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भूमि खण्ड · अध्याय 110

देवताओं द्वारा नहुष को शस्त्रास्त्र प्रदान

अध्याय 109अध्याय-सूचीअध्याय 111

श्लोक 1 (padma.2.110.1)

कुंजल उवाच । आमंत्र्य स मुनीन्सर्वान्वशिष्ठं तपतांवरम् । समुत्सुको गंतुकामो नहुषो दानवं प्रति

kuṁjala uvāca āmaṁtrya sa munīnsarvānvaśiṣṭhaṁ tapatāṁvaram samutsuko gaṁtukāmo nahuṣo dānavaṁ prati

कुंजल ने कहा — तपस्वियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ सहित समस्त मुनियों से आज्ञा लेकर, वह नहुष उत्सुक होकर उस दानव के पास जाने की इच्छा करने लगा।

श्लोक 2 (padma.2.110.2)

ततस्ते मुनयः सर्वे वशिष्ठाद्यास्तपोधनाः । आशीर्भिरभिनंद्यैनमायुपुत्रं महाबलम्

tataste munayaḥ sarve vaśiṣṭhādyāstapodhanāḥ āśīrbhirabhinaṁdyainamāyuputraṁ mahābalam

तब वसिष्ठ आदि तपोधन समस्त मुनियों ने आशीर्वादों से अभिनंदित करते हुए, उस महाबली आयु-पुत्र को विदा किया।

श्लोक 3 (padma.2.110.3)

आकाशे देवताः सर्वा जघ्नुर्वै दुंदुभीन्मुदा । पुष्पवृष्टिं प्रचक्रुस्ते नहुषस्य च मूर्धनि

ākāśe devatāḥ sarvā jaghnurvai duṁdubhīnmudā puṣpavṛṣṭiṁ pracakruste nahuṣasya ca mūrdhani

आकाश में समस्त देवताओं ने हर्षपूर्वक दुंदुभियाँ बजाईं, और नहुष के सिर पर पुष्पों की वर्षा की।

श्लोक 4 (padma.2.110.4)

अथ देवः सहस्राक्षः सुरैः सार्द्धं समागतः । ददौ शस्त्राणि चास्त्राणि सूर्यतेजोपमानि च

atha devaḥ sahasrākṣaḥ suraiḥ sārddhaṁ samāgataḥ dadau śastrāṇi cāstrāṇi sūryatejopamāni ca

तब सहस्राक्ष देव (इंद्र) देवताओं सहित वहाँ आए, और उन्होंने सूर्य के तेज के समान शस्त्र और अस्त्र प्रदान किए।

श्लोक 5 (padma.2.110.5)

देवेभ्यो नृपशार्दूलो जगृहे द्विजसत्तम । तानि दिव्यानि चास्त्राणि दिव्यरूपोपमोऽभवत्

devebhyo nṛpaśārdūlo jagṛhe dvijasattama tāni divyāni cāstrāṇi divyarūpopamo'bhavat

हे श्रेष्ठ द्विज! उस राजश्रेष्ठ ने देवताओं से वे दिव्य अस्त्र ग्रहण किए, और वह स्वयं दिव्य रूप के समान हो गया।

श्लोक 6 (padma.2.110.6)

अथ ता देवताः सर्वाः सहस्राक्षमथाब्रुवन् । स्यंदनो दीयतामस्मै नहुषाय सुरेश्वर

atha tā devatāḥ sarvāḥ sahasrākṣamathābruvan syaṁdano dīyatāmasmai nahuṣāya sureśvara

तब समस्त देवताओं ने सहस्राक्ष (इंद्र) से कहा — 'हे सुरेश्वर! इस नहुष को एक रथ भी दिया जाए।'

श्लोक 7 (padma.2.110.7)

देवानां मतमाज्ञाय वज्रपाणिः स्वसारथिम् । आहूय मातलि तं तु आदिदेश ततो द्विज

devānāṁ matamājñāya vajrapāṇiḥ svasārathim āhūya mātali taṁ tu ādideśa tato dvija

देवताओं की यह इच्छा जानकर वज्रधारी इंद्र ने, हे द्विज, अपने सारथि मातलि को बुलाकर यह आदेश दिया —

श्लोक 8 (padma.2.110.8)

एनं गच्छ महात्मानमुह्यतां स्यंदनेन वै । सध्वजेन महाप्राज्ञमायुजं समरोद्यतम्

enaṁ gaccha mahātmānamuhyatāṁ syaṁdanena vai sadhvajena mahāprājñamāyujaṁ samarodyatam

'जाओ, इस महात्मा, महाबुद्धिमान्, युद्ध के लिए उद्यत आयु-पुत्र को ध्वजा सहित रथ पर बिठाओ।'

श्लोक 9 (padma.2.110.9)

स चोवाच सहस्राक्षं करिष्ये तवशासनम् । एवमुक्त्वा जगामाशु ह्यायुपुत्रं रणोद्यतम्

sa covāca sahasrākṣaṁ kariṣye tavaśāsanam evamuktvā jagāmāśu hyāyuputraṁ raṇodyatam

उसने सहस्राक्ष से कहा — 'तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा।' ऐसा कहकर वह शीघ्र ही युद्ध के लिए उद्यत आयु-पुत्र के पास चला गया।

श्लोक 10 (padma.2.110.10)

राजानं प्रत्युवाचैव देवराजस्य भाषितम् । विजयी भव धर्मज्ञ रथेनानेन संगरे

rājānaṁ pratyuvācaiva devarājasya bhāṣitam vijayī bhava dharmajña rathenānena saṁgare

उसने राजा से देवराज इंद्र का यह संदेश कहा — 'हे धर्मज्ञ! इस रथ से युद्ध में विजयी बनो।'

श्लोक 11 (padma.2.110.11)

इत्युवाच सहस्राक्षस्त्वामेव नृपतीश्वर । जहि त्वं दानवं संख्ये तं हुंडं पापचेतनम्

ityuvāca sahasrākṣastvāmeva nṛpatīśvara jahi tvaṁ dānavaṁ saṁkhye taṁ huṁḍaṁ pāpacetanam

'सहस्राक्ष ने तुम्हें ही यह कहा है, हे राजेश्वर! युद्ध में उस पापचित्त दानव हुंड का वध करो।'

श्लोक 12 (padma.2.110.12)

समाकर्ण्य स राजेंद्र सानंदपुलकोद्गमः । प्रसादाद्देवदेवस्य वशिष्ठस्य महात्मनः

samākarṇya sa rājeṁdra sānaṁdapulakodgamaḥ prasādāddevadevasya vaśiṣṭhasya mahātmanaḥ

हे राजेंद्र! यह सुनकर वह, आनंद से रोमांचित होकर, देवाधिदेव महात्मा वसिष्ठ की कृपा को स्मरण करता हुआ बोला —

श्लोक 13 (padma.2.110.13)

दानवं सूदयिष्यामि समरे पापचेतनम् । देवानां च विशेषेण मम मायापचारितम्

dānavaṁ sūdayiṣyāmi samare pāpacetanam devānāṁ ca viśeṣeṇa mama māyāpacāritam

'मैं उस पापचित्त दानव को युद्ध में मार डालूँगा — देवताओं की कृपा से विशेष रूप से, और अपनी माया के प्रयोग से भी।'

श्लोक 14 (padma.2.110.14)

एवमुक्ते महावाक्ये नहुषेण महात्मना । अथायातः स्वयं देवः शंखचक्रगदाधरः

evamukte mahāvākye nahuṣeṇa mahātmanā athāyātaḥ svayaṁ devaḥ śaṁkhacakragadādharaḥ

महात्मा नहुष द्वारा यह महावचन कहे जाने पर, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले देव (विष्णु) स्वयं वहाँ आए।

श्लोक 15 (padma.2.110.15)

चक्राच्चक्रं समुत्पाट्य सूर्यबिंबोपमं महत् । ज्वलता तेजसा दीप्तं सुवृत्तारं शुभावहम्

cakrāccakraṁ samutpāṭya sūryabiṁbopamaṁ mahat jvalatā tejasā dīptaṁ suvṛttāraṁ śubhāvaham

अपने ही चक्र से एक और महान् चक्र उत्पन्न करके — सूर्य-बिंब के समान, जलती हुई ज्योति से दीप्त, सुगोल और शुभंकर —

श्लोक 16 (padma.2.110.16)

नहुषाय ददौ देवो हर्षेण महता किल । तस्मै शूलं ददौ शंभुः सुतीक्ष्णं तेजसान्वितम्

nahuṣāya dadau devo harṣeṇa mahatā kila tasmai śūlaṁ dadau śaṁbhuḥ sutīkṣṇaṁ tejasānvitam

— उस देव ने अत्यंत हर्ष से नहुष को अर्पित किया। शंभु (शिव) ने उसे एक तीक्ष्ण, तेज से युक्त त्रिशूल भी दिया।

श्लोक 17 (padma.2.110.17)

तेन शूलवरेणासौ शोभते समरोद्यतः । द्वितीयः शंकरश्चासौ त्रिपुरघ्नो यथा प्रभुः

tena śūlavareṇāsau śobhate samarodyataḥ dvitīyaḥ śaṁkaraścāsau tripuraghno yathā prabhuḥ

उस श्रेष्ठ त्रिशूल से युद्ध के लिए उद्यत वह ऐसे सुशोभित हो रहा था, मानो त्रिपुरनाशक स्वयं दूसरा शंकर हो।

श्लोक 18 (padma.2.110.18)

ब्रह्मास्त्रं दत्तवान्ब्रह्मा वरुणः पाशमुत्तमम् । चंद्र तेजःप्रतीकाशं शंखं च नादमंगलम्

brahmāstraṁ dattavānbrahmā varuṇaḥ pāśamuttamam caṁdra tejaḥpratīkāśaṁ śaṁkhaṁ ca nādamaṁgalam

ब्रह्मा ने ब्रह्मास्त्र दिया, वरुण ने श्रेष्ठ पाश दिया; चंद्रमा ने अपने तेज के समान, मंगल ध्वनि करने वाला शंख दिया।

श्लोक 19 (padma.2.110.19)

वज्रमिंद्रस्तथा शक्तिं वायुश्चापं समार्गणम् । आग्नेयास्त्रं तथा वह्निर्ददौ तस्मै महात्मने

vajramiṁdrastathā śaktiṁ vāyuścāpaṁ samārgaṇam āgneyāstraṁ tathā vahnirdadau tasmai mahātmane

इंद्र ने वज्र दिया, वायु ने शक्ति और बाणों सहित धनुष दिया; और अग्नि ने उस महात्मा को आग्नेयास्त्र दिया।

श्लोक 20 (padma.2.110.20)

शस्त्राण्यस्त्राणि दिव्यानि बहूनि विविधानि च । ददुर्देवा महात्मानस्तस्मै राज्ञे महौजसे

śastrāṇyastrāṇi divyāni bahūni vividhāni ca dadurdevā mahātmānastasmai rājñe mahaujase

उस महातेजस्वी राजा को महात्मा देवताओं ने अनेक और विविध दिव्य शस्त्र-अस्त्र प्रदान किए।

श्लोक 21 (padma.2.110.21)

कुंजल उवाच । अथ आयुसुतो वीरो दैवतैः परिमानितः । आशीर्भिर्नंदितश्चापि मुनिभिस्तत्त्ववेदिभिः

kuṁjala uvāca atha āyusuto vīro daivataiḥ parimānitaḥ āśīrbhirnaṁditaścāpi munibhistattvavedibhiḥ

कुंजल ने कहा — तब वीर आयु-पुत्र, देवताओं द्वारा सम्मानित, तत्त्वज्ञ मुनियों द्वारा भी आशीर्वादों से अभिनंदित होकर,

श्लोक 22 (padma.2.110.22)

आरुरोह रथं दिव्यं भास्वरं रत्नमालिनम् । घंटारवैः प्रणदंतं क्षुद्रघंटासमाकुलम्

āruroha rathaṁ divyaṁ bhāsvaraṁ ratnamālinam ghaṁṭāravaiḥ praṇadaṁtaṁ kṣudraghaṁṭāsamākulam

उस दिव्य, देदीप्यमान, रत्नमालाओं से युक्त रथ पर चढ़ गया — जो घंटियों की ध्वनि से गूँजता, छोटी-छोटी घंटियों से भरा था।

श्लोक 23 (padma.2.110.23)

रथेन तेन दिव्येन शुशुभे नृपनदंनः । दिविमार्गे यथा सूर्यस्तेजसा स्वेन वै किल

rathena tena divyena śuśubhe nṛpanadaṁnaḥ divimārge yathā sūryastejasā svena vai kila

उस दिव्य रथ से वह राजा इस प्रकार सुशोभित हुआ, जैसे आकाश-मार्ग में सूर्य अपने ही तेज से सुशोभित होता है,

श्लोक 24 (padma.2.110.24)

प्रतपंस्तेजसा तद्वद्दैत्यानां मस्तकेषु सः । जगाम शीघ्रं वेगेन यथा वायुः सदागतिः

pratapaṁstejasā tadvaddaityānāṁ mastakeṣu saḥ jagāma śīghraṁ vegena yathā vāyuḥ sadāgatiḥ

— उसी प्रकार वह अपने तेज से दैत्यों के मस्तकों पर मानो प्रचंड ताप बरसाता हुआ, नित्य-गतिशील वायु के समान वेग से शीघ्र चल पड़ा —

श्लोक 25 (padma.2.110.25)

यत्रासौ दानवः पापस्तिष्ठते स्वबलैर्युतः । तेन मातलिना सार्द्धं वाहकेन महात्मना

yatrāsau dānavaḥ pāpastiṣṭhate svabalairyutaḥ tena mātalinā sārddhaṁ vāhakena mahātmanā

— उस स्थान की ओर, जहाँ वह पापी दानव अपनी सेनाओं सहित ठहरा हुआ था, उस महात्मा सारथि मातलि के साथ।

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