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भूमि खण्ड · अध्याय 14

सुमना का कुल, वेदशर्मा की कथा तथा धर्मपूर्ण मृत्यु

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (padma.2.14.1)

सोमशर्मोवाच- एवंविधं महापुण्यं धर्मव्याख्यानमुत्तमम् । कथं जानासि भद्रे त्वं कस्माच्चैव त्वया श्रुतम्

somaśarmovāca- evaṁvidhaṁ mahāpuṇyaṁ dharmavyākhyānamuttamam kathaṁ jānāsi bhadre tvaṁ kasmāccaiva tvayā śrutam

सोमशर्मा ने कहा — 'इस प्रकार का यह महापुण्यमय, उत्तम धर्म-व्याख्यान — तुम कैसे जानती हो, हे भद्रे? तुमने यह किससे सुना है?'

श्लोक 2 (padma.2.14.2)

सुमनोवाच-। भार्गवाणां कुले जातः पिता मम महामते । च्यवनो नाम विख्यातः सर्वज्ञानविशारदः

sumanovāca- bhārgavāṇāṁ kule jātaḥ pitā mama mahāmate cyavano nāma vikhyātaḥ sarvajñānaviśāradaḥ

सुमना ने कहा — 'भार्गवों के कुल में जन्मे मेरे पिता, हे महामते, च्यवन नाम से विख्यात हैं, समस्त ज्ञान में निपुण।

श्लोक 3 (padma.2.14.3)

तस्याहं प्रिय कन्या वै प्राणादपि च वल्लभा । यत्रयत्र व्रजत्येष तीर्थारामेषु सुव्रत

tasyāhaṁ priya kanyā vai prāṇādapi ca vallabhā yatrayatra vrajatyeṣa tīrthārāmeṣu suvrata

मैं उनकी प्रिय कन्या हूँ, अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय। वे जहाँ-जहाँ भी जाते हैं — तीर्थों में, उद्यानों में, हे सुव्रत —

श्लोक 4 (padma.2.14.4)

सभासु च मुनीनां तु देवतायतनेषु च । तेन सार्द्धं व्रजाम्येका क्रीडमाना सदैव हि

sabhāsu ca munīnāṁ tu devatāyataneṣu ca tena sārddhaṁ vrajāmyekā krīḍamānā sadaiva hi

—मुनियों की सभाओं में, और देवताओं के मंदिरों में — उनके साथ मैं अकेली ही सदा क्रीड़ा करते हुए जाती हूँ।

श्लोक 5 (padma.2.14.5)

कौशिकान्वयसंभूतो वेदशर्मा महामतिः । पितुर्मम सखा दैवादटमानः समागतः

kauśikānvayasaṁbhūto vedaśarmā mahāmatiḥ piturmama sakhā daivādaṭamānaḥ samāgataḥ

कौशिक वंश में उत्पन्न वेदशर्मा नामक महामति, मेरे पिता के मित्र थे; भाग्यवश भ्रमण करते हुए वे हमारे यहाँ आए।

श्लोक 6 (padma.2.14.6)

दुःखेन महताविष्टश्चिंतयानो मुहुर्मुहुः । समागतं महात्मानं तमुवाच पिता मम

duḥkhena mahatāviṣṭaściṁtayāno muhurmuhuḥ samāgataṁ mahātmānaṁ tamuvāca pitā mama

महान दुःख से युक्त, बार-बार चिंता करते हुए उन आए हुए महात्मा से मेरे पिता ने कहा —

श्लोक 7 (padma.2.14.7)

भवंतं दुःखसंतप्तमिति जानामि सुव्रत । कस्माद्दुःखी भवाञ्जातस्तस्मात्त्वं कारणं वद

bhavaṁtaṁ duḥkhasaṁtaptamiti jānāmi suvrata kasmādduḥkhī bhavāñjātastasmāttvaṁ kāraṇaṁ vada

'मैं जानता हूँ कि तुम दुःख से संतप्त हो, हे सुव्रत। तुम्हें दुःख किस कारण हुआ, वह मुझे बताओ।'

श्लोक 8 (padma.2.14.8)

एतद्वाक्यं ततः श्रुत्वा च्यवनस्य महात्मनः । तमुवाच महात्मानं पितरं मम सुव्रतः

etadvākyaṁ tataḥ śrutvā cyavanasya mahātmanaḥ tamuvāca mahātmānaṁ pitaraṁ mama suvrataḥ

महात्मा च्यवन का यह वचन सुनकर उस सुव्रत वेदशर्मा ने मेरे पिता, उस महात्मा से कहा —

श्लोक 9 (padma.2.14.9)

वेदशर्मा महाप्राज्ञ सर्वदुःखस्य कारणम् । मम भार्या महासाध्वी पातिव्रत्यपरायणा

vedaśarmā mahāprājña sarvaduḥkhasya kāraṇam mama bhāryā mahāsādhvī pātivratyaparāyaṇā

वेदशर्मा ने कहा — 'हे महाप्राज्ञ! मेरे समस्त दुःख का कारण यह है — मेरी पत्नी, अत्यंत साध्वी, पातिव्रत्य में परायण —

श्लोक 10 (padma.2.14.10)

अपुत्रा सा हि संजाता मम वंशो न विद्यते । एतत्ते कारणं प्रोक्तं प्रश्नितोस्मि यतस्त्वया

aputrā sā hi saṁjātā mama vaṁśo na vidyate etatte kāraṇaṁ proktaṁ praśnitosmi yatastvayā

—पुत्रहीन ही रह गई है, मेरा वंश आगे नहीं बढ़ रहा है। यही मेरा कारण है जो मैंने आपको बताया, क्योंकि आपने मुझसे पूछा।'

श्लोक 11 (padma.2.14.11)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्तः कश्चित्सिद्धः समागतः । मम पित्रा तथा तेन ह्युत्थाय वेदशर्मणा

etasminnaṁtare prāptaḥ kaścitsiddhaḥ samāgataḥ mama pitrā tathā tena hyutthāya vedaśarmaṇā

इसी बीच कोई एक सिद्ध पुरुष वहाँ आ गए; मेरे पिता और वेदशर्मा दोनों उठकर खड़े हो गए —

श्लोक 12 (padma.2.14.12)

द्वाभ्यामपि च सिद्धोसौ पूजितो भक्तिपूर्वकैः । उपहारैस्स भोज्यान्नैर्वचनैर्मधुराक्षरैः

dvābhyāmapi ca siddhosau pūjito bhaktipūrvakaiḥ upahāraissa bhojyānnairvacanairmadhurākṣaraiḥ

—और दोनों ने उस सिद्ध की भक्तिपूर्वक पूजा की, उपहारों से, भोज्य अन्न से, मधुर वचनों से।

श्लोक 13 (padma.2.14.13)

द्वाभ्यामन्तर्गतं पृष्टं पूर्वोक्तं च यथा त्वया । उभौ तौ प्राह धर्मात्मा ससखं पितरं मम

dvābhyāmantargataṁ pṛṣṭaṁ pūrvoktaṁ ca yathā tvayā ubhau tau prāha dharmātmā sasakhaṁ pitaraṁ mama

दोनों ने पहले कहे गए विषय के बारे में पूछा, जैसा पहले तुम्हें बताया गया; उस धर्मात्मा ने उन दोनों — मेरे पिता और उनके मित्र — से कहा —

श्लोक 14 (padma.2.14.14)

धर्मस्य कारणं सर्वं मयोक्तं ते तथा किल । धर्मेण प्राप्यते पुत्रो धनं धान्यं तथा स्त्रियः

dharmasya kāraṇaṁ sarvaṁ mayoktaṁ te tathā kila dharmeṇa prāpyate putro dhanaṁ dhānyaṁ tathā striyaḥ

'धर्म का ही समस्त कारण है, जैसा मैंने पहले ही तुम्हें बताया था — धर्म से ही पुत्र, धन, धान्य और स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं।'

श्लोक 15 (padma.2.14.15)

ततस्तेन कृतं धर्मं संपूर्णं वेदशर्मणा । तस्माद्धर्मात्सुसंजातं महत्सौख्यं सपुत्रकम्

tatastena kṛtaṁ dharmaṁ saṁpūrṇaṁ vedaśarmaṇā tasmāddharmātsusaṁjātaṁ mahatsaukhyaṁ saputrakam

फिर वेदशर्मा द्वारा वह धर्म पूर्णतः आचरित किया गया; उसी धर्म से उन्हें महान सुख और पुत्र प्राप्त हुआ।

श्लोक 16 (padma.2.14.16)

तेन संगप्रसंगेन ममैष मतिनिश्चयः । यथा कांत तव प्रोक्तं मयैव च परं शुभम्

tena saṁgaprasaṁgena mamaiṣa matiniścayaḥ yathā kāṁta tava proktaṁ mayaiva ca paraṁ śubham

उसी संग और प्रसंग से मेरा भी यह मत निश्चित हुआ है — जैसा, हे प्रिय, मैंने तुम्हें बताया, वही परम कल्याण है।

श्लोक 17 (padma.2.14.17)

तस्माच्छ्रुतं महासिद्धात्सर्वसंदेहनाशनम् । विप्रधर्मं समाश्रित्य अनुवर्त्तस्व सर्वदा

tasmācchrutaṁ mahāsiddhātsarvasaṁdehanāśanam vipradharmaṁ samāśritya anuvarttasva sarvadā

उस महासिद्ध से सुना हुआ यह सर्वसंदेह-नाशक वचन है — विप्र-धर्म का आश्रय लेकर सदा उसका पालन करो।'

श्लोक 18 (padma.2.14.18)

सोमशर्मोवाच- धर्मेण कीदृशो मृत्युर्जन्म चैव वदस्व मे । उभयोर्लक्षणं कांते तत्सर्वं हि वदस्व मे

somaśarmovāca- dharmeṇa kīdṛśo mṛtyurjanma caiva vadasva me ubhayorlakṣaṇaṁ kāṁte tatsarvaṁ hi vadasva me

सोमशर्मा ने कहा — 'धर्म से कैसी मृत्यु होती है और कैसा जन्म, यह मुझे बताओ। दोनों का लक्षण, हे प्रिये, मुझे सब कुछ बताओ।'

श्लोक 19 (padma.2.14.19)

सुमनोवाच- सत्य शौच क्षमा शांति तीर्थपुण्यादिकैस्तथा । धर्मश्च पालितो येन तस्य मृत्युं वदाम्यहम्

sumanovāca- satya śauca kṣamā śāṁti tīrthapuṇyādikaistathā dharmaśca pālito yena tasya mṛtyuṁ vadāmyaham

सुमना ने कहा — 'सत्य, शौच, क्षमा, शांति, और तीर्थ-पुण्य आदि से जिसने धर्म का पालन किया है, उसकी मृत्यु के विषय में मैं कहती हूँ —

श्लोक 20 (padma.2.14.20)

रोगो न जायते तस्य न च पीडा कलेवरे । न श्रमो वै न च ग्लानिर्न च स्वेदो भ्रमस्तथा

rogo na jāyate tasya na ca pīḍā kalevare na śramo vai na ca glānirna ca svedo bhramastathā

—उसे कोई रोग नहीं होता, शरीर में कोई पीड़ा नहीं होती; न थकान, न ग्लानि, न पसीना, न भ्रम होता है।

श्लोक 21 (padma.2.14.21)

दिव्यरूपधरा भूत्वा गंधर्वा ब्राह्मणास्तथा । वेदपाठसमायुक्ता गीतज्ञानविशारदाः

divyarūpadharā bhūtvā gaṁdharvā brāhmaṇāstathā vedapāṭhasamāyuktā gītajñānaviśāradāḥ

दिव्य रूप धारण किए हुए गंधर्व और ब्राह्मण, वेदपाठ से युक्त, गीत-ज्ञान में निपुण —

श्लोक 22 (padma.2.14.22)

तस्य पार्श्वं समायांति स्तुतिं कुर्वंति चातुलाम् । स्वस्थो हि आसने युक्तो देवपूजारतः किल

tasya pārśvaṁ samāyāṁti stutiṁ kurvaṁti cātulām svastho hi āsane yukto devapūjārataḥ kila

—उसके पास आते हैं और अतुल स्तुति करते हैं। वह स्वस्थ होकर आसन पर बैठा, देवपूजा में रत रहता है।

श्लोक 23 (padma.2.14.23)

तीर्थं च लभते प्राज्ञः स्नानार्थं धर्मतत्परः । अग्न्यागारे च गोस्थाने देवतायतनेषु च

tīrthaṁ ca labhate prājñaḥ snānārthaṁ dharmatatparaḥ agnyāgāre ca gosthāne devatāyataneṣu ca

वह प्राज्ञ, धर्मपरायण, स्नान के लिए तीर्थ प्राप्त करता है — अग्निशाला में, गौशाला में, देवमंदिरों में —

श्लोक 24 (padma.2.14.24)

आरामे च तडागे च यत्राश्वत्थो वटस्तथा । ब्रह्मवृक्षं समाश्रित्य श्रीवृक्षं च तथा पुनः

ārāme ca taḍāge ca yatrāśvattho vaṭastathā brahmavṛkṣaṁ samāśritya śrīvṛkṣaṁ ca tathā punaḥ

—उद्यान में, तालाब में, जहाँ पीपल या बरगद हो; ब्रह्मवृक्ष का आश्रय लेकर, और वैसे ही श्रीवृक्ष का भी —

श्लोक 25 (padma.2.14.25)

अश्वस्थानं समाश्रित्य गजस्थानगतो नरः । अशोकं चूतवृक्षं च समाश्रित्य यदास्थितः

aśvasthānaṁ samāśritya gajasthānagato naraḥ aśokaṁ cūtavṛkṣaṁ ca samāśritya yadāsthitaḥ

—अश्वशाला का आश्रय लेकर, या गजस्थान में पहुँचकर; अशोक या आम्रवृक्ष का आश्रय लेकर जब वह स्थित होता है —

श्लोक 26 (padma.2.14.26)

संनिधौ ब्राह्मणानां च राजवेश्मगतोथवा । रणभूमिं समाश्रित्य पूर्वं यत्र मृतो भवेत्

saṁnidhau brāhmaṇānāṁ ca rājaveśmagatothavā raṇabhūmiṁ samāśritya pūrvaṁ yatra mṛto bhavet

—ब्राह्मणों की उपस्थिति में, या राजमहल में पहुँचकर; या रणभूमि का आश्रय लेकर, जहाँ पूर्वकाल में कोई मरा हो —

श्लोक 27 (padma.2.14.27)

मृत्युस्थानानि पुण्यानि केवलं धर्मकारणम् । गोग्रहं तु सुसंप्राप्य तथा चामरकंटकम्

mṛtyusthānāni puṇyāni kevalaṁ dharmakāraṇam gograhaṁ tu susaṁprāpya tathā cāmarakaṁṭakam

—ये मृत्यु के पुण्य स्थान हैं, केवल धर्म के कारण। गौशाला को प्राप्त कर, और वैसे ही अमरकंटक को —

श्लोक 28 (padma.2.14.28)

शुद्धधर्मकरो नित्यं धर्मतो धर्मवत्सलः । एवं स्थानं समाप्नोति यदा मृत्युं समाश्रितः

śuddhadharmakaro nityaṁ dharmato dharmavatsalaḥ evaṁ sthānaṁ samāpnoti yadā mṛtyuṁ samāśritaḥ

—शुद्ध धर्मकर्ता, सदा धर्म से धर्म में अनुरक्त, इस प्रकार का स्थान प्राप्त करता है जब वह मृत्यु का आश्रय लेता है।

श्लोक 29 (padma.2.14.29)

मातरं पश्यते पुण्यं पितरं च नरोत्तमः । भ्रातरं श्रेयसा युक्तमन्यं स्वजनबांधवम्

mātaraṁ paśyate puṇyaṁ pitaraṁ ca narottamaḥ bhrātaraṁ śreyasā yuktamanyaṁ svajanabāṁdhavam

वह नरोत्तम पुण्यमय क्षण में अपनी माता को देखता है, पिता को, और कल्याण से युक्त भाई को, तथा अन्य स्वजन-बांधवों को —

श्लोक 30 (padma.2.14.30)

बंदीजनैस्तथा पुण्यैः स्तूयमानं पुनःपुनः । पापिष्ठं नैव पश्येत मातृपित्रादिकं पुनः

baṁdījanaistathā puṇyaiḥ stūyamānaṁ punaḥpunaḥ pāpiṣṭhaṁ naiva paśyeta mātṛpitrādikaṁ punaḥ

—पुण्यशाली भाटों द्वारा बार-बार स्तुति किए जाते हुए; किंतु वह पापी माता-पिता आदि को कभी नहीं देखता।

श्लोक 31 (padma.2.14.31)

गीतं गायंति गंधर्वाः स्तुवंतिस्तावकाः स्तवैः । मंत्रपाठैस्तथा विप्रा माता स्नेहेन पूजयेत्

gītaṁ gāyaṁti gaṁdharvāḥ stuvaṁtistāvakāḥ stavaiḥ maṁtrapāṭhaistathā viprā mātā snehena pūjayet

गंधर्व गीत गाते हैं, भक्तजन स्तोत्रों से स्तुति करते हैं, विप्र मंत्रपाठ करते हैं, माता स्नेह से पूजा करती है —

श्लोक 32 (padma.2.14.32)

पितास्वजनवर्गाश्च धर्मात्मानं महामतिम् । एवं दूताः समाख्याताः पुण्यस्थानानि ते विभो

pitāsvajanavargāśca dharmātmānaṁ mahāmatim evaṁ dūtāḥ samākhyātāḥ puṇyasthānāni te vibho

—पिता और स्वजनवर्ग भी उस धर्मात्मा, महामति की पूजा करते हैं। इस प्रकार दूत और पुण्य-स्थान तुम्हें बताए गए, हे विभो।

श्लोक 33 (padma.2.14.33)

प्रत्यक्षान्पश्यते दूतान्हास्यस्नेहसमाविलान् । न च स्वप्नेन मोहेन क्लेदयुक्तेन नैव सः

pratyakṣānpaśyate dūtānhāsyasnehasamāvilān na ca svapnena mohena kledayuktena naiva saḥ

वह प्रत्यक्ष रूप से उन दूतों को देखता है, हास्य और स्नेह से युक्त — न स्वप्न से, न मोह से, न किसी विकार से।

श्लोक 34 (padma.2.14.34)

धर्मराजो महाप्राज्ञो भवंतं तु समाह्वयेत् । एह्येहि त्वं महाभाग यत्र धर्मः स तिष्ठति

dharmarājo mahāprājño bhavaṁtaṁ tu samāhvayet ehyehi tvaṁ mahābhāga yatra dharmaḥ sa tiṣṭhati

महाप्राज्ञ धर्मराज स्वयं उसे बुलाते हैं — 'आओ, आओ, हे महाभाग! जहाँ धर्म स्थित है, वहाँ चलो।'

श्लोक 35 (padma.2.14.35)

तस्य मोहो न च भ्रांतिर्न ग्लानिः स्मृतिविभ्रमः । जायते नात्र संदेहः प्रसन्नात्मा स तिष्ठति

tasya moho na ca bhrāṁtirna glāniḥ smṛtivibhramaḥ jāyate nātra saṁdehaḥ prasannātmā sa tiṣṭhati

उसे मोह नहीं होता, न भ्रांति, न ग्लानि, न स्मृति का विभ्रम — इसमें संदेह नहीं — वह प्रसन्न आत्मा से स्थित रहता है।

श्लोक 36 (padma.2.14.36)

ज्ञानविज्ञानसंपन्नः स्मरन्देवं जनार्दनम् । तैः सार्द्धं तु प्रयात्येवं संतुष्टो हृष्टमानसः

jñānavijñānasaṁpannaḥ smarandevaṁ janārdanam taiḥ sārddhaṁ tu prayātyevaṁ saṁtuṣṭo hṛṣṭamānasaḥ

ज्ञान-विज्ञान से संपन्न, देव जनार्दन का स्मरण करते हुए, वह उन दूतों के साथ ही संतुष्ट, हर्षित मन से प्रस्थान करता है।

श्लोक 37 (padma.2.14.37)

एकत्वं जायते तत्र त्यजतः स्वंकलेवरम् । दशमद्वारमाश्रित्य आत्मा तस्य स गच्छति

ekatvaṁ jāyate tatra tyajataḥ svaṁkalevaram daśamadvāramāśritya ātmā tasya sa gacchati

वहाँ अपने ही शरीर को त्यागते हुए एकत्व उत्पन्न होता है; दसवें द्वार का आश्रय लेकर उसकी आत्मा प्रस्थान करती है।

श्लोक 38 (padma.2.14.38)

शिबिका तस्य आयाति हंसयानं मनोहरम् । विमानमेव चायाति हयो वा गज उत्तमः

śibikā tasya āyāti haṁsayānaṁ manoharam vimānameva cāyāti hayo vā gaja uttamaḥ

उसके लिए एक पालकी आती है, मनोहर हंस-यान; या फिर विमान आता है, या घोड़ा, या उत्तम हाथी।

श्लोक 39 (padma.2.14.39)

छत्रेण ध्रियमाणेन चामरैर्व्यजनैस्तथा । वीज्यमानः स पुण्यात्मा पुण्यैरेवं समंततः

chatreṇa dhriyamāṇena cāmarairvyajanaistathā vījyamānaḥ sa puṇyātmā puṇyairevaṁ samaṁtataḥ

छत्र धारण किए हुए, चामरों और पंखों से — इस प्रकार पुण्यों द्वारा वह पुण्यात्मा चारों ओर से वीज्यमान होता है।

श्लोक 40 (padma.2.14.40)

गीयमानस्तु धर्मात्मा स्तूयमानस्तु पंडितैः । बंदिभिश्चारणैर्दिव्यैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः

gīyamānastu dharmātmā stūyamānastu paṁḍitaiḥ baṁdibhiścāraṇairdivyairbrāhmaṇairvedapāragaiḥ

वह धर्मात्मा गाया जाता है, पंडितों द्वारा स्तुति किया जाता है, भाटों और दिव्य चारणों द्वारा, वेदपारंगत ब्राह्मणों द्वारा —

श्लोक 41 (padma.2.14.41)

साधुभिः स्तूयमानस्तु सर्वसौख्यसमन्वितः । यथादानप्रभावेण फलमाप्नोति तत्र सः

sādhubhiḥ stūyamānastu sarvasaukhyasamanvitaḥ yathādānaprabhāveṇa phalamāpnoti tatra saḥ

—साधुओं द्वारा भी स्तुति किया जाता है, समस्त सुखों से युक्त होकर; वहाँ वह अपने दान के प्रभाव के अनुसार ही फल प्राप्त करता है।

श्लोक 42 (padma.2.14.42)

आरामवाटिकामध्ये स प्रयाति सुखेन वै । अप्सरोभिः समाकीर्णो दिव्याभिर्मंगलैर्युतः

ārāmavāṭikāmadhye sa prayāti sukhena vai apsarobhiḥ samākīrṇo divyābhirmaṁgalairyutaḥ

वह सुखपूर्वक उद्यान-वाटिकाओं के मध्य प्रस्थान करता है, दिव्य अप्सराओं से भरा हुआ, समस्त मंगलों से युक्त।

श्लोक 43 (padma.2.14.43)

देवैः संस्तूयमानस्तु धर्मराजं प्रपश्यति । देवाश्च धर्मसंयुक्ता जग्मुः संमुखमेव तम्

devaiḥ saṁstūyamānastu dharmarājaṁ prapaśyati devāśca dharmasaṁyuktā jagmuḥ saṁmukhameva tam

देवताओं द्वारा स्तुति किया जाता हुआ वह धर्मराज को देखता है; धर्म से युक्त देवगण उसके सम्मुख आते हैं —

श्लोक 44 (padma.2.14.44)

एह्येहि वै महाभाग भुंक्ष्व भोगान्मनोनुगान् । एवं स पश्यते धर्मं सौम्यरूपं महामतिम्

ehyehi vai mahābhāga bhuṁkṣva bhogānmanonugān evaṁ sa paśyate dharmaṁ saumyarūpaṁ mahāmatim

—'आओ, आओ, हे महाभाग! मनोवांछित भोगों का भोग करो।' इस प्रकार वह सौम्यरूपी, महामति धर्म को देखता है।

श्लोक 45 (padma.2.14.45)

स्वस्य पुण्यप्रभावेण भुंक्ते च स्वर्गमेव सः । भोगक्षयात्सधर्मात्मा पुनर्जन्म प्रयाति वै

svasya puṇyaprabhāveṇa bhuṁkte ca svargameva saḥ bhogakṣayātsadharmātmā punarjanma prayāti vai

अपने ही पुण्य के प्रभाव से वह स्वर्ग का भोग करता है; भोग क्षीण होने पर वह धर्मात्मा पुनः जन्म को प्राप्त होता है —

श्लोक 46 (padma.2.14.46)

निजधर्मप्रसादात्स कुलं पुण्यं प्रयाति वै । ब्राह्मणस्य सुपुण्यस्य क्षत्रियस्य तथैव च

nijadharmaprasādātsa kulaṁ puṇyaṁ prayāti vai brāhmaṇasya supuṇyasya kṣatriyasya tathaiva ca

—अपने ही धर्म की कृपा से वह पुण्यमय कुल में जन्म लेता है — किसी पुण्यशाली ब्राह्मण के, या वैसे ही क्षत्रिय के —

श्लोक 47 (padma.2.14.47)

धनाढ्यस्य सुपुण्यस्य वैश्यस्यैव महामते । धर्मेण मोदते तत्र पुनः पुण्यं करोति सः

dhanāḍhyasya supuṇyasya vaiśyasyaiva mahāmate dharmeṇa modate tatra punaḥ puṇyaṁ karoti saḥ

—या धनाढ्य, पुण्यशाली वैश्य के, हे महामते। वहाँ धर्म से आनंदित होकर वह पुनः पुण्य करता है।

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