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सृष्टि खण्ड · अध्याय 55

लौहित्य की उत्पत्ति

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

श्लोक 1 (padma.1.55.1)

श्रीभगवानुवाच- अपरं च प्रवक्ष्यामि कामेनाधिष्ठितस्य च। पुरा भागीरथी तीरे द्विजः परमहंसकः

śrībhagavānuvāca- aparaṁ ca pravakṣyāmi kāmenādhiṣṭhitasya ca purā bhāgīrathī tīre dvijaḥ paramahaṁsakaḥ

श्रीभगवान् ने कहा — अब मैं एक और वृत्तांत कहूँगा, काम के वशीभूत हुए एक पुरुष का। पूर्वकाल में भागीरथी के तट पर एक परमहंस द्विज रहते थे,

श्लोक 2 (padma.1.55.2)

उपदेष्टा सहस्राणां द्विजानां शांतिदः परः। एकदंडधरः साक्षात्कूर्मवद्धरणी स्थितः

upadeṣṭā sahasrāṇāṁ dvijānāṁ śāṁtidaḥ paraḥ ekadaṁḍadharaḥ sākṣātkūrmavaddharaṇī sthitaḥ

—जो सहस्रों द्विजों के उपदेशक और परम शांतिदाता थे, एक दंड धारण करने वाले, कच्छप के समान साक्षात् धरा पर स्थिर।

श्लोक 3 (padma.1.55.3)

एकाकिनः सतस्तस्य देवागारे विनिष्कृते। पत्युर्गृहात्परं गेहं गंतुं सायं समुद्यता

ekākinaḥ satastasya devāgāre viniṣkṛte patyurgṛhātparaṁ gehaṁ gaṁtuṁ sāyaṁ samudyatā

एक बार वे अपने एकांत देवागार में अकेले बैठे थे। उसी समय एक स्त्री, संध्या के समय अपने पति के घर से दूसरे घर जाने के लिए—

श्लोक 4 (padma.1.55.4)

अकस्माद्युवती नारी मिलिता रूपधारिणी। दृष्ट्वा तां भगवान्विप्रो मन्मथस्य भयार्दितः

akasmādyuvatī nārī militā rūpadhāriṇī dṛṣṭvā tāṁ bhagavānvipro manmathasya bhayārditaḥ

—अकस्मात् वहाँ आ मिली, अत्यंत रूपवती युवती। उसे देखकर वे भगवान् विप्र कामदेव के भय से पीड़ित होकर—

श्लोक 5 (padma.1.55.5)

अगारजठरे कृत्वा स चैनां प्राक्षिपत्क्षपाम्। अर्गलं सा दृढं कृत्वा देवागारे सुशोभने

agārajaṭhare kṛtvā sa caināṁ prākṣipatkṣapām argalaṁ sā dṛḍhaṁ kṛtvā devāgāre suśobhane

—उसे घर के भीतर करके उसी रात्रि में बंद कर दिया। उसने भी उस सुंदर देवागार का द्वार दृढ़तापूर्वक बंद कर दिया,

श्लोक 6 (padma.1.55.6)

कदाचिदपि तं द्वारादागंतुं न ददाति ह। एवंभूतः समाधिस्थः क्षपां क्षिप्त्वा विलप्य सः

kadācidapi taṁ dvārādāgaṁtuṁ na dadāti ha evaṁbhūtaḥ samādhisthaḥ kṣapāṁ kṣiptvā vilapya saḥ

—और उसे कभी भी द्वार से बाहर आने न दिया। इस प्रकार समाधिस्थ रहकर वह रात्रि बिताकर विलाप करने लगे,

श्लोक 7 (padma.1.55.7)

चिंतयंस्तां वरारोहां द्वारि किं वा कृतं मम। एवं संचिंत्यतामाह द्वारं देहीह नः प्रिये

ciṁtayaṁstāṁ varārohāṁ dvāri kiṁ vā kṛtaṁ mama evaṁ saṁciṁtyatāmāha dvāraṁ dehīha naḥ priye

उस सुंदरी का द्वार पर स्मरण करते हुए — 'मैंने यह क्या कर डाला!' ऐसा सोचकर उन्होंने कहा — 'हे प्रिये! हमारे लिए द्वार खोल दो,

श्लोक 8 (padma.1.55.8)

पतिश्च वशगः कांते दयितस्ते भविष्यति। ततस्तं प्राह सा विप्रं वृद्धं कामप्रलालसम्

patiśca vaśagaḥ kāṁte dayitaste bhaviṣyati tatastaṁ prāha sā vipraṁ vṛddhaṁ kāmapralālasam

—और, हे कांते! तुम्हारा यह पति तुम्हारे वश में हो जाएगा, तुम्हें प्रिय बनकर रहेगा।' तब उस वृद्ध, काम-विह्वल विप्र से उसने कहा —

श्लोक 9 (padma.1.55.9)

अनन्विता गिरःस्तात वक्तुं त्वं नार्हसि प्रभो। अथासौ भगवान्प्राह प्रचुरं चास्ति मे वसु

ananvitā giraḥstāta vaktuṁ tvaṁ nārhasi prabho athāsau bhagavānprāha pracuraṁ cāsti me vasu

'हे तात! असंगत वचन कहना आपको शोभा नहीं देता, हे प्रभो!' तब उस भगवान् ने कहा — 'मेरे पास प्रचुर धन है,

श्लोक 10 (padma.1.55.10)

तव दास्यामि कल्याणि प्रस्फोटय कपाटिकाम्। विप्रमाह पुनः सा च त्वं वै मे धर्मतः पिता

tava dāsyāmi kalyāṇi prasphoṭaya kapāṭikām vipramāha punaḥ sā ca tvaṁ vai me dharmataḥ pitā

—वह सब मैं तुम्हें दे दूँगा, हे कल्याणि! कपाट खोल दो।' फिर उस विप्र से उसने कहा — 'आप तो धर्मानुसार मेरे पिता हैं —

श्लोक 11 (padma.1.55.11)

मा गच्छ पुत्रिकां मां च परयोषां च धार्मिक। मनसा स समालोच्य सुषिरेण पथा गृहान्

mā gaccha putrikāṁ māṁ ca parayoṣāṁ ca dhārmika manasā sa samālocya suṣireṇa pathā gṛhān

—हे धार्मिक! अपनी पुत्री-समान मुझ पर, और पराई स्त्री पर, मत जाइए।' मन में यह विचार कर वे किसी छिद्र मार्ग से घर [में जाने का प्रयास करने लगे] —

श्लोक 12 (padma.1.55.12)

बाहुनोद्धाट्यते नैव गंतुं चैव समुद्यतः। गच्छतश्चार्द्धमरर उत्तमांगं सुसंकटे

bāhunoddhāṭyate naiva gaṁtuṁ caiva samudyataḥ gacchataścārddhamarara uttamāṁgaṁ susaṁkaṭe

बाहुबल से वह द्वार खुलता ही नहीं था, फिर भी वे भीतर जाने को उद्यत हुए। आधे मार्ग में जाते हुए उस संकरे स्थान में उनका सिर—

श्लोक 13 (padma.1.55.13)

प्रविष्टं न पुनश्चैति पंचत्वमगमत्तदा। उषःकाले समायाता रक्षिणो ये च किंकराः

praviṣṭaṁ na punaścaiti paṁcatvamagamattadā uṣaḥkāle samāyātā rakṣiṇo ye ca kiṁkarāḥ

—भीतर गया तो पुनः न निकल सका, और तभी उनका प्राणांत हो गया। प्रातःकाल जब रक्षक और सेवकजन वहाँ आए,

श्लोक 14 (padma.1.55.14)

अद्भुतं तं शवं दृष्ट्वा तामुचुस्ते च विस्मिताः। कथं च निधनं त्वस्य संभूतं ब्रूहि सुंदरि

adbhutaṁ taṁ śavaṁ dṛṣṭvā tāmucuste ca vismitāḥ kathaṁ ca nidhanaṁ tvasya saṁbhūtaṁ brūhi suṁdari

—तब उस अद्भुत शव को देखकर, विस्मित होकर उन्होंने उस स्त्री से पूछा — 'हे सुंदरी! बताओ, इनकी मृत्यु कैसे हुई?'

श्लोक 15 (padma.1.55.15)

कथयित्वा तु तद्वृत्तमभीष्टं देशमागता। एवं कामस्य महिमा दुर्निवारो जनेषु च

kathayitvā tu tadvṛttamabhīṣṭaṁ deśamāgatā evaṁ kāmasya mahimā durnivāro janeṣu ca

उसने वह सारा वृत्तांत कह सुनाया, फिर अपने अभीष्ट स्थान को चली गई। इस प्रकार काम की महिमा लोगों में दुर्निवार है,

श्लोक 16 (padma.1.55.16)

सर्वेषामपि जंतूनां सुरासुरनृणां भवेत्। दृष्ट्वाऽमोघां वरारोहां सर्वलोकपितामहः

sarveṣāmapi jaṁtūnāṁ surāsuranṛṇāṁ bhavet dṛṣṭvā'moghāṁ varārohāṁ sarvalokapitāmahaḥ

—यह देवों, असुरों और मनुष्यों सहित समस्त प्राणियों पर प्रभाव डालती है। अमोघा नामक सुंदरी को देखकर सर्वलोकपितामह ब्रह्मा—

श्लोक 17 (padma.1.55.17)

च्युतबीजोभवत्तत्र लौहित्यसंभवस्मृतः। पुनाति सकलान्लोकान्सर्वतीर्थमयो हि सः

cyutabījobhavattatra lauhityasaṁbhavasmṛtaḥ punāti sakalānlokānsarvatīrthamayo hi saḥ

—का वीर्य वहीं स्खलित हो गया, जिससे लौहित्य की उत्पत्ति हुई, ऐसा स्मरण किया जाता है। वे समस्त लोकों को पवित्र करते हैं, क्योंकि वे स्वयं सर्वतीर्थमय हैं,

श्लोक 18 (padma.1.55.18)

यमाश्रित्य नरो याति ब्रह्मलोकमनामयम्। द्विज उवाच- कथं च ब्रह्मणो मोहो ह्यमोघा का वरांगना

yamāśritya naro yāti brahmalokamanāmayam dvija uvāca- kathaṁ ca brahmaṇo moho hyamoghā kā varāṁganā

—जिनकी शरण लेकर मनुष्य निरामय ब्रह्मलोक को जाता है। द्विज ने कहा — यह ब्रह्मा को मोह कैसे हुआ, और वह सुंदरी अमोघा कौन थी?

श्लोक 19 (padma.1.55.19)

उद्भवं तीर्थराजस्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः। श्रीभगवानुवाच- मुनिर्देवैः समाराध्यः पद्मयोनिसमप्रभः

udbhavaṁ tīrtharājasya śrotumicchāmi tattvataḥ śrībhagavānuvāca- munirdevaiḥ samārādhyaḥ padmayonisamaprabhaḥ

मैं तीर्थराज की उत्पत्ति यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ। श्रीभगवान् ने कहा — एक मुनि थे, देवों द्वारा भी आराध्य, पद्मयोनि ब्रह्मा के समान तेजस्वी,

श्लोक 20 (padma.1.55.20)

शंतनुश्चेति विख्यातः पत्नी तस्य पतिव्रता। अमोघेति समाख्याता रूपयौवनशालिनी

śaṁtanuśceti vikhyātaḥ patnī tasya pativratā amogheti samākhyātā rūpayauvanaśālinī

—शंतनु नाम से विख्यात। उनकी पत्नी पतिव्रता थी, अमोघा नाम से प्रसिद्ध, रूप और यौवन से सुशोभित।

श्लोक 21 (padma.1.55.21)

अस्याश्च पतिमन्वेष्टुं यातो ब्रह्मा च तद्गृहम्। तस्मिन्काले मुनिश्रेष्ठः पुष्पाद्यर्थं वनं गतः

asyāśca patimanveṣṭuṁ yāto brahmā ca tadgṛham tasminkāle muniśreṣṭhaḥ puṣpādyarthaṁ vanaṁ gataḥ

उसके पति की खोज में ब्रह्मा उसके घर पधारे। उस समय वे मुनिश्रेष्ठ पुष्प आदि लाने वन गए हुए थे।

श्लोक 22 (padma.1.55.22)

सा तं दृष्ट्वा सुरश्रेष्ठमर्घ्यपाद्यादिकं ददौ। दूरेभिवादनं कृत्वा सा गृहं प्रविवेश ह

sā taṁ dṛṣṭvā suraśreṣṭhamarghyapādyādikaṁ dadau dūrebhivādanaṁ kṛtvā sā gṛhaṁ praviveśa ha

उसने उन देवश्रेष्ठ को देखकर अर्घ्य-पाद्य आदि अर्पित किया; और दूर से ही प्रणाम करके वह घर के भीतर चली गई।

श्लोक 23 (padma.1.55.23)

तां च दृष्ट्वा नवद्यांगीं धाता कामवशं गतः। स्रष्टात्मानं समाधायाचिंतयत्तां पुरोगताम्

tāṁ ca dṛṣṭvā navadyāṁgīṁ dhātā kāmavaśaṁ gataḥ sraṣṭātmānaṁ samādhāyāciṁtayattāṁ purogatām

उस निर्दोष अंगों वाली स्त्री को देखकर विधाता कामवश हो गए। अपने सृष्टिकर्ता स्वरूप को संयत रखते हुए भी वे उसका, सामने खड़ी उसका, चिंतन करने लगे।

श्लोक 24 (padma.1.55.24)

बीजं पपात खट्वायां ब्रह्मणः परमात्मनः। ततो ब्रह्मा गतस्त्रस्तस्त्वरया परिपीडितः

bījaṁ papāta khaṭvāyāṁ brahmaṇaḥ paramātmanaḥ tato brahmā gatastrastastvarayā paripīḍitaḥ

परमात्मा ब्रह्मा का वीर्य वहाँ खाट पर गिर पड़ा। तब भयभीत और लज्जित ब्रह्मा शीघ्रता से वहाँ से चले गए।

श्लोक 25 (padma.1.55.25)

अथायातो मुनिर्गेहं शुक्रं पीठे ददर्श ह। तमपृच्छद्वरारोहां कश्चाप्यत्रागतः पुमान्

athāyāto munirgehaṁ śukraṁ pīṭhe dadarśa ha tamapṛcchadvarārohāṁ kaścāpyatrāgataḥ pumān

तत्पश्चात् मुनि घर आए और आसन पर वह वीर्य देखा। उन्होंने उस सुंदरी से पूछा — 'यहाँ कौन पुरुष आया था?'

श्लोक 26 (padma.1.55.26)

तमुवाच ततोऽमोघा ब्रह्मा ह्यत्रागतः पते। त्वामेवान्वेषितुं नाथ मया दत्तोत्र पीठकः

tamuvāca tato'moghā brahmā hyatrāgataḥ pate tvāmevānveṣituṁ nātha mayā dattotra pīṭhakaḥ

तब अमोघा ने उनसे कहा — 'हे स्वामी! यहाँ ब्रह्मा आए थे, आपको ही खोजने; हे नाथ! मैंने उन्हें यह आसन दिया था।

श्लोक 27 (padma.1.55.27)

शुक्रस्य कारणं चात्र तपसा ज्ञातुमर्हसि। ततो ध्यानात्परिज्ञातं तेनैव च द्विजन्मना

śukrasya kāraṇaṁ cātra tapasā jñātumarhasi tato dhyānātparijñātaṁ tenaiva ca dvijanmanā

—यहाँ इस वीर्य का कारण आप तप से जान लीजिए।' तब उस द्विजश्रेष्ठ ने ध्यान से ही सब जान लिया,

श्लोक 28 (padma.1.55.28)

ब्रह्मरेतः परं साध्वी पालयस्व ममाज्ञया। उत्पद्यते सुतस्ते तु सर्वलोकैकपावनः

brahmaretaḥ paraṁ sādhvī pālayasva mamājñayā utpadyate sutaste tu sarvalokaikapāvanaḥ

[और कहा —] 'यह साक्षात् ब्रह्मा का वीर्य है, हे साध्वी! मेरी आज्ञा से इसकी रक्षा करो। इससे तुम्हें ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा जो समस्त लोकों का एकमात्र पवित्र करने वाला होगा,

श्लोक 29 (padma.1.55.29)

आवयोः सर्वकल्याणं फलिष्यति मनोगतम्। ततः पतिव्रता तस्य आज्ञामागृह्य संभवात्

āvayoḥ sarvakalyāṇaṁ phaliṣyati manogatam tataḥ pativratā tasya ājñāmāgṛhya saṁbhavāt

—और यह हम दोनों के लिए मनोवांछित सर्वकल्याण फलदायी होगा।' तब उस पतिव्रता ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके, उस उत्पत्ति के लिए—

श्लोक 30 (padma.1.55.30)

पपौ रेतो महाभागा ब्रह्मणः परमात्मनः। आवर्त इव संजज्ञे रौद्रगर्भ इति स्फुरन्

papau reto mahābhāgā brahmaṇaḥ paramātmanaḥ āvarta iva saṁjajñe raudragarbha iti sphuran

—उस महाभागा ने परमात्मा ब्रह्मा के उस वीर्य का पान किया। वह भँवर के समान, तेजोमय, 'रौद्रगर्भ' नाम से प्रकट हुआ।

श्लोक 31 (padma.1.55.31)

प्रसोढुं नैव शक्ता सा शंतनुं चाब्रवीत्ततः। गर्भं धारयितुं नाथ न शक्नोम्यधुना प्रभो

prasoḍhuṁ naiva śaktā sā śaṁtanuṁ cābravīttataḥ garbhaṁ dhārayituṁ nātha na śaknomyadhunā prabho

उसे धारण करने में असमर्थ होकर उसने शंतनु से कहा — 'हे नाथ! मैं अब इस गर्भ को धारण करने में असमर्थ हूँ, हे प्रभो!

श्लोक 32 (padma.1.55.32)

किं करिष्यामि धर्मज्ञ प्राणो मे संचलत्यपि। आज्ञापय महाभाग गर्भं त्यक्ष्यामि यत्र च

kiṁ kariṣyāmi dharmajña prāṇo me saṁcalatyapi ājñāpaya mahābhāga garbhaṁ tyakṣyāmi yatra ca

—हे धर्मज्ञ! मैं क्या करूँ, मेरे प्राण भी काँप रहे हैं। हे महाभाग! आज्ञा दीजिए, मैं इस गर्भ को कहाँ त्यागूँ?'

श्लोक 33 (padma.1.55.33)

पत्युराज्ञां समादाय मुक्तो गर्भो युगंधरे। पयस्तेजोमयं शुद्धं सर्वधर्मप्रतिष्ठितम्

patyurājñāṁ samādāya mukto garbho yugaṁdhare payastejomayaṁ śuddhaṁ sarvadharmapratiṣṭhitam

पति की आज्ञा लेकर उसने युगंधर पर्वत पर वह गर्भ त्याग दिया। तेजोमय, शुद्ध, समस्त धर्मों में प्रतिष्ठित वह द्रव्य—

श्लोक 34 (padma.1.55.34)

तन्मध्ये पुरुषः शुद्धः किरीटी नीलवाससा। रत्नदाम्ना च विद्धांगो दुःप्रेक्ष्यो ज्योतिषां गणः

tanmadhye puruṣaḥ śuddhaḥ kirīṭī nīlavāsasā ratnadāmnā ca viddhāṁgo duḥprekṣyo jyotiṣāṁ gaṇaḥ

—उसके मध्य एक शुद्ध पुरुष प्रकट हुआ, मुकुटधारी, नीलवस्त्रधारी, रत्नों की माला से सज्जित अंगों वाला, ज्योतियों का ऐसा समूह कि देखना कठिन था।

श्लोक 35 (padma.1.55.35)

ततो देवगणाः स्वर्गात्पुष्पवर्षमवाकिरन्। प्रसूतः सर्वतीर्थेषु तीर्थराज इति स्मृतः

tato devagaṇāḥ svargātpuṣpavarṣamavākiran prasūtaḥ sarvatīrtheṣu tīrtharāja iti smṛtaḥ

तब स्वर्ग से देवगणों ने पुष्पवृष्टि की। समस्त तीर्थों में जन्मा वह 'तीर्थराज' नाम से स्मरण किया जाता है।

श्लोक 36 (padma.1.55.36)

ततो राम इति ख्यातः प्रजातोहं भृगोः कुले। क्षत्रियान्पितृहंतॄंस्तु ससैन्यबलवाहनान्

tato rāma iti khyātaḥ prajātohaṁ bhṛgoḥ kule kṣatriyānpitṛhaṁtṝṁstu sasainyabalavāhanān

[तीर्थराज कहते हैं —] 'तत्पश्चात् मैं राम नाम से विख्यात होकर भृगुकुल में उत्पन्न हुआ। मेरे पिता के हत्यारे क्षत्रियों को, उनकी सेना, बल और वाहनों सहित—

श्लोक 37 (padma.1.55.37)

हत्वा युद्धगतान्भीतान्पंकैः सर्वैर्युतो ह्यहम्। ब्रह्महत्यासमं घोरं मद्गेहे समुपस्थितम्

hatvā yuddhagatānbhītānpaṁkaiḥ sarvairyuto hyaham brahmahatyāsamaṁ ghoraṁ madgehe samupasthitam

—युद्ध में आए हुए भयभीत उन सबको मारकर, रक्तसने अस्त्र से युक्त होकर मैं लौटा। ब्रह्महत्या के समान घोर पाप मेरे घर पर आ पड़ा —

श्लोक 38 (padma.1.55.38)

पंकयुक्तं कुठारं मे क्षालितं नैव शुद्ध्यति। ततः खे चाभवद्वाणी राम मद्वचनं कुरु

paṁkayuktaṁ kuṭhāraṁ me kṣālitaṁ naiva śuddhyati tataḥ khe cābhavadvāṇī rāma madvacanaṁ kuru

—मेरा रक्तसना कुठार धोने पर भी शुद्ध नहीं होता था। तब आकाशवाणी हुई — 'हे राम! मेरा वचन मानो —

श्लोक 39 (padma.1.55.39)

यत्र तीर्थे कुठारं ते निर्मलं च भवेदिह। तत्र ते सर्वपापानां जातानां च क्षयो भवेत्

yatra tīrthe kuṭhāraṁ te nirmalaṁ ca bhavediha tatra te sarvapāpānāṁ jātānāṁ ca kṣayo bhavet

—जिस तीर्थ में तेरा कुठार निर्मल हो जाए, वहीं तेरे समस्त उत्पन्न पापों का क्षय हो जाएगा —

श्लोक 40 (padma.1.55.40)

जनानां तत्र सर्वेषां हितार्थं तिष्ठ मानद। चपलं गच्छ तीर्थानि सर्वाणि सुमहांति च

janānāṁ tatra sarveṣāṁ hitārthaṁ tiṣṭha mānada capalaṁ gaccha tīrthāni sarvāṇi sumahāṁti ca

—हे मानद! वहीं समस्त जनों के हित के लिए स्थित रहना। अब शीघ्र ही सभी महान् तीर्थों में जाओ —

श्लोक 41 (padma.1.55.41)

तेषां मध्ये महातीर्थे पर्शुः शुद्धो भवेद्यदि। तं च जानीहि तीर्थेषु मुक्तिदं परिकीर्तितम्

teṣāṁ madhye mahātīrthe parśuḥ śuddho bhavedyadi taṁ ca jānīhi tīrtheṣu muktidaṁ parikīrtitam

—उनमें से जिस महातीर्थ में तेरा फरसा शुद्ध हो जाए, उसी तीर्थ को समस्त तीर्थों में मुक्तिदायक जानना।'

श्लोक 42 (padma.1.55.42)

तच्छ्रुत्वा जामदग्न्यस्तु तीर्थानि प्रययौ तदा। गंगां सरस्वतीं शुभ्रां कावेरीं सरयूं तथा

tacchrutvā jāmadagnyastu tīrthāni prayayau tadā gaṁgāṁ sarasvatīṁ śubhrāṁ kāverīṁ sarayūṁ tathā

यह सुनकर जामदग्न्य (परशुराम) तब तीर्थों की ओर चल पड़े — गंगा, उज्ज्वल सरस्वती, कावेरी, तथा सरयू,

श्लोक 43 (padma.1.55.43)

गोदावरीं च यमुनां कद्रूं च वसुदां तथा। अन्यां च पुण्यदां रम्यां गौरीं पूर्वां स्थितां शुभाम्

godāvarīṁ ca yamunāṁ kadrūṁ ca vasudāṁ tathā anyāṁ ca puṇyadāṁ ramyāṁ gaurīṁ pūrvāṁ sthitāṁ śubhām

—गोदावरी, यमुना, कद्रू, वसुदा, तथा अन्य पुण्यदायिनी, रमणीय, शुभ पूर्व दिशा में स्थित गौरी नदी —

श्लोक 44 (padma.1.55.44)

गच्छतस्तस्य धीरस्य सदागतिसमस्य च। क्षालितः सर्वतीर्थेषु न पुनर्निर्मलोऽभवत्

gacchatastasya dhīrasya sadāgatisamasya ca kṣālitaḥ sarvatīrtheṣu na punarnirmalo'bhavat

—इन सबमें जाते हुए, वायु के समान वेगवान् उस धीर वीर ने सर्वत्र स्नान से कुठार धोया, फिर भी वह शुद्ध न हुआ।

श्लोक 45 (padma.1.55.45)

ततो गिरिगुहां दुर्गां महारण्यं च पर्वतम्। गिरिकूटं च दुर्लभ्यं ययौ तीर्थमसौ हरिः

tato giriguhāṁ durgāṁ mahāraṇyaṁ ca parvatam girikūṭaṁ ca durlabhyaṁ yayau tīrthamasau hariḥ

तब वे दुर्गम गिरिगुहा, महावन, पर्वत और दुर्लभ गिरिशिखर होते हुए, वे हरि (परशुराम) उस [अंतिम] तीर्थ की ओर गए।

श्लोक 46 (padma.1.55.46)

न च निर्मलतामेति कुठारस्तस्य तेन च। विषादमगमत्तत्र रामः परपुरंजयः

na ca nirmalatāmeti kuṭhārastasya tena ca viṣādamagamattatra rāmaḥ parapuraṁjayaḥ

फिर भी वहाँ उनका कुठार शुद्ध न हुआ, और शत्रुनगर-विजयी राम विषाद को प्राप्त हुए।

श्लोक 47 (padma.1.55.47)

हाहेति विविधं कृत्वा चोपविश्य धरातले। प्रचिंतामगमद्वीरस्तमुवाच पुनस्तथा

hāheti vividhaṁ kṛtvā copaviśya dharātale praciṁtāmagamadvīrastamuvāca punastathā

बारंबार 'हाय-हाय' करके, पृथ्वी पर बैठकर वह वीर गहन चिंता में पड़ गए। तब पुनः उन्हें वाणी ने कहा —

श्लोक 48 (padma.1.55.48)

पूर्वस्यां दिशि देवेश तीर्थं चास्ति गुहोदरे। तच्छ्रुत्वा नरशार्दूलो गत्वा कुंडं ददर्श सः

pūrvasyāṁ diśi deveśa tīrthaṁ cāsti guhodare tacchrutvā naraśārdūlo gatvā kuṁḍaṁ dadarśa saḥ

'पूर्व दिशा में एक गुफा के भीतर एक तीर्थ है।' यह सुनकर वह नरश्रेष्ठ वहाँ जाकर एक कुंड को देखने लगे —

श्लोक 49 (padma.1.55.49)

प्रदक्षिणं जलावर्तं शुभ्रं पापहरं शुभम्। तज्जलस्पर्शमात्रेण कुठारः शुद्धतां गतः

pradakṣiṇaṁ jalāvartaṁ śubhraṁ pāpaharaṁ śubham tajjalasparśamātreṇa kuṭhāraḥ śuddhatāṁ gataḥ

—प्रदक्षिणा करता हुआ जलावर्त, उज्ज्वल, पापहारी, मंगलकारी। उस जल के स्पर्शमात्र से उनका कुठार शुद्ध हो गया।

श्लोक 50 (padma.1.55.50)

ततो रामोभिषेकं तु कृतवान्प्रमुदान्वितः। शुद्धात्मनस्त्वपापस्य बुद्धिर्जाता प्रपाविनी

tato rāmobhiṣekaṁ tu kṛtavānpramudānvitaḥ śuddhātmanastvapāpasya buddhirjātā prapāvinī

तब राम ने अत्यंत हर्षित होकर वहाँ स्नान किया। उनकी शुद्ध, निष्पाप आत्मा में परम पावन बुद्धि उत्पन्न हुई।

श्लोक 51 (padma.1.55.51)

स रामः सुचिरं स्थित्वा तीर्थराजं प्रसाद्य तम्। ततस्ततोऽचलात्प्राप्य पुरं वेगसमन्वितः

sa rāmaḥ suciraṁ sthitvā tīrtharājaṁ prasādya tam tatastato'calātprāpya puraṁ vegasamanvitaḥ

वे राम बहुत समय तक वहाँ रहकर उस तीर्थराज को प्रसन्न करते रहे; फिर उस पर्वत से वेगपूर्वक अपने नगर को लौट गए।

श्लोक 52 (padma.1.55.52)

ख्यातं कृत्वा ततश्चोर्व्यां गतोसौ लवणार्णवम्। अयं तीर्थवरः साक्षात्पितामहकृतो भुवि

khyātaṁ kṛtvā tataścorvyāṁ gatosau lavaṇārṇavam ayaṁ tīrthavaraḥ sākṣātpitāmahakṛto bhuvi

उसे समस्त पृथ्वी पर विख्यात करके वे लवण-समुद्र की ओर चले गए। यह श्रेष्ठ तीर्थ साक्षात् पितामह ब्रह्मा द्वारा पृथ्वी पर बनाया गया है —

श्लोक 53 (padma.1.55.53)

सुखदः सर्वतः शुद्धो मुक्तिमार्गप्रदः किल। एवं कामप्रभावं च विद्धि दुर्वारदुःसहम्

sukhadaḥ sarvataḥ śuddho muktimārgapradaḥ kila evaṁ kāmaprabhāvaṁ ca viddhi durvāraduḥsaham

—सब प्रकार से सुखदायी, शुद्ध, और वास्तव में मुक्ति-मार्ग प्रदान करने वाला। इस प्रकार काम के प्रभाव को दुर्वार और असह्य जानो।

श्लोक 54 (padma.1.55.54)

कामाज्जातं वृषं पापं पुण्यं पुण्यप्रयोगतः। स जातश्चैव लौहित्यो विरंचेश्चैव चौरसः

kāmājjātaṁ vṛṣaṁ pāpaṁ puṇyaṁ puṇyaprayogataḥ sa jātaścaiva lauhityo viraṁceścaiva caurasaḥ

काम से पाप उत्पन्न होता है, और पुण्य के प्रयोग से पुण्य भी। इस प्रकार वे विरंचि (ब्रह्मा) से उत्पन्न पुत्र लौहित्य के रूप में जन्मे,

श्लोक 55 (padma.1.55.55)

शंतनो क्षेत्र संजातस्त्वमोघागर्भसंभवः। विरिञ्चिना जितः कामः शांतनोरप्यमत्सरात्

śaṁtano kṣetra saṁjātastvamoghāgarbhasaṁbhavaḥ viriñcinā jitaḥ kāmaḥ śāṁtanorapyamatsarāt

—शंतनु के क्षेत्र में उत्पन्न, अमोघा के गर्भ से प्रकट। इस प्रकार विरंचि का काम पूर्ण हुआ, और शंतनु ने भी बिना ईर्ष्या के [उसे स्वीकार किया]।

श्लोक 56 (padma.1.55.56)

तस्याः पतिव्रतात्वाच्च तीर्थात्तीर्थवरो हि सः। एवं यस्तु पठेन्नित्यं पुण्याख्यानमिदं शिवम्

tasyāḥ pativratātvācca tīrthāttīrthavaro hi saḥ evaṁ yastu paṭhennityaṁ puṇyākhyānamidaṁ śivam

उसकी माता की पतिव्रता-धर्मशीलता के कारण ही वह तीर्थ, तीर्थों में श्रेष्ठ हुआ। इस प्रकार जो कोई इस पवित्र आख्यान को नित्य पढ़ता है,

श्लोक 57 (padma.1.55.57)

शृणुयाद्वा मुदा पृथ्व्यां मुक्तिमार्गं स गच्छति

śṛṇuyādvā mudā pṛthvyāṁ muktimārgaṁ sa gacchati

—अथवा पृथ्वी पर आनंदपूर्वक सुनता है, वह मुक्ति के मार्ग को प्राप्त करता है।

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