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सृष्टि खण्ड · अध्याय 80

सोम-अर्चन

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

श्लोक 1 (padma.1.80.1)

वैशंपायन उवाच । श्रुतो ग्रहेश्वरस्यैष प्रभावस्त्वत्प्रसादतः । रव्यादीनां ग्रहाणां च साधनं नो वद द्विज

vaiśaṁpāyana uvāca | śruto graheśvarasyaiṣa prabhāvastvatprasādataḥ | ravyādīnāṁ grahāṇāṁ ca sādhanaṁ no vada dvija

वैशंपायन ने कहा — आपकी कृपा से ग्रहेश्वर का यह प्रभाव मैंने सुना; अब हे द्विज! सूर्य आदि ग्रहों की साधना-विधि बताइए।

श्लोक 2 (padma.1.80.2)

के ते रव्यादयस्तेषां कथं तोषः कथं प्रियम् । काले देशे तु संप्राप्ते दर्शनं तच्छिवाशिवम्

ke te ravyādayasteṣāṁ kathaṁ toṣaḥ kathaṁ priyam | kāle deśe tu saṁprāpte darśanaṁ tacchivāśivam

वे सूर्य आदि कौन हैं? उनकी तुष्टि कैसे होती है, उन्हें क्या प्रिय है? समय और स्थान के अनुरूप उनका दर्शन शुभ या अशुभ कैसे होता है?

श्लोक 3 (padma.1.80.3)

व्यास उवाच । ग्रहादयो ये लोके तु भुंजंति पुण्यपातकम् । शिवाशिवं च कुर्वंति विश्वकर्मक्षयाय वै

vyāsa uvāca | grahādayo ye loke tu bhuṁjaṁti puṇyapātakam | śivāśivaṁ ca kurvaṁti viśvakarmakṣayāya vai

व्यास जी ने कहा — लोक में जो ग्रह आदि हैं, वे पुण्य-पाप का फल भोगते हैं; वे विश्व के कर्मों के क्षय के लिए शुभ और अशुभ दोनों करते हैं।

श्लोक 4 (padma.1.80.4)

सूरः कालोंतको ज्ञेयो जनेषु च ग्रहेषु च । तिग्मसौम्याच्च योगात्स निग्रहानुग्रहे प्रभुः

sūraḥ kāloṁtako jñeyo janeṣu ca graheṣu ca | tigmasaumyācca yogātsa nigrahānugrahe prabhuḥ

सूर्य को मनुष्यों और ग्रहों दोनों में काल-अंतक जानना चाहिए; अपने तीक्ष्ण और सौम्य योग से वे निग्रह और अनुग्रह दोनों के स्वामी हैं।

श्लोक 5 (padma.1.80.5)

ग्रहभावाच्च तस्यैव संतोषं निगदाम्यहम् । उदुम्बरपलाशाभ्यां पल्लवाभ्यां जुहोति यः

grahabhāvācca tasyaiva saṁtoṣaṁ nigadāmyaham | udumbarapalāśābhyāṁ pallavābhyāṁ juhoti yaḥ

उन्हीं के ग्रह-स्वभाव से उनकी तुष्टि का उपाय मैं बताता हूँ। जो उदुंबर और पलाश की टहनियों से हवन करता है —

श्लोक 6 (padma.1.80.6)

आकृष्णेनेति मंत्रेण मूलकेनाथ शांतये । जुहुयादाज्ययुक्ताभ्यामभीष्टफलहेतवे

ākṛṣṇeneti maṁtreṇa mūlakenātha śāṁtaye | juhuyādājyayuktābhyāmabhīṣṭaphalahetave

— 'आकृष्णेन' मंत्र से, तथा मूली के साथ, शांति के लिए घृतयुक्त आहुति अभीष्ट फल के लिए देनी चाहिए।

श्लोक 7 (padma.1.80.7)

शांतये सर्वरोगाणां वधबंधविमोचने । एकैकेन तु मंत्रेण होतव्यं च शतंशतम्

śāṁtaye sarvarogāṇāṁ vadhabaṁdhavimocane | ekaikena tu maṁtreṇa hotavyaṁ ca śataṁśatam

समस्त रोगों की शांति और वध-बंधन से मुक्ति के लिए, एक-एक मंत्र से सौ-सौ आहुतियाँ देनी चाहिए।

श्लोक 8 (padma.1.80.8)

शितं चच्छागलं दद्यात्सूरायादित्यवासरे । भोजयेद्ब्राह्मणान्शक्त्या हव्यकव्यैर्मनोहरैः

śitaṁ cacchāgalaṁ dadyātsūrāyādityavāsare | bhojayedbrāhmaṇānśaktyā havyakavyairmanoharaiḥ

रविवार को सूर्य को श्वेत बकरा देना चाहिए; यथाशक्ति ब्राह्मणों को मनोहर हव्य-कव्य पदार्थों से भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 9 (padma.1.80.9)

सप्तम्यां च सिते पक्षे पंचदश्यां तथैव च । रोगाद्विमुच्यते रोगी न रोगात्कृच्छ्रमेष्यति

saptamyāṁ ca site pakṣe paṁcadaśyāṁ tathaiva ca | rogādvimucyate rogī na rogātkṛcchrameṣyati

शुक्लपक्ष की सप्तमी और पंचदशी को यह करने से रोगी रोग से मुक्त हो जाता है, और पुनः रोग से कष्ट नहीं पाता।

श्लोक 10 (padma.1.80.10)

परमं चामरं सत्वमाब्रह्मस्तंबमात्रके । ब्रह्मांडे चाणुमात्रे च सूरः संभावयिष्यते

paramaṁ cāmaraṁ satvamābrahmastaṁbamātrake | brahmāṁḍe cāṇumātre ca sūraḥ saṁbhāvayiṣyate

उनका परम अमर अस्तित्व ब्रह्मा से लेकर एक तिनके तक व्याप्त है; ब्रह्मांड से लेकर परमाणु तक सूर्य को विद्यमान समझना चाहिए।

श्लोक 11 (padma.1.80.11)

संहारांतं क्रमात्सर्वमुत्पत्तिस्थितिकारणात् । प्राणसर्गे जनानां स पाता विश्वचरस्तनौ

saṁhārāṁtaṁ kramātsarvamutpattisthitikāraṇāt | prāṇasarge janānāṁ sa pātā viśvacarastanau

सृष्टि से लेकर संहार तक, उत्पत्ति और स्थिति के कारणस्वरूप, प्राणियों के प्राण-सृजन में वे ही रक्षक हैं, विश्व में विचरण करते हुए, शरीर में स्थित।

श्लोक 12 (padma.1.80.12)

मृत्युकाले तनोर्मध्यात्प्राणेन सह गच्छति । शीर्षान्तस्थः सदा चंद्रो द्विरष्टकलया युतः

mṛtyukāle tanormadhyātprāṇena saha gacchati | śīrṣāntasthaḥ sadā caṁdro dviraṣṭakalayā yutaḥ

मृत्यु के समय शरीर के मध्य से वे प्राण के साथ चले जाते हैं। सिर के शीर्ष पर सदा स्थित चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त —

श्लोक 13 (padma.1.80.13)

अहर्निशं सुधावृष्टिं देहे वर्षत्यधोमुखः । जंतवस्तेन जीवंति महासत्वानुमात्रकाः

aharniśaṁ sudhāvṛṣṭiṁ dehe varṣatyadhomukhaḥ | jaṁtavastena jīvaṁti mahāsatvānumātrakāḥ

— दिन-रात नीचे मुख करके शरीर में अमृत की वर्षा करते हैं; इसी से महान से लेकर सूक्ष्मतम प्राणी तक जीवित रहते हैं।

श्लोक 14 (padma.1.80.14)

उर्व्यां सस्यानि पुष्णाति तथा स्थावरजंगमान् । एताभ्यां पुष्पवद्भ्यां च धारितं जनितं जगत्

urvyāṁ sasyāni puṣṇāti tathā sthāvarajaṁgamān | etābhyāṁ puṣpavadbhyāṁ ca dhāritaṁ janitaṁ jagat

वे पृथ्वी पर फसलों को तथा स्थावर-जंगम को पुष्ट करते हैं; इन दोनों (सूर्य-चंद्र) के प्रकाश से ही यह जगत् धृत और उत्पन्न है।

श्लोक 15 (padma.1.80.15)

तयोराराधनात्पुष्टिः सदा पुण्यापरार्धिका । साधयेत्सर्वकार्याणि साधकः सर्वदा शुचिः

tayorārādhanātpuṣṭiḥ sadā puṇyāparārdhikā | sādhayetsarvakāryāṇi sādhakaḥ sarvadā śuciḥ

उन दोनों की आराधना से सदा पुष्टि और महान पुण्य प्राप्त होता है; सदा शुद्ध साधक अपने समस्त कार्य सिद्ध करता है।

श्लोक 16 (padma.1.80.16)

न पूजयति यो मोहात्सुधांशुं मानवाधमः । आयुस्तस्य क्षयं याति नरकं चाधिगच्छति

na pūjayati yo mohātsudhāṁśuṁ mānavādhamaḥ | āyustasya kṣayaṁ yāti narakaṁ cādhigacchati

जो अधम मनुष्य मोहवश अमृतरश्मि चंद्रमा की पूजा नहीं करता, उसकी आयु क्षीण होती है और वह नरक को प्राप्त होता है।

श्लोक 17 (padma.1.80.17)

निष्कलंक कलाधार गंगाधर शिरोमणे । द्वितीयायां जगन्नाथ तुभ्यं चंद्र नमोस्तु ते

niṣkalaṁka kalādhāra gaṁgādhara śiromaṇe | dvitīyāyāṁ jagannātha tubhyaṁ caṁdra namostu te

'हे निष्कलंक, कलाधार, गंगाधर के शिरोमणि! हे जगन्नाथ! द्वितीया के दिन तुझे, हे चंद्र, नमस्कार है।'

श्लोक 18 (padma.1.80.18)

तिथिमन्यामनुप्राप्य नमस्कारं विधोरपि । प्रकरोति नरो यस्तु सोभीष्टं फलमाप्नुयात्

tithimanyāmanuprāpya namaskāraṁ vidhorapi | prakaroti naro yastu sobhīṣṭaṁ phalamāpnuyāt

जो मनुष्य किसी अन्य तिथि को प्राप्त होकर भी चंद्रमा को यह नमस्कार करता है, वह अभीष्ट फल प्राप्त करता है।

श्लोक 19 (padma.1.80.19)

अत्रिनेत्रोद्भव श्रीमन्क्षीरोद मथनोद्भव । महेशमुकटावास तुभ्यं चंद्र नमोस्तुते

atrinetrodbhava śrīmankṣīroda mathanodbhava | maheśamukaṭāvāsa tubhyaṁ caṁdra namostute

'हे अत्रि के नेत्र से उत्पन्न, श्रीमान, क्षीरसागर-मंथन से उत्पन्न, महेश के मुकुट में निवास करने वाले चंद्र! तुझे नमस्कार है।'

श्लोक 20 (padma.1.80.20)

दिव्यरूप नमस्तुभ्यं सुधाकर जगत्पते । शुक्लपक्षे तथा कृष्णे त्रियामायां विदुर्बुधाः

divyarūpa namastubhyaṁ sudhākara jagatpate | śuklapakṣe tathā kṛṣṇe triyāmāyāṁ vidurbudhāḥ

'हे दिव्यरूप! तुझे नमस्कार, हे सुधाकर, हे जगत्पते!' — शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष दोनों में, रात्रि के अंतिम प्रहर में विद्वान इसे जानते हैं।

श्लोक 21 (padma.1.80.21)

ऊँ ह्रां ह्रीं सोमाय नमः इति जप्यमंत्रः । प्रभाते जपनीयः । एवं यः पूजयेत्सोमं श्रावयेच्च शृणोति वा । स पीयूषसमो लोके भवेज्जन्मनि जन्मनि

ū~ hrāṁ hrīṁ somāya namaḥ iti japyamaṁtraḥ | prabhāte japanīyaḥ | evaṁ yaḥ pūjayetsomaṁ śrāvayecca śṛṇoti vā | sa pīyūṣasamo loke bhavejjanmani janmani

'ॐ ह्रां ह्रीं सोमाय नमः' — यह जप्य मंत्र है, प्रातःकाल जपने योग्य। इस प्रकार जो सोम की पूजा करता है, सुनाता है या स्वयं सुनता है, वह जन्म-जन्म में लोक में अमृत के समान हो जाता है।

श्लोक 22 (padma.1.80.22)

एवं सहस्रनाम्ना यः स्तौति पूजयते भुवि । सोऽक्षयं लभते स्वर्गं पुनरावृत्तिदुर्लभम्

evaṁ sahasranāmnā yaḥ stauti pūjayate bhuvi | so'kṣayaṁ labhate svargaṁ punarāvṛttidurlabham

इसी प्रकार जो पृथ्वी पर सहस्रनाम से उनकी स्तुति और पूजा करता है, वह अक्षय स्वर्ग प्राप्त करता है, जहाँ से पुनरावृत्ति दुर्लभ है।

श्लोक 23 (padma.1.80.23)

इति सोमपूजा । पित्तले भाजने कांस्ये दधिपूर्णे घृते शिवे । न्यूनोऽधिकस्तु विभवाच्छ्रुत्वा कर्मविमत्सरः

iti somapūjā | pittale bhājane kāṁsye dadhipūrṇe ghṛte śive | nyūno'dhikastu vibhavācchrutvā karmavimatsaraḥ

इस प्रकार सोम-पूजा है। काँसे के पात्र में दही और घृत भरकर, शुभतापूर्वक — क्षमता के अनुसार कम या अधिक, ईर्ष्यारहित होकर सुनकर —

श्लोक 24 (padma.1.80.24)

स्वर्णे वा राजते वारे सौम्ये कृष्णभवे बुधम् । संस्थाप्य सर्वसंस्थाने दद्याद्बहुसुताय च

svarṇe vā rājate vāre saumye kṛṣṇabhave budham | saṁsthāpya sarvasaṁsthāne dadyādbahusutāya ca

— बुध को स्वर्ण या रजत में, बुधवार को, समस्त विधि सहित स्थापित कर, बहुपुत्रवान ब्राह्मण को देना चाहिए।

श्लोक 25 (padma.1.80.25)

परं भवति सौभाग्यं पीयूषादधिकं भृशम् । स्त्रीणां च पुरुषाणां च न दौर्भाग्यं कदाचन

paraṁ bhavati saubhāgyaṁ pīyūṣādadhikaṁ bhṛśam | strīṇāṁ ca puruṣāṇāṁ ca na daurbhāgyaṁ kadācana

— इससे अमृत से भी बढ़कर परम सौभाग्य प्राप्त होता है; स्त्री और पुरुष दोनों को कभी दुर्भाग्य नहीं होता।

श्लोक 26 (padma.1.80.26)

रूपसौभाग्यकामोहं दधिपूर्णं च भाजनम् । ददामि कांस्यपात्रस्थं देहि सौभाग्यरूपकम्

rūpasaubhāgyakāmohaṁ dadhipūrṇaṁ ca bhājanam | dadāmi kāṁsyapātrasthaṁ dehi saubhāgyarūpakam

'रूप-सौभाग्य की कामना से यह दही-भरा काँसे का पात्र मैं अर्पित करता हूँ — मुझे रूप और सौभाग्य प्रदान करो।'

श्लोक 27 (padma.1.80.27)

द्विजाय वाक्यपूर्वेण दद्याद्विमत्सरो नरः । शक्तितो दक्षिणा देया तथा वस्त्रादिकं नवम्

dvijāya vākyapūrveṇa dadyādvimatsaro naraḥ | śaktito dakṣiṇā deyā tathā vastrādikaṁ navam

ईर्ष्यारहित मनुष्य यह वचन पहले कहकर द्विज को यह अर्पित करे; शक्ति के अनुसार दक्षिणा तथा नए वस्त्र आदि देने चाहिए।

श्लोक 28 (padma.1.80.28)

भोज्यान्नं सर्वसम्पूर्णं तांबूलं सुमनोहरम् । पुष्पमालादिकं दद्याद्रूपसौभाग्यहेतवे

bhojyānnaṁ sarvasampūrṇaṁ tāṁbūlaṁ sumanoharam | puṣpamālādikaṁ dadyādrūpasaubhāgyahetave

संपूर्ण भोज्य अन्न, मनोहर ताम्बूल, पुष्पमाला आदि रूप और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए देने चाहिए।

श्लोक 29 (padma.1.80.29)

एवं यः कुरुते दानं सोमोद्दिष्टं द्विजातये । स्वर्लोके नरलोके वा रूपसौभाग्यभुग्भवेत्

evaṁ yaḥ kurute dānaṁ somoddiṣṭaṁ dvijātaye | svarloke naraloke vā rūpasaubhāgyabhugbhavet

इस प्रकार जो सोम के लिए निर्दिष्ट यह दान द्विज को देता है, वह स्वर्गलोक अथवा मनुष्यलोक में रूप और सौभाग्य का भोग करने वाला होता है।

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81