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सृष्टि खण्ड · अध्याय 44

कुमारसंभवतारकवध

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

श्लोक 1 (padma.1.44.1)

शर्व उवाच। शरीरे मम तन्वंगि सिते भास्यसितद्युतिः। भुजंगी वा सिता शुभ्रे संश्लिष्टा चंदनेतरौ

śarva uvāca śarīre mama tanvaṁgi site bhāsyasitadyutiḥ bhujaṁgī vā sitā śubhre saṁśliṣṭā caṁdanetarau

शर्व ने कहा — हे तन्वंगी! मेरे शरीर पर श्वेत भस्म में तुम्हारी यह श्याम कांति — क्या तुम श्वेत भुजंगिनी हो, या असमान रूप से लगा चंदन?

श्लोक 2 (padma.1.44.2)

चंद्रातपेन संपृक्ता रुधिराम्बरसंवृता। रजनी वा सिते पक्षे दृष्टिदोषं ददासि मे

caṁdrātapena saṁpṛktā rudhirāmbarasaṁvṛtā rajanī vā site pakṣe dṛṣṭidoṣaṁ dadāsi me

चंद्रकिरणों से युक्त, रक्तवस्त्र से ढकी — क्या तुम शुक्ल पक्ष की रात्रि हो? तुम मेरी दृष्टि को दोषी बना रही हो।

श्लोक 3 (padma.1.44.3)

इत्युक्ता गिरिजा तेन मुक्तकंठा पिनाकिनम्। उवाच कोपरक्ताक्षी भ्रुकुटी विकृतानना

ityuktā girijā tena muktakaṁṭhā pinākinam uvāca koparaktākṣī bhrukuṭī vikṛtānanā

यह सुनकर गिरिजा ने खुले कंठ से, क्रोध से लाल नेत्रों, टेढ़ी भौंहों और विकृत मुख से पिनाकधारी से कहा।

श्लोक 4 (padma.1.44.4)

देव्युवाच-। स्वकृतेन जनः सर्वो जाड्येन परिभूयते। अवश्यमर्थी प्राप्नोति खंडनं शशिमंडन

devyuvāca- svakṛtena janaḥ sarvo jāḍyena paribhūyate avaśyamarthī prāpnoti khaṁḍanaṁ śaśimaṁḍana

देवी ने कहा — हर व्यक्ति अपने ही कर्म की जड़ता से पराभूत होता है। जो निश्चय ही चाहता है, वह अवश्य तिरस्कार पाता है, हे शशिमौलि।

श्लोक 5 (padma.1.44.5)

तपोभिर्दीर्घचरितैर्या त्वां प्रार्थितवत्यहं। तस्या मेनि यतस्त्वेष ह्यवमानः पदे पदे

tapobhirdīrghacaritairyā tvāṁ prārthitavatyahaṁ tasyā meni yatastveṣa hyavamānaḥ pade pade

जिस तुम्हें मैंने दीर्घकाल के तप से पाने की कामना की, उसी की ओर से यह अपमान पग-पग पर मुझे झेलना पड़ता है।

श्लोक 6 (padma.1.44.6)

नैवास्मि कुटिला शर्व विषमा न च धूर्जटे। सविषस्त्वं जगत्ख्यातो व्यक्तदोषाकराश्रयः

naivāsmi kuṭilā śarva viṣamā na ca dhūrjaṭe saviṣastvaṁ jagatkhyāto vyaktadoṣākarāśrayaḥ

मैं कुटिल नहीं हूँ, शर्व, न ही विषम, हे धूर्जटि। तुम ही तो जगत में विषधारी, स्पष्ट दोषों के आश्रय के रूप में विख्यात हो।

श्लोक 7 (padma.1.44.7)

त्वं हि मुष्णासि दशनान्नेत्रहंता भगस्य च। आदित्यस्त्वां विजानाति भगवान्द्वादशात्मकः

tvaṁ hi muṣṇāsi daśanānnetrahaṁtā bhagasya ca ādityastvāṁ vijānāti bhagavāndvādaśātmakaḥ

तुम ही दाँत चुराने वाले, भग के नेत्र के नाशक हो। द्वादशरूपी भगवान आदित्य तुम्हें भली-भाँति जानते हैं।

श्लोक 8 (padma.1.44.8)

मूर्ध्नि शूलं जनयसि स्वैर्दोषैर्मामधिक्षिपन्। यस्त्वं मामात्थकृष्णेति महाकालोसि विश्रुतः

mūrdhni śūlaṁ janayasi svairdoṣairmāmadhikṣipan yastvaṁ māmātthakṛṣṇeti mahākālosi viśrutaḥ

अपने ही दोषों से मुझे धिक्कारते हुए तुम मेरे सिर में शूल उत्पन्न करते हो — तुम जो मुझे 'कृष्णा' कहते हो, स्वयं महाकाल नाम से विख्यात हो!

श्लोक 9 (padma.1.44.9)

यास्याम्यहं परित्यक्तुमात्मानं तपसा गिरिम्। जीवंत्या न मया कृत्यं धूर्तेन परिभूतया

yāsyāmyahaṁ parityaktumātmānaṁ tapasā girim jīvaṁtyā na mayā kṛtyaṁ dhūrtena paribhūtayā

मैं जाऊँगी, तप से अपने आप को त्यागने पर्वत पर। एक धूर्त से अपमानित होकर जीवित रहने से मुझे कोई प्रयोजन नहीं।

श्लोक 10 (padma.1.44.10)

कापालिकेन क्षुद्रेण श्मशाने नित्यवासिना। भूत्या विलिप्त स्वांगेन मातृमध्यस्थ चारिणा

kāpālikena kṣudreṇa śmaśāne nityavāsinā bhūtyā vilipta svāṁgena mātṛmadhyastha cāriṇā

—एक क्षुद्र कापालिक, श्मशान का नित्यवासी, जिसका शरीर भस्म से लिपटा, जो मातृगणों के बीच विचरता है!

श्लोक 11 (padma.1.44.11)

निशम्य तस्या वचनं कोपतीक्ष्णाक्षरं हरः। उवाचानिष्टसंभ्रांतः प्रचलेनेंदुमौलिना

niśamya tasyā vacanaṁ kopatīkṣṇākṣaraṁ haraḥ uvācāniṣṭasaṁbhrāṁtaḥ pracaleneṁdumaulinā

उसके क्रोध-तीक्ष्ण वचन सुनकर हर, इस अनिष्ट से व्याकुल होकर, चंद्रमौलि काँपते हुए बोले।

श्लोक 12 (padma.1.44.12)

शर्व उवाच। अगात्मजासि गिरिजे नाहं निंदापरस्तव। चाटूक्तिबुध्या तु मया कृत उन्मादसंश्रयः

śarva uvāca agātmajāsi girije nāhaṁ niṁdāparastava cāṭūktibudhyā tu mayā kṛta unmādasaṁśrayaḥ

शर्व ने कहा — हे गिरिजे! तुम पर्वत की पुत्री हो, मैं तुम्हारी निंदा में लीन नहीं हूँ। यह तो मैंने केवल परिहासवश ही उन्माद का सहारा लिया।

श्लोक 13 (padma.1.44.13)

विकल्पः स्वस्थचित्ते तु गिरिजे न मम क्रमात्। यद्येवं कुपिता भीरु तत्तवाहं न वै पुनः

vikalpaḥ svasthacitte tu girije na mama kramāt yadyevaṁ kupitā bhīru tattavāhaṁ na vai punaḥ

हे गिरिजे! मेरे स्वस्थ चित्त में तुम्हारे प्रति कोई संदेह नहीं, यह कभी मेरा तरीका नहीं रहा। यदि तुम इतनी क्रुद्ध हो, हे भीरु, तो मैं फिर कभी—

श्लोक 14 (padma.1.44.14)

नर्मवादी भविष्यामि जहि कोपं शुचिस्मिते। शिरसा प्रणतेनैष रचितस्ते मयांजलि

narmavādī bhaviṣyāmi jahi kopaṁ śucismite śirasā praṇatenaiṣa racitaste mayāṁjali

—परिहासवादी नहीं बनूँगा। क्रोध त्याग दो, हे शुचिस्मिते! सिर झुकाकर मैंने यह तुम्हें अंजलि अर्पित की है।

श्लोक 15 (padma.1.44.15)

नि हीनो ह्यपमानेन निंदिते नैति विक्रियाम्। असतां तु सतां न स्यान्मर्मस्पृष्टो नरः किल

ni hīno hyapamānena niṁdite naiti vikriyām asatāṁ tu satāṁ na syānmarmaspṛṣṭo naraḥ kila

नीच व्यक्ति अपमान से अपमानित होने पर विचलित नहीं होता, परंतु सज्जन मर्म पर आघात पाकर अवश्य विचलित होता है।

श्लोक 16 (padma.1.44.16)

अनेकैश्चाटुभिर्देवी देवेन प्रतिबोधिता। कोपं तीव्रं न तत्याज सती मर्मणि घट्टिता

anekaiścāṭubhirdevī devena pratibodhitā kopaṁ tīvraṁ na tatyāja satī marmaṇi ghaṭṭitā

अनेक मधुर वचनों से देव द्वारा समझाई जाने पर भी देवी ने अपना तीव्र क्रोध नहीं त्यागा, मर्मस्थल पर घायल वह सती।

श्लोक 17 (padma.1.44.17)

अवष्टब्धमथाच्छिद्य वासः शंकरपाणिना। विपर्यस्तालकावेगाद्गन्तुमैच्छच्च शैलजा

avaṣṭabdhamathācchidya vāsaḥ śaṁkarapāṇinā viparyastālakāvegādgantumaicchacca śailajā

शंकर के हाथ से पकड़े गए अपने वस्त्र को छुड़ाकर, केशों के बिखर जाने से, शैलजा जाने की इच्छा करने लगी।

श्लोक 18 (padma.1.44.18)

तस्या व्रजंत्याः कोपेन पुनराह पुरांतकः। सत्यं सर्वैरवयवैस्तनोषि सदृशां पितुः

tasyā vrajaṁtyāḥ kopena punarāha purāṁtakaḥ satyaṁ sarvairavayavaistanoṣi sadṛśāṁ pituḥ

क्रोध में जाती हुई उससे पुरांतक ने पुनः कहा — सत्य ही, तुम अपने सभी अंगों से अपने पिता के समान प्रतीत होती हो—

श्लोक 19 (padma.1.44.19)

हिमाचलस्य शृंगस्थमेव जालाकुलं मनः। तथा दुरवगाह्येभ्यो गहनो हि तवाशयः

himācalasya śṛṁgasthameva jālākulaṁ manaḥ tathā duravagāhyebhyo gahano hi tavāśayaḥ

—हिमाचल के शिखर के समान ही उलझा हुआ तुम्हारा मन है, वैसे ही तुम्हारा हृदय दुर्गम और गहन है।

श्लोक 20 (padma.1.44.20)

काठिन्यमश्मसारेभ्यो वनेभ्यो बहुलां गता। कुटिलत्वं निम्नगाभ्यो दुःसेव्यत्वं हिमादपि

kāṭhinyamaśmasārebhyo vanebhyo bahulāṁ gatā kuṭilatvaṁ nimnagābhyo duḥsevyatvaṁ himādapi

पत्थर से भी अधिक कठोरता, वनों से भी अधिक सघनता, नदियों से भी अधिक कुटिलता, तथा हिम से भी अधिक दुःसेव्यता—

श्लोक 21 (padma.1.44.21)

संक्रांतं सर्वमेवैतत्तन्वंगि हिमभूधरात्। इत्युक्ता सा पुनः प्राह गिरिशं शैलकन्यका

saṁkrāṁtaṁ sarvamevaitattanvaṁgi himabhūdharāt ityuktā sā punaḥ prāha giriśaṁ śailakanyakā

—ये सब, हे तन्वंगी, तुम्हारे हिमपिता से ही तुम्हें संक्रमित हुए हैं। यह सुनकर शैलकन्या ने पुनः गिरीश से कहा—

श्लोक 22 (padma.1.44.22)

कोपकंपितमूर्द्धा सा प्रस्फुरद्दशनच्छदा। उमोवाच-। स्यात्सर्वं दोषदानेन निंदायां गुणिनो बलात्

kopakaṁpitamūrddhā sā prasphuraddaśanacchadā umovāca- syātsarvaṁ doṣadānena niṁdāyāṁ guṇino balāt

—क्रोध से काँपते सिर, फड़कते होंठों से। उमा ने कहा — दोष लगाने से गुणी में भी दोष बलपूर्वक निंदा में आ ही जाता है।

श्लोक 23 (padma.1.44.23)

तवापि दुष्टसंपर्कात्संक्रांतं सर्वमेव हि। व्यालेभ्योनेकजिह्वत्वं भस्मनोऽस्नेहवृत्तिता

tavāpi duṣṭasaṁparkātsaṁkrāṁtaṁ sarvameva hi vyālebhyonekajihvatvaṁ bhasmano'snehavṛttitā

तुम्हारे भीतर भी दुष्ट संगति से यह सब संक्रमित हुआ है — सर्पों से तुम्हारी अनेक जिह्वाएँ, भस्म से तुम्हारी स्नेहहीनता—

श्लोक 24 (padma.1.44.24)

हृत्कालुष्यं शशांकोत्थं दुर्बाधत्वं विषादपि। किं चात्र बहुनोक्तेन अलं वाचां श्रमेण ते

hṛtkāluṣyaṁ śaśāṁkotthaṁ durbādhatvaṁ viṣādapi kiṁ cātra bahunoktena alaṁ vācāṁ śrameṇa te

—चंद्रमा से तुम्हारे हृदय की मलिनता, दुर्बाध्यता, तथा विष भी। इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ, बहुत हो चुका।

श्लोक 25 (padma.1.44.25)

श्मशानवासान्निर्भीस्त्वं नग्नत्वात्तवनत्रपा। निर्घृणत्वं कपालित्वाद्दया ते विगता चिरम्

śmaśānavāsānnirbhīstvaṁ nagnatvāttavanatrapā nirghṛṇatvaṁ kapālitvāddayā te vigatā ciram

श्मशान-वास से निर्भीकता, नग्नता से निर्लज्जता, कपाल धारण से निर्घृणता — तुम्हारी दया चिरकाल से लुप्त हो चुकी है।

श्लोक 26 (padma.1.44.26)

इत्युक्त्वा मंदिरात्तस्मान्निर्जगाम हिमाद्रिजा। तस्यां व्रजंत्यां देवेश्यां गणैः किलकिलाकृता

ityuktvā maṁdirāttasmānnirjagāma himādrijā tasyāṁ vrajaṁtyāṁ deveśyāṁ gaṇaiḥ kilakilākṛtā

ऐसा कहकर हिमाद्रि की पुत्री उस भवन से निकल गई। देवेश्वरी के जाते समय, गणों के किलकिलाहट से घिरी—

श्लोक 27 (padma.1.44.27)

क्व मातर्गच्छसीत्युक्त्वा रुदद्भिर्धावितं पुनः। विष्टभ्य चरणौ देव्या वीरको बाष्पगद्गदः

kva mātargacchasītyuktvā rudadbhirdhāvitaṁ punaḥ viṣṭabhya caraṇau devyā vīrako bāṣpagadgadaḥ

—'हे माता! कहाँ जा रही हो?' कहते हुए रोते हुए फिर दौड़े; अश्रुगद्गद वीरक देवी के चरणों को रोककर—

श्लोक 28 (padma.1.44.28)

प्रोवाच मातः किन्न्वेतत्क्व यासि कुपितातुरा। अहं त्वामनुयास्यामि व्रजंतीं स्नेहवर्जिताम्

provāca mātaḥ kinnvetatkva yāsi kupitāturā ahaṁ tvāmanuyāsyāmi vrajaṁtīṁ snehavarjitām

—बोला — माता! यह क्या है? क्रुद्ध, व्याकुल होकर कहाँ जा रही हो? स्नेह-त्यागी होकर जाती हुई तुम्हारा मैं अनुसरण करूँगा।

श्लोक 29 (padma.1.44.29)

नोचेत्पतिष्ये शिखराद्गिरेरस्य त्वयोज्झितः। उन्नम्यवदनं देवी दक्षिणेन तु पाणिना

nocetpatiṣye śikharādgirerasya tvayojjhitaḥ unnamyavadanaṁ devī dakṣiṇena tu pāṇinā

नहीं तो, तुम्हारे द्वारा त्याग दिया हुआ, मैं इस पर्वत शिखर से गिर पड़ूँगा। दक्षिण हाथ से उसका मुख उठाकर देवी ने—

श्लोक 30 (padma.1.44.30)

उवाच वीरकं माता त्वं शोकं पुत्र मा कृथाः। शैलाग्रात्पतितुं नैव न च गंतुं मया सह

uvāca vīrakaṁ mātā tvaṁ śokaṁ putra mā kṛthāḥ śailāgrātpatituṁ naiva na ca gaṁtuṁ mayā saha

—वीरक से कहा — माता कहती है, पुत्र! शोक मत करो। न शिखर से गिरना है, न मेरे साथ जाना है।

श्लोक 31 (padma.1.44.31)

युक्तं ते पुत्र गच्छामि येन कार्येण तच्छृणु। कृष्णेत्युक्ता हरेणाहं स्तंभितास्म्यवमानिता

yuktaṁ te putra gacchāmi yena kāryeṇa tacchṛṇu kṛṣṇetyuktā hareṇāhaṁ staṁbhitāsmyavamānitā

हे पुत्र! मैं जिस कार्य से जाती हूँ, वह उचित है, सुनो। हर द्वारा 'कृष्णा' कहे जाने पर मैं स्तब्ध, अपमानित हुई हूँ।

श्लोक 32 (padma.1.44.32)

साहं तपः करिष्यामि येन गौरीत्वमाप्नुयाम्। एष स्त्रीलंपटो देवो यातायां मय्यनंतरम्

sāhaṁ tapaḥ kariṣyāmi yena gaurītvamāpnuyām eṣa strīlaṁpaṭo devo yātāyāṁ mayyanaṁtaram

मैं वह तप करूँगी जिससे गौरी-रूप प्राप्त करूँ। यह देव स्त्रीलंपट है — मेरे जाने के तुरंत बाद—

श्लोक 33 (padma.1.44.33)

द्वाररक्षा त्वया कार्या नित्यं रन्ध्रान्ववेक्षणम्। यथा न काचित्प्रविशेद्योषित्तत्र हरांतिकम्

dvārarakṣā tvayā kāryā nityaṁ randhrānvavekṣaṇam yathā na kācitpraviśedyoṣittatra harāṁtikam

—तुम्हें द्वार की रक्षा करनी होगी, हर छिद्र पर सदा दृष्टि रखनी होगी, ताकि कोई भी स्त्री वहाँ हर के निकट प्रवेश न कर सके।

श्लोक 34 (padma.1.44.34)

दृष्ट्वा परस्त्रियं चापि वदेथा मम पुत्रक। शीघ्रमेव करिष्यामि यथायुक्तमनंतरम्

dṛṣṭvā parastriyaṁ cāpi vadethā mama putraka śīghrameva kariṣyāmi yathāyuktamanaṁtaram

किसी परस्त्री को देखकर मुझे तुरंत बताना, पुत्र। मैं तब उचित कार्य शीघ्र ही करूँगी।

श्लोक 35 (padma.1.44.35)

एवमस्त्विति देवेशीं वीरकोवाच सांप्रतम्। मातुराज्ञामृताहार प्लावितांगो गतज्वरः

evamastviti deveśīṁ vīrakovāca sāṁpratam māturājñāmṛtāhāra plāvitāṁgo gatajvaraḥ

'ऐसा ही हो' कहकर वीरक ने तुरंत देवेश्वरी को उत्तर दिया; माता की आज्ञा को अमृत की तरह पीकर, उसका सारा शरीर आनंद से भर गया, ज्वर मिट गया—

श्लोक 36 (padma.1.44.36)

जगाम रक्षां स द्रष्टुं प्रणिपत्य तु मातरम्। देवी चापश्यदायांतीं सखीं मातुर्विभूषिताम्

jagāma rakṣāṁ sa draṣṭuṁ praṇipatya tu mātaram devī cāpaśyadāyāṁtīṁ sakhīṁ māturvibhūṣitām

—वह माता को प्रणाम कर रक्षा करने चला गया। इसी बीच देवी ने माता की एक सखी को, सज्जित होकर आते देखा—

श्लोक 37 (padma.1.44.37)

कुसुमामोहिनीं नाम तस्य शैलस्य देवताम्। सापि दृष्ट्वा गिरिसुतां स्नेहविक्लवमानसा

kusumāmohinīṁ nāma tasya śailasya devatām sāpi dṛṣṭvā girisutāṁ snehaviklavamānasā

—कुसुमामोहिनी नाम्नी, उस पर्वत की देवता। उसने भी पर्वतपुत्री को देखकर, स्नेह से व्याकुल होकर—

श्लोक 38 (padma.1.44.38)

क्व पुत्रि गच्छसीत्युच्चैरालिग्योवाच देवता। सा तस्याः सर्वमाचख्यौ शंकरात्कोपकारणम्

kva putri gacchasītyuccairāligyovāca devatā sā tasyāḥ sarvamācakhyau śaṁkarātkopakāraṇam

—'बेटी! कहाँ जा रही हो?' कहकर ऊँची आवाज़ में आलिंगन किया। उसने उसे सब कुछ — शंकर के प्रति क्रोध का कारण — बता दिया।

श्लोक 39 (padma.1.44.39)

पुनश्चोवाचगिरिजा देवतां मातृसंमिताम्। उमोवाच-। नित्यं शैलाधिराजस्य देवतात्वमनिंदिते

punaścovācagirijā devatāṁ mātṛsaṁmitām umovāca- nityaṁ śailādhirājasya devatātvamaniṁdite

गिरिजा ने पुनः माता-समान उस देवता से कहा। उमा ने कहा — हे अनिंदिते! तुम सदा पर्वतराज की अधिष्ठात्री देवता हो—

श्लोक 40 (padma.1.44.40)

सर्वतः सन्निधानं ते मनसातीव वत्सला। अतस्तु ते प्रवक्ष्यामि यद्विधेयं त्वयांबिके

sarvataḥ sannidhānaṁ te manasātīva vatsalā atastu te pravakṣyāmi yadvidheyaṁ tvayāṁbike

—तुम्हारी सर्वत्र उपस्थिति है, और तुम्हारा हृदय अत्यंत वत्सल है। इसीलिए, हे अंबिके! मैं तुम्हें बताती हूँ जो तुम्हें करना है।

श्लोक 41 (padma.1.44.41)

अन्यस्त्रीसंप्रवेशस्तु त्वया रक्ष्यः प्रयत्नतः। सरहस्ये प्रयत्नेन निषेव्यः सततं गिरौ

anyastrīsaṁpraveśastu tvayā rakṣyaḥ prayatnataḥ sarahasye prayatnena niṣevyaḥ satataṁ girau

किसी अन्य स्त्री के प्रवेश की तुम्हें पूरे प्रयत्न से रक्षा करनी है, गुप्त रूप से पर्वत पर सदा सावधानी से निगरानी रखनी है।

श्लोक 42 (padma.1.44.42)

पिनाकिनः प्रविष्टायां वक्तव्यं मे त्वयानघे। ततोहं संविधास्यामि यत्क्षमं तदनंतरम्

pinākinaḥ praviṣṭāyāṁ vaktavyaṁ me tvayānaghe tatohaṁ saṁvidhāsyāmi yatkṣamaṁ tadanaṁtaram

पिनाकधारी के पास किसी स्त्री के प्रवेश करने पर मुझे बताना, हे अनघे! तब मैं जो उचित हो, तुरंत करूँगी।

श्लोक 43 (padma.1.44.43)

इत्युक्ता तां तथेत्युक्त्त्वा जगाम सा गिरिं शुभा। उमापि पितुरुद्यानं जगामाद्रिसुताद्भुतम्

ityuktā tāṁ tathetyukttvā jagāma sā giriṁ śubhā umāpi piturudyānaṁ jagāmādrisutādbhutam

यह कहे जाने पर उसने 'ऐसा ही हो' कहा और वह शुभा पर्वत की ओर चली गई। उमा भी अपने पिता के अद्भुत उद्यान को गई।

श्लोक 44 (padma.1.44.44)

अंतरिक्षं समाविश्य मेघमालाविलप्रभम्। भूषणानि ततो न्यस्य वृक्षवल्कलधारिणी

aṁtarikṣaṁ samāviśya meghamālāvilaprabham bhūṣaṇāni tato nyasya vṛkṣavalkaladhāriṇī

मेघमाला के समान धुँधले आकाश में प्रवेश कर, आभूषण त्यागकर, वृक्ष की छाल धारण की।

श्लोक 45 (padma.1.44.45)

ग्रीष्मे पंचाग्निसंतप्ता वर्षासु च जलोषिता। वन्याहारा निराहारा शुष्कस्थंडिलशायिनी

grīṣme paṁcāgnisaṁtaptā varṣāsu ca jaloṣitā vanyāhārā nirāhārā śuṣkasthaṁḍilaśāyinī

ग्रीष्म में पंचाग्नि से तप्त, वर्षा में जल में निवास करती, वन्य आहार या निराहार रहती, सूखी भूमि पर सोती हुई—

श्लोक 46 (padma.1.44.46)

एवं साधयती तत्र तपः सा च व्यवस्थिता। ज्ञात्वा गतां गिरिसुतां दैत्यस्तत्रांतरे बली

evaṁ sādhayatī tatra tapaḥ sā ca vyavasthitā jñātvā gatāṁ girisutāṁ daityastatrāṁtare balī

—इस प्रकार वह वहाँ तप-साधना में स्थित रही। इसी बीच पर्वतपुत्री के चले जाने की बात जानकर एक बलवान दैत्य—

श्लोक 47 (padma.1.44.47)

अंधकस्य सुतो हृष्टः पितुर्वधमनुस्मरन्। देवान्सर्वान्विजित्याजौ बकभ्राता रणोत्कटः

aṁdhakasya suto hṛṣṭaḥ piturvadhamanusmaran devānsarvānvijityājau bakabhrātā raṇotkaṭaḥ

—अंधक का पुत्र, अपने पिता के वध का स्मरण करता हुआ प्रसन्न, समस्त देवों को युद्ध में जीतकर, बक का भ्राता, युद्धोन्मत्त—

श्लोक 48 (padma.1.44.48)

आडिर्नामांतरप्रेक्षी सततं चंद्रमौलिनः। आजगामामररिपुः पुरं त्रिपुरघातिनः

āḍirnāmāṁtaraprekṣī satataṁ caṁdramaulinaḥ ājagāmāmararipuḥ puraṁ tripuraghātinaḥ

—आडि नामक, सदा चंद्रमौलि का छिद्र ढूँढ़ता हुआ वह देवशत्रु त्रिपुरघातक शिव के नगर में आया।

श्लोक 49 (padma.1.44.49)

स तत्रागत्य ददृशे वीरकं द्वार्यवस्थितम्। विचिंत्य सोपि च वरं दत्तं कमलयोनिना

sa tatrāgatya dadṛśe vīrakaṁ dvāryavasthitam viciṁtya sopi ca varaṁ dattaṁ kamalayoninā

वहाँ पहुँचकर उसने द्वार पर स्थित वीरक को देखा। उसने कमलयोनि ब्रह्मा द्वारा दिए गए वर का भी स्मरण किया।

श्लोक 50 (padma.1.44.50)

हते किलांधके दैत्ये गिरिशेनासुरद्विषा। आडिश्चकार विपुलं तपः परमदारुणम्

hate kilāṁdhake daitye giriśenāsuradviṣā āḍiścakāra vipulaṁ tapaḥ paramadāruṇam

जब असुरद्वेषी गिरीश द्वारा दैत्य अंधक मारा गया था, तब आडि ने अत्यंत घोर, विशाल तप किया था।

श्लोक 51 (padma.1.44.51)

समागत्याब्रवीद्ब्रह्मा तपसा परितोषितः। किमाडे दानवश्रेष्ठ तपसा प्राप्तुमिच्छसि

samāgatyābravīdbrahmā tapasā paritoṣitaḥ kimāḍe dānavaśreṣṭha tapasā prāptumicchasi

तप से संतुष्ट होकर ब्रह्मा आकर बोले — हे आडि, दानवश्रेष्ठ! तप से तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो?

श्लोक 52 (padma.1.44.52)

ब्रह्माणमाह दैत्यस्तु निर्मृत्युत्वमहं वृणे। ब्रह्मोवाच-। जातानामिह संसारे विना मृत्युं न युज्यते

brahmāṇamāha daityastu nirmṛtyutvamahaṁ vṛṇe brahmovāca- jātānāmiha saṁsāre vinā mṛtyuṁ na yujyate

दैत्य ने ब्रह्मा से कहा — मैं मृत्युरहितत्व चाहता हूँ। ब्रह्मा ने कहा — इस संसार में जन्मे हुओं के लिए मृत्यु के बिना संभव नहीं।

श्लोक 53 (padma.1.44.53)

यतस्ततोपि दैत्येंद्र मृत्युः प्राप्यश्शरीरिभिः। इत्युक्तो दैत्यसिंहस्तु प्रोवाचांबुजसंभवम्

yatastatopi daityeṁdra mṛtyuḥ prāpyaśśarīribhiḥ ityukto daityasiṁhastu provācāṁbujasaṁbhavam

अतः, हे दैत्येंद्र! मृत्यु सभी देहधारियों को अवश्य प्राप्त होगी। यह सुनकर उस दैत्यसिंह ने कमलसंभव से कहा।

श्लोक 54 (padma.1.44.54)

रूपस्यपरिवर्तो मे यदा स्यात्पद्मसंभव। तदा मृत्युर्मम भवेदन्यथा त्वमरोस्म्यहम्

rūpasyaparivarto me yadā syātpadmasaṁbhava tadā mṛtyurmama bhavedanyathā tvamarosmyaham

हे पद्मसंभव! जब मेरे रूप का परिवर्तन हो, तभी मेरी मृत्यु हो, अन्यथा मैं अमर रहूँ।

श्लोक 55 (padma.1.44.55)

इत्युक्तस्तु तदोवाच तुष्टः कमलसंभवः। यदा द्वितीयो रूपस्य विवर्त्तस्ते भविष्यति

ityuktastu tadovāca tuṣṭaḥ kamalasaṁbhavaḥ yadā dvitīyo rūpasya vivarttaste bhaviṣyati

यह सुनकर संतुष्ट कमलसंभव ने कहा — जब तुम्हारे रूप का दूसरा परिवर्तन होगा—

श्लोक 56 (padma.1.44.56)

तदा ते भविता मृत्युरन्यथा न भविष्यति। इत्युक्तोमरतां मेने दैत्यसूनुर्महाबलः

tadā te bhavitā mṛtyuranyathā na bhaviṣyati ityuktomaratāṁ mene daityasūnurmahābalaḥ

—तभी तुम्हारी मृत्यु होगी, अन्यथा नहीं। यह सुनकर उस महाबली दैत्यपुत्र ने स्वयं को अमर मान लिया।

श्लोक 57 (padma.1.44.57)

तस्मिन्काले त्वसंस्मृत्य तद्वधोपायमात्मनः। प्रतिहर्तुर्दृष्टिपथे वीरकस्याभवंस्तदा

tasminkāle tvasaṁsmṛtya tadvadhopāyamātmanaḥ pratiharturdṛṣṭipathe vīrakasyābhavaṁstadā

उस समय अपने वध के उपाय का स्मरण न करते हुए, वह वीरक की दृष्टि के मार्ग में आ पहुँचा—

श्लोक 58 (padma.1.44.58)

भुजंगरूपी रंध्रेण प्रविवेश दृशःपथम्। परिहृत्य गणेशस्य दानवो रौद्रदुर्जयः

bhujaṁgarūpī raṁdhreṇa praviveśa dṛśaḥpatham parihṛtya gaṇeśasya dānavo raudradurjayaḥ

—सर्प का रूप धारण कर वह किसी छिद्र से दृष्टि-मार्ग में प्रविष्ट हुआ, गणेश की उपस्थिति टालकर, वह भयंकर दुर्जय दानव।

श्लोक 59 (padma.1.44.59)

अलक्षितो गणेशेन प्रविश्याथ परां तनुम्। भुजंगरूपं संत्यज्य जग्राहाथ महासुरः

alakṣito gaṇeśena praviśyātha parāṁ tanum bhujaṁgarūpaṁ saṁtyajya jagrāhātha mahāsuraḥ

गणेश द्वारा अलक्षित रहकर, प्रविष्ट होकर उसने सर्प-रूप त्यागकर एक अन्य श्रेष्ठ शरीर धारण किया।

श्लोक 60 (padma.1.44.60)

उमारूपं रमयितुं गिरिशं मूढचेतनः। कृत्वा मायामयं रूपमप्रतर्क्यं मनोहरम्

umārūpaṁ ramayituṁ giriśaṁ mūḍhacetanaḥ kṛtvā māyāmayaṁ rūpamapratarkyaṁ manoharam

मूढ़चित्त उस असुर ने गिरीश को रमण के लिए मोहित करने हेतु उमा के रूप को धारण किया, एक अकल्पनीय, मनोहर मायामय रूप बनाकर।

श्लोक 61 (padma.1.44.61)

सर्वैरवयवैः पूर्णं सर्वाभिज्ञानबृंहितम्। कृत्वा भगांतरे दंतं दैत्यो वज्रमयं दृढम्

sarvairavayavaiḥ pūrṇaṁ sarvābhijñānabṛṁhitam kṛtvā bhagāṁtare daṁtaṁ daityo vajramayaṁ dṛḍham

सभी अंगों से पूर्ण, हर पहचान-चिह्न से युक्त रूप बनाकर, दैत्य ने उस रूप की गुह्येंद्रिय में एक दृढ़ वज्रमय दाँत—

श्लोक 62 (padma.1.44.62)

तीक्ष्णाग्रं बुद्धिमोहेन गिरिशं हंतुमुद्यतः। कृत्वोमारूपसंस्थानं गतो दैत्यो हरांतिकम्

tīkṣṇāgraṁ buddhimohena giriśaṁ haṁtumudyataḥ kṛtvomārūpasaṁsthānaṁ gato daityo harāṁtikam

—तीक्ष्ण अग्र वाला, बुद्धिभ्रम से गिरीश को मारने के लिए उद्यत होकर स्थापित किया। उमा का रूप-आकार बनाकर दैत्य हर के निकट गया।

श्लोक 63 (padma.1.44.63)

पापो रम्याकृतिश्चित्र भूषणांबरसंयुतः। तं दृष्ट्वा गिरिशस्तुष्टस्तमालिंग्य महासुरम्

pāpo ramyākṛtiścitra bhūṣaṇāṁbarasaṁyutaḥ taṁ dṛṣṭvā giriśastuṣṭastamāliṁgya mahāsuram

वह पापी, रम्य आकृति वाला, विचित्र आभूषण-वस्त्र से युक्त था। उसे देखकर प्रसन्न गिरीश ने उस महासुर का आलिंगन किया—

श्लोक 64 (padma.1.44.64)

मन्यमानो गिरिसुतां सर्वैरवयवांतरैः। अपृच्छत्साधुभावं ते गिरिपुत्रि न कृत्रिमम्

manyamāno girisutāṁ sarvairavayavāṁtaraiḥ apṛcchatsādhubhāvaṁ te giriputri na kṛtrimam

—उसे सभी अंगों से पर्वतपुत्री ही मानते हुए। उन्होंने पूछा — हे गिरिपुत्री! तुम्हारा यह साधुभाव कृत्रिम तो नहीं है?

श्लोक 65 (padma.1.44.65)

या त्वं मदाशयं ज्ञात्वा प्राप्तेह वरवर्णिनी। त्वया विरहितं शून्यं मम स्थानं जगत्त्रयम्

yā tvaṁ madāśayaṁ jñātvā prāpteha varavarṇinī tvayā virahitaṁ śūnyaṁ mama sthānaṁ jagattrayam

—तुम जो मेरे मन की इच्छा जानकर यहाँ आई हो, हे वरवर्णिनी। तुम्हारे बिना मेरा स्थान, यह तीनों लोक, शून्य था।

श्लोक 66 (padma.1.44.66)

प्राप्ता प्रसन्नवदने युक्तमेवंविधं त्वयि। इत्युक्तो दानवेंद्रस्तु तं बभाषे स्मितं शनैः

prāptā prasannavadane yuktamevaṁvidhaṁ tvayi ityukto dānaveṁdrastu taṁ babhāṣe smitaṁ śanaiḥ

तुम्हारा आना, हे प्रसन्नमुखी, तुम्हारे स्वभाव के अनुरूप ही है। यह कहे जाने पर उस दानवेंद्र ने धीरे-धीरे मुस्कुराते हुए उत्तर दिया।

श्लोक 67 (padma.1.44.67)

स चाबुध्यदभिज्ञानैः प्राह त्रिपुरघातिनम्। दैत्य उवाच। यातास्मि तपसः कामाद्वरं लब्धुं हिमाचलम्

sa cābudhyadabhijñānaiḥ prāha tripuraghātinam daitya uvāca yātāsmi tapasaḥ kāmādvaraṁ labdhuṁ himācalam

उसने बनावटी पहचान-चिह्नों से उत्तर दिया, त्रिपुरघाती से कहा। दैत्य ने कहा — मैं हिमाचल में तप की इच्छा से वर पाने गई थी—

श्लोक 68 (padma.1.44.68)

रतिश्च तत्र मेनाभूत्ततः प्राप्ता त्वदंतिकम्। इत्युक्तः शंकरः शंकां चित्ते प्राप्तो विचारयन्

ratiśca tatra menābhūttataḥ prāptā tvadaṁtikam ityuktaḥ śaṁkaraḥ śaṁkāṁ citte prāpto vicārayan

—वहाँ मुझे संतोष न हुआ, इसलिए तुम्हारे निकट आई हूँ। यह सुनकर शंकर के मन में शंका उत्पन्न हुई, वे विचार करने लगे।

श्लोक 69 (padma.1.44.69)

हृदयेन समाधाय देवः प्रहसिताननः। कुपिता कुपितं बुद्ध्वा प्रकृत्या च दृढव्रता

hṛdayena samādhāya devaḥ prahasitānanaḥ kupitā kupitaṁ buddhvā prakṛtyā ca dṛḍhavratā

मन ही मन विचार कर मुस्कुराते हुए देव ने सोचा — वह क्रुद्ध थी, मुझे भी क्रुद्ध जानती थी, और स्वभाव से दृढ़व्रता है—

श्लोक 70 (padma.1.44.70)

अप्राप्तकामा संप्राप्ता किमेतत्संविजानती। इति चिंत्य हरस्तस्या अभिज्ञानं विचारयन्

aprāptakāmā saṁprāptā kimetatsaṁvijānatī iti ciṁtya harastasyā abhijñānaṁ vicārayan

—फिर अपनी इच्छा पूर्ण किए बिना यहाँ आ गई, यह पूरी तरह जानते हुए भी? ऐसा सोचकर हर उसके पहचान-चिह्नों की जाँच करने लगे।

श्लोक 71 (padma.1.44.71)

नापश्यद्वामपार्श्वे तु तदंकं पद्मलक्षणम्। लोम्नामावर्तरचितं ततो देवः पिनाकधृक्

nāpaśyadvāmapārśve tu tadaṁkaṁ padmalakṣaṇam lomnāmāvartaracitaṁ tato devaḥ pinākadhṛk

उन्हें उसके बाएँ पार्श्व में वह रोमावर्त से बना कमल-चिह्न न दिखा। तब पिनाकधारी देव ने—

श्लोक 72 (padma.1.44.72)

बुद्ध्वा तां दानवीं मायामाकारं गूहयंस्ततः। मेढ्रदंष्ट्रास्त्रमादाय दानवं तमसादयत्

buddhvā tāṁ dānavīṁ māyāmākāraṁ gūhayaṁstataḥ meḍhradaṁṣṭrāstramādāya dānavaṁ tamasādayat

—उस दानवी माया को समझते हुए, अपने रूप को छिपाते हुए, अपने मेढ्र-दंष्ट्र अस्त्र से उस दानव पर विजय पाई।

श्लोक 73 (padma.1.44.73)

न चाबुध्यत तद्वृत्तं वीरको द्वाररक्षकः। कुसुमामोदिनं दृष्ट्वा स्त्रीरूपं दानवेश्वरम्

na cābudhyata tadvṛttaṁ vīrako dvārarakṣakaḥ kusumāmodinaṁ dṛṣṭvā strīrūpaṁ dānaveśvaram

द्वाररक्षक वीरक को इस घटना का पता न चला; उसने कुसुमामोदिनी के स्त्रीरूप में उस दानवेश्वर को देखा था।

श्लोक 74 (padma.1.44.74)

दूतेन मारुतेनाशु बोधिता हिमशैलजा। श्रुत्वा वायुमुखाद्देवी क्रोधरक्ताविलेक्षणा

dūtena mārutenāśu bodhitā himaśailajā śrutvā vāyumukhāddevī krodharaktāvilekṣaṇā

दूत वायु द्वारा तुरंत सूचित हिमशैलजा, वायु के मुख से यह सुनकर क्रोध से लाल-व्याकुल नेत्रों वाली—

श्लोक 75 (padma.1.44.75)

अपश्यद्वीरकं पुत्रं हृदयेनैव दूयता। देव्युवाच। मातरं मां परित्यज्य यस्मात्त्वं स्नेहविक्लवाम्

apaśyadvīrakaṁ putraṁ hṛdayenaiva dūyatā devyuvāca mātaraṁ māṁ parityajya yasmāttvaṁ snehaviklavām

—हृदय में व्यथित होकर पुत्र वीरक को देखा। देवी ने कहा — मुझ माता को त्यागकर तुमने जो स्नेहविहीन होकर—

श्लोक 76 (padma.1.44.76)

विहितावसरः स्त्रीणां शंकरस्य रहोविधौ। तस्मात्ते मानुषे रूक्षा जडा हृदयवर्जिता

vihitāvasaraḥ strīṇāṁ śaṁkarasya rahovidhau tasmātte mānuṣe rūkṣā jaḍā hṛdayavarjitā

—शंकर के एकांत-काल में स्त्रियों को अवसर दे दिया, इसलिए मनुष्य-जन्म में तुम रूखे, जड़, हृदयहीन—

श्लोक 77 (padma.1.44.77)

गणेशाकारसदृशी शिला माता भविष्यति। निमित्त एष विख्यातो वीरकस्य सुतादरात्

gaṇeśākārasadṛśī śilā mātā bhaviṣyati nimitta eṣa vikhyāto vīrakasya sutādarāt

—गणेश के आकार जैसी शिला-माता वाले होगे। यह चिह्न वीरक के पुत्र-आदर के कारण ही विख्यात होगा—

श्लोक 78 (padma.1.44.78)

संभवे प्रक्रमे चैव विचित्राख्या न संशयः। एवमुत्सृष्टशापायां गिरिपुत्र्यामनंतरं

saṁbhave prakrame caiva vicitrākhyā na saṁśayaḥ evamutsṛṣṭaśāpāyāṁ giriputryāmanaṁtaraṁ

—तुम्हारे जन्म और आचरण दोनों में विचित्र नाम से, निःसंदेह। इस प्रकार पर्वतपुत्री द्वारा शाप देने के तुरंत बाद—

श्लोक 79 (padma.1.44.79)

निर्जगाम मुखात्क्रोधः सिंहरूपी महाबलः। स तु सिंहः करालास्यः सटाजटिलकंधरः

nirjagāma mukhātkrodhaḥ siṁharūpī mahābalaḥ sa tu siṁhaḥ karālāsyaḥ saṭājaṭilakaṁdharaḥ

—उसके मुख से क्रोध महाबली सिंह-रूप में निकला। वह सिंह भयंकर मुख वाला, अयाल से जटिल कंधे वाला—

श्लोक 80 (padma.1.44.80)

ऊर्ध्वप्रोद्भूतलांगूलो दंष्ट्रोत्कटमुखावटः। व्यादितास्यो लंबजिह्वः क्षामः कुक्षिबलादिषु

ūrdhvaprodbhūtalāṁgūlo daṁṣṭrotkaṭamukhāvaṭaḥ vyāditāsyo laṁbajihvaḥ kṣāmaḥ kukṣibalādiṣu

—ऊपर उठी पूँछ वाला, दाढ़ों से भयंकर मुखविवर वाला, खुले मुख, लटकी जीभ, कृश कुक्षि पर भी बलवान।

श्लोक 81 (padma.1.44.81)

अस्यास्ये वर्तितुं देवी व्यवस्थितवती तदा। ज्ञात्वा मनोगतं तस्या भगवांश्चतुराननः

asyāsye vartituṁ devī vyavasthitavatī tadā jñātvā manogataṁ tasyā bhagavāṁścaturānanaḥ

देवी तब उसी के मुख में स्थित रहने का निश्चय करने लगीं। उसके मनोभाव को जानकर भगवान चतुरानन (ब्रह्मा)—

श्लोक 82 (padma.1.44.82)

आजगामाश्रमपदं संपदामाश्रयं यतः। आगम्योवाच देवेशो गिरिजां स्पष्टया गिरा

ājagāmāśramapadaṁ saṁpadāmāśrayaṁ yataḥ āgamyovāca deveśo girijāṁ spaṣṭayā girā

—उस आश्रम में आए, जो समृद्धि का आश्रयस्थल था। आकर देवेश ने स्पष्ट वाणी में गिरिजा से कहा।

श्लोक 83 (padma.1.44.83)

ब्रह्मोवाच-। किं पुनः प्राप्तुकामासि किमलभ्यं ददामि ते। विरम्यतामतिक्लेशात्तपसोस्मान्मदाज्ञया

brahmovāca- kiṁ punaḥ prāptukāmāsi kimalabhyaṁ dadāmi te viramyatāmatikleśāttapasosmānmadājñayā

ब्रह्मा ने कहा — अब और क्या पाना चाहती हो? जो अलभ्य हो, वह मैं तुम्हें दूँगा। अत्यधिक तप से मेरी आज्ञा से रुक जाओ।

श्लोक 84 (padma.1.44.84)

तच्छ्रुत्वोवाचगिरिजा गुरोर्गौरवयंत्रितं। वाक्यं वाचाहरोद्गीर्णवर्णनिर्गमवांछितं

tacchrutvovācagirijā gurorgauravayaṁtritaṁ vākyaṁ vācāharodgīrṇavarṇanirgamavāṁchitaṁ

यह सुनकर गिरिजा ने गुरु के प्रति आदर से नियंत्रित होकर वह वचन कहा, जिसके शब्द हर का नाम कहने को उत्सुक थे।

श्लोक 85 (padma.1.44.85)

देव्युवाच-। तपसा दुष्करेणाप्तः पतिर्वै शंकरो मया। समां श्यामलवर्णेति बहुशः प्रोक्तवान्रहः

devyuvāca- tapasā duṣkareṇāptaḥ patirvai śaṁkaro mayā samāṁ śyāmalavarṇeti bahuśaḥ proktavānrahaḥ

देवी ने कहा — दुष्कर तप से मैंने शंकर को पति रूप में पाया। किंतु उन्होंने एकांत में बार-बार मुझे 'श्यामलवर्णा' कहा है—

श्लोक 86 (padma.1.44.86)

तस्मादहं कांचनाभवर्णा तन्नामसंयुता। भर्तुर्भूतपतेरंगमेकतो निर्विषं भवेत्

tasmādahaṁ kāṁcanābhavarṇā tannāmasaṁyutā bharturbhūtapateraṁgamekato nirviṣaṁ bhavet

—इसलिए मैं स्वर्ण-सी कांतिवाली, उस नाम से युक्त हो जाऊँ। और पति भूतपति के शरीर का एक भाग सदा के लिए विषरहित हो।

श्लोक 87 (padma.1.44.87)

तस्यास्तद्भाषितं श्रुत्वा प्रोवाच जगदीश्वरः। एवं भव त्वं भूयश्च भर्तुर्देहार्द्धचारिणी

tasyāstadbhāṣitaṁ śrutvā provāca jagadīśvaraḥ evaṁ bhava tvaṁ bhūyaśca bharturdehārddhacāriṇī

उसका यह वचन सुनकर जगदीश्वर ने कहा — ऐसा ही हो, और तुम आगे पति के शरीर के आधे भाग में विचरण करने वाली भी बनो।

श्लोक 88 (padma.1.44.88)

ततस्तत्याजतां कृष्णां फुल्लनीलोत्पलत्वचं। त्वक्च साप्यभवद्भीमा घंटाहस्तात्रिलोचना

tatastatyājatāṁ kṛṣṇāṁ phullanīlotpalatvacaṁ tvakca sāpyabhavadbhīmā ghaṁṭāhastātrilocanā

तब उसने खिले नीलकमल जैसी वह श्याम त्वचा त्याग दी; और वह त्वचा भी भयंकर, घंटा-हस्त, त्रिनेत्री देवी बन गई—

श्लोक 89 (padma.1.44.89)

नानाभरणसंपूर्णा पीतकौशेयधारिणी। तामब्रवीत्ततो ब्रह्मा देवीं नीलांबुजत्विषं

nānābharaṇasaṁpūrṇā pītakauśeyadhāriṇī tāmabravīttato brahmā devīṁ nīlāṁbujatviṣaṁ

—अनेक आभूषणों से पूर्ण, पीत रेशमी वस्त्र धारण किए। तब ब्रह्मा ने उस नीलकमल-कांतिवाली देवी से कहा—

श्लोक 90 (padma.1.44.90)

निशे भूधरजा देह संपर्का त्वं मदाज्ञया। संप्राप्ता कृतकृत्यत्वमेकानंशा पुरो ह्यसि

niśe bhūdharajā deha saṁparkā tvaṁ madājñayā saṁprāptā kṛtakṛtyatvamekānaṁśā puro hyasi

—हे रात्रि! पर्वतपुत्री के शरीर के संसर्ग से, मेरी आज्ञा से, तुमने कृतकृत्यता प्राप्त की है; तुम तो पहले से ही एकानंशा हो।

श्लोक 91 (padma.1.44.91)

य एष सिंहः प्रोद्भूतो देव्याः क्रोधाद्वरानने। स तेस्तु वाहनं देवि केतौ चास्तु महाबलः

ya eṣa siṁhaḥ prodbhūto devyāḥ krodhādvarānane sa testu vāhanaṁ devi ketau cāstu mahābalaḥ

देवी के क्रोध से उत्पन्न यह जो सिंह है, हे वरानने! वह तुम्हारा वाहन बने, हे देवी, और वह महाबली तुम्हारी ध्वजा में भी रहे।

श्लोक 92 (padma.1.44.92)

गच्छ विंध्याचलं तत्र सुरकार्यं करिष्यसि। पंचालो नाम यक्षोयं यक्षलक्षपदानुगः

gaccha viṁdhyācalaṁ tatra surakāryaṁ kariṣyasi paṁcālo nāma yakṣoyaṁ yakṣalakṣapadānugaḥ

विंध्याचल जाओ, वहाँ देवकार्य पूर्ण करोगी। यह पंचाल नामक यक्ष, लाख यक्षों का अनुगामी—

श्लोक 93 (padma.1.44.93)

दत्तस्ते किंकरो देवि मया मायाशतैर्युतः। इत्युक्त्वा कौशिकी देवी विंध्यशैलं जगाम ह

dattaste kiṁkaro devi mayā māyāśatairyutaḥ ityuktvā kauśikī devī viṁdhyaśailaṁ jagāma ha

—मेरे द्वारा तुम्हें सेवक रूप में दिया गया है, हे देवी, सैकड़ों मायाओं से युक्त। यह कहकर कौशिकी देवी विंध्यपर्वत को गई।

श्लोक 94 (padma.1.44.94)

उमापि प्राप्तसंकल्पा जगाम गिरिशांतिकं। प्रविशंतीं तु तां द्वारादपहृत्य समाहितः

umāpi prāptasaṁkalpā jagāma giriśāṁtikaṁ praviśaṁtīṁ tu tāṁ dvārādapahṛtya samāhitaḥ

उमा भी अपना संकल्प पूर्ण कर गिरीश के निकट गई। द्वार से प्रवेश करते हुए उसे, ध्यानपूर्वक—

श्लोक 95 (padma.1.44.95)

रुरोध वीरको देवीं हेमवेत्रलताधरः। तामुवाच च कोपेन रूपे तु व्यभिचारिणीं

rurodha vīrako devīṁ hemavetralatādharaḥ tāmuvāca ca kopena rūpe tu vyabhicāriṇīṁ

—स्वर्ण-वेत्र-लता धारण किए वीरक ने रोक दिया। क्रोध से उसने उस रूप-परिवर्तित, प्रतीत होती व्यभिचारिणी को कहा—

श्लोक 96 (padma.1.44.96)

प्रयोजनं न तेत्रास्ति गच्छ यावन्न भक्ष्यसे। देव्यारूपधरो दैत्यो देवं वंचितुमागतः

prayojanaṁ na tetrāsti gaccha yāvanna bhakṣyase devyārūpadharo daityo devaṁ vaṁcitumāgataḥ

—'तुम्हें यहाँ कोई प्रयोजन नहीं, जाओ, जब तक भक्षित न हो जाओ। देवी का रूप धारण किए एक दैत्य देव को छलने आया था—'

श्लोक 97 (padma.1.44.97)

प्रविष्टो न च दृष्टोसौ स च देवेन घातितः। घातिते चाहमाज्ञप्तो नीलकंठेन कोपिना

praviṣṭo na ca dṛṣṭosau sa ca devena ghātitaḥ ghātite cāhamājñapto nīlakaṁṭhena kopinā

—'वह अलक्षित प्रवेश कर गया, फिर देव द्वारा मारा गया। उसके मारे जाने पर मुझे क्रुद्ध नीलकंठ द्वारा आज्ञा मिली—'

श्लोक 98 (padma.1.44.98)

द्वारे त्वनवधानं ते यस्मात्पश्यामि वै ततः। भविष्यसि न मे द्वास्थो वर्षपूगाननेकशः

dvāre tvanavadhānaṁ te yasmātpaśyāmi vai tataḥ bhaviṣyasi na me dvāstho varṣapūgānanekaśaḥ

—'चूँकि द्वार पर मेरी यह असावधानी तुम देख रहे हो, इसलिए तुम अनेक वर्षों तक मेरे द्वारपाल नहीं रहोगे।'

श्लोक 99 (padma.1.44.99)

अतस्ते नात्र दास्यामि प्रवेशं गम्यतां द्रुतम्। एकां मुक्त्वा गिरिसुतां मातरं स्नेहवत्सलाम्

ataste nātra dāsyāmi praveśaṁ gamyatāṁ drutam ekāṁ muktvā girisutāṁ mātaraṁ snehavatsalām

—'अतः मैं तुम्हें यहाँ प्रवेश नहीं दूँगा, शीघ्र चली जाओ। एक पर्वतपुत्री माता को छोड़कर, स्नेहवत्सला—'

श्लोक 100 (padma.1.44.100)

प्रवेशं लभते नान्या नारी कमललोचने। इत्युक्त्वा तु तदा देवी चिंतयामास चेतसा

praveśaṁ labhate nānyā nārī kamalalocane ityuktvā tu tadā devī ciṁtayāmāsa cetasā

—'कोई अन्य स्त्री प्रवेश नहीं पाती, हे कमललोचने।' यह कहे जाने पर देवी ने मन में विचार किया।

श्लोक 101 (padma.1.44.101)

नारी नैव स दैतेयो वायुर्मे यामभाषत। वृथैव वीरकश्शप्तो मया क्रोधपरीतया

nārī naiva sa daiteyo vāyurme yāmabhāṣata vṛthaiva vīrakaśśapto mayā krodhaparītayā

वह स्त्री नहीं थी, वह वही दैत्य था जिसकी बात वायु ने मुझसे कही थी। व्यर्थ ही मैंने क्रोध में आकर वीरक को शाप दिया।

श्लोक 102 (padma.1.44.102)

अकार्यं क्रियते मूढैः प्रायः क्रोधसमन्वितैः। क्रोधेन नश्यते कीर्तिः क्रोधो हंति स्थितां श्रियम्

akāryaṁ kriyate mūḍhaiḥ prāyaḥ krodhasamanvitaiḥ krodhena naśyate kīrtiḥ krodho haṁti sthitāṁ śriyam

क्रोध से भरे मूर्खों द्वारा प्रायः अकार्य किया जाता है। क्रोध से कीर्ति नष्ट होती है, क्रोध स्थिर लक्ष्मी को भी नष्ट कर देता है।

श्लोक 103 (padma.1.44.103)

अपरिच्छिन्नतत्वार्था पुत्रं शापितवत्यहं। विपरीतार्थबुद्धीनां सुलभो विपदागमः

aparicchinnatatvārthā putraṁ śāpitavatyahaṁ viparītārthabuddhīnāṁ sulabho vipadāgamaḥ

तत्त्व को समझे बिना मैंने अपने पुत्र को शाप दे दिया। विपरीत बुद्धि वालों के लिए विपत्ति सुलभ हो जाती है।

श्लोक 104 (padma.1.44.104)

संचिंत्यैवमुवाचेदं वीरकं प्रति शैलजा। सज्जलज्जाविकारेण वदनेनाम्बुजत्विषा

saṁciṁtyaivamuvācedaṁ vīrakaṁ prati śailajā sajjalajjāvikāreṇa vadanenāmbujatviṣā

ऐसा सोचकर शैलजा ने वीरक से कहा, लज्जा के भाव से युक्त उसके कमल-सम मुख से।

श्लोक 105 (padma.1.44.105)

देव्युवाच-। अहं वीरक ते माता न तेस्तु मनसो भ्रमः। शंकरस्यास्मि दयिता सुता तुहिनभूभृतः

devyuvāca- ahaṁ vīraka te mātā na testu manaso bhramaḥ śaṁkarasyāsmi dayitā sutā tuhinabhūbhṛtaḥ

देवी ने कहा — हे वीरक! मैं तुम्हारी माता हूँ, तुम्हारे मन में कोई भ्रम न रहे। मैं शंकर की प्रिया, हिमपर्वत की पुत्री हूँ।

श्लोक 106 (padma.1.44.106)

मम गात्रच्छविभ्रांत्या मा शंकां पुत्र धारय। तुष्टेन गौरता दत्ता ममेयं पद्मजन्मना

mama gātracchavibhrāṁtyā mā śaṁkāṁ putra dhāraya tuṣṭena gauratā dattā mameyaṁ padmajanmanā

मेरे शरीर की छवि में परिवर्तन से, हे पुत्र, संदेह मत करो। यह गौरवर्ण मुझे संतुष्ट पद्मज (ब्रह्मा) द्वारा दिया गया है।

श्लोक 107 (padma.1.44.107)

मया शप्तोस्यविदिते वृत्तांते दैत्यनिर्मिते। ज्ञात्वा नारीप्रवेशं तु शंकरे रहसि स्थिते

mayā śaptosyavidite vṛttāṁte daityanirmite jñātvā nārīpraveśaṁ tu śaṁkare rahasi sthite

वास्तविक घटना न जानते हुए, जो दैत्य द्वारा रची गई थी, मैंने केवल शंकर के एकांत-काल में स्त्री-प्रवेश जानकर तुम्हें शाप दिया।

श्लोक 108 (padma.1.44.108)

ननिवर्तयितुं शक्यः शापः किंतु ब्रवीमि ते। शीघ्रमेष्यसि मानुष्यात्सर्वकामसमन्वितः

nanivartayituṁ śakyaḥ śāpaḥ kiṁtu bravīmi te śīghrameṣyasi mānuṣyātsarvakāmasamanvitaḥ

शाप वापस नहीं लिया जा सकता, किंतु मैं तुम्हें बताती हूँ — तुम शीघ्र ही मनुष्य-जन्म से लौटकर सर्वकामनाओं से युक्त होगे।

श्लोक 109 (padma.1.44.109)

शिरसा तु ततो वंद्य मातरं पूर्णमानसः। उवाच साध्वीं पूर्णेन्दु द्युतिं तुहिनशैलजां

śirasā tu tato vaṁdya mātaraṁ pūrṇamānasaḥ uvāca sādhvīṁ pūrṇendu dyutiṁ tuhinaśailajāṁ

तब सिर झुकाकर माता को प्रणाम कर, पूर्ण मन से संतुष्ट होकर, उसने पूर्णचंद्र-सी कांतिवाली उस साध्वी हिमशैलजा से कहा—

श्लोक 110 (padma.1.44.110)

वीरक उवाच-। नतसुरासुरमौलिलसन्मणिप्रवरकांतिकरालिनखाङ्घ्रिके। नगसुते शरणागतवत्सले नवनमोवनतार्त्तिविनाशिनि

vīraka uvāca- natasurāsuramaulilasanmaṇipravarakāṁtikarālinakhāṅghrike nagasute śaraṇāgatavatsale navanamovanatārttivināśini

वीरक ने कहा — हे नगसुते! जिनके चरण-नखों की कांति देव-असुरों के झुके मुकुटों के मणियों से भी अधिक चमकती है, शरणागतों पर वत्सल, बार-बार प्रणाम करने वालों की पीड़ा का नाश करने वाली—

श्लोक 111 (padma.1.44.111)

तपनमंडलमंडितकंधरे पृथुसुवर्णनगद्युतिहारिके। विषमभंगविषंगमभीषितो गिरिसुते भवतीमहमाश्रये

tapanamaṁḍalamaṁḍitakaṁdhare pṛthusuvarṇanagadyutihārike viṣamabhaṁgaviṣaṁgamabhīṣito girisute bhavatīmahamāśraye

—सूर्यमंडल से सज्जित कंठ वाली, विशाल स्वर्णपर्वत की कांति को भी हरने वाली — इस विषम, उलझी विपत्ति से भयभीत मैं, हे गिरिसुते, आपकी शरण लेता हूँ।

श्लोक 112 (padma.1.44.112)

जगतिकाप्रणताभिमता ददौ झटिति सिद्धिमृते भवतीं यथा। जगतिकां प्रणमेच्छशिशेखरो भुवनभृन्मुनयो भवतीं यथा

jagatikāpraṇatābhimatā dadau jhaṭiti siddhimṛte bhavatīṁ yathā jagatikāṁ praṇamecchaśiśekharo bhuvanabhṛnmunayo bhavatīṁ yathā

संसार के प्रणतजनों की अभीष्ट, तुम बिना किसी अन्य सिद्धि के तुरंत सिद्धि देती हो; चंद्रमौलि स्वयं, संसार के भरणकर्ता मुनि भी तुम्हें प्रणाम करते हैं।

श्लोक 113 (padma.1.44.113)

विमलयोगविनिर्मितदुर्जये सुतनुतुल्यमहेश्वरमंडली। विदलितांधकबांधवसंहतिः सुरवरैः प्रथमं त्वमभिष्टुता

vimalayogavinirmitadurjaye sutanutulyamaheśvaramaṁḍalī vidalitāṁdhakabāṁdhavasaṁhatiḥ suravaraiḥ prathamaṁ tvamabhiṣṭutā

निर्मल योग से रचित अजेय, तुम्हारी शक्ति महेश्वर के समान है; अंधक के समस्त बंधुओं का नाश करने वाली, देवश्रेष्ठों द्वारा सर्वप्रथम स्तुत—

श्लोक 114 (padma.1.44.114)

सितसटापटलोद्धतकंधराभवमहामृगराजरयस्थिता। विमलशक्तिमुखानलपिंगला यतभुजौघनिपिष्टमहासुरा

sitasaṭāpaṭaloddhatakaṁdharābhavamahāmṛgarājarayasthitā vimalaśaktimukhānalapiṁgalā yatabhujaughanipiṣṭamahāsurā

—श्वेत अयाल वाले, उठे कंधे वाले वेगवान सिंहराज पर स्थित; निर्मल शक्ति के मुख की अग्नि से पीली, अपनी नियंत्रित भुजाओं से महासुरों को कुचलने वाली—

श्लोक 115 (padma.1.44.115)

निगदिता भुवनैरतिचंडिकाजननिशुंभनिशुंभनिषूदिनी। प्रणतचिंतितदा भवदा नवप्रशमनैकरतिस्तरसा भुवि

nigaditā bhuvanairaticaṁḍikājananiśuṁbhaniśuṁbhaniṣūdinī praṇataciṁtitadā bhavadā navapraśamanaikaratistarasā bhuvi

—संसार द्वारा अतिचंडिका, निशुंभ-शुंभ की नाशक कही जाने वाली; प्रणतजनों की चिंतित वस्तु देने वाली, तुरंत शांति में लीन रहने वाली—

श्लोक 116 (padma.1.44.116)

वियतिवायुपथे ज्वलनाकुलेवनितले तव देवि च यद्वपुः। तदजितेप्रतिमे प्रणमाम्यहं भुवनभाविनिते भववल्लभे

viyativāyupathe jvalanākulevanitale tava devi ca yadvapuḥ tadajitepratime praṇamāmyahaṁ bhuvanabhāvinite bhavavallabhe

—आकाश में, वायुपथ में, प्रज्वलित अग्नि में, धरातल पर जो भी आपका रूप हो, हे देवी, उस अजित, अनुपम रूप को, संसार की माता, भव की प्रिया को, मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 117 (padma.1.44.117)

जलधयो ललितोद्धतवीचयो हुतवहो द्युतिदग्धचराचरः। फणसहस्रभृतश्च भुजंगमास्त्वमभिधास्यसि मामभयंकरा

jaladhayo lalitoddhatavīcayo hutavaho dyutidagdhacarācaraḥ phaṇasahasrabhṛtaśca bhujaṁgamāstvamabhidhāsyasi māmabhayaṁkarā

समुद्रों में उठती लहरों के रूप में, चराचर को जलाने वाली अग्नि में, सहस्रफणी सर्पों में भी — हे अभयंकरी, तुम स्वयं मुझे अपना परिचय दोगी।

श्लोक 118 (padma.1.44.118)

भगवति स्थिरभक्तजनाश्रये प्रतिगतो भवतीचरणाश्रयं। करणजातमिहास्तु ममाश्रवैतवविलासमुखानुभवास्यदम्

bhagavati sthirabhaktajanāśraye pratigato bhavatīcaraṇāśrayaṁ karaṇajātamihāstu mamāśravaitavavilāsamukhānubhavāsyadam

हे भगवति, स्थिर भक्तों के आश्रय! मैं आपके चरणों की शरण में लौट आया हूँ; मेरी सभी इंद्रियाँ आपकी लीला के अनुभव में सदा लगी रहें।

श्लोक 119 (padma.1.44.119)

सुप्रसन्ना ततो देवी वीरकस्येति संस्तुता। प्रविवेश शुभंभर्तुर्भुवनं भूधरात्मजा

suprasannā tato devī vīrakasyeti saṁstutā praviveśa śubhaṁbharturbhuvanaṁ bhūdharātmajā

वीरक द्वारा इस प्रकार स्तुत होकर, अत्यंत संतुष्ट देवी, वह पर्वतपुत्री, अपने पति के शुभ भवन में प्रविष्ट हुई।

श्लोक 120 (padma.1.44.120)

द्वास्थोपि वीरको देवान्हरदर्शनकांक्षिणः। व्यसर्जयत्स्वकानेव गृहानादरपूर्वकं

dvāsthopi vīrako devānharadarśanakāṁkṣiṇaḥ vyasarjayatsvakāneva gṛhānādarapūrvakaṁ

द्वारपाल वीरक भी हर-दर्शन की इच्छा रखने वाले देवों को आदरपूर्वक उनके ही घरों को लौटा देता था।

श्लोक 121 (padma.1.44.121)

नास्त्यत्रावसरो देवा देव्याः सह वृषाकपिः। निभृतः क्रीडतीत्युक्ता ययुस्ते च यथागतं

nāstyatrāvasaro devā devyāḥ saha vṛṣākapiḥ nibhṛtaḥ krīḍatītyuktā yayuste ca yathāgataṁ

'यहाँ अभी अवसर नहीं है, हे देवो, वृषभवाहन देवी के साथ एकांत में क्रीड़ा कर रहे हैं' — यह कहे जाने पर वे जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 122 (padma.1.44.122)

गते वर्षसहस्रे तु देवास्त्वरितमानसाः। ज्वलनं चोदयामासुर्ज्ञातुं शंकरचेष्टितं

gate varṣasahasre tu devāstvaritamānasāḥ jvalanaṁ codayāmāsurjñātuṁ śaṁkaraceṣṭitaṁ

एक सहस्र वर्ष बीतने पर, त्वरित मन वाले देवों ने अग्नि को शंकर की गतिविधि जानने के लिए भेजा।

श्लोक 123 (padma.1.44.123)

प्रविश्य पक्षिरंध्रेण शुकरूपी हुताशनः। ददर्श शयने सर्वं रतौ गिरिजया सह

praviśya pakṣiraṁdhreṇa śukarūpī hutāśanaḥ dadarśa śayane sarvaṁ ratau girijayā saha

किसी छिद्र से पक्षी-रूप में प्रविष्ट होकर, तोता बना अग्नि ने शय्या पर गिरिजा के साथ रति में सब कुछ देखा।

श्लोक 124 (padma.1.44.124)

ददर्श तं च देवेशो हुताशं शुकरूपिणं। तमुवाच महादेवः किंचित्कोपसमन्वितः

dadarśa taṁ ca deveśo hutāśaṁ śukarūpiṇaṁ tamuvāca mahādevaḥ kiṁcitkopasamanvitaḥ

देवेश (शिव) ने भी उस शुकरूपधारी अग्नि को देख लिया। महादेव ने कुछ क्रोध सहित उससे कहा।

श्लोक 125 (padma.1.44.125)

शर्व उवाच। निषिक्तमर्धं देव्यां मे वीर्यं च शुकविग्रह। लज्जया विरतिश्चास्य त्वमर्धं पिब पावक

śarva uvāca niṣiktamardhaṁ devyāṁ me vīryaṁ ca śukavigraha lajjayā viratiścāsya tvamardhaṁ piba pāvaka

शर्व ने कहा — हे शुकरूप! मेरा आधा वीर्य देवी में सिंचित हो चुका है, लज्जा से इसका शेष भाग रुक गया — शेष आधा तुम पी लो, हे पावक।

श्लोक 126 (padma.1.44.126)

यस्मात्तु त्वत्कृते विघ्नं तस्मात्त्वय्युपपद्यते। इत्युक्तः प्राञ्जलिर्वह्निरपिबद्वीर्यमाहितं

yasmāttu tvatkṛte vighnaṁ tasmāttvayyupapadyate ityuktaḥ prāñjalirvahnirapibadvīryamāhitaṁ

चूँकि यह विघ्न तुम्हारे कारण हुआ, अतः यह तुम्हारे ही ऊपर पड़ना उचित है। यह कहे जाने पर हाथ जोड़े अग्नि ने वह स्थापित वीर्य पी लिया।

श्लोक 127 (padma.1.44.127)

तेनाप्लुतास्ततो देवास्तन्मुखा ऋभवो यतः। विपाट्य जठरं तेषां वीर्यं माहेश्वरं ततः

tenāplutāstato devāstanmukhā ṛbhavo yataḥ vipāṭya jaṭharaṁ teṣāṁ vīryaṁ māheśvaraṁ tataḥ

उससे अभिभूत होकर देव तथा उनके मुख-साझा ऋभुगण, उनके उदर को फाड़कर वह माहेश्वर वीर्य—

श्लोक 128 (padma.1.44.128)

निष्क्रांतं तप्तहेमाभं वितते शंकराश्रमे। तस्मिन्सरो महज्जातं विमलं बहुयोजनं

niṣkrāṁtaṁ taptahemābhaṁ vitate śaṁkarāśrame tasminsaro mahajjātaṁ vimalaṁ bahuyojanaṁ

—तपे सुवर्ण के समान बाहर निकला, विस्तृत शंकर-आश्रम में फैल गया। वहाँ एक विशाल, निर्मल, अनेक योजन विस्तृत सरोवर उत्पन्न हुआ—

श्लोक 129 (padma.1.44.129)

प्रोत्फुल्लहेमकमलं नानाविहगनादितम्। तच्छ्रुत्वा तु सरो देवी जातं हेममहांबुजम्

protphullahemakamalaṁ nānāvihaganāditam tacchrutvā tu saro devī jātaṁ hemamahāṁbujam

—खिले सुवर्ण-कमलों वाला, अनेक पक्षियों की ध्वनि से गुंजित। उस स्वर्ण-महाकमल-युक्त सरोवर के उत्पन्न होने की बात सुनकर देवी—

श्लोक 130 (padma.1.44.130)

जगाम कौतुकाविष्टा तत्सरः कनकांबुजम्। तत्र कृत्वा जलक्रीडां तदब्जकृतशेखरा

jagāma kautukāviṣṭā tatsaraḥ kanakāṁbujam tatra kṛtvā jalakrīḍāṁ tadabjakṛtaśekharā

—कौतुक से भरकर उस स्वर्णकमल-सरोवर को गई। वहाँ जलक्रीड़ा करके, उसके कमलों का मुकुट बनाकर—

श्लोक 131 (padma.1.44.131)

उपविष्टा ततस्तस्य तीरे देवी सखीवृता। पातुकामा च तत्तोयं स्वादुनिर्मलपंकजम्

upaviṣṭā tatastasya tīre devī sakhīvṛtā pātukāmā ca tattoyaṁ svādunirmalapaṁkajam

—देवी सखियों सहित उसके तट पर बैठ गई, उस स्वादिष्ट, निर्मल कमल-जल को पीने की इच्छा से।

श्लोक 132 (padma.1.44.132)

अपश्यत्कृत्तिकास्तास्स षडर्कद्युतिसन्निभाः। पद्मपत्रे तु तद्वारि गृहीत्वा प्रस्थिता गृहम्

apaśyatkṛttikāstāssa ṣaḍarkadyutisannibhāḥ padmapatre tu tadvāri gṛhītvā prasthitā gṛham

उसने सूर्य के समान तेजस्वी उन छह कृत्तिकाओं को देखा — वे कमलपत्र में वह जल लेकर घर जाने को प्रस्थान कर रही थीं।

श्लोक 133 (padma.1.44.133)

हर्षात्सोवाच पास्यामि पद्मपत्रे स्थितं पयः। ततःस्ता ऊचुरखिलाः कृत्तिका हिमशैलजाम्

harṣātsovāca pāsyāmi padmapatre sthitaṁ payaḥ tataḥstā ūcurakhilāḥ kṛttikā himaśailajām

हर्ष से उसने कहा — मैं कमलपत्र में स्थित यह जल पीऊँगी। तब उन सभी कृत्तिकाओं ने हिमशैलजा से कहा।

श्लोक 134 (padma.1.44.134)

कृत्तिका ऊचुः-। दास्यामो दयिते गर्भे संभूतो यो भविष्यति। सोस्माकमपि पुत्रः स्यादस्मत्त्राता च वृत्तिमान्

kṛttikā ūcuḥ- dāsyāmo dayite garbhe saṁbhūto yo bhaviṣyati sosmākamapi putraḥ syādasmattrātā ca vṛttimān

कृत्तिकाओं ने कहा — हे प्रिये! हम इसे देंगी, इस शर्त पर कि गर्भ में जो उत्पन्न होगा, वह हमारा भी पुत्र, हमारा रक्षक तथा पालनकर्ता बने—

श्लोक 135 (padma.1.44.135)

त्रिषु लोकेषु विख्यातः सर्वेष्वपि शुभानने। इत्युक्तोवाच गिरिजा कथं मद्गात्रसंभवैः

triṣu lokeṣu vikhyātaḥ sarveṣvapi śubhānane ityuktovāca girijā kathaṁ madgātrasaṁbhavaiḥ

—तीनों लोकों में विख्यात, हे शुभानने। यह सुनकर गिरिजा ने कहा — कैसे मेरे ही शरीर से उत्पन्न—

श्लोक 136 (padma.1.44.136)

सर्वैरवयवैर्युक्तो भवतीभ्यः सुतो भवेत्। ततस्तां कृत्तिका ऊचुर्विधास्यामोस्य वै वयम्

sarvairavayavairyukto bhavatībhyaḥ suto bhavet tatastāṁ kṛttikā ūcurvidhāsyāmosya vai vayam

—सभी अंगों से युक्त पुत्र तुम्हारा भी हो सकता है? तब कृत्तिकाओं ने उससे कहा — हम स्वयं उसके—

श्लोक 137 (padma.1.44.137)

उत्तमान्युत्तमांगानि यद्येवं तु भविष्यति। उक्ता वै शैलजा प्राह भवत्वेवमनिंदिताः

uttamānyuttamāṁgāni yadyevaṁ tu bhaviṣyati uktā vai śailajā prāha bhavatvevamaniṁditāḥ

—उत्तम अंगों की व्यवस्था करेंगी, यदि ऐसा हो। यह कहे जाने पर शैलजा ने कहा — ऐसा ही हो, हे अनिंदिताओ।

श्लोक 138 (padma.1.44.138)

ततस्तु हर्षसंपूर्णा पद्मपत्रस्थितं पयः। तस्यै ददुस्तया चापि तत्पीतं क्रमशो जलम्

tatastu harṣasaṁpūrṇā padmapatrasthitaṁ payaḥ tasyai dadustayā cāpi tatpītaṁ kramaśo jalam

तब हर्ष से पूर्ण होकर उन्होंने कमलपत्र में स्थित वह जल उसे दिया, और उसने भी क्रमशः वह जल पी लिया।

श्लोक 139 (padma.1.44.139)

पीते तु सलिले चैव तस्मिन्नेव क्षणे वरः। विपाट्य देव्याश्च ततो दक्षिणं कुक्षिमुद्गतः

pīte tu salile caiva tasminneva kṣaṇe varaḥ vipāṭya devyāśca tato dakṣiṇaṁ kukṣimudgataḥ

वह जल पीते ही, उसी क्षण, वह श्रेष्ठ शिशु देवी के दाहिने पार्श्व को चीरकर बाहर निकला—

श्लोक 140 (padma.1.44.140)

निश्चक्रामाद्भुतो बालो रोगशोकविनाशनः। प्रभाकरकरव्रात प्रकारप्रकरप्रभुः

niścakrāmādbhuto bālo rogaśokavināśanaḥ prabhākarakaravrāta prakāraprakaraprabhuḥ

—वह अद्भुत बालक, रोग-शोक का नाशक, सूर्य की किरणों के समूह से भी अधिक प्रभावशाली, प्रकट हुआ।

श्लोक 141 (padma.1.44.141)

गृहीतनिर्मलोदग्र शक्तिशूलांकुशोनलः। दीप्तो मारयितुं दैत्यानुत्थितः कनकच्छविः

gṛhītanirmalodagra śaktiśūlāṁkuśonalaḥ dīpto mārayituṁ daityānutthitaḥ kanakacchaviḥ

निर्मल, उठे शक्ति, शूल, अंकुश तथा अग्नि हाथों में लिए, दैत्यों को मारने के लिए दीप्त, स्वर्णकांति वाला वह उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 142 (padma.1.44.142)

एतस्मात्कारणादेव कुमारश्चापि सोभवत्। वामं विदार्य निष्क्रांतस्ततो देव्याः पुनः शिशुः

etasmātkāraṇādeva kumāraścāpi sobhavat vāmaṁ vidārya niṣkrāṁtastato devyāḥ punaḥ śiśuḥ

इसी कारण से वह कुमार भी कहलाया। फिर देवी के बाएँ पार्श्व से भी एक शिशु प्रकट हुआ—

श्लोक 143 (padma.1.44.143)

स्कंदोथ वदनाद्वह्नेः शुभ्रात्षड्वदनोरिहा। कृत्तिकासलिलादेव शाखाभिः सविशेषतः

skaṁdotha vadanādvahneḥ śubhrātṣaḍvadanorihā kṛttikāsalilādeva śākhābhiḥ saviśeṣataḥ

—स्कंद, अग्नि के उज्ज्वल मुख से, छह मुखों वाला यहाँ; कृत्तिकाओं के जल से ही, विशेष रूप से उनकी छह शाखाओं (धाराओं) से—

श्लोक 144 (padma.1.44.144)

शाखाः शिवाः समाख्याताः षट्सुवक्त्रेषु विस्तृताः। यतस्ततो विशाखोसौ ख्यातो लोकेषु षण्मुखः

śākhāḥ śivāḥ samākhyātāḥ ṣaṭsuvaktreṣu vistṛtāḥ yatastato viśākhosau khyāto lokeṣu ṣaṇmukhaḥ

—वे मंगलमय शाखाएँ उसके छह सुंदर मुखों में विस्तृत बतायी गईं; इसीलिए वह विशाख नाम से लोकों में षण्मुख कहलाया।

श्लोक 145 (padma.1.44.145)

स्कंदो विशाखः षड्वक्त्रः कार्तिकेयश्च विश्रुतः। पक्षे चैत्रस्य बहुले पंचदश्यां महाबलौ

skaṁdo viśākhaḥ ṣaḍvaktraḥ kārtikeyaśca viśrutaḥ pakṣe caitrasya bahule paṁcadaśyāṁ mahābalau

स्कंद, विशाख, षड्वक्त्र तथा कार्तिकेय — इस प्रकार वह विख्यात हुआ। चैत्र के कृष्णपक्ष की पूर्णिमा को वे दोनों महाबली—

श्लोक 146 (padma.1.44.146)

संभूतावर्कसदृशौ विशाले शरकानने। सिते पक्षे तु पंचम्यां तथैतौ पावकानलौ

saṁbhūtāvarkasadṛśau viśāle śarakānane site pakṣe tu paṁcamyāṁ tathaitau pāvakānalau

—सूर्य के समान तेजस्वी, उस विशाल शरवन में उत्पन्न हुए। शुक्लपक्ष की पंचमी को वे दोनों, अग्नि से उत्पन्न—

श्लोक 147 (padma.1.44.147)

बालकाभ्यां चकारैकं संध्यायामेव भूतये। तस्यामेव ततः षष्ठ्यामभिषिक्तो गुहः प्रभुः

bālakābhyāṁ cakāraikaṁ saṁdhyāyāmeva bhūtaye tasyāmeva tataḥ ṣaṣṭhyāmabhiṣikto guhaḥ prabhuḥ

—दो शिशुओं से मिलकर संध्याकाल में ही, जगत्कल्याण हेतु, एक हो गए। फिर उसी छठी तिथि को प्रभु गुह का अभिषेक हुआ।

श्लोक 148 (padma.1.44.148)

सर्वैरमरसंघातैर्ब्रह्मोपेंद्रेंद्र भास्करैः। गंधमाल्यैः शुभैर्धूपैस्तथा क्रीडनकैरपि

sarvairamarasaṁghātairbrahmopeṁdreṁdra bhāskaraiḥ gaṁdhamālyaiḥ śubhairdhūpaistathā krīḍanakairapi

समस्त देव-समूहों, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सूर्य द्वारा, गंध-माला, शुभ धूप तथा खिलौनों सहित—

श्लोक 149 (padma.1.44.149)

छत्रैश्चामरजालैश्च भूषणैश्च विलेपनैः। अभिषिक्तो विधानेन यथावत्षण्मुखः प्रभुः

chatraiścāmarajālaiśca bhūṣaṇaiśca vilepanaiḥ abhiṣikto vidhānena yathāvatṣaṇmukhaḥ prabhuḥ

—छत्रों, चामर-समूहों, आभूषणों तथा विलेपनों से, विधिवत यथावत् षण्मुख प्रभु का अभिषेक हुआ।

श्लोक 150 (padma.1.44.150)

सुतामस्मै ददौ शक्रो देवसेनेति विश्रुताम्। पत्न्यर्थं देवदेवेशो ददौ विष्णुरथायुधम्

sutāmasmai dadau śakro devaseneti viśrutām patnyarthaṁ devadeveśo dadau viṣṇurathāyudham

इन्द्र ने उन्हें अपनी पुत्री देवसेना नाम से विख्यात दे दी। देवदेवेश विष्णु ने पत्नी के लिए रथ और आयुध दिया।

श्लोक 151 (padma.1.44.151)

यक्षाणां दशलक्षाणि ददावस्य धनाधिपः। ददौ हुताशनस्तेजो ददौ वायुश्च वाहनम्

yakṣāṇāṁ daśalakṣāṇi dadāvasya dhanādhipaḥ dadau hutāśanastejo dadau vāyuśca vāhanam

धनाधिप कुबेर ने दस लाख यक्ष दिए। अग्नि ने अपना तेज दिया, वायु ने वाहन दिया।

श्लोक 152 (padma.1.44.152)

ददौ क्रीडनकं त्वष्टा कुक्कुटं कामरूपिणम्। एवं सुरास्तु ते सर्वे परिवारमनन्तकम्

dadau krīḍanakaṁ tvaṣṭā kukkuṭaṁ kāmarūpiṇam evaṁ surāstu te sarve parivāramanantakam

त्वष्टा ने इच्छानुसार रूप धारण करने वाला मुर्गा खिलौने रूप में दिया। इस प्रकार सभी देवों ने अनंत परिवार—

श्लोक 153 (padma.1.44.153)

। ददुर्मुदितचेतस्काः स्कंदायादित्यवर्चसे। जानुभ्यामवनौ स्थित्वा सुरसंघास्तमस्तुवन्

dadurmuditacetaskāḥ skaṁdāyādityavarcase jānubhyāmavanau sthitvā surasaṁghāstamastuvan

—प्रसन्नचित्त होकर सूर्यसम तेजस्वी स्कंद को दिया। घुटनों के बल भूमि पर बैठकर देवसमूहों ने उनकी स्तुति की।

श्लोक 154 (padma.1.44.154)

स्तोत्रेणानेन वरदं षण्मुखं मुख्यशः सुराः। देवा ऊचुः-। नमः कुमाराय महाप्रभाय स्कंदाय चास्कंदितदानवाय

stotreṇānena varadaṁ ṣaṇmukhaṁ mukhyaśaḥ surāḥ devā ūcuḥ- namaḥ kumārāya mahāprabhāya skaṁdāya cāskaṁditadānavāya

इस स्तोत्र से देवों ने मुख्य रूप से वरदायी षण्मुख की स्तुति की। देवों ने कहा — महाप्रभावशाली कुमार को, दानवों को पराजित करने वाले स्कंद को नमस्कार—

श्लोक 155 (padma.1.44.155)

नवार्कबिंबप्रतिमप्रभाव नमोस्तु गुह्याय गुहाय तुभ्यम्। नमोस्तु ते लोकभयापहाय नमोस्तु ते लोककृपापराय

navārkabiṁbapratimaprabhāva namostu guhyāya guhāya tubhyam namostu te lokabhayāpahāya namostu te lokakṛpāparāya

—नवोदित सूर्यबिंब जैसी प्रभा वाले, हे गुह्य, हे गुहा को नमस्कार। संसार का भय हरने वाले तुम्हें नमस्कार, संसार पर कृपा करने वाले तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 156 (padma.1.44.156)

नमो विशालामललोचनाय नमो विशाखाय महाव्रताय। नमो नमस्तेस्तु रणोत्कटाय नमो मयूरोज्ज्वलवाहनाय

namo viśālāmalalocanāya namo viśākhāya mahāvratāya namo namastestu raṇotkaṭāya namo mayūrojjvalavāhanāya

विशाल निर्मल नेत्रों वाले को नमस्कार, महाव्रती विशाख को नमस्कार। युद्ध में उत्कट तुम्हें नमस्कार, मयूर-वाहन तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 157 (padma.1.44.157)

नमोस्तु केयूरधराय तुभ्यं नमो धृतोदग्रपताकिने ते। नमः प्रभावप्रणताय तेस्तु नमोऽस्तु घंटाधरधैर्यशालिने

namostu keyūradharāya tubhyaṁ namo dhṛtodagrapatākine te namaḥ prabhāvapraṇatāya testu namo'stu ghaṁṭādharadhairyaśāline

केयूरधारी तुम्हें नमस्कार, ऊँची पताका धारण करने वाले तुम्हें नमस्कार। जिनके प्रभाव के आगे सब झुकते हैं, तुम्हें नमस्कार; घंटाधारी, धैर्यशाली तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 158 (padma.1.44.158)

कुमार उवाच-। कं वः कामं प्रयच्छामि भवंतो ब्रूतनिर्वृताः। यद्यप्य साध्यं कृत्यं नो हृदये चिंतितं चिरम्

kumāra uvāca- kaṁ vaḥ kāmaṁ prayacchāmi bhavaṁto brūtanirvṛtāḥ yadyapya sādhyaṁ kṛtyaṁ no hṛdaye ciṁtitaṁ ciram

कुमार ने कहा — तुम्हारी क्या इच्छा है, मैं वह पूर्ण करूँ, हे संतुष्टो! भले ही वह कार्य असाध्य हो, जो चिरकाल से तुम्हारे हृदय में चिंतित है।

श्लोक 159 (padma.1.44.159)

इत्युक्तास्तु सुरास्तेन प्रोचुः प्रणतमौलयः। सर्व एव महात्मानं गुहं मुदितमानसाः

ityuktāstu surāstena procuḥ praṇatamaulayaḥ sarva eva mahātmānaṁ guhaṁ muditamānasāḥ

यह सुनकर, झुके मुकुटों वाले देवों ने प्रसन्न मन से उस महात्मा गुह से कहा।

श्लोक 160 (padma.1.44.160)

दैत्येंद्रस्तारको नाम सर्वामरकुलांतकृत्। बलवान्दुर्जयस्तीक्ष्णो दुराचारोतिकोपनः

daityeṁdrastārako nāma sarvāmarakulāṁtakṛt balavāndurjayastīkṣṇo durācārotikopanaḥ

तारक नामक दैत्येंद्र है, समस्त देवकुल का नाशक — बलवान, दुर्जय, तीक्ष्ण, दुराचारी, अत्यंत क्रोधी।

श्लोक 161 (padma.1.44.161)

तमेव जहि दुर्धर्षं दैत्यं सर्वविनाशनम्। उपस्थितः कृत्यशेषो ह्यस्माकं च भयावहः

tameva jahi durdharṣaṁ daityaṁ sarvavināśanam upasthitaḥ kṛtyaśeṣo hyasmākaṁ ca bhayāvahaḥ

उसी दुर्धर्ष, सर्वनाशी दैत्य को मारो। यही शेष कार्य हमारे सामने है, जो हमें अत्यंत भयभीत करता है।

श्लोक 162 (padma.1.44.162)

हिरण्यकशिपुश्चोग्रो ह्यवध्यो देवतागणैः। यज्ञघ्नः पापकर्मा वै येन ब्रह्मापि तापितः

hiraṇyakaśipuścogro hyavadhyo devatāgaṇaiḥ yajñaghnaḥ pāpakarmā vai yena brahmāpi tāpitaḥ

और उग्र हिरण्यकशिपु भी, देवगणों के लिए भी अवध्य, यज्ञनाशक, पापकर्मा, जिसने ब्रह्मा को भी संतप्त किया है।

श्लोक 163 (padma.1.44.163)

एतौ हरस्व भद्रं ते तावकं च महाबलम्। एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सर्वामरपदानुगः

etau harasva bhadraṁ te tāvakaṁ ca mahābalam evamuktastathetyuktvā sarvāmarapadānugaḥ

इन दोनों को अपने महाबल से नष्ट करो, तुम्हारा कल्याण हो। यह कहे जाने पर 'ऐसा ही हो' कहकर, सभी देवों के अनुगमन में—

श्लोक 164 (padma.1.44.164)

जगाम जगतांनाथस्तूयमानोमरेश्वरैः। तारकस्य वधार्थाय जगतां कंटकस्य च

jagāma jagatāṁnāthastūyamānomareśvaraiḥ tārakasya vadhārthāya jagatāṁ kaṁṭakasya ca

—जगत के स्वामी, अमरेश्वरों द्वारा स्तुत होकर, तारक के वध हेतु, जो संसार का कंटक था, प्रस्थान किया।

श्लोक 165 (padma.1.44.165)

ततश्च प्रेषयामास शक्रो गूढसमाश्रयः। दूतं दानवसिंहस्य परुषाक्षरवादिनम्

tataśca preṣayāmāsa śakro gūḍhasamāśrayaḥ dūtaṁ dānavasiṁhasya paruṣākṣaravādinam

तब गुप्त रूप से सतर्क इन्द्र ने कठोर वचन बोलने वाला एक दूत उस दानवसिंह के पास भेजा।

श्लोक 166 (padma.1.44.166)

स तु गत्वाब्रवीद्दैत्यमभयो भीमदर्शनम्। दूत उवाच। शक्रस्त्वामाह देवेशो दैत्यकेतुं दिवस्पतिः

sa tu gatvābravīddaityamabhayo bhīmadarśanam dūta uvāca śakrastvāmāha deveśo daityaketuṁ divaspatiḥ

वह निर्भय होकर जाकर भीषण दिखने वाले दैत्य से बोला। दूत ने कहा — देवेश, स्वर्गाधिपति इन्द्र तुमसे कहते हैं, हे दैत्यकेतु—

श्लोक 167 (padma.1.44.167)

तारकासुर तच्छक्त्या घटयस्व यथेच्छया। यज्जगज्ज्वलनोद्दीप्तं किल्बिषं च त्वया कृतम्

tārakāsura tacchaktyā ghaṭayasva yathecchayā yajjagajjvalanoddīptaṁ kilbiṣaṁ ca tvayā kṛtam

—हे तारकासुर! अपनी इच्छानुसार सारी शक्ति से तैयार हो जाओ, तुमने जो जगत को जलाकर पाप किया है—

श्लोक 168 (padma.1.44.168)

तस्याहं सादकस्तेद्य राजास्मि भुवनत्रये। श्रुत्वैतदद्भुतं वाक्यं कोपसंरक्तलोचनः

tasyāhaṁ sādakastedya rājāsmi bhuvanatraye śrutvaitadadbhutaṁ vākyaṁ kopasaṁraktalocanaḥ

—उसका मैं आज दंडदाता हूँ, मैं तीनों लोकों का राजा हूँ। यह अद्भुत वचन सुनकर, क्रोध से लाल नेत्रों वाला—

श्लोक 169 (padma.1.44.169)

उवाच दूतं दुष्टात्मा नष्टप्रायविभूतिकः। तारक उवाच-। दृष्टं ते पौरुषं शक्र शतशोथ महारणे

uvāca dūtaṁ duṣṭātmā naṣṭaprāyavibhūtikaḥ tāraka uvāca- dṛṣṭaṁ te pauruṣaṁ śakra śataśotha mahāraṇe

—उस दुष्टात्मा, नष्टप्राय वैभव वाले ने दूत से कहा। तारक ने कहा — हे शक्र! तुम्हारा पौरुष महायुद्ध में सैकड़ों बार देखा जा चुका है।

श्लोक 170 (padma.1.44.170)

निस्त्रपत्वान्न ते शांतिर्विद्यते शक्र दुर्मते। एवमुक्ते गते दूते चिंतयामास दानवः

nistrapatvānna te śāṁtirvidyate śakra durmate evamukte gate dūte ciṁtayāmāsa dānavaḥ

निर्लज्जता से ही तुम्हें शांति नहीं मिलती, हे दुर्मते शक्र। यह कहे जाने पर, दूत के जाने पर, दानव ने विचार किया।

श्लोक 171 (padma.1.44.171)

नालब्धसंश्रयः शक्रो वक्तुमेवमिहार्हति। जातः स्कंदोधुना शक्राज्ज्ञायते समुपाश्रयात्

nālabdhasaṁśrayaḥ śakro vaktumevamihārhati jātaḥ skaṁdodhunā śakrājjñāyate samupāśrayāt

कोई नया आश्रय पाए बिना शक्र ऐसा बोलने का साहस नहीं कर सकता। अब यह ज्ञात होता है कि स्कंद जन्म ले चुका है, इसी नए आश्रय से—

श्लोक 172 (padma.1.44.172)

निमित्तौघांस्तदा दुष्टान्सोपश्यन्नाशवेदिनः। पांसुवर्षमसृक्पातं गगनादवनीतले

nimittaughāṁstadā duṣṭānsopaśyannāśavedinaḥ pāṁsuvarṣamasṛkpātaṁ gaganādavanītale

—तब उसने अपने विनाश की सूचना देने वाले अनेक दुष्ट संकेत देखे — आकाश से धूल और रक्त की वर्षा भूमि पर—

श्लोक 173 (padma.1.44.173)

वामनेत्रप्रकंपं च वक्त्रशोषं मनोमयम्। स्वकानां वक्त्रपद्मानां म्लानतां च व्यलोकयत्

vāmanetraprakaṁpaṁ ca vaktraśoṣaṁ manomayam svakānāṁ vaktrapadmānāṁ mlānatāṁ ca vyalokayat

—बाएँ नेत्र का फड़कना, चिंता से मुख का सूखना; अपने ही लोगों के मुखकमलों की मलिनता को उसने देखा।

श्लोक 174 (padma.1.44.174)

दुष्टांश्च प्राणिनो रौद्रान्सोपश्यद्दुष्टवादिनः। तदचिंत्यैव दितिजो न्यस्तचित्तोभवत्क्षणात्

duṣṭāṁśca prāṇino raudrānsopaśyadduṣṭavādinaḥ tadaciṁtyaiva ditijo nyastacittobhavatkṣaṇāt

उसने दुष्ट, भयंकर, अशुभ बोलने वाले प्राणियों को भी देखा। इस पर विचार किए बिना ही वह दितिपुत्र क्षणभर में उसे भुला बैठा।

श्लोक 175 (padma.1.44.175)

यावद्गजघटाघंटा घनत्काररवोत्कटाम्। तद्वत्तुरंगसंघातहेषोत्साहविभूषिताम्

yāvadgajaghaṭāghaṁṭā ghanatkāraravotkaṭām tadvatturaṁgasaṁghātaheṣotsāhavibhūṣitām

हाथी-समूह की घंटियों की गंभीर ध्वनि से भरी, वैसे ही घोड़ों के हिनहिनाने के उत्साह से सुशोभित—

श्लोक 176 (padma.1.44.176)

सैन्यैस्सेनान्तरोदग्र ध्वजराजैर्विराजिताम्। विमानैश्चाद्भुताकारैश्चलितामलचामरैः

sainyaissenāntarodagra dhvajarājairvirājitām vimānaiścādbhutākāraiścalitāmalacāmaraiḥ

—सेनाओं तथा उनके बीच उठी राजसी ध्वजाओं से सुशोभित, अद्भुत आकार वाले विमानों तथा हिलते निर्मल चामरों वाली—

श्लोक 177 (padma.1.44.177)

विभूषणपिनद्धां च किन्नरोद्गीतनादिताम्। नाना नाकतरूत्फुल्ल कुसुमापीडधारिणीम्

vibhūṣaṇapinaddhāṁ ca kinnarodgītanāditām nānā nākatarūtphulla kusumāpīḍadhāriṇīm

—आभूषणों से सज्जित, किन्नरों के गीतों से गुंजायमान, विविध स्वर्गीय वृक्षों के खिले फूलों का मुकुट धारण किए—

श्लोक 178 (padma.1.44.178)

विशोकास्त्रपरिस्फार चर्मनिर्मलदर्शिनीं। विद्युत्पुष्टद्युतिधरां नानावाद्यविनादिताम्

viśokāstraparisphāra carmanirmaladarśinīṁ vidyutpuṣṭadyutidharāṁ nānāvādyavināditām

—शोकरहित, फैलाए गए अस्त्रों तथा निर्मल ढालों से दृश्यमान, बिजली-सी पुष्ट कांति धारण किए, नाना वाद्यों से गुंजित—

श्लोक 179 (padma.1.44.179)

सेनां नाकसदां दैत्यः प्रासादस्थो व्यलोकयत्। सचिंतयामास तदा किंचिद्विभ्रांतमानसः

senāṁ nākasadāṁ daityaḥ prāsādastho vyalokayat saciṁtayāmāsa tadā kiṁcidvibhrāṁtamānasaḥ

—स्वर्गवासियों की उस सेना को दैत्य ने अपने प्रासाद से देखा। तब उसने कुछ भ्रमित मन से विचार किया।

श्लोक 180 (padma.1.44.180)

अपूर्वः को भवेद्योद्धा यो मया न विनिर्जितः। ततश्चिंताकुलो दैत्यः शुश्राव कटुकाक्षरम्। सिद्धवंदिभिरुद्घुष्टमिदं हृदयदारुणम्

apūrvaḥ ko bhavedyoddhā yo mayā na vinirjitaḥ tataściṁtākulo daityaḥ śuśrāva kaṭukākṣaram siddhavaṁdibhirudghuṣṭamidaṁ hṛdayadāruṇam

'यह कौन अपूर्व योद्धा होगा, जिसे मैंने अभी तक पराजित नहीं किया?' फिर चिंताकुल दैत्य ने कटु वचन सुने — सिद्धों और वंदीजनों द्वारा उद्घोषित यह हृदयविदारक वचन—

श्लोक 181 (padma.1.44.181)

जयातुलशक्तिदीधितिपंजरभुजदंडप्रचंडतर। रभससुरवदनकुमुदविकासनविलासनेत्र कुमारवर

jayātulaśaktidīdhitipaṁjarabhujadaṁḍapracaṁḍatara rabhasasuravadanakumudavikāsanavilāsanetra kumāravara

जय हो! अतुल शक्ति की किरणों के पिंजरे जैसी भुजदंडों वाले, प्रचंड, वेगवान देवों के मुख-कुमुद को खिलाने वाले नेत्रों से लीलामय, हे कुमारश्रेष्ठ!

श्लोक 182 (padma.1.44.182)

जय दितिजकुलमहोदधि बडवानल मधुरमयूररथ सुरमकुट कोटि कुंचित चरण नखांकुर महासेन

jaya ditijakulamahodadhi baḍavānala madhuramayūraratha suramakuṭa koṭi kuṁcita caraṇa nakhāṁkura mahāsena

जय हो! दितिपुत्रों के कुल-महासागर के लिए बड़वानल, मधुर मयूर-रथी, सुरमुकुटों की करोड़ों झुकी हुई किरणों से चरण-नखांकुर वाले, महासेन!

श्लोक 183 (padma.1.44.183)

जय चलितललित चूडाकलापनवविमलकमल। दंडकांत दैत्येशवंश दुःसह दावानल

jaya calitalalita cūḍākalāpanavavimalakamala daṁḍakāṁta daityeśavaṁśa duḥsaha dāvānala

जय हो! हिलते, सुंदर, नए निर्मल कमल जैसे चूड़ा-समूह वाले! दैत्येश-वंश रूपी दंडकवन के लिए असह्य दावानल!

श्लोक 184 (padma.1.44.184)

जय विशाखविभोजय बालसप्तवासर भुवनालिशोकशमन जय सकललोक दितिसुतधुरंधरनाशक स्कंद

jaya viśākhavibhojaya bālasaptavāsara bhuvanāliśokaśamana jaya sakalaloka ditisutadhuraṁdharanāśaka skaṁda

जय हो, विशाख प्रभु! जय हो, सात दिन के बालक, संसार-समूह के शोक को शांत करने वाले! जय हो, समस्त लोकों के दितिपुत्रों के अग्रगण्य को नष्ट करने वाले स्कंद!

श्लोक 185 (padma.1.44.185)

श्रुत्वैतत्तारकः सर्वमुद्घुष्टं देववंदिभिः। सस्मार ब्रह्मणो वाक्यं वधं बालादुपस्थितं

śrutvaitattārakaḥ sarvamudghuṣṭaṁ devavaṁdibhiḥ sasmāra brahmaṇo vākyaṁ vadhaṁ bālādupasthitaṁ

देवों के वंदीजनों द्वारा घोषित यह सब सुनकर तारक ने ब्रह्मा के उस वचन का स्मरण किया, कि उसका वध एक बालक द्वारा उपस्थित होगा।

श्लोक 186 (padma.1.44.186)

स्मृत्वा धर्मौघविध्वंसी सदा वीरपदानुगः। मंदिरान्निर्जगामाशु शोकग्रस्तेन चेतसा

smṛtvā dharmaughavidhvaṁsī sadā vīrapadānugaḥ maṁdirānnirjagāmāśu śokagrastena cetasā

स्मरण करके, वह धर्म-प्रवाह का सदा विध्वंसक, वीरपद का अनुगामी, शोकग्रस्त मन से शीघ्र अपने भवन से निकल पड़ा।

श्लोक 187 (padma.1.44.187)

कालनेमिमुखा दैत्याः संत्रस्ता भ्रांतचेतसः। स्वेष्वनीकेषु च तदा त्वरा विस्मितचेतसः

kālanemimukhā daityāḥ saṁtrastā bhrāṁtacetasaḥ sveṣvanīkeṣu ca tadā tvarā vismitacetasaḥ

कालनेमि आदि दैत्य भयभीत, भ्रमित मन से, अपनी-अपनी सेनाओं में जल्दबाजी से, विस्मित होकर—

श्लोक 188 (padma.1.44.188)

हिरण्यकशिपुः प्राह दानवानां धुरंधरः। त्रपाकरं भवेन्मह्यं बालस्यास्य पलायनम्

hiraṇyakaśipuḥ prāha dānavānāṁ dhuraṁdharaḥ trapākaraṁ bhavenmahyaṁ bālasyāsya palāyanam

—हिरण्यकशिपु ने, दानवों के अग्रणी ने कहा — इस बालक से भागना मुझे लज्जित करेगा।

श्लोक 189 (padma.1.44.189)

यद्यहं हंतवे यामि सोपि वै कमलाश्रितः। हत्वाहं बालकं चैनं दुःस्पर्शः स्यामकारणं

yadyahaṁ haṁtave yāmi sopi vai kamalāśritaḥ hatvāhaṁ bālakaṁ cainaṁ duḥsparśaḥ syāmakāraṇaṁ

यदि मैं उसे मारने जाऊँ, तो वह भी कमलयोनि (ब्रह्मा) के आश्रय में है — इस बालक को मारकर मैं बिना कारण ही अस्पृश्य बन जाऊँगा।

श्लोक 190 (padma.1.44.190)

यात धावत गृह्णीत योजयध्वं वरूथिनीम्। कुमारं तारको दृष्ट्वा बभाषे भीषणाकृतिः

yāta dhāvata gṛhṇīta yojayadhvaṁ varūthinīm kumāraṁ tārako dṛṣṭvā babhāṣe bhīṣaṇākṛtiḥ

'जाओ, दौड़ो, पकड़ो, सेना जोड़ो!' कुमार को देखकर भयंकर आकृति वाले तारक ने कहा।

श्लोक 191 (padma.1.44.191)

किं बाल योद्धुकामोसि क्रीडकंदुकलीलया। येनातपो निसृष्टस्ते सत्संगरविभाषक

kiṁ bāla yoddhukāmosi krīḍakaṁdukalīlayā yenātapo nisṛṣṭaste satsaṁgaravibhāṣaka

क्या बालक तू लीला के गेंद-खेल की तरह लड़ना चाहता है? किसने तुझे यह तेज दिया है, हे सच्चे युद्ध की डींग हाँकने वाले?

श्लोक 192 (padma.1.44.192)

बालत्वादथ ते बुद्धिरेवं स्वल्पार्थदर्शिनी। कुमारोपि तमग्रस्थं बभाषे हर्षवत्तमं

bālatvādatha te buddhirevaṁ svalpārthadarśinī kumāropi tamagrasthaṁ babhāṣe harṣavattamaṁ

बालपन के कारण ही तेरी बुद्धि छोटी वस्तुओं को ही देखने वाली है। कुमार ने भी उसके सामने खड़े होकर अत्यंत हर्षपूर्वक कहा।

श्लोक 193 (padma.1.44.193)

शृणु तारक शास्त्रार्थ इह नैव निरूप्यते। शस्त्रैरर्था न दृश्यंते समरे निर्भरं भये

śṛṇu tāraka śāstrārtha iha naiva nirūpyate śastrairarthā na dṛśyaṁte samare nirbharaṁ bhaye

सुनो तारक! यहाँ शास्त्रार्थ से कुछ सिद्ध नहीं होता। अस्त्रों का सच्चा अर्थ युद्ध के भय में ही पूरी तरह दिखता है।

श्लोक 194 (padma.1.44.194)

शिशुत्वं मावमंस्था मे शिशुः कष्टो भुजंगमः। दुष्प्रेक्षो भास्करो बालस्तथाहं दुर्जयः शिशुः

śiśutvaṁ māvamaṁsthā me śiśuḥ kaṣṭo bhujaṁgamaḥ duṣprekṣo bhāskaro bālastathāhaṁ durjayaḥ śiśuḥ

मेरे बालपन का तिरस्कार मत करो — बालक सर्प भी कष्टकारी होता है, नवोदित सूर्य भी देखना कठिन होता है; वैसे ही मैं, बालक होते हुए भी, दुर्जय हूँ।

श्लोक 195 (padma.1.44.195)

अल्पाक्षरो न मंत्रः किं सस्फुरो दैत्य दृश्यते। कुमारे प्रोक्तवत्येवं दैत्यश्चिक्षेप मुद्गरं

alpākṣaro na maṁtraḥ kiṁ sasphuro daitya dṛśyate kumāre proktavatyevaṁ daityaścikṣepa mudgaraṁ

क्या अल्पाक्षर मंत्र स्फुरित होता हुआ नहीं दिखता, हे दैत्य? कुमार के यह कहने पर दैत्य ने मुद्गर फेंका।

श्लोक 196 (padma.1.44.196)

कुमारस्तं निरासोग्रं चक्रेणामोघवर्चसा। ततश्चिक्षेप दैत्येंद्रो भिंदिपालमयोमयं

kumārastaṁ nirāsograṁ cakreṇāmoghavarcasā tataścikṣepa daityeṁdro bhiṁdipālamayomayaṁ

कुमार ने अपने अमोघ तेजस्वी चक्र से उस भयंकर मुद्गर को दूर हटा दिया। फिर दैत्येंद्र ने लौह भिंदिपाल फेंका।

श्लोक 197 (padma.1.44.197)

करेण तं च जग्राह कार्तिकेयोमरारिहा। गदां मुमोच दैत्याय समुत्थाय खरस्वनाम्

kareṇa taṁ ca jagrāha kārtikeyomarārihā gadāṁ mumoca daityāya samutthāya kharasvanām

अमरशत्रुनाशक कार्तिकेय ने उसे हाथ से पकड़ लिया। उठकर उन्होंने दैत्य पर कर्कश ध्वनि वाली गदा छोड़ी।

श्लोक 198 (padma.1.44.198)

तया हतस्ततो दैत्यश्चकम्पेचलराडिव। मेने च दुर्जयं दैत्यस्तदाबालं सुदुःसहं

tayā hatastato daityaścakampecalarāḍiva mene ca durjayaṁ daityastadābālaṁ suduḥsahaṁ

उससे आहत होकर दैत्य पर्वतराज की तरह काँप उठा। तब दैत्य ने उस बालक को दुर्जय, अत्यंत असह्य समझा।

श्लोक 199 (padma.1.44.199)

चिंतयामास बुद्ध्या वै प्राप्तः कालो न संशयः। कंपितं च समालोक्य कालनेमि पुरोगमाः

ciṁtayāmāsa buddhyā vai prāptaḥ kālo na saṁśayaḥ kaṁpitaṁ ca samālokya kālanemi purogamāḥ

उसने बुद्धि से सोचा — निश्चय ही मेरा काल आ गया है। उसे काँपता देखकर कालनेमि आदि—

श्लोक 200 (padma.1.44.200)

सर्वे देत्यैश्वरा जघ्नुः कुमारं रणदारुणं। स तैः प्रहारैरस्पृष्टस्तथा क्लैशैर्महाद्युतिः

sarve detyaiśvarā jaghnuḥ kumāraṁ raṇadāruṇaṁ sa taiḥ prahārairaspṛṣṭastathā klaiśairmahādyutiḥ

—सभी दैत्येश्वरों ने युद्ध में भयंकर कुमार पर प्रहार किया। परंतु वह महातेजस्वी उनके प्रहारों और कष्टों से अस्पृष्ट रहा।

श्लोक 201 (padma.1.44.201)

स बालो बलिभिर्वेगैरयुध्यद्दानवै रणे। रणशौण्डाश्च दैत्येंद्रा पुःनर्जघ्नुः शिलीमुखैः

sa bālo balibhirvegairayudhyaddānavai raṇe raṇaśauṇḍāśca daityeṁdrā puḥnarjaghnuḥ śilīmukhaiḥ

वह बालक बलवान, वेगवान दानवों से युद्ध में लड़ता रहा। युद्धकुशल दैत्येंद्रों ने पुनः तीक्ष्ण बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 202 (padma.1.44.202)

कुमारं समरे दैत्या बलिनो देवकंटकाः। कुमारस्य व्यथा नाभूद्दैत्यास्त्रनिहतस्य तु

kumāraṁ samare daityā balino devakaṁṭakāḥ kumārasya vyathā nābhūddaityāstranihatasya tu

बलवान दैत्यों ने, देवों के कंटकों ने, युद्ध में कुमार पर प्रहार किया, परंतु दैत्यास्त्रों से आहत होकर भी कुमार को कोई पीड़ा न हुई।

श्लोक 203 (padma.1.44.203)

प्राणांतकरणं जातं देवानां दानवा हवं। देवान्निपीडितान्दृष्ट्वा कुमारः कोपमाविशत्

prāṇāṁtakaraṇaṁ jātaṁ devānāṁ dānavā havaṁ devānnipīḍitāndṛṣṭvā kumāraḥ kopamāviśat

देवों की ओर से यह युद्ध दानवों के प्राणांतकारी हो चुका था। देवों को इस प्रकार पीड़ित देखकर कुमार क्रोध से भर गए।

श्लोक 204 (padma.1.44.204)

ततोस्त्रैर्दारयामास दानावानामनीकिनीम्। तैरस्त्रैर्निष्प्रतीकारैस्ताडितास्सुरकंटकाः

tatostrairdārayāmāsa dānāvānāmanīkinīm tairastrairniṣpratīkāraistāḍitāssurakaṁṭakāḥ

तब उन्होंने अस्त्रों से दानवों की सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया। उन अप्रतिकार्य अस्त्रों से आहत होकर देवों के कंटक—

श्लोक 205 (padma.1.44.205)

कालनेमिमुखाः सर्वे रणे ह्यासन्पराङ्मुखाः। विद्रुतेषु च दैत्येषु प्रहतेषु समंततः

kālanemimukhāḥ sarve raṇe hyāsanparāṅmukhāḥ vidruteṣu ca daityeṣu prahateṣu samaṁtataḥ

—कालनेमि आदि सभी युद्ध में पीठ फेर बैठे। दैत्यों के चारों ओर से आहत होकर भागते समय—

श्लोक 206 (padma.1.44.206)

किन्नरोद्गारगीतैश्च हास्यसन्यस्तचेतनः। जघ्ने कुमारं गदया निष्टप्तकनकत्विषा

kinnarodgāragītaiśca hāsyasanyastacetanaḥ jaghne kumāraṁ gadayā niṣṭaptakanakatviṣā

—किन्नरों के उपहासपूर्ण विजय-गीतों से चित्त पर आक्रांत होकर, तारक ने तपे स्वर्ण जैसी कांति वाली गदा से कुमार पर प्रहार किया।

श्लोक 207 (padma.1.44.207)

शरैर्मयूरं चित्रैश्च चकार विमुखं रणे। दृष्ट्वा पराड्मुखो देवो मुक्तरक्तं स्ववाहनम्

śarairmayūraṁ citraiśca cakāra vimukhaṁ raṇe dṛṣṭvā parāḍmukho devo muktaraktaṁ svavāhanam

विचित्र बाणों से उसने मयूर को युद्ध से विमुख कर दिया। अपने वाहन को घायल, विमुख देखकर देव—

श्लोक 208 (padma.1.44.208)

जग्राह शक्तिं विमलां रणे कनकभूषणाम्। बाहुना हेमकेयूर रुचिरेण षडाननः

jagrāha śaktiṁ vimalāṁ raṇe kanakabhūṣaṇām bāhunā hemakeyūra rucireṇa ṣaḍānanaḥ

—षडानन ने स्वर्ण-केयूर से सुशोभित भुजा से युद्ध में अपनी निर्मल, स्वर्णभूषित शक्ति उठाई।

श्लोक 209 (padma.1.44.209)

ततोब्रवीन्महासेनस्तारकं दानवाधिपम्। तिष्ठतिष्ठ सुदुर्बुद्धे यमलोकं विलोकय

tatobravīnmahāsenastārakaṁ dānavādhipam tiṣṭhatiṣṭha sudurbuddhe yamalokaṁ vilokaya

तब महासेन ने दानवाधिप तारक से कहा — रुको, रुको, हे दुर्बुद्धे! यमलोक को देख लो।

श्लोक 210 (padma.1.44.210)

हतो ह्यसि मया शक्त्या स्मर स्वं दैत्यचेष्टितम्। इत्युक्त्वा तु ततः शक्तिं मुमोच दितिजं प्रति

hato hyasi mayā śaktyā smara svaṁ daityaceṣṭitam ityuktvā tu tataḥ śaktiṁ mumoca ditijaṁ prati

तुम मेरी शक्ति से मारे जा चुके हो, अपने दैत्य-आचरण को स्मरण करो। यह कहकर उन्होंने वह शक्ति दितिपुत्र पर छोड़ दी।

श्लोक 211 (padma.1.44.211)

सा कुमारभुजोत्सृष्टा तत्केयूररवानुगा। बिभेद दैत्यहृदयं वज्रशैलेंद्रकर्कशम्

sā kumārabhujotsṛṣṭā tatkeyūraravānugā bibheda daityahṛdayaṁ vajraśaileṁdrakarkaśam

कुमार की भुजा से छूटी, अपने केयूर की ध्वनि के साथ, उसने वज्र-पर्वत के समान कठोर दैत्य के हृदय को भेद दिया।

श्लोक 212 (padma.1.44.212)

गतासुः स पपातोर्व्यां प्रलये भूधरो यथा। विकीर्णमकुटोष्णीषो विस्रस्ताखिलभूषणः

gatāsuḥ sa papātorvyāṁ pralaye bhūdharo yathā vikīrṇamakuṭoṣṇīṣo visrastākhilabhūṣaṇaḥ

प्राणहीन होकर वह भूमि पर गिर पड़ा, जैसे प्रलय में कोई पर्वत गिरता है, उसका मुकुट-उष्णीष बिखर गया, सभी आभूषण गिर गए।

श्लोक 213 (padma.1.44.213)

तस्मिन्विनिहते दैत्ये दानवानां धुरंधरे। नाभूत्कश्चित्तदा दुःखी नरकेष्वपि पापकृत्

tasminvinihate daitye dānavānāṁ dhuraṁdhare nābhūtkaścittadā duḥkhī narakeṣvapi pāpakṛt

दानवों के उस अग्रणी दैत्य के मारे जाने पर, उस समय नरकों में भी कोई पापी दुःखी नहीं हुआ।

श्लोक 214 (padma.1.44.214)

स्तुवंतः षण्मुखं देवाः प्राक्रीडन्नागतस्मिताः। जग्मुः स्वानेव भुवनान्निरस्यासंस्तथोत्सुकाः

stuvaṁtaḥ ṣaṇmukhaṁ devāḥ prākrīḍannāgatasmitāḥ jagmuḥ svāneva bhuvanānnirasyāsaṁstathotsukāḥ

षण्मुख की स्तुति करते हुए देव प्रसन्न हो उठे, उनके मुखों पर मुस्कान लौट आई; वे अपना पूर्व दुःख त्यागकर उत्सुकता से अपने-अपने लोकों को गए।

श्लोक 215 (padma.1.44.215)

ददुश्चापि वरं सर्वे देवाश्च षण्मुखं प्रति। तुष्टाः संप्राप्तसर्वार्थास्सहसिद्धैस्तपोधनैः

daduścāpi varaṁ sarve devāśca ṣaṇmukhaṁ prati tuṣṭāḥ saṁprāptasarvārthāssahasiddhaistapodhanaiḥ

और सभी देवों ने भी सिद्धों तथा तपोधनों सहित संतुष्ट होकर, अपने सभी प्रयोजन पूर्ण होने पर, षण्मुख को वर भी दिया।

श्लोक 216 (padma.1.44.216)

देवा ऊचुः। यः पठेत्स्कंदसंबंधां कथामेतां महामतिः। शृणुयाच्छ्रावयेद्वापि स भवेत्कीर्तिमान्नरः

devā ūcuḥ yaḥ paṭhetskaṁdasaṁbaṁdhāṁ kathāmetāṁ mahāmatiḥ śṛṇuyācchrāvayedvāpi sa bhavetkīrtimānnaraḥ

देवों ने कहा — जो महामति स्कंद-संबंधी इस कथा को पढ़े या सुने अथवा सुनाए, वह मनुष्य कीर्तिमान बनेगा।

श्लोक 217 (padma.1.44.217)

बह्वायुः सुभगः श्रीमान्कीर्तिमान्शुभदर्शनः। भूतेभ्यो निर्भयश्चापि सर्वदुःखविवर्जितः

bahvāyuḥ subhagaḥ śrīmānkīrtimānśubhadarśanaḥ bhūtebhyo nirbhayaścāpi sarvaduḥkhavivarjitaḥ

—दीर्घायु, सौभाग्यशाली, श्रीमान, कीर्तिमान, शुभदर्शन; प्राणियों से निर्भय तथा समस्त दुःखों से रहित।

श्लोक 218 (padma.1.44.218)

संध्यामुपास्य यः पूर्वां स्कंदस्य चरितं पठेत्। स युक्तः किन्नरैः सर्वैर्महाधनपतिर्भवेत्

saṁdhyāmupāsya yaḥ pūrvāṁ skaṁdasya caritaṁ paṭhet sa yuktaḥ kinnaraiḥ sarvairmahādhanapatirbhavet

प्रातःकाल की संध्या-वंदना करके जो स्कंद के चरित्र को पढ़े, वह सभी किन्नरों से युक्त होकर महान धनपति बनेगा।

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