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भूमि खण्ड · अध्याय 115

हुंड का वध

अध्याय 114अध्याय-सूचीअध्याय 116

श्लोक 1 (padma.2.115.1)

कुंजल उवाच । ततस्त्वसौ संयति राजमानः समुद्यतश्चापधरो महात्मा । यथैव कालः कुपितः सलोकान्संहर्तुमैच्छत्तु तथा सुदानवान्

kuṁjala uvāca tatastvasau saṁyati rājamānaḥ samudyataścāpadharo mahātmā yathaiva kālaḥ kupitaḥ salokānsaṁhartumaicchattu tathā sudānavān

कुंजल ने कहा — तब वह महात्मा, युद्ध में देदीप्यमान, धनुष धारण किए हुए उद्यत — मानो कुपित काल ही, लोकों का संहार करने की इच्छा से, उन दानवों का संहार करने की इच्छा करने लगा।

श्लोक 2 (padma.2.115.2)

महास्त्रजालै रवितेजतुल्यैः सुदीप्तिमद्भिर्निजघान दानवान् । वायुर्यथोन्मूलयतीह पादपांस्तथैव राजा निजघान दानवान्

mahāstrajālai ravitejatulyaiḥ sudīptimadbhirnijaghāna dānavān vāyuryathonmūlayatīha pādapāṁstathaiva rājā nijaghāna dānavān

सूर्य के तेज के समान देदीप्यमान महाअस्त्रों के समूहों से उसने दानवों का संहार किया — जैसे वायु वृक्षों को जड़ से उखाड़ देता है, वैसे ही उस राजा ने दानवों का संहार किया।

श्लोक 3 (padma.2.115.3)

वायुर्यथा मेघचयं च दिव्यं संचालयेत्स्वेन बलेन तेजसा । तथा स राजा असुरान्मदोत्कटाननाशयद्बाणवरैः सुतीक्ष्णैः

vāyuryathā meghacayaṁ ca divyaṁ saṁcālayetsvena balena tejasā tathā sa rājā asurānmadotkaṭānanāśayadbāṇavaraiḥ sutīkṣṇaiḥ

जैसे वायु अपने ही बल और वेग से बादलों के दिव्य समूह को तितर-बितर कर देता है, वैसे ही उस राजा ने मद से उन्मत्त असुरों को तीक्ष्ण श्रेष्ठ बाणों से नष्ट कर दिया।

श्लोक 4 (padma.2.115.4)

न शेकुर्दानवाः सर्वे बाणवर्षं महात्मनः । मृताः केचिद्द्रुताः केचित्केचिन्नष्टा महाहवात्

na śekurdānavāḥ sarve bāṇavarṣaṁ mahātmanaḥ mṛtāḥ keciddrutāḥ kecitkecinnaṣṭā mahāhavāt

समस्त दानव उस महात्मा की बाणवृष्टि को सह नहीं सके — कुछ मारे गए, कुछ भाग गए, और कुछ उस महासंग्राम से नष्ट हो गए।

श्लोक 5 (padma.2.115.5)

सूत उवाच । महातेजं महाप्राज्ञं महादानवनाशनम् । चुक्रोध हुंडो दुष्टात्मा दृष्ट्वा तं नृपनंदनम्

sūta uvāca mahātejaṁ mahāprājñaṁ mahādānavanāśanam cukrodha huṁḍo duṣṭātmā dṛṣṭvā taṁ nṛpanaṁdanam

सूत ने कहा — उस महातेजस्वी, महाबुद्धिमान्, महादानवों के संहारक राजपुत्र को देखकर, दुष्टात्मा हुंड क्रोधित हो गया।

श्लोक 6 (padma.2.115.6)

स्थितो गत्वेदमाभाष्य तिष्ठतिष्ठेति चाहवे । त्वामद्य च नयिष्यामि आयुपुत्र यमांतिकम्

sthito gatvedamābhāṣya tiṣṭhatiṣṭheti cāhave tvāmadya ca nayiṣyāmi āyuputra yamāṁtikam

वह वहाँ जाकर, 'ठहरो, ठहरो' कहते हुए युद्ध में डट गया — 'हे आयुपुत्र! मैं आज ही तुम्हें यमलोक भेज दूँगा।'

श्लोक 7 (padma.2.115.7)

नहुष उवाच । स्थितोस्मि समरे पश्य त्वामहं हंतुमागतः । अहं त्वां तु हनिष्यामि दानवं पापचेतनम्

nahuṣa uvāca sthitosmi samare paśya tvāmahaṁ haṁtumāgataḥ ahaṁ tvāṁ tu haniṣyāmi dānavaṁ pāpacetanam

नहुष ने कहा — 'मैं युद्ध में डटा हूँ, देखो — मैं तुम्हें मारने के लिए ही आया हूँ। मैं ही तुम पापचित्त दानव का वध करूँगा।'

श्लोक 8 (padma.2.115.8)

इत्युक्त्वा धनुरादाय बाणानग्निशिखोपमान् । छत्रेण ध्रियमाणेन शुशुभे सोऽपि संयुगे

ityuktvā dhanurādāya bāṇānagniśikhopamān chatreṇa dhriyamāṇena śuśubhe so'pi saṁyuge

ऐसा कहकर उसने धनुष उठाया, और अग्नि की लपटों के समान बाण चढ़ाए। छत्र धारण किए हुए वह उस संग्राम में भी सुशोभित हो रहा था।

श्लोक 9 (padma.2.115.9)

इंद्रस्य सारथिं दिव्यं मातलिं वाक्यमब्रवीत् । वाहयतु रथं मेऽद्य हुंडस्य सम्मुखं भवान्

iṁdrasya sārathiṁ divyaṁ mātaliṁ vākyamabravīt vāhayatu rathaṁ me'dya huṁḍasya sammukhaṁ bhavān

उसने इंद्र के दिव्य सारथि मातलि से कहा — 'आज मेरे रथ को हुंड के सम्मुख ले चलिए।'

श्लोक 10 (padma.2.115.10)

इत्युक्तस्तेन वीरेण मातलिर्लघुविक्रमः । तुरगांश्चोदयामास महावातजवोपमान्

ityuktastena vīreṇa mātalirlaghuvikramaḥ turagāṁścodayāmāsa mahāvātajavopamān

उस वीर के यह कहने पर, अत्यंत फुर्तीला मातलि, महावायु के वेग के समान उन घोड़ों को हाँकने लगा।

श्लोक 11 (padma.2.115.11)

उत्पेतुश्च ततो वाहा हंसा इव यथांबरे । छत्रेण इंदुवर्णेन रथेनापि पताकिना

utpetuśca tato vāhā haṁsā iva yathāṁbare chatreṇa iṁduvarṇena rathenāpi patākinā

तब वे घोड़े, चंद्रमा-सी श्वेत छत्र और पताकाओं से युक्त रथ सहित, आकाश में हंसों की भाँति उड़ चले।

श्लोक 12 (padma.2.115.12)

नभस्तलं तु संप्राप्य यथा सूर्यो विराजते । आयुपुत्रस्तथा संख्ये तेजसा विक्रमेण तु

nabhastalaṁ tu saṁprāpya yathā sūryo virājate āyuputrastathā saṁkhye tejasā vikrameṇa tu

आकाश में पहुँचकर वह जैसे सूर्य देदीप्यमान होता है, वैसे ही आयु-पुत्र भी उस संग्राम में तेज और पराक्रम से देदीप्यमान हो रहा था।

श्लोक 13 (padma.2.115.13)

अथ हुंडो रथस्थोऽपि राजमानः स्वतेजसा । सर्वायुधैश्च संयुक्तस्तद्वद्वीरव्रते स्थितः

atha huṁḍo rathastho'pi rājamānaḥ svatejasā sarvāyudhaiśca saṁyuktastadvadvīravrate sthitaḥ

इधर हुंड भी अपने रथ पर सवार, अपने ही तेज से देदीप्यमान, समस्त शस्त्रों से सुसज्जित, वैसे ही वीर-व्रत में स्थित था।

श्लोक 14 (padma.2.115.14)

उभयोर्वीरयोर्युद्धं देवविस्मयकारकम् । तदा आसीन्महाप्राज्ञ दारुणं भीतिदायकम्

ubhayorvīrayoryuddhaṁ devavismayakārakam tadā āsīnmahāprājña dāruṇaṁ bhītidāyakam

हे महाबुद्धिमान्! उन दोनों वीरों का वह युद्ध देवताओं को भी विस्मित कर देने वाला, अत्यंत भयंकर और भयदायक हो उठा।

श्लोक 15 (padma.2.115.15)

सुबाणैर्निशितैस्तीक्ष्णैः कंकपत्रैः शिलीमुखैः । हुंडेन ताडितो राजा सुबाह्वोरंतरे तदा

subāṇairniśitaistīkṣṇaiḥ kaṁkapatraiḥ śilīmukhaiḥ huṁḍena tāḍito rājā subāhvoraṁtare tadā

तीक्ष्ण, बगुले के पंखों वाले, नुकीले बाणों से हुंड ने उस राजा को दोनों भुजाओं के बीच में आघात पहुँचाया।

श्लोक 16 (padma.2.115.16)

सुभाले पंचभिर्बाणैर्विद्धः क्रुद्धोऽभवत्तदा । सविद्धस्तु तदा बाणैरधिकं शुशुभे नृपः

subhāle paṁcabhirbāṇairviddhaḥ kruddho'bhavattadā saviddhastu tadā bāṇairadhikaṁ śuśubhe nṛpaḥ

पाँच बाणों से उसके ललाट को भी बींध दिया गया, जिससे वह क्रुद्ध हो उठा। बाणों से बिंधा हुआ वह राजा और भी अधिक सुशोभित हो उठा —

श्लोक 17 (padma.2.115.17)

सारुणः करमालाभिरुदयंश्च दिवाकरः । रुधिरेण तु दिग्धांगो हेमबाणैस्तनुस्थितैः

sāruṇaḥ karamālābhirudayaṁśca divākaraḥ rudhireṇa tu digdhāṁgo hemabāṇaistanusthitaiḥ

— मानो रक्तवर्ण किरणों-सी मालाओं से उदित होता हुआ सूर्य ही हो; रक्त से रँगे अंगों वाला, अपने शरीर में लगे स्वर्ण-बाणों सहित —

श्लोक 18 (padma.2.115.18)

सूर्यवच्छोभते राजा पूर्वकालस्य चांबरे । दृष्ट्वा तु पौरुषं तस्य दानवं वाक्यमब्रवीत्

sūryavacchobhate rājā pūrvakālasya cāṁbare dṛṣṭvā tu pauruṣaṁ tasya dānavaṁ vākyamabravīt

वह राजा उदयकालीन आकाश में सूर्य की भाँति देदीप्यमान हो रहा था। उसके इस पराक्रम को देखकर उसने उस दानव से कहा —

श्लोक 19 (padma.2.115.19)

तिष्ठतिष्ठ क्षणं दैत्य पश्य मे लाघवं पुनः । इत्युक्त्वा तु रणे दैत्यं जघान दशभिः शरैः

tiṣṭhatiṣṭha kṣaṇaṁ daitya paśya me lāghavaṁ punaḥ ityuktvā tu raṇe daityaṁ jaghāna daśabhiḥ śaraiḥ

'ठहरो, ठहरो, क्षणभर, हे दैत्य! मेरी फुर्ती को फिर से देखो।' ऐसा कहकर उसने युद्ध में उस दैत्य को दस बाणों से मारा।

श्लोक 20 (padma.2.115.20)

मुखे भाले हतस्तेन मूर्च्छितो निपपात ह । पश्यामानैः सुरैर्दिव्यै रथोपरि महाबलः

mukhe bhāle hatastena mūrcchito nipapāta ha paśyāmānaiḥ surairdivyai rathopari mahābalaḥ

मुख और ललाट पर आहत होकर वह मूर्च्छित हो अपने रथ पर ही गिर पड़ा — उस महाबली को दिव्य देवगण देखते ही रहे।

श्लोक 21 (padma.2.115.21)

देवैश्च चारणैः सिद्धैः कृतः शब्दः सुहर्षजः । जयजयेति राजेंद्र शंखान्दध्मुः पुनः पुनः

devaiśca cāraṇaiḥ siddhaiḥ kṛtaḥ śabdaḥ suharṣajaḥ jayajayeti rājeṁdra śaṁkhāndadhmuḥ punaḥ punaḥ

देवताओं, चारणों और सिद्धों ने अत्यंत हर्षपूर्ण ध्वनि की — 'जय हो, जय हो हे राजेंद्र!' — बार-बार शंख बजाए गए।

श्लोक 22 (padma.2.115.22)

सकोलाहलशब्दस्तु तुमलो देवतेरितः । कर्णरंध्रमाविवेश हुंडस्य मूर्छितस्य च

sakolāhalaśabdastu tumalo devateritaḥ karṇaraṁdhramāviveśa huṁḍasya mūrchitasya ca

वह देवताओं से उठा हुआ कोलाहल का महान् शब्द मूर्च्छित हुए हुंड के कानों में भी प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 23 (padma.2.115.23)

श्रुत्वा सधनुरादाय बाणमाशीविषोपमम् । स्थीयतां स्थीयतां युद्धे न मृतोस्मि त्वया हतः

śrutvā sadhanurādāya bāṇamāśīviṣopamam sthīyatāṁ sthīyatāṁ yuddhe na mṛtosmi tvayā hataḥ

उसे सुनकर, धनुष और आशीविष-सम बाण लेकर वह उठ गया — 'रुको, रुको युद्ध में! मैं तुम्हारे मारने से मरा नहीं हूँ।'

श्लोक 24 (padma.2.115.24)

इत्युक्त्वा पुनरुत्थाय लाघवेन समन्वितः । एकविंशतिभिर्बाणैर्नहुषं चाहनत्पुनः

ityuktvā punarutthāya lāghavena samanvitaḥ ekaviṁśatibhirbāṇairnahuṣaṁ cāhanatpunaḥ

ऐसा कहकर वह फिर से फुर्तीले ढंग से उठा, और इक्कीस बाणों से उसने नहुष पर फिर से प्रहार किया।

श्लोक 25 (padma.2.115.25)

एकेन मुष्टिमध्ये तु चतुर्भिर्बाहुमध्यतः । चतुर्भिश्च महाश्वांश्च छत्रमेकेन तेन वै

ekena muṣṭimadhye tu caturbhirbāhumadhyataḥ caturbhiśca mahāśvāṁśca chatramekena tena vai

एक से मुट्ठी के बीच, चार से भुजाओं के बीच, चार से उत्तम घोड़ों को, और एक से उसके छत्र को —

श्लोक 26 (padma.2.115.26)

पंचभिर्मातलिं विद्ध्वा रथनीडं तु सप्तभिः । ध्वजदंडं त्रिभिस्तीक्ष्णैर्दानवः शिखिपत्रिभिः

paṁcabhirmātaliṁ viddhvā rathanīḍaṁ tu saptabhiḥ dhvajadaṁḍaṁ tribhistīkṣṇairdānavaḥ śikhipatribhiḥ

पाँच से मातलि को बींधकर, सात से रथ के आसन को, तीन तीखे मयूरपंख वाले बाणों से उस दानव ने ध्वजदंड को —

श्लोक 27 (padma.2.115.27)

आदानं तु निदानं तु लक्षमोक्षं दुरात्मनः । लाघवं तस्य संदृष्ट्वा देवता विस्मयंगताः

ādānaṁ tu nidānaṁ tu lakṣamokṣaṁ durātmanaḥ lāghavaṁ tasya saṁdṛṣṭvā devatā vismayaṁgatāḥ

— उस दुरात्मा के आदान-निदान और लक्ष्य-भेदन की इस फुर्ती को देखकर देवता भी चकित रह गए।

श्लोक 28 (padma.2.115.28)

तस्य पौरुषमापश्य स राजा दानवोत्तमम् । शूरोसि कृतविद्योसि धीरोसि रणपंडितः

tasya pauruṣamāpaśya sa rājā dānavottamam śūrosi kṛtavidyosi dhīrosi raṇapaṁḍitaḥ

उस दानवश्रेष्ठ के इस पराक्रम को देखकर वह राजा बोला — 'तुम शूरवीर हो, विद्या-संपन्न हो, धैर्यवान् हो, युद्ध में निपुण हो।'

श्लोक 29 (padma.2.115.29)

इत्युक्वा दानवं तं तु धनुर्विस्फार्य भूपतिः । मार्गणैर्दशभिस्तं तु विव्याध लघुविक्रमः

ityukvā dānavaṁ taṁ tu dhanurvisphārya bhūpatiḥ mārgaṇairdaśabhistaṁ tu vivyādha laghuvikramaḥ

इतना कहकर उस दानव से, वह भूपति धनुष खींचकर, फुर्तीले पराक्रम से दस बाणों से उसे बींध दिया।

श्लोक 30 (padma.2.115.30)

त्रिभिर्ध्वजं प्रचिच्छेद स पपात धरातले । तुरगान्पातयामास चतुर्भिस्तस्य सायकैः

tribhirdhvajaṁ praciccheda sa papāta dharātale turagānpātayāmāsa caturbhistasya sāyakaiḥ

तीन से उसकी ध्वजा काट दी, जो धरती पर गिर पड़ी; और चार बाणों से उसके घोड़ों को भी गिरा दिया।

श्लोक 31 (padma.2.115.31)

एकेन छत्रं तस्यापि चकर्त लघुविक्रमः । दशभिः सारथिस्तस्य प्रेषितो यममंदिरम्

ekena chatraṁ tasyāpi cakarta laghuvikramaḥ daśabhiḥ sārathistasya preṣito yamamaṁdiram

एक से उस फुर्तीले पराक्रमी ने उसका छत्र भी काट डाला; और दस बाणों से उसके सारथि को यमलोक भेज दिया।

श्लोक 32 (padma.2.115.32)

दंशनं दशभिश्छित्त्वा शरैश्च विदलीकृतः । सर्वांगेषु च त्रिंशद्भिर्विव्याध दनुजेश्वरम्

daṁśanaṁ daśabhiśchittvā śaraiśca vidalīkṛtaḥ sarvāṁgeṣu ca triṁśadbhirvivyādha danujeśvaram

दस बाणों से उसका कवच काटकर उसे छिन्न-भिन्न कर दिया, और तीस बाणों से उस दानवेश्वर के समस्त अंगों को बींध दिया।

श्लोक 33 (padma.2.115.33)

हताश्वो विरथो जातो बाणपाणिर्धनुर्धरः । अभ्यधावत्स वेगेन वर्षयन्निशितैः शरैः

hatāśvo viratho jāto bāṇapāṇirdhanurdharaḥ abhyadhāvatsa vegena varṣayanniśitaiḥ śaraiḥ

अपने घोड़ों को खोकर, रथहीन हो चुका वह, बाण और धनुष हाथ में लिए, तीक्ष्ण बाणों की वर्षा करता हुआ वेग से दौड़ पड़ा।

श्लोक 34 (padma.2.115.34)

खड्गचर्मधरो दैत्यो राजानं तमधावत । धावमानस्य हुंडस्य खड्गं चिच्छेद भूपतिः

khaḍgacarmadharo daityo rājānaṁ tamadhāvata dhāvamānasya huṁḍasya khaḍgaṁ ciccheda bhūpatiḥ

तलवार और ढाल धारण किए वह दैत्य उस राजा की ओर दौड़ा। दौड़ते हुए हुंड की उस तलवार को भूपति ने काट डाला।

श्लोक 35 (padma.2.115.35)

क्षुरप्रैर्निशितैर्बाणैश्चर्म चिच्छेद भूपतिः । अथ हुंडः स दुष्टात्मा समालोक्य समंततः

kṣuraprairniśitairbāṇaiścarma ciccheda bhūpatiḥ atha huṁḍaḥ sa duṣṭātmā samālokya samaṁtataḥ

तीक्ष्ण, अर्धचंद्राकार बाणों से भूपति ने उसकी ढाल को भी काट डाला। तब वह दुष्टात्मा हुंड चारों ओर देखकर —

श्लोक 36 (padma.2.115.36)

जग्राह मुद्गरं तूर्णं मुमोच लघुविक्रमः । वज्रवेगं समायांतं ददृशे नृपतिस्तदा

jagrāha mudgaraṁ tūrṇaṁ mumoca laghuvikramaḥ vajravegaṁ samāyāṁtaṁ dadṛśe nṛpatistadā

शीघ्रता से एक मुद्गर (गदा) उठा लिया और उस फुर्तीले पराक्रमी ने उसे छोड़ दिया। उस राजा ने उसे वज्र के वेग से आते देखा,

श्लोक 37 (padma.2.115.37)

मुद्गरं स्वनवंतं चापातयदंबरात्ततः । दशभिर्निशितैर्बाणैः क्षुरप्रैश्च स्वविक्रमात्

mudgaraṁ svanavaṁtaṁ cāpātayadaṁbarāttataḥ daśabhirniśitairbāṇaiḥ kṣurapraiśca svavikramāt

और उस गरजती हुई गदा को आकाश में ही गिरा दिया — दस तीक्ष्ण बाणों और अर्धचंद्राकार बाणों से, अपने ही पराक्रम से।

श्लोक 38 (padma.2.115.38)

मुद्गरं पतितं दृष्ट्वा दशखण्डमयं भुवि । गदामुद्यम्य वेगेन राजानमभ्यधावत

mudgaraṁ patitaṁ dṛṣṭvā daśakhaṇḍamayaṁ bhuvi gadāmudyamya vegena rājānamabhyadhāvata

अपनी गदा को भूमि पर दस टुकड़ों में गिरा हुआ देखकर, वह वेगपूर्वक गदा उठाकर उस राजा की ओर दौड़ा।

श्लोक 39 (padma.2.115.39)

खड्गेन तीक्ष्णधारेण तस्य बाहुं विचिच्छिदे । सगदं पतितं भूमौ सांगदं कटकान्वितम्

khaḍgena tīkṣṇadhāreṇa tasya bāhuṁ vicicchide sagadaṁ patitaṁ bhūmau sāṁgadaṁ kaṭakānvitam

तीक्ष्ण धार वाली तलवार से (राजा ने) उसकी भुजा को काट डाला, गदा सहित, कड़े और भुजबंद सहित वह भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 40 (padma.2.115.40)

महारावं ततः कृत्वा वज्रस्फोटसमं तदा । रुधिरेणापि दिग्धांगो धावमानो महाहवे

mahārāvaṁ tataḥ kṛtvā vajrasphoṭasamaṁ tadā rudhireṇāpi digdhāṁgo dhāvamāno mahāhave

तब वज्र के गिरने जैसा एक महान् चीत्कार करके, रक्त से लथपथ अंगों वाला वह उस महासंग्राम में दौड़ पड़ा।

श्लोक 41 (padma.2.115.41)

क्रोधेन महताविष्टो ग्रस्तुमिच्छति भूपतिम् । दुर्निवार्यः समायातः पार्श्वं तस्य च भूपतेः

krodhena mahatāviṣṭo grastumicchati bhūpatim durnivāryaḥ samāyātaḥ pārśvaṁ tasya ca bhūpateḥ

क्रोध से अत्यंत भरा हुआ वह उस भूपति को निगल जाना चाहता था; असंभाव्य वेग से आकर वह उस राजा के पास पहुँच गया।

श्लोक 42 (padma.2.115.42)

नहुषेण महाशक्त्या ताडितो हृदि दानवः । पतितः सहसा भूमौ वज्राहत इवाचलः

nahuṣeṇa mahāśaktyā tāḍito hṛdi dānavaḥ patitaḥ sahasā bhūmau vajrāhata ivācalaḥ

नहुष ने अपनी महाशक्ति से उस दानव को हृदय में आघात पहुँचाया — वह तत्काल भूमि पर गिर पड़ा, जैसे वज्र से आहत कोई पर्वत गिरता है।

श्लोक 43 (padma.2.115.43)

तस्मिन्दैत्ये गते भूमावितरे दानवा गताः । विविशुः कति दुर्गेषु कति पातालमाश्रिताः

tasmindaitye gate bhūmāvitare dānavā gatāḥ viviśuḥ kati durgeṣu kati pātālamāśritāḥ

उस दैत्य के भूमि पर गिरते ही, शेष सारे दानव वहाँ से भाग गए — कुछ दुर्गम स्थानों में जा छिपे, कुछ पाताल का आश्रय ले गए।

श्लोक 44 (padma.2.115.44)

देवाः प्रहर्षमाजग्मुर्गंधर्वाः सिद्धचारणाः । हते तस्मिन्महापापे नहुषेण महात्मना

devāḥ praharṣamājagmurgaṁdharvāḥ siddhacāraṇāḥ hate tasminmahāpāpe nahuṣeṇa mahātmanā

उस महापापी के, महात्मा नहुष द्वारा मारे जाने पर, देवता, गंधर्व, सिद्ध और चारण सभी अत्यंत प्रसन्न हो उठे।

श्लोक 45 (padma.2.115.45)

तस्मिन्हते दैत्यवरे महाहवे देवाश्च सर्वे प्रमुदं प्रलेभिरे । तां देवरूपां तपसा प्रवर्द्धितां स आयुपुत्रः प्रतिलभ्य हर्षितः

tasminhate daityavare mahāhave devāśca sarve pramudaṁ pralebhire tāṁ devarūpāṁ tapasā pravarddhitāṁ sa āyuputraḥ pratilabhya harṣitaḥ

उस श्रेष्ठ दैत्य के उस महासंग्राम में मारे जाने पर, समस्त देवता आनंद से भर उठे; और वह आयु-पुत्र, अपनी उस देवरूपिणी, तप से महिमामंडित पत्नी को पुनः प्राप्त करके, हर्षित हो उठा।

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