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भूमि खण्ड · अध्याय 104

इंदुमती का स्वप्न और शौनक का फलादेश

अध्याय 103अध्याय-सूचीअध्याय 105

श्लोक 1 (padma.2.104.1)

कुंजल उवाच । गते तस्मिन्महाभागे दत्तात्रेये महामुनौ । आजगाम महाराज आयुश्च स्वपुरं प्रति

kuṁjala uvāca gate tasminmahābhāge dattātreye mahāmunau ājagāma mahārāja āyuśca svapuraṁ prati

कुंजल ने कहा — उस महाभाग महामुनि दत्तात्रेय के चले जाने पर, हे महाराज, आयु भी अपने नगर की ओर लौट आए।

श्लोक 2 (padma.2.104.2)

इंदुमत्या गृहं हृष्टः प्रविवेश श्रियान्वितम् । सर्वकामसमृद्धार्थमिंद्रस्य सदनोपमम्

iṁdumatyā gṛhaṁ hṛṣṭaḥ praviveśa śriyānvitam sarvakāmasamṛddhārthamiṁdrasya sadanopamam

वे हर्षित होकर इंदुमती के महल में प्रविष्ट हुए, जो शोभा से युक्त, इंद्र के भवन के समान समस्त कामनाओं की समृद्धि से भरा था।

श्लोक 3 (padma.2.104.3)

राज्यं चक्रे स मेधावी यथा स्वर्गे पुरंदरः । स्वर्भानुसुतया सार्द्धमिंदुमत्या द्विजोत्तम

rājyaṁ cakre sa medhāvī yathā svarge puraṁdaraḥ svarbhānusutayā sārddhamiṁdumatyā dvijottama

हे श्रेष्ठ द्विज! वह बुद्धिमान् राजा स्वर्भानु की पुत्री इंदुमती के साथ इस प्रकार राज्य करने लगा, जैसे स्वर्ग में इंद्र करते हैं।

श्लोक 4 (padma.2.104.4)

सा च इंदुमती राज्ञी गर्भमाप फलाशनात् । दत्तात्रेयस्य वचनाद्दिव्यतेजः समन्वितम्

sā ca iṁdumatī rājñī garbhamāpa phalāśanāt dattātreyasya vacanāddivyatejaḥ samanvitam

वह रानी इंदुमती दत्तात्रेय के वचन से प्राप्त उस फल को खाकर गर्भवती हुई, दिव्य तेज से युक्त।

श्लोक 5 (padma.2.104.5)

इंदुमत्या महाभाग स्वप्नं दृष्टमनुत्तमम् । रात्रौ दिवान्वितं तात बहुमंगलदायकम्

iṁdumatyā mahābhāga svapnaṁ dṛṣṭamanuttamam rātrau divānvitaṁ tāta bahumaṁgaladāyakam

हे महाभाग! इंदुमती ने एक अनुपम स्वप्न देखा, हे तात, जो रात्रि में भी दिन के समान उज्ज्वल तथा अत्यंत मंगलकारी था।

श्लोक 6 (padma.2.104.6)

गृहांतरे विशंतं च पुरुषं सूर्यसन्निभम् । मुक्तामालान्वितं विप्रं श्वेतवस्त्रेणशोभितम्

gṛhāṁtare viśaṁtaṁ ca puruṣaṁ sūryasannibham muktāmālānvitaṁ vipraṁ śvetavastreṇaśobhitam

उसने देखा कि सूर्य के समान तेजस्वी, मोतियों की माला से युक्त, श्वेत वस्त्र से सुशोभित एक विप्र पुरुष उसके घर में प्रवेश कर रहा है।

श्लोक 7 (padma.2.104.7)

श्वेतपुष्पकृतामाला तस्य कंठे विराजते । सर्वाभरणशोभांगो दिव्यगंधानुलेपनः

śvetapuṣpakṛtāmālā tasya kaṁṭhe virājate sarvābharaṇaśobhāṁgo divyagaṁdhānulepanaḥ

उसके कंठ में श्वेत पुष्पों की माला सुशोभित थी; वह समस्त आभूषणों से मंडित अंगों वाला, दिव्य सुगंध से अनुलिप्त था।

श्लोक 8 (padma.2.104.8)

चतुर्भुजः शंखपाणिर्गदाचक्रासिधारकः । छत्रेण ध्रियमाणेन चंद्रबिंबानुकारिणा

caturbhujaḥ śaṁkhapāṇirgadācakrāsidhārakaḥ chatreṇa dhriyamāṇena caṁdrabiṁbānukāriṇā

वह चतुर्भुज था, हाथों में शंख, गदा, चक्र और खड्ग धारण किए हुए था; उसके ऊपर चंद्रबिंब के समान एक छत्र धरा हुआ था।

श्लोक 9 (padma.2.104.9)

शोभमानो महातेजा दिव्याभरणभूषितः । हारकंकणकेयूर नूपुराभ्यां विराजितः

śobhamāno mahātejā divyābharaṇabhūṣitaḥ hārakaṁkaṇakeyūra nūpurābhyāṁ virājitaḥ

वह महातेजस्वी, दिव्य आभूषणों से भूषित, हार-कंकण-केयूर और नूपुरों से सुशोभित था।

श्लोक 10 (padma.2.104.10)

चंद्रबिंबानुकाराभ्यां कुंडलाभ्यां विराजितः । एवंविधो महाप्राज्ञो नरः कश्चित्समागतः

caṁdrabiṁbānukārābhyāṁ kuṁḍalābhyāṁ virājitaḥ evaṁvidho mahāprājño naraḥ kaścitsamāgataḥ

चंद्रबिंब के समान कुंडलों से वह सुशोभित था। इस प्रकार का कोई महाबुद्धिमान् पुरुष वहाँ आ पहुँचा।

श्लोक 11 (padma.2.104.11)

इंदुमतीं समाहूय स्नापिता पयसा तदा । शंखेन क्षीरपूर्णेन शशिवर्णेन भामिनी

iṁdumatīṁ samāhūya snāpitā payasā tadā śaṁkhena kṣīrapūrṇena śaśivarṇena bhāminī

उस सुंदरी इंदुमती को बुलाकर, चंद्रमा-वर्ण के दूध से भरे शंख से उसे स्नान कराया गया,

श्लोक 12 (padma.2.104.12)

रत्नकांचनबद्धेन संपूर्णेन पुनः पुनः । श्वेतं नागं सुरूपं च सहस्रशिरसं वरम्

ratnakāṁcanabaddhena saṁpūrṇena punaḥ punaḥ śvetaṁ nāgaṁ surūpaṁ ca sahasraśirasaṁ varam

रत्न और स्वर्ण से जड़े, बार-बार भरे जाते उस पूर्ण शंख से। फिर एक श्वेत, सुंदर सहस्रफणी नाग को —

श्लोक 13 (padma.2.104.13)

महामणियुतं दीप्तं धामज्वालासमाकुलम् । क्षिप्तं तेन मुखप्रांते दत्तं मुक्ताफलं पुनः

mahāmaṇiyutaṁ dīptaṁ dhāmajvālāsamākulam kṣiptaṁ tena mukhaprāṁte dattaṁ muktāphalaṁ punaḥ

— बड़े-बड़े मणियों से युक्त, दीप्तिमान, ज्वाला-समूह से घिरा हुआ — उसने उसके मुख के समीप रख दिया, और फिर उसे एक मोती अर्पित किया।

श्लोक 14 (padma.2.104.14)

कंठे तस्याः स देवेश इंदुमत्या महायशाः । पद्मं हस्ते ततो दत्वा स्वस्थानं प्रति जग्मिवान्

kaṁṭhe tasyāḥ sa deveśa iṁdumatyā mahāyaśāḥ padmaṁ haste tato datvā svasthānaṁ prati jagmivān

उस देवाधिदेव, महायशस्वी ने इंदुमती के कंठ में वह (माला) पहनाई, और फिर उसके हाथ में एक कमल देकर वह अपने स्थान को लौट गया।

श्लोक 15 (padma.2.104.15)

एवंविधं महास्वप्नं तया दृष्टं सुतोत्तमम् । समाचष्ट महाभागा आयुं भूमिपतीश्वरम्

evaṁvidhaṁ mahāsvapnaṁ tayā dṛṣṭaṁ sutottamam samācaṣṭa mahābhāgā āyuṁ bhūmipatīśvaram

इस प्रकार का यह महास्वप्न, जो श्रेष्ठ पुत्र का सूचक था, उसने देखा; और वह महाभागा रानी उसे भूपति आयु से कह सुनाने लगी।

श्लोक 16 (padma.2.104.16)

समाकर्ण्य महाराजश्चिंतयामास वै पुनः । समाहूय गुरुं पश्चात्कथितं स्वप्नमुत्तमम्

samākarṇya mahārājaściṁtayāmāsa vai punaḥ samāhūya guruṁ paścātkathitaṁ svapnamuttamam

इसे सुनकर महाराज पुनः विचार में पड़ गए। फिर उन्होंने अपने गुरु को बुलाकर वह उत्तम स्वप्न कह सुनाया —

श्लोक 17 (padma.2.104.17)

शौनकं सुमहाभागं सर्वज्ञं ज्ञानिनां वरम् । राजोवाच । अद्य रात्रौ महाभाग मम पत्न्या द्विजोत्तम

śaunakaṁ sumahābhāgaṁ sarvajñaṁ jñānināṁ varam rājovāca adya rātrau mahābhāga mama patnyā dvijottama

— महाभाग, सर्वज्ञ, ज्ञानियों में श्रेष्ठ शौनक को। राजा ने कहा — 'हे महाभाग, हे श्रेष्ठ द्विज! आज रात्रि मेरी पत्नी के —

श्लोक 18 (padma.2.104.18)

विप्रो गेहं विशन्दृष्टः किमिदं स्वप्नकारणम् । शौनक उवाच । वरो दत्तस्तु ते पूर्वं दत्तात्रेयेण धीमता

vipro gehaṁ viśandṛṣṭaḥ kimidaṁ svapnakāraṇam śaunaka uvāca varo dattastu te pūrvaṁ dattātreyeṇa dhīmatā

'— घर में एक विप्र को प्रवेश करते हुए देखा गया; इस स्वप्न का क्या कारण है?' शौनक ने कहा — 'तुम्हें पहले बुद्धिमान् दत्तात्रेय द्वारा वर दिया गया था —

श्लोक 19 (padma.2.104.19)

आदिष्टं च फलं राज्ञां सुगुणं सुतहेतवे । तत्फलं किं कृतं राजन्कस्मै त्वया निवेदितम्

ādiṣṭaṁ ca phalaṁ rājñāṁ suguṇaṁ sutahetave tatphalaṁ kiṁ kṛtaṁ rājankasmai tvayā niveditam

'— और राजाओं के लिए उपयुक्त, गुणवान् पुत्र की प्राप्ति हेतु एक फल भी दिया गया था। हे राजन्! उस फल का तुमने क्या किया, किसे अर्पित किया?'

श्लोक 20 (padma.2.104.20)

सुभार्यायै मया दत्तमिति राज्ञोदितं वचः । श्रुत्वोवाच महाप्राज्ञः शौनको द्विजसत्तमः

subhāryāyai mayā dattamiti rājñoditaṁ vacaḥ śrutvovāca mahāprājñaḥ śaunako dvijasattamaḥ

राजा ने कहा — 'मैंने अपनी उत्तम पत्नी को दे दिया था।' यह सुनकर महाबुद्धिमान् श्रेष्ठ द्विज शौनक ने कहा —

श्लोक 21 (padma.2.104.21)

दत्तात्रेयप्रसादेन तव गेहे सुतोत्तमः । वैष्णवांशेन संयुक्तो भविष्यति न संशयः

dattātreyaprasādena tava gehe sutottamaḥ vaiṣṇavāṁśena saṁyukto bhaviṣyati na saṁśayaḥ

'दत्तात्रेय की कृपा से तुम्हारे घर में एक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होगा — विष्णु के अंश से युक्त, इसमें कोई संशय नहीं है।'

श्लोक 22 (padma.2.104.22)

स्वप्नस्य कारणं राजन्नेतत्ते कथितं मया । इंद्रोपेंद्र समः पुत्रो दिव्यवीर्यो भविष्यति

svapnasya kāraṇaṁ rājannetatte kathitaṁ mayā iṁdropeṁdra samaḥ putro divyavīryo bhaviṣyati

'हे राजन्! यही तुम्हारे स्वप्न का कारण है, जो मैंने तुम्हें बताया। इंद्र और उपेंद्र के समान वह पुत्र दिव्य पराक्रम वाला होगा।'

श्लोक 23 (padma.2.104.23)

पुत्रस्ते सर्वधर्मात्मा सोमवंशस्य वर्द्धनः । धनुर्वेदे च वेदे च सगुणोसौ भविष्यति

putraste sarvadharmātmā somavaṁśasya varddhanaḥ dhanurvede ca vede ca saguṇosau bhaviṣyati

'तुम्हारा पुत्र सर्वथा धर्मात्मा, सोमवंश को बढ़ाने वाला होगा। वह धनुर्वेद में और वेद में भी गुणों से युक्त होगा।'

श्लोक 24 (padma.2.104.24)

एवमुक्त्वा स राजानं शौनको गतवान्गृहम् । हर्षेण महताविष्टो राजाभूत्प्रियया सह

evamuktvā sa rājānaṁ śaunako gatavāngṛham harṣeṇa mahatāviṣṭo rājābhūtpriyayā saha

इस प्रकार राजा से कहकर शौनक अपने घर लौट गए। राजा भी अत्यंत हर्ष से भरकर अपनी प्रिय पत्नी के साथ रहने लगा।

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