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भूमि खण्ड · अध्याय 24

वृत्र का जन्म, इंद्र के साथ छलपूर्ण संधि तथा रंभा का जाल

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (padma.2.24.1)

सूत उवाच- हतं श्रुत्वा दितिः पुत्रं सुबलं बलमेव च । रुदितं करुणं कृत्वा हा हा कष्टं भृशं मम

sūta uvāca- hataṁ śrutvā ditiḥ putraṁ subalaṁ balameva ca ruditaṁ karuṇaṁ kṛtvā hā hā kaṣṭaṁ bhṛśaṁ mama

सूत जी ने कहा — अपने सुपुत्र बल को मारा गया सुनकर दिति ने करुणापूर्वक विलाप करते हुए कहा — 'हाय-हाय! मुझ पर यह कितना बड़ा कष्ट आ गया!'

श्लोक 2 (padma.2.24.2)

एवं सुकरुणं कृत्वा बहुकालं तपस्विनी । सा गता कश्यपं कांतं तमुवाच यशस्विनी

evaṁ sukaruṇaṁ kṛtvā bahukālaṁ tapasvinī sā gatā kaśyapaṁ kāṁtaṁ tamuvāca yaśasvinī

इस प्रकार बहुत समय तक करुणापूर्वक विलाप कर वह तपस्विनी, यशस्विनी अपने पति कश्यप के पास गई और उनसे कहा —

श्लोक 3 (padma.2.24.3)

तव पुत्रो महापाप इंद्रः सुरगणेश्वरः । सागरोपगतं दृष्ट्वा बलं मे ब्रह्मलक्षणम्

tava putro mahāpāpa iṁdraḥ suragaṇeśvaraḥ sāgaropagataṁ dṛṣṭvā balaṁ me brahmalakṣaṇam

—'आपका पुत्र, महापापी इंद्र, देवगणों का स्वामी, समुद्र के पास गए मेरे पुत्र बल को, जो ब्रह्मलक्षणों वाला था, देखकर —

श्लोक 4 (padma.2.24.4)

वज्रेण घातयामास संध्यामास्यंतमेव हि । एवं श्रुत्वा ततः क्रुद्धो मरीचितनयस्तदा

vajreṇa ghātayāmāsa saṁdhyāmāsyaṁtameva hi evaṁ śrutvā tataḥ kruddho marīcitanayastadā

—वज्र से उसे मार डाला, ठीक उसकी संध्या-वंदना के अंत में।' यह सुनकर मरीचि के पुत्र कश्यप तब क्रुद्ध हो गए —

श्लोक 5 (padma.2.24.5)

क्रोधेन महताविष्टः प्रजज्वालेव वह्निना । अवलुंच्य जटामेकां शुच्यग्नौ स द्विजोत्तमः

krodhena mahatāviṣṭaḥ prajajvāleva vahninā avaluṁcya jaṭāmekāṁ śucyagnau sa dvijottamaḥ

—महान क्रोध से आविष्ट होकर वे अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठे; अपनी एक जटा उखाड़कर उस द्विजोत्तम ने पवित्र अग्नि में डाल दी —

श्लोक 6 (padma.2.24.6)

इंद्रस्यैव वधार्थाय पुत्रमुत्पादयाम्यहम् । तस्मात्कुंडात्समुत्पन्नो हुताशनमुखादपि

iṁdrasyaiva vadhārthāya putramutpādayāmyaham tasmātkuṁḍātsamutpanno hutāśanamukhādapi

—'इंद्र के वध के लिए ही मैं एक पुत्र उत्पन्न करता हूँ।' उस हवनकुंड से, अग्नि के मुख से ही —

श्लोक 7 (padma.2.24.7)

कृष्णांजनचयोपेतः पिंगाक्षो भीषणाकृतिः । दंष्ट्राकरालवक्त्रांतो जगतां भयदायकः

kṛṣṇāṁjanacayopetaḥ piṁgākṣo bhīṣaṇākṛtiḥ daṁṣṭrākarālavaktrāṁto jagatāṁ bhayadāyakaḥ

—काले अंजन के ढेर के समान, पिंगल नेत्रों वाला, भयंकर आकृति वाला, दाढ़ों से विकराल मुखवाला, जगत को भय देने वाला —

श्लोक 8 (padma.2.24.8)

महाचर्वरिको घोरः खड्गचर्मधरस्तथा । सर्वांगतेजसा दीप्तो महामेघोपमो बली

mahācarvariko ghoraḥ khaḍgacarmadharastathā sarvāṁgatejasā dīpto mahāmeghopamo balī

—महाभक्षक, घोर, खड्ग-ढाल धारण किए हुए, समस्त अंगों में तेज से दीप्त, महान बादल के समान बलवान —

श्लोक 9 (padma.2.24.9)

उवाच कश्यपं विप्रमादेशो मम दीयताम् । कस्मादुत्पादितो विप्र भवता कारणं वद

uvāca kaśyapaṁ vipramādeśo mama dīyatām kasmādutpādito vipra bhavatā kāraṇaṁ vada

—वह उत्पन्न हुआ, और विप्र कश्यप से बोला — 'मुझे आदेश दीजिए। हे विप्र! आपने मुझे किस लिए उत्पन्न किया है, कारण बताइए —

श्लोक 10 (padma.2.24.10)

तमहं साधयिष्यामि प्रसादात्तव सुव्रत । कश्यप उवाच- अस्या मनोरथं पुत्र पूरयस्व ममैव हि

tamahaṁ sādhayiṣyāmi prasādāttava suvrata kaśyapa uvāca- asyā manorathaṁ putra pūrayasva mamaiva hi

—मैं आपकी कृपा से उसे साधूँगा, हे सुव्रत।' कश्यप ने कहा — 'हे पुत्र! इस दिति की मनोकामना पूर्ण करो, मेरी ही ओर से —

श्लोक 11 (padma.2.24.11)

अदित्यास्त्वं महाप्राज्ञ जहि इंद्रं दुरात्मकम् । निहते देवराजे हि ऐंद्रं पदं प्रभुंक्ष्व च

adityāstvaṁ mahāprājña jahi iṁdraṁ durātmakam nihate devarāje hi aiṁdraṁ padaṁ prabhuṁkṣva ca

—हे महाप्राज्ञ! तुम अदिति के दुरात्मा पुत्र इंद्र को मार डालो। देवराज के मारे जाने पर तुम इंद्रपद भोगना।'

श्लोक 12 (padma.2.24.12)

एवं तेन समादिष्टः कश्यपेन महात्मना । वृत्रस्तु उद्यमं चक्रे तस्येंद्रस्य वधाय च

evaṁ tena samādiṣṭaḥ kaśyapena mahātmanā vṛtrastu udyamaṁ cakre tasyeṁdrasya vadhāya ca

इस प्रकार उस महात्मा कश्यप द्वारा आदेशित होकर वृत्र ने उस इंद्र के वध के लिए उद्यम करना आरंभ किया।

श्लोक 13 (padma.2.24.13)

धनुर्वेदस्य चाभ्यासं स चक्रे पौरुषान्वितः । बलं वीर्यं तथा क्षात्रं तेजो धैर्यसमन्वितम्

dhanurvedasya cābhyāsaṁ sa cakre pauruṣānvitaḥ balaṁ vīryaṁ tathā kṣātraṁ tejo dhairyasamanvitam

वह पौरुष से युक्त होकर धनुर्वेद का अभ्यास करने लगा — बल, वीर्य, क्षात्र-तेज, धैर्य से युक्त होकर।

श्लोक 14 (padma.2.24.14)

दृष्ट्वा हि तस्य दैत्यस्य सहस्राक्षो भयातुरः । उपायं चिंतितं तस्य वृत्रस्यापि दुरात्मनः

dṛṣṭvā hi tasya daityasya sahasrākṣo bhayāturaḥ upāyaṁ ciṁtitaṁ tasya vṛtrasyāpi durātmanaḥ

उस दैत्य को देखकर सहस्राक्ष, भय से आतुर होकर, उस दुरात्मा वृत्र के विषय में उपाय सोचने लगा।

श्लोक 15 (padma.2.24.15)

वधार्थं देवदेवेन समाहूय महामुनीन् । सप्तर्षीन्प्रेषयामास वृत्रं दैत्येश्वरं प्रति

vadhārthaṁ devadevena samāhūya mahāmunīn saptarṣīnpreṣayāmāsa vṛtraṁ daityeśvaraṁ prati

उसके वध के लिए देवदेव ने महामुनियों को बुलाकर सप्तर्षियों को दैत्येश्वर वृत्र के पास भेजा —

श्लोक 16 (padma.2.24.16)

भवंतस्तत्र गच्छंतु यत्र वृत्रः स तिष्ठति । संधिं कुर्वंतु वै तेन सार्द्धं मम मुनीश्वराः

bhavaṁtastatra gacchaṁtu yatra vṛtraḥ sa tiṣṭhati saṁdhiṁ kurvaṁtu vai tena sārddhaṁ mama munīśvarāḥ

—'आप सब वहाँ जाइए जहाँ वृत्र स्थित है। मेरी ओर से उसके साथ संधि कीजिए, हे मुनीश्वरो।'

श्लोक 17 (padma.2.24.17)

एवं तेन समादिष्टा मुनयः सप्त ते तदा । वृत्रासुरं ततः प्रोचुः सहस्राक्ष प्रचालिताः

evaṁ tena samādiṣṭā munayaḥ sapta te tadā vṛtrāsuraṁ tataḥ procuḥ sahasrākṣa pracālitāḥ

इस प्रकार उसके द्वारा आदेशित वे सातों मुनि, सहस्राक्ष द्वारा भेजे गए, तब वृत्रासुर से बोले —

श्लोक 18 (padma.2.24.18)

सख्यं कर्तुं प्रयच्छेत्स क्रियतां दैत्यसत्तम । ऋषयः सप्ततत्त्वज्ञा ऊचुर्वृत्रं महाबलम्

sakhyaṁ kartuṁ prayacchetsa kriyatāṁ daityasattama ṛṣayaḥ saptatattvajñā ūcurvṛtraṁ mahābalam

—'मित्रता करो, वह की जाए, हे दैत्यसत्तम।' सातों तत्त्वज्ञ ऋषियों ने महाबली वृत्र से कहा —

श्लोक 19 (padma.2.24.19)

सहस्राक्षो महाप्राज्ञो भवता सह सत्तम । मैत्रमिच्छति वै कर्तुं तत्कथं न करोषि किम्

sahasrākṣo mahāprājño bhavatā saha sattama maitramicchati vai kartuṁ tatkathaṁ na karoṣi kim

—'हे सत्तम! महाप्राज्ञ सहस्राक्ष आपके साथ मैत्री करना चाहते हैं; ऐसा क्यों नहीं करते आप?

श्लोक 20 (padma.2.24.20)

अर्धमैंद्रं पदं वीर सत्वं भुंक्ष्व सुखेन वै । वर्तंत्वर्द्धेन इंद्रस्तु असुरा देवतास्तथा

ardhamaiṁdraṁ padaṁ vīra satvaṁ bhuṁkṣva sukhena vai vartaṁtvarddhena iṁdrastu asurā devatāstathā

आधा इंद्रपद, हे वीर, और वह शक्ति भी सुखपूर्वक भोगो; आधे भाग से इंद्र रहें, और आधे से असुर तथा देवता भी।

श्लोक 21 (padma.2.24.21)

सुखं वर्तंतु ते सर्वे वैरं चैव विसृज्य वै । वृत्र उवाच- यदि सत्येन देवेंद्रो मैत्रमिच्छति सत्तमः

sukhaṁ vartaṁtu te sarve vairaṁ caiva visṛjya vai vṛtra uvāca- yadi satyena deveṁdro maitramicchati sattamaḥ

वे सभी वैर त्यागकर सुखपूर्वक रहें।' वृत्र ने कहा — 'यदि सत्य से देवेंद्र, वह सत्तम, मैत्री चाहते हैं —

श्लोक 22 (padma.2.24.22)

सत्यमाश्रित्य चैवाहं करिष्ये नात्र संशयः । छद्म चैवं पुरस्कृत्य इंद्रो द्रोहं समाचरेत्

satyamāśritya caivāhaṁ kariṣye nātra saṁśayaḥ chadma caivaṁ puraskṛtya iṁdro drohaṁ samācaret

—तो सत्य का ही आश्रय लेकर मैं भी वैसा करूँगा, इसमें संदेह नहीं। किंतु यदि इस छल को आगे कर इंद्र द्रोह करें —

श्लोक 23 (padma.2.24.23)

तदा किं क्रियते विप्रा इत्यर्थे प्रत्ययं हि किम् । ऋषयस्त्विंद्रमाचख्युरित्यर्थं प्रत्ययं वद

tadā kiṁ kriyate viprā ityarthe pratyayaṁ hi kim ṛṣayastviṁdramācakhyurityarthaṁ pratyayaṁ vada

—तो क्या किया जाए, हे विप्रो? इसका क्या प्रमाण है?' ऋषियों ने इंद्र से जाकर कहा — 'इस विषय में अपना प्रमाण बताइए —

श्लोक 24 (padma.2.24.24)

तन्नस्त्वं सत्यतां ब्रूहि यदि सख्यमिहेच्छसि । इंद्र उवाच- यद्यऽसत्येन वर्तामि भवद्भिः सह छद्मना

tannastvaṁ satyatāṁ brūhi yadi sakhyamihecchasi iṁdra uvāca- yadya'satyena vartāmi bhavadbhiḥ saha chadmanā

—हमें सत्य बताइए, यदि यहाँ मैत्री चाहते हैं।' इंद्र ने कहा — 'यदि मैं असत्य से, छल से आपके साथ आचरण करूँ —

श्लोक 25 (padma.2.24.25)

ब्रह्महत्यादिकैः पापैर्लिप्येहं नात्र संशयः । छद्म चैवं पुरस्कृत्य इंद्रो द्रोहं समाचरेत्

brahmahatyādikaiḥ pāpairlipyehaṁ nātra saṁśayaḥ chadma caivaṁ puraskṛtya iṁdro drohaṁ samācaret

—तो मुझे ब्रह्महत्या आदि पापों से लिप्त होना पड़े, इसमें संदेह नहीं। और यदि इस छल को आगे कर इंद्र द्रोह करें —

श्लोक 26 (padma.2.24.26)

ब्रह्महत्यादिकैः पापैर्लिप्येहं नात्र संशयः । इत्युवाच महाप्राज्ञ त्वामेवं स पुरंदरः

brahmahatyādikaiḥ pāpairlipyehaṁ nātra saṁśayaḥ ityuvāca mahāprājña tvāmevaṁ sa puraṁdaraḥ

—तो मुझे ब्रह्महत्या आदि पापों से लिप्त होना पड़े, इसमें संदेह नहीं।' इस प्रकार, हे महाप्राज्ञ, उस पुरंदर ने तुमसे कहा —

श्लोक 27 (padma.2.24.27)

एतेन प्रत्ययेनापि सख्यं कुरु महामते । वृत्र उवाच- भवतां शिष्टमार्गेण सत्येनानेन तस्य च

etena pratyayenāpi sakhyaṁ kuru mahāmate vṛtra uvāca- bhavatāṁ śiṣṭamārgeṇa satyenānena tasya ca

—'इसी प्रमाण के साथ मैत्री करो, हे महामते।' वृत्र ने कहा — 'आप लोगों के इस श्रेष्ठ मार्ग से, और उसके इस सत्य से —

श्लोक 28 (padma.2.24.28)

मैत्रमेवं करिष्यामि तेन सार्द्धं द्विजोत्तमाः । वृत्रमिंद्रस्यसंस्थानं नीतं ब्राह्मणपुङ्गवैः

maitramevaṁ kariṣyāmi tena sārddhaṁ dvijottamāḥ vṛtramiṁdrasyasaṁsthānaṁ nītaṁ brāhmaṇapuṁgavaiḥ

—मैं उसके साथ मैत्री ही करूँगा, हे द्विजोत्तमो।' वृत्र को उन ब्राह्मणश्रेष्ठों द्वारा इंद्र के स्थान पर ले जाया गया।

श्लोक 29 (padma.2.24.29)

इन्द्रस्तमागतं दृष्ट्वा वृत्रं मित्रार्थमुद्यतः । सिंहासनात्समुत्थाय अर्घमादाय सत्वरः

indrastamāgataṁ dṛṣṭvā vṛtraṁ mitrārthamudyataḥ siṁhāsanātsamutthāya arghamādāya satvaraḥ

इंद्र ने उसे आया देखकर, मित्रता के लिए उद्यत वृत्र को, सिंहासन से उठकर शीघ्रता से अर्घ्य लेकर —

श्लोक 30 (padma.2.24.30)

ददौ तस्मै स धर्मात्मा वृत्राय द्विजसत्तम । अर्धं भुंक्ष्व महाप्राज्ञ ऐंद्रमेतन्महत्पदम्

dadau tasmai sa dharmātmā vṛtrāya dvijasattama ardhaṁ bhuṁkṣva mahāprājña aiṁdrametanmahatpadam

—उस धर्मात्मा ने वृत्र को दिया, हे द्विजसत्तम — 'हे महाप्राज्ञ! इस महान इंद्रपद का आधा भोग करो —

श्लोक 31 (padma.2.24.31)

वर्तितव्यं सुखेनापि आवाभ्यां दैत्यसत्तम । एवं विश्वासयन्दैत्यं वृत्र मैत्रेण वै तदा

vartitavyaṁ sukhenāpi āvābhyāṁ daityasattama evaṁ viśvāsayandaityaṁ vṛtra maitreṇa vai tadā

—हम दोनों को सुखपूर्वक रहना चाहिए, हे दैत्यसत्तम।' इस प्रकार मैत्री से उस दैत्य वृत्र को विश्वास दिलाकर —

श्लोक 32 (padma.2.24.32)

गतेषु तेषु विप्रेषु स्वस्थानं द्विजसत्तम । छिद्रं पश्यति दुष्टात्मा वृत्रस्यापि सदैव हि

gateṣu teṣu vipreṣu svasthānaṁ dvijasattama chidraṁ paśyati duṣṭātmā vṛtrasyāpi sadaiva hi

—जब वे विप्र अपने-अपने स्थान चले गए, हे द्विजसत्तम, तब वह दुष्टात्मा वृत्र में भी सदा छिद्र खोजता रहा।

श्लोक 33 (padma.2.24.33)

सावधानत्वमिंद्रोपि दिवारात्रौ प्रचिंतयेत् । तस्यच्छिद्रं न पश्येत वृत्रस्यापि महात्मनः

sāvadhānatvamiṁdropi divārātrau praciṁtayet tasyacchidraṁ na paśyeta vṛtrasyāpi mahātmanaḥ

इंद्र भी दिन-रात सावधानी से विचार करता रहा; किंतु उस महात्मा वृत्र में उसे कोई छिद्र दिखाई नहीं दिया।

श्लोक 34 (padma.2.24.34)

उपायं चिंतयामास तस्यैव वधहेतवे । रंभा संप्रेषिता तेन मोहयस्व महासुरम्

upāyaṁ ciṁtayāmāsa tasyaiva vadhahetave raṁbhā saṁpreṣitā tena mohayasva mahāsuram

उसने उसी के वध के लिए उपाय सोचा; उसने रंभा को भेजा — 'उस महासुर को मोहित करो —

श्लोक 35 (padma.2.24.35)

येनकेनाप्युपायेन यथा हत्वा लभे सुखम् । तथा कुरुष्व कल्याणि संमोहाय सुरद्विषः

yenakenāpyupāyena yathā hatvā labhe sukham tathā kuruṣva kalyāṇi saṁmohāya suradviṣaḥ

—जिस किसी भी उपाय से, ताकि उसे मारकर मैं सुख प्राप्त करूँ। ऐसा करो, हे कल्याणी, उस देवशत्रु को मोहित करने के लिए।'

श्लोक 36 (padma.2.24.36)

वनं पुण्यं महादिव्यं पुण्यपादपसेवितम् । बहुवृक्षफलोपेतं मृगपक्षिसमाकुलम्

vanaṁ puṇyaṁ mahādivyaṁ puṇyapādapasevitam bahuvṛkṣaphalopetaṁ mṛgapakṣisamākulam

वह पुण्य, महादिव्य वन, पुण्य वृक्षों से सेवित, अनेक फलदार वृक्षों से युक्त, मृग-पक्षियों से भरा हुआ —

श्लोक 37 (padma.2.24.37)

विमानमंदिरैर्दिव्यैः सर्वत्र परिशोभितम् । दिव्यगंधर्वसंगीतं भ्रमराकुलितं सदा

vimānamaṁdirairdivyaiḥ sarvatra pariśobhitam divyagaṁdharvasaṁgītaṁ bhramarākulitaṁ sadā

—विमान-मंदिरों से सर्वत्र सुशोभित, दिव्य गंधर्व-संगीत से युक्त, सदा भ्रमरों से व्याप्त —

श्लोक 38 (padma.2.24.38)

कोकिलानां रुतैः पुण्यैः सर्वत्र मधुरायतैः । शिखिसारंगनादैश्च सर्वत्र सुसमाकुलम्

kokilānāṁ rutaiḥ puṇyaiḥ sarvatra madhurāyataiḥ śikhisāraṁganādaiśca sarvatra susamākulam

—कोयलों की पुण्य, मधुर बोलियों से सर्वत्र भरा हुआ, मयूरों और हरिणों के स्वरों से सर्वत्र भरा हुआ —

श्लोक 39 (padma.2.24.39)

दिव्यैस्तु चंदनैर्वृक्षैः सर्वत्र समलंकृतम् । वापीकुंडतडागैश्च जलपूर्णैर्मनोहरैः

divyaistu caṁdanairvṛkṣaiḥ sarvatra samalaṁkṛtam vāpīkuṁḍataḍāgaiśca jalapūrṇairmanoharaiḥ

—दिव्य चंदन के वृक्षों से सर्वत्र अलंकृत, बावड़ियों, कुंडों और तालाबों से, जल से भरे, मनोहर —

श्लोक 40 (padma.2.24.40)

कमलैः शतपत्रैश्च पुष्पितैः समलंकृतम् । देवगंधर्वसंसिद्धैश्चारणैश्चैव किन्नरैः

kamalaiḥ śatapatraiśca puṣpitaiḥ samalaṁkṛtam devagaṁdharvasaṁsiddhaiścāraṇaiścaiva kinnaraiḥ

—शतदल कमलों से खिले हुए, अलंकृत; देव-गंधर्व-सिद्ध, चारण और किन्नरों से —

श्लोक 41 (padma.2.24.41)

मुनिभिः शुशुभे दिव्यैर्दिव्योद्यानवरेण च । अप्सरोगणसंकीर्णं नानाकौतुकमंगलैः

munibhiḥ śuśubhe divyairdivyodyānavareṇa ca apsarogaṇasaṁkīrṇaṁ nānākautukamaṁgalaiḥ

—दिव्य मुनियों से और उत्तम दिव्य उद्यान से सुशोभित; अप्सरागणों से भरा, नाना कौतुकों और मंगलों से युक्त —

श्लोक 42 (padma.2.24.42)

हेमप्रासादसंबाधं दंडच्छत्रैश्च चामरैः । कलशैश्च पताकाभिः सर्वत्रसमलंकृतम्

hemaprāsādasaṁbādhaṁ daṁḍacchatraiśca cāmaraiḥ kalaśaiśca patākābhiḥ sarvatrasamalaṁkṛtam

—स्वर्ण-प्रासादों से भरा, दंड-छत्रों, चामरों, कलशों और पताकाओं से सर्वत्र अलंकृत —

श्लोक 43 (padma.2.24.43)

वेदध्वनिसमाकीर्णं गीतध्वनिसमाकुलम् । एवं नंदनमासाद्य सा रंभा चारुहासिनी

vedadhvanisamākīrṇaṁ gītadhvanisamākulam evaṁ naṁdanamāsādya sā raṁbhā cāruhāsinī

—वेदध्वनि से भरा, गीत-ध्वनि से व्याप्त — इस प्रकार उस नंदन वन में पहुँचकर वह रंभा, मधुर हास्य वाली —

श्लोक 44 (padma.2.24.44)

अप्सरोभिः समं तत्र क्रीडत्येवं विलासिनी । सूत उवाच- एकदा तु स वृत्रो वै कालाकृष्टो गतो वनम्

apsarobhiḥ samaṁ tatra krīḍatyevaṁ vilāsinī sūta uvāca- ekadā tu sa vṛtro vai kālākṛṣṭo gato vanam

—वहाँ अप्सराओं के साथ ही, वह विलासिनी, क्रीड़ा करने लगी। सूत जी ने कहा — एक बार वह वृत्र काल से आकर्षित होकर उस वन में गया —

श्लोक 45 (padma.2.24.45)

कतिभिर्दानवैः सार्द्धं मुदया परया युतः । अलक्ष्ये भ्रमते पार्श्वं तस्यैव च महात्मनः

katibhirdānavaiḥ sārddhaṁ mudayā parayā yutaḥ alakṣye bhramate pārśvaṁ tasyaiva ca mahātmanaḥ

—कुछ दानवों के साथ, परम आनंद से युक्त होकर; उस महात्मा के पास अलक्ष्य होकर भ्रमण करती —

श्लोक 46 (padma.2.24.46)

देवराजोपि विप्रेंद्रश्छिद्रान्वेषी द्विषां किल । स हि वृत्रो महाप्राज्ञो विश्वस्तः सर्वकर्मसु

devarājopi vipreṁdraśchidrānveṣī dviṣāṁ kila sa hi vṛtro mahāprājño viśvastaḥ sarvakarmasu

—देवराज भी, हे विप्रेंद्र, शत्रुओं की दुर्बलता खोजने वाला था। किंतु वह महाप्राज्ञ वृत्र सब कर्मों में विश्वस्त रहा —

श्लोक 47 (padma.2.24.47)

इंद्रं मित्रं परं जानन्भयं चक्रे न तस्य सः । भ्रममाणो वनं पश्येत्सर्वत्र परमं शुभम्

iṁdraṁ mitraṁ paraṁ jānanbhayaṁ cakre na tasya saḥ bhramamāṇo vanaṁ paśyetsarvatra paramaṁ śubham

—इंद्र को अपना परम मित्र जानकर उसने उससे भय नहीं किया। भ्रमण करते हुए वह वन को देखता, सर्वत्र अत्यंत शुभ —

श्लोक 48 (padma.2.24.48)

सुरम्यं कौतुकवनं वनितागणसंकुलम् । चंदनस्यापि वृक्षस्य छायां शीतां सुपुण्यदाम्

suramyaṁ kautukavanaṁ vanitāgaṇasaṁkulam caṁdanasyāpi vṛkṣasya chāyāṁ śītāṁ supuṇyadām

—सुरम्य, कौतुकों से भरा, स्त्रीगणों से व्याप्त; और चंदन के वृक्ष की शीतल, पुण्यदायी छाया का —

श्लोक 49 (padma.2.24.49)

समाश्रित्य विशालाक्षी रंभा तत्र प्रदीव्यति । सखीभिस्तु महाभागा दोलारूढा यशस्विनी

samāśritya viśālākṣī raṁbhā tatra pradīvyati sakhībhistu mahābhāgā dolārūḍhā yaśasvinī

—आश्रय लेकर वह विशालाक्षी रंभा वहाँ क्रीड़ा कर रही थी; वह महाभागा, यशस्विनी, सखियों के साथ झूले पर आरूढ़ —

श्लोक 50 (padma.2.24.50)

गायते सुस्वरं गीतं सर्वविश्वप्रमोहनम् । तत्र वृत्रः समायातः कामाकुलितमानसः

gāyate susvaraṁ gītaṁ sarvaviśvapramohanam tatra vṛtraḥ samāyātaḥ kāmākulitamānasaḥ

—मधुर स्वर में गीत गा रही थी, जो समस्त विश्व को मोहित करने वाला था। वहाँ वृत्र आया, काम से व्याकुल मन वाला —

श्लोक 51 (padma.2.24.51)

दोलारूढां समालोक्य रंभां चारुसुलोचनाम्

dolārūḍhāṁ samālokya raṁbhāṁ cārusulocanām

—झूले पर आरूढ़, सुंदर सुनयना रंभा को देखकर।

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25