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भूमि खण्ड · अध्याय 111

नहुष का हुंड के नगर की ओर प्रस्थान

अध्याय 110अध्याय-सूचीअध्याय 112

श्लोक 1 (padma.2.111.1)

कुंजल उवाच । निर्गच्छमाने समराय वीरे नहुषे हि तस्मिन्सुरराज तुल्ये । सकौतुका मंगलगीतयुक्ताः स्त्रियस्तु सर्वाः परिजग्मुरत्र

kuṁjala uvāca nirgacchamāne samarāya vīre nahuṣe hi tasminsurarāja tulye sakautukā maṁgalagītayuktāḥ striyastu sarvāḥ parijagmuratra

कुंजल ने कहा — जब देवराज इंद्र के समान वह वीर नहुष युद्ध के लिए निकल पड़ा, तब सभी स्त्रियाँ कौतुकपूर्वक मंगलगीत गाती हुई उसके साथ चल पड़ीं।

श्लोक 2 (padma.2.111.2)

देवतानां वरा नार्यो रंभाद्यप्सरसस्तथा । किन्नर्यः कौतुकोत्सुक्यो जगुः स्वरेण सत्तम

devatānāṁ varā nāryo raṁbhādyapsarasastathā kinnaryaḥ kautukotsukyo jaguḥ svareṇa sattama

हे श्रेष्ठ! देवताओं की श्रेष्ठ स्त्रियाँ, रंभा आदि अप्सराएँ, तथा किन्नरियाँ भी कौतुक से उत्सुक होकर मधुर स्वर में गाने लगीं।

श्लोक 3 (padma.2.111.3)

गंधर्वाणां तथा नार्यो रूपालंकारसंयुताः । कौतुकाय गतास्तत्र यत्र राजा स तिष्ठति

gaṁdharvāṇāṁ tathā nāryo rūpālaṁkārasaṁyutāḥ kautukāya gatāstatra yatra rājā sa tiṣṭhati

रूप और आभूषणों से युक्त गंधर्व-स्त्रियाँ भी कौतुकवश वहाँ गईं, जहाँ वह राजा (नहुष) ठहरा हुआ था।

श्लोक 4 (padma.2.111.4)

पुरं महोदयं नाम हुंडस्यापि दुरात्मनः । नंदनोपवनैर्दिव्यैः सर्वत्र समलंकृतम्

puraṁ mahodayaṁ nāma huṁḍasyāpi durātmanaḥ naṁdanopavanairdivyaiḥ sarvatra samalaṁkṛtam

वहाँ दुरात्मा हुंड का ही महोदय नामक नगर था, जो नंदन-सदृश दिव्य उपवनों से सर्वत्र सुसज्जित था।

श्लोक 5 (padma.2.111.5)

सप्तकक्षान्वितैर्गेहैः कलशैरुपशोभितः । सपताकैर्महादंडैः शोभमानं पुरोत्तमम्

saptakakṣānvitairgehaiḥ kalaśairupaśobhitaḥ sapatākairmahādaṁḍaiḥ śobhamānaṁ purottamam

सात-सात मंज़िलों वाले भवनों और कलशों से सुशोभित, ध्वजा-पताकाओं और विशाल दंडों से शोभायमान वह श्रेष्ठ नगर था —

श्लोक 6 (padma.2.111.6)

कैलासशिखराकारैः सोन्नतैर्दिवमास्थितैः । सर्वश्रियान्वितैर्दिव्यैर्भ्राजमानं पुरोत्तमम्

kailāsaśikharākāraiḥ sonnatairdivamāsthitaiḥ sarvaśriyānvitairdivyairbhrājamānaṁ purottamam

— कैलास के शिखरों के समान ऊँचे, आकाश को छूते हुए, सर्वप्रकार की दिव्य शोभा से युक्त, देदीप्यमान श्रेष्ठ नगर था।

श्लोक 7 (padma.2.111.7)

वनैश्चोपवनैर्दिव्यैस्तडागैः सागरोपमैः । जलपूर्णैः सुशोभैस्तु पद्मै रक्तोत्पलान्वितैः

vanaiścopavanairdivyaistaḍāgaiḥ sāgaropamaiḥ jalapūrṇaiḥ suśobhaistu padmai raktotpalānvitaiḥ

वह दिव्य वनों और उपवनों से, समुद्र-सदृश जलाशयों से युक्त था — जो जल से भरे, लाल कमलों और नीलकमलों से सुशोभित थे।

श्लोक 8 (padma.2.111.8)

प्राकारैश्च महारत्नैरट्टालकशतैरपि । परिखाभिः सुपूर्णाभिर्जलैः स्वच्छैः प्रशोभितम्

prākāraiśca mahāratnairaṭṭālakaśatairapi parikhābhiḥ supūrṇābhirjalaiḥ svacchaiḥ praśobhitam

वह बड़े-बड़े रत्नों से जड़ी प्राचीरों और सैकड़ों अट्टालिकाओं से, तथा स्वच्छ जल से भरी खाइयों से सुशोभित था।

श्लोक 9 (padma.2.111.9)

अन्यैश्चैव महारत्नैर्गजाश्वैश्च विराजितम् । सुनारीभिः समाकीर्णं पुरुषैश्च महाप्रभैः

anyaiścaiva mahāratnairgajāśvaiśca virājitam sunārībhiḥ samākīrṇaṁ puruṣaiśca mahāprabhaiḥ

अन्य बड़े-बड़े रत्नों, हाथी-घोड़ों से सुशोभित, सुंदर स्त्रियों और अत्यंत तेजस्वी पुरुषों से भरा था।

श्लोक 10 (padma.2.111.10)

नानाप्रभावैर्दिव्यैश्च शोभमानं महोदयम् । राजश्रेष्ठो महावीरो नहुषो ददृशे पुरम्

nānāprabhāvairdivyaiśca śobhamānaṁ mahodayam rājaśreṣṭho mahāvīro nahuṣo dadṛśe puram

नाना दिव्य प्रभावों से देदीप्यमान वह महोदय नगर — उस राजश्रेष्ठ महावीर नहुष ने देखा।

श्लोक 11 (padma.2.111.11)

पुरप्रांते वनं दिव्यं दिव्यवृक्षैरलंकृतम् । तद्विवेश महावीरो नंदनं हि यथाऽमरः

puraprāṁte vanaṁ divyaṁ divyavṛkṣairalaṁkṛtam tadviveśa mahāvīro naṁdanaṁ hi yathā'maraḥ

नगर के छोर पर एक दिव्य वन था, दिव्य वृक्षों से अलंकृत। वह महावीर उसमें इस प्रकार प्रविष्ट हुआ, जैसे कोई अमर देवता नंदन वन में प्रविष्ट होता है।

श्लोक 12 (padma.2.111.12)

रथेन सह धर्मात्मा तेन मातलिना सह । प्रविष्टः स तु राजेंद्रो वनमध्ये सरित्तटे

rathena saha dharmātmā tena mātalinā saha praviṣṭaḥ sa tu rājeṁdro vanamadhye sarittaṭe

वह धर्मात्मा राजेंद्र अपने रथ पर मातलि के साथ, उस वन के मध्य, एक नदी के तट पर प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 13 (padma.2.111.13)

तत्र ता रूपसंयुक्ता दिव्या नार्यः समागताः । गंधर्वा गीततत्त्वज्ञा जगुर्गीतैर्नृपोत्तमम्

tatra tā rūpasaṁyuktā divyā nāryaḥ samāgatāḥ gaṁdharvā gītatattvajñā jagurgītairnṛpottamam

वहाँ रूप-संपन्न दिव्य स्त्रियाँ, तथा संगीत के तत्त्व को जानने वाले गंधर्व, आ पहुँचे और गीतों द्वारा उस राजश्रेष्ठ का गुणगान करने लगे।

श्लोक 14 (padma.2.111.14)

सूताश्च मागधाः सर्वे तं स्तुवंति नृपोत्तमम् । राजानमायुपुत्रं तं भ्राजमानं यथा रविम्

sūtāśca māgadhāḥ sarve taṁ stuvaṁti nṛpottamam rājānamāyuputraṁ taṁ bhrājamānaṁ yathā ravim

सूत और मागध भी सब उस राजश्रेष्ठ, आयु के उस पुत्र की, जो सूर्य के समान देदीप्यमान था, स्तुति करने लगे।

श्लोक 15 (padma.2.111.15)

शुश्राव गीतं मधुरं नहुषः किन्नरेरितम्

śuśrāva gītaṁ madhuraṁ nahuṣaḥ kinnareritam

नहुष ने किन्नरों द्वारा गाया गया वह मधुर गीत सुना।

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