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भूमि खण्ड · अध्याय 25

रंभा द्वारा वृत्र का मोहन तथा उसका छलपूर्ण वध

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26

श्लोक 1 (padma.2.25.1)

सूत उवाच- इयं हि का गायति चारुलोचना विलासभावैः परिविश्वमेव । अतीव बाला शुशुभे मनोहरा संपूर्णभावैः परिमोहयेज्जनम्

sūta uvāca- iyaṁ hi kā gāyati cārulocanā vilāsabhāvaiḥ pariviśvameva atīva bālā śuśubhe manoharā saṁpūrṇabhāvaiḥ parimohayejjanam

सूत जी ने कहा — वृत्र ने सोचा — 'यह चारुलोचना कौन है, जो अपने विलासभावों से संपूर्ण विश्व को भर रही है? अत्यंत युवा, मनोहर, अपने पूर्ण भावों से जन को मोहित करने वाली दिखाई देती है।'

श्लोक 2 (padma.2.25.2)

दृष्ट्वा स रंभां कमलायताक्षीं पीनस्तनीं चर्चितकुंकुमांगीम् । पद्माननां कामगृहं ममैषा नो वा रतिश्चारुमनोहरेयम्

dṛṣṭvā sa raṁbhāṁ kamalāyatākṣīṁ pīnastanīṁ carcitakuṁkumāṁgīm padmānanāṁ kāmagṛhaṁ mamaiṣā no vā ratiścārumanohareyam

उस रंभा को, कमल जैसे विशाल नेत्रों वाली, पीन-स्तनों वाली, कुंकुम से लिप्त अंगों वाली, कमल-मुखी को देखकर उसने सोचा — 'क्या यह मेरे लिए कामगृह है, या यह स्वयं रति है, मनोहर और सुंदर?'

श्लोक 3 (padma.2.25.3)

संपूर्णभावां परिरूपयुक्तां कामांगशीलामतिशीलभावाम् । यास्याम्यहं वश्यमिहैव अस्या मनोभवेनाद्य इहैव प्रेषितः

saṁpūrṇabhāvāṁ parirūpayuktāṁ kāmāṁgaśīlāmatiśīlabhāvām yāsyāmyahaṁ vaśyamihaiva asyā manobhavenādya ihaiva preṣitaḥ

'संपूर्ण भावों से युक्त, समस्त सौंदर्य से संपन्न, जिसके अंग ही कामस्वरूप हैं, अत्यंत शीलवती — मैं इसके वश में हो जाऊँगा; आज ही मानो कामदेव द्वारा मुझे यहीं भेजा गया हो —'

श्लोक 4 (padma.2.25.4)

इतीव दैत्यः सुविचिंतयान्वितः कामेन मुग्धो बहुकालनोदितः । समातुरस्तत्र जगाम सत्वरमुवाच तां दीनमनाः सुलोचनाम्

itīva daityaḥ suviciṁtayānvitaḥ kāmena mugdho bahukālanoditaḥ samāturastatra jagāma satvaramuvāca tāṁ dīnamanāḥ sulocanām

—ऐसा विचार करता हुआ वह दैत्य, बहुत काल से जगे हुए काम से मोहित, व्याकुल होकर वहाँ शीघ्रता से गया और दीन मन से उस सुनयना से बोला —

श्लोक 5 (padma.2.25.5)

कस्यासि वा सुंदरि केन प्रेषिता किं नाम ते पुण्यतमं वदस्व मे । तवैव रूपेण महातितेजसा मुग्धोस्मि बाले मम वश्यतां व्रज

kasyāsi vā suṁdari kena preṣitā kiṁ nāma te puṇyatamaṁ vadasva me tavaiva rūpeṇa mahātitejasā mugdhosmi bāle mama vaśyatāṁ vraja

'हे सुंदरी! तुम किसकी हो, किसके द्वारा भेजी गई हो? अपना अत्यंत पुण्य नाम मुझे बताओ। तुम्हारे ही अत्यंत तेजस्वी रूप से मैं मोहित हो गया हूँ, हे बाला! मेरे वश में हो जाओ।'

श्लोक 6 (padma.2.25.6)

एवमुक्ता विशालाक्षी वृत्रं कामाकुलं प्रति । अहं रंभा महाभाग क्रीडार्थं वनमुत्तमम्

evamuktā viśālākṣī vṛtraṁ kāmākulaṁ prati ahaṁ raṁbhā mahābhāga krīḍārthaṁ vanamuttamam

इस प्रकार कहे जाने पर उस विशालाक्षी ने काम से व्याकुल वृत्र से कहा — 'मैं रंभा हूँ, हे महाभाग! क्रीड़ा के लिए इस उत्तम वन में —

श्लोक 7 (padma.2.25.7)

सखीसार्धं समायाता नंदनं वनमुत्तमम् । त्वं तु को वा किमर्थं हि मम पार्श्वं समागतः

sakhīsārdhaṁ samāyātā naṁdanaṁ vanamuttamam tvaṁ tu ko vā kimarthaṁ hi mama pārśvaṁ samāgataḥ

—सखियों सहित इस उत्तम नंदन वन में आई हूँ। किंतु तुम कौन हो, और किस कारण मेरे पास आए हो?'

श्लोक 8 (padma.2.25.8)

वृत्र उवाच- श्रूयतामभिधास्यामि योहं बाले समागतः । हुताशनात्समुत्पन्नः कश्यपस्य सुतः शुभे

vṛtra uvāca- śrūyatāmabhidhāsyāmi yohaṁ bāle samāgataḥ hutāśanātsamutpannaḥ kaśyapasya sutaḥ śubhe

वृत्र ने कहा — 'सुनो, मैं बताता हूँ कि मैं कौन हूँ, हे बाला, जो यहाँ आया हूँ। मैं हवनाग्नि से उत्पन्न, कश्यप का पुत्र हूँ, हे शुभे।

श्लोक 9 (padma.2.25.9)

सखाहं देवदेवस्य इंद्र स्यापि वरानने । ऐंद्रं पदं वरारोहे अर्धं मे भुक्तिमागतम्

sakhāhaṁ devadevasya iṁdra syāpi varānane aiṁdraṁ padaṁ varārohe ardhaṁ me bhuktimāgatam

मैं देवदेव इंद्र का भी मित्र हूँ, हे वरानने। इंद्रपद, हे वरारोहे, उसका आधा मुझे भोग के लिए प्राप्त हुआ है।

श्लोक 10 (padma.2.25.10)

अहं वृत्रः कथं देवि मामेवं न तु विंदसि । त्रैलोक्यं वशमायातं यस्यैव वरवर्णिनि

ahaṁ vṛtraḥ kathaṁ devi māmevaṁ na tu viṁdasi trailokyaṁ vaśamāyātaṁ yasyaiva varavarṇini

मैं वृत्र हूँ — यह कैसे है, हे देवी, कि तुम मुझे नहीं पहचानतीं? त्रिभुवन जिसके ही वश में आ गया है, हे वरवर्णिनी —

श्लोक 11 (padma.2.25.11)

अहं शरणमायातः कामाद्रक्ष वरानने । भजस्व मां विशालाक्षि कामेनाकुलितं प्रिये

ahaṁ śaraṇamāyātaḥ kāmādrakṣa varānane bhajasva māṁ viśālākṣi kāmenākulitaṁ priye

—मैं काम से पीड़ित होकर तुम्हारी शरण आया हूँ, हे वरानने, मेरी रक्षा करो। मुझ काम से व्याकुल का स्वीकार करो, हे विशालाक्षी, हे प्रिये!'

श्लोक 12 (padma.2.25.12)

रंभोवाच- वशगा हं तवैवाद्य भविष्यामि न संशयः । यं यं वदाम्यहं वीर तं तं कार्यं त्वयैव हि

raṁbhovāca- vaśagā haṁ tavaivādya bhaviṣyāmi na saṁśayaḥ yaṁ yaṁ vadāmyahaṁ vīra taṁ taṁ kāryaṁ tvayaiva hi

रंभा ने कहा — 'मैं आज ही तुम्हारे वश में हो जाऊँगी, इसमें संदेह नहीं; किंतु मैं जो-जो कहूँ, हे वीर, वह-वह तुम्हें ही करना होगा।'

श्लोक 13 (padma.2.25.13)

एवमस्तु महाभागे तं तं सर्वं करोम्यहम् । एवं संबंधकं कृत्वा तया सह महाबलः

evamastu mahābhāge taṁ taṁ sarvaṁ karomyaham evaṁ saṁbaṁdhakaṁ kṛtvā tayā saha mahābalaḥ

'ऐसा ही हो, हे महाभागे! वह सब मैं करूँगा।' इस प्रकार उससे संबंध बनाकर वह महाबली —

श्लोक 14 (padma.2.25.14)

तस्मिन्वने महापुण्ये रेमे दानवसत्तमः । तस्या गीतेन नृत्येन हास्येन ललितेन च

tasminvane mahāpuṇye reme dānavasattamaḥ tasyā gītena nṛtyena hāsyena lalitena ca

—उस महापुण्यमय वन में उस दानवश्रेष्ठ ने विहार किया, उसके गीत, नृत्य, हास्य और मधुर लीला से।

श्लोक 15 (padma.2.25.15)

अतिमुग्धो महादैत्यः स तस्याः सुरतेन च । तमुवाच महाभागं वृत्रं दानवसत्तमम्

atimugdho mahādaityaḥ sa tasyāḥ suratena ca tamuvāca mahābhāgaṁ vṛtraṁ dānavasattamam

वह महादैत्य उसके साथ सुरत में अत्यंत मोहित हो गया। तब उसने उस महाभागा वृत्र, दानवसत्तम से कहा —

श्लोक 16 (padma.2.25.16)

सुरापानं कुरुष्वेह पिबस्व मधुमाधवीम् । तामुवाच विशालाक्षीं रंभां शशिनिभाननाम्

surāpānaṁ kuruṣveha pibasva madhumādhavīm tāmuvāca viśālākṣīṁ raṁbhāṁ śaśinibhānanām

—'यहाँ सुरापान करो, माधवी मदिरा पीओ।' उसने उस विशालाक्षी, चंद्रमुखी रंभा से कहा —

श्लोक 17 (padma.2.25.17)

पुत्रोहं ब्राह्मणस्यापि वेदवेदांगपारगः । सुरापानं कथं भद्रे करिष्यमि विनिंदितम्

putrohaṁ brāhmaṇasyāpi vedavedāṁgapāragaḥ surāpānaṁ kathaṁ bhadre kariṣyami viniṁditam

'मैं तो एक ब्राह्मण का पुत्र हूँ, वेद-वेदांगों में पारंगत। हे भद्रे! सुरापान जैसा निंदित कार्य मैं कैसे करूँ?'

श्लोक 18 (padma.2.25.18)

तया तु रंभया देव्या प्रीत्या दत्ता सुरा हठात् । तस्या दाक्षिण्यभावेन सुरापानं कृतं तदा

tayā tu raṁbhayā devyā prītyā dattā surā haṭhāt tasyā dākṣiṇyabhāvena surāpānaṁ kṛtaṁ tadā

किंतु उस देवी रंभा द्वारा प्रीतिपूर्वक मदिरा हठपूर्वक दी गई; उसके प्रति शिष्टाचार के भाव से तब सुरापान किया गया।

श्लोक 19 (padma.2.25.19)

अतीवमुग्धं सुरया ज्ञानभ्रष्टो यदाभवत् । तदंतरे सुरेंद्रेण वज्रेण निहतस्तदा

atīvamugdhaṁ surayā jñānabhraṣṭo yadābhavat tadaṁtare sureṁdreṇa vajreṇa nihatastadā

जब वह मदिरा से अत्यंत मोहित, ज्ञान से भ्रष्ट हो गया, उसी बीच में सुरेंद्र ने उसे वज्र से मार डाला।

श्लोक 20 (padma.2.25.20)

ब्रह्महत्यादिकैः पापैः स लिप्तो वृत्रहा ततः । ब्राह्मणास्तु ततः प्रोचुरिंद्र पापं कृतं त्वया

brahmahatyādikaiḥ pāpaiḥ sa lipto vṛtrahā tataḥ brāhmaṇāstu tataḥ procuriṁdra pāpaṁ kṛtaṁ tvayā

उस वृत्रहंता को तब ब्रह्महत्या आदि पापों से लिप्त होना पड़ा। तब ब्राह्मणों ने कहा — 'हे इंद्र! तुमने पाप किया है —

श्लोक 21 (padma.2.25.21)

अस्माद्वाक्यात्तु विश्वस्तो वृत्रो नाम महाबलः । हतो विश्वासभावेन एवं पापं त्वया कृतम्

asmādvākyāttu viśvasto vṛtro nāma mahābalaḥ hato viśvāsabhāvena evaṁ pāpaṁ tvayā kṛtam

—जिस वचन पर विश्वास कर वह महाबली वृत्र नामधारी विश्वासपूर्वक मारा गया, इस प्रकार तुमने यह पाप किया है।'

श्लोक 22 (padma.2.25.22)

इंद्र उवाच- येन केनाप्युपायेन हंतव्योरिः सदैव हि । देवब्राह्मणहंतारं यज्ञानां धर्मकंटकम्

iṁdra uvāca- yena kenāpyupāyena haṁtavyoriḥ sadaiva hi devabrāhmaṇahaṁtāraṁ yajñānāṁ dharmakaṁṭakam

इंद्र ने कहा — 'जिस किसी भी उपाय से, शत्रु का सदा वध करना ही चाहिए। देव-ब्राह्मणों का हंता, यज्ञों का, धर्म का कंटक —

श्लोक 23 (padma.2.25.23)

निहतं दानवं दुष्टं त्रैलोक्यस्यापि नायकम् । तदर्थं कुपिता यूयमेतन्न्यायस्य लक्षणम्

nihataṁ dānavaṁ duṣṭaṁ trailokyasyāpi nāyakam tadarthaṁ kupitā yūyametannyāyasya lakṣaṇam

—उस दुष्ट दानव को, त्रिभुवन के भी नायक को, मैंने मार डाला। क्या इसीलिए तुम मुझसे क्रुद्ध हो? क्या यह न्याय का लक्षण है?

श्लोक 24 (padma.2.25.24)

विचारमेवं कर्त्तव्यं भवद्भिर्द्विजसत्तमाः । पश्चात्कोपं प्रकर्त्तव्यमन्यायं मम चिंत्यताम्

vicāramevaṁ karttavyaṁ bhavadbhirdvijasattamāḥ paścātkopaṁ prakarttavyamanyāyaṁ mama ciṁtyatām

ऐसा विचार तुम्हें करना चाहिए, हे द्विजसत्तमो; क्रोध बाद में करना चाहिए — पहले विचार करो कि मैंने कोई अन्याय किया या नहीं।'

श्लोक 25 (padma.2.25.25)

एवं संबोधिता विप्रा इंद्रेणापि महात्मना । ब्रह्मादिभिः सुरैः सर्वैर्बोधितास्ते च सत्तमाः

evaṁ saṁbodhitā viprā iṁdreṇāpi mahātmanā brahmādibhiḥ suraiḥ sarvairbodhitāste ca sattamāḥ

इस प्रकार उस महात्मा इंद्र द्वारा समझाए गए, और ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं द्वारा भी समझाए गए वे विप्र, वे सत्तम —

श्लोक 26 (padma.2.25.26)

जग्मुः स्वस्थानमेवं हि निहते धर्मकंटके

jagmuḥ svasthānamevaṁ hi nihate dharmakaṁṭake

—अपने-अपने स्थान को चले गए, इस प्रकार वह धर्मकंटक मारा जाकर।

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