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सृष्टि खण्ड · अध्याय 81

भौम की उत्पत्ति और पूजन

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82

श्लोक 1 (padma.1.81.1)

वैशंपायन उवाच । उद्भवं लोहितांगस्य संतोषं तु जनेषु च । प्रभावं वैभवं तेजः श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः

vaiśaṁpāyana uvāca | udbhavaṁ lohitāṁgasya saṁtoṣaṁ tu janeṣu ca | prabhāvaṁ vaibhavaṁ tejaḥ śrotumicchāmi tattvataḥ

वैशंपायन ने कहा — लोहितांग (मंगल) की उत्पत्ति, मनुष्यों में उनकी तुष्टि, प्रभाव, वैभव और तेज — यह सब मैं वास्तव में सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 2 (padma.1.81.2)

व्यास उवाच । हरांशसंभवो देवः कुजातः पृथिवीसुतः । सत्त्वस्थस्सत्वसंपूर्णश्शूरः शक्तिधरो भुवि

vyāsa uvāca | harāṁśasaṁbhavo devaḥ kujātaḥ pṛthivīsutaḥ | sattvasthassatvasaṁpūrṇaśśūraḥ śaktidharo bhuvi

व्यास जी ने कहा — हर के अंश से उत्पन्न देव, भूमि से जन्मे, सत्त्वस्थ, सत्त्वसंपूर्ण, शूरवीर, पृथ्वी पर शक्तिधारी —

श्लोक 3 (padma.1.81.3)

तीक्ष्णः क्रूरग्रहो देवो लोहितांगः प्रतापवान् । कुमारो रूपसंपन्नो विद्युत्पातमयः प्रभुः

tīkṣṇaḥ krūragraho devo lohitāṁgaḥ pratāpavān | kumāro rūpasaṁpanno vidyutpātamayaḥ prabhuḥ

— तीक्ष्ण, क्रूर ग्रह देव, लोहितांग, प्रतापवान्, सदा कुमार, रूपसंपन्न, विद्युत्पात के समान प्रभु —

श्लोक 4 (padma.1.81.4)

अनेन भर्जिता दैत्याः क्रव्यादाय सुरद्विषः । दशायोगाच्च मनुजा उद्भिज्जाः पशुपक्षिणः

anena bharjitā daityāḥ kravyādāya suradviṣaḥ | daśāyogācca manujā udbhijjāḥ paśupakṣiṇaḥ

— इनके द्वारा देवद्वेषी दैत्य क्रव्याद (मांसाहारी अग्नि) के लिए भुने जाते हैं; इनकी दशा के योग से मनुष्य, वनस्पति, पशु-पक्षी भी प्रभावित होते हैं।

श्लोक 5 (padma.1.81.5)

वैशंपायन उवाच । शंभोरेष कथं जातः कथं जातो महीसुतः । ग्रहो देवः कथं क्रूर एतदिच्छामि वेदितुम्

vaiśaṁpāyana uvāca | śaṁbhoreṣa kathaṁ jātaḥ kathaṁ jāto mahīsutaḥ | graho devaḥ kathaṁ krūra etadicchāmi veditum

वैशंपायन ने कहा — ये शंभु से कैसे उत्पन्न हुए? महीसुत (पृथ्वीपुत्र) कैसे जन्मे? यह देव ग्रह क्रूर कैसे हुआ — यह जानना चाहता हूँ।

श्लोक 6 (padma.1.81.6)

कथमस्य भवेत्तुष्टिः सर्वलोकेषु सर्वदा । गुरो मय्याप्तभावे तु वद निस्संशयं मुखात्

kathamasya bhavettuṣṭiḥ sarvalokeṣu sarvadā | guro mayyāptabhāve tu vada nissaṁśayaṁ mukhāt

इनकी तुष्टि सभी लोकों में सदा कैसे होती है? हे गुरु! मुझ पर आपका विश्वास है, अतः यह निःसंशय अपने मुख से बताइए।

श्लोक 7 (padma.1.81.7)

व्यास उवाच । हिरण्याक्षकुले धीमानसुराणां च पार्थिवः । अंधकेति समाख्यातो दैत्यः सर्वसुरांतकृत्

vyāsa uvāca | hiraṇyākṣakule dhīmānasurāṇāṁ ca pārthivaḥ | aṁdhaketi samākhyāto daityaḥ sarvasurāṁtakṛt

व्यास जी ने कहा — हिरण्याक्ष के कुल में असुरों का एक बुद्धिमान राजा था, जो अंधक नाम से प्रसिद्ध था, समस्त देवताओं का अंतकर्ता।

श्लोक 8 (padma.1.81.8)

जातो विष्णुवरादेव जातो विष्णुपराक्रमः । तेनैव निर्जिता देवास्सेन्द्राः क्रतुभुजः क्रमात्

jāto viṣṇuvarādeva jāto viṣṇuparākramaḥ | tenaiva nirjitā devāssendrāḥ kratubhujaḥ kramāt

वह विष्णु के वर से ही जन्मा, विष्णु के ही पराक्रम से युक्त जन्मा; उसी ने इंद्र सहित यज्ञभोक्ता देवताओं को क्रमशः पराजित कर दिया।

श्लोक 9 (padma.1.81.9)

ततो देवा विधिं गत्वा वचनं चेदमब्रुवन् । अन्धकेनैव चास्माकं हृतं राज्यं सुखं मखः

tato devā vidhiṁ gatvā vacanaṁ cedamabruvan | andhakenaiva cāsmākaṁ hṛtaṁ rājyaṁ sukhaṁ makhaḥ

तब देवगण विधाता के पास जाकर यह वचन बोले — 'अंधक ने ही हमारा राज्य, सुख और यज्ञ छीन लिया है।'

श्लोक 10 (padma.1.81.10)

तस्मात्तस्य वधोपाय उच्यतां तद्विधीयताम् । अथ धाताऽब्रवीद्वाक्यं देवानस्य च नैधनम्

tasmāttasya vadhopāya ucyatāṁ tadvidhīyatām | atha dhātā'bravīdvākyaṁ devānasya ca naidhanam

'अतः उसके वध का उपाय बताइए, वह किया जाए।' तब धाता ने देवताओं से उसके विनाश के विषय में यह वचन कहा।

श्लोक 11 (padma.1.81.11)

नास्ति विष्णुवरादेव पीयूषस्य च भक्षणात् । किंतु तस्यासुरत्वस्य यथा परिभवो ध्रुवम्

nāsti viṣṇuvarādeva pīyūṣasya ca bhakṣaṇāt | kiṁtu tasyāsuratvasya yathā paribhavo dhruvam

'विष्णु के वर और अमृत-पान के कारण वध संभव नहीं। किंतु उसके असुरत्व का पराभव जिस प्रकार निश्चित हो सके —'

श्लोक 12 (padma.1.81.12)

कुर्वे लोकहितार्थाय श्रद्धां कामसमन्विताम् । विचिकित्सा तु तत्रैव सर्वास्त्रीरतिगच्छति

kurve lokahitārthāya śraddhāṁ kāmasamanvitām | vicikitsā tu tatraiva sarvāstrīratigacchati

'— उसके लिए लोकहित हेतु मैं काम-सहित श्रद्धा उत्पन्न करता हूँ; और विचिकित्सा (भ्रम) को हर स्त्री के प्रति उसकी आसक्ति में भेजता हूँ।'

श्लोक 13 (padma.1.81.13)

त्यक्त्वैकां पार्वतीं दुर्गां न तस्य मानसं स्थिरम् । ततः क्रुद्धो जगत्स्वामी तं च वैरूप्यतां नयेत्

tyaktvaikāṁ pārvatīṁ durgāṁ na tasya mānasaṁ sthiram | tataḥ kruddho jagatsvāmī taṁ ca vairūpyatāṁ nayet

'केवल पार्वती दुर्गा को छोड़कर उसका मन स्थिर नहीं रहेगा; तब क्रुद्ध होकर जगत्स्वामी शिव उसे विरूप कर देंगे।'

श्लोक 14 (padma.1.81.14)

ततोऽसुरत्वं संत्यज्य गणस्तस्य भविष्यति । एवमुक्त्वा प्रजाध्यक्षः श्रद्धां कामसमन्विताम्

tato'suratvaṁ saṁtyajya gaṇastasya bhaviṣyati | evamuktvā prajādhyakṣaḥ śraddhāṁ kāmasamanvitām

'तब असुरत्व त्यागकर वह उन्हीं (शिव) का गण बन जाएगा।' ऐसा कहकर प्रजापति ने काम-सहित श्रद्धा —

श्लोक 15 (padma.1.81.15)

विचिकित्सां स्वमायां च प्रेषयामास तं प्रति । ततो विचेष्टितः कामाद्योषान्वेषणतत्परः

vicikitsāṁ svamāyāṁ ca preṣayāmāsa taṁ prati | tato viceṣṭitaḥ kāmādyoṣānveṣaṇatatparaḥ

— और विचिकित्सा नामक अपनी माया उसकी ओर भेज दी। तब वह काम से विक्षिप्त होकर स्त्रियों की खोज में तत्पर हो गया,

श्लोक 16 (padma.1.81.16)

स्वदारान्परयोषां च नापश्यद्विचिकित्सया । ततो मायाप्रयुक्तोसौ त्रैलोक्यं विचचार ह

svadārānparayoṣāṁ ca nāpaśyadvicikitsayā | tato māyāprayuktosau trailokyaṁ vicacāra ha

और भ्रम के कारण अपनी पत्नी और पराई स्त्री में भेद न देख सका; तब माया से प्रेरित होकर वह त्रैलोक्य में विचरण करने लगा।

श्लोक 17 (padma.1.81.17)

दृष्टं च हिमवत्पृष्ठे स्त्रीरत्नं चातिशोभनं । दृष्ट्वा च पार्वतीं दैत्यः कामस्य वशगोऽभवत्

dṛṣṭaṁ ca himavatpṛṣṭhe strīratnaṁ cātiśobhanaṁ | dṛṣṭvā ca pārvatīṁ daityaḥ kāmasya vaśago'bhavat

हिमालय की चोटी पर उसने एक अत्यंत सुंदर स्त्रीरत्न देखा; पार्वती को देखकर वह दैत्य काम के वशीभूत हो गया।

श्लोक 18 (padma.1.81.18)

ज्ञानलोपात्ततो दुर्गां ग्रहीतुं तां स चेच्छति । उमा च कोटवीरूपं कृत्वा देहस्य चात्मनः

jñānalopāttato durgāṁ grahītuṁ tāṁ sa cecchati | umā ca koṭavīrūpaṁ kṛtvā dehasya cātmanaḥ

ज्ञान के लोप से वह दुर्गा को पकड़ना चाहने लगा; तब उमा ने अपने शरीर को कोटवी (भीषण योद्धा) का रूप देकर —

श्लोक 19 (padma.1.81.19)

ईश्वरस्यांतिकस्था च ग्रहीतुं तां ससार सः । ततः कामविचेताश्च उन्मत्तीकृतचेतनः

īśvarasyāṁtikasthā ca grahītuṁ tāṁ sasāra saḥ | tataḥ kāmavicetāśca unmattīkṛtacetanaḥ

— ईश्वर के समीप ही स्थित हुईं, फिर भी वह उन्हें पकड़ने दौड़ा। तब काम से विक्षिप्त, उन्मत्त-चित्त होकर —

श्लोक 20 (padma.1.81.20)

न जहाति शिवां धात्रीं पार्वतीं दैत्यपुंगवः । ततो ध्यानात्समागम्य मिलितः पार्वतीं धवः

na jahāti śivāṁ dhātrīṁ pārvatīṁ daityapuṁgavaḥ | tato dhyānātsamāgamya militaḥ pārvatīṁ dhavaḥ

— वह दैत्य श्रेष्ठ शिवा माता पार्वती को नहीं छोड़ता था। तब ध्यान से लौटकर उनके पति शिव पार्वती के पास आ मिले।

श्लोक 21 (padma.1.81.21)

दृष्ट्वा तं च स दैत्येन्द्रः प्रगतस्तु स्वमालयम् । सज्जीकृत्य स्वयोधांश्च शंभुं जेतुं समुत्सुकः

dṛṣṭvā taṁ ca sa daityendraḥ pragatastu svamālayam | sajjīkṛtya svayodhāṁśca śaṁbhuṁ jetuṁ samutsukaḥ

उन्हें देखकर वह दैत्येंद्र अपने आवास को लौट गया; अपने योद्धाओं को तैयार कर शंभु को जीतने के लिए उत्सुक हुआ —

श्लोक 22 (padma.1.81.22)

गौरीमेव समानेतुं काममोहादचेतनः । एतच्छ्रुत्वा तु त्रिदशा गत्वा तं नंदिनेरिताः

gaurīmeva samānetuṁ kāmamohādacetanaḥ | etacchrutvā tu tridaśā gatvā taṁ naṁdineritāḥ

— केवल गौरी को हरने के लिए, काम-मोह से अचेत होकर। यह सुनकर देवगण नंदी द्वारा भेजे जाकर उसके पास गए,

श्लोक 23 (padma.1.81.23)

अकुर्वंश्च महद्युद्धं घोरं लोकभयंकरम् । दैत्यान्रणे मृतांस्तत्र दैत्याचार्यो ह्यजीवयत्

akurvaṁśca mahadyuddhaṁ ghoraṁ lokabhayaṁkaram | daityānraṇe mṛtāṁstatra daityācāryo hyajīvayat

और वहाँ एक महान, भीषण, लोकभयंकर युद्ध हुआ; युद्ध में मारे गए दैत्यों को दैत्याचार्य (शुक्र) पुनर्जीवित कर देते थे।

श्लोक 24 (padma.1.81.24)

एतद्वृत्तं तु कैलासे सर्वे चैव न्यवेदयन् । क्रोधाच्छंभुस्तदा वाक्यं नंदिनं निजगाद ह

etadvṛttaṁ tu kailāse sarve caiva nyavedayan | krodhācchaṁbhustadā vākyaṁ naṁdinaṁ nijagāda ha

यह सब वृत्तांत कैलास में सबने निवेदित किया। तब क्रोधित शंभु ने नंदी से यह वचन कहा।

श्लोक 25 (padma.1.81.25)

गच्छ दैत्यालयं वीर द्रुतमेव ममाज्ञया । पश्यतां सर्वदैत्यानां दैत्येंद्रस्य च संसदि

gaccha daityālayaṁ vīra drutameva mamājñayā | paśyatāṁ sarvadaityānāṁ daityeṁdrasya ca saṁsadi

'हे वीर! मेरी आज्ञा से शीघ्र ही दैत्यों के निवास पर जाओ, समस्त दैत्यों के देखते हुए, दैत्येंद्र की सभा में ही —'

श्लोक 26 (padma.1.81.26)

गृहीत्वा चिकुरेऽत्यर्थं भार्गवं तं दुरात्मकम् । लब्ध्वा चास्मत्सकाशं वै विह्वलं चानय क्षणात्

gṛhītvā cikure'tyarthaṁ bhārgavaṁ taṁ durātmakam | labdhvā cāsmatsakāśaṁ vai vihvalaṁ cānaya kṣaṇāt

'— उस दुरात्मा भार्गव (शुक्राचार्य) को केशों से पकड़कर, उसे विह्वल करके तत्क्षण मेरे पास ले आओ।'

श्लोक 27 (padma.1.81.27)

ततो नंदीश्वरः श्रीमान्पार्वतीपतिनेरितः । काव्यं तं कुंतले धृत्वा दैत्यानां पुरतो बलात्

tato naṁdīśvaraḥ śrīmānpārvatīpatineritaḥ | kāvyaṁ taṁ kuṁtale dhṛtvā daityānāṁ purato balāt

तब श्रीमान नंदीश्वर पार्वतीपति की प्रेरणा से, दैत्यों के सामने ही बलपूर्वक काव्य (शुक्र) को केशों से पकड़कर —

श्लोक 28 (padma.1.81.28)

आनयंतं च तं दैत्या जघ्नुः प्रहरणैः शरैः । न शेकुस्ते रुजां कर्तुं नंदिनो बलशालिनः

ānayaṁtaṁ ca taṁ daityā jaghnuḥ praharaṇaiḥ śaraiḥ | na śekuste rujāṁ kartuṁ naṁdino balaśālinaḥ

— उसे ले जाते हुए, दैत्यों ने शस्त्रों-बाणों से उस पर प्रहार किया; किंतु बलशाली नंदी को वे तनिक भी घायल न कर सके।

श्लोक 29 (padma.1.81.29)

देवानामग्रतो नंदी गृहीत्वा तं च कुंतले । हरस्य पुरतो हृष्टः सह तेन समाययौ

devānāmagrato naṁdī gṛhītvā taṁ ca kuṁtale | harasya purato hṛṣṭaḥ saha tena samāyayau

देवताओं के आगे-आगे नंदी उसे केशों से पकड़े हुए, हर्षित होकर शिव के सम्मुख उसके साथ आया।

श्लोक 30 (padma.1.81.30)

गृहीत्वा भार्गवं शंभुरसुराणां गुरुं रुषा । अगिलद्रौद्रमूर्तोऽसौ कालांतकसमः प्रभुः

gṛhītvā bhārgavaṁ śaṁbhurasurāṇāṁ guruṁ ruṣā | agiladraudramūrto'sau kālāṁtakasamaḥ prabhuḥ

क्रोध में भरकर शंभु ने असुरों के गुरु भार्गव को पकड़कर, रौद्रमूर्ति काल-अंतक के समान वह प्रभु उसे निगल गए।

श्लोक 31 (padma.1.81.31)

ततो दैत्यपतिः क्रुद्धः सर्वसैन्यवृतो बली । दुद्राव शंकरं तत्र घोरैः प्रहरणादिभिः

tato daityapatiḥ kruddhaḥ sarvasainyavṛto balī | dudrāva śaṁkaraṁ tatra ghoraiḥ praharaṇādibhiḥ

तब क्रोधित दैत्यपति, समस्त सेना से घिरा हुआ बलवान, भीषण शस्त्रों के साथ शंकर की ओर दौड़ा।

श्लोक 32 (padma.1.81.32)

त्रिदशाश्च तथा क्रुद्धास्ततो विद्याधरादयः । प्रययुः समरं तत्र दैत्यानां च भृशं रुषा

tridaśāśca tathā kruddhāstato vidyādharādayaḥ | prayayuḥ samaraṁ tatra daityānāṁ ca bhṛśaṁ ruṣā

देवगण भी उसी प्रकार क्रोधित होकर, तथा विद्याधर आदि, दैत्यों के विरुद्ध अत्यंत क्रोध में उस युद्ध में गए।

श्लोक 33 (padma.1.81.33)

एतस्मिन्नंतरे घोरं युद्धं भीष्मं समुत्थितम् । देवदानवयोरेवं सर्वलोकभयंकरम्

etasminnaṁtare ghoraṁ yuddhaṁ bhīṣmaṁ samutthitam | devadānavayorevaṁ sarvalokabhayaṁkaram

इसी बीच देव और दानवों के बीच एक घोर, भीषण, समस्त लोकों को भयभीत करने वाला युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 34 (padma.1.81.34)

ततः प्रत्ययितास्त्रैश्च देवा निघ्नंति दानवान् । दनुजा निर्जरांस्तत्र विनिघ्नंति महाहवे

tataḥ pratyayitāstraiśca devā nighnaṁti dānavān | danujā nirjarāṁstatra vinighnaṁti mahāhave

तब देवगण विश्वसनीय अस्त्रों से दानवों का वध करने लगे; और दनुज उस महासमर में देवताओं का वध करने लगे।

श्लोक 35 (padma.1.81.35)

शातकुंभमयाङ्गैस्ते शरैर्वज्रसमानकैः । बिभिदू रत्नपुंखैश्च परस्परजयैषिणः

śātakuṁbhamayāṅgaiste śarairvajrasamānakaiḥ | bibhidū ratnapuṁkhaiśca parasparajayaiṣiṇaḥ

स्वर्णमय अंगों वाले, वज्र के समान, रत्नपंख युक्त बाणों से, परस्पर विजय चाहते हुए वे एक-दूसरे को बींधते रहे।

श्लोक 36 (padma.1.81.36)

दीपयंति भृशं कांतैस्तद्गात्राणि नभांसि च । वीर्यवंतो महादैत्या न मोघैरस्त्रसंचयैः

dīpayaṁti bhṛśaṁ kāṁtaistadgātrāṇi nabhāṁsi ca | vīryavaṁto mahādaityā na moghairastrasaṁcayaiḥ

उनके सुंदर अस्त्र उनके शरीरों और आकाश को अत्यंत प्रज्वलित करते थे; पराक्रमी महादैत्य निष्फल अस्त्रों के समूह से नहीं लड़ते थे।

श्लोक 37 (padma.1.81.37)

हत्वा च पातयामासुः काश्यपाः सुरसत्तमाः । जगद्व्याप्तं महासैन्यं बलायुधसुसंवृतम्

hatvā ca pātayāmāsuḥ kāśyapāḥ surasattamāḥ | jagadvyāptaṁ mahāsainyaṁ balāyudhasusaṁvṛtam

काश्यप वंशी श्रेष्ठ देवगण ने बल-आयुध से सुरक्षित उस विश्वव्यापी महासेना को मार गिराया।

श्लोक 38 (padma.1.81.38)

नीतं क्षयं सुरैः सर्वैः शस्त्रैः प्रत्ययितैः क्षणात् । स्वयं च युध्यमानेन महादेवेन यत्नतः

nītaṁ kṣayaṁ suraiḥ sarvaiḥ śastraiḥ pratyayitaiḥ kṣaṇāt | svayaṁ ca yudhyamānena mahādevena yatnataḥ

वह क्षणभर में समस्त देवताओं के विश्वसनीय शस्त्रों से, तथा स्वयं यत्नपूर्वक युद्धरत महादेव द्वारा नष्ट कर दी गई।

श्लोक 39 (padma.1.81.39)

शूलोद्धृतोपि सुचिरमविनष्टोऽथ नम्रधीः । अन्धको गणतां नीत्वा कृतो भृंगीरिटिर्द्विज

śūloddhṛtopi suciramavinaṣṭo'tha namradhīḥ | andhako gaṇatāṁ nītvā kṛto bhṛṁgīriṭirdvija

अंधक त्रिशूल से बींधे जाने पर भी बहुत देर तक नष्ट नहीं हुआ; तब विनम्र होकर, हे द्विज! उसे गणों में लेकर भृंगीरिटि बना दिया गया।

श्लोक 40 (padma.1.81.40)

ततो देवान्समाभाष्य शुक्रमुद्गीर्णवान्शिवः । भूमौ निपतितो गर्भस्ततो भौम इति स्मृतः

tato devānsamābhāṣya śukramudgīrṇavānśivaḥ | bhūmau nipatito garbhastato bhauma iti smṛtaḥ

तब देवताओं से वार्तालाप कर शिव ने शुक्र को उगल दिया; भूमि पर गिरा वह गर्भ 'भौम' नाम से जाना गया।

श्लोक 41 (padma.1.81.41)

शुक्रश्शिवं समाभाष्य गतो दैत्यान्मुदान्वितः । एवं भौमस्समुत्पन्नो हरांशो भूसमुद्भवः

śukraśśivaṁ samābhāṣya gato daityānmudānvitaḥ | evaṁ bhaumassamutpanno harāṁśo bhūsamudbhavaḥ

शुक्र शिव से बातचीत कर प्रसन्नतापूर्वक दैत्यों के पास लौट गया। इस प्रकार भौम उत्पन्न हुआ — हर का अंश, भूमि से उद्भूत।

श्लोक 42 (padma.1.81.42)

तस्य पूजा चतुर्थ्यां तु भौमवारे च सुव्रतैः । दशाद्यरिष्टे च तथा गोचरेऽनिष्टराशिगे

tasya pūjā caturthyāṁ tu bhaumavāre ca suvrataiḥ | daśādyariṣṭe ca tathā gocare'niṣṭarāśige

उनकी पूजा चतुर्थी को तथा मंगलवार को सुव्रतियों द्वारा की जाती है; इसी प्रकार दशा के आरंभिक अरिष्ट में या अनिष्ट राशि के गोचर में —

श्लोक 43 (padma.1.81.43)

त्रिकोणे मंडले चैव रक्तपुष्पानुलेपनैः । एवं वै पूजितो भौमः प्रयच्छति मतिं धनम्

trikoṇe maṁḍale caiva raktapuṣpānulepanaiḥ | evaṁ vai pūjito bhaumaḥ prayacchati matiṁ dhanam

— त्रिकोण मंडल में, लाल पुष्पों और अनुलेपन से। इस प्रकार पूजित भौम बुद्धि और धन प्रदान करते हैं,

श्लोक 44 (padma.1.81.44)

पुत्रान्सुखंयशश्चैवकिंभूयःश्रोतुमिच्छसि । व्यास उवाच । एतद्वः कथितं शिष्या धर्माख्यानं शुभावहम्

putrānsukhaṁyaśaścaivakiṁbhūyaḥśrotumicchasi | vyāsa uvāca | etadvaḥ kathitaṁ śiṣyā dharmākhyānaṁ śubhāvaham

पुत्र, सुख और यश भी। और क्या सुनना चाहते हो? व्यास जी ने कहा — हे शिष्यो! यह मैंने तुम्हें मंगलकारी धर्माख्यान सुनाया है,

श्लोक 45 (padma.1.81.45)

यच्छ्रुत्वा न पुनर्भूयो जायते म्रियतेपि वा । द्विजातीनां पुण्यदं च संसेव्यं च शुभेप्सुभिः

yacchrutvā na punarbhūyo jāyate mriyatepi vā | dvijātīnāṁ puṇyadaṁ ca saṁsevyaṁ ca śubhepsubhiḥ

जिसे सुनकर मनुष्य पुनः न जन्म लेता है, न मरता है; यह द्विजों को पुण्यदायी है, और शुभेच्छुओं द्वारा सेवनीय है।

श्लोक 46 (padma.1.81.46)

यथासुखं च गच्छध्वं कृतकृत्या ममाज्ञया । ब्रह्मोवाच । एवं विश्राव्य भगवान्व्यासः सत्यवतीसुतः

yathāsukhaṁ ca gacchadhvaṁ kṛtakṛtyā mamājñayā | brahmovāca | evaṁ viśrāvya bhagavānvyāsaḥ satyavatīsutaḥ

'मेरी आज्ञा से कृतकृत्य होकर सुखपूर्वक जाओ।' ब्रह्मा ने कहा — इस प्रकार सुनाकर भगवान सत्यवती-सुत व्यास —

श्लोक 47 (padma.1.81.47)

निर्णीय धर्मं विविधं शम्याप्रासमगात्सुत । त्वमपि श्रद्धया वत्स ज्ञात्वा तत्त्वं यथासुखम्

nirṇīya dharmaṁ vividhaṁ śamyāprāsamagātsuta | tvamapi śraddhayā vatsa jñātvā tattvaṁ yathāsukham

— विविध धर्म का निर्णय करके, हे पुत्र, शम्याप्रास चले गए। तुम भी, हे वत्स, श्रद्धापूर्वक तत्त्व को जानकर सुखपूर्वक —

श्लोक 48 (padma.1.81.48)

विहरस्व यथाकालं गायमानो हरिं मुदा । लोकान्धर्मं चोपदिशन्प्रीणयन्जगतां गुरुम्

viharasva yathākālaṁ gāyamāno hariṁ mudā | lokāndharmaṁ copadiśanprīṇayanjagatāṁ gurum

— समयानुसार विचरण करो, प्रसन्नतापूर्वक हरि का गायन करते हुए, लोगों को धर्म का उपदेश देते हुए, जगत्गुरु को प्रसन्न करते हुए।

श्लोक 49 (padma.1.81.49)

पुलस्त्य उवाच । इत्युक्तः प्रययौ भूप नारदो गंधमादनम् । नारायणं मुनिवरं द्रष्टुं बदरिकाश्रमे

pulastya uvāca | ityuktaḥ prayayau bhūpa nārado gaṁdhamādanam | nārāyaṇaṁ munivaraṁ draṣṭuṁ badarikāśrame

पुलस्त्य ने कहा — हे राजन्! यह कहे जाने पर नारद गंधमादन पर्वत की ओर, बदरिकाश्रम में मुनिश्रेष्ठ नारायण के दर्शन हेतु चले गए।

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