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भूमि खण्ड · अध्याय 120

स्वप्न पर नारद का प्रवचन

अध्याय 119अध्याय-सूचीअध्याय 121

श्लोक 1 (padma.2.120.1)

कुंजल उवाच । कामोदाख्यं पुरं दिव्यं सर्वदेवसमाकुलम् । सर्वकामसमृद्ध्यर्थमपश्यन्नारदस्ततः

kuṁjala uvāca kāmodākhyaṁ puraṁ divyaṁ sarvadevasamākulam sarvakāmasamṛddhyarthamapaśyannāradastataḥ

कुंजल ने कहा — नारद ने वह दिव्य नगर कामोदा को देखा, जो समस्त देवताओं से व्याप्त, समस्त कामनाओं की समृद्धि से युक्त था।

श्लोक 2 (padma.2.120.2)

कामोदाया गृहं प्राप्य प्रविवेश द्विजोत्तमः । कामोदां तु ततो दृष्ट्वा सर्वकामसमाकुलाम्

kāmodāyā gṛhaṁ prāpya praviveśa dvijottamaḥ kāmodāṁ tu tato dṛṣṭvā sarvakāmasamākulām

उस श्रेष्ठ द्विज ने कामोदा के घर पहुँचकर उसमें प्रवेश किया; फिर समस्त कामनाओं से घिरी कामोदा को देखा।

श्लोक 3 (padma.2.120.3)

तया संपूजितो विप्रः सुवाक्यैः स्वागतादिभिः । दिव्यासने समारूढस्तां पप्रच्छ द्विजोत्तमः

tayā saṁpūjito vipraḥ suvākyaiḥ svāgatādibhiḥ divyāsane samārūḍhastāṁ papraccha dvijottamaḥ

उसने स्वागत आदि उत्तम वचनों से उस विप्र की पूजा की। दिव्य आसन पर बैठकर, उस श्रेष्ठ द्विज ने उससे पूछा —

श्लोक 4 (padma.2.120.4)

सुखेन स्थीयते भद्रे विष्णुतेजः समुद्भवे । अनामयं च पप्रच्छ आशीर्भिरभिनंद्य ताम्

sukhena sthīyate bhadre viṣṇutejaḥ samudbhave anāmayaṁ ca papraccha āśīrbhirabhinaṁdya tām

'हे भद्रे! विष्णु के तेज से उत्पन्न हुई तुम सुखपूर्वक रहती हो न?' उसने आशीर्वाद देकर उसका कुशल-क्षेम भी पूछा।

श्लोक 5 (padma.2.120.5)

कामोदोवाच-। प्रसादाद्भवतां विष्णोः सुखेन वर्तयाम्यहम् । कथयस्व महाप्राज्ञ त्वं प्रश्नोत्तरकारणम्

kāmodovāca- prasādādbhavatāṁ viṣṇoḥ sukhena vartayāmyaham kathayasva mahāprājña tvaṁ praśnottarakāraṇam

कामोदा ने कहा — 'आप सब की और विष्णु की कृपा से मैं सुखपूर्वक रहती हूँ। हे महाबुद्धिमान्! मुझे बताइए, आप यह प्रश्न किस कारण पूछ रहे हैं?'

श्लोक 6 (padma.2.120.6)

महामोहः समुत्पन्नो ममांगे मुनिपुंगव । व्यापकः सर्वलोकानां ममांगे मतिनाशकः

mahāmohaḥ samutpanno mamāṁge munipuṁgava vyāpakaḥ sarvalokānāṁ mamāṁge matināśakaḥ

'हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे शरीर में एक बड़ा मोह उत्पन्न हो गया है — मेरे अंग-अंग में व्याप्त होकर, मेरी बुद्धि का नाश करने वाला।'

श्लोक 7 (padma.2.120.7)

तस्मान्निद्रा समुत्पन्ना यथा मर्त्येषु वर्तते । सुप्तया तु मया दृष्टः स्वप्नो वै दारुणो मुने

tasmānnidrā samutpannā yathā martyeṣu vartate suptayā tu mayā dṛṣṭaḥ svapno vai dāruṇo mune

'उसी से मुझे निद्रा आई, जैसे मनुष्यों में होती है। सोते हुए मुझे, हे मुनि, एक भयंकर स्वप्न दिखाई दिया।'

श्लोक 8 (padma.2.120.8)

केनाप्युक्तं समेत्यैव पुरतो द्विजसत्तम । अव्यक्तोऽसौ हृषीकेशः संसारं स गमिष्यति

kenāpyuktaṁ sametyaiva purato dvijasattama avyakto'sau hṛṣīkeśaḥ saṁsāraṁ sa gamiṣyati

'हे श्रेष्ठ द्विज! किसी ने मेरे समक्ष आकर मुझसे कहा — यह अव्यक्त हृषीकेश संसार-चक्र को प्राप्त होंगे।'

श्लोक 9 (padma.2.120.9)

तदा प्रभृति दुःखेन व्यापिताहं महामते । तन्मे त्वं कारणं ब्रूहि भवाञ्ज्ञानवतां वरः

tadā prabhṛti duḥkhena vyāpitāhaṁ mahāmate tanme tvaṁ kāraṇaṁ brūhi bhavāñjñānavatāṁ varaḥ

'हे बुद्धिमान्! तब से मैं दुःख से व्याप्त हूँ। ज्ञानियों में श्रेष्ठ आप ही मुझे इसका कारण बताइए।'

श्लोक 10 (padma.2.120.10)

नारद उवाच । वातिकः पैत्तिकश्चैव कफजः सान्निपातिकः । स्वप्नः प्रवर्तते भद्रे मानवेषु न संशयः

nārada uvāca vātikaḥ paittikaścaiva kaphajaḥ sānnipātikaḥ svapnaḥ pravartate bhadre mānaveṣu na saṁśayaḥ

नारद ने कहा — 'वातिक, पैत्तिक, कफज और सान्निपातिक — हे भद्रे! मनुष्यों में ऐसे ही स्वप्न होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 11 (padma.2.120.11)

न जायते च देवेषु स्वप्नो निद्रा च सुंदरि । आदित्योदयवेलायां दृश्यते स्वप्न उत्तमः

na jāyate ca deveṣu svapno nidrā ca suṁdari ādityodayavelāyāṁ dṛśyate svapna uttamaḥ

'हे सुंदरी! देवताओं में तो स्वप्न या निद्रा होती ही नहीं। सूर्योदय के समय जो स्वप्न दिखाई देता है, वह श्रेष्ठ होता है।'

श्लोक 12 (padma.2.120.12)

सत्स्वप्नो मानवानां हि पुण्यस्य फलदायकः । अन्यदेवं प्रवक्ष्यामि स्वप्नस्य कारणं शुभे

satsvapno mānavānāṁ hi puṇyasya phaladāyakaḥ anyadevaṁ pravakṣyāmi svapnasya kāraṇaṁ śubhe

'मनुष्यों का सच्चा स्वप्न पुण्य का फल देने वाला होता है। अब मैं तुम्हें कुछ और बताता हूँ — स्वप्न का कारण, हे शुभे!'

श्लोक 13 (padma.2.120.13)

महावातांदोलनैश्च चलंत्यापो वरानने । त्रुटंत्यंबुकणाः सूक्ष्मास्तस्मादुदकसंचयात्

mahāvātāṁdolanaiśca calaṁtyāpo varānane truṭaṁtyaṁbukaṇāḥ sūkṣmāstasmādudakasaṁcayāt

'हे वरानने! महावायु के हिलोरों से जल हिलता है; उसी जलराशि से सूक्ष्म जल-कण टूटकर बिखर जाते हैं,'

श्लोक 14 (padma.2.120.14)

बहिरेव पतंत्येते निर्मलांबुकणाः शुभे । पुनर्लयं प्रयांत्येते दृश्यादृश्या भवंति वै

bahireva pataṁtyete nirmalāṁbukaṇāḥ śubhe punarlayaṁ prayāṁtyete dṛśyādṛśyā bhavaṁti vai

'हे शुभे! वे निर्मल जल-कण बाहर गिर जाते हैं; फिर वे विलीन हो जाते हैं, कभी दिखते और कभी नहीं दिखते।'

श्लोक 15 (padma.2.120.15)

तद्वत्स्वप्नस्य वै भावः कथ्यते शृणु भामिनि । आत्मा शुद्धो विरक्तस्तु रागद्वेषविवर्जितः

tadvatsvapnasya vai bhāvaḥ kathyate śṛṇu bhāmini ātmā śuddho viraktastu rāgadveṣavivarjitaḥ

'हे भामिनी! उसी प्रकार स्वप्न की प्रकृति भी समझी जाती है, सुनो। आत्मा शुद्ध, विरक्त, राग-द्वेष से रहित है,'

श्लोक 16 (padma.2.120.16)

पंचभूतात्मकानां च मुषित्वैव सुनिश्चलः । षड्विंशतिसु तत्वानां मध्ये चैष विराजते

paṁcabhūtātmakānāṁ ca muṣitvaiva suniścalaḥ ṣaḍviṁśatisu tatvānāṁ madhye caiṣa virājate

'पंचमहाभूतों से मानो चुराकर ही अत्यंत निश्चल है; छब्बीस तत्त्वों के बीच वही विराजमान है।'

श्लोक 17 (padma.2.120.17)

शुद्धात्मा केवलो नित्यः प्रकृतेः संगतिं गतः । तद्भावैर्वायुरूपैश्च चलते स्थानतो यदा

śuddhātmā kevalo nityaḥ prakṛteḥ saṁgatiṁ gataḥ tadbhāvairvāyurūpaiśca calate sthānato yadā

'वह केवल शुद्ध आत्मा, नित्य, प्रकृति के संग को प्राप्त हुआ — जब उसके ही भावों से, वायु-रूप होकर, वह अपने स्थान से चलायमान होता है,'

श्लोक 18 (padma.2.120.18)

आत्मनस्तेजसश्चैव प्रतितेजः प्रजायते । अंतरात्मा शुभं नाम तस्य एव प्रकथ्यते

ātmanastejasaścaiva pratitejaḥ prajāyate aṁtarātmā śubhaṁ nāma tasya eva prakathyate

'— तब आत्मा के ही तेज से एक प्रतिबिंबित तेज उत्पन्न होता है। उसी को अंतरात्मा नाम से कहा जाता है।'

श्लोक 19 (padma.2.120.19)

पयसश्च यथा भिन्ना भवंत्यंबुकणाः शुभे । आत्मनस्तु तथा तेज अंतरात्मा प्रकथ्यते

payasaśca yathā bhinnā bhavaṁtyaṁbukaṇāḥ śubhe ātmanastu tathā teja aṁtarātmā prakathyate

'हे शुभे! जैसे जल से भिन्न-भिन्न जल-कण बन जाते हैं, वैसे ही आत्मा का वह तेज अंतरात्मा कहलाता है।'

श्लोक 20 (padma.2.120.20)

स हि पृथ्वी स वै वायुः स चाप्याकाश एव हि । स वै तोयं स दीप्येत एते पंच पुरा कृताः

sa hi pṛthvī sa vai vāyuḥ sa cāpyākāśa eva hi sa vai toyaṁ sa dīpyeta ete paṁca purā kṛtāḥ

'वही पृथ्वी है, वही वायु है, वही आकाश भी है; वही जल है, वही अग्नि भी होगा — ये पाँचों पहले बनाए गए,'

श्लोक 21 (padma.2.120.21)

आत्मनस्तेजसो भूता मलरूपा महात्मनः । तस्यापि संगतिं प्राप्ता एकत्वं हि प्रयांति ते

ātmanastejaso bhūtā malarūpā mahātmanaḥ tasyāpi saṁgatiṁ prāptā ekatvaṁ hi prayāṁti te

'महात्मा आत्मा के तेज से उत्पन्न, मल-रूप में। उसी के संग को प्राप्त होकर वे एकत्व को भी प्राप्त होते हैं।'

श्लोक 22 (padma.2.120.22)

स्वात्मभावप्रदोषेण नाशयंति वरानने । तत्पिंडमन्यमिच्छंति वारं वारं वरानने

svātmabhāvapradoṣeṇa nāśayaṁti varānane tatpiṁḍamanyamicchaṁti vāraṁ vāraṁ varānane

'हे वरानने! अपने ही स्वभाव के दोष से वे नष्ट हो जाते हैं; और हे वरानने! बार-बार वे किसी और शरीर की कामना करते हैं।'

श्लोक 23 (padma.2.120.23)

तेषां क्रीडाविहारोयं सृष्टिसंबंधकारणम् । उदकस्य तरंगस्तु जायते च विलीयते

teṣāṁ krīḍāvihāroyaṁ sṛṣṭisaṁbaṁdhakāraṇam udakasya taraṁgastu jāyate ca vilīyate

'उनकी यह क्रीड़ा और विहार ही सृष्टि के बंधन का कारण है। जैसे जल की एक लहर उठती है और विलीन हो जाती है,'

श्लोक 24 (padma.2.120.24)

पुनर्भूतिः पुनर्हानिस्तादृशस्य पुनः पुनः । अपां रूपस्य दृष्टांतं तद्वदेषां न संशयः

punarbhūtiḥ punarhānistādṛśasya punaḥ punaḥ apāṁ rūpasya dṛṣṭāṁtaṁ tadvadeṣāṁ na saṁśayaḥ

'फिर उत्पन्न होती है, फिर नष्ट होती है, इसी प्रकार बार-बार — जल के रूप का यह दृष्टांत उन्हीं पर भी लागू होता है, इसमें संशय नहीं।'

श्लोक 25 (padma.2.120.25)

आत्मा न नश्यते देवि तेजो वायुर्न नश्यति । न नश्यतो धराकाशौ न नश्यंत्याप एव च

ātmā na naśyate devi tejo vāyurna naśyati na naśyato dharākāśau na naśyaṁtyāpa eva ca

'हे देवी! आत्मा नष्ट नहीं होता, तेज और वायु नष्ट नहीं होते, पृथ्वी और आकाश नष्ट नहीं होते, और जल भी नष्ट नहीं होता।'

श्लोक 26 (padma.2.120.26)

पंचैव आत्मना सार्द्धं प्रभवंति प्रयांति च । आत्मादयो ह्यमी भद्रे नित्यरूपा न संशयः

paṁcaiva ātmanā sārddhaṁ prabhavaṁti prayāṁti ca ātmādayo hyamī bhadre nityarūpā na saṁśayaḥ

'ये पाँचों आत्मा के साथ ही उत्पन्न होते और मिलते-बिछुड़ते हैं; हे भद्रे! आत्मा आदि ये सब नित्य-स्वरूप हैं, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 27 (padma.2.120.27)

पिंड एव प्रणश्येत तेषां संजात एव च । विषयाणां सुदोषैः स रागद्वेषादिभिर्हतः

piṁḍa eva praṇaśyeta teṣāṁ saṁjāta eva ca viṣayāṇāṁ sudoṣaiḥ sa rāgadveṣādibhirhataḥ

'केवल शरीर (पिंड) ही नष्ट होता है, उन्हीं से उत्पन्न होकर — विषयों के भारी दोषों से, राग-द्वेष आदि से आहत होकर।'

श्लोक 28 (padma.2.120.28)

प्राणाः प्रयांति वै पिंडात्पंचपंचात्मका द्विज । पिंडांते वसते आत्मा प्रतिरूपस्तु तस्य च

prāṇāḥ prayāṁti vai piṁḍātpaṁcapaṁcātmakā dvija piṁḍāṁte vasate ātmā pratirūpastu tasya ca

'हे द्विज! पाँच-पाँच के स्वरूप वाले प्राण शरीर से निकल जाते हैं। शरीर के अंत में आत्मा अपने ही प्रतिरूप में वहीं रहता है।'

श्लोक 29 (padma.2.120.29)

अंतरात्मा यथा चाग्नेः स्फुलिंगस्तु प्रकाशते । तथा प्रकाशमायाति दृश्यादृश्यः प्रजायते

aṁtarātmā yathā cāgneḥ sphuliṁgastu prakāśate tathā prakāśamāyāti dṛśyādṛśyaḥ prajāyate

'जैसे अग्नि से एक चिनगारी प्रकट होती है, वैसे ही अंतरात्मा भी प्रकाशित होता है — कभी दिखता, कभी नहीं दिखता, ऐसा वह बन जाता है।'

श्लोक 30 (padma.2.120.30)

शुद्धात्मा च परं ब्रह्म सदा जागर्ति नित्यशः । अंतरात्मा प्रबद्धस्तु प्रकृतेश्च महागुणैः

śuddhātmā ca paraṁ brahma sadā jāgarti nityaśaḥ aṁtarātmā prabaddhastu prakṛteśca mahāguṇaiḥ

'शुद्ध आत्मा ही परब्रह्म है, वह सदा-सर्वदा जागृत ही रहता है; किंतु अंतरात्मा प्रकृति के महागुणों से बँधा रहता है।'

श्लोक 31 (padma.2.120.31)

अन्नाहारेण संपुष्टैरंतरात्मा सुखं व्रजेत् । सुसुखाज्जायते मोहस्तस्मान्मनः प्रमुह्यति

annāhāreṇa saṁpuṣṭairaṁtarātmā sukhaṁ vrajet susukhājjāyate mohastasmānmanaḥ pramuhyati

'अन्न-आहार से पुष्ट होकर अंतरात्मा सुख की ओर जाता है; अधिक सुख से मोह उत्पन्न होता है, और उसी से मन मोहित हो जाता है।'

श्लोक 32 (padma.2.120.32)

पश्चात्संजायते निद्रा तामसी लयवर्द्धिनी । नाडीमार्गेण यः सूर्यो मेरुमुल्लंघ्य गच्छति

paścātsaṁjāyate nidrā tāmasī layavarddhinī nāḍīmārgeṇa yaḥ sūryo merumullaṁghya gacchati

'उसके बाद तामसी, लय को बढ़ाने वाली निद्रा उत्पन्न होती है। जब सूर्य नाड़ी-मार्ग से मेरु को लाँघकर आगे बढ़ता है,'

श्लोक 33 (padma.2.120.33)

तदा रात्रिः प्रजायेत यावन्नोदयते रविः । विषयांधकारैर्मुक्तस्तु अंतरात्मा प्रकाशते

tadā rātriḥ prajāyeta yāvannodayate raviḥ viṣayāṁdhakārairmuktastu aṁtarātmā prakāśate

'— तब रात्रि उत्पन्न होती है, जब तक सूर्य फिर उदित नहीं होता। विषयों के अंधकार से मुक्त होकर अंतरात्मा प्रकाशित होता है।'

श्लोक 34 (padma.2.120.34)

भावैस्तत्त्वात्मकानां तु पंचतत्त्वैः प्रपोषितैः । पूर्वजन्मस्थितैः पिंडैरंतरात्मा प्रगृह्यते

bhāvaistattvātmakānāṁ tu paṁcatattvaiḥ prapoṣitaiḥ pūrvajanmasthitaiḥ piṁḍairaṁtarātmā pragṛhyate

'तत्त्वस्वरूप भावों से, पाँचों तत्त्वों से पुष्ट, पूर्वजन्म में स्थित शरीरों के द्वारा अंतरात्मा वशीभूत होता है।'

श्लोक 35 (padma.2.120.35)

स यास्यति च वै स्थानमुच्चावचं महामते । संसार अंतरात्मा वै दोषैर्बद्धः प्रणीयते

sa yāsyati ca vai sthānamuccāvacaṁ mahāmate saṁsāra aṁtarātmā vai doṣairbaddhaḥ praṇīyate

'हे बुद्धिमान्! वह ऊँचे या नीचे किसी स्थान को जाता है; दोषों से बँधा हुआ वह अंतरात्मा संसार में प्रेरित किया जाता है।'

श्लोक 36 (padma.2.120.36)

कायं रक्षति जीवात्मा पश्चात्तिष्ठति मध्यगः । उदानः स्फुरते तीव्रस्तस्माच्छब्दः प्रजायते

kāyaṁ rakṣati jīvātmā paścāttiṣṭhati madhyagaḥ udānaḥ sphurate tīvrastasmācchabdaḥ prajāyate

'जीवात्मा शरीर की रक्षा करता है, फिर वह मध्य में स्थित रहता है। उदान वायु तीव्रता से स्पंदित होती है, और उसी से ध्वनि उत्पन्न होती है।'

श्लोक 37 (padma.2.120.37)

शुष्का भस्त्रा यथा श्वासं कुरुते वायुपूरिता । तद्वच्छब्दवशाच्छ्वासमुदानः कुरुते बलात्

śuṣkā bhastrā yathā śvāsaṁ kurute vāyupūritā tadvacchabdavaśācchvāsamudānaḥ kurute balāt

'जैसे सूखी धौंकनी वायु से भरकर श्वास उत्पन्न करती है, वैसे ही उस ध्वनि के बल से उदान बलपूर्वक श्वास उत्पन्न करता है।'

श्लोक 38 (padma.2.120.38)

आत्मनस्तु प्रभावेण उदानो बलवान्भवेत् । एवं कायः प्रमुग्धस्तु मृतकल्पः प्रजायते

ātmanastu prabhāveṇa udāno balavānbhavet evaṁ kāyaḥ pramugdhastu mṛtakalpaḥ prajāyate

'आत्मा के ही प्रभाव से उदान बलवान् बन जाता है। इस प्रकार शरीर मूर्च्छित होकर मृतक-सा हो जाता है।'

श्लोक 39 (padma.2.120.39)

ततो निद्रा महामाया तस्यांगेषु प्रयाति सा । हृदि कंठे तथा चास्ये नासिकाग्रे प्रतिष्ठति

tato nidrā mahāmāyā tasyāṁgeṣu prayāti sā hṛdi kaṁṭhe tathā cāsye nāsikāgre pratiṣṭhati

'तब महामाया निद्रा उसके अंगों में व्याप्त हो जाती है — वह हृदय में, कंठ में, मुख में और नासिका के अग्रभाग में स्थित होती है।'

श्लोक 40 (padma.2.120.40)

बाहू संकुच्य संतिष्ठेद्धृद्गतो नाभिमंडले । आत्मनस्तु प्रभावाच्च उदानो नाम मारुतः

bāhū saṁkucya saṁtiṣṭheddhṛdgato nābhimaṁḍale ātmanastu prabhāvācca udāno nāma mārutaḥ

'भुजाएँ सिकुड़कर स्थिर हो जाती हैं, वह हृदय में स्थित होकर नाभिमंडल में जा टिकती है। आत्मा के ही प्रभाव से उदान नामक वायु —'

श्लोक 41 (padma.2.120.41)

प्रजायते महातीव्रा बलरोधं करोति सः । यथा रज्ज्वा प्रबद्धस्तु दारु कीलधरः स्थितः

prajāyate mahātīvrā balarodhaṁ karoti saḥ yathā rajjvā prabaddhastu dāru kīladharaḥ sthitaḥ

'— अत्यंत तीव्र होकर उत्पन्न होती है, और वह बल को रोक देती है — जैसे रस्सी से बँधी हुई, कील से थमी हुई लकड़ी स्थिर रहती है,'

श्लोक 42 (padma.2.120.42)

तथा चात्मासु संलग्नः प्राणवायुर्न संशयः । अंतरात्मप्रसक्तस्तु प्राणवायुः शुभानने

tathā cātmāsu saṁlagnaḥ prāṇavāyurna saṁśayaḥ aṁtarātmaprasaktastu prāṇavāyuḥ śubhānane

'— उसी प्रकार, इसमें कोई संशय नहीं, प्राणवायु भी आत्माओं में बद्ध रहता है। हे शुभानने! अंतरात्मा में आसक्त वह प्राणवायु,'

श्लोक 43 (padma.2.120.43)

बुद्धिवद्रोहितो भद्रे अंतरात्मा प्रधावति । पूर्वजन्मार्जितान्वासान्स्मृत्वा तत्र प्रधावति

buddhivadrohito bhadre aṁtarātmā pradhāvati pūrvajanmārjitānvāsānsmṛtvā tatra pradhāvati

'हे भद्रे! बुद्धि के वशीभूत होकर अंतरात्मा दौड़ता है — पूर्वजन्म में अर्जित वासनाओं का स्मरण कर वहीं दौड़ पड़ता है।'

श्लोक 44 (padma.2.120.44)

तत्र संस्थो महाप्राज्ञः स्वेच्छया रमते पुनः । एवं नानाविधान्स्वप्नानंतरात्मा प्रपश्यति

tatra saṁstho mahāprājñaḥ svecchayā ramate punaḥ evaṁ nānāvidhānsvapnānaṁtarātmā prapaśyati

'वहीं स्थित होकर वह महाबुद्धिमान् अपनी इच्छा से पुनः विचरण करता है। इस प्रकार अंतरात्मा नाना प्रकार के स्वप्न देखता है।'

श्लोक 45 (padma.2.120.45)

उत्तमांश्च विरुद्धांश्च कर्मयुक्तान्प्रपश्यति । गिरींस्तथा सुदुर्गांश्च उच्चावचान्प्रपश्यति

uttamāṁśca viruddhāṁśca karmayuktānprapaśyati girīṁstathā sudurgāṁśca uccāvacānprapaśyati

'वह उत्तम और विपरीत, दोनों प्रकार के, कर्मयुक्त स्वप्न देखता है; वह ऊँचे-नीचे पर्वतों और दुर्गम स्थानों को भी देखता है।'

श्लोक 46 (padma.2.120.46)

तदेव वातिकं विद्धि कफवत्तद्वदाम्यहम् । जलं नदीं तडागं च पयः स्थानानि पश्यति

tadeva vātikaṁ viddhi kaphavattadvadāmyaham jalaṁ nadīṁ taḍāgaṁ ca payaḥ sthānāni paśyati

'उसी को वातिक स्वप्न जानो; अब मैं तुम्हें कफज स्वप्न भी बताता हूँ — उसमें जल, नदी, तालाब और दूध के स्थान दिखाई देते हैं,'

श्लोक 47 (padma.2.120.47)

अग्निं च पश्यते देवि बहुकांचनमुत्तमम् । तदेव पैत्तिकं विद्धि भाव्यं चैव वदाम्यहम्

agniṁ ca paśyate devi bahukāṁcanamuttamam tadeva paittikaṁ viddhi bhāvyaṁ caiva vadāmyaham

'हे देवी! और अग्नि, तथा प्रचुर उत्तम स्वर्ण भी दिखाई देता है — उसे पैत्तिक स्वप्न जानो; और आगे जो होने वाला है, वह भी मैं तुम्हें बताता हूँ।'

श्लोक 48 (padma.2.120.48)

प्रभाते दृश्यते स्वप्नो भव्यो वाभव्य एव च । कर्मयुक्तो वरारोहे लाभालाभप्रकाशकः

prabhāte dṛśyate svapno bhavyo vābhavya eva ca karmayukto varārohe lābhālābhaprakāśakaḥ

'प्रभातकाल में जो स्वप्न दिखाई देता है, वह शुभ भी हो सकता है और अशुभ भी; हे वरारोहे! वह कर्म से युक्त होकर लाभ-हानि को प्रकट करता है।'

श्लोक 49 (padma.2.120.49)

स्वप्नस्यापि अवस्था मे कथिता वरवर्णिनि । तद्भाव्यंचवरारोहेविष्णोश्चैवभविष्यति

svapnasyāpi avasthā me kathitā varavarṇini tadbhāvyaṁcavarāroheviṣṇoścaivabhaviṣyati

'हे वरवर्णिनी! स्वप्न की ये अवस्थाएँ मैंने तुम्हें कह दीं। और हे वरारोहे, विष्णु के विषय में जो भावी है, वह अवश्य ही घटित होगा।'

श्लोक 50 (padma.2.120.50)

तन्निमित्तं त्वया दृष्टो दुःस्वप्नः स तु प्रेक्षितः

tannimittaṁ tvayā dṛṣṭo duḥsvapnaḥ sa tu prekṣitaḥ

'उसी कारण से तुमने वह दुःस्वप्न देखा है, जो तुमने अनुभव किया।'

अध्याय 119अध्याय-सूचीअध्याय 121