहता हूँ, हाथ जोड़कर कहता हूँ, क्या करूँ?

श्लोक 59 (padma.1.40.59)

श्रीभवगवानुवाच। यत्सत्यमक्षरं ब्रह्म अष्टादशविधं च तत्। यत्सत्यममृतं तत्तु परं पदमनुस्मर।

śrībhavagavānuvāca yatsatyamakṣaraṁ brahma aṣṭādaśavidhaṁ ca tat yatsatyamamṛtaṁ tattu paraṁ padamanusmara

श्रीभगवान् ने कहा -- जो सत्य अक्षर ब्रह्म है, जो अठारह प्रकार का है; जो सत्य अमृत है, उस परम पद का स्मरण करो।

श्लोक 60 (padma.1.40.60)

एतद्वचो निशम्यैवं स ययौ दिशमुत्तरां। गत्वा च तत्र स ब्रह्म अगमज्ज्ञानचक्षुषा।

etadvaco niśamyaivaṁ sa yayau diśamuttarāṁ gatvā ca tatra sa brahma agamajjñānacakṣuṣā

यह वचन सुनकर वह उत्तर दिशा में गया। वहाँ जाकर वह ज्ञानचक्षु से उस ब्रह्म को प्राप्त हुआ।

श्लोक 61 (padma.1.40.61)

ततो ब्रह्मा भुवर्नाम द्वितीयमसृजत्प्रभुः। संकल्पयित्वा मनसा तमेव च महामनाः।

tato brahmā bhuvarnāma dvitīyamasṛjatprabhuḥ saṁkalpayitvā manasā tameva ca mahāmanāḥ

फिर उस महामना प्रभु ब्रह्मा ने मन में संकल्प करके भुवर् नामक दूसरा पुत्र रचा।

श्लोक 62 (padma.1.40.62)

ततः सोप्यब्रवीद्वाक्यं किं करोमि पितामह। पितामहसमा ज्ञातो ब्रह्माणं समुपस्थितः।

tataḥ sopyabravīdvākyaṁ kiṁ karomi pitāmaha pitāmahasamā jñāto brahmāṇaṁ samupasthitaḥ

फिर वह भी पितामह के समान माने जाने वाले ब्रह्मा के पास पहुँचकर बोला -- हे पितामह, मैं क्या करूँ?

श्लोक 63 (padma.1.40.63)

ब्राह्मणस्यामृतरसोनुभूतस्तेन वै ततः। प्राप्तः सपरमंस्थानं स तयोः पार्श्वमागतः।

brāhmaṇasyāmṛtarasonubhūtastena vai tataḥ prāptaḥ saparamaṁsthānaṁ sa tayoḥ pārśvamāgataḥ

ब्राह्मण के अमृतरस का अनुभव करके वह उससे परमस्थान को प्राप्त हुआ; वह उन दोनों के पास पहुँचा।

श्लोक 64 (padma.1.40.64)

तस्मिन्नपि गते सोथ तृतीयमसृजत्प्रभुः। मोक्षप्रवृत्तिकुशलं सुवर्नामयुतः प्रभुः।

tasminnapi gate sotha tṛtīyamasṛjatprabhuḥ mokṣapravṛttikuśalaṁ suvarnāmayutaḥ prabhuḥ

उसके भी चले जाने पर उस प्रभु ने तीसरा रचा, मोक्षप्रवृत्ति में कुशल, सुवर्ण नामक वह प्रभु --

श्लोक 65 (padma.1.40.65)

सोपि तंधर्ममास्थाय तयोरेवागमद्गतिं। एवं पुत्रास्त्रयोप्येते गताः शंभोर्महात्मनः।

sopi taṁdharmamāsthāya tayorevāgamadgatiṁ evaṁ putrāstrayopyete gatāḥ śaṁbhormahātmanaḥ

वह भी उसी धर्म का आश्रय लेकर उन दोनों की ही गति को प्राप्त हुआ। इस प्रकार महात्मा शंभु (ब्रह्मा) के ये तीनों पुत्र भी उसी गति को प्राप्त हुए।

श्लोक 66 (padma.1.40.66)

तान्गृहीत्वा सुतांस्तस्य तौ गतावूर्जितां गतिं। नारायणश्च भगवान्कपिलश्च यतीश्वरः।

tāngṛhītvā sutāṁstasya tau gatāvūrjitāṁ gatiṁ nārāyaṇaśca bhagavānkapilaśca yatīśvaraḥ

उन पुत्रों को लेकर वे दोनों -- भगवान् नारायण और यतीश्वर कपिल -- उस उत्कृष्ट गति को प्राप्त हुए।

श्लोक 67 (padma.1.40.67)

यं कालं ते गता ब्रह्म ब्रह्मा तं कालमेव च। तपोघोरतरं भूयः संश्रितः परमं पदं।

yaṁ kālaṁ te gatā brahma brahmā taṁ kālameva ca tapoghorataraṁ bhūyaḥ saṁśritaḥ paramaṁ padaṁ

जिस काल में वे ब्रह्म को प्राप्त हुए, उसी काल में ब्रह्मा ने भी अत्यंत घोर तप का पुनः आश्रय लेकर परम पद प्राप्त किया।

श्लोक 68 (padma.1.40.68)

न च शक्तस्ततो ब्रह्मा प्रभुरेकस्तपश्चरन्। शरीरार्धात्ततो भार्यामुत्पादयति तच्छुभाम्।

na ca śaktastato brahmā prabhurekastapaścaran śarīrārdhāttato bhāryāmutpādayati tacchubhām

अकेले तप करते हुए वे प्रभु ब्रह्मा समर्थ नहीं हुए; तब उन्होंने अपने शरीर के आधे भाग से उस शुभ पत्नी को उत्पन्न किया।

श्लोक 69 (padma.1.40.69)

आत्मनः सदृशान्पुत्रानसृजद्वै पितामहः। विश्वे प्रजानां पतयो येभ्यो लोका विनिःसृताः।

ātmanaḥ sadṛśānputrānasṛjadvai pitāmahaḥ viśve prajānāṁ patayo yebhyo lokā viniḥsṛtāḥ

पितामह ने अपने समान पुत्रों की रचना की -- संपूर्ण प्रजाओं के स्वामी, जिनसे लोक उत्पन्न हुए।

श्लोक 70 (padma.1.40.70)

विश्वेशं प्रथमं तावन्महात्मा तपसात्मजम्। सर्वत्रसंहतं पुण्यं नाम्ना धर्मं स सृष्टवान्।

viśveśaṁ prathamaṁ tāvanmahātmā tapasātmajam sarvatrasaṁhataṁ puṇyaṁ nāmnā dharmaṁ sa sṛṣṭavān

पहले उन महात्मा ने तप से उत्पन्न विश्वेश नामक पुत्र को रचा; उन्होंने ही सर्वत्र संगृहीत पुण्यमय धर्म नामक पुत्र को भी रचा।

श्लोक 71 (padma.1.40.71)

दक्षं मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं कतुम्। वसिष्ठं गौतमं चैव भृगुमंगिरसं मुनिं।

dakṣaṁ marīcimatriṁ ca pulastyaṁ pulahaṁ katum vasiṣṭhaṁ gautamaṁ caiva bhṛgumaṁgirasaṁ muniṁ

दक्ष, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, गौतम, भृगु और अंगिरस मुनि को भी --

श्लोक 72 (padma.1.40.72)

अत्यद्भुतास्स्वकृत्येन ज्ञेयास्ते तु महर्षयः। त्रयोदशगुणारंभा ये वंशास्तु महर्षिणां।

atyadbhutāssvakṛtyena jñeyāste tu maharṣayaḥ trayodaśaguṇāraṁbhā ye vaṁśāstu maharṣiṇāṁ

ये महर्षिगण अपने-अपने कार्यों से अत्यद्भुत जानने योग्य हैं। महर्षियों के जो वंश तेरह उत्तम आरंभों वाले हैं --

श्लोक 73 (padma.1.40.73)

अदितिर्दितिर्दनुः काला अनायुः सिंहिका खसा। प्राची क्रोधा च सुरसा विनता कद्रुरेव च।

aditirditirdanuḥ kālā anāyuḥ siṁhikā khasā prācī krodhā ca surasā vinatā kadrureva ca

अदिति, दिति, दनु, काला, अनायु, सिंहिका, खसा, प्राची, क्रोधा, सुरसा, विनता और कद्रु --

श्लोक 74 (padma.1.40.74)

दक्षस्यापत्यमेतद्वै कन्या द्वादश पार्थिव। नक्षत्राणि च चंद्रस्य विंशतिस्सप्त चोर्जिताः।

dakṣasyāpatyametadvai kanyā dvādaśa pārthiva nakṣatrāṇi ca caṁdrasya viṁśatissapta corjitāḥ

हे पार्थिव, ये दक्ष की बारह कन्याएँ हैं। चंद्रमा के जो सत्ताईस मनोहर नक्षत्र हैं, वे भी उन्हीं की पुत्रियाँ थीं।

श्लोक 75 (padma.1.40.75)

मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तपसा निर्मितः किल। तस्मै द्वादशकन्याश्च दक्षस्ताश्चान्वमन्यत।

marīceḥ kaśyapaḥ putrastapasā nirmitaḥ kila tasmai dvādaśakanyāśca dakṣastāścānvamanyata

मरीचि के पुत्र कश्यप तप से निर्मित हुए थे; उन्हें दक्ष ने वे बारह कन्याएँ प्रदान कर उनका अनुमोदन किया।

श्लोक 76 (padma.1.40.76)

नक्षत्राणि च सोमाय तथैवं दत्तवानृषिः। रोहिण्यादीनि सर्वाणि पुण्यानि कुरुनंदन।

nakṣatrāṇi ca somāya tathaivaṁ dattavānṛṣiḥ rohiṇyādīni sarvāṇi puṇyāni kurunaṁdana

और नक्षत्रों को भी उस ऋषि ने सोम को इसी प्रकार दिया, रोहिणी आदि सभी पुण्य नक्षत्र, हे कुरुनंदन।

श्लोक 77 (padma.1.40.77)

लक्ष्मीस्सरस्वती संध्या विश्वेशा च महायशाः। देवी सरस्वती चैव ब्रह्मणा निर्मिताः पुरा।

lakṣmīssarasvatī saṁdhyā viśveśā ca mahāyaśāḥ devī sarasvatī caiva brahmaṇā nirmitāḥ purā

लक्ष्मी, सरस्वती, संध्या और महायशस्विनी विश्वेशा, तथा देवी सरस्वती भी -- ये पूर्वकाल में ब्रह्मा द्वारा रची गईं।

श्लोक 78 (padma.1.40.78)

एताः पञ्च वरिष्ठा वै सुरश्रेष्ठाय पार्थिव। दत्ता धर्माय भद्रं ते ब्रह्मणा दृष्टकर्मणा।

etāḥ pañca variṣṭhā vai suraśreṣṭhāya pārthiva dattā dharmāya bhadraṁ te brahmaṇā dṛṣṭakarmaṇā

हे पार्थिव, ये पाँचों श्रेष्ठ, देवताओं में श्रेष्ठ धर्म को, कर्मदर्शी ब्रह्मा द्वारा प्रदान की गईं, तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 79 (padma.1.40.79)

या रूपार्धवती पत्नी ब्रह्मणः कामरूपिणी। सुरभिः सहसा भूत्वा ब्रह्माणं समुपस्थिता।

yā rūpārdhavatī patnī brahmaṇaḥ kāmarūpiṇī surabhiḥ sahasā bhūtvā brahmāṇaṁ samupasthitā

ब्रह्मा के आधे रूप से उत्पन्न, कामरूपिणी पत्नी, सुरभि, अचानक ब्रह्मा के सामने प्रकट हुई।

श्लोक 80 (padma.1.40.80)

ततस्तामगमद्ब्रह्मा मैथुने लोकपूजितः। लोकसर्जनहेतुज्ञो गवामर्थाय सत्तम।

tatastāmagamadbrahmā maithune lokapūjitaḥ lokasarjanahetujño gavāmarthāya sattama

तब लोकपूजित ब्रह्मा, लोक की रचना के प्रयोजन को जानते हुए, गायों की उत्पत्ति के लिए, हे सत्तम, उससे संयुक्त हुए।

श्लोक 81 (padma.1.40.81)

जज्ञे चैकादशसुतान्विपुलान्धर्मसंज्ञितान्। रक्तसंध्याभ्रसंकाशान्महतस्तिग्मतेजसः।

jajñe caikādaśasutānvipulāndharmasaṁjñitān raktasaṁdhyābhrasaṁkāśānmahatastigmatejasaḥ

उससे ग्यारह पुत्र उत्पन्न हुए, विशाल, धर्म नामक, संध्याकालीन लाल बादलों-सम, तीक्ष्ण तेजस्वी --

श्लोक 82 (padma.1.40.82)

ते रुदंतो द्रवंतश्च गतवंतः पितामहम्। रोदनाद्द्रवणाच्चैव रुद्रा एवेति ते स्मृताः।

te rudaṁto dravaṁtaśca gatavaṁtaḥ pitāmaham rodanāddravaṇāccaiva rudrā eveti te smṛtāḥ

वे रोते-दौड़ते हुए पितामह के पास गए। रोने और दौड़ने के कारण ही वे रुद्र कहलाए।

श्लोक 83 (padma.1.40.83)

निर्हृतिश्चैव संध्यश्च तृतीयश्चाप्ययोनिजः। मृगव्याधः कपर्दी च महाविश्वेश्वरश्च यः।

nirhṛtiścaiva saṁdhyaśca tṛtīyaścāpyayonijaḥ mṛgavyādhaḥ kapardī ca mahāviśveśvaraśca yaḥ

निर्ऋति, संध्य, और अयोनिज तीसरा; मृगव्याध, कपर्दी और जो महाविश्वेश्वर हैं,

श्लोक 84 (padma.1.40.84)

अहिर्बुध्न्यश्च भगवान्कपाली चैव पिंगलः। सेनानीश्च महातेजा रुद्राश्चैकादश स्मृताः।

ahirbudhnyaśca bhagavānkapālī caiva piṁgalaḥ senānīśca mahātejā rudrāścaikādaśa smṛtāḥ

अहिर्बुध्न्य, भगवान् कपाली, पिंगल, महातेजस्वी सेनानी -- ये ग्यारह रुद्र स्मरण किए जाते हैं।

श्लोक 85 (padma.1.40.85)

तस्यामेव सुरभ्यां च गावो जाताः सुराश्च ये। अजश्चैव तु हंसश्च तथैव नृपसत्तम।

tasyāmeva surabhyāṁ ca gāvo jātāḥ surāśca ye ajaścaiva tu haṁsaśca tathaiva nṛpasattama

उसी सुरभि से गौएँ और कुछ देवता भी उत्पन्न हुए; अज और हंस भी, हे नृपसत्तम,

श्लोक 86 (padma.1.40.86)

ओषध्यः प्रवरायाश्च सुरभ्यास्तास्समुत्थिताः। धर्माल्लक्ष्मीस्तथाकामं साध्यान्साध्या व्यजायत।

oṣadhyaḥ pravarāyāśca surabhyāstāssamutthitāḥ dharmāllakṣmīstathākāmaṁ sādhyānsādhyā vyajāyata

तथा उत्तम ओषधियाँ भी सुरभि से उत्पन्न हुईं। धर्म से लक्ष्मी ने काम और साध्यों को जन्म दिया; साध्या ने भी --

श्लोक 87 (padma.1.40.87)

भवं च प्रभवं चैव कृशाश्वं सुवहं तथा। अरुणं वरुणं चैव विश्वामित्र चल ध्रुवौ।

bhavaṁ ca prabhavaṁ caiva kṛśāśvaṁ suvahaṁ tathā aruṇaṁ varuṇaṁ caiva viśvāmitra cala dhruvau

भव और प्रभव को, कृशाश्व और सुवह को, अरुण और वरुण को, विश्वामित्र, चल और ध्रुव को,

श्लोक 88 (padma.1.40.88)

हविष्मंतं तनूजं च विधानाभिमतावपि। वत्सरं चैव भूतिं च सर्वासुरनिषूदनम्।

haviṣmaṁtaṁ tanūjaṁ ca vidhānābhimatāvapi vatsaraṁ caiva bhūtiṁ ca sarvāsuraniṣūdanam

हविष्मान् और तनूज को, विधान और अभिमत को भी, वत्सर और सर्वासुरनिषूदन भूति को,

श्लोक 89 (padma.1.40.89)

सुपर्वाणं बृहत्कांतिं साध्या लोकनमस्कृतम्। वासवानुगता देवी जनयामास वै सुरान्।

suparvāṇaṁ bṛhatkāṁtiṁ sādhyā lokanamaskṛtam vāsavānugatā devī janayāmāsa vai surān

सुपर्वा और बृहत्कांति को -- ये साध्या से उत्पन्न हुए, लोकवंदित। और वासव की अनुगामिनी देवी ने देवताओं को जन्म दिया --

श्लोक 90 (padma.1.40.90)

धरं वै प्रथमं देवं द्वितीयं ध्रुवमव्ययम्। विश्वावसुं तृतीयं च चतुर्थं सोममीश्वरं।

dharaṁ vai prathamaṁ devaṁ dvitīyaṁ dhruvamavyayam viśvāvasuṁ tṛtīyaṁ ca caturthaṁ somamīśvaraṁ

पहले देव धर, दूसरे अव्यय ध्रुव, तीसरे विश्वावसु और चौथे ईश्वर सोम,

श्लोक 91 (padma.1.40.91)

ततोनुरूपमायं च यमं तस्मादनंतरम्। सप्तमं च तथा वायुमष्टमं निर्हृतिं तथा।

tatonurūpamāyaṁ ca yamaṁ tasmādanaṁtaram saptamaṁ ca tathā vāyumaṣṭamaṁ nirhṛtiṁ tathā

फिर अनुरूप और अनिल, उनके बाद यम; सातवें वायु और आठवें निर्ऋति भी।

श्लोक 92 (padma.1.40.92)

धर्मस्यापत्यमेतद्वै सुरभ्यां तदजायत। विश्वेदेवाश्च विश्वायां धर्माज्जाता इति स्मृताः।

dharmasyāpatyametadvai surabhyāṁ tadajāyata viśvedevāśca viśvāyāṁ dharmājjātā iti smṛtāḥ

यह धर्म की, सुरभि से उत्पन्न संतान है। विश्वेदेवगण विश्वा से धर्म द्वारा उत्पन्न कहे जाते हैं।

श्लोक 93 (padma.1.40.93)

दक्षश्चैव महाबाहुः पुष्करस्तम एव च। चाक्षुषश्च ततोत्रिश्च तथा भद्रमहोरगौ।

dakṣaścaiva mahābāhuḥ puṣkarastama eva ca cākṣuṣaśca tatotriśca tathā bhadramahoragau

महाबाहु दक्ष भी, पुष्कर और तम भी, चाक्षुष और फिर अत्रि, तथा भद्र और महोरग,

श्लोक 94 (padma.1.40.94)

विश्वांतक वसुर्बालो निकुंभश्च महायशाः। रुरुदश्चातिसिद्धौजा भास्कर प्रमितद्युतिः।

viśvāṁtaka vasurbālo nikuṁbhaśca mahāyaśāḥ rurudaścātisiddhaujā bhāskara pramitadyutiḥ

विश्वांतक, वसु, बाल, महायशस्वी निकुंभ, रुरुद, अत्यंत सिद्ध-ओजस्वी, तथा भास्कर, मित तेजस्वी।

श्लोक 95 (padma.1.40.95)

विश्वान्देवान्देवमाता विश्वेषां जनयत्सुतान्। मरुत्वती मरुत्वतो देवानजनयत्सुतान्।

viśvāndevāndevamātā viśveṣāṁ janayatsutān marutvatī marutvato devānajanayatsutān

देवमाता विश्वा ने विश्वेदेवों को पुत्रों के रूप में जन्म दिया; मरुत्वती ने मरुत्वान् से मरुद्गण पुत्रों को जन्म दिया --

श्लोक 96 (padma.1.40.96)

अग्निश्चक्षू रविर्ज्योतिः सावित्री मित्रमेव च। अमरं शरवृष्टिं च सुकर्षं च महत्तरम्।

agniścakṣū ravirjyotiḥ sāvitrī mitrameva ca amaraṁ śaravṛṣṭiṁ ca sukarṣaṁ ca mahattaram

अग्नि, चक्षु, रवि, ज्योति, सावित्री और मित्र भी, अमर, शरवृष्टि, सुकर्ष और महत्तर,

श्लोक 97 (padma.1.40.97)

विराजं चैव राजं च विश्वायुं सुमतिं तथा। अश्वगं चित्ररश्मिं च तथा च निषधं नृपं।

virājaṁ caiva rājaṁ ca viśvāyuṁ sumatiṁ tathā aśvagaṁ citraraśmiṁ ca tathā ca niṣadhaṁ nṛpaṁ

विराज और राज भी, विश्वायु और सुमति भी, अश्वग और चित्ररश्मि, तथा राजा निषध भी,

श्लोक 98 (padma.1.40.98)

भूय एवं चात्मविधिं चारित्रं पादमात्रगं। बृहंतं वै बृहद्रूपं तथा चैव सनाभिगं।

bhūya evaṁ cātmavidhiṁ cāritraṁ pādamātragaṁ bṛhaṁtaṁ vai bṛhadrūpaṁ tathā caiva sanābhigaṁ

और आत्मविधि, चारित्र, पादमात्रग, तथा बृहंत और बृहद्रूप, और सनाभिग भी।

श्लोक 99 (padma.1.40.99)

मरुत्वती प्रजा जज्ञे ज्येष्ठां तं मरुतांगणं। अदितिः कश्यपाज्जज्ञे आदित्यान्द्वादशैव हि।

marutvatī prajā jajñe jyeṣṭhāṁ taṁ marutāṁgaṇaṁ aditiḥ kaśyapājjajñe ādityāndvādaśaiva hi

मरुत्वती ने यह ज्येष्ठ मरुद्गण संतान उत्पन्न की। अदिति ने कश्यप से बारह आदित्यों को जन्म दिया --

श्लोक 100 (padma.1.40.100)

इंद्रो विष्णुर्भगस्त्वष्टा वरुणोंशोर्यमारविः। पूषा मित्रश्च वरदो धाता पर्जन्य एव हि।

iṁdro viṣṇurbhagastvaṣṭā varuṇoṁśoryamāraviḥ pūṣā mitraśca varado dhātā parjanya eva hi

इंद्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अंश, यम, रवि, पूषा, मित्र, वरदाता धाता और पर्जन्य भी।

श्लोक 101 (padma.1.40.101)

इत्येते द्वादशादित्या वरिष्टास्त्रिदिवौकसां। आदित्यस्य सरस्वत्यां जज्ञाते द्वौ सुतौ वरौ।

ityete dvādaśādityā variṣṭāstridivaukasāṁ ādityasya sarasvatyāṁ jajñāte dvau sutau varau

ये बारह आदित्य स्वर्गवासियों में श्रेष्ठ हैं। आदित्य से सरस्वती के गर्भ से दो उत्तम पुत्र उत्पन्न हुए,

श्लोक 102 (padma.1.40.102)

तपःश्रेष्ठौ गुणश्रेष्ठौ त्रिदिवस्यातिसंमतौ। दनुस्तु दानवान्जज्ञे दितिर्दैत्यान्व्यजायत।

tapaḥśreṣṭhau guṇaśreṣṭhau tridivasyātisaṁmatau danustu dānavānjajñe ditirdaityānvyajāyata

तप में श्रेष्ठ, गुण में श्रेष्ठ, स्वर्ग में अत्यंत सम्मानित। दनु ने दानवों को जन्म दिया, दिति ने दैत्यों को।

श्लोक 103 (padma.1.40.103)

काला तु कालकेयांस्तानसुरान्राक्षसांस्तथा। अनायुषायास्तनया व्याधयश्च महाबलाः।

kālā tu kālakeyāṁstānasurānrākṣasāṁstathā anāyuṣāyāstanayā vyādhayaśca mahābalāḥ

काला ने उन कालकेय असुरों और राक्षसों को जन्म दिया; अनायुषा के पुत्र महाबली व्याधियाँ (रोग) थे।

श्लोक 104 (padma.1.40.104)

सिंहिका ग्रहमाता च गंधर्वजननी मुनिः। प्राची त्वप्सरसां माता पुण्यानां भारतेतरा।

siṁhikā grahamātā ca gaṁdharvajananī muniḥ prācī tvapsarasāṁ mātā puṇyānāṁ bhāratetarā

सिंहिका ग्रहों (राहु आदि) की माता, मुनि गंधर्वों की जननी थी; प्राची अप्सराओं की, भारत-भिन्न पुण्य अप्सराओं की माता थी।

श्लोक 105 (padma.1.40.105)

क्रोधा साः सर्वभूतानि पिशाचा सा च पार्थिव। जज्ञे यक्षगणांश्चैव राक्षसांश्च विशांपते।

krodhā sāḥ sarvabhūtāni piśācā sā ca pārthiva jajñe yakṣagaṇāṁścaiva rākṣasāṁśca viśāṁpate

क्रोधा ने सभी पिशाचों को जन्म दिया, हे पार्थिव; खसा ने यक्षगणों और राक्षसों को जन्म दिया, हे विशांपते।

श्लोक 106 (padma.1.40.106)

चतुष्पदानि सत्वानि एता गाश्चैव सौरभी। पुराणपुरुषश्चैव मायां विष्णुर्हरिः प्रभुः।

catuṣpadāni satvāni etā gāścaiva saurabhī purāṇapuruṣaścaiva māyāṁ viṣṇurhariḥ prabhuḥ

ये चतुष्पद प्राणी और गौएँ भी सौरभी (सुरभि) की संतति हैं। पुराणपुरुष विष्णु, हरि, प्रभु, अपनी माया से --

श्लोक 107 (padma.1.40.107)

कथितस्तेनुपूर्वेण संस्तुतश्च महर्षिभिः। यश्चेदमग्र्यं शृणुयात्पुराणं सदा नरः पर्वसु चेत्पठेत।

kathitastenupūrveṇa saṁstutaśca maharṣibhiḥ yaścedamagryaṁ śṛṇuyātpurāṇaṁ sadā naraḥ parvasu cetpaṭheta

इस प्रकार पहले से कहा गया और महर्षियों द्वारा स्तुत यह वर्णन हुआ। जो कोई मनुष्य इस श्रेष्ठ पुराण को सदा सुने या पर्वों पर पढ़े,

श्लोक 108 (padma.1.40.108)

अवाप्य लोकं स हि वीतरागः परत्र च स्वर्गफलानि भुंक्ते। चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्।

avāpya lokaṁ sa hi vītarāgaḥ paratra ca svargaphalāni bhuṁkte cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham

वह वीतराग होकर लोक को पाकर, परलोक में स्वर्गफल भोगता है। नेत्र, मन, वाणी और कर्म से जो चार प्रकार का पाप हुआ हो,

श्लोक 109 (padma.1.40.109)

प्रसादयति यः कृष्णं तस्य कृष्णः प्रसीदति। राज्यं च लभते राजा निर्धनश्चोत्तमं धनम्।

prasādayati yaḥ kṛṣṇaṁ tasya kṛṣṇaḥ prasīdati rājyaṁ ca labhate rājā nirdhanaścottamaṁ dhanam

जो कृष्ण को प्रसन्न करता है, उससे कृष्ण प्रसन्न होते हैं; राजा राज्य पाता है, निर्धन उत्तम धन पाता है,

श्लोक 110 (padma.1.40.110)

क्षीणायुर्लभते चायुः पुत्रकामोथ संततिम्। यज्ञार्थिनस्तथा कामांस्तपांसि विविधानि च।

kṣīṇāyurlabhate cāyuḥ putrakāmotha saṁtatim yajñārthinastathā kāmāṁstapāṁsi vividhāni ca

आयुक्षीण आयु पाता है, पुत्रकामी संतान पाता है; यज्ञार्थी अपनी कामनाएँ और विविध तप भी पाते हैं,

श्लोक 111 (padma.1.40.111)

यं यं कामयते कामं तं तं लोकेश्वराल्लभेत्। सर्वं विहाय य इमं पठेद्वै पौष्करं हरेः।

yaṁ yaṁ kāmayate kāmaṁ taṁ taṁ lokeśvarāllabhet sarvaṁ vihāya ya imaṁ paṭhedvai pauṣkaraṁ hareḥ

जो-जो कामना करता है, वह-वह लोकेश्वर से पाता है। जो सब कुछ त्यागकर हरि के इस पौष्करक आख्यान को पढ़ता है,

श्लोक 112 (padma.1.40.112)

प्रादुर्भावं नरश्रेष्ठ न तस्य ह्यशुभं भवेत्। एष पौष्करकोनाम प्रादुर्भावो महात्मनः।

prādurbhāvaṁ naraśreṣṭha na tasya hyaśubhaṁ bhavet eṣa pauṣkarakonāma prādurbhāvo mahātmanaḥ

हे नरश्रेष्ठ, उसका कोई अशुभ नहीं होता। यह उस महात्मा का पौष्करक नामक प्रादुर्भाव,

श्लोक 113 (padma.1.40.113)

कीर्तितस्तु महाराज व्यासश्रुतिनिदर्शनात्। विष्णुत्वं शृणु मे विष्णोर्हरित्वं च कृतेयुगे।

kīrtitastu mahārāja vyāsaśrutinidarśanāt viṣṇutvaṁ śṛṇu me viṣṇorharitvaṁ ca kṛteyuge

हे महाराज, व्यास की श्रुति के अनुसार कीर्तित किया गया। अब मुझसे कृतयुग में विष्णु के विष्णुत्व और हरित्व को सुनो,

श्लोक 114 (padma.1.40.114)

वैकुंठत्वं च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषु च। ईश्वरस्य हितस्यैषा कर्मणां गहना गतिः।

vaikuṁṭhatvaṁ ca deveṣu kṛṣṇatvaṁ mānuṣeṣu ca īśvarasya hitasyaiṣā karmaṇāṁ gahanā gatiḥ

देवताओं में वैकुंठत्व और मनुष्यों में कृष्णत्व को भी। यह उन हितकारी ईश्वर के कर्मों की गहन गति है।

श्लोक 115 (padma.1.40.115)

सांप्रतं भूतभव्यं च शृणु राजन्यथातथं। अव्यक्तो व्यक्तलिंगस्थो य एष भगवान्प्रभुः।

sāṁprataṁ bhūtabhavyaṁ ca śṛṇu rājanyathātathaṁ avyakto vyaktaliṁgastho ya eṣa bhagavānprabhuḥ

हे राजन्, अब वर्तमान, भूत और भविष्य को यथार्थ रूप से सुनो। ये भगवान् प्रभु, अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त लक्षणों में स्थित,

श्लोक 116 (padma.1.40.116)

नारायणो ह्यनंतात्मा प्रभवाप्यय एव च। एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत्सनातनः।

nārāyaṇo hyanaṁtātmā prabhavāpyaya eva ca eṣa nārāyaṇo bhūtvā harirāsītsanātanaḥ

अनंतात्मा नारायण ही प्रभव और अपाय (उत्पत्ति और लय) हैं। यही नारायण बनकर सनातन हरि हुए।

श्लोक 117 (padma.1.40.117)

ब्रह्मा वायुश्च सोमश्च धर्मः शक्रो बृहस्पतिः। अदितेरपि पुत्रत्वमेत्यजः कुरुनंदन।

brahmā vāyuśca somaśca dharmaḥ śakro bṛhaspatiḥ aditerapi putratvametyajaḥ kurunaṁdana

ब्रह्मा, वायु, सोम, धर्म, शक्र, बृहस्पति -- इस प्रकार वे अजन्मा भी अदिति के पुत्रत्व को प्राप्त होते हैं, हे कुरुनंदन।

श्लोक 118 (padma.1.40.118)

एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजो विभुः। प्रसादनं तस्यविभोरदित्याः पुत्रकारणम्।

eṣa viṣṇuriti khyāta indrasyāvarajo vibhuḥ prasādanaṁ tasyavibhoradityāḥ putrakāraṇam

यही विष्णु नाम से विख्यात, इंद्र के छोटे भाई, विभु हैं। उन विभु की प्रसन्नता ही अदिति के पुत्र-प्राप्ति का कारण थी।

श्लोक 119 (padma.1.40.119)

वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम्। ससर्जाथ सुरान्कल्पे ब्रह्माणं च प्रजापतीन्।

vadhārthaṁ suraśatrūṇāṁ daityadānavarakṣasām sasarjātha surānkalpe brahmāṇaṁ ca prajāpatīn

देवशत्रु दैत्य-दानव-राक्षसों के वध के लिए उन्होंने उस कल्प में देवताओं, ब्रह्मा और प्रजापतियों को रचा।

श्लोक 120 (padma.1.40.120)

असृजन्मानसांस्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान्। तेभ्योभवन्महात्मभ्यः परंब्रह्म सनातनम्।

asṛjanmānasāṁstatra brahmavaṁśānanuttamān tebhyobhavanmahātmabhyaḥ paraṁbrahma sanātanam

उन्होंने वहाँ मानस ब्रह्मवंशों को अनुत्तम रूप से रचा; उन महात्माओं से सनातन परब्रह्म हुआ।

श्लोक 121 (padma.1.40.121)

एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोः कर्मानुकीर्तितं। कीर्त्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे।

etadāścaryabhūtasya viṣṇoḥ karmānukīrtitaṁ kīrttanīyasya lokeṣu kīrtyamānaṁ nibodha me

यह आश्चर्यभूत विष्णु का कर्म कीर्तित किया गया; अब लोकों में कीर्तनीय, कीर्तित होने वाला अगला वृत्तांत मुझसे समझो।

श्लोक 122 (padma.1.40.122)

वृत्ते वृत्रवधे भीष्म वर्तमाने कृतेयुगे। आसीत्त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः।

vṛtte vṛtravadhe bhīṣma vartamāne kṛteyuge āsīttrailokyavikhyātaḥ saṁgrāmastārakāmayaḥ

हे भीष्म, वृत्रवध के हो जाने पर, कृतयुग के वर्तमान रहते हुए, त्रैलोक्यविख्यात तारका-प्रसंग का महायुद्ध हुआ था।

श्लोक 123 (padma.1.40.123)

यत्र ते दानवा घोराः सर्वे संग्रामदुर्जयाः। घ्नंति देवासुरान्सर्वान्सयक्षोरगराक्षसान्।

yatra te dānavā ghorāḥ sarve saṁgrāmadurjayāḥ ghnaṁti devāsurānsarvānsayakṣoragarākṣasān

जिसमें वे भयंकर दानव, सभी युद्ध में अजेय, यक्ष-नाग-राक्षसों सहित सभी देव-असुरों को मार रहे थे।

श्लोक 124 (padma.1.40.124)

ते वध्यमाना विमुखाश्छिन्नप्रहरणा रणे। त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं प्रभुम्।

te vadhyamānā vimukhāśchinnapraharaṇā raṇe trātāraṁ manasā jagmurdevaṁ nārāyaṇaṁ prabhum

वे मारे जाते, विमुख होते, युद्ध में अस्त्रहीन होते हुए, मन से अपने रक्षक भगवान् नारायण की शरण गए।

श्लोक 125 (padma.1.40.125)

एतस्मिन्नंतरे मेघा निर्वाणांगारवर्चसः। सार्कचंद्रग्रहगणं च्छादयंतो नभस्तलम्।

etasminnaṁtare meghā nirvāṇāṁgāravarcasaḥ sārkacaṁdragrahagaṇaṁ cchādayaṁto nabhastalam

इसी बीच बुझे अंगारों जैसी कांति वाले मेघों ने सूर्य-चंद्र-ग्रहगणों सहित आकाश को ढक लिया,

श्लोक 126 (padma.1.40.126)

चंडविद्युद्गणोपेता घोरनिर्ह्रादकारिणः। अन्योन्यवेगाभिहताः प्रववुः सप्तमारुताः।

caṁḍavidyudgaṇopetā ghoranirhrādakāriṇaḥ anyonyavegābhihatāḥ pravavuḥ saptamārutāḥ

प्रचंड बिजलियों से युक्त, भयंकर गर्जन करते हुए; एक-दूसरे के वेग से टकराते सातों प्रकार के वायु बहने लगे।

श्लोक 127 (padma.1.40.127)

दीप्ततोयाः सनिर्घातैः सह वज्रानलानिलैः। रवैस्सुघोरैरुत्पातैर्दह्यमानमिवाम्बरम्।

dīptatoyāḥ sanirghātaiḥ saha vajrānalānilaiḥ ravaissughorairutpātairdahyamānamivāmbaram

वज्र-अग्नि-वायु सहित गड़गड़ाहट के साथ प्रज्वलित जल-वर्षा हुई; अत्यंत भयंकर स्वरों और उत्पातों से मानो आकाश जल रहा था।

श्लोक 128 (padma.1.40.128)

पेतुरुल्कासहस्राणि निपेतुः खचराण्यपि। दैवानि च विमानानि प्रपतंत्युत्पतंति च।

peturulkāsahasrāṇi nipetuḥ khacarāṇyapi daivāni ca vimānāni prapataṁtyutpataṁti ca

हजारों उल्काएँ गिरने लगीं, आकाशचारी प्राणी भी गिरने लगे; दिव्य विमान भी नीचे गिरते और ऊपर उछलते रहे।

श्लोक 129 (padma.1.40.129)

चतुर्युगांतसमये लोकानां यद्भयं भवेत्। अरूपवति रूपाणि तस्मिन्नुत्पातलक्षणे।

caturyugāṁtasamaye lokānāṁ yadbhayaṁ bhavet arūpavati rūpāṇi tasminnutpātalakṣaṇe

चार युगों के अंत के समय जो लोकों को भय होता है, वैसे ही अरूप में रूप उस उत्पात के लक्षण में प्रकट हुए।

श्लोक 130 (padma.1.40.130)

तस्माद्दुष्प्रथितं सर्वं न प्राज्ञायत किंचन। तिमिरौघपरिक्षिप्ता न रेजुश्च दिशो दश।

tasmādduṣprathitaṁ sarvaṁ na prājñāyata kiṁcana timiraughaparikṣiptā na rejuśca diśo daśa

इस कारण सब कुछ इतना अस्पष्ट हो गया कि कुछ भी नहीं जाना जा सका; अंधकार के समूह से घिरी दसों दिशाएँ प्रकाशित नहीं हुईं।

श्लोक 131 (padma.1.40.131)

विवेश रूपिणी काली कालमेघावगुंठिता। द्यौर्नभात्यभिभूतार्का घोरेण तमसा वृता।

viveśa rūpiṇī kālī kālameghāvaguṁṭhitā dyaurnabhātyabhibhūtārkā ghoreṇa tamasā vṛtā

साक्षात् काली रात्रि, काले मेघों से आवृत होकर प्रविष्ट हुई; सूर्य से आच्छादित आकाश घोर अंधकार से ढक गया।

श्लोक 132 (padma.1.40.132)

तां घनौघां सतिमिरां दोर्भ्यामाछिद्य स प्रभुः। वपुः स्वं दर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः।

tāṁ ghanaughāṁ satimirāṁ dorbhyāmāchidya sa prabhuḥ vapuḥ svaṁ darśayāmāsa divyaṁ kṛṣṇavapurhariḥ

उस घने, अंधकारमय बादलों की राशि को अपनी दोनों भुजाओं से चीरकर, उन प्रभु हरि ने अपना दिव्य श्यामवर्ण रूप दिखाया।

श्लोक 133 (padma.1.40.133)

बलाहकांजननिभं बलाहकतनूरुहम्। तेजसा वपुषा चैव कृष्णं कृष्णमिवाचलम्।

balāhakāṁjananibhaṁ balāhakatanūruham tejasā vapuṣā caiva kṛṣṇaṁ kṛṣṇamivācalam

मेघ-अंजन-सम श्याम, मेघ जैसे रोमों वाला, तेज और रूप दोनों में श्याम, मानो श्याम पर्वत,

श्लोक 134 (padma.1.40.134)

दीप्तपीतांबरधरं तप्तकांचनभूषणम्। धूम्रांधकारवपुषं युगांताग्निमिवोत्थितम्।

dīptapītāṁbaradharaṁ taptakāṁcanabhūṣaṇam dhūmrāṁdhakāravapuṣaṁ yugāṁtāgnimivotthitam

दीप्त पीतांबरधारी, तपे हुए स्वर्ण के आभूषणों वाला, धूम्र-अंधकार जैसे शरीर वाला, मानो युगांत की अग्नि उठी हो,

श्लोक 135 (padma.1.40.135)

वृत्तद्विगुणपीनां संकिरीटाच्छन्नमूर्धजम्। बभौ चामीकरप्रख्यैरायुधैरुपशोभितम्।

vṛttadviguṇapīnāṁ saṁkirīṭācchannamūrdhajam babhau cāmīkaraprakhyairāyudhairupaśobhitam

गोल, दुगुने पुष्ट कंधों वाला, किरीट से ढके केशों वाला -- वह स्वर्णसम आयुधों से सुशोभित होकर चमक रहा था।

श्लोक 136 (padma.1.40.136)

चंद्रार्ककिरणोद्योतं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम्। नंदकानंदितकरं कौस्तुभोद्भासितोरसम्।

caṁdrārkakiraṇodyotaṁ girikūṭamivocchritam naṁdakānaṁditakaraṁ kaustubhodbhāsitorasam

चंद्र-सूर्य की किरणों से उद्भासित, मानो पर्वत-शिखर सा ऊँचा, नंदक (खड्ग) से आनंदित हाथ वाला, कौस्तुभ से देदीप्यमान वक्ष वाला,

श्लोक 137 (padma.1.40.137)

शक्तिचित्रफलोदग्रं शंखचक्रगदाधरम्। विष्णुशैलं क्षमाशीलं श्रीवत्सं शार्ङ्गपाणिनम्।

śakticitraphalodagraṁ śaṁkhacakragadādharam viṣṇuśailaṁ kṣamāśīlaṁ śrīvatsaṁ śārṅgapāṇinam

विचित्र फलक वाली शक्ति (भाला) से ऊँचा, शंख-चक्र-गदाधारी, विष्णु, पर्वत-सम, क्षमाशील, श्रीवत्सधारी, शार्ङ्गधनुर्धारी,

श्लोक 138 (padma.1.40.138)

त्रिदशोदारफलदं स्वर्गस्त्रीचारुवल्लभम्। सर्वलोकमनःकांतं सर्वसत्वमनोहरम्।

tridaśodāraphaladaṁ svargastrīcāruvallabham sarvalokamanaḥkāṁtaṁ sarvasatvamanoharam

देवताओं को उदार फल देने वाला, स्वर्ग की सुंदरियों का प्रिय, सर्वलोकों के मन को प्रिय, सब प्राणियों के मन को हरने वाला।

श्लोक 139 (padma.1.40.139)

मायाविशालविटपं तोयदौघसमप्रभम्। विद्याहंकारमानाढ्य महाभूतप्ररोहणम्।

māyāviśālaviṭapaṁ toyadaughasamaprabham vidyāhaṁkāramānāḍhya mahābhūtaprarohaṇam

मायामय विशाल शाखाओं वाला, मेघसमूह-सम कांति वाला, विद्या और अहंकार से समृद्ध, महाभूतों को अंकुरित करने वाला,

श्लोक 140 (padma.1.40.140)

विशेषपत्रैर्निचितं ग्रहनक्षत्रपुष्पितम्। दैत्यलोकमहास्कंधं मर्त्यलोकप्रकाशितम्।

viśeṣapatrairnicitaṁ grahanakṣatrapuṣpitam daityalokamahāskaṁdhaṁ martyalokaprakāśitam

विशेष (इंद्रिय-विषय) पत्तों से सघन, ग्रह-नक्षत्रों से पुष्पित, दैत्यलोक जिसका महान् स्कंध है, मर्त्यलोक से प्रकाशित,

श्लोक 141 (padma.1.40.141)

सागराकारनिर्ह्रादं रसातलगलाश्रयम्। नागेंद्रपाशैर्विततं पक्षिजंतुसमन्वितम्।

sāgarākāranirhrādaṁ rasātalagalāśrayam nāgeṁdrapāśairvitataṁ pakṣijaṁtusamanvitam

समुद्र जैसे गर्जन वाला, रसातल में जिसकी जड़ का आश्रय है, नागराजों के फंदों से फैला हुआ, पक्षी-जंतुओं से युक्त,

श्लोक 142 (padma.1.40.142)

शीलानाहार्यगंधाढ्यं सर्वलोकमहाद्रुमम्। अव्यक्तानंदसलिलं व्यक्ताहंकारफेनिलम्।

śīlānāhāryagaṁdhāḍhyaṁ sarvalokamahādrumam avyaktānaṁdasalilaṁ vyaktāhaṁkāraphenilam

स्वाभाविक अनाहार्य गंध से समृद्ध -- सर्वलोकों का यह महावृक्ष, अव्यक्त-आनंद ही जिसका जल है, व्यक्त अहंकार ही जिसका फेन है,

श्लोक 143 (padma.1.40.143)

महाभूतकरौघौघं ग्रहनक्षत्रबुद्बुदम्। विमानवाहनैर्व्याप्तं तोयदाडम्बराकुलम्।

mahābhūtakaraughaughaṁ grahanakṣatrabudbudam vimānavāhanairvyāptaṁ toyadāḍambarākulam

महाभूतों की धाराओं की बाढ़ वाला, ग्रह-नक्षत्र जिसके बुलबुले हैं, विमान-वाहनों से व्याप्त, मेघों की गर्जना से व्याकुल,

श्लोक 144 (padma.1.40.144)

जंतुमत्स्यगणाकीर्णं शैलशंखकुलैर्युतम्। त्रैगुण्यविषयावर्तं सर्वलोकतिमिंगिलम्।

jaṁtumatsyagaṇākīrṇaṁ śailaśaṁkhakulairyutam traiguṇyaviṣayāvartaṁ sarvalokatimiṁgilam

जंतु-मत्स्य समूहों से भरा, पर्वत-शंख कुलों से युक्त, त्रिगुण के विषय जिसके भँवर हैं -- सर्वलोकों को निगलने वाला,

श्लोक 145 (padma.1.40.145)

वीरवृक्षलतागुल्मं भुजगोत्सृष्टशैवलम्। द्वादशार्कमहाद्वीपं रुद्रैकादशपत्तनम्।

vīravṛkṣalatāgulmaṁ bhujagotsṛṣṭaśaivalam dvādaśārkamahādvīpaṁ rudraikādaśapattanam

वीर ही जिसके वृक्ष-लता-गुल्म हैं, सर्पों द्वारा छोड़ी गई शैवाल वाला, बारह सूर्य ही जिसके महाद्वीप हैं, ग्यारह रुद्र ही जिसके नगर हैं,

श्लोक 146 (padma.1.40.146)

वस्वष्टपर्वतोपेतं त्रैलोक्यांभो महोदधिम्। संध्यासंध्योर्मिसलिलमापूर्णानिलशोभितम्।

vasvaṣṭaparvatopetaṁ trailokyāṁbho mahodadhim saṁdhyāsaṁdhyormisalilamāpūrṇānilaśobhitam

आठ वसु ही जिसके पर्वत हैं -- यह त्रैलोक्य का महासमुद्र, संध्याएँ ही जिसकी तरंगें हैं, वायु से पूर्ण और सुशोभित,

श्लोक 147 (padma.1.40.147)

दैत्ययक्षगणग्रामं रक्षोगणझषाकुलम्। पितामहमहावीर्यं स्वर्गस्त्रीरत्नसंकुलम्।

daityayakṣagaṇagrāmaṁ rakṣogaṇajhaṣākulam pitāmahamahāvīryaṁ svargastrīratnasaṁkulam

दैत्य-यक्षगण ही जिसके गाँव हैं, राक्षसगण जिसकी मछलियाँ हैं, पितामह जिसका महावीर्य है, स्वर्ग की रत्न-स्त्रियों से भरा,

श्लोक 148 (padma.1.40.148)

श्री कीर्ति कांतिलक्ष्मीभिर्नदीभिश्च समाकुलम्। कालयोगमहावर्षप्रलयोत्पत्तिवेगितम्।

śrī kīrti kāṁtilakṣmībhirnadībhiśca samākulam kālayogamahāvarṣapralayotpattivegitam

श्री-कीर्ति-कांति-लक्ष्मी रूपी नदियों से भरा, काल के योग से महावर्षा और प्रलय-उत्पत्ति के वेग से युक्त,

श्लोक 149 (padma.1.40.149)

सत्संयोगमहापारं नारायणमहार्णवम्। देवातिदेवं वरदं भक्तानां भक्तवत्सलम्।

satsaṁyogamahāpāraṁ nārāyaṇamahārṇavam devātidevaṁ varadaṁ bhaktānāṁ bhaktavatsalam

सज्जनों के संयोग ही जिसका महापार (किनारा) है -- यह नारायणरूपी महासमुद्र, देवाधिदेव, वरदाता, भक्तों के प्रति भक्तवत्सल,

श्लोक 150 (padma.1.40.150)

अनुग्रहकरं देवं प्रशांतिकरणं शुभम्। हर्यश्वरथसंयुक्त सुपर्णध्वजशोभिते।

anugrahakaraṁ devaṁ praśāṁtikaraṇaṁ śubham haryaśvarathasaṁyukta suparṇadhvajaśobhite

अनुग्रहकारी देव, शुभ शांतिकारक -- हरि-अश्वों से जुते रथ पर, गरुड़ध्वज से सुशोभित,

श्लोक 151 (padma.1.40.151)

चंद्रार्कचक्ररचित उदाराक्षवृतांतरे। अनंतरश्मिसंयुक्ते दुर्दर्शे मेरुकूबरे।

caṁdrārkacakraracita udārākṣavṛtāṁtare anaṁtaraśmisaṁyukte durdarśe merukūbare

चंद्र-सूर्य के चक्रों से रचित, उदार धुरी से घिरे भीतरी भाग वाले, अनंत किरणों से युक्त, दुर्दर्श, मेरु जैसी धुरी वाले,

श्लोक 152 (padma.1.40.152)

तारकाचित्रकुसुमे ग्रहनक्षत्रबंधुरे। भयेष्वभयदे व्योम्नि देवदैत्यापराजिते।

tārakācitrakusume grahanakṣatrabaṁdhure bhayeṣvabhayade vyomni devadaityāparājite

तारों के विचित्र फूलों वाले, ग्रह-नक्षत्रों से सुंदर, भयों में अभयदाता, देव-दैत्यों से अपराजित उस आकाश में --

श्लोक 153 (padma.1.40.153)

हर्यश्वरथसंयुक्तमुक्ताशोभासमन्वितम्। ददृशुस्ते स्थितं देवं दिव्यलोकमये रथे।

haryaśvarathasaṁyuktamuktāśobhāsamanvitam dadṛśuste sthitaṁ devaṁ divyalokamaye rathe

हरि-अश्वों से जुते, मोतियों की शोभा से युक्त उस रथ पर स्थित उन देव को उन्होंने देखा, दिव्य लोकमय रथ में विराजमान।

श्लोक 154 (padma.1.40.154)

ते कृतांजलयः सर्वे देवा इंद्रपुरोगमाः। जयशब्दं पुरस्कृत्य शरण्यं शरणं गताः।

te kṛtāṁjalayaḥ sarve devā iṁdrapurogamāḥ jayaśabdaṁ puraskṛtya śaraṇyaṁ śaraṇaṁ gatāḥ

हाथ जोड़े हुए, इंद्र को आगे किए वे सभी देवता, 'जय' शब्द को आगे करके उन शरणदाता की शरण में गए।

श्लोक 155 (padma.1.40.155)

एतेषां च गिरः श्रुत्वा स विष्णुर्देवदैवतः। मनश्चक्रे विनाशाय दानवानां महामृधे।

eteṣāṁ ca giraḥ śrutvā sa viṣṇurdevadaivataḥ manaścakre vināśāya dānavānāṁ mahāmṛdhe

उनके वचन सुनकर देवदेव विष्णु ने उस महासमर में दानवों के विनाश का मन बना लिया।

श्लोक 156 (padma.1.40.156)

आकाशे तु स्थितो विष्णुरुत्तमं वपुराश्रितः। उवाच देवताः सर्वाः सप्रतिज्ञमिदं वचः।

ākāśe tu sthito viṣṇuruttamaṁ vapurāśritaḥ uvāca devatāḥ sarvāḥ sapratijñamidaṁ vacaḥ

आकाश में स्थित होकर, उस उत्तम शरीर का आश्रय लेकर, विष्णु ने सब देवताओं से यह प्रतिज्ञायुक्त वचन कहा --

श्लोक 157 (padma.1.40.157)

शांतिं व्रजत भद्रं वो मा भैष्ट मरुतांगणाः। जिता मे दानवाः सर्वे त्रैलोक्यं परिगृह्यताम्।

śāṁtiṁ vrajata bhadraṁ vo mā bhaiṣṭa marutāṁgaṇāḥ jitā me dānavāḥ sarve trailokyaṁ parigṛhyatām

शांति को प्राप्त हो, तुम्हारा कल्याण हो, भय मत करो, हे मरुद्गणो। मेरे द्वारा सभी दानव जीत लिए गए हैं, त्रैलोक्य को ग्रहण करो।

श्लोक 158 (padma.1.40.158)

ततोस्य सत्यसंधस्य विष्णोर्वाक्येन तोषिताः। देवाः प्रीतिं पराजग्मुः प्राश्यामृतमिवोत्तमम्।

tatosya satyasaṁdhasya viṣṇorvākyena toṣitāḥ devāḥ prītiṁ parājagmuḥ prāśyāmṛtamivottamam

तब सत्यप्रतिज्ञ उस विष्णु के वचन से संतुष्ट होकर देवगण, मानो उत्तम अमृत का पान करके, परम प्रीति को प्राप्त हुए।

श्लोक 159 (padma.1.40.159)

ततस्तमश्च संहृत्य विनेशुश्च बलाहकाः। प्रववुश्च शिवा वाताः प्रसन्नाश्च दिशो दश।

tatastamaśca saṁhṛtya vineśuśca balāhakāḥ pravavuśca śivā vātāḥ prasannāśca diśo daśa

फिर अंधकार का संहार होकर मेघ नष्ट हो गए, शुभ वायु बहने लगे और दसों दिशाएँ प्रसन्न हो गईं।

श्लोक 160 (padma.1.40.160)

शुद्धप्रायाणि ज्योतींषि सोमं चक्रुः प्रदक्षिणम्। न विग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रसन्नाश्चापि सिंधवः।

śuddhaprāyāṇi jyotīṁṣi somaṁ cakruḥ pradakṣiṇam na vigrahaṁ grahāścakruḥ prasannāścāpi siṁdhavaḥ

प्रायः शुद्ध हुई ज्योतियों ने चंद्रमा की प्रदक्षिणा की; ग्रहों ने कोई अशुभ योग नहीं बनाया, समुद्र भी प्रसन्न हो गए।

श्लोक 161 (padma.1.40.161)

विरजा अभवन्मार्गा लोकाः स्वर्गादयस्त्रयः। यथार्थमूहुस्सरितश्चुक्षुभे न तथार्णवः।

virajā abhavanmārgā lokāḥ svargādayastrayaḥ yathārthamūhussaritaścukṣubhe na tathārṇavaḥ

मार्ग धूलिरहित हो गए, स्वर्गादि तीनों लोक शांत हो गए; नदियाँ यथार्थ गति से बहने लगीं, समुद्र पहले जैसे क्षुब्ध नहीं रहा।

श्लोक 162 (padma.1.40.162)

आसन्छुभानीन्द्रियाणि नराणामंतरात्मसु। महर्षयो वीतशोका वेदानुच्चैरधीयत।

āsanchubhānīndriyāṇi narāṇāmaṁtarātmasu maharṣayo vītaśokā vedānuccairadhīyata

मनुष्यों के अंतरात्मा में इंद्रियाँ शुभ हो गईं; शोकरहित महर्षि ऊँचे स्वर से वेदों का अध्ययन करने लगे।

श्लोक 163 (padma.1.40.163)

यज्ञेषु च हविः पाकं शिवमाप च पावकः। प्रवृत्तधर्मसंवृत्ता लोका मुदितमानसाः।

yajñeṣu ca haviḥ pākaṁ śivamāpa ca pāvakaḥ pravṛttadharmasaṁvṛttā lokā muditamānasāḥ

यज्ञों में हविष्य का पाक शुभ हुआ, और अग्नि शांत हो गई; धर्म में प्रवृत्त लोक प्रसन्नचित्त हो गए।

श्लोक 164 (padma.1.40.164)

विष्णोः सत्यप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधना गिरः। ततो भयं विष्णुमुखाच्छ्रुत्वा दैतेयदानवाः।

viṣṇoḥ satyapratijñasya śrutvārinidhanā giraḥ tato bhayaṁ viṣṇumukhācchrutvā daiteyadānavāḥ

सत्यप्रतिज्ञ विष्णु के शत्रुनाश की वाणी सुनकर, विष्णु के मुख से ही यह भययुक्त वचन सुनकर दैत्य-दानव,

श्लोक 165 (padma.1.40.165)

उद्योगं विपुलं चक्रुर्युद्धाय विजयाय च। मयस्तु कांचनमयं त्रिनल्वांतरमव्ययम्।

udyogaṁ vipulaṁ cakruryuddhāya vijayāya ca mayastu kāṁcanamayaṁ trinalvāṁtaramavyayam

युद्ध और विजय के लिए विशाल उद्योग करने लगे। मय ने स्वर्णमय, तीन नल्व विस्तार वाला, अव्यय रथ बनाया,

श्लोक 166 (padma.1.40.166)

चतुश्चक्रं सुविपुलं सुकल्पितमहायुधम्। किंकिणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम्।

catuścakraṁ suvipulaṁ sukalpitamahāyudham kiṁkiṇījālanirghoṣaṁ dvīpicarmapariṣkṛtam

चार पहियों वाला, अत्यंत विशाल, महान् आयुधों से सुसज्जित, घंटियों के जाल से गूँजता, द्वीपिचर्म से सुशोभित,

श्लोक 167 (padma.1.40.167)

रुचिरं रश्मिजालैश्च हैमजालैश्च शोभितम्। ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिसंघविराजितम्।

ruciraṁ raśmijālaiśca haimajālaiśca śobhitam īhāmṛgagaṇākīrṇaṁ pakṣisaṁghavirājitam

किरणजालों और स्वर्णजालों से रुचिर और सुशोभित, वन्य-मृगों के समूहों से भरा, पक्षिसमूहों से सुशोभित,

श्लोक 168 (padma.1.40.168)

दिव्यास्त्रशस्त्ररुचिरं पयोधरनिनादितम्। स्वक्षं रथवरोदारं सूपस्थं गगनोपमम्।

divyāstraśastraruciraṁ payodharanināditam svakṣaṁ rathavarodāraṁ sūpasthaṁ gaganopamam

दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से रुचिर, मेघों जैसा गूँजता, सुंदर धुरी वाला, उदार और श्रेष्ठ रथ, सुंदर स्थान वाला, आकाश जैसा,

श्लोक 169 (padma.1.40.169)

गदापरिघसंपूर्णं मूर्तिमंतमिवार्णवम्। हेमकेयूरवलयं चंद्रमंडलकूबरम्।

gadāparighasaṁpūrṇaṁ mūrtimaṁtamivārṇavam hemakeyūravalayaṁ caṁdramaṁḍalakūbaram

गदा-परिघों से भरा, मानो साकार समुद्र, स्वर्णकेयूर-कंकणों वाला, चंद्रमंडल-सी धुरी वाला,

श्लोक 170 (padma.1.40.170)

सपताकध्वजोपेतं सादित्यमिव मंदरम्। गजेंद्राभोगवपुषं क्वचित्केसरवर्चसम्।

sapatākadhvajopetaṁ sādityamiva maṁdaram gajeṁdrābhogavapuṣaṁ kvacitkesaravarcasam

पताका-ध्वज से युक्त, मानो सूर्य सहित मंदर पर्वत, गजेंद्र जैसे विशाल रूप वाला, कहीं सिंह-अयाल जैसी कांति वाला,

श्लोक 171 (padma.1.40.171)

युक्तमृक्षसहस्रेण सुधारांबुदनादितम्। दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम्।

yuktamṛkṣasahasreṇa sudhārāṁbudanāditam dīptamākāśagaṁ divyaṁ rathaṁ pararathārujam

हजार भालुओं से जुता हुआ, अमृतवर्षी मेघों जैसा गूँजता, दीप्त, आकाशगामी दिव्य रथ, शत्रु के रथों को तोड़ने वाला --

श्लोक 172 (padma.1.40.172)

अध्यतिष्ठद्रणाकांक्षी मेरुं दीप्तमिवांशुमान्। तारस्तु क्रोशविस्तारमायामे च तथाविधम्।

adhyatiṣṭhadraṇākāṁkṣī meruṁ dīptamivāṁśumān tārastu krośavistāramāyāme ca tathāvidham

उस पर युद्धेच्छु वह आरूढ़ हुआ, मानो तेजस्वी सूर्य दीप्त मेरु पर। अब तारा (के रथ) की चौड़ाई एक क्रोश थी, और लंबाई भी वैसी ही,

श्लोक 173 (padma.1.40.173)

शैलकूबरसंकाशं नीलांजनचयोपमम्। काललोहस्य रत्नानां समूहाबद्धकूबरम्।

śailakūbarasaṁkāśaṁ nīlāṁjanacayopamam kālalohasya ratnānāṁ samūhābaddhakūbaram

उसकी धुरी पर्वत जैसी, नीले अंजन के समूह-सी, काले लोहे और रत्नों के समूहों से बँधी धुरी वाली,

श्लोक 174 (padma.1.40.174)

तिमिरोद्गारकिरणं गर्जंतमिव तोयदम्। लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम्।

timirodgārakiraṇaṁ garjaṁtamiva toyadam lohajālena mahatā sagavākṣeṇa daṁśitam

अंधकार की किरणें उगलती, मानो गरजता हुआ मेघ, गवाक्षों सहित विशाल लौह-जाल से कवचित,

श्लोक 175 (padma.1.40.175)

आयसैः परिघैः पूर्णं क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः। प्रासैः पाशैश्च विततैरसंयुक्तैश्च कण्टकैः।

āyasaiḥ parighaiḥ pūrṇaṁ kṣepaṇīyaiśca mudgaraiḥ prāsaiḥ pāśaiśca vitatairasaṁyuktaiśca kaṇṭakaiḥ

लौह-परिघों से भरी, फेंकने योग्य मुद्गरों से युक्त, प्रासों-पाशों से विस्तृत, असंयुक्त कंटकों से युक्त,

श्लोक 176 (padma.1.40.176)

शोभितं त्रासनीयैश्च तोमरैः सपरश्वधैः। उद्यतं द्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मंदरम्।

śobhitaṁ trāsanīyaiśca tomaraiḥ saparaśvadhaiḥ udyataṁ dviṣatāṁ hetordvitīyamiva maṁdaram

भयंकर तोमरों और परशुओं से सुशोभित, शत्रुओं के लिए उठा हुआ, मानो दूसरा मंदर पर्वत --

श्लोक 177 (padma.1.40.177)

युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम्। विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः।

yuktaṁ kharasahasreṇa so'dhyārohadrathottamam virocanastu saṁkruddho gadāpāṇiravasthitaḥ

हजार गधों से जुते उस श्रेष्ठ रथ पर वह आरूढ़ हुआ। और विरोचन, अत्यंत क्रुद्ध, गदा हाथ में लिए,

श्लोक 178 (padma.1.40.178)

प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृंग इवाचलः। युक्तं हयसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः।

pramukhe tasya sainyasya dīptaśṛṁga ivācalaḥ yuktaṁ hayasahasreṇa hayagrīvastu dānavaḥ

उस सेना के अग्रभाग में, मानो दीप्त शिखरों वाला पर्वत, खड़ा हुआ। हजार अश्वों से जुता हुआ दानव हयग्रीव,

श्लोक 179 (padma.1.40.179)

व्यूहितं दानवव्यूहं परिचक्राम वीर्यवान्। विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुंडलभूषणः।

vyūhitaṁ dānavavyūhaṁ paricakrāma vīryavān vipracittisutaḥ śvetaḥ śvetakuṁḍalabhūṣaṇaḥ

उस दानव-व्यूह में घूमता रहा, वह वीर्यवान्; विप्रचित्ति का पुत्र श्वेत, श्वेत कुंडलों से भूषित,

श्लोक 180 (padma.1.40.180)

स्यंदनं वाहयामास परानीकस्य मर्दनः। व्यायतं किष्कुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन्महत्।

syaṁdanaṁ vāhayāmāsa parānīkasya mardanaḥ vyāyataṁ kiṣkusāhasraṁ dhanurvisphārayanmahat

शत्रुसेना को कुचलने वाला, अपना रथ चलाने लगा, हजार किष्कु लंबा महान् धनुष खींचते हुए,

श्लोक 181 (padma.1.40.181)

स चाहवमुखे तस्थौ सप्ररोह इवाचलः। खरस्तु विष्किरिन्क्रोधान्नेत्राभ्यां रोपजं जलम्।

sa cāhavamukhe tasthau sapraroha ivācalaḥ kharastu viṣkirinkrodhānnetrābhyāṁ ropajaṁ jalam

और वह युद्ध के अग्रभाग में खड़ा हुआ, मानो नई कोंपलों वाला पर्वत। खर, क्रोध से नेत्रों से अश्रुजल बिखेरते हुए,

श्लोक 182 (padma.1.40.182)

स्फुरद्दंतौष्ठनयनः संग्रामं सोभ्यकांक्षत। त्वष्टा त्वष्टादशहयं यानमास्थाय दानवः।

sphuraddaṁtauṣṭhanayanaḥ saṁgrāmaṁ sobhyakāṁkṣata tvaṣṭā tvaṣṭādaśahayaṁ yānamāsthāya dānavaḥ

दाँत, होंठ, नेत्र फड़कते हुए, युद्ध की कामना करने लगा। दानव त्वष्टा, अठारह अश्वों वाले यान पर आरूढ़ होकर,

श्लोक 183 (padma.1.40.183)

दिव्यव्यूहप्रतीकाशा युद्धायाभिमुखः स्थितः। अरिष्टो बलिपुत्रश्च वरिष्ठो दुर्धरायुधः।

divyavyūhapratīkāśā yuddhāyābhimukhaḥ sthitaḥ ariṣṭo baliputraśca variṣṭho durdharāyudhaḥ

दिव्य व्यूह-सा दिखता हुआ, युद्ध के लिए सामने खड़ा हुआ। बलि का पुत्र अरिष्ट, श्रेष्ठ, दुर्धर आयुधों वाला,

श्लोक 184 (padma.1.40.184)

युद्धायाभिमुखस्तस्थौ धराधरविकंपनः। किशोरस्त्वतिसंहर्षात्किशोर इव चोदितः।

yuddhāyābhimukhastasthau dharādharavikaṁpanaḥ kiśorastvatisaṁharṣātkiśora iva coditaḥ

युद्ध के लिए सामने खड़ा हुआ, पर्वतों को भी कँपा देने वाला। किशोर, अत्यंत हर्ष से किशोर की भाँति प्रेरित होकर,

श्लोक 185 (padma.1.40.185)

अभवद्दैत्यमध्ये स ग्रहमध्ये यथा रविः। लंबस्तु नवमेघाभः प्रलंबांबरभूषणः।

abhavaddaityamadhye sa grahamadhye yathā raviḥ laṁbastu navameghābhaḥ pralaṁbāṁbarabhūṣaṇaḥ

दैत्यों के मध्य ग्रहों के बीच सूर्य के समान हो गया। लंब, नए मेघ-सा श्याम, लंबे वस्त्रों से सुशोभित,

श्लोक 186 (padma.1.40.186)

दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान्। वसुंधराभस्तदनु दशनौष्ठेक्षणायुधः।

daityavyūhagato bhāti sanīhāra ivāṁśumān vasuṁdharābhastadanu daśanauṣṭhekṣaṇāyudhaḥ

दैत्य-व्यूह में स्थित होकर कोहरे में सूर्य की भाँति चमक रहा था। उसके बाद वसुंधराभ, जिसके दाँत-होंठ-नेत्र ही आयुध थे,

श्लोक 187 (padma.1.40.187)

हसंस्तिष्ठति दैत्यानाम्मध्ये क्रूर महाग्रहः। अन्ये हयगतास्तत्र मत्तेभेंद्रगताः परे।

hasaṁstiṣṭhati daityānāmmadhye krūra mahāgrahaḥ anye hayagatāstatra mattebheṁdragatāḥ pare

दैत्यों के बीच हँसता हुआ खड़ा था, क्रूर महाग्रह-सा। कुछ अश्वारूढ़ थे, कुछ मत्त गजेंद्र पर सवार,

श्लोक 188 (padma.1.40.188)

सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहर्क्षेषु चापरे। केचित्खरोष्ट्रयातारः केचित्तोयदवाहनाः।

siṁhavyāghragatāścānye varāharkṣeṣu cāpare kecitkharoṣṭrayātāraḥ kecittoyadavāhanāḥ

कुछ सिंह-व्याघ्रों पर, कुछ वराह-भालुओं पर सवार थे; कुछ गधों-ऊँटों पर चलने वाले, कुछ मेघों को वाहन बनाने वाले,

श्लोक 189 (padma.1.40.189)

पत्तयश्चापरे दैत्या भीषणा विकृताननाः। एकपादास्त्वपादाश्च ननृतुर्युद्धकांक्षिणः।

pattayaścāpare daityā bhīṣaṇā vikṛtānanāḥ ekapādāstvapādāśca nanṛturyuddhakāṁkṣiṇaḥ

और अन्य पैदल दैत्य, भयंकर, विकृत मुखों वाले; एक पैर वाले और बिना पैर वाले भी, युद्धेच्छु होकर नाचने लगे।

श्लोक 190 (padma.1.40.190)

आस्फोटयंतो बहवः स्वनंतश्च तथापरे। दृप्तशार्दूलनिर्घोषा नेदुर्दानवपुङ्गवाः।

āsphoṭayaṁto bahavaḥ svanaṁtaśca tathāpare dṛptaśārdūlanirghoṣā nedurdānavapuṅgavāḥ

बहुत से भुजाएँ फटकारते हुए, कुछ गरजते हुए भी -- अभिमानी सिंहों जैसी दहाड़ के साथ दानवश्रेष्ठ गरजने लगे।

श्लोक 191 (padma.1.40.191)

ते गदापरिघैर्घोरैः शिलामुद्गरपाणयः। बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयंति स्म देवताः।

te gadāparighairghoraiḥ śilāmudgarapāṇayaḥ bāhubhiḥ parighākāraistarjayaṁti sma devatāḥ

वे भयंकर गदा-परिघों से, शिला-मुद्गर हाथों में लिए, परिघ जैसी भुजाओं से देवताओं को धमकाने लगे।

श्लोक 192 (padma.1.40.192)

प्रासैः खड्गैश्च पाशैश्च तोमरांकुशपट्टिशैः। चिक्रीडुस्ते शतघ्नीभिः शतधारैश्च मुद्गरैः।

prāsaiḥ khaḍgaiśca pāśaiśca tomarāṁkuśapaṭṭiśaiḥ cikrīḍuste śataghnībhiḥ śatadhāraiśca mudgaraiḥ

प्रास, खड्ग, पाश, तोमर, अंकुश और पट्टिशों से, शतघ्नियों और सौ धार वाले मुद्गरों से वे क्रीड़ा करने लगे।

श्लोक 193 (padma.1.40.193)

खड्गशैलैश्च शैलैश्च परिघैश्चोद्यतायुधैः। युक्तं बलाहकगणैः सर्वतः संवृतं नभः।

khaḍgaśailaiśca śailaiśca parighaiścodyatāyudhaiḥ yuktaṁ balāhakagaṇaiḥ sarvataḥ saṁvṛtaṁ nabhaḥ

खड्ग-पर्वतों और पर्वतों से, परिघों और उठे हुए आयुधों से -- मेघसमूहों से युक्त आकाश चारों ओर से घिर गया।

श्लोक 194 (padma.1.40.194)

एवं तद्दानवं सैन्यं सर्वसत्वमदोत्कटम्। देवताभिमुखं तस्थौ मेघानीकमिवोदितम्।

evaṁ taddānavaṁ sainyaṁ sarvasatvamadotkaṭam devatābhimukhaṁ tasthau meghānīkamivoditam

इस प्रकार वह दानवसेना, सर्वप्राणियों के मद से उत्कट, देवताओं के सामने मेघों की सेना की भाँति उठकर खड़ी हुई।

श्लोक 195 (padma.1.40.195)

रेजे च तद्दैत्यसहस्रगाढं वाय्वग्निशैलांबुदतोयकल्पम्। बलं बलौघाकुलमभ्युदीर्णं युयुत्सयोन्मत्तमिवा बभासे।

reje ca taddaityasahasragāḍhaṁ vāyvagniśailāṁbudatoyakalpam balaṁ balaughākulamabhyudīrṇaṁ yuyutsayonmattamivā babhāse

वह हजारों दैत्यों से सघन, वायु-अग्नि-पर्वत-मेघ-जल जैसी वह सेना, अपनी ही भीड़ से व्याकुल, उठी हुई, मानो युद्ध की इच्छा से उन्मत्त होकर चमक रही थी।

श्लोक 196 (padma.1.40.196)

श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तारः कुरुनंदन। सुराणामपि सैन्यस्य विस्तरं वैष्णवं शृणु।

śrutaste daityasainyasya vistāraḥ kurunaṁdana surāṇāmapi sainyasya vistaraṁ vaiṣṇavaṁ śṛṇu

हे कुरुनंदन, तुमने दैत्यसेना का विस्तार सुन लिया; अब मुझसे देवताओं की, विष्णु की सेना का विस्तार भी सुनो।

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