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भूमि खण्ड · अध्याय 16

पापी की यमलोक-यात्रा, नरक-यातना तथा पशु-योनियों में पुनर्जन्म

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (padma.2.16.1)

सुमनोवाच- अंगारसंचये मार्गे घृष्यमाणो हि नीयते । दह्यमानः स दुष्टात्मा चेष्टमानः पुनः पुनः

sumanovāca- aṁgārasaṁcaye mārge ghṛṣyamāṇo hi nīyate dahyamānaḥ sa duṣṭātmā ceṣṭamānaḥ punaḥ punaḥ

सुमना ने कहा — 'अंगारों से भरे मार्ग पर घसीटा जाकर वह ले जाया जाता है; वह दुष्टात्मा जलता हुआ बार-बार तड़पता है।

श्लोक 2 (padma.2.16.2)

यत्रातपो महातीव्रो द्वादशादित्यतापितः । नीयते तेन मार्गेण संतप्तः सूर्यरश्मिभिः

yatrātapo mahātīvro dvādaśādityatāpitaḥ nīyate tena mārgeṇa saṁtaptaḥ sūryaraśmibhiḥ

जहाँ अत्यंत तीव्र धूप है, मानो बारह सूर्यों से तपाया हुआ, उसी मार्ग से वह सूर्य की किरणों से संतप्त होकर ले जाया जाता है।

श्लोक 3 (padma.2.16.3)

पर्वतेष्वेव दुर्गेषु छायाहीनेषु दुर्मतिः । नीयते तेन मार्गेण क्षुधातृष्णाप्रपीडितः

parvateṣveva durgeṣu chāyāhīneṣu durmatiḥ nīyate tena mārgeṇa kṣudhātṛṣṇāprapīḍitaḥ

छायारहित पर्वतीय दुर्गों में वह दुर्मति, भूख-प्यास से पीड़ित होकर, उसी मार्ग से ले जाया जाता है।

श्लोक 4 (padma.2.16.4)

स दूतैर्हन्यमानस्तु गदाखड्गैः परश्वधैः । कशाभिस्ताड्यमानस्तु निंद्यमानस्तु दूतकैः

sa dūtairhanyamānastu gadākhaḍgaiḥ paraśvadhaiḥ kaśābhistāḍyamānastu niṁdyamānastu dūtakaiḥ

वह दूतों द्वारा गदा, खड्ग और फरसों से मारा जाता है, कोड़ों से पीटा जाता है, दूतों द्वारा निंदित होता है —

श्लोक 5 (padma.2.16.5)

ततः शीतमये मार्गे वायुना सेव्यते पुनः । तेन शीतेन दुःखी स भूत्वा याति न संशयः

tataḥ śītamaye mārge vāyunā sevyate punaḥ tena śītena duḥkhī sa bhūtvā yāti na saṁśayaḥ

—फिर शीतल मार्ग पर वह पुनः वायु से आक्रांत होता है; उस शीत से दुःखी होकर वह चलता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 6 (padma.2.16.6)

आकृष्यमाणो दूतैस्तु नानादुर्गेषु नीयते । एवं पापी स दुष्टात्मा देवब्राह्मणनिंदकः

ākṛṣyamāṇo dūtaistu nānādurgeṣu nīyate evaṁ pāpī sa duṣṭātmā devabrāhmaṇaniṁdakaḥ

दूतों द्वारा घसीटा जाकर वह नाना दुर्गों में ले जाया जाता है। इस प्रकार वह पापी, दुष्टात्मा, देव-ब्राह्मणों का निंदक —

श्लोक 7 (padma.2.16.7)

सर्वपापसमाचारो नीयते यमकिंकरैः । यमं पश्यति दुष्टात्मा कृष्णांजनचयोपमम्

sarvapāpasamācāro nīyate yamakiṁkaraiḥ yamaṁ paśyati duṣṭātmā kṛṣṇāṁjanacayopamam

—समस्त पापाचरण से युक्त, यमकिंकरों द्वारा ले जाया जाता है। वह दुष्टात्मा काले अंजन के ढेर के समान यम को देखता है —

श्लोक 8 (padma.2.16.8)

तमुग्रं दारुणं भीमं भीमदूतैः समावृतम् । सर्वव्याधिसमाकीर्णं चित्रगुप्तसमन्वितम्

tamugraṁ dāruṇaṁ bhīmaṁ bhīmadūtaiḥ samāvṛtam sarvavyādhisamākīrṇaṁ citraguptasamanvitam

—उग्र, दारुण, भयंकर, भयंकर दूतों से घिरा हुआ, समस्त रोगों से भरा हुआ, चित्रगुप्त सहित —

श्लोक 9 (padma.2.16.9)

आरूढं महिषं देवं धर्मराजं द्विजोत्तम । दंष्ट्राकरालमत्युग्रं तस्यास्यं कालसंनिभम्

ārūḍhaṁ mahiṣaṁ devaṁ dharmarājaṁ dvijottama daṁṣṭrākarālamatyugraṁ tasyāsyaṁ kālasaṁnibham

—भैंसे पर आरूढ़ वह देव, धर्मराज, हे द्विजोत्तम, विकराल दाढ़ों वाला, अत्यंत उग्र, जिसका मुख काल के समान है —

श्लोक 10 (padma.2.16.10)

पीतवासं गदाहस्तं रक्तगंधानुलेपनम् । रक्तमाल्यकृताभूषं गदाहस्तं भयंकरम्

pītavāsaṁ gadāhastaṁ raktagaṁdhānulepanam raktamālyakṛtābhūṣaṁ gadāhastaṁ bhayaṁkaram

—पीले वस्त्र वाला, गदाधारी, लाल चंदन से लिप्त, लाल पुष्पों की माला धारण किए, गदाधारी, भयंकर —

श्लोक 11 (padma.2.16.11)

एवंविधं महाकायं यमं पश्यति दुर्मतिः । तं दृष्ट्वा समनुप्राप्तं सर्वधर्मबहिष्कृतम्

evaṁvidhaṁ mahākāyaṁ yamaṁ paśyati durmatiḥ taṁ dṛṣṭvā samanuprāptaṁ sarvadharmabahiṣkṛtam

—ऐसे महाकाय यम को वह दुर्मति देखता है। उसे इस प्रकार आया हुआ, समस्त धर्म से बहिष्कृत को देखकर —

श्लोक 12 (padma.2.16.12)

यमः पश्यति तं दुष्टं पापिष्ठं धर्मकंटकम् । शासयेत्तु महादुःखैः पीडाभिर्दारुमुद्गलैः

yamaḥ paśyati taṁ duṣṭaṁ pāpiṣṭhaṁ dharmakaṁṭakam śāsayettu mahāduḥkhaiḥ pīḍābhirdārumudgalaiḥ

—यम उस दुष्ट, पापिष्ठ, धर्मकंटक को देखकर महादुःखों से, पीड़ाओं से, लकड़ी के मुद्गरों से दंडित करता है।

श्लोक 13 (padma.2.16.13)

यावद्युगसहस्रांतं तावत्कालं प्रपच्यते । नानाविधे च नरके पच्यते च पुनः पुनः

yāvadyugasahasrāṁtaṁ tāvatkālaṁ prapacyate nānāvidhe ca narake pacyate ca punaḥ punaḥ

हजार युगों के अंत तक वह उतने ही समय तक पकाया जाता है; नाना प्रकार के नरकों में वह बार-बार पकाया जाता है।

श्लोक 14 (padma.2.16.14)

नारकीं याति वै योनिं कृमिकोटिषु पापकृत् । अमेध्ये पच्यते नित्यं हाहाभूतो विचेतनः

nārakīṁ yāti vai yoniṁ kṛmikoṭiṣu pāpakṛt amedhye pacyate nityaṁ hāhābhūto vicetanaḥ

वह पापकर्ता नारकीय योनि को, करोड़ों कीड़ों के मध्य प्राप्त होता है; अपवित्रता में सदा पकाया जाता है, त्राहि-त्राहि करता, चेतनाहीन।

श्लोक 15 (padma.2.16.15)

मरणं च स पापात्मा एवं याति सुनिश्चितम् । एवं पापस्य संयोगं भुंक्ते चैव सु दुर्मतिः

maraṇaṁ ca sa pāpātmā evaṁ yāti suniścitam evaṁ pāpasya saṁyogaṁ bhuṁkte caiva su durmatiḥ

वह पापात्मा इस प्रकार निश्चय ही मृत्यु को प्राप्त होता है। इस प्रकार वह अत्यंत दुर्मति पाप के संयोग को भोगता है।

श्लोक 16 (padma.2.16.16)

पुनर्जन्म प्रवक्ष्यामि यासु योनिषु याति च । शुनां योनिशतं प्राप्य भुंक्ते वै पातकं पुनः

punarjanma pravakṣyāmi yāsu yoniṣu yāti ca śunāṁ yoniśataṁ prāpya bhuṁkte vai pātakaṁ punaḥ

अब मैं पुनर्जन्म के विषय में बताती हूँ — किन योनियों में वह जाता है। कुत्तों की सौ योनियाँ प्राप्त कर वह पुनः अपने पाप का फल भोगता है।

श्लोक 17 (padma.2.16.17)

व्याघ्रो भवति दुष्टात्मा रासभीं याति वै पुनः । मार्जार शूकरीं योनिं सर्पयोनिं तथैव च

vyāghro bhavati duṣṭātmā rāsabhīṁ yāti vai punaḥ mārjāra śūkarīṁ yoniṁ sarpayoniṁ tathaiva ca

वह दुष्टात्मा व्याघ्र बनता है, फिर गधी की योनि को प्राप्त होता है; बिल्ली, सूअरी की योनि, और वैसे ही सर्प की योनि को भी —

श्लोक 18 (padma.2.16.18)

नानाभेदासु सर्वासु तिर्यक्षु च पुनः पुनः । पापपक्षिषु संयाति अन्यासु महतीषु च

nānābhedāsu sarvāsu tiryakṣu ca punaḥ punaḥ pāpapakṣiṣu saṁyāti anyāsu mahatīṣu ca

—नाना भेद वाले सभी तिर्यक् योनियों में बार-बार, पापी पक्षियों में जाता है, और अन्य बड़े पशुओं में भी।

श्लोक 19 (padma.2.16.19)

चांडाल भिल्लयोनिं च पुलिंदीं याति पापकृत् । एतत्ते सर्वमाख्यातं पापिनां जन्म चैव हि

cāṁḍāla bhillayoniṁ ca puliṁdīṁ yāti pāpakṛt etatte sarvamākhyātaṁ pāpināṁ janma caiva hi

वह पापकर्ता चांडाल, भील की योनि, और पुलिंद की योनि को प्राप्त होता है। यह सब तुम्हें बताया गया — पापियों का जन्म भी।

श्लोक 20 (padma.2.16.20)

मरणे शृणु कांत त्वं चेष्टां तेषां सुदारुणाम् । पापपुण्यसमाचारस्तवाग्रे कथितो मया

maraṇe śṛṇu kāṁta tvaṁ ceṣṭāṁ teṣāṁ sudāruṇām pāpapuṇyasamācārastavāgre kathito mayā

मृत्यु में, हे प्रिय, सुनो, उनकी अत्यंत भयंकर चेष्टा; पाप और पुण्य दोनों का आचरण तुम्हारे समक्ष मैंने बताया है।

श्लोक 21 (padma.2.16.21)

अन्यदेवं प्रवक्ष्यामि यदि पृच्छसि मानद

anyadevaṁ pravakṣyāmi yadi pṛcchasi mānada

यदि तुम पूछो तो, हे मानद, मैं अन्य कुछ और बताऊँगी।'

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