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भूमि खण्ड · अध्याय 105

नहुष की रक्षा और शिक्षा-दीक्षा

अध्याय 104अध्याय-सूचीअध्याय 106

श्लोक 1 (padma.2.105.1)

कुञ्जल उवाच । गता सा नन्दनवनं सखीभिः सह क्रीडितुम्। तत्राकर्ण्य महद्वाक्यमप्रियं तु तदा पितुः

kuñjala uvāca gatā sā nandanavanaṁ sakhībhiḥ saha krīḍitum tatrākarṇya mahadvākyamapriyaṁ tu tadā pituḥ

कुंजल ने कहा — वह (हुंड की कन्या) सखियों के साथ क्रीड़ा करने नंदन वन गई। वहाँ उसने पिता (हुंड) के लिए अप्रिय एक बड़ा वचन सुना —

श्लोक 2 (padma.2.105.2)

चारणानां सुसिद्धानां भाषतां हर्षणेन तु। आयोर्गेहे महावीर्यो विष्णुतुल्यपराक्रमः

cāraṇānāṁ susiddhānāṁ bhāṣatāṁ harṣaṇena tu āyorgehe mahāvīryo viṣṇutulyaparākramaḥ

— सिद्ध चारणों को हर्षपूर्वक यह कहते हुए कि आयु के घर में महापराक्रमी, विष्णु के समान बलशाली,

श्लोक 3 (padma.2.105.3)

भविष्यति सुतश्रेष्ठो हुण्डस्यांतं करिष्यति । एवंविधं महद्वाक्यमप्रियं दुःखदायकम्

bhaviṣyati sutaśreṣṭho huṇḍasyāṁtaṁ kariṣyati evaṁvidhaṁ mahadvākyamapriyaṁ duḥkhadāyakam

— एक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होगा, जो हुंड का अंत करेगा। इस प्रकार का यह अप्रिय, दुःखदायी महावचन —

श्लोक 4 (padma.2.105.4)

समाकर्ण्य समायाता पितुरग्रे निवेदितम् । समासेन तया तस्य पुरतो दुःखदायकम्

samākarṇya samāyātā pituragre niveditam samāsena tayā tasya purato duḥkhadāyakam

— सुनकर वह लौट आई और पिता के सामने निवेदन किया — संक्षेप में उसने वह दुःखद बात उसके सामने कह दी।

श्लोक 5 (padma.2.105.5)

पितुरग्रे जगादाथ पिता श्रुत्वा स विस्मितः । शापमशोकसुंदर्याः सस्मार च पुराकृतम्

pituragre jagādātha pitā śrutvā sa vismitaḥ śāpamaśokasuṁdaryāḥ sasmāra ca purākṛtam

पिता के सामने उसने यह कहा; पिता यह सुनकर चकित रह गया और उसे अशोकसुंदरी का पूर्व दिया हुआ शाप स्मरण हो आया।

श्लोक 6 (padma.2.105.6)

एतस्यार्थे तपस्तेपे सेयं चाशोकसुंदरी । गर्भस्य नाशनायैव इंदुमत्याः स दानवः

etasyārthe tapastepe seyaṁ cāśokasuṁdarī garbhasya nāśanāyaiva iṁdumatyāḥ sa dānavaḥ

इसी कारण अशोकसुंदरी ने वह तप किया था। इंदुमती के गर्भ को नष्ट करने के लिए ही वह दानव —

श्लोक 7 (padma.2.105.7)

विचक्रे उद्यमं दुष्टः कालाकृष्टो दुरात्मवान् । छिद्रान्वेषी ततो भूत्वा इंदुमत्यास्तु नित्यशः

vicakre udyamaṁ duṣṭaḥ kālākṛṣṭo durātmavān chidrānveṣī tato bhūtvā iṁdumatyāstu nityaśaḥ

— उस पाप-आत्मा दुष्ट ने, काल से प्रेरित होकर प्रयत्न किया; तत्पश्चात् वह इंदुमती के प्रति निरंतर छिद्र (कमजोरी) खोजता रहा।

श्लोक 8 (padma.2.105.8)

यदा पश्यति तां राज्ञीं रूपौदार्यगुणान्विताम् । दिव्यतेजः समायुक्तां रक्षितां विष्णुतेजसा

yadā paśyati tāṁ rājñīṁ rūpaudāryaguṇānvitām divyatejaḥ samāyuktāṁ rakṣitāṁ viṣṇutejasā

जब भी वह उस रानी को रूप, औदार्य और गुणों से युक्त, दिव्य तेज से संपन्न, विष्णु के तेज से रक्षित देखता,

श्लोक 9 (padma.2.105.9)

दिव्येन तेजसा युक्तां सूर्यबिंबोपमां तु ताम् । तस्याः पार्श्वे महाभाग रक्षणार्थं स्थितः सदा

divyena tejasā yuktāṁ sūryabiṁbopamāṁ tu tām tasyāḥ pārśve mahābhāga rakṣaṇārthaṁ sthitaḥ sadā

— दिव्य तेज से युक्त, सूर्यबिंब के समान उस रानी को — हे महाभाग! (वह रक्षक तेज) उसके पार्श्व में सदा रक्षा के लिए स्थित रहता था।

श्लोक 10 (padma.2.105.10)

दूरात्स दानवो दुष्टस्तस्याश्च बहुदर्शयन् । नानाविद्यां महोग्रां च भीषिकां सुविभीषिकाम्

dūrātsa dānavo duṣṭastasyāśca bahudarśayan nānāvidyāṁ mahogrāṁ ca bhīṣikāṁ suvibhīṣikām

वह दुष्ट दानव दूर से ही उसे नाना प्रकार की महाभयंकर माया, भय और अत्यंत भयावह दृश्य दिखाता रहा,

श्लोक 11 (padma.2.105.11)

गर्भस्य तेजसा युक्ता रक्षिता विष्णुतेजसा । भयं न जायते तस्या मनस्येव कदापुनः

garbhasya tejasā yuktā rakṣitā viṣṇutejasā bhayaṁ na jāyate tasyā manasyeva kadāpunaḥ

किंतु वह गर्भ के तेज से युक्त, विष्णु के तेज से रक्षित रानी — उसके मन में फिर कभी भय उत्पन्न नहीं हुआ।

श्लोक 12 (padma.2.105.12)

विफलो दानवो जात उद्यमश्च निरर्थकः । मनीप्सितं नैव जातं हुंडस्यापि दुरात्मनः

viphalo dānavo jāta udyamaśca nirarthakaḥ manīpsitaṁ naiva jātaṁ huṁḍasyāpi durātmanaḥ

दानव के सारे प्रयत्न विफल हो गए, उसका उद्यम निरर्थक हो गया। उस दुरात्मा हुंड का मनचाहा कभी सिद्ध नहीं हुआ।

श्लोक 13 (padma.2.105.13)

एवं वर्षशतं पूर्णं पश्यमानस्य तस्य च । प्रसूता सा हि पुत्रं च स्वर्भानोस्तनया तदा

evaṁ varṣaśataṁ pūrṇaṁ paśyamānasya tasya ca prasūtā sā hi putraṁ ca svarbhānostanayā tadā

इस प्रकार पूरे सौ वर्ष तक प्रतीक्षा करते हुए उसने देखा कि स्वर्भानु की पुत्री (इंदुमती) ने पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 14 (padma.2.105.14)

रात्रावेव सुतश्रेष्ठ तस्याः पुत्रो व्यजायत । तेजसातीव भात्येष यथा सूर्यो नभस्तले

rātrāveva sutaśreṣṭha tasyāḥ putro vyajāyata tejasātīva bhātyeṣa yathā sūryo nabhastale

हे श्रेष्ठ पुत्र! रात्रि में ही उसका पुत्र उत्पन्न हुआ, जो आकाश में सूर्य के समान अत्यंत तेजस्वी था।

श्लोक 15 (padma.2.105.15)

सूत उवाच । अथ दासी महादुष्टा काचित्सूतिगृहागता । अशौचाचारसंयुक्ता महामंगलवादिनी

sūta uvāca atha dāsī mahāduṣṭā kācitsūtigṛhāgatā aśaucācārasaṁyuktā mahāmaṁgalavādinī

सूत ने कहा — तब उस प्रसूतिगृह में एक अत्यंत दुष्ट दासी आई, जो अशुद्ध आचरण वाली थी, पर मंगलमय वचन बोल रही थी।

श्लोक 16 (padma.2.105.16)

तस्याः सर्वं समाज्ञाय स हुंडो दानवाधमः । दास्या अंगं प्रविश्यैव प्रविष्टश्चायुमन्दिरे

tasyāḥ sarvaṁ samājñāya sa huṁḍo dānavādhamaḥ dāsyā aṁgaṁ praviśyaiva praviṣṭaścāyumandire

उससे सब कुछ जानकर, वह अधम दानव हुंड उस दासी के शरीर में प्रवेश करके ही आयु के महल में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 17 (padma.2.105.17)

महाजने प्रसुप्ते च निद्रयातीवमोहिते । तं पुत्रं देवगर्भाभमपहृत्य बहिर्गतः

mahājane prasupte ca nidrayātīvamohite taṁ putraṁ devagarbhābhamapahṛtya bahirgataḥ

जब समस्त बड़े जन गहरी निद्रा में मोहित होकर सो गए, तब वह देवगर्भ-सम उस पुत्र को हरकर बाहर निकल गया।

श्लोक 18 (padma.2.105.18)

कांचनाख्यपुरे प्राप्तः स्वकीये दानवाधमः । समाहूय प्रियां भार्यां विपुलां वाक्यमब्रवीत्

kāṁcanākhyapure prāptaḥ svakīye dānavādhamaḥ samāhūya priyāṁ bhāryāṁ vipulāṁ vākyamabravīt

वह अधम दानव अपने ही कांचन नामक नगर में पहुँचकर, अपनी प्रिय पत्नी विपुला को बुलाकर यह वचन बोला —

श्लोक 19 (padma.2.105.19)

वधस्वैनं महापापं बालरूपं रिपुं मम । पश्चात्सूदस्य वै हस्ते भोजनार्थं प्रदीयताम्

vadhasvainaṁ mahāpāpaṁ bālarūpaṁ ripuṁ mama paścātsūdasya vai haste bhojanārthaṁ pradīyatām

'इस महापापी, बालरूपी मेरे शत्रु को मार डालो। फिर इसे रसोइए के हाथ भोजन के लिए सौंप दो।'

श्लोक 20 (padma.2.105.20)

नानाभेदैर्विभेदैश्च पाचयस्व हि निर्घृणम् । सूदहस्तान्महाभागे पश्चाद्भोक्ष्ये न संशयः

nānābhedairvibhedaiśca pācayasva hi nirghṛṇam sūdahastānmahābhāge paścādbhokṣye na saṁśayaḥ

'इसे नाना टुकड़ों में काटकर निर्दयतापूर्वक पकवाओ। हे महाभागे! रसोइए के हाथों से बना भोजन मैं बाद में निःसंदेह खाऊँगा।'

श्लोक 21 (padma.2.105.21)

वाक्यमाकर्ण्य तद्भर्तुर्विपुला विस्मिताभवत् । कस्मान्निर्घृणतां याति भर्त्ता मम सुनिष्ठुरः

vākyamākarṇya tadbharturvipulā vismitābhavat kasmānnirghṛṇatāṁ yāti bharttā mama suniṣṭhuraḥ

पति का यह वचन सुनकर विपुला चकित रह गई — 'मेरा पति इतना निर्दय और अत्यंत निष्ठुर क्यों हो गया है?'

श्लोक 22 (padma.2.105.22)

सर्वलक्षणसंपन्नं देवगर्भोपमं सुतम् । कस्य कस्मात्प्रभक्ष्येत क्षमाहीनः सुनिर्घृणः

sarvalakṣaṇasaṁpannaṁ devagarbhopamaṁ sutam kasya kasmātprabhakṣyeta kṣamāhīnaḥ sunirghṛṇaḥ

'समस्त शुभ लक्षणों से युक्त, देवगर्भ-सम इस पुत्र को — क्षमाहीन, अत्यंत निर्दय (मेरा पति) किसका, किस कारण भक्षण करना चाहता है?'

श्लोक 23 (padma.2.105.23)

इत्येवं चिंतयामास कारुण्येन समन्विता । पुनः पप्रच्छ भर्तारं कस्माद्भक्ष्यसि बालकम्

ityevaṁ ciṁtayāmāsa kāruṇyena samanvitā punaḥ papraccha bhartāraṁ kasmādbhakṣyasi bālakam

इस प्रकार वह करुणा से भरकर विचार करने लगी। उसने फिर पति से पूछा — 'तुम इस बालक को क्यों खाओगे?'

श्लोक 24 (padma.2.105.24)

कस्माद्भवसि संक्रुद्धो अतीव निरपत्रपः । सर्वं मे कारणं ब्रूहि तत्त्वेन दनुजेश्वर

kasmādbhavasi saṁkruddho atīva nirapatrapaḥ sarvaṁ me kāraṇaṁ brūhi tattvena danujeśvara

'तुम इतने क्रोधित और इतने निर्लज्ज क्यों हो गए हो? हे दनुजेश्वर! मुझे सारा कारण सच-सच बताओ।'

श्लोक 25 (padma.2.105.25)

आत्मदोषं च वृत्तांतं समासेन निवेदितम् । शापमशोकसुंदर्या हुंडेनापि दुरात्मना

ātmadoṣaṁ ca vṛttāṁtaṁ samāsena niveditam śāpamaśokasuṁdaryā huṁḍenāpi durātmanā

तब उस दुरात्मा हुंड ने अपना दोष और सारा वृत्तांत — अशोकसुंदरी का वह शाप — संक्षेप में उसे बता दिया।

श्लोक 26 (padma.2.105.26)

तया ज्ञातं तु तत्सर्वं कारणं दानवस्य वै । वध्योऽयं बालकः सत्यं नो वा भर्त्ता मरिष्यति

tayā jñātaṁ tu tatsarvaṁ kāraṇaṁ dānavasya vai vadhyo'yaṁ bālakaḥ satyaṁ no vā bharttā mariṣyati

उससे उस दानव का सारा कारण उसे ज्ञात हो गया — 'यह बालक सचमुच वध्य है, अन्यथा मेरे पति ही मरेंगे।'

श्लोक 27 (padma.2.105.27)

इत्येवं प्रविचार्यैव विपुला क्रोधमूर्च्छिता । मेकलां तु समाहूय सैरंध्रीं वाक्यमब्रवीत्

ityevaṁ pravicāryaiva vipulā krodhamūrcchitā mekalāṁ tu samāhūya sairaṁdhrīṁ vākyamabravīt

ऐसा विचार करके विपुला ने क्रोध का बहाना करते हुए मेकला नामक दासी को बुलाकर यह वचन कहा —

श्लोक 28 (padma.2.105.28)

जह्येनं बालकं दुष्टं मेकलेऽद्य महानसे । सूदहस्ते प्रदेहि त्वं हुण्डभोजनहेतवे

jahyenaṁ bālakaṁ duṣṭaṁ mekale'dya mahānase sūdahaste pradehi tvaṁ huṇḍabhojanahetave

'इस दुष्ट बालक को आज ही रसोईघर में समाप्त कर दो, हे मेकले। हुंड के भोजन के लिए इसे रसोइए के हाथ सौंप दो।'

श्लोक 29 (padma.2.105.29)

मेकला बालकं गृह्य सूदमाहूय चाब्रवीत् । राजादेशं कुरुष्वाद्य पचस्वैनं हि बालकम्

mekalā bālakaṁ gṛhya sūdamāhūya cābravīt rājādeśaṁ kuruṣvādya pacasvainaṁ hi bālakam

मेकला उस बालक को लेकर रसोइए को बुलाकर बोली — 'आज राजा की आज्ञा पूरी करो, इस बालक को पका दो।'

श्लोक 30 (padma.2.105.30)

एवमाकर्णितं तेन सूदेनापि महात्मना । आदाय बालकं हस्ताच्छस्त्रमुद्यम्य चोद्यतः

evamākarṇitaṁ tena sūdenāpi mahātmanā ādāya bālakaṁ hastācchastramudyamya codyataḥ

यह सुनकर उस महात्मा रसोइए ने बालक को हाथों में लेकर, शस्त्र उठाकर उसे मारने के लिए तत्पर हुआ।

श्लोक 31 (padma.2.105.31)

एष वै देवदेवस्य दत्तात्रेयस्य तेजसा । रक्षितस्त्वायुपुत्रश्च स जहास पुनः पुनः

eṣa vai devadevasya dattātreyasya tejasā rakṣitastvāyuputraśca sa jahāsa punaḥ punaḥ

किंतु देवाधिदेव दत्तात्रेय के तेज से रक्षित वह आयु का पुत्र केवल हँस पड़ा, बार-बार हँसता रहा।

श्लोक 32 (padma.2.105.32)

हसंतं तं समालोक्य स सूदः कृपयान्वितः । सैरंध्री च कृपायुक्ता सूदं तं प्रत्यभाषत

hasaṁtaṁ taṁ samālokya sa sūdaḥ kṛpayānvitaḥ sairaṁdhrī ca kṛpāyuktā sūdaṁ taṁ pratyabhāṣata

उसे हँसते हुए देखकर वह रसोइया करुणा से भर गया, और वह दासी भी दया से भरकर रसोइए से बोली —

श्लोक 33 (padma.2.105.33)

नैष वध्यस्त्वया सूद शिशुरेव महामते । दिव्यलक्षणसंपन्नः कस्य जातः सुसत्कुले

naiṣa vadhyastvayā sūda śiśureva mahāmate divyalakṣaṇasaṁpannaḥ kasya jātaḥ susatkule

'हे बुद्धिमान् रसोइए! इस मात्र शिशु को तुम्हें नहीं मारना चाहिए। दिव्य लक्षणों से युक्त यह किसी उत्तम कुल में जन्मा है।'

श्लोक 34 (padma.2.105.34)

सूद उवाच । सत्यमुक्तं त्वया भद्रे वाक्यं वै कृपयान्वितम् । राजलक्षणसंपन्नो रूपवान्कस्य बालकः

sūda uvāca satyamuktaṁ tvayā bhadre vākyaṁ vai kṛpayānvitam rājalakṣaṇasaṁpanno rūpavānkasya bālakaḥ

रसोइए ने कहा — 'हे भद्रे! तुमने सत्य और करुणापूर्ण वचन कहा। राजोचित लक्षणों से युक्त, रूपवान् यह बालक किसका है?'

श्लोक 35 (padma.2.105.35)

कस्माद्भोक्ष्यति दुष्टात्मा हुंडोऽयं दानवाधमः । येन वै रक्षितो वंशः पूर्वमेव सुकर्मणा

kasmādbhokṣyati duṣṭātmā huṁḍo'yaṁ dānavādhamaḥ yena vai rakṣito vaṁśaḥ pūrvameva sukarmaṇā

'यह अधम दानव दुष्टात्मा हुंड इसे किस कारण खाएगा — जबकि इसका वंश तो पहले से ही सुकर्मों द्वारा रक्षित है?'

श्लोक 36 (padma.2.105.36)

आपत्स्वपि स जीवेत दुर्गेषु नान्यथा भवेत् । सिंधुवेगेन नीतस्तु वह्निमध्ये गतोऽथवा

āpatsvapi sa jīveta durgeṣu nānyathā bhavet siṁdhuvegena nītastu vahnimadhye gato'thavā

'ऐसा व्यक्ति विपत्तियों में भी, दुर्गम स्थानों में भी जीवित रहता है, अन्यथा नहीं होता — भले ही उसे समुद्र के वेग में बहा दिया जाए या अग्नि के बीच डाल दिया जाए,'

श्लोक 37 (padma.2.105.37)

जीवतेनात्र संदेहो यश्च कर्मसहायवान् । तस्माद्धि क्रियते कर्म धर्मपुण्यसमन्वितम्

jīvatenātra saṁdeho yaśca karmasahāyavān tasmāddhi kriyate karma dharmapuṇyasamanvitam

'— वह अवश्य जीवित रहता है, इसमें संदेह नहीं, जिसके पास कर्म का सहारा है। इसीलिए धर्म और पुण्य से युक्त कर्म किया जाता है।'

श्लोक 38 (padma.2.105.38)

आयुष्मंतो नरास्तेन प्रवदंति सुखं ततः । तारकं पालकं कर्म रक्षते जाग्रते हि तत्

āyuṣmaṁto narāstena pravadaṁti sukhaṁ tataḥ tārakaṁ pālakaṁ karma rakṣate jāgrate hi tat

'उसी से मनुष्य दीर्घायु होते हैं, और तभी वे सुखी कहलाते हैं। उद्धार करने वाला और पालन करने वाला कर्म सदा जागकर रक्षा करता है।'

श्लोक 39 (padma.2.105.39)

मुक्तिदं जायते नित्यं मैत्रस्थानप्रदायकम् । दानपुण्यान्वितं कर्म प्रियवाक्यसमन्वितम्

muktidaṁ jāyate nityaṁ maitrasthānapradāyakam dānapuṇyānvitaṁ karma priyavākyasamanvitam

'सदा मुक्तिदायक और सुहृदों का स्थान देने वाला बन जाता है — दान और पुण्य से युक्त कर्म, प्रिय वचनों से युक्त,'

श्लोक 40 (padma.2.105.40)

उपकारयुतं यश्च करोति शुभकृत्तदा । तमेव रक्षते कर्म सर्वदैव न संशयः

upakārayutaṁ yaśca karoti śubhakṛttadā tameva rakṣate karma sarvadaiva na saṁśayaḥ

'— जो कोई उपकारयुक्त शुभ कर्म करता है, उसी की सदैव रक्षा वह कर्म करता है, इसमें कोई संदेह नहीं।'

श्लोक 41 (padma.2.105.41)

अन्ययोनिं प्रयाति स्म प्रेरितः स्वेन कर्मणा । किं करोति पिता माता अन्ये स्वजनबान्धवाः

anyayoniṁ prayāti sma preritaḥ svena karmaṇā kiṁ karoti pitā mātā anye svajanabāndhavāḥ

'अपने ही कर्म से प्रेरित होकर मनुष्य दूसरी योनि को भी चला जाता है — तब पिता, माता और अन्य स्वजन-बांधव क्या कर सकते हैं?'

श्लोक 42 (padma.2.105.42)

कर्मणा निहतो यस्तु न स्युस्तस्य च रक्षणे । सूत उवाच । येनैव कर्मणा चैव रक्षितश्चायुनंदनः

karmaṇā nihato yastu na syustasya ca rakṣaṇe sūta uvāca yenaiva karmaṇā caiva rakṣitaścāyunaṁdanaḥ

'जो कर्म से ही आहत हो, उसकी रक्षा में कोई समर्थ नहीं होता।' सूत ने कहा — उसी कर्म के बल से आयु के पुत्र की रक्षा हुई,

श्लोक 43 (padma.2.105.43)

तस्मात्कृपान्वितो जातः सूदः कर्मवशानुगः । सैरंध्री च तथा जाता प्रेरिता तस्य कर्मणा

tasmātkṛpānvito jātaḥ sūdaḥ karmavaśānugaḥ sairaṁdhrī ca tathā jātā preritā tasya karmaṇā

— उसी से वह रसोइया करुणा से भर गया, कर्म के वशीभूत होकर; और वह दासी भी उसी के कर्म से प्रेरित होकर वैसी ही बनी।

श्लोक 44 (padma.2.105.44)

द्वाभ्यामेव सुतश्चायो रक्षितश्चारुलक्षणः । रात्रावेव प्रणीतोऽसौ तस्माद्गेहान्महाश्रमे

dvābhyāmeva sutaścāyo rakṣitaścārulakṣaṇaḥ rātrāveva praṇīto'sau tasmādgehānmahāśrame

उन दोनों के ही द्वारा आयु के उस सुंदर लक्षणों वाले पुत्र की रक्षा हुई। उसी रात उसे उस घर से एक महान् आश्रम में पहुँचा दिया गया —

श्लोक 45 (padma.2.105.45)

वशिष्ठस्याश्रमे पुण्ये सैरंध्र्या पुण्यकर्मणा । शुभे पर्णकुटीद्वारे तस्मिन्नेव महाश्रमे

vaśiṣṭhasyāśrame puṇye sairaṁdhryā puṇyakarmaṇā śubhe parṇakuṭīdvāre tasminneva mahāśrame

— वसिष्ठ के पवित्र आश्रम में, उस दासी के पुण्यकर्म से, उसी महाआश्रम की एक शुभ पर्णकुटी के द्वार पर।

श्लोक 46 (padma.2.105.46)

गता सा स्वगृहं पश्चान्निक्षिप्य बालकोत्तमम् । एणं निपात्य सूदेन पाचितं मांसमेव हि

gatā sā svagṛhaṁ paścānnikṣipya bālakottamam eṇaṁ nipātya sūdena pācitaṁ māṁsameva hi

उस श्रेष्ठ बालक को वहाँ रखकर वह अपने घर लौट गई। इधर रसोइए ने एक मृग को मारकर उसका ही मांस पका दिया,

श्लोक 47 (padma.2.105.47)

भोजयित्वा सुदैत्येंद्रो हुंडो हृष्टोभवत्तदा । शापमशोकसुंदर्या मोघं मेने तदासुरः

bhojayitvā sudaityeṁdro huṁḍo hṛṣṭobhavattadā śāpamaśokasuṁdaryā moghaṁ mene tadāsuraḥ

जिसे खाकर वह दैत्येंद्र हुंड प्रसन्न हो गया। उस असुर ने मान लिया कि अशोकसुंदरी का शाप व्यर्थ हो गया,

श्लोक 48 (padma.2.105.48)

हर्षेण महताविष्टः स हुंडो दानवेश्वरः । कुंजल उवाच । प्रभाते विमले जाते वशिष्ठो मुनिसत्तमः

harṣeṇa mahatāviṣṭaḥ sa huṁḍo dānaveśvaraḥ kuṁjala uvāca prabhāte vimale jāte vaśiṣṭho munisattamaḥ

और वह दानवेश्वर हुंड अत्यंत हर्ष से भर गया। कुंजल ने कहा — निर्मल प्रभात होने पर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ —

श्लोक 49 (padma.2.105.49)

बहिर्गतो हि धर्मात्मा कुटीद्वारात्प्रपश्यति । संपूर्णं बालकं दृष्ट्वा दिव्यलक्षणसंयुतम्

bahirgato hi dharmātmā kuṭīdvārātprapaśyati saṁpūrṇaṁ bālakaṁ dṛṣṭvā divyalakṣaṇasaṁyutam

— वह धर्मात्मा बाहर निकले और कुटी के द्वार से देखने लगे। उन्होंने दिव्य लक्षणों से युक्त एक संपूर्ण बालक को देखा,

श्लोक 50 (padma.2.105.50)

संपूर्णेंदुप्रतीकाशं सुंदरं चारुलोचनम् । वशिष्ठ उवाच । पश्यंतु मुनयः सर्वे यूयमागत्य बालकम्

saṁpūrṇeṁdupratīkāśaṁ suṁdaraṁ cārulocanam vaśiṣṭha uvāca paśyaṁtu munayaḥ sarve yūyamāgatya bālakam

पूर्णचंद्र के समान, सुंदर, मनोहर नेत्रों वाला। वसिष्ठ ने कहा — 'सभी मुनि आकर इस बालक को देखें —

श्लोक 51 (padma.2.105.51)

कस्य केन समानीतं रात्रौ द्वारांगणे मम । देवगंधर्वगर्भाभं राजलक्षणसंयुतम्

kasya kena samānītaṁ rātrau dvārāṁgaṇe mama devagaṁdharvagarbhābhaṁ rājalakṣaṇasaṁyutam

'— न जाने किसका, किसके द्वारा रात्रि में मेरे द्वार-आँगन में लाया गया यह देवता या गंधर्व के गर्भ-सा, राजोचित लक्षणों वाला बालक —'

श्लोक 52 (padma.2.105.52)

कंदर्पकोटिसंकाशं पश्यंतु मुनयोऽमलम् । महाकौतुकसंयुक्ता हृष्टा द्विजवरास्ततः

kaṁdarpakoṭisaṁkāśaṁ paśyaṁtu munayo'malam mahākautukasaṁyuktā hṛṣṭā dvijavarāstataḥ

'— करोड़ों कामदेवों के समान इस निर्मल बालक को मुनिजन देखें।' तब अत्यंत कौतुक से भरे, हर्षित श्रेष्ठ द्विजगण —

श्लोक 53 (padma.2.105.53)

समपश्यन्सुतं ते तु आयोश्चैव महात्मनः । वशिष्ठः स तु धर्मात्मा ज्ञानेनालोक्य बालकम्

samapaśyansutaṁ te tu āyoścaiva mahātmanaḥ vaśiṣṭhaḥ sa tu dharmātmā jñānenālokya bālakam

— उस महात्मा आयु के पुत्र को देखने लगे। वसिष्ठ, वह धर्मात्मा, अपने ज्ञान से उस बालक को देखकर,

श्लोक 54 (padma.2.105.54)

आयुपुत्रं समाज्ञातं चरित्रेण समन्वितम् । वृत्तांतं तस्य दुष्टस्य हुण्डस्यापि दुरात्मनः

āyuputraṁ samājñātaṁ caritreṇa samanvitam vṛttāṁtaṁ tasya duṣṭasya huṇḍasyāpi durātmanaḥ

उसे आयु का पुत्र समझ गए, और उसका सारा वृत्तांत — उस दुष्ट, दुरात्मा हुंड का किया हुआ कृत्य — भी जान गए।

श्लोक 55 (padma.2.105.55)

कृपया ब्रह्मपुत्रस्तु समुत्थाय सुबालकम् । कराभ्यामथ गृह्णाति यावद्द्विजो वरोत्तमः

kṛpayā brahmaputrastu samutthāya subālakam karābhyāmatha gṛhṇāti yāvaddvijo varottamaḥ

वह ब्रह्मपुत्र (वसिष्ठ) करुणावश उठकर उस सुंदर बालक को अपने दोनों हाथों में उठाने लगे — तभी, हे द्विजश्रेष्ठ,

श्लोक 56 (padma.2.105.56)

तावत्पुष्पसुवृष्टिं च चक्रुर्देवाः सुतोपरि । ललितं सुस्वरं गीतं जगुर्गंधर्वकिन्नराः

tāvatpuṣpasuvṛṣṭiṁ ca cakrurdevāḥ sutopari lalitaṁ susvaraṁ gītaṁ jagurgaṁdharvakinnarāḥ

देवताओं ने उस पुत्र पर सुंदर पुष्पवृष्टि की; गंधर्वों और किन्नरों ने ललित, मधुर स्वर में गीत गाया।

श्लोक 57 (padma.2.105.57)

ऋषयो वेदमंत्रैस्तु स्तुवंति नृपनंदनम् । वशिष्ठस्तं समालोक्य वरं वै दत्तवांस्तदा

ṛṣayo vedamaṁtraistu stuvaṁti nṛpanaṁdanam vaśiṣṭhastaṁ samālokya varaṁ vai dattavāṁstadā

ऋषिगण वेदमंत्रों से उस राजपुत्र की स्तुति करने लगे। वसिष्ठ ने उसे देखकर उसी क्षण उसे एक वर दिया —

श्लोक 58 (padma.2.105.58)

नहुषेत्येव ते नाम ख्यातं लोके भविष्यति । हुषितो नैव तेनापि बालभावैर्नराधिप

nahuṣetyeva te nāma khyātaṁ loke bhaviṣyati huṣito naiva tenāpi bālabhāvairnarādhipa

'तुम्हारा नाम संसार में 'नहुष' के रूप में विख्यात होगा — क्योंकि यह बालक अपने बाल-स्वभाव से ही उस दुष्ट द्वारा भी विचलित (हुषित) नहीं किया जा सका,'

श्लोक 59 (padma.2.105.59)

तस्मान्नहुष ते नाम देवपूज्यो भविष्यसि। जातकर्मादिकं कर्म तस्य चक्रे द्विजोत्तमः

tasmānnahuṣa te nāma devapūjyo bhaviṣyasi jātakarmādikaṁ karma tasya cakre dvijottamaḥ

'— इसीलिए तुम्हारा नाम नहुष होगा, और तुम देवताओं द्वारा पूज्य बनोगे।' उस श्रेष्ठ द्विज ने उसके जातकर्म आदि संस्कार किए,

श्लोक 60 (padma.2.105.60)

व्रतदानं विसर्गं च गुरुशिष्यादिलक्षणम्। वेदं चाधीत्य संपूर्णं षडंगं सपदक्रमम्

vratadānaṁ visargaṁ ca guruśiṣyādilakṣaṇam vedaṁ cādhītya saṁpūrṇaṁ ṣaḍaṁgaṁ sapadakramam

व्रत-बंधन, विसर्जन और गुरु-शिष्य के अनुरूप समस्त संस्कार किए। उसने संपूर्ण वेद को छह अंगों और पदक्रम सहित पढ़ा,

श्लोक 61 (padma.2.105.61)

सर्वाण्येव च शास्त्राणि अधीत्य द्विजसत्तमात्। वशिष्ठाच्च धनुर्वेदं सरहस्यं महामतिः

sarvāṇyeva ca śāstrāṇi adhītya dvijasattamāt vaśiṣṭhācca dhanurvedaṁ sarahasyaṁ mahāmatiḥ

तथा उस श्रेष्ठ द्विज से समस्त शास्त्रों को पढ़कर, वसिष्ठ से रहस्य सहित धनुर्वेद को भी वह महाबुद्धिमान् बालक पढ़ने लगा,

श्लोक 62 (padma.2.105.62)

शस्त्राण्यस्त्राणि दिव्यानि ग्राहमोक्षयुतानि च। ज्ञानशास्त्रादिकं न्याय राजनीतिगुणादिकान्

śastrāṇyastrāṇi divyāni grāhamokṣayutāni ca jñānaśāstrādikaṁ nyāya rājanītiguṇādikān

दिव्य शस्त्र-अस्त्र और उन्हें ग्रहण-मोक्ष (धारण-त्याग) करने की विधि, ज्ञानशास्त्र, न्यायशास्त्र, राजनीति के गुण आदि भी सीखे —

श्लोक 63 (padma.2.105.63)

वशिष्ठादायुपुत्रश्च शिष्यरूपेण भक्तिमान्। एवं स सर्वनिष्पन्नो नाहुषश्चातिसुंदरः

vaśiṣṭhādāyuputraśca śiṣyarūpeṇa bhaktimān evaṁ sa sarvaniṣpanno nāhuṣaścātisuṁdaraḥ

— आयु का पुत्र वसिष्ठ से शिष्यभाव में भक्तिपूर्वक सब कुछ सीख गया। इस प्रकार वह अत्यंत सुंदर नाहुष सब कुछ में निष्णात हो गया,

श्लोक 64 (padma.2.105.64)

वशिष्ठस्य प्रसादाच्च चापबाणधरोभवत्

vaśiṣṭhasya prasādācca cāpabāṇadharobhavat

और वसिष्ठ की कृपा से वह धनुष-बाण धारण करने वाला योद्धा बन गया।

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