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भूमि खण्ड · अध्याय 112

अशोकसुंदरी द्वारा तेजस्वी अपरिचित का दर्शन

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113

श्लोक 1 (padma.2.112.1)

कुंजल उवाच । तदेव गानं च सुरांगनाभिर्गीतं समाकर्ण्य च गीतकैर्ध्रुवैः । समाकुला चापि बभूव तत्र सा शंभुपुत्री परिचिंतयाना

kuṁjala uvāca tadeva gānaṁ ca surāṁganābhirgītaṁ samākarṇya ca gītakairdhruvaiḥ samākulā cāpi babhūva tatra sā śaṁbhuputrī pariciṁtayānā

कुंजल ने कहा — देवांगनाओं द्वारा गाया जाता वह ही गीत, अपने ध्रुवपदों सहित सुनकर, शंभु की वह पुत्री व्याकुल हो गई और सोचने लगी।

श्लोक 2 (padma.2.112.2)

आसनात्तूर्णमुत्थाय महोत्साहेन संयुता । तूर्णं गता वरारोहा तपोभावसमन्विता

āsanāttūrṇamutthāya mahotsāhena saṁyutā tūrṇaṁ gatā varārohā tapobhāvasamanvitā

वह श्रेष्ठांगी, तप के भाव से युक्त, आसन से शीघ्र उठकर, बड़े उत्साह से भरी हुई, तुरंत वहाँ चली गई।

श्लोक 3 (padma.2.112.3)

तं दृष्ट्वा देवसंकाशं दिव्यरूपसमप्रभम् । दिव्यगंधानुलिप्तांगं दिव्यमालाभिशोभितम्

taṁ dṛṣṭvā devasaṁkāśaṁ divyarūpasamaprabham divyagaṁdhānuliptāṁgaṁ divyamālābhiśobhitam

देवतुल्य, दिव्य रूप और दिव्य प्रभा से युक्त, दिव्य सुगंध से लिप्त अंगों वाले, दिव्य मालाओं से सुशोभित —

श्लोक 4 (padma.2.112.4)

दिव्यैराभरणैर्वस्त्रैः शोभितं नृपनंदनम् । दीप्तिमंतं यथा सूर्यं दिव्यलक्षणसंयुतम्

divyairābharaṇairvastraiḥ śobhitaṁ nṛpanaṁdanam dīptimaṁtaṁ yathā sūryaṁ divyalakṣaṇasaṁyutam

— दिव्य आभूषणों और वस्त्रों से सुशोभित उस राजकुमार को उसने देखा, जो सूर्य के समान देदीप्यमान और दिव्य लक्षणों से युक्त था।

श्लोक 5 (padma.2.112.5)

किं वा देवो महाप्राज्ञो गंधर्वो वा भविष्यति । किं वा नागसुतः सोयं किंवा विद्याधरो भवेत्

kiṁ vā devo mahāprājño gaṁdharvo vā bhaviṣyati kiṁ vā nāgasutaḥ soyaṁ kiṁvā vidyādharo bhavet

'यह कोई महाबुद्धिमान् देवता होगा, या गंधर्व? अथवा यह किसी नाग का पुत्र होगा, या विद्याधर?'

श्लोक 6 (padma.2.112.6)

देवेषु नैव पश्यामि कुतो यक्षेषु जायते । अनया लीलया वीरः सहस्राक्षोपि जायते

deveṣu naiva paśyāmi kuto yakṣeṣu jāyate anayā līlayā vīraḥ sahasrākṣopi jāyate

'देवताओं में तो मैं इसे कहीं नहीं देखती, यक्षों में भला यह कैसे उत्पन्न हो सकता है? इसी लीला से तो सहस्राक्ष (इंद्र) भी उत्पन्न होते हैं।'

श्लोक 7 (padma.2.112.7)

शंभुरेष भवेत्किंवा किंवा चायं मनोभवः । किंवा पितुः सखा मे स्यात्पौलस्त्योऽयं धनाधिपः

śaṁbhureṣa bhavetkiṁvā kiṁvā cāyaṁ manobhavaḥ kiṁvā pituḥ sakhā me syātpaulastyo'yaṁ dhanādhipaḥ

'क्या यह स्वयं शंभु होंगे? या यह कामदेव होंगे? या मेरे पिता के मित्र, धन के स्वामी पौलस्त्य (कुबेर) होंगे?'

श्लोक 8 (padma.2.112.8)

एवं समा चिंतयती च यावत्तावत्त्वरं रूपगुणाधिपा सा । समेत्य रंभासु महासखीभिरुवाच तां शंभुसुतां प्रहस्य

evaṁ samā ciṁtayatī ca yāvattāvattvaraṁ rūpaguṇādhipā sā sametya raṁbhāsu mahāsakhībhiruvāca tāṁ śaṁbhusutāṁ prahasya

इस प्रकार वह रूप और गुणों में श्रेष्ठ देवी विचार कर ही रही थी, कि उतने में रंभा आदि उसकी घनिष्ठ सखियाँ पास आकर, हँसते हुए, शंभु की उस पुत्री से बोलीं —

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