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भूमि खण्ड · अध्याय 117

नहुष का राज्याभिषेक और आयु का स्वर्गारोहण

अध्याय 116अध्याय-सूचीअध्याय 118

श्लोक 1 (padma.2.117.1)

कुंजल उवाच । नहुषः प्रियया सार्द्धं तया चैव सरंभया । ऐंद्रेणापि स दिव्येन स्यंदनेन वरेण च

kuṁjala uvāca nahuṣaḥ priyayā sārddhaṁ tayā caiva saraṁbhayā aiṁdreṇāpi sa divyena syaṁdanena vareṇa ca

कुंजल ने कहा — नहुष अपनी प्रिय पत्नी और उस रंभा सहित, इंद्र के उसी दिव्य श्रेष्ठ रथ पर सवार होकर,

श्लोक 2 (padma.2.117.2)

नागाह्वयं पुरं प्राप्तः सर्वशोभासमन्वितम् । दिव्यैर्मंगलकैर्युक्तं भवनैरुपशोभितम्

nāgāhvayaṁ puraṁ prāptaḥ sarvaśobhāsamanvitam divyairmaṁgalakairyuktaṁ bhavanairupaśobhitam

नागाह्वय नामक श्रेष्ठ नगर में पहुँचा, जो सर्वप्रकार की शोभा से युक्त, दिव्य मंगलचिह्नों से युक्त और भवनों से सुशोभित था।

श्लोक 3 (padma.2.117.3)

हेमतोरणसंयुक्तं पताकाभिरलंकृतम् । नानावादित्रनादैश्च बंदिचारणशोभितम्

hematoraṇasaṁyuktaṁ patākābhiralaṁkṛtam nānāvāditranādaiśca baṁdicāraṇaśobhitam

सुवर्ण के तोरणों से युक्त, पताकाओं से अलंकृत, नाना वाद्यों की ध्वनि से गूँजता, बंदीजनों और चारणों से शोभित —

श्लोक 4 (padma.2.117.4)

देवरूपोपमैः पुण्यैः पुरुषैः समलंकृतम् । नारीभिर्दिव्यरूपाभिर्गजाश्वैः स्यंदनैस्तथा

devarūpopamaiḥ puṇyaiḥ puruṣaiḥ samalaṁkṛtam nārībhirdivyarūpābhirgajāśvaiḥ syaṁdanaistathā

— देवतुल्य पुण्यशाली पुरुषों से सुसज्जित, दिव्यरूपा नारियों से, तथा हाथी-घोड़ों और रथों से भी सुसज्जित,

श्लोक 5 (padma.2.117.5)

नानामंगलशब्दैश्च वेदध्वनिसमाकुलम् । गीतवादित्रशब्दैश्च वीणावेणुस्वनैस्ततः

nānāmaṁgalaśabdaiśca vedadhvanisamākulam gītavāditraśabdaiśca vīṇāveṇusvanaistataḥ

नाना मंगल-ध्वनियों और वेद-मंत्रों के घोष से व्याप्त, गीत-वाद्यों की ध्वनि से, वीणा और वंशी के स्वरों से गूँजता —

श्लोक 6 (padma.2.117.6)

सर्वशोभासमाकीर्णं विवेश स पुरोत्तमम् । वेदमंगलघोषैश्च ब्राह्मणैश्चैव पूजितः

sarvaśobhāsamākīrṇaṁ viveśa sa purottamam vedamaṁgalaghoṣaiśca brāhmaṇaiścaiva pūjitaḥ

— समस्त शोभा से व्याप्त उस श्रेष्ठ नगर में उसने प्रवेश किया, और वेदमंत्रों के मंगल-घोष के साथ ब्राह्मणों द्वारा पूजित हुआ।

श्लोक 7 (padma.2.117.7)

ददृशे पितरं वीरो मातरं च सुपुण्यकाम् । हर्षेण महताविष्टः पितुः पादौ ननाम सः

dadṛśe pitaraṁ vīro mātaraṁ ca supuṇyakām harṣeṇa mahatāviṣṭaḥ pituḥ pādau nanāma saḥ

उस वीर ने अपने पिता और पुण्यशालिनी माता को देखा। अत्यंत हर्ष से भरकर उसने पिता के चरणों में प्रणाम किया।

श्लोक 8 (padma.2.117.8)

अशोकसुंदरी सा तु तयोः पादौ पुनः पुनः । ननाम भक्त्या भावेन उभयोः सा वरानना

aśokasuṁdarī sā tu tayoḥ pādau punaḥ punaḥ nanāma bhaktyā bhāvena ubhayoḥ sā varānanā

वह श्रेष्ठमुखी अशोकसुंदरी भी उन दोनों के चरणों में भक्तिभाव से बार-बार प्रणाम करती रही।

श्लोक 9 (padma.2.117.9)

रंभा च सा ननामाथ प्रीतिं चैवाप्यदर्शयत् । नमस्कृत्वा समाभाष्य स्वगुरुं नृपनंदनः

raṁbhā ca sā nanāmātha prītiṁ caivāpyadarśayat namaskṛtvā samābhāṣya svaguruṁ nṛpanaṁdanaḥ

रंभा ने भी प्रणाम किया और अपना स्नेह प्रकट किया। उस राजपुत्र ने अपने गुरुजनों को नमस्कार करके, उनसे बातचीत करते हुए,

श्लोक 10 (padma.2.117.10)

अनामयं च पप्रच्छ मातरं पितरं प्रति । एवमुक्तो महाभागः सानंदपुलकोद्गमः

anāmayaṁ ca papraccha mātaraṁ pitaraṁ prati evamukto mahābhāgaḥ sānaṁdapulakodgamaḥ

अपनी माता और पिता का कुशल-क्षेम पूछा। इस प्रकार पूछे जाने पर, वह महाभाग्यशाली, हर्ष से रोमांचित होकर बोले —

श्लोक 11 (padma.2.117.11)

आयुरुवाच । अद्यैव व्याधयो नष्टा दुःखशोकावुभौ गतौ । भवतो दर्शनात्पुत्र सुतुष्ट्या हृष्यते जगत्

āyuruvāca adyaiva vyādhayo naṣṭā duḥkhaśokāvubhau gatau bhavato darśanātputra sutuṣṭyā hṛṣyate jagat

आयु ने कहा — 'आज ही मेरी सारी व्याधियाँ नष्ट हो गईं, दोनों दुःख और शोक चले गए। हे पुत्र! तुम्हारे दर्शन से समस्त जगत् संतोष से हर्षित हो उठा है।'

श्लोक 12 (padma.2.117.12)

कृतकृत्योस्मि संजातस्त्वयि जाते महौजसि । स्ववंशोद्धरणं कृत्वा अहमेव समुद्धृतः

kṛtakṛtyosmi saṁjātastvayi jāte mahaujasi svavaṁśoddharaṇaṁ kṛtvā ahameva samuddhṛtaḥ

'तुम्हारे इस महातेजस्वी रूप में उत्पन्न होने से मैं कृतकृत्य हो गया हूँ। अपने वंश का उद्धार करके, मैं भी स्वयं उद्धृत हो गया हूँ।'

श्लोक 13 (padma.2.117.13)

इंदुमत्युवाच । पर्वणि प्राप्य इंदोस्तु तेजो दृष्ट्वा महोदधिः । वृद्धिं याति महाभाग तथाहं तव दर्शनात्

iṁdumatyuvāca parvaṇi prāpya iṁdostu tejo dṛṣṭvā mahodadhiḥ vṛddhiṁ yāti mahābhāga tathāhaṁ tava darśanāt

इंदुमती ने कहा — 'हे महाभाग! जैसे पूर्णिमा को चंद्रमा का तेज देखकर महासागर उमड़ पड़ता है, वैसे ही तुम्हें देखकर मैं भी उमड़ पड़ी हूँ।'

श्लोक 14 (padma.2.117.14)

वर्द्धितास्मि सुहृष्टास्मि आनंदेन समाकुला । दर्शनात्ते महाप्राज्ञ धन्या जातास्मि मानद

varddhitāsmi suhṛṣṭāsmi ānaṁdena samākulā darśanātte mahāprājña dhanyā jātāsmi mānada

'मैं बढ़ गई हूँ, अत्यंत प्रसन्न हूँ, आनंद से पूरित हूँ। हे महाबुद्धिमान्! तुम्हारे दर्शन से, हे मानप्रद, मैं धन्य हो गई हूँ।'

श्लोक 15 (padma.2.117.15)

एवं संभाष्य तं पुत्रमालिंग्य तनयोत्तमम् । शिरश्चाघ्राय तस्यापि वत्सं धेनुर्यथा स्वकम्

evaṁ saṁbhāṣya taṁ putramāliṁgya tanayottamam śiraścāghrāya tasyāpi vatsaṁ dhenuryathā svakam

इस प्रकार अपने उस श्रेष्ठ पुत्र से बातचीत करके, उसे गले लगाकर, उसका सिर सूँघते हुए — जैसे गाय अपने बछड़े का सूँघती है,

श्लोक 16 (padma.2.117.16)

अभिनंद्य सुतं प्राप्तं नहुषं देवरूपिणम् । आशीर्भिश्चार्चयद्देवी पुण्या इंदुमती तदा

abhinaṁdya sutaṁ prāptaṁ nahuṣaṁ devarūpiṇam āśīrbhiścārcayaddevī puṇyā iṁdumatī tadā

— देवरूपधारी अपने प्राप्त हुए पुत्र नहुष का अभिनंदन करके, वह पुण्यशालिनी देवी इंदुमती आशीर्वादों से उसकी पूजा करने लगी।

श्लोक 17 (padma.2.117.17)

सूत उवाच । अथासौ मातरं पुण्यां देवीमिंदुमतीं सुतः । कथयामास वृत्तांतं यथाहरणमात्मनः

sūta uvāca athāsau mātaraṁ puṇyāṁ devīmiṁdumatīṁ sutaḥ kathayāmāsa vṛttāṁtaṁ yathāharaṇamātmanaḥ

सूत ने कहा — तब उस पुत्र ने अपनी पुण्यशालिनी माता, देवी इंदुमती को, अपने हरण का सारा वृत्तांत कह सुनाया —

श्लोक 18 (padma.2.117.18)

स्वभार्यायास्तथोत्पत्तिं प्राप्तिं चैव महायशाः । हुंडेनापि यथा युद्धं हुंडस्यापि निपातनम्

svabhāryāyāstathotpattiṁ prāptiṁ caiva mahāyaśāḥ huṁḍenāpi yathā yuddhaṁ huṁḍasyāpi nipātanam

अपनी पत्नी की उत्पत्ति और प्राप्ति का वृत्तांत भी, उस महायशस्वी ने; और हुंड के साथ जो युद्ध हुआ, तथा हुंड का जो पतन हुआ, वह भी।

श्लोक 19 (padma.2.117.19)

समासेन समस्तं तदाख्यातं स्वयमेव हि । मातापित्रोर्यथा वृत्तं तयोरानंददायकम्

samāsena samastaṁ tadākhyātaṁ svayameva hi mātāpitroryathā vṛttaṁ tayorānaṁdadāyakam

उसने स्वयं ही संक्षेप में यह सब कह दिया, जो उसके माता-पिता के लिए आनंददायक वृत्तांत था।

श्लोक 20 (padma.2.117.20)

मातापितरावाकर्ण्य पुत्रस्य विक्रमोद्यमम् । हर्षेण महताविष्टौ संजातौ पूर्णमानसौ

mātāpitarāvākarṇya putrasya vikramodyamam harṣeṇa mahatāviṣṭau saṁjātau pūrṇamānasau

अपने पुत्र के इस पराक्रम और उद्यम को सुनकर, माता-पिता दोनों अत्यंत हर्ष से भरकर, पूर्ण मन वाले हो गए।

श्लोक 21 (padma.2.117.21)

नहुषो धनुरादाय इंद्रस्य स्यंदनेन वै । जिगाय पृथिवीं सर्वां सप्तद्वीपां सपत्तनाम्

nahuṣo dhanurādāya iṁdrasya syaṁdanena vai jigāya pṛthivīṁ sarvāṁ saptadvīpāṁ sapattanām

नहुष ने धनुष उठाकर, इंद्र के उसी रथ से, सातों द्वीपों और नगरों सहित समस्त पृथ्वी को जीत लिया।

श्लोक 22 (padma.2.117.22)

पित्रे समर्पयामास वसुपूर्णां वसुंधराम् । पितरं हर्षयन्नित्यं दानधर्मैः सुकर्मभिः

pitre samarpayāmāsa vasupūrṇāṁ vasuṁdharām pitaraṁ harṣayannityaṁ dānadharmaiḥ sukarmabhiḥ

धन-धान्य से परिपूर्ण उस पृथ्वी को उसने अपने पिता को अर्पित कर दिया, और दान-धर्म तथा उत्तम कर्मों से नित्य अपने पिता को प्रसन्न करता रहा।

श्लोक 23 (padma.2.117.23)

पितरं याजयामास राजसूयादिभिस्तदा । महायज्ञैश्च दानैश्च व्रतैर्नियमसंयमैः

pitaraṁ yājayāmāsa rājasūyādibhistadā mahāyajñaiśca dānaiśca vratairniyamasaṁyamaiḥ

तब उसने अपने पिता से राजसूय आदि यज्ञ कराए — महायज्ञों, दानों, व्रतों, नियमों और संयमों के साथ।

श्लोक 24 (padma.2.117.24)

सुदानैर्यशसा पुण्यैर्यज्ञैः पुण्यमहोदयैः । सुसंपूर्णौ कृतौ तौ तु पितरौ चायुसूनुना

sudānairyaśasā puṇyairyajñaiḥ puṇyamahodayaiḥ susaṁpūrṇau kṛtau tau tu pitarau cāyusūnunā

उत्तम दान, यश, पुण्य और पुण्यमय महान् यज्ञों के द्वारा, आयु के उस पुत्र ने अपने माता-पिता को सर्वथा संपूर्ण (कृतार्थ) कर दिया।

श्लोक 25 (padma.2.117.25)

अथ देवाः समागत्य नागाह्वयं पुरोत्तमम् । अभ्यषिंचन्महात्मानं नहुषं वीरमर्दनम्

atha devāḥ samāgatya nāgāhvayaṁ purottamam abhyaṣiṁcanmahātmānaṁ nahuṣaṁ vīramardanam

तब देवतागण उस श्रेष्ठ नगर नागाह्वय में स्वयं आकर, उस महात्मा, वीरों के दमनकारी नहुष का अभिषेक करने लगे।

श्लोक 26 (padma.2.117.26)

मुनिभिश्च सुसिद्धैश्च आयुना तेन भूभुजा । अभिषिंच्य स्वराज्ये तं समेतं शिवकन्यया

munibhiśca susiddhaiśca āyunā tena bhūbhujā abhiṣiṁcya svarājye taṁ sametaṁ śivakanyayā

मुनियों और सिद्धों के साथ, उस भूपति आयु ने भी उसे उसके अपने राज्य पर अभिषिक्त किया, शिव-कन्या सहित उपस्थित उसको।

श्लोक 27 (padma.2.117.27)

भार्यायुक्तः स्वकायेन आयु राजा महायशाः । दिवं जगाम धर्मात्मा देवैः सिद्धैः सुपूजितः

bhāryāyuktaḥ svakāyena āyu rājā mahāyaśāḥ divaṁ jagāma dharmātmā devaiḥ siddhaiḥ supūjitaḥ

तब वह महायशस्वी, धर्मात्मा राजा आयु, अपने शरीर सहित अपनी पत्नी के साथ, देवताओं और सिद्धों द्वारा भलीभाँति पूजित होकर, स्वर्गलोक को चला गया।

श्लोक 28 (padma.2.117.28)

ऐंद्रं पदं परित्यज्य ब्रह्मलोकं गतः पुनः । हरलोकं जगामाथ मुनिभिर्देवपूजितः

aiṁdraṁ padaṁ parityajya brahmalokaṁ gataḥ punaḥ haralokaṁ jagāmātha munibhirdevapūjitaḥ

इंद्र के पद को भी त्यागकर वह फिर ब्रह्मलोक को चला गया; फिर मुनियों और देवताओं द्वारा पूजित होकर वह शिवलोक को गया।

श्लोक 29 (padma.2.117.29)

स्वकर्मभिर्महाराजः पुत्रस्यापि सुतेजसा । हरेर्लोकं गतः पुण्यैर्निवसत्येष भूपतिः

svakarmabhirmahārājaḥ putrasyāpi sutejasā harerlokaṁ gataḥ puṇyairnivasatyeṣa bhūpatiḥ

अपने ही कर्मों से, और अपने पुत्र के भी महातेज से, वह महाराज पुण्यों के बल पर हरि (विष्णु) के लोक को प्राप्त हुआ, और वहीं निवास कर रहा है।

श्लोक 30 (padma.2.117.30)

पुरुषैः पुण्यकर्माख्यैरीदृशं पुण्यमुत्तमम् । जनितव्यं महाभाग किमन्यैः शोककारकैः

puruṣaiḥ puṇyakarmākhyairīdṛśaṁ puṇyamuttamam janitavyaṁ mahābhāga kimanyaiḥ śokakārakaiḥ

पुण्यकर्म करने वाले पुरुषों के लिए ऐसा ही उत्तम पुण्य फलित होना चाहिए, हे महाभाग! शोक उत्पन्न करने वाले अन्य कर्मों से क्या लाभ?

श्लोक 31 (padma.2.117.31)

यथा जातः स धर्मात्मा नहुषः पितृतारकः । कुलस्य धर्त्ता सर्वस्य नहुषो ज्ञानपंडितः

yathā jātaḥ sa dharmātmā nahuṣaḥ pitṛtārakaḥ kulasya dharttā sarvasya nahuṣo jñānapaṁḍitaḥ

जैसे वह धर्मात्मा नहुष, पितरों का तारणहार, उत्पन्न हुआ — वही नहुष, ज्ञान में निपुण, समस्त कुल का धारक हुआ।

श्लोक 32 (padma.2.117.32)

एतत्ते सर्वमाख्यातं चरित्रं तस्य भूपतेः । अन्यत्किं ते प्रवक्ष्यामि वद पुत्र कपिंजल

etatte sarvamākhyātaṁ caritraṁ tasya bhūpateḥ anyatkiṁ te pravakṣyāmi vada putra kapiṁjala

यह सब उस भूपति का चरित्र मैंने तुम्हें कह सुनाया। हे पुत्र कपिंजल! अब और क्या कहूँ, बोलो।

श्लोक 33 (padma.2.117.33)

एवंविधं पुण्यमयं पवित्रं चरित्रमेतद्यशसा समेतम् । आयोः सुतस्यापि शृणोति मर्त्यो भोगान्स भुक्त्वैति पदं मुरारेः

evaṁvidhaṁ puṇyamayaṁ pavitraṁ caritrametadyaśasā sametam āyoḥ sutasyāpi śṛṇoti martyo bhogānsa bhuktvaiti padaṁ murāreḥ

इस प्रकार का यह पवित्र, पुण्यमय, यशयुक्त आयु-पुत्र का चरित्र जो भी मनुष्य सुनता है, वह समस्त भोगों को भोगकर अंततः मुरारि (विष्णु) के परमपद को प्राप्त होता है।

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